Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीयदक्षिण एशिया में 'ईसाई राष्ट्र' बनाने की कोशिश? यूक्रेनी-अमेरिकी 'एजेंट्स' की गिरफ्तारी से तेज...

दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ बनाने की कोशिश? यूक्रेनी-अमेरिकी ‘एजेंट्स’ की गिरफ्तारी से तेज हुई चर्चा: जानें- कैसे भारत-बांग्लादेश-म्यांमार में विदेशी मिशनरियाँ कर रही साजिश

म्यांमार में अमेरिका-समर्थक सरकार बनने से हिंद महासागर में अमेरिका की मौजूदगी बढ़ेगी। इससे उसे इस क्षेत्र में रूस, चीन और यहाँ तक कि भारत के मुकाबले बढ़त हासिल करने का मौका मिलेगा। इससे रूस और चीन के आर्थिक और रणनीतिक हितों को भी नुकसान पहुँचेगा। भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर हमेशा खतरा बना रहेगा।

अगस्त 2024 में तत्कालीन बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अमेरिका की एक कथित साजिश को लेकर चेतावनी दी थी। उसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। शेख हसीना ने कहा था कि भारत के पूर्वोत्तर, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साजिश रची जा रही है। तब से अब तक बहुत कुछ हुआ है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी बातों में दम था।

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए ने 6 यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। इनकी कड़ियों को अगर जोड़ा जाए, तो ये पता चलता है कि भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में अमेरिका की साजिश चल रही है।

सभी यूक्रेनी मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर ‘चिन नेशनल आर्मी’ से जुड़े उग्रवादियों को हथियार और ट्रेनिंग दे रहे थे। एक अमेरिकी नागरिक कोलकाता एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया।

इन विदेशी नागरिकों पर अवैध या आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आपराधिक साजिश रचने के आरोप में ‘गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA) की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया गया।

NIA द्वारा गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक की पहचान मैथ्यू एरॉन वैन डाइक के रूप में हुई। वह ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ (SOLI) के संस्थापक हैं, जो एक गैर-लाभकारी सुरक्षा अनुबंध फर्म है।

गिरफ्तार किए गए छह यूक्रेनियों की पहचान हुरबा पेट्रो, स्लीवियाक तारास, इवान सुकमानोव्स्की, स्टेफानकिव मारियन, होनचारुक मैक्सिम और कामिंस्की विक्टर के रूप में हुई है।

NIA ने गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिकों की कस्टडी माँगते हुए कोर्ट को बताया कि आरोपी वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन फिर उन्होंने मिजोरम के प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध तरीके से एंट्री की। वहाँ से सीमा पार कर म्यांमार में घुस गए और भारत विरोधी जातीय संघर्ष में शामिल ग्रुपों से संपर्क साधा। उन्हें कथित तौर पर प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराए।

पकड़े गए सभी 6 यूक्रेनी नागरिक ड्रोन तकनीक में माहिर बताए जा रहे हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि ये लोग म्यांमार के आतंकी ग्रुप को ड्रोन वॉरफेयर सिखाने आए थे। अगर म्यांमार के आतंकी समूह आधुनिक ड्रोन से लैस हो गए, तो इसका सीधा असर भारत के मिजोरम, मणिपुर और नगालैंड की सुरक्षा पर पड़ेगा।

NIA के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक यूरोप से भारत के रास्ते ड्रोन की एक बड़ी खेप लाए थे। जाँच में पता चला कि सभी आरोपी वैध वीज़ा पर भारत में दाखिल हुए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ के बिना मिजोरम पहुँच गए।

NIA द्वारा विदेशी नागरिकों की गिरफ़्तारी ने उन दबी हुई अटकलों को फिर से हवा दे दी है कि अमेरिका और कई अन्य विदेशी ताकतें म्यांमार में सत्ता-विरोधी ताकतों को ‘सॉफ्ट’ और ‘हार्ड’ दोनों तरह का समर्थन दे रही हैं।

तब डैनियल कोर्टनी, अब मैथ्यू वैनडाइक: क्या अमेरिकी मिशनरी और पूर्व सैनिक दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ के एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं?

