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खेती, शहर और AI… सबको चाहिए पानी, लेकिन भारत के जलाशय दे रहे खतरनाक संकेत: जानें- Moody’s की चेतावनी कितनी भयावह

अगर भारत को आने वाले वर्षों में बड़े जल संकट से बचना है तो लंबे समय तक की योजना, बेहतर जल शासन, जल वितरण में लचीलापन, बुनियादी ढाँचे में निवेश और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता देनी होगी।

एक और भारत तपती गर्मी का सामना कर रहा है तो अब दूसरी तरफ गंभीर जल संकट की समस्या भी मुँह बाए खड़ी है। संकट की यह चेतावनी किसी सामान्य संस्था ने नहीं बल्कि वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) ने दी है। मूडीज का कहना है कि अगर भारत ने जल्द ही अपने जल प्रबंधन यानी वॉटर मैनेजमेंट के सिस्टम में बड़े सुधार नहीं किए तो पानी की कमी सिर्फ लोगों की रोजमर्रा की परेशानी तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इसका असर खेती, उद्योग, शहरों, डिजिटल सेक्टर, सरकारी बजट और देश की आर्थिक स्थिरता तक पहुँच सकता है।

भारत में पानी की समस्या नई नहीं है लेकिन अब यह समस्या बढ़ती जा रही है। पहले पानी की कमी को मुख्य रूप से सूखे, कम बारिश या गर्मियों की समस्या माना जाता था। अब स्थिति बदल चुकी है। देश में आबादी बढ़ रही है, शहर फैल रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं, खेती में पानी की माँग पहले से ही बहुत ज्यादा है और अब डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए डिजिटल सेक्टर भी पानी की माँग बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी अनियमित बारिश और कभी कमजोर मानसून जैसी स्थितियाँ पैदा हो रही हैं।

मूडीज ने भारत के जल प्रबंधन पर सवाल क्यों उठाए

मूडीज ने भारत की जल व्यवस्था को ‘fragmented or inflexible’ बताया है। इसका यह मतलब यह है कि देश में पानी से जुड़े फैसले एक जगह से नहीं लिए जाते। सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, स्थानीय जल संसाधन और पानी के उपयोग से जुड़े बड़े फैसले ज्यादातर राज्य सरकारों के स्तर पर होते हैं। भारत में हर राज्य की जरूरत, प्राथमिकता, राजनीति और नीति अलग-अलग है।

एक राज्य खेती को प्राथमिकता देता है, दूसरा उद्योगों को, तीसरा शहरों की पानी की दरूरत पर ध्यान देता है और चौथा अपने स्थानीय जल स्रोतों के हिसाब से फैसले लेता है। यह व्यवस्था सामान्य समय में तो चल सकती है लेकिन जब पानी की माँग तेजी से बढ़ रही हो और जल स्रोतों पर दबाव हो तब ऐसी बिखरी हुई व्यवस्था बड़ी समस्या बन जाती है।

मूडीज के अनुसार, भारत में यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि पानी का कितना हिस्सा खेती को मिले, कितना घरों को मिले, कितना उद्योगों को मिले और कितना नए डिजिटल सेक्टर को दिया जाए। जब पानी कम हो और माँग ज्यादा हो तब सबसे जरूरी काम होता है पानी का समझदारी से बँटवारा। लेकिन भारत में अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग नीतियों के कारण यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

भारत में खेती में सबसे अधिक पानी का इस्तेमाल

भारत में मौजदू मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। इसका मतलब है कि देश में पानी का सबसे बड़ा उपयोग खेतों में होता है। भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण जीवन के लिए खेती बहुत जरूरी है, इसलिए पानी की जरूरत भी स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पानी का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो और उसका प्रबंधन कमजोर हो।

कई राज्यों में किसानों को बिजली और पानी पर भारी सब्सिडी मिलती है। इसका उद्देश्य किसानों की मदद करना होता है लेकिन इसका एक दूसरा असर भी पड़ता है। जब पानी बहुत सस्ता या लगभग मुफ्त मिलता है, तो उसके बचाव और सावधानी से उपयोग की भावना कमजोर हो जाती है। कई क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन इसी वजह से बढ़ा है।

