Saturday, June 25, 2022
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चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता ज्होऊ फेंगसुओ ने कहा- कोरोना वायरस महामारी और थियानमेन नरसंहार एक जैसे

अपने थियानमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट के दौरान अपने संघर्षों को याद करते हुए ज्होऊ फेंगसुओ ने कहा ‘मेरी कहानी साल 1989 में शुरू हुई थी। जब थियानमेन विरोध प्रदर्शन हुआ था, इस विरोध प्रदर्शन ने चीन के लोगों ने आज़ादी और लोकतंत्र का सपना देखा था। यह पहला ऐसा मौक़ा था जब चीन के लोगों ने आज़ादी के लिए अपना प्यार और जुनून जाहिर किया था।

चीन संबंधी मामलों के जानकारी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पैदा की जा रही है चुनौतियों से निपटने के लिए चर्चा की। यह चर्चा एक वेबिनार के ज़रिए आयोजित की गई और इसका शीर्षक था ‘Emperor Has No Clothes: China Under Xi Jinping’। इस आयोजन में अपने विचार रखने वाले मुख्य लोग थे ह्यूमैनिटेरियन चीन के सह संस्थापक, अध्यक्ष और तियानानमेन छात्र नेता ज्होऊ फेंगसुओ। द तिब्बत ब्यूरो और जेनेवा के विशेष कर्मचारी थिनले चुक्की और पत्रकार आदित्य राज कौल। 

अपने थियानमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट के दौरान अपने संघर्षों को याद करते हुए ज्होऊ फेंगसुओ ने कहा ‘मेरी कहानी साल 1989 में शुरू हुई थी। जब थियानमेन विरोध प्रदर्शन हुआ था, इस विरोध प्रदर्शन ने चीन के लोगों ने आज़ादी और लोकतंत्र का सपना देखा था। यह पहला ऐसा मौक़ा था जब चीन के लोगों ने आज़ादी के लिए अपना प्यार और जुनून जाहिर किया था। तब से मैं संघर्ष कर रहा हूँ कि चीन का आने वाला कल आज़ादी और लोकतंत्र की बुनियाद पर खड़ा हो। सिर्फ इस वजह से ही आज मैं यहाँ पर हूँ।’ 

इसके बाद फेंगसुओ ने कहा ‘मेरा संस्था ह्यूमैनिटेरियन चाइना चीन में आम लोगों के मानवाधिकारों के लिए काम करती है। हम हर साल चीन की जेलों में बंद 100 से 200 राजनीतिक कैदियों की मदद करते हैं। यह संख्या काफी ज़्यादा है फिर हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि चीन में ऐसे राजनीतिक कैदियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। हमारा लक्ष्य है कि हम ऐसे लोग चीन में प्रताड़ित किए जा रहे हैं उन्हें बाहर की दुनिया और लोगों से जोड़ें। इसके अलावा चीन में आज़ादी के लिए जारी प्रदर्शन को बढ़ावा मिले।

इसके अलावा फेंगसुओ ने चीन के थियानमेन प्रदर्शन को नियंत्रित करने के तरीके और वुहान कोरोना कोरोना वायरस महामारी के बीच तुलना की। तुलना के दौरान उन्होंने कहा, “हाल ही में पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक को कई साल के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। जेल में रहने हुए उन्होंने चीन में फैली इस महामारी पर एक पत्र लिखा था और दुनिया के देशों से निवेदन किया था कि वह इस मुद्दे पर कार्रवाई करें।” 

वुहान काफी कुछ थियानमेन जैसा है, लोगों को यहाँ बात करने की आज़ादी नहीं है। लोगों के पास ऐसा कोई ज़रिया ही नहीं है जिसकी मदद से वह अपनी बात रख सकें। चीन की कम्युनिस्ट सरकार के तानाशाही रवैये की वजह से कोरोना वायरस महामारी एक वैश्विक ख़तरा बन गई। हैरानी की यह थी कि चीन के मेडिकल जनरल ने 26 फरवरी को दावा किया था कि उन्होंने कोरोना वायरस की वैक्सीन बना ली है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता ने इस बात पर भी ज़ोर किया कि कैसे चीन दुनिया के लिए एक ख़तरा है। उन्होंने भारत के चीनी एप्लीकेशन पर पाबंदी लगाने के फैसले की सराहना की। साथ ही यह भी कहा कि भारत की तरह दुनिया के अन्य देशों को ऐसे कदम उठाने चाहिए। फिर उन्होंने इस बात की उम्मीद भी जताई की भारत और ताइवान के बीच कूटनीतिक स्तर पर अच्छे संबंध बनें। इसके अलावा उन्होंने चीनी फायरवॉल पर भी चिंता जताई। 

फ़िलहाल फेंगसुओ को चीन से देश निकाला दिया जा चुका है। थियानमेन में हुए नरसंहार के दौरान वह एक छात्र नेता थे। प्रदर्शन में शामिल होने की वजह से उन्हें भी जेल भेज दिया गया था। चीनी सरकार ने थियानमेन में हुए विरोध प्रदर्शन को दबाने का प्रयास किया था जिसके बाद नरसंहार हुआ था। इतने सालों के बावजूद इस बात का पता नहीं चल पाया है कि उस नरसंहार में कुल कितने लोग मारे गए थे। 

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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