पूर्वोत्तर भारत के रास्ते म्यांमार में एंट्री करने के ईसाई मिशनरियों से जुड़े विदेशी नागरिकों के पहले भी कई मामले सामने आए हैं।

डैनियल स्टीफन कोर्टनी का मामला काफी सुर्खियों में रहा। वह साल 2009 में टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था, यहाँ एक दशक से भी ज्यादा समय तक रुका और लोगों का धर्मांतरण कराया। तत्कालीन आंध्र प्रदेश में इस दौरान ईसाइयत काफी फैला।

कोर्टनी को भारत से 2017 में भेजा गया था और उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। साल 2023 में हालाँकि उसने टूरिस्ट वीजा पर भारत में दोबारा एंट्री की। वह मणिपुर में समाज सेवा करने और ईसाइयत का प्रचार करने के बहाने धर्मांतरण में शामिल था। उसने इलाके में बाइबिल बांटी थी और हिंदुओं के साथ- साथ मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में नफरत फैलाने की कोशिश की। भारत में टूरिस्ट वीजा पर रहते हुए किसी भी धर्म का प्रचार करना या धर्मांतरण में शामिल होना गैर-कानूनी है।

5 अगस्त 2023 को, डैनियल स्टीफन कोर्टनी ने मणिपुर से एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उन्होंने दावा किया कि ईसाइयों पर ज़ुल्म हो रहे हैं और इस समुदाय को जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है। OpIndia ने पहले बताया था कि कैसे अमेरिका का यह ईसाई मिशनरी, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के खिलाफ नफ़रत और गलत जानकारी फैला रहा था। केन्द्र सरकार को वह ‘कट्टर हिंदू सरकार’ कह रहा था। उसने मणिपुर में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप सरकार पर लगाया और कहा कि पूर्वोत्तर ईसाइयों के लिए एक पवित्र भूमि है।

खास बात यह है कि कोर्टनी अमेरिकी सेना का एक रिटायर्ड सैनिक है, जिस पर मणिपुर और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में जातिवादी हिंसक गुटों को हथियार, विस्फोटक, आधुनिक संचार उपकरण, ड्रोन और ‘लॉजिस्टिक्स’ पहुँचाने में मदर करने के आरोप लगे। दिसंबर 2024 में उसका एक पुराना वीडियो (संभवतः अगस्त 2023 का) सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कोर्टनी को एक हिंसा-ग्रस्त इलाके में कुकी उग्रवादियों को बुलेटप्रूफ जैकेट और ड्रोन बाँटते हुए देखा गया। ये मैतेई हिन्दुओं से मुकाबला करने के लिए दिए गये थे।

ब्रिटेन के एक नागरिक डैनियल न्यूई को एक ज़िंदा कारतूस के साथ जून 2024 में गिरफ्तार किया गया था। न्यूई को लेंगपुई हवाई अड्डे पर पकड़ा गया और उस पर हथियार अधिनियम, 1959 के तहत मामला दर्ज किया गया। हालाँकि बाद में उसे बरी कर दिया गया, लेकिन ऐसे मामलों में बरी होना कोई हैरानी की बात नहीं है।

अमेरिका के एक प्रचारक फ्रैंकलिन ग्राहम को नवंबर 2025 में वीजा देने से मना कर दिया गया। वह 30 नवंबर को नागालैंड के कोहिमा में एक ईसाई कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जाना चाहता था। दरअसल ग्राहम का संगठन ‘समैरिटन्स पर्स’ देश में धर्म-परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रहा है। यह संगठन धर्म-प्रचार के साथ-साथ लोगों के बीच भोजन वितरण और दूसरी मदद करता है।

अब आइए हाल ही में गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक की बात करते हैं। 1981 में बाल्टीमोर मैरीलैंड में पैदा हुए वैनडाइक लीबिया में युद्धबंदी रह चुका है। उसने कर्नल मोहम्मद गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया था।

मैथ्यू वैनडाइक ने 2014 में, ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ की स्थापना की थी। ISIS ने उनके दोस्त अमेरिकी पत्रकार जेम्स फोली और स्टीवन सॉटलॉफ की हत्या कर दी थी, उसके बाद उन्होंने संगठन बनाया था। एक लाइसेंस्ड 501(c)(3) गैर-लाभकारी संस्था के तौर पर काम करने वाली एक निजी सुरक्षा ठेका कंपनी है।

