असम में जनसांख्यिकीय संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने रविवार (12 अक्टूबर 2025) को खुलासा किया कि राज्य में हिंदू आबादी अब केवल 40% रह गई है जबकि मुस्लिम आबादी लगभग 39.5% तक पहुँच चुकी है। यानी अब दोनों समुदायों की जनसंख्या लगभग बराबरी पर है। आने वाले वर्षों में इस स्थिति के मुस्लिम आबादी के पक्ष में बदलने की संभावना है।
सरमा ने कहा कि असम की जनसंख्या संरचना में जो परिवर्तन हुआ है यह केवल संयोग नहीं बल्कि लंबे समय से जारी घुसपैठ का परिणाम है। उन्होंने कहा, “जनसंख्या में यह वृद्धि स्थानीय मुसलमानों की स्वाभाविक वृद्धि के कारण नहीं बल्कि घुसपैठियों के कारण हुई है।”
उन्होंने आगे कहा, “असम जनसांख्यिकीय परिवर्तन का एक बड़ा शिकार रहा है। वर्ष 2021 में मुस्लिम आबादी 38 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर चुकी थी और वर्तमान में यह करीब 39.5 प्रतिशत है। वहीं हिंदू आबादी अब मुश्किल से 40 प्रतिशत पर टिकी हुई है।”
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य के पवित्र आध्यात्मिक केंद्र माजुली जैसे क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी में 100 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने कहा, “यह वृद्धि बाहर से आए घुसपैठियों के कारण हुई है। असमिया हिंदू अब वहाँ स्वयं अल्पसंख्यक हो चुके हैं।”
माजुली – असम का आध्यात्मिक केंद्र – में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या लगभग 100% बढ़ चुकी है। यह वृद्धि बाहर से आए घुसपैठियों के कारण हुई है। असमिया हिंदू अब वहाँ स्वयं अल्पसंख्यक हो चुके हैं।
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) October 12, 2025
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सरमा ने बताया कि राज्य में ईसाइयों की आबादी करीब 6-7% है। मुख्यमंत्री ने चिंता जताते हुए कहा कि ये सभी आँकड़े 2011 की जनगणना पर आधारित अनुमान हैं, जिसका अर्थ है कि मौजूदा स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है। उन्होंने केंद्र सरकार के प्रस्तावित जनसांख्यिकी मिशन को इस संकट के समाधान की दिशा में एक निर्णायक और ऐतिहासिक कदम बताया है।
असम में लगातार बदलता जनसांख्यिकीय नक्शा अब जनसंख्या के आँकड़ों का सवाल नहीं है बल्कि यह संस्कृतिक अस्तित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है। हिमंता बिस्वा सरमा का यह बयान दिखाता है कि असम में हमारी आँखों के सामने ही घुसपैठ का बड़ा खेल चल रहा है।

