Sunday, November 29, 2020
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जस्टिस काटजू ने अलोक वर्मा कांड पर ‘फ़र्ज़ी मीडिया’ की निकृष्टता पर जमकर ली क्लास

खुद को लोकतंत्र का चौथा खम्भा बताने वाली भारतीय मीडिया को भी काटजू ने फ़र्ज़ी और बकवास जैसे विशेषणों से नवाज़ा

CBI के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा पिछले कुछ दिनों से चर्चा में थे। मीडिया-सोशल मीडिया हर जगह। सुप्रीम कोर्ट तक में भी। अब इस्तीफ़ा देकर खुद ही उन्होंने पूर्ण विराम लगा दिया है। लेकिन मीडिया को जो मसाला चाहिए होता है, वो दे गए। इसी मसाले पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने फेसबुक पर अपनी राय रखी और मीडिया की धज्जियाँ उड़ा दीं। पत्रकारिता और रिपोर्टिंग कैसे करनी चाहिए, इसकी सीख भी दे गए:

11 जनवरी, सुबह 9:30 – जस्टिस सीकरी का समर्थन

जस्टिस काटजू लिखते हैं – मुझसे कई लोगों ने एक दिन पुराने पोस्ट पर पूछा कि आलोक वर्मा को समिति (जिसमें जस्टिस सीकरी भी थे) द्वारा सुनवाई का अवसर क्यों नहीं दिया गया। इस पर उनकी राय जानने के लिए मैंने उन्हें फोन किया। फोन पर जस्टिस सीकरी ने कहा:

  • आलोक वर्मा के खिलाफ कुछ गंभीर आरोप थे, जिनकी प्रारंभिक जांच में सीवीसी को कुछ सबूत और निष्कर्ष मिले थे।
  • सीवीसी ने प्रथम दृष्टया सामने आ रहे निष्कर्ष को अपनी रिपोर्ट में दर्ज करने से पहले आलोक वर्मा को सुनवाई का मौका दिया था।
  • इन गंभीर आरोपों व सबूतों के आधार पर ही जस्टिस सीकरी इस फैसले पर पहुँचे कि जाँच पूरी होने तक आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद पर नहीं रहना चाहिए। जाँच के दौरान उन्हें उनकी रैंक के बराबर के किसी अन्य पद पर स्थानांतरित कर दिया जाए।
  • कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि वर्मा को बर्ख़ास्त किया गया है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्हें तो निलंबित भी नहीं किया गया है। वर्मा को उनके स्तर के बराबर ही वेतन व रुतबे वाली दूसरी पोस्ट पर महज़ स्थानांतरित किया गया है।
  • जहाँ तक वर्मा का पक्ष नहीं सुनने की बात है तो बिना किसी सुनवाई के किसी को निलंबित करने की प्रक्रिया बहुत आम है। सिर्फ बर्ख़ास्तगी के मामले में सुनवाई जरूरी है।
  • वर्मा को न तो बर्ख़ास्त किया गया और न ही हटाया गया। उन्हें सिर्फ सीबीआई डायरेक्टर के बराबर स्तर वाले दूसरे पद पर ट्रांसफर किया गया।

11 जनवरी, शाम 4:46 – भारतीय मीडिया फ़र्ज़ी खबरों का पुलिंदा

आगे वो बताते हैं कि कैसे ट्विटर पर सीबीआई डायरेक्टर के पद से आलोक वर्मा को हटाए जाने पर कई पत्रकारों (जिनमें कुछ तो बहुत जानेमाने हैं) ने बकवास भरी बातें लिखीं, “उनमें से किसी ने भी जस्टिस सीकरी से संपर्क करके इस मुद्दे पर उनकी राय जानने की जरूरत भी नहीं समझी। इस मामले में जो 3 सदस्य समिति थी, वो न्यायिक कार्यवाही से संबंधित समिति नहीं थी।”

“ऐसे में मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि जस्टिस सीकरी से अगर कोई उनके फ़ैसले पर राय ज़ाहिर करने को कहता तो वो मना कर देते। हद तो तब हो गई, जब बिना उनकी राय जाने लोगों ने उन्हें पीएम मोदी की कठपुतली तक कह दिया। क्या मीडियाकर्मियों ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की? क्या यही जिम्मेदार पत्रकारिता है?”

