हलाल मांस का एक हिस्सा जाता है जिहाद में, यह खाना मतलब अपनी सुपारी खुद देना: ‘डॉ. झटका’

"संसद में या तो हलाल-झटका दोनों तरह के मांस परोसे जाएँ, या दोनों में से कोई भी नहीं। आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते कि अगर मीट खाना है तो इस्लामिक पद्धति का ही खाना है- ये मजबूरी मुझ पर न लादी जाए।"

‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’ जैसे उपनामों से नवाज़े जा चुके Live Values Foundation के अध्यक्ष और झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी के चेयरमैन रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात की। इस बातचीत में उन्होंने हलाल और झटका मांस में अन्तर, हलाल मांस के जबरन हिन्दुओं पर थोपे जाने और इसको लेकर हमारी खुद की अनभिज्ञता, इसके जिहाद कनेक्शन जैसे विभिन्न पहलुओं पर मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव को बताया। साक्षात्कार के मुख्य बिंदुओं का सारांश निम्न है:

इस्लाम का हलाल-हराम दूसरों पर क्यों?

रवि रंजन सिंह बताते हैं कि हलाल का शाब्दिक अर्थ है “जिसकी इजाज़त हो”, अंग्रेजी में “permissible”। वे सवाल उठाते हैं कि भला मुस्लिमों का हलाल-हराम (यानी वैध-अवैध) गैर-मुस्लिमों के लिए भी उसी तरह वैध या अवैध कैसे हो सकता है। वे पहली माँग यह करते हैं कि इस्लामिक शब्दावली का सामान्यीकरण कर सबके ऊपर थोपने की बजाय “इस्लामिक हलाल” अलग से बताया जाए- ताकि पता रहे कि यह इस्लामिक पद्धति है, नॉर्म नहीं।

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उन्होंने बताया कि अरबी भाषा में ‘हलाल’ का शब्द और ‘अनुमति है/नहीं है’ का सिद्धांत इस्लाम से भी पुराना है। हलाल की सटीक परिभाषा को लेकर भी इस्लाम के विभिन्न फिरकों में आपसी मतभिन्नता है- जैसे सुन्नियों का हलाल और हराम शियाओं के हलाल और हराम से कुछ अलग होता है, इत्यादि।

झटका‘ हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

रवि रंजन बताते हैं कि उनकी मुहिम और झटका को वैधता की कोशिशें न ही शाकाहारी लोगों में माँस का प्रचार करने के लिए है, न ही हलाल माँस क्या है, यह जानते हुए हलाल का सेवन करने की इच्छा रखने वालों को रोकने के लिए। वे केवल यह चाहते हैं कि लोगों को एक तो पता हो कि हलाल मांस के मायने क्या-क्या हैं, और दूसरे कि लोगों के सामने हलाल के अलावा झटका मांस का विकल्प भी उपलब्ध हो।

फ़िलहाल हो रहा भेदभाव, सरकार भी ‘हलाल-सर्टिफाइड’

रवि रंजन बताते हैं कि व्यवहारिक बराबरी तो दूर की बात, सैद्धांतिक रूप से भी सरकार झटका मांस के साथ सौतेला व्यवहार करती है। अधिकाँश सरकारी, यानी जनता के, टैक्स के पैसे से खड़े किए गए और चल रहे, सेक्युलरता की डुगडुगी पीटने वाले, संस्थान असल में ‘हलाल- सर्टिफाइड’ हैं- यानी उनमें केवल हलाल मांस ही परोसा जाता है। इन संस्थानों में राष्ट्रपति भवन, भारतीय संसद की IRCTC* कैंटीन (इसका स्पष्टीकरण नीचे फुटनोट में है) से लेकर भारतीय रेल तक शामिल हैं।

रवि रंजन के अनुसार इस बाबत 2009 से उनकी एक याचिका संसद के सामने लम्बित है, जिसमें माँग की गई है कि संसद या तो हलाल-झटका दोनों तरह के मांस परोसे, या दोनों में से कोई भी नहीं। “ये भारतीय रेल है, कोई मुस्लिम रेल नहीं है। और हम कहीं सीरिया में नहीं बैठे हुए… आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते कि अगर मीट खाना है तो इस्लामिक पद्धति का ही खाना है- ये मजबूरी मुझ पर न लादी जाए।”

