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PDA को लेकर अखिलेश की सपा में घमासान, नेता बोल रहे- हर बार यादव ही क्यों दे कुर्बानी?: जानें- क्यों वायरल हो रहा अफजाल अंसारी का बयान

यादव समाज सपा का पारंपरिक वोट बैंक रहा है लेकिन अब मुस्लिमों को ज्यादा जगह दिए जाने से नाराजगी है। यह विवाद अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

कभी-कभी एक पुराना बयान भी आग की तरह फैल जाता है। ठीक यही उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों हो रहा है। दरअसल, गाजीपुर के सपा सांसद अफजाल अंसारी का करीब एक साल पुराना भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उसमें उन्होंने साफ कहा था कि “सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।” अब इस बयान पर पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने 9 फरवरी 2026 को जोरदार पलटवार किया है। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें?” और अफजाल अंसारी को चुनौती दी कि पहले वे अपनी सीट छोड़कर देखें।

यह विवाद सिर्फ दो नेताओं के बीच नहीं है। यह पूरे पीडीए फॉर्मूले की असली परीक्षा है। क्या यादव समाज, जो लंबे समय से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है, अब अपनी हिस्सेदारी कम करके अन्य वर्गों को आगे आने देगा? या फिर अंदरूनी खींचतान से पीडीए का सपना चूर-चूर हो जाएगा?

पीडीए फॉर्मूला है क्या और क्यों लाया गया?

समाजवादी पार्टी की जड़ें कथित तौर पर यादव-मुस्लिम वोटबैंट के समीकरण में हैं। मुलायम सिंह यादव ने 1992 में सपा बनाई तो मुख्य आधार यादव और मुस्लिम थे। इसे एमवाई कहा जाता था। यह फॉर्मूला कई बार सरकार भी बना चुका है। लेकिन 2014 से 2022 तक सपा को लगातार झटके लगे। भाजपा ने अपना हिंदुत्व और विकास का नारा देकर यादव-मुस्लिम के अलावा अन्य पिछड़ों और दलितों को अपनी तरफ खींच लिया।

अखिलेश यादव ने 2023 में नया प्लान बनाया- पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। इसमें यादव के अलावा लोध, गुर्जर, राजभर, कुर्मी जैसी पिछड़ी जातियाँ, जाटव-पासी जैसे दलित और मुस्लिम-अल्पसंख्यक सब शामिल हैं। अखिलेश का कहना था कि यह 90 प्रतिशत लोगों का गठजोड़ है जो भाजपा के खिलाफ है।

साल 2024 लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले ने कमाल दिखाया। सपा ने 33 सीटें जीतीं। उनमें से 86 प्रतिशत सांसद पिछड़े, दलित या मुस्लिम वर्ग से थे। टिकट बंटवारे में गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को ज्यादा मौका मिला। कई यादव नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया क्योंकि पार्टी की सीटें बढ़ीं। लेकिन कुछ यादव कार्यकर्ता और नेता महसूस करने लगे कि उनकी पुरानी ताकत अब बंट रही है। यहीं से असंतोष की शुरुआत हुई।

अफजाल अंसारी के बयान से खींचतान आई सामने

अफजाल अंसारी गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। वे मुस्लिम समुदाय से हैं और सपा में अल्पसंख्यक चेहरा माने जाते हैं। करीब एक साल पहले (2025 में) उन्होंने गाजीपुर में एक बैठक में पीडीए को मजबूत करने की बात करते हुए कहा, “अगर पीडीए को सशक्त बनाना है तो सबसे बड़ी कुर्बानी यादव भाइयों को देनी होगी।”

उनका मतलब साफ था- यादव समाज को पद, टिकट और सत्ता की हिस्सेदारी में पीछे हटना होगा। ताकि अन्य पिछड़े, दलित और मुस्लिम नेताओं को बराबर मौका मिले। उन्होंने कहा कि सिर्फ बैठकें करने से काम नहीं चलेगा, त्याग करना पड़ेगा। यह बयान उस समय भी चर्चा में रहा लेकिन सोशल मीडिया पर अब इतना फैला कि हर कोई इसे देख रहा है।

कई लोग इसे सकारात्मक मानते हैं। वे कहते हैं कि अफजाल अंसारी सही कह रहे हैं। अगर पीडीए को असली मायने में समावेशी बनाना है तो पुराने वर्चस्व वाले वर्ग को त्याग दिखाना होगा। लेकिन यादव समाज के बड़े हिस्से को यह बात नागवार गुजरी। वे पूछते हैं- हमने पार्टी बनाई, संघर्ष किया, जेल गए, तो अब हम ही क्यों पीछे हटें?

