समाचार वेबसाइट ‘द वायर’ ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि केंद्र सरकार सभी मोबाइल फोन में लोकेशन सर्विस को हमेशा चालू रखने का प्रस्ताव ला रही है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट की हेडलाइन में भी सीधे सवाल किया, “क्या मोदी सरकार सभी मोबाइल फोन में लोकेशन हमेशा ऑन रखने का विचार कर रही है?” ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा कि गूगल, एप्पल और सैमसंग जैसे बड़े फोन निर्माता इस प्रस्ताव के खिलाफ हैं।
हालाँकि, असली रिपोर्टों की जाँच करने पर स्पष्ट हुआ कि ‘द वायर’ ने इस खबर को जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश किया और इसका दोष सीधे सरकार पर मढ़ दिया। असलियत यह है कि यह प्रस्ताव सरकार का नहीं था, बल्कि यह मोबाइल सेवा देने वाले (टेलीकॉम ऑपरेटरों) की तरफ से आया था और सरकार केवल इसकी समीक्षा कर रही थी।

टेलीकॉम कंपनियों की माँग और उसका कारण
यह प्रस्ताव सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) के माध्यम से लाया गया था, जिसमें Jio और Airtel जैसी कंपनियाँ शामिल हैं। ऑपरेटर चाहते थे कि फोन बनाने वाली कंपनियों को यह आदेश दिया जाए कि वे A-GPS (असिस्टेड-GPS) तकनीक को डिफॉल्ट रूप से हमेशा ऑन रखें और यूजर को इसे बंद करने का विकल्प न दिया जाए।
इस माँग का मुख्य कारण यह है कि जब पुलिस या जाँच एजेंसियों को किसी यूजर का सही स्थान जानना होता है, तो टेलीकॉम ऑपरेटर केवल मोबाइल टॉवरों के जरिए लोकेशन का अनुमान ही लगा पाते हैं, जो सटीक नहीं होता। A-GPS तकनीक GPS और मोबाइल नेटवर्क दोनों की मदद से सटीक लोकेशन देती है। इसीलिए ऑपरेटर चाहते थे कि यह नियम लागू हो, ताकि जाँच एजेंसियों को सही लोकेशन आसानी से मिल सके।
फोन निर्माताओं का विरोध और सरकारी समीक्षा
टेलीकॉम कंपनियों के इस प्रस्ताव का एप्पल, सैमसंग और गूगल जैसे बड़े फोन निर्माताओं ने जोरदार विरोध किया है। उन्होंने सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि ऐसा अनिवार्य नियम कहीं भी लागू नहीं है और A-GPS लोकेशन को निगरानी के लिए नहीं बनाया गया है।
रॉयटर्स ने सरकारी सूत्रों और IT मंत्रालय के आंतरिक ईमेल्स के आधार पर बताया कि सरकार इस प्रस्ताव पर सिर्फ समीक्षा कर रही थी, न कि सक्रिय रूप से इसे लागू करने पर विचार कर रही थी। इस मुद्दे पर चर्चा के लिए गृह मंत्रालय और स्मार्टफोन कंपनियों की एक बैठक प्रस्तावित थी, लेकिन उसे फिलहाल टाल दिया गया है।
‘द वायर’ ने फोन निर्माताओं की आपत्ति तो सही बताई, लेकिन उसने यह सबसे जरूरी तथ्य छिपा दिया कि यह प्रस्ताव सरकार का नहीं, बल्कि टेलीकॉम ऑपरेटरों का था, जिसे दिखाकर उसने जानबूझकर जनता को गुमराह करने और सरकार को घेरने की कोशिश की।