किसान सिचांई के लिए बड़े पैमाने पर भू-जल निकालते हैं। कई जगहों पर बिजली सब्सिडी के कारण पंपिंग की लागत कम होती है। इससे पानी निकालना आसान हो जाता है लेकिन जमीन के नीचे का जल स्तर लगातार गिरता जाता है। शुरू में इसका असर दिखाई नहीं देता लेकिन कुछ वर्षों बाद कुएँ, ट्यूबवेल और बोरवेल सूखने लगते हैं। यही स्थिति कई राज्यों में देखने को मिल रही है।

सब्सिडी और पानी की कीमत का बड़ा सवाल

भारत में कई जगह पानी सस्ता है, कई जगह मुफ्त जैसा है और कई जगह उसकी वसूली बहुत कम है। इसका असर जल प्रबंधन पर पड़ता है। जब किसी संसाधन की कीमत बहुत कम रखी जाती है, तो लोग उसके उपयोग को लेकर उतने सावधान नहीं रहते।

मूडीज ने कहा है कि पानी की अत्यधिक सब्सिडी कई बार समझदारी से इस्तेमाल को रोकती है। सरल भाषा में इसका मतलब यह है कि जहाँ पानी सस्ता या मुफ्त मिलता है, वहाँ उसे बचाने की प्रेरणा कम हो जाती है। इससे पानी की माँग बढ़ती है, पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था पर दबाव आता है, भूजल तेजी से घटता है और सरकार को अधिक खर्च करना पड़ता है।

डेटा सेंटर और डिजिटल अर्थव्यवस्था का नया दबाव

भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था जल प्रबंधन के सामने एक नई चुनौती बनकर उभर रही है। क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उद्योगों के विस्तार से पानी की माँग और बढ़ने की आशंका है। डेटा सेंटरों में सर्वर कूलिंग और अन्य तकनीकी के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है।

मूडीज ने कहा कि क्लाउड कंप्यूटिंग और AI के विस्तार के चलते डेटा सेंटरों की तेजी से बढ़ती माँग जल पर नया दबाव पैदा कर रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पानी की आपूर्ति की भौतिक संरचना भी बेहद मायने रखती है। अगर किसी शहर या क्षेत्र की पानी की आपूर्ति एक ही स्रोत या एक ही उपचार प्रणाली पर निर्भर है, तो उस स्रोत पर तनाव आने से पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ती अनिश्चितता

मूडीज ने जलवायु परिवर्तन को भी भारत के जल संकट का बड़ा कारण बताया है। देश पहले से ही सूखा, बाढ़, गर्मी, अनियमित वर्षा और मानसून की अनिश्चितता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। World Resources Institute की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को हीट स्ट्रेस, बाढ़ और मानसून की अस्थिरता से उच्च क्रेडिट एक्सपोजर है। जल प्रबंधन श्रेणी में भारत की स्थिति और भी गंभीर बताई गई है जिसकी बड़ी वजह पुराना जल ढाँचा, भूजल दोहन और बुनियादी सुविधाओं की कमजोरी है।

जलवायु परिवर्तन के कारण कभी अत्यधिक बारिश होती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। इससे जलाशयों, नदियों, भूजल और शहरी जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है। अगर मानसून कमजोर या अनियमित रहा, तो पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह चिंता भी सामने आई कि मानसून समय से पहले आने की उम्मीद के बावजूद एल नीनो जैसी स्थिति बारिश को कमजोर कर सकती है।

मुंबई, दिल्ली और चेन्नई की अलग-अलग स्थिति

मुंबई की स्थिति इस समय सबसे चिंताजनक उदाहरणों में से एक है। BMC के अनुसार, मुंबई के 7 जलाशयों में कुल क्षमता का केवल 9.33 प्रतिशत पानी बचा है। इसका मतलब है कि शहर के पास लगभग एक महीने का ही पानी उपलब्ध है। जल भंडारण का स्तर पिछले वर्षों की इसी अवधि की तुलना में कम है। इसी कारण मुंबई में पानी की राशनिंग की घोषणा करनी पड़ी।

दिल्ली भी पानी की गंभीर कमी से जूझ रही है। राष्ट्रीय राजधानी के कई इलाकों में 15 से 20 दिनों तक नियमित पानी नहीं मिलने की बात सामने आई है। दिल्ली में अभी लगभग 948 से 950 मिलियन गैलन प्रतिदिन पानी उत्पादन हो रहा है और यह सामान्य स्तर से करीब 50 मिलियन गैलन कम है। इस कमी के कारण सप्लाई में बाधाएँ आ रही हैं और लोगों को पानी के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है।

