Saturday, July 31, 2021
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‘अंकित शर्मा ने किया हिंसक भीड़ का नेतृत्व, ताहिर हुसैन कर रहा था खुद का बचाव’: ‘द लल्लनटॉप’ ने जमकर परोसा प्रोपेगेंडा

इंडिया टुडे के पत्रकार ऐश्वर्या पालीवाल ने इस डॉक्यूमेंट्री के 43 मिनट वाले स्लॉट के बाद बेहद गंभीर हाव-भाव के साथ बताने की कोशिश की कि जो लोग बता रहे हैं कि अंकित शर्मा आईबी के स्टॉफ से थे, वो बात बाद में निकली, उससे पहले वहाँ के लोगों का कहना था कि अंकित भीड़ का हिस्सा थे और भीड़ को लेकर मुस्लिम बहुल इलाकों में जा रहे थे।

दिल्ली दंगों के 1 साल बीतने के बावजूद कुछ जख्म ऐसे हैं जिनका भरना कुछ परिवारों के लिए नामुमकिन है। आगामी सालों में 23-24 फरवरी की तारीख जब भी आएगी, साल 2020 के ये जख्म ताजा हो जाएँगे। उत्तर पूर्वी दिल्ली के लिए जहाँ ये तारीखें काले दिन के तौर पर दर्ज रहेंगी, वहीं कुछ मीडिया संस्थान ऐसे हैं जिनके लिए ये अवसर भी प्रोपेगेंडा चलाने का एक मौका होगा।

24 फरवरी 2021 को द लल्लनटॉप ने अपने यूट्यूब चैनल पर दिल्ली दंगों पर ‘दहली’ शीर्षक के साथ एक डॉक्यूमेंट्री अपलोड की। इसमें उन्होंने शाहीन बाग की शुरुआत से दिल्ली दंगों के आखिरी दिन तक की एक-एक बात को कवर करने की कोशिश की।

हालाँकि, हर पहलू को दिखाने के चक्कर में लल्लनटॉप शायद भूल गया कि उनकी डॉक्यूमेंट्री का झुकाव किस ओर हो रहा है और किस तरह एक प्रकार का नैरेटिव बना रहे हैं।

शाहीन बाग को शांतिपूर्ण प्रदर्शन बताने से लेकर कपिल मिश्रा को हिंसा भड़काने का जिम्मेदार बताने का काम इस डॉक्यूमेंट्री के जरिए बखूबी किया गया। इसमें जामिया में हुई फायरिंग को दिखाया गया, कपिल गुर्जर जिसके बाद में AAP से जुड़े होने के प्रमाण मिले थे, उसकी फुटेज तब तक दिखाई गई जब तक वह जय श्रीराम बोलता नहीं दिखा और ये नहीं जताया कि उसने गोली हिंदू होने के नाते चलाई है।

वहीं वीडियो में पुलिस पर गोली तानने वाला शाहरूख भी दिखा लेकिन चंद सेकेंड के लिए। वो भी इस तुलना के साथ कि जैसे कपिल गुर्जर ने बंदूक उठाई थी वैसे ही तस्वीर शाहरूख की है। 

अंकित शर्मा पर लगा हिंसक भीड़ के नेतृत्व करने का इल्जाम?

अब पूरी डॉक्यूमेंट्री पर बात करें तो बहुत बिंदु हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे इसमें एक विशेष समुदाय को मासूम दिखाने का प्रयास हुआ और ये बताने की कोशिश हुई कि पूरे दंगों में उनकी कोई गलती नहीं थी। पीड़ितों के वर्जन की संख्या भी देंखे तो शायद द लल्लनटॉप ज्यादा हिंदू पीड़ितों के पास नहीं जा पाया।

खैर हमें इससे आपत्ती नहीं है। लेकिन, एक बात जिस पर शायद कम लोगों का ध्यान जाए वो यह कि इस पूरी 1 घंटे 8 मिनट की वीडियो में जहाँ विशेष समुदाय के पीड़ितों के जख्म उनके परिजनों के दर्द तक जूम कर करके दिखाए गए, वहीं अंकित शर्मा जिन्हें ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में बर्बरता से मार दिया गया, उन पर सच्चाई बताना तो दूर हिंसा करने वाली भीड़ का नेतृत्व करने के इल्जाम लगा दिए गए।

इंडिया टुडे के पत्रकार ऐश्वर्या पालीवाल ने इस डॉक्यूमेंट्री के 43 मिनट वाले स्लॉट के बाद बेहद गंभीर हाव-भाव के साथ बताने की कोशिश की कि जो लोग बता रहे हैं कि अंकित शर्मा आईबी के स्टॉफ से थे, वो बात बाद में निकली, उससे पहले वहाँ के लोगों का कहना था कि अंकित भीड़ का हिस्सा थे और भीड़ को लेकर मुस्लिम बहुल इलाकों में जा रहे थे।

अंकित शर्मा का हाथ और इंडिया टुडे के पत्रकार ऐश्वर्या पालीवाल

अब पालीवाल की बातों का क्या मतलब है, उन्हें ऐसी जानकारी देने वाले कौन से स्रोत हैं, इस पर ऑपइंडिया को बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन हमारे पास अंकित के परिवार के कुछ शब्द हैं, जिन्हें पढ़कर आज लगता है कि उन्हें पहले से पता था कि आखिर में न्याय तो मिलेगा नहीं लेकिन उसके बदले अंकित को दंगाई घोषित जरूर कर दिया जाएगा।

क्या कहा था अंकित के परिवार ने?

