उत्तराखंड HC ने रद्द की सिविल जज दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी, जाँच को बताया बनावटी और सबूतहीन: नाबालिग सहायिका से दुर्व्यवहार का था आरोप

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में हरिद्वार में तैनात रही सिविल जज दीपाली शर्मा को घरेलू नाबालिग सहायिका से कथित शारीरिक दुर्व्यवहार के मामले में सेवा से हटाने के आदेश को रद्द किया है। मुख्य जज जी नरेंद्र और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 6 जनवरी 2026 को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि यह मामला न सिर्फ सबूतों के अभाव का है, बल्कि ‘बिना नींव की एक बनावटी इमारत’ जैसा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह ‘राई का पहाड़ बनाने’ जैसा मामला है।

हाई कोर्ट ने दीपाली शर्मा की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ हुई विभागीय जाँच और पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोप एक गुमनाम ईमेल के आधार पर लगाए गए थे, जिन्हें किसी भी कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किया जा सका।

कोर्ट ने माना कि जाँच में गंभीर प्रक्रियात्मक चूक हुई और जज को एक ‘अस्तित्वहीन आरोप’ में दोषी ठहराया गया। फैसले के अनुसार, दीपाली शर्मा को बर्खास्तगी की तारीख से सेवा में बहाल माना जाएगा और उन्हें वरिष्ठता सहित सभी सेवा लाभ मिलेंगे। इसके अलावा  बर्खास्तगी की तारीख से 50 प्रतिशत वेतन और अन्य सेवा लाभ देने के भी निर्देश दिए गए हैं।

जाँच में खामियाँ और सबूतों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने कार्यवाही में पाई गई कई गंभीर विसंगतियों की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्य जज की स्वीकृति का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। इसके अलावा कथित नाबालिग लड़की और उसके पिता ने बाल श्रम और मारपीट के सभी आरोपों से इनकार किया था।

सबसे अहम बात यह रही कि उत्तराखंड सरकारी सेवक नियम, 2002 के तहत हुई जाँच में बाल श्रम से जुड़ा कोई औपचारिक आरोप तय ही नहीं किया गया। हाई कोर्ट ने जाँच अधिकारी द्वारा भरोसा किए गए मेडिकल साक्ष्यों पर भी सवाल उठाए।

कोर्ट ने कहा कि कथित चोट की रिपोर्ट किसी योग्य डॉक्टर द्वारा प्रमाणित नहीं थी और न ही उसे किसी अस्पताल में भर्ती होने के रिकॉर्ड का समर्थन प्राप्त था। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “घाव का प्रमाण पत्र ऐसे प्रारूप में था, जिसे इस कोर्ट ने पहले कभी नहीं देखा।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मामले के अहम गवाहों जैसे जज के आवास पर तैनात कोर्ट कर्मचारी और पड़ोसी न्यायिक अधिकारी की गवाही तक दर्ज नहीं की गई। जाँच अधिकारी ने केवल अनुमान और अटकलों के आधार पर निष्कर्ष निकाले।

कोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग लड़की को लंबे समय तक शेल्टर होम में रखा गया, जबकि उसके माता-पिता की पहचान हो चुकी थी और वे उसकी कस्टडी लेने को तैयार थे। साथ ही आरोपों के बाद जज के आवास पर की गई पुलिस कार्रवाई को कोर्ट ने अत्यधिक और अनुपयुक्त बताया।

क्या था मामला?

दीपाली शर्मा वर्ष 2018 में हरिद्वार में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात थीं, जब उनके खिलाफ एक गुमनाम ईमेल के जरिए नाबालिग घरेलू सहायिका के साथ शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया गया। इसके बाद तत्कालीन मुख्य जजा के निर्देश पर हरिद्वार के जिला जज ने मौके का निरीक्षण किया।

दीपाली शर्मा ने वर्ष 2008 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। आरोपों के बाद उन्हें पहले निलंबित किया गया और फिर 20 अक्टूबर 2020 को राज्य सरकार के आदेश से सेवा से हटा दिया गया। यह आदेश हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के प्रशासनिक पक्ष के प्रस्ताव के आधार पर पारित किया गया था।