Thursday, February 25, 2021
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अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की आगे की जाँच अवैध नहीं, पीड़ितों के अधिकार भी महत्वपूर्ण: बॉम्बे हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए, डिवीजन बेंच ने कहा कि ‘कानून में आगे की जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है’। बेंच ने आगे कहा कि चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी आगे की जाँच करना पुलिस का एक वैधानिक अधिकार है।

रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को अंतरिम जमानत देने से इनकार करने के आदेश में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि रायगढ़ पुलिस द्वारा अन्वय नाइक आत्महत्या मामले में शुरू की गई आगे की जाँच को ‘अवैध और मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना’ नहीं कहा जा सकता है।

जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने गोस्वामी के वकीलों- वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और अबद पोंडा द्वारा उठाए गए तर्कों को खारिज कर दिया कि उनके खिलाफ पुलिस की कार्रवाई अवैध थी क्योंकि 2019 के मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा क्लोजर स्वीकार किए जाने के बाद उन्होंने जाँच रद्द कर दी थी, तो ऐसे में वे मुकदमा नहीं कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए, डिवीजन बेंच ने कहा कि ‘कानून में आगे की जाँच के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है’। बेंच ने आगे कहा कि चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी आगे की जाँच करना पुलिस का एक वैधानिक अधिकार है।

इस आदेश ने वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई द्वारा ‘A summary’, ‘B summary’ और ‘C summary’ रिपोर्ट के बीच के अंतर के बारे में प्रस्तुतियाँ और राज्य सरकार की शक्ति के बारे में और जाँच को निर्देशित करने के लिए काफी निर्भरता देखी गई।

बता दें कि मामले की जाँच कर रही रायगढ़ पुलिस ने अप्रैल 2019 में मजिस्ट्रेट के सामने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में ‘case summary’ दायर किया था। क्लोजर रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया था, “तीनों अभियुक्तों को विभिन्न क्षेत्रों, स्थानों और तीनों के बीच कोई संबंध नहीं होने के कारण जाँच में प्रमाणित किया गया है। अब तक की जाँच में इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि सुसाइड नोट में नामजद तीन आरोपितों की ओर से की गई कार्रवाई, व्यक्तिगत रूप से या एक साथ मिलकर, मृतक के जीवन को असहनीय बना दिया या उसके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसलिए, इस मामले में साक्ष्य के अभाव में, ‘अंतिम समरी’ को स्वीकार किया जाना चाहिए।” 

गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक और प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा दावा नहीं पेश किया गया, जिससे पीठ को असाधारण जुरिडिक्शन देना पड़े। हालाँकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि नियमित जमानत के अन्य विकल्प अभी भी है और उसके लिए प्रयास किया जा सकता है। इसके लिए अर्णब गोस्वामी को सेशन कोर्ट जाना पड़ेगा

जमानत नहीं मिलने के बाद अर्णब आज न्यायिक हिरातस में 6ठी रात गुजारेंगे। रिपब्लिक ने इस पर बयान जारी करते हुए कहा कि वह हर कानूनी उपाय को अपनाएँगे और जनमत की अदालतों में अपनी निर्विवाद लड़ाई जारी रखेंगे। भारत के नागरिक को न्यायिक हिरासत में रात बिताने के लिए, कानून और व्यवस्था की मशीनरी द्वारा हमला किया जाना और बुनियादी कानूनी पहुँच से अवरुद्ध होना इस महान लोकतंत्र की आँखों के सामने एक चौंकाने वाली सच्चाई है, और अन्याय है, जिसे इतिहास माफ नहीं करेगी। अर्णब गोस्वामी पर हमला, मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ है और महाराष्ट्र राज्य में स्वतंत्र प्रेस की निर्मम हत्या नहीं होगी। दुनिया भर में भारत और भारत के लोग इसे नहीं होने देंगे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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