जब दंगे हुए थे और अंकित की लाश नाले में मिलने से सब सकते में आ गए थे, उस समय ऑपइंडिया ने सच जानने के लिए अंकित के घरवालों से बात की थी। अंकित के भाई अंकुर ने तब कहा था,

“मेरे भाई अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन ने मारा है। वो यहाँ दंगाइयों का सबसे बड़ा सरगना है। वही दंगे करवा रहा है। जब मेरे भाई को इस्लामी दंगाई घसीटते हुए ले जा रहे थे, तब वही उन्हें निर्देश दे रहा था कि क्या और कैसे करना है। अरविंद केजरीवाल मेरे भाई को दंगाई साबित कर देंगे। मेरा भाई दंगाई नहीं था। वो एक सरकारी अधिकारी था, जो लोगों को समझा रहा था कि झगड़ा मत करो। वो दोनों तरफ के लोगों को जानता था, इसलिए उन्हें समझाने गया था।”

दिलचस्प बात यह है कि अंकित के भाई ने जिस ताहिर हुसैन पर अपने भाई की हत्या का इल्जाम लगाया, उसी ताहिर हुसैन को लेकर सारी चीजें आज कोर्ट में स्पष्ट हैं। लेकिन तब भी डॉक्यूमेंट्री यही कहती है कि उसके बारे में लोग क्या कह रहे थे और कैसे वो उस दिन खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था।

ये प्रोपगेंडा फैलाने का तरीका नहीं है तो क्या है? सोचने वाली बात है कि यदि लोगों के हवाले से ही बातों को रखना है तो लोग तो ये भी कह रहे थे कि अंकित शर्मा को घसीटकर ताहिर की बिल्डिंग में ले जाया गया, उसी के कहने पर उनकी हत्या हुई। फिर क्यों इसमें एक ही तरह के लोगों की बातें बताई गईं?

अंकित शर्मा और ताहिर हुसैन

वास्तविकता ये हैं कि चाँद बाग, जहाँ अंकित मारे गए वो एक मुस्लिम बहुल इलाका है तो पालीवाल से पूछा जाना तो बनता है अंकित कौन से मुस्लिम बहुल इलाके में जा रहे थे? सच यही है कि उस दिन इस्लामी भीड़ ने अंकित पर हमला किया था। और हमला भी ऐसा कि अंकित की आंते तक फाड़ दी गई थीं। मारते हुए भीड़ की क्या मंशा थी इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि 6 लोगों ने उन पर 400 से ज्यादा बार हमले किए थे और मारने के बाद उन्हें एक नाले में फेंक दिया गया था।

आज उन दंगों के 1 साल बीतने के बाद हम मोहम्मद नासिर खान की आँख में गोली मारने वाले किसी हिंदू को जायज नहीं ठहराते, लेकिन ये तो पूछ सकते हैं जब द लल्लनटॉप नासिर की आपबीती सबके सामने ला सकता है, तो अंकित शर्मा के साथ हुई बर्बरता बताने से क्या परहेज है? दर्शकों के मन में ये प्रश्न क्यों छोड़ा जा रहा है कि जैसे अंकित को उसके किए का फल मिला, वो खुद मारकाट मचाने जा रहे थे और उनका शिकार हो गया।

चाँद बाद की दरगाह

इस वीडियो की शुरुआत में ही एक पीर बाबा की दरगाह दिखाई है, वीडियो के अंत तक किसी मंदिर के पुजारी का वर्जन क्यों नहीं लिया। वो तस्वीर जिसमें कुर्ते टोपी वाला पीड़ित जिस पर हिंसक भीड़ लाठी भाँज रही है, यदि वह दृश्य डराने वाला है तो क्या विनोद का शव भयभीत करने वाला नहीं है जिसे गली में फेंककर मजहबी नारों के साथ उसके बेटे को धमकी दी गई थी कि पूरी रात लाशों का सिलसिला जारी रहेगा।

द लल्लनटॉप! 23-24 फरवरी 2020, दिल्ली दहली थी, आग में झुलसी थी, 50 से ज्यादा लोगों ने अपनों को खोया था। लेकिन उन सबकी पृष्ठभूमि हिंदूवादी संगठनों या नेता की एंट्री से बहुत पहले से तैयार हो रही थी। आज इन बातों के तमाम सबूत मौजूद हैं। पुलिस पर हमले से लेकर आम जन की हत्याओं के पीछे किसकी साजिश थी, इसके भी खुलासे हो रहे हैं। ऐसे में इतनी घटिया प्रयास यदि न ही किए जाएँ तो वह आम पाठक और दर्शक के लिए बेहतर होंगे, क्योंकि हासिल इन सबका कुछ नहीं होगा, बस फर्क पड़ेगा तो आपकी नैतिकता और विश्वसनीयता पर, जिसे पहले ही गाली पड़ती है।

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