उन्होंने मीडिया की नैतिकता और जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि हमारे अधिकांश पत्रकार केवल सनसनी पैदा करना चाहते हैं। तथ्यों की परवाह किए बिना मसाला घोंटने में विश्वास रखते हैं। इसीलिए मैं ज्यादातर भारतीय मीडिया को फ़र्ज़ी खबर कहता हूँ।”

12 जनवरी – मीडिया की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर सवाल

मार्कंडेय काटजू फेसबुक पर ही नहीं रुके। कई बड़े TV चैनलों पर भी उन्होंने अपनी राय दी। लेकिन TV के शोर को छोड़, इस मुद्दे पर हम आपको ‘द वीक’ पर लिखे उनके आर्टिकल का सारांश समझाते हैं। यह मीडिया की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर एक तमाचा है। ऊपर कही गई बातों के अलावा ‘द वीक’ का अहम हिस्सा (शब्दशः नहीं, सिर्फ भावार्थ):

मुझे पता चला कि आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी द्वारा जांच की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त जस्टिस पटनायक ने एक बयान दिया था। इसमें कहा गया था कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं है। इसलिए, मैंने जस्टिस पटनायक को फोन किया और उनसे इस मुद्दे पर लंबी चर्चा की। उन्होंने इस चर्चा को मुझे दूसरों के साथ शेयर करने की अनुमति नहीं दी। हालाँकि उन्होंने मुझे यह उल्लेख करने की अनुमति दे दी कि एक को छोड़कर किसी भी पत्रकार ने उनके साथ इस मामले पर चर्चा करने के लिए संपर्क नहीं किया। और जिस एक ने उनसे संपर्क साधा, वो ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक महिला पत्रकार थीं। आश्चर्य कि उस महिला पत्रकार ने भी एक मिनट से भी कम देर तक बात की।

गौर कीजिए – एक मिनट से कम की बातचीत सिर्फ एक पत्रकार के साथ – लगभग सभी भारतीय मीडिया हाउस ने इस मुद्दे पर लंबे-लंबे आर्टिकल लिख छापे। सोशल मीडिया पर तो ख़ैर बाढ़ ही आ गई। और जिन्होंने ऐसा किया, उनमें से किसी ने भी (उस महिला पत्रकार को छोड़कर) जस्टिस पटनायक से संपर्क नहीं किया।

मिसाल के तौर पर, हिंदुस्तान टाइम्स की एक महिला पत्रकार ने लिखा कि हाई पावर्ड कमिटी का फैसला बहुत ज़ल्दबाज़ी में लिया गया। शायद, उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पढ़ने की भी ज़हमत नहीं उठाई, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि कमिटी को एक सप्ताह के भीतर फैसला करना होगा। साथ ही उसने यह भी लिखा कि कमिटी को वर्मा का पक्ष सुनना चाहिए था। अगर वह जस्टिस सीकरी (ईमेल आईडी aksikrij@gmail.com और फोन नंबर 23016022/23016044) से संपर्क करतीं तो शायद उन्हें उत्तर मिल जाता।

जिन पत्रकारों ने इस मुद्दे पर लिखा है, उनमें से किसी ने भी (उस महिला पत्रकार को छोड़कर, जिसने एक मिनट से भी कम बात की) जस्टिस सिकरी या जस्टिस पटनायक से संपर्क नहीं किया, न ही करने की कोशिश की।

पत्रकारों द्वारा बिना जाँच-पड़ताल के ख़बरें बनाना ही फ़ेक न्यूज़ हैं। ऐसे में डोनल्ड ट्रम्प जब कहते हैं -मीडिया ही लोगों का दुश्मन है- तो यह बात अमेरिकी मीडिया के लिए शायद सही है, शायद नहीं, लेकिन अधिकांश भारतीय मीडिया के लिए यह निश्चित तौर पर सच है। यहाँ की मीडिया संवेदनाओं को भड़काने और जनता को मसाला देने में विश्वास करती है। यही कारण है कि अब लोग अधिकांश मीडिया और पत्रकारों को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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