यह संगठन दावा करता है कि वह आतंकवादी समूहों और तानाशाही शासनों का सामना कर रही ‘कमजोर’ लोगों को निशुल्क जरूरी सामान, सैन्य प्रशिक्षण और परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराता है। इराक में अपनी पहली तैनाती के दौरान SOLI ने ‘निनवेह प्लेन प्रोटेक्शन यूनिट्स’ (NPU) को प्रशिक्षित किया था। यह एक सीरियन ईसाई समूह है, जो ISIS के खिलाफ लड़ रहा है।

वैनडाइक और SOLI ने रूस-यूक्रेन युद्द के दौरान लगातार यूक्रेन का समर्थन किया है। जब से युद्ध शुरू हुआ है, SOLI यूक्रेन के सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण, परामर्श और जरूरी सामान मुहैया करा रहा है। वैनडाइक का यूक्रेन के साथ गहरा सैन्य और वैचारिक जुड़ाव रहा है। वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन में अमेरिका के अभियान में वह खुले तौर पर शामिल रहा है। ऐसे में उसका 6 यूक्रेनी नागरिकों के साथ पूर्वोत्तर में गिरफ्तारी काफी मायने रखता है।

वैनडाइक की सोशल मीडिया प्रोफाइल से भी काफी कुछ पता चलता है। यह अलग-अलग देशों में उसकी गतिविधियों की एक डिजिटल डायरी जैसी है। म्यांमार में सक्रिय ‘जातीय सशस्त्र संगठनों’ (EAOs) के प्रति उसका समर्थन इससे साफ दिखता है।

मैथ्यू वैनडाइक के सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि उनका ईसाई धर्म में गहरा विश्वास है। वह दुनिया में किसी को भी, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, बेझिझक ‘बुरा ईसाई’ होने का सर्टिफिकेट दे देता है।

हालाँकि, म्यांमार में वैनडाइक जैसे और भी कई लोग सक्रिय हैं। इनमें से एक हैं- अमेरिका के पूर्व स्पेशल फोर्सेज अधिकारी और ईसाई पादरी डेव यूबैंक। इनकी संस्था ‘फ्री बर्मा रेंजर्स’ (FBR) म्यांमार में जातीय संघर्ष में शामिल संगठनों को ‘मानवीय सहायता’ उपलब्ध करना का दावा करते हैं, असल में ये सालों से धर्मांतरण में जुटे हुए हैं।

अब भारत के रास्ते म्यांमार के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के दखल की बात करें, तो मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने मार्च 2025 में ही भारत और म्यांमार की खुली सीमाओं पर विदेशियों की मौजूदगी पर चिंता जताई थी। इनमें से ज्यादातर ऐसे यूक्रेनी हैं, जिन्हें युद्ध का अनुभव है और सेना में रह चुके हैं। मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विदेशी नागरिक, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के लोग, खुली सीमाओं के रास्ते मिजोरम होते हुए म्यांमार में प्रवेश कर रहे हैं। ये विदेशी नागरिक म्यांमार में विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने के मकसद से घुस रहे हैं।

मिजोरम विधानसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने खुलासा किया कि जून से दिसंबर 2024 के बीच 2000 से भी ज्यादा विदेशी नागरिक आइजोल आए थे। हालाँकि उन्हें कभी भी सड़कों पर घूमते हुए नहीं देखा गया। इससे संदेह और भी गहरा हो गया कि वे मिजोरम में केवल इसलिए आए थे ताकि यहाँ से म्यांमार में प्रवेश कर सकें और पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में दखल दे सकें।

CM लालदुहोमा ने यह भी कहा था कि जो लोग मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसे थे, उनमें से कुछ पहले रूस-यूक्रेन युद्ध में भी हिस्सा ले चुके थे। लालदुहोमा के इस खुलासे से अब तक लगाए जा रहे उन कयासों को और बल मिला कि म्यांमार-मिजोरम सीमा पश्चिमी भाड़े के सैनिकों के लिए एक प्रवेश द्वार बन गई है।

CM लालदुहोमा ने कहा, “हमारे पास पक्की जानकारी है कि यूक्रेन युद्ध के अनुभवी सैनिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार के चिन प्रांत में गए, ताकि वे सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) से लड़ रहे विद्रोही गुटों को ट्रेनिंग दे सकें।”

उस समय, CM लालदुहोमा ने तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी के मिजोरम दौरे पर हैरानी भी जताई थी। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि भारत के पूर्वोत्तर और म्यांमार में हो रहे घटनाक्रमों में अमेरिकी सरकार की काफी दिलचस्पी है।

