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आंदोलन की मर्यादा बची रहे और इसका राजनीतिक इस्तेमाल ना हो, इसकी जिम्मेदारी अब GenZ पर… नेक नहीं हैं वामी-इस्लामी गिरोह के मंसूबे

GenZ की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी वायरल वीडियो को अंतिम सच न माने। हर वीडियो पूरी कहानी नहीं बताता। हर क्लिप संदर्भ नहीं बताती। हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यदि युवा केवल एल्गोरिद्म के अनुसार सोचने लगेंगे तो वे अपनी सबसे बड़ी ताकत 'स्वतंत्र सोच' को खो देंगे।

जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ चल रहा छात्र आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो गया। GenZ के इस आंदोलन में गाली-गलौज, गुस्सा, पत्थरबाजी, लाठीचार्ज सब देखने को मिला लेकिन अंतत: जंतर-मंतर पर सब समाप्त हो गया। युवाओं की भावनाओं का आवेग थम गया लेकिन सियासी रस्सा-कस्सी अभी भी जारी है। वामी-इस्लामी गुट से लेकर विपक्षी राजनेता तक सब इस आंदोलन की आड़ में अब अपना-अपना हित साधने में लगे हैं।

किसी को वोट चाहिए, किसी को PM मोदी के खिलाफ माहौल बनाना है, किसी को अब हिंदू धर्म और हिंदुओं को गाली देने का मौका मिल गया है। कुछ लोग चाहते हैं कि आंदोलन की यह आग लगी रहे, उन्हें उम्मीद है कि हो सकता है कि इसमें मोदी की सरकार झुलस जाए।

यह आंदोलन छात्रों की आवाज का आंदोलन था इसमें कोई शक नहीं। लाखों छात्र हर साल अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष किताबों, कोचिंग, मॉक टेस्ट और अनगिनत उम्मीदों के बीच बिताते हैं। उनके लिए परीक्षा जीवन की दिशा तय करने वाला मोड़ होती है। इसलिए जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो गुस्सा आना तो स्वाभाविक है ही। युवाओं में यह आक्रोश किसी राजनीतिक दल ने पैदा नहीं किया बल्कि उस व्यवस्था के प्रति पैदा हुआ जिस पर छात्रों ने भरोसा किया था।

अब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है तो अब इस आंदोलन के लिए सरकार से भिड़ गए युवाओं सामने एक चुनौती भी है। छात्र और युवाओं का एक वर्ग इस आंदोलन के लिए सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि उसने यह महसूस किया कि यह आंदोलन किसी निजी या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि वास्तविक समस्या के समाधान के लिए हो रहा है लेकिन अब इसके खत्म होने के बाद असली मकसद और चेहरे दिखने लगे हैं।

सरकारी विरोधी और प्रोपेगेंडाबाज लोगों ने अपने-अपने हितों के हिसाब से इंटरनेट पर प्रोपेगेंडा भरना शुरू कर दिया है। इंटरनेट पर सरकार विरोधी सामग्री की भरमार है। दरअसल, आज की पीढ़ी इंटरनेट के युग में जी रही है। पहले किसी आंदोलन को प्रभावित करने के लिए सभाएँ करनी पड़ती थीं, पोस्टर लगाने पड़ते थे और महीनों तक घूमना पड़ता था। आज एक वायरल वीडियो, एक ट्रेंडिंग हैशटैग या एक भावनात्मक पोस्ट लाखों लोगों की सोच को प्रभावित कर सकती है।

यही इस दौर की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। आपमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने PM मोदी को गाली देते, सरकार का विरोध करते और आधी अधूरी जानकारी की आड़ में झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाते लोगों के वीडियो नहीं देखे होंगे। यही एल्गोरिद्म का करिश्मा है और यही आपको आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। ऐसी सब कोशिशें की जाएँगी कि इस गुस्से को भड़काया जाए, चाहे इसके लिए झूठ का ही सहारा क्यों ना लेना पड़े।

ऐसे माहौल में अब GenZ की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी वायरल वीडियो को अंतिम सच न माने। हर वीडियो पूरी कहानी नहीं बताता। हर क्लिप संदर्भ नहीं बताती। हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यदि युवा केवल एल्गोरिद्म के अनुसार सोचने लगेंगे तो वे अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘स्वतंत्र सोच’ को खो देंगे।

GenZ को यह समझने की जरूरत है कि किसी भी आंदोलन में राजनीतिक दल उस मुद्दे पर अपनी राय रख सकते हैं। यह उनका अधिकार है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र अपनी डोर विरोधी दल के हाथों में ना दे दें। किसी भी दल का समर्थन स्वीकार करना और किसी दल का राजनीतिक मंच बन जाना इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।

भारत का युवा राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय है। लगभग हर बड़ा मुद्दा कुछ ही घंटों में राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। यही लोकतंत्र की वास्तविकता भी है। लेकिन युवाओं के सामने चुनौती यह है कि वे स्वयं को केवल एक गुट तक सीमित न कर दें। यदि कोई सरकार अच्छा काम करती है, तो उसकी सराहना हो सकती है। यदि वही सरकार कहीं चूकती है, तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए।

उसी प्रकार यदि विपक्ष कोई उचित प्रश्न उठाता है, तो उस पर विचार होना चाहिए। लेकिन यदि एक गुट छात्रों के मुद्दे को केवल चुनावी हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है तो उस पर सवाल उठने ही चाहिए। लोकतंत्र में सबसे मजबूत नागरिक वही होता है जो किसी दल का अंध समर्थक या अंध विरोधी नहीं होता। यही अब GenZ को समझने की जरूरत है।

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शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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