केवल मांस या जीव-हत्या का तरीका नहीं, हलाल के कई आयाम

रवि रंजन ने बातचीत में बताया कि हलाल के कई आयाम हैं। पहली बात तो यह है कि इस्लाम के पहले भी जीव-हत्या का लगभग यही तरीका ‘कोशर’ यहूदियों का भी था- जानवर की नसें काट कर उसे रक्तस्राव से मारना; इसे भी वे और उनका संगठन पसंद नहीं करते, लेकिन इसका विरोध भी इसलिए नहीं करते क्योंकि यहूदी अपना ‘कोशर’ किसी दूसरे पर नहीं थोपते। जबकि हलाल लादा जाता है।

इसके अलावा मारे जाते समय जानवर को मुस्लिमों के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यह आर्थिक पक्ष हलाल को केवल एक भोजन पद्धति ही नहीं, एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था बना देता है, जो गैर-मुस्लिमों को न केवल हाशिये पर धकेलती है, बल्कि परिदृश से ही बाहर कर देती है।

पैसा ज़कात में गया या जिहाद में? हलाल मांस खाना अपनी सुपारी खुद देना

वे इसका अगला आर्थिक पहलू बताते हैं कि किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले!

यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”

इसके अलावा मांस का काम करने वाले हिन्दुओं में भी आम तौर पर खटिक आदि अनुसूचित जातियाँ ही होतीं हैं- यानी किसी मांस का हलाल होना अगर गैर-मुस्लिम को, हिन्दू को, उस कार्य में कोई आर्थिक भागीदारी करने से रोकता है, तो यह दलितों के साथ आर्थिक अस्पृश्यता ही हुई।

लन्दन के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से निकला ‘हलाल सर्टिफिकेशन’

रवि रंजन सिंह बताते हैं कि हलाल सर्टिफिकेशन’ की शुरुआत लन्दन में मुस्लिम प्रवासियों की बड़ी संख्या के इकट्ठे होने से बने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों से हुई। वहाँ पर पहली Halal Certification Society स्थानीय मुस्लिमों को हलाल मांस उपलब्ध कराने के लिए बनी।

आज दुनिया में विभिन्न स्रोतों से आ रहे आँकड़ों के मुताबिक हलाल-सर्टिफाइड भोजन की अर्थव्यवस्था का आकार 1 से 4 ट्रिलियन डॉलर के बीच बताया जा रहा है। यह भारत के किसी बजट से तो बड़ी संख्या है ही, अधिकतम स्तर पर यह भारत की अर्थव्यवस्था ($2.61 ट्रिलियन) से भी बड़ा है। यही नहीं, ऑपइंडिया को मिली रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक, यानी महज़ 6 वर्ष के भीतर, इसका आकार बढ़कर $9 ट्रिलियन हो जाने की उम्मीद जताई जा रही है।

झटका प्लांटों में भी हलाल मांस?

रवि रंजन सिंह एक संगीन दावा यह भी करते हैं कि दिल्ली के झटका मांस के प्लांट चलाने वाली संस्था असल में उस प्लांट में भी हलाल तरीके से ही जानवरों को मार रही है, मांस भी हलाल ही बेच रही है, और उस पर झूठा तमगा ‘झटका’ का लगा होता है। इसका कारण उनके मुताबिक उस प्लांट के ठेकेदार का मुस्लिम होना है।

‘क्यों नहीं ले लेते यार झटका सर्टिफिकेट’?

