पश्चिम बंगाल सरकार ने सभी धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाकर ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। इसके बाद कई मुस्लिम संगठन भेदभाव का आरोप लगाते हुए खुद को पीड़ित बता रहे हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस ने राज्य भर की मस्जिद कमेटियों से संपर्क किया और उनसे तेज आवाज वाले लाउडस्पीकर हटाने और उनकी जगह साउंड बॉक्स लगाने को कहा है। पुलिस पिछले कुछ दिनों से लगातार मस्जिद समितियों के साथ कई बैठकें कर उनसे सहयोग की अपील कर रही है।
एक तरफ जहाँ कुछ मस्जिदें इस फैसले का पालन कर रही हैं तो कई ने रोना शुरू कर दिया है। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने इसे संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन तक बता दिया है। सिद्दीकी ने कहा कि पब्लिक एड्रेस सिस्टम के तौर पर इस्तेमाल होने वाले लाउडस्पीकरों को हटाना संविधान में दिए गए मजहबी अधिकारों का उल्लंघन है। सिद्दीकी ने बुधवार (5 अगस्त 2026) को पश्चिम बंगाल के DGP एस.एन. गुप्ता को पत्र लिखकर इस कार्रवाई पर स्पष्टीकरण और मामले की जाँच की माँग की है।
दक्षिण 24 परगना के भांगड़ निर्वाचन क्षेत्र से ISF विधायक ने पत्र में लिखा, “अगर लाउडस्पीकर से होने वाले ध्वनि प्रदूषण के बारे में कोई खास शिकायत है, तो कानून के मुताबिक उचित जाँच, नोटिस जारी करने और पक्ष रखने का मौका देने के बाद ही कार्रवाई की जानी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “किसी भी हालत में धार्मिक संस्थानों के खिलाफ जुबानी आदेश या जबरदस्ती कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।”
उन्होंने पत्र में कहा कि उन्हें अलग-अलग जिलों से कई शिकायतें मिल रही हैं जिनमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर नोटिस जारी कर रही है। सिद्दीकी ने DGP से यह भी आग्रह किया कि अगर कोई पुलिस अधिकारी अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते या मनमानी करते हुए पाया जाता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि वे पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएँगे।
खास बात यह है कि सिद्दीकी उस पार्टी से आते हैं जिसके संस्थापक मौलाना अब्बास सिद्दीकी ने कोविड-19 महामारी के दौरान नफरत भरी बातें कही थीं। मौलाना ने कहा था कि वह अल्लाह से एक ऐसा वायरस माँग रहे हैं जो एक ही बार में भारत में 50 करोड़ लोगों की जान ले ले। मौलाना का यह बयान देते हुए एक वीडियो वायरल हुआ था।
लाउडस्पीकर हटाने के सरकार के फैसले का विरोध करते हुए, कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मुहम्मद शफीक कासमी ने आरोप लगाया कि मस्जिद के अधिकारियों को लाउडस्पीकर हटाने की धमकी दी गई थी। मौलाना ने कहा, “ऐसा कोई कोर्ट का आदेश या सरकारी नोटिफिकेशन नहीं है जिसमें कहा गया हो कि सभी मस्जिदों से लाउडस्पीकर तुरंत हटा दिए जाएँ। अगर ऐसे आदेश होते, तो सरकार को इमामों और मस्जिद कमेटियों को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी। इसके बजाय, मस्जिद के अधिकारियों को धमकी दी गई और लाउडस्पीकर हटाने के लिए कहा गया। क्या यह कानून का उल्लंघन नहीं है?” उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड के अनुसार राज्य में 62,000 से अधिक मस्जिदें हैं लेकिन असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है।
मौलाना कासमी ने कहा, “मैं मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से अपील करता हूँ कि वे इस मामले में दखल दें और पुलिस को निर्देश दें कि वे लाउडस्पीकर हटाकर लोगों को परेशान करने के बजाय शोर को नियंत्रित करें। मैं राज्य पुलिस के महानिदेशक से कहना चाहता हूँ कि इस कार्रवाई से प्रशासन के खिलाफ केवल गुस्सा ही बढ़ेगा। हम सरकार से लड़ने के लिए नहीं हैं। अगर कोई समस्या है, तो बातचीत के जरिए उसका समाधान निकालें।”
राज्य सरकार ने भेदभाव के आरोपों का खंडन किया
शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह फैसला मंदिरों समेत सभी धार्मिक स्थलों पर लागू होता है, न कि सिर्फ मस्जिदों पर। कैबिनेट ने धार्मिक स्थलों पर शोर-शराबे को नियंत्रित करने के लिए गाइडलाइंस लागू करने का फैसला किया था और यह उसी पहल का हिस्सा है। पॉल ने कहा, “सिर्फ मस्जिदों को ही नहीं बल्कि मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को भी इन नियमों का पालन करना होगा। हम किसी को भी इनका उल्लंघन नहीं करने देंगे।”
पूरे राज्य में धार्मिक स्थलों पर शोर प्रदूषण नियंत्रण नियम लागू करने का फैसला शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में लिया था। राज्य सरकार ने पुलिस को निर्देश दिया था कि वे वेस्ट बंगाल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा तय शोर की सीमा का पालन सुनिश्चित करें। यह सीमा रिहायशी इलाकों में दिन के समय 55 डेसिबल और रात के समय 45 डेसिबल है।

