केंद्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आर.वी.एस. मणि को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया है। उन्हें सिविल सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मु्द्दों पर सिस्टम के अंदर रहकर भी अपनी आवाज बुलंद की, ये उनके साहस का सम्मान है।
President Droupadi Murmu presents Padma Shri to Shri R.V.S. Mani for his outstanding contribution to the field of Civil Service. A dedicated civil servant, Shri Mani identified and worked diligently in specific areas requiring special focus to meet the challenges of handling,… pic.twitter.com/LYa1SnyErh
— President of India (@rashtrapatibhvn) June 23, 2026
कौन हैं आरवीएस मणि
आरवीएस मणि पूर्व आईएएस अधिकारी हैं। वे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव रहे। आंतरिक सुरक्षा में एक विशिष्ट सरकारी अधिकारी के रूप में उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने यूके के मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से मानव संसाधन विकास में एम.एस.सी और दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की है। वे संस्कृत भाषा के ज्ञाता हैं और उन्हें भगवत गीता और वैदिक ग्रंथों का अच्छा ज्ञान है।
2006-10 तक वे गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा विभाग में तैनात थे। वे एक निजी विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं। राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर पाँच पुस्तकें उन्होंने लिखी है। उन्होंने सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद अपनी किताबों को प्रकाशित किया, जिसमें यूपीए सरकार के काले कारनामों का जिक्र है।
Former MHA officer RVS Mani conferred the Padma Shri at Rashtrapati Bhavan.
— News Arena India (@NewsArenaIndia) June 23, 2026
He was forced to sign affidavit to fabricate saffron terror narrative.
He wrote several highlighting how UPA Govt pressured him to defame Hindus. pic.twitter.com/HwL4cKI2OQ
‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी गढ़ने का किया विरोध
आरवीएस मणि ने तथाकथित ‘भगवा आतंकवाद‘ की अवधारणा को खारिज करते हुए इसे एक सोची‑समझी राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने अपनी आपबीती और आंतरिक सुरक्षा मामलों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के खुलासों को अपनी पुस्तक, ‘The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs 2006-2010’ में विस्तार से बताया है।
किताब में उन्होंने कहा है कि 2009 में गृह मंत्रालय में राजनीतिक नेतृत्व ने उन पर ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने वाले दूसरे हलफनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया था। उन्होंने दावा किया कि हिंदुओं को बदनाम करने और उन्हें आतंकवादी बताने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश रची गई थी।
उन्होंने किताब में लिखा है कि 2006 में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में बम विस्फोट के बाद तत्कालीन पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल बैठे थे और उन्हें बुलाया गया था। मणि से विस्फोट को लेकर सवाल पूछे गए थे, जिसमें उन्होंने खास मजहबी समूह के आतंकी हमलों की जानकारी दी थी। इस जानकारी से वे खुश नहीं थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे। उन्होंने कहा है कि नांदेड़ विस्फोट के बाद पहली बार ‘भगवा आतंक’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।
किताब में कहा गया है कि मक्का मस्जिद धमाके के मामले में असली आरोपितों को बचाकर निर्दोष लोगों को फँसाया गया, जिन्हें बाद में 2018 में क्लीन चिट मिली। मालेगाँव विस्फोट मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस केस में भी साध्वी प्रज्ञा और एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी पुरोहित को जानबूझकर फँसाया गया। मालेगाँव विस्फोट में सबूत रहते हुए भी उसे दरकिनार कर दिया गया और नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया गया।
यह पहला मौका था जब कथित तौर पर हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।
इशरत जहाँ मामले में जबरदस्ती हलफनामे पर हस्ताक्षर कराया गया-मणि
आरवीएस मणि ने दावा किया कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जेल भेजने की साजिश रची गई थी। मणि के अनुसार, उन्होंने जो हलफनामा साइन किया था, उसमें खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट शामिल थी, जिसमें इशरत जहां को लश्कर‑ए‑तैयबा से जुड़ा बताया गया था। उनका कहना है कि इशरत जहाँ और उसके साथ मौजूद लोगों का उद्देश्य तत्कालीन गुजरात सरकार के शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी और शाह को निशाना बनाना था।
मणि ने यूपीए सरकार के दौरान इशरत जहाँ मामले में दाखिल 2 अलग-अलग तरह के हलफनामे को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने दावा किया कि पहले हलफनामे में इशरत जहाँ को लश्कर ए तैयबा का ‘कार्यकर्ता’ बताया गया था, जो आतंकी मॉड्यूल का हिस्सा थी और भारत में बड़े बड़े नेताओं को अपना निशाना बनना चाहती थी।
यह हलफनामा खुफिया एजेंसी के रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था। इसमें इशरत जहाँ के आतंकी बैकग्राउंड के बारे में जानकारी दी गई थी। दूसरा हलफनामा कुछ हफ्ते बाद दाखिल किया गया, जिसमें खुफिया जानकारी नदारद थे और गुजरात पुलिस की कार्रवाई का भी इससे कोई लेना-देना नहीं था। यह तत्कालीन यूपीए सरकार ने बनवाया था और इस पर मणि को राजनीतिक दबाव में हस्ताक्षर करने पड़े थे।
उन्होंने ‘डिसेप्शन ए फैमिली दैट डिसीव्ड द होल नेशन’, ‘भगवा आतंक एक षड्यंत्र’ और दलाल जैसी किताबें में इनसब की विस्तार से चर्चा की है। आरवीएस मणि ने यह भी कहा कि 2004 में अहमदाबाद के पास हुई घटना को गलत तरीके से एनकाउंटर बताया गया, जबकि वह एक क्रॉस‑फायर की स्थिति थी, जिसमें पहले गोली दूसरी ओर से चलाई गई थी।
उनके अनुसार, इशरत जहाँ के साथ दो और लोग थे जो अवैध तरीके से सीमा पार कर पाकिस्तान से भारत में घुसे थे, लेकिन तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कारणों से उसे निर्दोष और ‘बिहार की बेटी’ बताने की कोशिश की। ये लोग इशरत जहाँ के साथ एनकाउंटर में मारे गए। इशरत जहाँ एक आतंकवादी थी, इसकी पुष्टि बाद में मुंबई हमले का मास्टरमाइंड डेविड कोलमैन हेडली ने भी किया था।
मणि ने अपनी किताब में यूपीए शासन के दौरान आतंकी जाँच में किस तरह से राजनीतिक हस्तक्षेप किया जाता था, उसकी भी चर्चा की है। मणि ने उस समय के सीबीआई निदेशक के एक कथित बयान के बारे में बताया है कि ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ को जेल भेजने की बात कही गई थी। उनका दावा है कि यह इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ओर था।