रवि रंजन सिंह आरोप यह भी लगाते हैं कि जब कोई हलाल से अलग झटका मांस बेचने या उसका उत्पादन करने की कोशिश करता है, तो और लोगों की बात तो अलग, सरकारी अमला भी उसे गैर-क़ानूनी रूप से हतोत्साहित करने में जुट जाता है। इसका उदाहरण वे पुणे में लगे पहले झटका स्लॉटर हाउस के रूप में देते हैं।

स्थानीय अधिकारियों ने कहा कि प्लांट को मान्यता और सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब वह हलाल सर्टिफिकेट लेकर आएगा- जबकि कानून में स्लॉटर हाउस खोलने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की बाध्यता नहीं है। “[यानी अगर आप हलाल तरीके से स्लॉटर नहीं करेंगे तो] आपको कोई अधिकार नहीं है मांस खाने का।” रवि रंजन ने यह आरोप भी लगाया कि यह सर्टिफिकेट लेने के लिए बाध्य करने वाले सरकारी अधिकारी ने ‘बड़े-बड़े लोगों’ जैसे शरद पवार (NCP अध्यक्ष, पूर्व केन्द्रीय मंत्री), गोदरेज (भारत के अग्रणी व्यवसायी) आदि का नाम लेते हुए कहा कि अगर ऐसे लोगों ने हलाल सर्टिफिकेट ले रखा है तो “आपको क्या प्रॉब्लम है?”

उस अधिकारी ने अंत में अपनी टेक रखते हुए ही उन्हें कहा कि अगर हलाल न सही तो कम-से-कम झटके का ‘सर्टिफिकेट’ तो लगाना ही होगा (ताकि मुस्लिमों और हलाल परोसने वालों को पता रहे कि यहाँ का मांस हलाल नहीं है)- जबकि कानून में ऐसे किसी सर्टिफिकेट की बाध्यता का प्रावधान नहीं है।

जल्दी शुरू होगी ट्रेनिंग भी

रवि रंजन सिंह ने बताया कि हालाँकि अभी तो उनकी संस्था केवल खुद से ‘झटका’ के तरीके से मांस-उत्पादन करने वालों को सर्टिफिकेट भर ही दे रही है, लेकिन जल्दी ही वे कसाईयों के लिए झटका तरीके से जानवरों को मारना सिखाने का प्रशिक्षण देना भी चालू करेंगे। इसके लिए ढाँचा खड़ा करने के प्रयास चल रहे हैं।

आर्थिक सफ़लता हिन्दुओं पर निर्भर है

क्या कभी झटका हलाल जितना प्रचलित या आर्थिक रूप से सफ़ल होगा? यह पूछे जाने पर रवि रंजन सिंह बिना लाग-लपेट के इसकी सफलता के पीछे के कारकों के लिए – हिन्दुओं की इसमें आस्था, इसके पीछे के सिद्धांत में उनका भरोसा, उनकी रुचि और इस मुद्दे पर उनका समर्थन बताते हैं। उन्होंने बताया कि कई बड़े-बड़े रेस्तरां मालिकों ने उनसे अनाधिकारिक बातचीत में बताया कि उनके प्रतिष्ठानों में आने वाले ग्राहक बहुसंख्या में हिन्दू या गैर-मुस्लिम ही होते हैं (रवि रंजन सिंह का दावा इस संख्या के कुछ मामलों में 95% तक होने का है, लेकिन ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं कर पाया है), लेकिन वे किसी ख़ास प्रकार (झटका या हलाल) पर जोर नहीं देते, जबकि मुस्लिम ग्राहक केवल हलाल पर ही जोर देते हैं- अतः इसे आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने के लिए हिन्दुओं को झटका या गैर-हलाल के सर्टिफिकेट पर जोर देना होगा। अभी तो उन प्रतिष्ठानों को यह डर है कि झटका/गैर-हलाल न होने से कोई बिजनेस नहीं जा रहा, लेकिन उसका सर्टिफिकेट लगा लेने से मुस्लिम ग्राहक न चले जाएँ। 

झटका ही नहीं, ‘Values Certification’ भी दे रहे हैं

अपनी संस्थाओं Live Values Foundation और ‘झटका सर्टिफिकेशन अथॉरिटी’ के बारे में रवि रंजन सिंह बताते हैं कि जहाँ ‘झटका सर्टिफिकेशन अथॉरिटी’ का काम केवल मांस व्यवसायियों और विक्रेताओं के यहाँ बिक रहे मांस को ‘झटका’ पद्धति से पाया गया प्रमाणित करना है, वहीं Live Values Foundation का कार्य-क्षेत्र इससे कहीं व्यापक है।

