Tuesday, June 25, 2024
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पानी की टंकी में हथियार, जवानों के खाने-पीने की चीजों में ज़हर… जानें क्या था ‘लाल आतंकियों’ का ‘पेरमिली दलम’ जिसे नेस्तनाबूत करने में लगे 39 साल, जंगल में चलाते थे ‘सरकार’

जंगलों के बीच पहले कम संख्या में तैनात वन विभाग और पुलिस वालों को निशाना बनाया जाता था। बाद में इलाके को अपना क्षेत्र घोषित कर दिया जाता था जहाँ से समांतर सरकार चलाने के दावे होते थे।

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके में सोमवार (13 मई, 2024) को सुरक्षा बलों ने पेरमिली दलम नाम के नक्सल गिरोह को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। यह संगठन अबूझमाड़ में नक्सलियों के हेडक्वार्टर का सप्लाई चेन माना जाता था। अबूझमाड़ के लिए नक्सल विरोधी अभियान में लगे पैरामिलिट्री और राज्य पुलिस के जवानों को यह सफलता 39 वर्षों के बाद मिली है। देश विरोधी कार्यों में लगे इस गैंग को खत्म करने में कई जवानों और अधिकारियों ने अपना योगदान दिया जिसमें बलिदान तक शामिल हैं।

सोमवार (13 मई) को सुरक्षा बलों को गढ़चिरौली इलाके में पेरमिली दलम के कुछ सदस्यों की मूवमेंट की सूचना मिली थी। इस सूचना पर खासतौर पर नक्सल विरोधी अभियान के लिए बनी C-60 टीम को मौके पर भेजा गया। तलाशी के दौरान नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी थीं। जवाबी कार्रवाई में 3 नक्सली मारे गए थे। इनमें महिला नक्सली भी शामिल हैं। मारे गए पुरुष नक्सली की पहचान कमांडर वासु के तौर पर हुई थी। तलाशी के दौरान इन नक्सलियों के पास से एक AK 47, एक कार्बाइन, एक इंसास राइफल, नक्सली साहित्य के साथ कई अन्य चीजें बरामद हुईं थीं।

39 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद सुरक्षा बलों ने पेरमिली दलम को नेस्तोनाबूत करने में सफलता पाई है। इस संगठन के खात्मे के बाद सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के अंतिम गढ़ अबूझमाड़ की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा दिए हैं। अबूझमाड़ को अघोषित तौर पर नक्सलियों का हेडक्वार्टर भी कहा जाता है। पेरमिली दलम इस मुख्यालय के लिए सप्लाई-चेन का काम करता था।

क्या था पेरमिली दलम

पेरमिली दलम की स्थापना कुछ तेलगु युवकों द्वारा साल 1985 में की गई थी। बाद में यह संगठन गढ़चिरौली में सक्रिय हो गया। धीरे-धीरे अपना कैडर को बढ़ाता चला गया। शुरुआत में इस गिरोह ने वन विभाग के अधिकारियों को धमकाना शुरू किया। कुछ समय बाद इस संगठन का कनेक्शन अबूझमाड़ के जंगलों से जुड़ गया। माओवादी सोच को आगे बढ़ाने के लिए इस गैंग ने स्थानीय थानों पर तैनात पुलिस वालों के खिलाफ जनजातीय लोगों को भड़काना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे कैडर का विस्तार करने के साथ पेरमिली दलम ने महिलाओं को भी भर्ती करना शुरू कर दिया। गढ़चिरौली इलाके में पेरमिली दलम द्वारा जब हालात को बदतर कर दिया गया तब से अर्धसैनिक बलों ने वहाँ मोर्चा सँभाला। 39 वर्षों तक संघर्ष चला। सुरक्षा बलों के कई जवानों ने वीरगति पाई। सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचने के साथ क्षेत्र में विकास होने की वजह से तमाम युवाओं ने इस गिरोह से मुँह फेर लिया। अंत में सिमट रहे नक्सली आतंक के अभियान में पेरमिली दलम का सफाया हुआ।

कैसे आतंक फैलाता था पेरमिली दलम

ऑपइंडिया ने नक्सल विरोधी अभियान में तैनात रहे पैरामिलिट्री के एक अधिकारी से बात की। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने हमें बताया कि पेरमिली दलम भी अन्य नक्सली संगठनों की तर्ज पर पहले उन इलाकों को चिह्नित करता था जो शासन की नजर से दूर होते थे। जंगलों के बीच पहले कम संख्या में तैनात वन विभाग और पुलिस वालों को निशाना बनाया जाता था। बाद में इलाके को अपना क्षेत्र घोषित कर दिया जाता था जहाँ से समांतर सरकार चलाने के दावे होते थे।

हमें बताया गया कि पेरमिली दलम ने गढ़चिरौली के घने जंगलों में अपने ट्रेनिंग कैम्प खोल रखे थे। यहाँ वो जनजातीय समुदाय के युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़का कर हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिया करते थे। नक्सलियों द्वारा झारखंड और छत्तीसगढ़ की खदानों पर हमला कर के डेटोनेटर लूटे जाते थे जो पेरमिली दलम जैसे गिरोहों को बाँटे जाते थे। इन डेटोनेटर का उपयोग लैंडमाइंस बिछाने से ले कर बम बनाने तक में होता था। हथियारों को छिपाने के लिए पेरमिली दलम अन्य नक्सली संगठनों की तरह पानी की टंकियों में उन्हें भर के जमीन में दबा कर रखता था।

वर्तमान में नक्सल विरोधी अभियान में तैनात CRPF के एक अन्य अधिकारी ने हमें बताया कि पेरमिली दलम माओवाद की उस विचारधारा से प्रेरित था जिसका मकसद किसी भी रूप में दुश्मन का खात्मा होता है। उन्होंने हमें बताया कि सुरक्षा बलों पर हथियारों से हमलों के अलावा यह संगठन जवानों के खाने के सामान और पीने के पानी तक में जहर डालने की साजिश रच चुका है। अधिकारी ने आशा जताई कि जिस गति से नक्सल विरोधी अभियान जारी है यह उसमें को बड़ी बाधा नहीं आती तो जल्द ही भारत नक्सल मुक्त होगा।

अबूझमाड़ को ही क्यों बनाया हेडक्वार्टर

नक्सल विरोधी अभियान में तैनात CRPF अधिकारी ने हमें आगे अबूझमाड़ के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अबूझमाड़ का अर्थ है जिसे कोई बूझ नहीं पाया। 4400 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल की मैपिंग भी अभी तक ठीक से नहीं हो पाई है। जनजातीय बहुल होने की वजह से यहाँ किसी आधिकारिक मूवमेंट के लिए पहले राज्यपाल की अनुमति आवश्यक है। हमें यह भी बताया गया कि कई राज्यों से इस जंगल की सीमा लगने की वजह से भी कई बार नक्सलियों को पुलिस के सीमा विवाद का भी फायदा मिल जाता है। अबूझमाड़ का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र तो कुछ आंध्र प्रदेश में पड़ता है।

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राहुल पाण्डेय
राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com
धर्म और राष्ट्र की रक्षा को जीवन की प्राथमिकता मानते हुए पत्रकारिता के पथ पर अग्रसर एक प्रशिक्षु। सैनिक व किसान परिवार से संबंधित।

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