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भारत का रुपया 6 साल में पहली बार हुआ ‘अंडरवैल्यूड’, इंटरनेशनल मार्केट में होगा फायदा: जानिए क्यों आती है ऐसी स्थिति, कैसे चीनी युआन को ₹ देगा टक्कर

रुपए में रिकॉर्ड गिरावट आई है। आरबीआई गवर्नर ने इसे सार्वजनिक तौर पर माना है। चीन के युआन से नीचे जाने की वजह से अब विदेशी बाजार में भारतीय सामान सस्ता मिलेगा और इससे निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा।

आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि भारत का रुपया ने ओवरवैल्यूड नहीं बल्कि अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। ‘बिजनेस लाइन’ के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ये रुपए की कमजोरी नहीं बल्कि भू राजनीतिक तनाव, अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना और उभरते बाजारों में आई अस्थिरता की वजह से हुआ है।

रुपए को मापने का तरीका

आरबीआई के गवर्नर का कहना है कि भारतीय रुपया NEER और REER सूचकांकों के आधार पर अंडरवैल्यूड स्थिति में आ चुका है। दरअसल ये दोनों रुपए मापने के दो पैमाने हैं।

NEER यानी नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट, जो बगैर महँगाई की जोड़े दूसरे देशों की करेंसी के आधार पर रुपए के बाहरी वैल्यू को आँकता है। वहीं REER यानी रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट जब रुपए की वैल्यू बताता है तो व्यापारिक साझेदारों के बीच महँगाई के अंतर को भी जोड़ता है। अगर REER 100 से ऊपर है तो करेंसी ओवरवैल्यूड है, और 100 से नीचे है तो अंडरवैल्यूड है।

आरबीआई के गवर्नर आम तौर पर बाजार के अस्थिर होने पर रुपए की कीमत को लेकर बयान देने से बचते हैं। ब्लूमबर्ग ने आरबीआई के गवर्नर के बयान को ‘रेयर सार्वजनिक बयान’ कहा है।

रुपए के मूल्य में सबसे बड़ी गिरावट

रुपये में कमजोरी का कारण घरेलू अर्थव्यवस्था की कमजोरी नहीं है। इसके वैश्विक कारण हैं। भू-राजनीतिक तनाव, मजबूत डॉलर और वैश्विक अस्थिरता का इससे पता चलता है। आरबीआई व्यापार को कंट्रोल नहीं करता, बल्कि रुपए के अत्यधिक उतार-चढ़ाव को डॉलर की खरीद-बिक्री कर, मौद्रिक नीति के द्वारा या विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर रोकता है।

भारतीय रुपया इस वित्त वर्ष यानी 2025-26 के दौरान पिछले 14 साल में सबसे ज्यादा गिरा है। कहा तो ये भी जा रहा है कि एशिया में सबसे ज्यादा भारत का रुपया गिरा है। यूएस ईरान के बीच जंग का असर दुनिया के तेल बाजार पर काफी पड़ा है। हॉर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही प्रभावित होने पर दुनियाभर में तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। भारत तेल का सबसे बड़े आयातक देशों में एक है। इसलिए भारत का रुपया कमजोर हुआ। इसकी कीमत में करीब 11 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई। 1 डॉलर की कीमत 96 रुपए से ऊपर तक चला गया। इससे व्यापार घाटे में वृद्धि हुई।

क्या होता है रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होना

आम बोलचाल की भाषा में रुपए का ओवरवैल्यूड और अंडरवैल्यूड होने का मतलब है उसकी वास्तविक आर्थिक ताकत और बाजार में उसकी कीमत में अंतर होना। उदाहरण के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के हिसाब से 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 74 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए ओवरवैल्यूड मानी जाएगी।

इसी तरह अगर 1 डॉलर की कीमत 80 रुपए हो, लेकिन वह 84 रुपए में मिल रहा हो, तो रुपए अंडरवैल्यूड मानी जाएगी।

