तानाशाह किम ने की जुर्म की इंतेहा, Squid Game और K-pop देखने पर छात्रों को दे रहा फाँसी: बच्चों को बचाने के लिए घर बेचकर रिश्वत दे रहे लोग


तानाशाह किम जोंग उन के उत्तर कोरिया में अब विदेशी फिल्में देखना, K-pop सुनना या दक्षिण कोरियाई वेब सीरीज का आनंद लेना वहाँ सिर्फ अपराध नहीं बल्कि जानलेवा जुर्म बन गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट में देश में ‘स्क्विड गेम’ और ‘क्रैश लैंडिंग ऑन यू’ जैसी लोकप्रिय दक्षिण कोरियाई वेब सीरीज देखने या BTS जैसे K-pop कलाकारों के गाने सुनने पर लोगों को सार्वजनिक रूप से फाँसी तक दी जा रही है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्रूरता का शिकार सिर्फ बड़े नहीं बल्कि स्कूली बच्चे भी हो रहे हैं। 25 उत्तर कोरियाई शरणार्थियों के इंटरव्यू पर आधारित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार विदेशी संस्कृति को ‘खतरनाक विचारधारा’ मानती है और समाज में डर का माहौल बनाए रखने के लिए सार्वजनिक फाँसी का इस्तेमाल करती है। इस तानाशाही व्यवस्था में न्याय भी वर्गों में बँटा हुआ है। अमीर और प्रभावशाली लोग रिश्वत देकर कानून से बच निकलते हैं जबकि गरीब और आम नागरिकों को श्रम शिविरों में भेज दिया जाता है या मौत के घाट उतार दिया जाता है।

Squid Game और K-pop देखने पर मौत की सजा

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर कोरिया के यांगगांग और नॉर्थ हामग्योंग जैसे प्रांतों में स्क्विड गेम देखने या फैलाने के आरोप में लोगों को मौत की सजा दी गई है। एक शरणार्थी ने बताया कि हाई स्कूल के छात्रों तक को इस अपराध के लिए फाँसी दी गई। इसके अलावा, BTS जैसे K-pop बैंड का गाने सुनना भी गंभीर अपराध माना जाता है।

उत्तर कोरिया के 2020 के एंटी रिएक्शन थॉट एंड कल्चर ऐक्ट के तहत दक्षिण कोरियाई कंटेंट को सड़ी हुई विचारधारा करार दिया गया है। इस कानून के अनुसार, विदेशी मीडिया देखने पर 5 से 15 साल की जबरन मजदूरी हो सकती है जबकि इसे फैलाने या सामूहिक रूप से देखने पर मौत की सजा भी दी जा सकती है।

डर का माहौल, भ्रष्टाचार और सार्वजनिक फाँसी

शरणार्थियों के अनुसार, उत्तर कोरिया में 109 ग्रुप नाम की एक विशेष पुलिस टीम घर-घर छापेमारी करती है और बिना वारंट मोबाइल फोन, बैग और टीवी की जाँच करती है। कई मामलों में अधिकारी खुद रिश्वत की माँग करते हैं ताकि वे वरिष्ठ अधिकारियों को पैसे दे सकें।

चोई सुविन नाम की एक महिला ने बताया कि लोग सजा से बचने के लिए अपने घर तक बेच देते हैं। उन्होंने कहा कि गरीब लोग 5000 से 10,000 डॉलर तक जुटाने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें पुनः शिक्षा शिविरों से बचाया जा सके।

एक अन्य शरणार्थी, किम जून्सिक ने बताया कि उनके परिवार के संबंध मजबूत थे, इसलिए उन्हें सजा नहीं मिली, जबकि उनकी बहन की तीन सहेलियों को श्रम शिविरों में सालों की सजा मिली क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बच्चों और किशोरों को वैचारिक शिक्षा के नाम पर सार्वजनिक फाँसी देखने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि उन्हें डराया जा सके।