चेन्नई में लगभग 288 दिनों के पेयजल के लिए पर्याप्त भंडार है। लेकिन विशेषज्ञों की चिंता यह है कि भूजल स्तर में गिरावट, उद्योगों की बढ़ती माँग और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भविष्य में चेन्नई के लिए भी मुश्किलें पैदा कर सकता है। यह बताता है कि आज बेहतर दिख रही स्थिति भी स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं है, अगर प्रबंधन ढाँचा मजबूत न हो।

देश के जलाशयों की स्थिति और गिरता भंडारण

Central Water Commission की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश के निगरानी वाले जलाशयों में कुल 63.232 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है। यह सामान्य भंडारण से करीब 24% अधिक है लेकिन हालिया गिरावट चिंता पैदा करती है। 30 अप्रैल 2026 को देश के 166 जलाशयों में 71.082 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल क्षमता का 38.72 प्रतिशत था। 14 मई की रिपोर्ट तक यह घटकर 63.232 बिलियन क्यूबिक मीटर, यानी कुल क्षमता का 34.45 प्रतिशत रह गया। इसका अर्थ है कि केवल दो सप्ताह में करीब 8 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी कम हो गया।

13 प्रमुख जलाशयों में 50% कम जल

इस गिरावट ने चिंता इसलिए बढ़ाई है क्योंकि 13 प्रमुख जलाशयों में जल स्तर सामान्य भंडारण के 50 प्रतिशत से नीचे पहुँच गया है। 30 अप्रैल को ऐसे जलाशयों की संख्या नौ थी लेकिन अब यह बढ़कर 13 हो गई है। यह तेजी से गिरते जल स्तर का संकेत है।

इसके अलावा कुल 31 जलाशय ऐसे हैं जहाँ पानी का स्तर सामान्य भंडारण के 80 प्रतिशत या उससे कम पर आ गया है। इनमें 13 जलाशय 50 प्रतिशत से नीचे हैं जबकि 18 जलाशय 51 से 80 प्रतिशत के बीच हैं। इन 18 में से तीन जलाशय 51 से 60 प्रतिशत के बीच, सात जलाशय 61 से 70 प्रतिशत के बीच और आठ जलाशय 71 से 80 प्रतिशत के बीच हैं। जलाशयों पर यह दबाव कई राज्यों तक फैला है।

जलाशयों की गिरती स्थिति आने वाले दिनों में पीने के पानी की आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा सकती है। जलाशय सिर्फ शहरों और गाँवों की पेयजल जरूरतों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि वे खेती और जलविद्युत उत्पादन के लिए भी जरूरी हैं। अगर गर्मी बढ़ती रही और मानसून कमजोर या देर से प्रभावी हुआ, तो जिन राज्यों में जलाशय पहले से आधे से नीचे हैं, वहाँ संकट और गंभीर हो सकता है।

सुधार नहीं हुए तो गहराएगा संकट

मूडीज की चेतावनी का सार यही है कि भारत को जल प्रबंधन को केवल स्थानीय या मौसमी समस्या मानकर नहीं चलना चाहिए। यह राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता, सार्वजनिक वित्त, औद्योगिक विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।

कृषि में अत्यधिक पानी की खपत, सब्सिडी आधारित मूल्य व्यवस्था, राज्यों के बीच बिखरी हुई नीतियाँ, कमजोर बुनियादी ढाँचा, भूजल दोहन, डेटा सेंटरों की बढ़ती माँग और जलवायु परिवर्तन ये सभी कारक मिलकर भारत के जल संकट को बड़ा बना रहे हैं।

अगर भारत को आने वाले वर्षों में बड़े जल संकट से बचना है तो लंबे समय तक की योजना, बेहतर जल शासन, जल वितरण में लचीलापन, बुनियादी ढाँचे में निवेश और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता देनी होगी। मूडीज की चेतावनी साफ संकेत देती है कि पानी का सवाल अब सिर्फ जीवन का नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, विकास और वित्तीय स्थिरता का भी सवाल है।

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शिव
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