आरबीआई सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपए का क्या भाव है सिर्फ इस आधार पर रुपए की वैल्यू नहीं आँकता, बल्कि दुनिया के करीब 40 व्यापारिक देशों की करेंसी को सामने रख कर रुपए के वैल्यू को मापता है।

ओवरवैल्यूड होने से विदेशों में घूमना, पढ़ना-लिखना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है। विदेश से आने वाले सामान जैसे मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, तेल और गैस सस्ते हो जाते हैं, महँगाई को भी कुछ हद तक कंट्रोल करना आसान हो जाता है। लेकिन निर्यात पर असर पड़ता है क्योंकि विदेश में सामान महँगा हो जाता है। इससे व्यापार घाटा बढ़ जाता है।

वहीं दूसरी ओर रुपए के अंडरवैल्यूड होने पर कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रोनिक सामान जो विदेशों से आते हैं, वे महँगी हो जाती है। पेट्रोल- डीजल के दाम बढ़ जाते हैं और महँगाई बढ़ती है। लेकिन इसका फायदा यह है कि निर्यात में बढ़ोतरी होती है और व्यापार घाटा को पाटने में मदद मिलती है। भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। विदेशी निवेशकों के लिए भारत में संपत्ति या शेयर खरीदना सस्ता हो जाता है, जिससे निवेश बढ़ सकता है।

दोनों ही स्थितियों में ‘बहुत ज्यादा’ से बचने की कोशिश की जाती है। बहुत ज्यादा मजबूत रुपया भी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या बन सकता है, क्योंकि इससे निर्यात प्रभावित हो सकता है। वहीं रुपए में नियंत्रित सीमा तक कमजोर हो, तो इससे निर्यात और घरेलू उद्योगों को फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि गिरावट बहुत तेज हो जाए, तो आयात महँगा होने और महँगाई बढ़ने जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

चीन के युआन से भी भारत का रुपया हुआ सस्ता

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ‘RBEER’ इंडेक्स के मुताबिक, नवंबर 2024 में 1 डॉलर की कीमत 84.4 रुपए थी, तब NEER सूचकांक 91.68 पर था। इसका मतलब यह था कि 2015-16 से लेकर अब तक भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की करेंसी के मुकाबले रुपए में लगभग 8.3% की गिरावट आ चुकी थी। फिर भी चीनी युआन की वैल्यू भारतीय रुपए से अधिक थी।

लेकिन मई 2026 की बात करें, जब रुपये-डॉलर की विनिमय दर औसतन 95.5 थी। NEER न केवल रिकॉर्ड निचले स्तर 77.19 पर आ गया, बल्कि REER भी गिरकर 89.08 पर पहुँच गया। हालाँकि जून में दोनों में थोड़ी रिकवरी हुई है, फिर भी 91.26 का REER रुपये की विनिमय दर में 8.7% की महत्वपूर्ण कमजोरी को दर्शाता है।

जून 2026 आते आते रुपये का इंडेक्स गिरकर 90.15 पर आ गया है, जबकि युआन 92.24 पर है यानी पिछले 6 साल में पहली बार युआन की कीमत भारतीय रुपए से ज्यादा हो गई है।

इसका फायदा ये होगा कि चीनी वस्तुओं से भारतीय वस्तुएँ विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा की स्थिति में आ गई हैं। उनकी कीमत कम होने पर विदेशी बाजार में भारतीय पैठ बढ़ेगी।

इतना ही नहीं भारतीय निर्यात को नई गति मिलेगी। भारत के टेक्सटाइल, जूते, दवाईयाँ, ऑटो पार्ट्स और दूसरे सामान चीन से सस्ते हो जाएँगे।

आयात महँगा होने की वजह से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और देश के अंदर सामान थोड़े सस्ते होंगे। कुल मिलाकर भारत के लिए फायदे की स्थिति बन रही है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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