
इसकीौ जानकारी मिलते ही जाट राजकुमार जवाहर सिंह करीब 5000 योद्धाओं के साथ मथुरा की सीमा पर खड़े थे। मथुरा में आक्रांताओं को घुसने नहीं देने के लिए उन्होंने अहमद शाह अब्दाली की सेना के साथ 9 घंटे तक संघर्ष किया। इस दौरान उनके ज्यादातर सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद मथुरा-वृंदावन में जमकर मारकाट मची। होली मनाने आए हजारों भक्तों को काट डाला गया। सड़कें खून से लाल हो गई।
Hindu Genocide of 1757 during Holi
— Manoshi Sinha (@authormanoshi) March 10, 2020
28 Feb 1757. Jat prince Jawahar Singh with 5000 men offered resistance against Ahmad Shah Abdali's forces near Mathura fr 9 hrs, but in vain. What followed was genocide of 1000s of devotees who assembled in Mathura/Vrindavan 2 celebrate Holi 👇 pic.twitter.com/1i9pGZgV8o
सरदार खान ने आम लोगों और तीर्थयात्रियों की हत्या कर उसकी खोपड़ी इकट्ठा करने का आदेश अपने आदमियों को दिया था, क्योंकि अहमदशाह अब्दाली ने उसे हर सिर पर 5 रुपए ईनाम देने की बात कही थी। जाहिर है बड़े पैमाने पर लोगों का कत्लेआम कर खोपड़ी जमा किए जा रहे थे।
अब्दाली ने आदेश दिया था, “जाट की सीमाओं में जाओ और उसके कब्जे वाले हर शहर और जिले को लूटो और तबाह मचा दो। मथुरा-वृंदावन हिंदुओं की पवित्र जगह है। वहाँ इतना कत्लेआम मचाओ कि लोग हजारों सालों तक याद रखें। उस राज्य में कुछ भी मत छोड़ना। यहाँ से लेकर अकबराबाद (आगरा) तक कुछ भी बचना नहीं चाहिए।”
अहमदशाह अब्दाली ने ये भी कहा था कि वे जहाँ भी जाएँ, बारूद और तलवार साथ रखें। जो भी लूट का माल उन्हें मिले, वह ले लें। हर कोई जो काफिरों के सिर काटकर लाए, उसे सेनापति के तंबू के सामने फेंक दे। सबका हिसाब-किताब लगा कर सरकारी फंड से हर सिर के लिए पाँच रुपये दिए जाएँगे।
1 मार्च की सुबह-सुबह अफगान सेनापति सरदार जहान खान शहर में आया। उसने देखा कि शहर को बचाने के लिए न तो कहीं खाई खोदी गई थी और न ही मजबूत दीवार बनाई गई थी। मथुरा में बस भगवान कृष्ण के भक्त, उनकी पूजा में लीन पुजारी और तीर्थयात्री थे। होली के रंग में खून का रंग भी शामिल हो चुका था। सरदार जहान खान को अपने बादशाह अब्दाली को खुश करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था। उसने शहर में जो दिख रहा था, उसे मारना शुरू किया और लूटपाट करने लगा।
28 फरवरी को उसका जिस तरह बहादुरी से जाटों ने मुकाबला किया था, उसका गुस्सा भी था। इसलिए किसी पर भी रहम न करने का आदेश उसने अपनी सेना को दिया। हिंदुओं के खून से पूरा इलाका लहुलुहान हो गया। खून की नदियाँ सड़कों पर बह गई। शहर को लूटने और कत्लेआम से भी जब उसका मन नहीं भरा, तो उसने शहर में आग लगा दी। शहर में जहाँ भी भगवान की मूर्तियाँ दिखीं, उन्हें भारी हथियार जैसे- कुल्हाड़ी से मार-मार कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।
बच्चों को मार कर उन्हें पोलो बॉल की तरह एक तरफ से दूसरी तरफ फेंका जा रहा था। महिलाओं को अपनी इज्जत बचाने के लिए जल समाधि लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। जो दिखी उनकी आबरू लूट ली गई और मार डाला। अमीर लोगों की संपत्ति लूटने के बाद खूबसूरत हिन्दू महिलाओं को बंधक बना कर अब्दाली का सेनापति साथ ले गया।
यमुना किनारे झोपड़ी में रहने वाले कृष्ण भक्तों को भी नहीं छोड़ा। बैरागी और संन्यासी साधुओं को उनकी झोपड़ियों में काट दिया गया। इस दौरान हर झोपड़ी में ‘एक कटा हुआ सिर रखा था जिसके मुँह पर मरी हुई गाय का सिर लगा था और उसके गले में रस्सी बंधी थी। मुस्लिम जौहरी के बयान के मुताबिक, मथुरा में इतनी तबाही हुई थी कि सात दिनों तक यमुना का पानी खून जैसा लाल बहता रहा और फिर पीला हो गया।
एक दिन तक जमकर उत्पात मचा कर सरदार जहान खान उसी रात मथुरा से चला गया। उसके कुछ सैनिक नजीब उद दौला के नेतृत्व में वहाँ तीन दिन तक रुका रहा। इस दौरान जो कुछ लोग बच गए थे, उन्हें मार डाला और घर से मंदिर तक हर जगह घुस कर हर कोने में बचे दौलत को लूट कर ले गया।
वृंदावन में नरसंहार
सरदार जहान खान मथुरा के बाद वृंदावन पहुँचा। मथुरा से सात मील उत्तर में वृंदावन को भी जमकर लूटा। लोगों का कत्लेआम किया और लोगों को लूटा। समीन के संस्मरणों के अनुसार, ‘जहाँ भी देखो, मारे गए लोगों के ढेर लगे हुए थे, बहुत सारी लाशें पड़ी थी। हर तरफ खून ही खून था।
रास्ते पर इतना खून था कि रास्ता पहचानना मुश्किल हो रहा था। एक जगह पर करीब 2 सौ मरे हुए बच्चों को ढेर कर दिया गया था। किसी भी लाश का सिर नहीं था, क्योंकि सिर तो अब्दाली की सेना अपने साथ ले गई थी। हर तरफ सिर्फ बदबू फैली हुई थी।
नागा साधुओं ने गोकुल में नहीं घुसने दिया
अब्दाली की सेना फिर गोकुल की ओर कूच की। अब्दाली ने शहर से छह मील दक्षिण-पूर्व में महाबन में डेरा डाला। यहाँ से उसने गोकुल को लूटने के लिए एक सेना भेजी, जो उनके कैंप से करीब दो मील दूर था। वहाँ नागा साधुओं ने मंदिर और आम लोगों की रक्षा की।

अब्दाली की सेना के खिलाफ भीषण युद्ध हुआ और नागा साधुओं ने वीरता से लड़ते हुए अब्दाली की फौज को परास्त किया। इस दौरान 2000 से ज्यादा नागा साधु वीरगति को प्राप्त हुए। बंगाल के वकील जुगल किशोर, जो उस समय शाह के कैंप में थे, ने उन्हें बताया कि गोकुल सिर्फ नंगे वैरागियों का आश्रम है और वहाँ ज्यादा पैसा नहीं है। इसलिए शाह ने अपनी टुकड़ी वापस बुला ली और गोकुल बच गया।
साधुओं और जाटों की वीरता इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। धर्म और मातृभूमि की रक्षा करते हुए हजारों वीरों ने होली के दिन अपनी जान देश को समर्पित किया।