कॉन्ग्रेस सरकार की ‘पर्यटन को बढ़ावा देने’ की नीति का फायदा उठाकर मिजोरम-म्यांमार सीमा को पश्चिमी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियाँ एक्टिव हुईँ

यह ध्यान रखना जरूरी है कि मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसने वाले विदेशी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियों का जो खतरा आज बना हुआ है, उसकी जड़ें कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के वक्त फैली। 2011 में यूपीए सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मणिपुर, नागालैंड और मिज़ोरम में ‘संरक्षित क्षेत्र परमिट’ (PAP) की शर्तों में ढील दी थी। इसका फायदा उठाकर ये लोग ‘पर्यटक’ वीज़ा पर भारत आए और खुली सीमाओं के रास्ते म्यांमार में घुस गए।

म्यांमार में अमेरिका-यूक्रेन बनाम रूस-चीन की सत्ता की खींचतान: कौन किसका साथ दे रहा है और क्यों?

चूंकि म्यांमार को हमेशा से ही सत्ता पर कब्जे के लिए एक रणभूमि माना जाता रहा है, खासकर हिंद महासागर में चीन और अमेरिका के बीच उसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, तो ऐसे में रूस-यूक्रेन का कनेक्शन आखिर कहाँ से सामने आया?

इस सवाल का जवाब उन पक्षों में छिपा है, जिनका इन देशों ने ऐतिहासिक रूप से साथ दिया है। रूस और चीन हमेशा से ही मिन आंग ह्लाइंग के नेतृत्व वाले म्यांमार के सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) के समर्थक रहे हैं। इस सैन्य ‘तात्माडॉ’ शासन भी ने भी रूस और चीन के समर्थन का पूरा मान रखा। तात्माडॉ ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन किया, जबकि मॉस्को ने नेपीताव को लड़ाकू विमान, ड्रोन और निगरानी उपकरण मुहैया कराए, जिनका इस्तेमाल तात्माडॉ विद्रोही गुटों के खिलाफ करता है।

रूस म्यांमार को तेल की आपूर्ति करने वाला एक भरोसेमंद देश भी रहा है। मार्च 2025 में, म्यांमार के सैन्य शासन ने रूस को संघर्ष वाले इलाकों से रत्न और खनिज निकालने, और तटीय शहर दावी में एक तेल रिफाइनरी और एक बंदरगाह बनाने के लिए आमंत्रित किया।

और यहीं पर अमेरिका और अमेरिकी भाड़े के सैनिक तस्वीर में आते हैं। अमेरिका, रूस के खिलाफ यूक्रेन को सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से समर्थन देता है। अमेरिका, रूस और चीन समर्थित म्यांमार के सैन्य शासन के खिलाफ म्यांमार के जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) का भी समर्थन करता है।

दरअसल चीन और अमेरिका दोनों ही दशकों से म्यांमार के राजनीतिक मामलों में दखल देते रहे हैं। 1950, 1970 और 1980 के दशकों में CIA ने उत्तरी म्यांमार में राष्ट्रवादी चीनी (KMT) के बचे हुए गुटों का समर्थन किया था, जबकि चीन ने बर्मी कम्युनिस्ट पार्टी के छापामारों को गुप्त समर्थन दिया था।

हाल में, अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने ‘बर्मा यूनिफाइड थ्रू रिगरस मिलिट्री अकाउंटेबिलिटी एक्ट’ यानी ‘बर्मा एक्ट’ (BURMA Act) पारित किया। इस एक्ट का उद्देश्य ‘लोकतंत्र समर्थक संगठनों’ को तकनीकी और मानवीय सहायता पहुँचाना है।

इनमें ‘पीपल्स डिफेंस फोर्स’ (PDF) और EAOs जैसे संगठन शामिल हैं। सिर्फ ‘तकनीकी और गैर-घातक’ शब्द का यह अर्थ नहीं है कि अमेरिका ने म्यांमार में सैन्य शासन विरोधी ताकतों को सैन्य सहायता न देने का वादा किया था। इस एक्ट में हथियारों और गोला-बारूद को छोड़कर, सैन्य सहायता की दूसरी चीजें शामिल की गई थी। इनमें बॉडी आर्मर, वर्दी, रडार, और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं।

