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बॉस के ‘ख़ौफ़’ से आज़ादी: मोदी सरकार ने पास किया ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2018’

इस बिल के क़ानून बनने के बाद कर्मचारियों को काम के घंटों से परे कार्य संबंधी कॉल को डिस्कनेक्ट करने या ईमेल का ज़वाब नहीं देने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा

निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए राहत की एक बड़ी ख़बर सामने आई है। इसका सीधा संबंध कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से ‘अच्छे दिन’ का एहसास कराएगा। मोदी सरकार ने लोकसभा में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक ऐसा बिल पास किया है, जिसके मुताबिक़ कार्यालय समय के बाद अब अपने बॉस के फ़ोन कॉल और ईमेल का जवाब देने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह एक अच्छी ख़बर है। लोकसभा ने ऑफ़िस टाइम के बाद कार्य संबंधी कॉल या ईमेल को डिस्कनेक्ट करने का बिल पास कर दिया गया।

लोकसभा में ‘राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2018’ को एनसीपी (राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी) सांसद सुप्रिया सुले द्वारा पेश किया गया। इस बिल के क़ानून बनने के बाद कर्मचारियों को काम के घंटों से परे कार्य संबंधी कॉल को डिस्कनेक्ट करने या ईमेल का ज़वाब नहीं देने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। यहाँ तक कि छुट्टियों पर भी, कर्मचारियों को फ़ोन कॉल का जवाब देने की किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं रहेगी।

सुप्रिया सुले ने कहा है कि इस बिल के माध्यम से कोई भी कंपनी किसी भी कर्मचारी पर अतिरिक्त कार्यभार नहीं थोप सकेगी। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस क़ानून के बाद कर्मचारियों के तनाव में कमी आएगी, जिससे उनके व्यक्तिगत जीवन में बेहतर स्थिरता आएगी।

हालाँकि, यह बिल अभी लोकसभा से पास हुआ है और क़ानून बनने की राह में अभी राज्यसभा की मंज़ूरी मिलनी बाक़ी है।

आइए आपको यह भी बताते चलें कि इस बिल के तहत किन-किन बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति न पैदा हो सके। इस बिल की धारा-7 के अनुसार कुछ ऐसे तथ्य भी शामिल हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

काम के घंटों के बाद यदि कोई कर्मचारी (महिला/ पुरुष) चाहे तो बॉस के कॉल को डिस्कनेक्ट कर सकता/ सकती है। हालाँकि बॉस के अलावा सहयोगी कर्मचारी अन्य कर्मचारी से समपर्क कर सकता है।

काम के घंटों के दौरान यानि ऑफ़िस टाइम में ऑफ़िशियल कॉल डिस्कनेक्ट और ईमेल का जवाब न देने जैसी गतिविधियाँ इस बिल का हिस्सा नहीं होंगी। जिसका सीधा सा मतलब है कि यदि कोई कर्मचारी इस प्रकार की अनुशासनहीनता का आचरण करता है, तो वो कर्मचारी निजी कंपनी द्वारा तय नियमों के अनुसार दंड का अधिकारी होगा।

इस विधेयक के तहत, एक कल्याण प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के राज्य मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होंगे। संचार मंत्रालय के साथ-साथ श्रम व रोजगार मंत्रालय के राज्य मंत्री इसके उपाध्यक्ष होंगे।

साथ ही, इस बिल के तहत एक चार्टर भी तैयार किया जाएगा। इस चार्टर के तहत, जिन कंपनियों के पास 10 से अधिक कर्मचारी हैं, उन्हें अपने कर्मचारियों से बात करनी होगी और इसमें शामिल करना होगा कि वे चार्टर में क्या चाहते हैं, उसके बाद ही रिपोर्ट बनाई जाएगी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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