Tuesday, March 5, 2024
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‘गॉड पार्टिकल’ की खोज के बाद बनने जा रही है LHC से बड़ी मशीन

LHC से आगे बढ़कर FCC बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि अभी तक हम एंटी मैटर और डार्क मैटर को नहीं समझ पाए हैं। हम यह नहीं जानते कि हिग्स बोसॉन में द्रव्यमान कहाँ से आता है।

ब्रह्माण्ड का निर्माण किन कणों से हुआ? पदार्थ की संरचना की सबसे छोटी इकाई कौन सी है? हमारे आसपास सभी चीज़ें किससे बनी हैं? इन प्रश्नों का उत्तर सैद्धांतिक रूप से पीटर हिग्स और सत्येंद्रनाथ बोस द्वारा कई दशक पहले दे दिया गया था किंतु प्रयोगों द्वारा हिग्स बोसॉन कणों के अस्तित्व की पुष्टि की घोषणा 4 जुलाई 2012 को की गई थी।

हिग्स बोसॉन कणों से ही समूचा ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ है इसीलिए लीओन लेडरमैन ने 1993 में प्रकाशित हुई अपनी पुस्तक में इन कणों को ‘गॉड पार्टिकल’ नाम दिया था। यह प्रयोग विश्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला CERN के ‘लार्ज हैड्रन कोलाइडर (LHC)’  में किया गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात अमेरिका आदि धनी देशों ने कुछ अत्यंत बड़ी वैज्ञानिक परियोजनाओं में निवेश किया था जिसे ‘बिग साइंस’ या ‘बिग फ़िज़िक्स’ कहा जाता है। स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर स्थित CERN पार्टिकल फ़िज़िक्स प्रयोगशाला अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से निर्मित एक बिग साइंस प्रोजेक्ट है जिसमें यूरोपीय करदाताओं के करोड़ों डॉलर का निवेश हुआ है।

ब्रह्माण्ड के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए यहाँ बड़ी-बड़ी मशीनों में पदार्थ के अत्यंत छोटे कण तीव्र गति पर दौड़ाए जाते हैं और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसी क्रम में लार्ज हैड्रन कोलाइडर को 2008 में प्रारंभ किया गया था जिसने कथित गॉड पार्टिकल के अस्तित्व को प्रयोगों द्वारा 2012 में प्रमाणित किया था।

लेकिन अब CERN लार्ज हैड्रन कोलाइडर (LHC) से भी चार गुना बड़ी मशीन बनाने की तैयारी में है। इस मशीन को ‘फ्यूचर सर्कुलर कोलाइडर’ या FCC कहा जाएगा। CERN की वेबसाइट पर जारी की गई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार FCC 100 किमी लंबी सुपरकंडक्टिंग प्रोटॉन एक्सेलरेटर रिंग होगी जिसमें करीब 100 टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा उत्पन्न होगी। यह पूरी परियोजना कई चरणों में पूरी होगी जिसपर लगभग 24 अरब यूरो का कुल खर्च आएगा।

FCC एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसमें यूरोपीयन यूनियन के राष्ट्र सम्मिलित हैं। भविष्य की इस परियोजना का अध्ययन 2014 में प्रारंभ किया गया था जिसके बाद अब इसकी ‘कॉन्सेप्चुअल डिज़ाइन रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई है। यह अध्ययन रिपोर्ट 150 शोध संस्थानों के 1300 विशेषज्ञों ने पाँच वर्ष की अवधि में बनाई है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परियोजना का आकार कितना बड़ा है।

LHC से आगे बढ़कर FCC बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि अभी तक हम एंटी मैटर और डार्क मैटर को नहीं समझ पाए हैं। भौतिकी के कुछ अनसुलझे रहस्यों में से एक यह भी है कि हम यह नहीं जानते कि हिग्स बोसॉन में द्रव्यमान कहाँ से आता है। पदार्थ के मूलभूत कणों की सर्वमान्य थ्योरी जिसे हम ‘स्टैण्डर्ड मॉडल ऑफ़ पार्टिकल फिजीक्स’ कहते हैं उसके बहुत से प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं जिनका उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें LHC में उत्पन्न ऊर्जा से अधिक ऊर्जा पर कणों का अध्ययन करने की आवश्यकता है।

इसलिए FCC परियोजना में कुल चार स्थितियों का वृहद् अध्ययन किया जाएगा। पहले चरण में एक 100 किमी लंबी सुरंग में लेप्टॉन कोलाइडर (FCC-ee) बनाया जाएगा जिसमें हिग्स बोसॉन और क्वॉर्क नामक अन्य कणों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाएगा। दूसरे चरण में प्रोटॉन तथा हेवी आयन के अध्ययन के लिए FCC-hh बनाया जाएगा जहाँ उच्च ऊर्जा पर कणों के बीच काम करने वाली फ़ोर्स का अध्ययन किया जाएगा।

ऐसे वातावरण में अरबों कण उत्पन्न होंगे जिनमें डार्क मैटर के संभावित कण WIMPS (Weakly Interacting Massive Particles) भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर उच्च दाब और तापमान पर पदार्थ के कण कैसा व्यवहार करते हैं इसका अध्ययन किया जाएगा। तीसरे चरण में एक इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन कोलाइडर FCC-he का निर्माण किया जाएगा जिसमें प्रोटॉन न्यूट्रॉन के भीतर मौजूद क्वॉर्क और ग्लूऑन कणों के व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा।

अंत में LHC को अपग्रेड कर उसे दो से तीन गुना अधिक ऊर्जा पर कार्य करने की क्षमता तक लाया जाएगा। यह पूरी परियोजना सात दशक में पूरी होगी अर्थात इसे इक्कीसवीं शताब्दी का मेगा प्रोजेक्ट कहा जा सकता है। CERN की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद डॉक्यूमेंट Writing the Future में इस परियोजना के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का भी आंकलन किया गया है जिसके अनुसार उद्योग जगत को इसमें निवेश करने पर तीन गुना तक लाभ कमाने का अवसर मिलेगा।  

ध्यातव्य है कि वर्ल्ड वाइड वेब की खोज टीम बर्नर ली ने CERN में ही की थी। यह एक अंतर्विषयक बड़ी परियोजना है जिससे वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, उद्योग जगत तथा साधारण जनमानस को भी भविष्य में कई समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान मिलने की आशा है।  

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