हालाँकि इस एक्ट को अभी अमेरिकी सीनेट द्वारा अनुमोदित किया जाना बाकी है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका में शक्तिशाली राजनीतिक ताकतें म्यांमार के मामलों में दखल देने के लिए सक्रिय हैं।

कई रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की योजना बांग्लादेश में एक ‘विशाल सप्लाई डंप’ स्थापित करने की है। इसका मकसद म्यांमार में जुंटा-विरोधी सैन्य अभियानों को समर्थन देना है। इसके तहत अराकान आर्मी और चिन नेशनल फ्रंट जैसे विद्रोही समूहों को हथियार और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान की जाएगी।

दरअसल म्यांमार में एक अमेरिका-समर्थक शासन स्थापित होने से हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका की उपस्थिति का विस्तार होगा। इससे अमेरिका को इस क्षेत्र में रूस, चीन और यहाँ तक कि भारत के मुकाबले बढ़त हासिल करने का अवसर मिलेगा। साथ ही, इससे इस क्षेत्र में रूस और चीन के आर्थिक और रणनीतिक हितों को भी नुकसान पहुँचेगा।

इससे भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर भी हमेशा खतरा बना रहेगा। म्यांमार के जुंटा सैन्य शासन का समर्थन चीन भी करता है, खासकर उन EAOs (जातीय सशस्त्र संगठनों) के खिलाफ जो मुख्य रूप से ईसाई हैं। ताकि उसे हथियारों की आपूर्ति और ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना तक पहुँच मिल सके। हालाँकि मैथ्यू वैनडाइक और 6 यूक्रेनी नागरिकों की गिरफ्तारी के साथ, भारत ने एक कड़ा संदेश दिया है कि नई दिल्ली की तटस्थता को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उसकी कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए।

चूँकि अब हम म्यांमार के संदर्भ में रूस, यूक्रेन, चीन और अमेरिका के ‘सॉफ्ट पावर’ से लेकर ‘हार्ड पावर’ तक के समीकरण को समझ चुके हैं, तो आइए अब शेख हसीना के उस आरोप पर फिर से विचार करें जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका दक्षिण एशिया में एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साज़श रच रहा है।

शेख हसीना की 2024 की ‘ईसाई राष्ट्र’ वाली चेतावनी, जो पहले केवल एक हताशापूर्ण राजनीतिक बयान लग रही थी, अब एक हकीकत नजर आ रही है

जून 2024 में, बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक सनसनीखेज दावा किया था। उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश पूर्वोत्तर और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर ‘पूर्वी तिमोर जैसा एक ईसाई राष्ट्र’ बनाने की साजिश रची जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और इस्लामी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को खुला समर्थन दिया था। इन दोनों ही संगठनों ने अंततः हसीना-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया और हसीना को प्रधानमंत्री पद से अवैध रूप से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब ये संगठन बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। अमेरिका पर बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की साजिश रचने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अवामी लीग के नेताओं ने इस बात की पुष्टि की थी कि शेख हसीना एक ऐसी साजिश के बारे में बात कर रही थीं, जिसका मकसद ‘जो’ लोगों के लिए एक ईसाई राष्ट्र ‘जोगम’ बनाना था। इन लोगों को ‘जोमी’, ‘चिन-कूकी-मिजो’ के नाम से भी जाना जाता है।

कहा जाता है कि यह प्रस्ताव ‘जालेंगम’ [आज़ादी की धरती] पर प्रस्तावित कूकी राज्य है। इस अलग राष्ट्र में म्यांमार के सागाइंग डिवीज़न और चिन राज्य के बड़े हिस्से, भारत के मिजोरम, मणिपुर के कूकी-बहुल इलाके और बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबान जिले और आस-पास के इलाके शामिल होंगे।

इन लोगों की ऐतिहासिक जड़ें म्यांमार की चिन पहाड़ियों और भारत के मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के आस-पास के इलाकों में मिलती हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, ‘ज़ो’ लोगों का ईसाई मिशनरियों से काफी मेल-जोल बढ़ा। 20वीं सदी की शुरुआत में बड़े पैमाने पर लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में गहरे बदलाव आए।

