Thursday, November 26, 2020
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6 BJP समर्थकों की हत्या: यह आँकड़ा सिर्फ लोकसभा नतीजों के बाद, फिर भी भाजपा ही फासिस्ट!

मीडिया गिरोहों और फर्जी लिबरलों को जवाब देना चाहिए कि अगर भाजपा सही में नफरती और फासिस्ट पार्टी है तो आखिर इतने सारे भाजपाई अपनी ही पार्टी के राज में क्यों असुरक्षित हैं?

लोकसभा निर्वाचन के नतीजों की घोषणा के बाद से अब तक छह भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, अन्य कई पर हमले हो रहे हैं और इतने के बाद भी मीडिया लगातार भाजपा को ही फासीवादी, लोकतंत्र-विरोधी और गुंडा पार्टी बताने में व्यस्त है। इससे पहले भी लोकसभा की निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं की बंगाल, कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक में हत्या हुई थी। उस समय भी और इस समय भी न केवल इन हत्याओं पर पत्रकारिता के समुदाय विशेष की आँखें फिरी हुईं हैं, बल्कि अभी भी नैरेटिव यही चलाया जा रहा है कि भाजपा के फिर से आने का मतलब कितने दिन में देश में दंगे शुरू होने वाले हैं।

ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, महिला: कोई भी (भाजपा समर्थक) नहीं सुरक्षित

हालात यह है कि भाजपा की केंद्र और अधिकाँश राज्यों में सरकारें होते हुए भी सबसे ज्यादा असुरक्षित और ‘डर का माहौल’ भाजपाईयों के लिए ही है। जिन 14 घटनाओं (जिनमें से 6 हत्या की हैं) का जिक्र हम नीचे करने जा रहे हैं, उनमें से अधिकाँश भाजपा-शासित प्रदेशों में ही हुईं हैं। यही नहीं, “जाति-वर्ग-मज़हब की दीवारों को तोड़ते हुए” यह पीड़ित ब्राह्मण, मुस्लिम, महिला, दलित यानी की समाज के हर वर्ग से हैं। यानी भाजपा की जीत के बाद सबसे ज्यादा जिसे डर के, संभल के रहने की जरूरत है वह न मुस्लिम है न दलित, और न ही महिला- वह भाजपा का ही समर्थक वर्ग है।

यूपी में दो हत्याएँ नतीजों के बाद की, एक पहले की, कुल 8 वारदातें

यह विडंबना ही कही जाएगी कि एक तरफ योगी सरकार बनने के बाद से यूपी में आम जनता के लिए कानून व्यवस्था में भारी सुधार हुआ है, दूसरी तरफ इस संकलन में भाजपाईयों या भाजपा-वोटरों पर हुए 14 में से 8 हमले भी केवल उत्तर प्रदेश के ही हैं। नतीजे आने के बाद से अमेठी की नवनिर्वाचित सांसद स्मृति ईरानी के सहयोगी सुरेंद्र सिंह के अलावा हापुड़ में भाजपा के पन्ना प्रमुख चंद्रपाल सिंह की भी सोते में गोली मारकर हत्या कर दी गई है। इन दोनों के अलावा निर्वाचन प्रक्रिया जब चल रही थी, तब भी गाजीपुर के तरवनियाँ गाँव में एक बसपा समर्थक ने अपनी ही पत्नी को भाजपा को वोट देने के लिए काट डाला था

यही नहीं, प्रदेश के मुरादाबाद में दो मुस्लिम भाईयों को भी उनके ही रिश्तेदारों की गोलियों का शिकार इसलिए होना पड़ा क्योंकि वे दोनों भाजपा के समर्थक थे और उनके परिवार ने भाजपा को वोट दिया था। लेकिन अब चूँकि वे भाजपा-समर्थक मुस्लिम थे और उनकी हत्या का प्रयास करने वाले भाजपा विरोधी ‘समुदाय विशेष’, इसलिए न ही उन दोनों भाइयों के लिए जुनैद और अखलाक जैसा हंगामा हुआ, न ही ₹50 लाख का पिटारा खुला। इसके अलावा एक दूसरे मुस्लिम को उसके ही बेटे ने जान से मारने की धमकी दी, क्योंकि उसने भी मोदी को वोट दिया था

लोकसभा निर्वाचन के नतीजे आने के बाद प्रयागराज में पवन द्विवेदी के परिवार को सपा-समर्थक रामचंद्र यादव, शिवम यादव, दिनेश यादव, जुगल किशोर और रवि शंकर यादव ने घर में घुस कर पीटा क्योंकि हिदायत दिए जाने के बावजूद 12 मई के मतदान में इस परिवार ने भाजपा को वोट देने की हिमाकत की थी। द्विवेदी परिवार द्वारा दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक न केवल इन पाँचों ने पवन द्विवेदी, मनीष द्विवेदी और कल्लू द्विवेदी को लाठी-डंडे से पीटा बल्कि घर की महिलाओं से भी अभद्रता की। इसी तरह बुलंदशहर के मुस्तफागढ़ी में रहने वाली रहसार को भी उनके रिश्तेदारों ने इसीलिए पीटा क्योंकि उन्होंने बसपा को वोट देने के खानदानी ‘फतवे’ को नज़रअंदाज़ कर भाजपा को वोट दिया था

