दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूजलॉन्ड्री की पत्रकार मनीषा पांडे को उनके अपमानजनक शब्दों के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए उन्हें पद से हटाने तक की सलाह दे दी है। जस्टिस सी हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने टीवी टुडे नेटवर्क (आज तक) के खिलाफ मनीषा के वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा को ‘घटिया’ और ‘अशोभनीय’ बताया।
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि पत्रकारिता में शालीनता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया, तो वे मनीषा पांडे के करियर को खतरे में डालने वाला सख्त आदेश पारित करने से पीछे नहीं हटेंगे। कोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
‘घटिया और अपमानजनक’: कोर्ट ने भाषा पर जताया कड़ा ऐतराज
सुनवाई के दौरान अदालत का पारा तब चढ़ गया जब मनीषा पांडे द्वारा टीवी टुडे के चैनल ‘गुड न्यूज टुडे’ के एक वीडियो के संदर्भ में ‘shit’ शब्द का उपयोग करने का मामला सामने आया। जस्टिस सी हरि शंकर ने इस अभिव्यक्ति को ‘घटिया’ और स्पष्ट रूप से अपमानजनक करार दिया।
बेंच ने बहुत ही कड़े और असाधारण शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, “क्या आप अभी भी इस एंकर के साथ काम कर रहे हैं? उन्हें तुरंत बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। उन्हें रिपोर्टिंग का बुनियादी ज्ञान नहीं है और वह शालीनता के सिद्धांतों को नहीं जानतीं।” कोर्ट ने चेतावनी दी कि वे मनीषा पांडे के आचरण पर ऐसी टिप्पणी या आदेश पारित कर सकते हैं, जिससे उनके पूरे करियर पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
आलोचना और अपमान के बीच की ‘लक्ष्मण रेखा’
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किया- ‘आलोचना’ और ‘अपमान’ के बीच का अंतर। कोर्ट ने कहा कि टीवी टुडे हर उस वीडियो को अपमानजनक नहीं कह सकता जो उनके पक्ष में न हो।
बेंच ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई न्यूजलॉन्ड्री जैसा प्लेटफॉर्म ‘मेथड एंकरिंग’, ‘थोड़ा ड्रामा थोड़ा गिमिक’, ‘सोप ओपेरा’ या ‘किलिंग स्पोर्ट्स जर्नलिज्म’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल करता है, तो यह ‘आलोचना’ के दायरे में आता है और यह पत्रकारिता में स्वीकार्य है। कोर्ट ने यहाँ तक कहा, “अगर कोई आपके प्रोग्राम को पूरी तरह बकवास कहता है, तो वह भी एक टिप्पणी है, अपमान नहीं।”
2021 से जारी है कानूनी विवाद
यह पूरा मामला अक्टूबर 2021 में शुरू हुआ था, जब टीवी टुडे नेटवर्क ने न्यूज़लॉन्ड्री पर कॉपीराइट उल्लंघन और छवि खराब करने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया था। टीवी टुडे का तर्क है कि न्यूजलॉन्ड्री उनके कंटेंट का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर पत्रकारों और संस्थान को बदनाम कर रहा है। वहीं, न्यूजलॉन्ड्री इसे ‘मीडिया क्रिटिक’ और व्यंग्य बताकर अपना बचाव कर रहा है।
बचाव पक्ष की दलीलें: ‘लोकतंत्र के प्रहरी’
न्यूजलॉन्ड्री की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजशेखर राव ने स्वीकार किया कि वीडियो में शब्दों का चुनाव बेहतर हो सकता था, लेकिन उन्होंने इसे मुख्यधारा के मीडिया की आलोचना को दबाने की कोशिश बताया। उन्होंने तर्क दिया, “मैं उनकी क्लिप लेता हूँ और उस पर कमेंट करता हूँ। कोई मेरी आवाज बंद करना चाहता है।”
वहीं, वकील बानी दीक्षित ने ‘नंगा नाच’ जैसे शब्दों के उपयोग का बचाव करते हुए कहा कि इन्हें पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए। न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि उनका काम ‘मीडिया क्रिटिक’ और व्यंग्य का है, जो स्वतंत्र भाषण के अधिकार के तहत सुरक्षित है। वकील राव ने भावुक अपील करते हुए कहा कि मीडिया हमेशा से लोकतंत्र का विवेक रक्षक रहा है।
अदालत का रुख और भविष्य का फैसला
भले ही कोर्ट ने मनीषा पांडे की व्यक्तिगत भाषा पर नाराजगी जताई, लेकिन बेंच ने व्यापक स्तर पर मीडिया की वर्तमान स्थिति पर कोई भी टिप्पणी करने से खुद को रोक लिया। जस्टिस हरि शंकर ने स्पष्ट किया, “हम मीडिया की कार्यप्रणाली पर अपनी राय नहीं देना चाहते, हम खुद को केवल कानूनी तथ्यों तक सीमित रख रहे हैं।”