वे इसे ऐसे समझाते हैं कि जैसे हलाल में आर्थिक, सांस्कृतिक आदि पक्ष भी होते हैं, और यह एक पूरी व्यापक संस्कृति है, लेकिन ठीक उसी तरह ‘झटका’ नहीं हो सकता- क्योंकि झटका मात्र जानवर की हत्या का एक तरीका है, इसलिए कोई एयरलाइन्स कभी झटका नहीं हो सकती, लेकिन वह ‘हलाल एयरलाइन्स’ हो सकती है। यहाँ पर Live Values Foundation की भूमिका आती है कि जैसे हलाल इंस्पेक्शन होता है, वैसी ही उनका यह फाउण्डेशन जाँच कर के यह सर्टिफिकेट जारी करता है कि सर्टिफिकेट धारक प्रतिष्ठान के यहाँ ‘हलाल’ जैसी जानवरों को तकलीफ़ देने वाली कोई भी पद्धति नहीं अपनाई जाती, साथ ही उनका पैसा (सांस्थानिक तौर पर) जकात के रास्ते जिहाद में नहीं भेजा जाता है, आदि।

यही नहीं, Live Values Foundation व्यक्तियों को भी ‘values pledge’ (शपथ) दिलाता है, और इसके लिए एक प्रमाणपत्र बाकायदा जारी किया जाता है। इससे एक आम आदमी में ‘झटका’ संस्कृति का हिस्सा बनने की प्रेरणा जगती है, उसे यह महसूस होता है कि उसे किसी ऐसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना “जो मेरे विरोध में जा रहा है।”

झटका के चलते राजनीति में आया, राजनीति से झटका नहीं

अपने राजनीतिक रुझान की बारे में बात करते हुए रवि रंजन सिंह ने कहा कि हालाँकि वे हिंदू महासभा के सदस्य अवश्य हैं, लेकिन उनका झटका अभियान हिन्दू महासभा की देन नहीं, बल्कि उनकी हिन्दू महासभा की सदस्यता महासभा सदस्यों द्वारा झटका मुहिम को समर्थन के चलते है। उन्होंने एक और हैरतअंगेज बात यह बताई कि उनका महासभा के भीतर भी समर्थन करने वाले सबसे पहले लोग मांसाहारी नहीं, बल्कि विशुद्ध शाकाहारी थे। वे पंडित जिनका मांस तो दूर, प्याज-लहसुन से भी लेना-देना नहीं था, वे उनकी पूरी बात पहले समझे, स्वयं मांसाहार का सेवन करने वाले बाद में।

रवि रंजन 4-5 साल की उम्र में झटका मांस के प्रति अपना पहला रुझान बताते हैं। उनके अनुसार वे जब 4-5 साल के ही थे, तभी उन्होंने पहला जानवर हलाल होते हुए देखा। इसके बाद से ही वे इस पद्धति के विरुद्ध हो गए। मुस्लिमों के विरोध के बारे में उनका कहना है कि हालाँकि ज़बानी विरोध तो बहुत हुआ और धमकियाँ भी मिलीं, लेकिन शारीरिक हिंसा की नौबत नहीं आई। अपने हाथों में पड़ी लोहे की रॉडों पर खुद चुटकियाँ लेते हुए वे कहते हैं कि वे ‘लौह पुरुष’ हैं, इसीलिए सब उनसे घबराते हैं।

नोट- *गौरतलब है कि जब हमने रेलवे से इस संदर्भ में बात की तो रेलवे के एक अधिकारी ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि IRCTC खुद से झटका या हलाल में कोई अंतर नहीं करता। वह अंतरराष्ट्रीय मानककीकरण संस्था (International Organization for Standardization, ISO) और HACCP (Hazard Analysis and Critical Control Point, भोजन सामग्री में निहित जोखिमों को कम करने की प्रणाली) के मानकों के अनुसार फ्रोज़ेन चिकन के सप्लायर्स की छँटाई (shortisting) करती है। वह माँस के झटका या हलाल ही होने की शर्त अपने टेंडर दस्तावेज़ों में नहीं लिखती। भारत के भोज्य पदार्थ नियामक FS&SAI (Food Safety and Standards Authority of India) के मानकों में भी झटका या हलाल का ज़िक्र नहीं है।

अपडेट: अक्टूबर 4, 2019, 08:00 PM

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