दलितों और मुस्लिमों के लिए हर ओर ‘भय का माहौल’ देख-देख चिंतित होने वाले वामपंथी मीडिया गिरोह के लोग उस दलित परिवार की दुर्दशा पर चुप हैं, जिसे भोलू पुत्र कल्लू खां, गुड्डू पुत्र कल्लू खां, चिंटू पुत्र इम्तियाज खां, साबिर, सूरज और इम्तियाज खां पुत्र सकूर खां के हाथों, प्राथमिकी के अनुसार, मारपीट, छेड़छाड़, अनुसूचित जाति उत्पीड़न समेत कई तरह की प्रताड़नाएँ सहनी पड़ीं। मुलायम के ‘गढ़’ रहे इटावा में इकदिल कस्बे की शशिबाला ने जब अपने आसपास के लोगों को बताया कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया था तो भोलू ने 40-50 समर्थकों सहित उनके घर पर धावा बोल दिया। शशिबाला के बेटों बजरंगी और दीपक को भी मारा गया। महिलाओं के साथ भी अभद्रता की। इसलिए कि इस दलित परिवार ने भाजपा को वोट दिया था

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेसियों के हाथों हलाक भाजपाई

महाराष्ट्र में न केवल एक बार फिर खुद भाजपा की सरकार है बल्कि महाराष्ट्र में वह नागपुर भी है जहाँ से पत्रकारिता के समुदाय विशेष को यह देश चलता हुआ लगता है। उसके बावजूद भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के कार्यकर्ता मतीन पटेल की हत्या आरोपी कॉन्ग्रेस नेता हिदायत पटेल कथित तौर पर 8-10 लोगों के साथ मिलकर कर देते हैं। कॉन्ग्रेस के राज वाले मध्य प्रदेश में भी भाजपा कार्यकर्ता नेमीचंद तंवर को कॉन्ग्रेस नेता अरुण शर्मा कथित तौर पर मार देते हैं। खबरों के अनुसार जब शर्मा ने तंवर को गोली मारी तो तंवर का बेटा उनके साथ ही था

झारखंड-हरियाणा में भाजपा समर्थक मुस्लिम घर में ज्यादा असुरक्षित या बाहर?

झारखंड में सहाना खातून का भाजपा को वोट देना उनके शौहर कुदुस अंसारी को इतना नागवार गुजरा कि उसने अपनी पत्नी को पीट दिया। मजबूरी में बेगम को शौहर के खिलाफ प्राथमिकी करानी पड़ी। प्राथमिकी में उन्होंने दावा किया कि शौहर ही नहीं, पहले पड़ोसी के लड़के ओसामा ने भी पीटा। उसके बाद शौहर ने ओसामा के साथ मिलकर पीटा– अपनी ही बेगम को।

हरियाणा के फजरू ने भाजपा को वोट क्या दिया, उनका समुदाय ही उनका दुश्मन बन बैठा। पिटने और लुटने के बाद फजरू द्वारा दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक तौफीक, नसीम, राकिब ने अन्य गुंडों के साथ मिलकर न केवल उनके ₹30 हजार लूट लिए बल्कि कॉन्ग्रेस की बजाय भाजपा को वोट देने का ‘मजा भी चखाया’।

बंगाल बेहाल, त्रिपुरा में दंगे जैसी स्थिति

बंगाल में तृणमूल द्वारा शुरू किया गया हिंसा और हत्या का बवंडर लोकसभा के नतीजों के बाद भी नहीं थमा है। महज 25 साल के सन्तु घोष को तृणमूल छोड़ भाजपा में जाने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। वह नादिया के चकदाह इलाके का निवासी था। वहीं भाजपा का परचम वाम का किला तोड़ लहराने वाले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब उस परचम के नीचे अपने लोगों को महफूज़ रखने के लिए संघर्षरत दिख रहे हैं। चार दिन से, यानी नतीजों के ठीक बाद से जारी हिंसा में भाजपा कार्यकर्ता शिबु दास (20) और मछली-विक्रेता अपू दास (56) को जान गँवानी पड़ी है। इसके पहले भाजपा कार्यकर्ता मिथु भौमिक भी इसी हिंसा की भेंट चढ़ गए थे। बिप्लब देब की चेतावनी और पुलिस द्वारा 23 प्राथमिकियों और 64 गिरफ्तारियों के बाद देखना है भाजपा के लोग कितने महफूज़ रहते हैं

गैरों पे करम तो ठीक, पर अपनों को ही न बिसरा दे भाजपा!

दूसरे राज्यों में तो यह तर्क समझा जा सकता है कि पुलिस का नियंत्रण अपने हाथों में न होने से भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की जान नहीं बचा पा रही लेकिन भाजपा-शासित राज्यों में उसके पास क्या जवाब है? वह भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ योगी आदित्यनाथ के शासन सँभालने के बाद पुलिस के खौफ से अपराधी खुद को गोली मार ले रहे हैं? दूसरे दलों के लोगों को भी न्याय और नीति से परिपूर्ण, भेदभाव-रहित शासन उपलब्ध कराने की भाजपा की नीति अच्छी है, लेकिन इस चक्कर में अपने कार्यकर्ताओं और विपरीत परिस्थितियों में अपना समर्थन करने वालों को भी सुरक्षा मुहैया कराना भी भाजपा का ही धर्म होगा- राजनीतिक भी, और प्रशासनिक रूप से भी।

इसके अलावा मीडिया गिरोहों और फर्जी लिबरलों को भी इस बात का जवाब देना चाहिए कि अगर भाजपा सही में नफरती और फासिस्ट पार्टी है उनके आरोप के मुताबिक, तो आखिर इतने सारे भाजपाई अपनी ही पार्टी के राज में क्यों असुरक्षित हैं?

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