काशीनाथ यादव का पलटवार बनी असंतोष की असली आवाज

9 फरवरी 2026 को स्वर्गीय कैलाश यादव की पुण्यतिथि पर गाजीपुर-मऊ क्षेत्र में एक कार्यक्रम था। वहाँ पूर्व एमएलसी काशीनाथ यादव ने मंच से सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “हर बार यादव ही क्यों कुर्बानी दें? अफजाल अंसारी पहले अपनी गाजीपुर सीट छोड़कर देखें कि कोई अन्य जाति का व्यक्ति वहाँ जीत पाता है या नहीं।”

काशीनाथ यादव खुद यादव समाज के बड़े नेता हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ नेता समय-समय पर दल बदलते रहते हैं। ऐसे में यादव समाज बार-बार अपना हक क्यों छोड़े? उनका बयान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं था। कई यादव कार्यकर्ता उनके साथ खड़े दिखे। यह बयान बताता है कि सपा के अंदर यादव वर्ग में गुस्सा पनप रहा है। वे महसूस कर रहे हैं कि उनकी मेहनत का फल दूसरे ले जा रहे हैं।

यादव समाज की भूमिका और कुर्बानी की असली माँग

यादव समाज उत्तर प्रदेश में करीब 9 प्रतिशत आबादी का है। वे ओबीसी में सबसे संगठित और प्रभावशाली हैं। सपा के जन्म से लेकर आज तक हर स्तर पर यादव नेता रहे हैं- जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, मंत्री, सांसद। मुलायम सिंह यादव यादव थे, अखिलेश यादव यादव हैं। इसलिए यादवों का भावनात्मक लगाव पार्टी से बहुत गहरा है।

अब पीडीए में जब अन्य पिछड़ों को टिकट दिए जा रहे हैं तो यादवों की संख्या कम हो रही है। साल 2024 में कई यादव उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला। यही ‘कुर्बानी’ की बात है जिसका जिक्र अफजाल अंसारी ने किया। लेकिन यादव नेता पूछ रहे हैं- हम त्याग करें तो क्या बदले में हमें सम्मान और सुरक्षा मिलेगी? या फिर हमारी उपेक्षा होगी?

पीडीए के अंदर तीन बड़े टकराव

यादव बनाम अन्य पिछड़े: यादवों को लगता है कि वे सबसे ज्यादा संगठित हैं इसलिए उनकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन अन्य पिछड़े जैसे राजभर, निषाद कहते हैं कि हम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यादव-मुस्लिम रिश्ता: मुस्लिम 19 प्रतिशत आबादी के हैं। वे 90 प्रतिशत वोट सपा को देते हैं। अफजाल अंसारी मुस्लिम प्रतिनिधि हैं। यादव कहते हैं कि मुस्लिम तो वोट देते हैं लेकिन पद कम लेते हैं। अब जब मुस्लिम नेताओं को ज्यादा जगह दी जा रही है तो टकराव बढ़ रहा है।

दलितों का शामिल होना: दलित 21 प्रतिशत हैं। सपा ने कई दलित नेताओं को जोड़ा है। लेकिन दलितों में अभी भी असंतोष है। वे पूछते हैं कि सपा के शासन में उनके साथ क्या हुआ था? क्या अब वाकई बराबरी मिलेगी?

ये तीनों टकराव पीडीए को कमजोर कर सकते हैं अगर सपा ने इन्हें नहीं संभाला तो। हालाँकि दलितों का बड़ा वोटबैंक अब भी सपा से दूर है। वो परंपरागत तौर पर बीएसपी के लिए वोट करता रहा है और अब गैर-जाटव दलितों का बड़ा वोट बीजेपी को मिलने लगा है।

साल 2027 के चुनावों में क्या असर पड़ेगा?

साल 2027 का विधानसभा चुनाव करीब हैं। सपा पीडीए को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है। लेकिन अगर यादव कार्यकर्ता नाराज रहे तो वोट ट्रांसफर नहीं होगा। यादव बूथ स्तर पर सबसे ज्यादा काम करते हैं। अगर वे उत्साह नहीं दिखाएँगे तो पूरा समीकरण बिगड़ सकता है।

दूसरी तरफ अगर यादव समाज कुर्बानी दे देता है तो पीडीए और मजबूत हो सकता है। भाजपा इस विवाद को अपना फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेता कह रहे हैं कि सपा में यादव-मुस्लिम की लड़ाई शुरू हो गई है।

अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती

अखिलेश यादव को तीन काम करने होंगे:

  1. यादव समाज को समझाना कि त्याग से पार्टी मजबूत होगी और सबका भला होगा।
  2. अन्य वर्गों को विश्वास दिलाना कि उनकी भागीदारी सिर्फ कागज पर नहीं, हकीकत में है।
  3. पार्टी के अंदर अनुशासन बनाए रखना ताकि बयानबाजी न बढ़े।

अगर वे यह संतुलन साध लेते हैं तो पीडीए 2027 में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है। वरना यह नारा सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

फिरलहाल तो लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या यादव समाज वाकई कुर्बानी देने को तैयार है? क्या अफजाल अंसारी जैसे नेता खुद अपनी सीटों पर त्याग दिखाएँगे? क्या अखिलेश यादव इस असंतोष को संभाल पाएंगे?

यह विवाद सिर्फ सपा की अंदरूनी बात नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति की असली तस्वीर है। जहाँ एक तरफ सामाजिक न्याय का सपना है, दूसरी तरफ वास्तविकता में हिस्सेदारी की लड़ाई है। अभी तो समय बताएगा कि पीडीए एकजुट रहता है या आंतरिक खींचतान में बिखर जाता है। लेकिन एक बात तय है कि अखिलेश यादव का चुनावी पीडीए अब बिखरता दिख रहा है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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