क्या भारतीय न्यायपालिका बड़े बदलावों की ओर बढ़ रही है? हाँ। वरना न तो भारत की राष्ट्रपति और न ही प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार न्यायप्रणाली की खामियों पर इतना खुलकर बोलते।
इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक बार फिर न्यायपालिका को आड़े हाथों लिया। 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के 75वें स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा, “न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए।”
इस समारोह में देशभर की जिला अदालतों से आए लगभग 800 जज मौजूद थे। राष्ट्रपति ने आगे कहा, “लोगों को लगता है कि न्यायपालिका में संवेदनशीलता नहीं है।” यानी, भारत की न्यायिक प्रणाली कठोर और अकड़ू बन चुकी है।
यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रपति मुर्मू ने जजों की नियुक्ति प्रणाली पर सवाल उठाए। कॉलेजियम का नाम लिए बिना उन्होंने बार-बार सुझाव दिया है कि जजों की नियुक्ति भी उसी तरह होनी चाहिए, जैसे आईएएस अधिकारियों की होती है।
राष्ट्रपति के सुझाव का थोड़ा बैकग्राउन्ड देखें। 1958 में भारत के लॊ कमिशन की 14वीं रिपोर्ट ने ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस (AIJS) बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1978 की 77वीं रिपोर्ट, 1986 की 116वीं रिपोर्ट और हाल ही में 2012 में भी यह सुझाव दोहराया गया। लेकिन 1958 से आज तक छह दशकों से अधिक समय बीत गया और एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
क्यों?, क्योंकि हर बार खुद जजों ने इसका विरोध किया। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने लगातार कहा कि इससे हमारे अधिकार क्षेत्र में दखल होगा।
यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) और सिविल सर्विस एग्जाम (CSE) के माध्यम से सरकार की 64 शीर्ष सेवाओं में नियुक्तियाँ होती हैं—IAS, IPS और IRS इनमें सबसे ऊपर हैं। इन्हीं परीक्षाओं से विदेश सेवा, वन सेवा, रक्षा खातों के हिसाब विभाग, रेलवे के कुछ विभागों, डाक विभाग और कई अन्य विभागों के उच्च अधिकारी चुने जाते हैं। कानून के क्षेत्र के लिए ICLS ( इंडियन सिविल लॉ सर्विस) और ILS (इंडियन लॉ सर्विस) जैसी सेवाएँ हैं, लेकिन इनमें से कोई भी जजों का चयन नहीं करती।
जरूरी है कि जजों की नियुक्ति भी IAS जैसी सख्त परीक्षा और गहन प्रशिक्षण से हो। और यह केवल हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के लिए नहीं बल्कि फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, सिटी सिविल कोर्ट और सेशन्स कोर्ट के लिए हो। आखिरकार, इन्हीं स्तरों से आगे चलकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनते हैं।
कोलेजियम प्रणाली के चलते उच्च न्यायालयों में जजों की कुर्सियाँ कुछ चुनिंदा परिवारों के सदस्यों के लिए आरक्षित हो गईं हैं। नजदीकी रिश्तेदार न हों तो जज साहब अपने दोस्तों या खास लोगों के बच्चों को प्राथमिकता देते हैं। इसी भाई-भतीजावाद और भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म करने के लिए नेशनल ज्यूडिशियल अप्वॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) बना। मोदी सरकार ने 2014 में संसद के दोनों सदनों में 99वाँ संवैधानिक संशोधन पास कराया, NJAC अधिनियम बना और 16 राज्यों ने भी इसे मंजूरी दे दी। 31 दिसम्बर 2014 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर कर दिए।
13 अप्रैल 2015 को यह कानून लागू हो गया। फिर क्या हुआ? 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने NJAC को असंवैधानिक करार दिया और कॉलेजियम प्रणाली बहाल कर दी।
यह वैसा ही था जैसे जंगल के दरबार में शेर से पूछा जाए कि क्या वह ऐसा कानून मंजूर करेगा जिसमें शेरों को मनमाने शिकार से रोका जाए और हर शिकार का हिसाब देना पड़े। शेर का जवाब क्या होगा?
कॉलेजियम प्रणाली ही न्यायपालिका के शेरों का पेट भरती है। NJAC लागू होता तो शेर भूखे मरते। यह कहानी का एक हिस्सा है। अब दूसरा हिस्सा।
संजीव सान्याल भारत के इतिहास पर लिखने वाले बेस्टसेलर लेखक हैं , जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अहम सदस्य हैं उन्होंने हाल ही में एक कानून विषयक सम्मेलन में 12 मिनट का सटीक भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं:-
- “मुझे डर है कि न्यायिक प्रणाली और कानूनी इको-सिस्टम, खासतौर से न्यायिक प्रणाली, आज भारत को विकसित भारत बनाने में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक यहाँ भारी परिवर्तन नहीं होता, सबसे मजबूत आर्थिक नीतियाँ भी बेकार साबित होंगी।”
- उन्होंने पूछा- जजों को ‘माई लॉर्ड’ क्यों कहा जाए? आखिर वे भी हमारे जैसे नागरिक हैं, सामंती शासक नहीं। (आज भले ही ‘सर’ या ‘योर ऑनर’ स्वीकार्य हैं, लेकिन सन्याल की चिंता सही है। ज़्यादातर वकील अब भी ‘माई लॉर्ड’ कहकर ही जजों को सिर पर चढ़ाते हैं।)
- उन्होंने अदालतों की लंबी छुट्टियों पर सवाल उठाया। इन लंबे वेकेशन के दौरान अदालतों का पूरा कामकाज ठप हो जाता है। पुलिस, सरकारी अस्पताल या नौकरशाही में भी छुट्टियाँ होती हैं, लेकिन वहाँ काम कभी बंद नहीं होता। अदालतों को ही क्यों ‘वेकेशन बेंच’ की जरूरत पड़े?
आप की जानकारी के लिए बता दें कि संजीव सान्याल महान क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के पोते हैं- जिनके शिष्य राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे वीर हैं जिन्होने काकोरी साहस में राम प्रसाद बिस्मिल का साथ दिया था और अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी थी। संजीव सान्याल प्रधानमंत्री के भरोसेमंद व्यक्ति हैं।
परंपरा रही है कि राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयान अक्सर प्रधानमंत्री की मूक सहमति से ही होते हैं। इसलिए इन दोनों दिग्गजों की बातें साफ इशारा करती हैं कि मोदी सरकार न्यायप्रणाली में कुछ बड़े परिवर्तन की तैयारी कर रही है। आने वाले महीनों में जज साहबान को ‘मुलजिम’ के कटघरे में खड़ा कर जवाब माँगा जाएगा और कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों द्वारा खड़ी की गई ‘लीगल इको-सिस्टम’ को भी तोड़ा जाएगा।
आवश्यक सुधारों के साथ-साथ न्यायालयों की रिपोर्टिंग प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है। अभी LiveLaw और Bar & Bench सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई कवर करते हैं, लेकिन ये भी उसी इको-सिस्टम का हिस्सा हैं। जरूरत है एक तीसरे, मजबूत और राष्ट्रवादी लीगल डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म की, जो बेबाकी से इस किले में प्रवेश कर सके और न्यायपालिका को खोखला कर रही दीमकों का ‘पेस्ट कंट्रोल’ कर सके।
मोदी सरकार का कामकाज कुछ कुछ भगवान के कारोबार जैसा ही है- कभी कभार देर है, पर अंधेर नहीं।


