सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली छोटी घटना भी ‘पब्लिक ऑर्डर’ के लिए खतरा: NSA के तहत शोएब के डिटेंशन को सही बता HC, इस्लामी भीड़ ने ऐक्सीडेंट के बाद किया था पथराव

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए नेशनल सिक्योरिटी ऐक्ट 1980 (NSA) के तहत की गई एक गिरफ्तारी को बरकरार रखा है। अदालत का कहना है कि एक अकेला अपराध भी यदि उससे सांप्रदायिक तनाव भड़कता है और आम लोगों की दिनचर्या बाधित होती है, तो वह सिर्फ ‘कानून-व्यवस्था’ का मामला नहीं रहता बल्कि सीधे ‘पब्लिक ऑर्डर’ के लिए समस्या पैदा करता है।

यह फैसला शोएब नामक व्यक्ति द्वारा दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर आया जिसने मऊ के जिलाधिकारी द्वारा जारी अपने डिटेंशन ऑर्डर को रद्द करने की मांँ की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की पीठ ने की।

हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह घटना सामान्य अपराध या शांति भंग जैसा प्रतीत हो सकती है लेकिन इसके चलते हुए दंगे, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान और बढ़ती साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति इसे ‘पब्लिक ऑर्डर’ का मसला बनाती है। इसी आधार पर अदालत ने NSA के तहत की गई कार्रवाई को सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी।

क्या था मामला?

15 नवंबर 2024 को शोएब ने सुक्खू की मोटरसाइकल को टक्कर मार दी थी जिसके बाद उसने शोएब ने अपने साथियों को बुलाया और सुक्खू पर चाकू से हमला किया। इसके बाद पीड़ित को अस्पताल ले जाने पर शोएब के पक्ष के लोग जुट गए और वहाँ भी मारपीट व पत्थरबाजी की गई।

इसके बाद 200 लोगों ने घोसी-दोहरीघाट मेन रोड को ब्लॉक कर दिया। जब पुलिस ने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो वहाँ हंगामा और आगजनी की गई। पथराव हुआ और पब्लिक प्रॉपर्टी व धार्मिक जगह को नुकसान पहुँचाया गया।

कोर्ट ने क्या कहा?

‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के जिस काम के चलते यह सभी घटनाएँ हुई उससे हिंदू समुदाय के लोग गुस्से में आ गए जिसके बाद दंगा हुआ और पुलिस फोर्स की चोट आई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के काम की वजह से पब्लिक ऑर्डर बहुत अधिक बिगड़ गया, जिससे दुकानदारों को अपनी दुकानें बंद करनी पड़ीं और डर के मारे स्कूल बंद करने पड़े।

कोर्ट ने राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य 1965 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया कि कोई भी काम जो कम्युनिटी या आम जनता को प्रभावित करता है वह सिर्फ कानून तोड़ने से कहीं अधिक है।

कोर्ट ने आगे कहा कि हिरासत के आधार से यह कॉन्फिडेंशियल जानकारी सामने आई कि याचिकाकर्ता ने गवाहों को मारने और ‘हिंदू समुदाय के लोगों को सबक सिखाने’ की कसम खाई। बेंच ने कहा कि इंटेलिजेंस रिपोर्ट से पता चलता है कि याचिकाकर्ता का इसी तरह के काम करने का पक्का इरादा था।

कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता और उसके साथियों ने मोटरसाइकिल टकराने की पर सुक्खू पर चाकू से हमला किया, यह कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का एक आसान मामला हो सकता है…लेकिन इस कार्रवाई का सीधा नतीजा यह हुआ कि दो समुदायों के बीच बड़े पैमाने पर दंगा और सांप्रदायिक तनाव फैल गया, जिससे पब्लिक ऑर्डर खराब हो गया।”