आजादी के बाद यह समुदाय राष्ट्रीय सीमाओं में बँट गया। भारत ने इन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में मान्यता दी, जिससे इन्हें कुछ संवैधानिक सुरक्षाएँ मिलीं। म्यांमार में ये कई उग्रवादी समूह के रूप में जाने जाते हैं। इनमें ‘चिन नेशनल फ्रंट’ की सशस्त्र शाखा ‘चिन नेशनल आर्मी’, ‘चिनलैंड डिफेंस फोर्स’ और ‘चिन नेशनल डिफेंस फोर्स’ शामिल हैं।

ये लोग म्यांमार की सैनिक सरकार (जंटा) के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए हैं। बांग्लादेश में, ‘कूकी-चिन नेशनल फ्रंट’ चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में हत्याएँ और लूटपाट की घटनाएँ अंजाम देते रहे हैं।

मिजोरम में सत्ताधारी ‘जोरम पीपुल्स मूवमेंट’, विपक्षी ‘मिज़ो नेशनल फ्रंट’ और कांग्रेस मिजोरम स्थित संगठन ‘ज़ो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइज़ेशन’ (ZRO) की एकीकरण की माँग के समर्थक बताए जाते हैं। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों में फैले सभी ‘ज़ो-बहुल’ इलाकों को एक साथ लाना है। ऐसी खबरें हैं कि चर्च से जुड़े संगठन, विशेष रूप से अमेरिका स्थित ‘बैपटिस्ट चर्च’, इस ‘जो-एकीकरण’ की माँग को हवा दे रहे हैं।

OpIndia ने पहले भी इस बात को उजागर किया है कि कैसे इन चर्च संगठनों के तार अमेरिका की खुफिया एजेंसी ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी’ (CIA) से जुड़े हुए बताए जाते हैं।

OpIndia लगातार अमेरिका स्थित संगठन ‘वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल’ की गतिविधियों को लेकर आगाह करता रहा है। इस ईसाई NGO को USAID (अब बंद हो चुकी) से फंडिंग मिली थी। इसका भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों और लोगों की फंडिंग का इतिहास रहा है। World Vision की गतिविधियाँ सिर्फ पूर्वोत्तर भारत तक ही सीमित नहीं हैं। यह एक मानवीय संगठन होने का दिखावा करता है, लेकिन असल में यह एक कट्टरपंथी ईसाई संगठन है। यह अन्य कट्टरपंथी ईसाई संगठनों के साथ मिलकर पिछले सात दशकों से भोले-भाले हिंदुओं, खासकर बच्चों और महिलाओं का धर्मांतरण करवा रहा है। नेहरू सरकार ने इस कट्टरपंथी ईसाई संगठन को पूरी छूट दे रखी थी।

1972 में, इंदिरा गाँधी सरकार ने World Vision के बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दे दी थी। ग्राहम खुद इस बात से हैरान थे, क्योंकि उस समय वहाँ की अस्थिर स्थिति के चलते विदेशियों को इस भारतीय राज्य में जाने की अनुमति नहीं मिलती थी। इंदिरा गाँधी के शासनकाल में World Vision ने खुलेआम धर्मांतरण की गतिविधियाँ चलाईं। इस दौरान हजारों हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया गया।

साल 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया। इससे भारत में इसकी धर्मांतरण की गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia ने पहले भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज (World Council of Churches), वर्ल्ड इवेंजेलिकल एलायंस ( World Evangelical Alliance) और वर्ल्ड विजन ( World Vision) जैसे अमेरिकी ईसाई संगठनों ने धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ किस तरह से विरोध जताया।

सितंबर 2024 में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमेरिका की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान ‘चिन समुदाय’ के सदस्यों से मुलाकात की। भारत के एक सीमावर्ती राज्य के मुख्यमंत्री होने के बावजूद, उन्होंने म्यांमार और बांग्लादेश में फैले ‘ज़ो समुदाय’ (जिसमें चिन, कूकी और मिज़ो लोग शामिल हैं) के बीच जातीय और धार्मिक आधार पर एकता बनाए रखने का आह्वान किया।

उनके भाषण के लिखित अंश में कहा गया था, “मैं इस अवसर का लाभ उठाते हुए एक बेहद गंभीर और ज्वलंत मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ। मुझे इस बात की आशंका है कि हमारा धर्म एकता और भाईचारे का स्रोत बनने के बजाय, कहीं आपसी फूट और विभाजन का कारण न बन जाए। ईसाइयत का काम तो अपने अनुयायियों का सही मार्गदर्शन करना और चर्च को एक मजबूत, एकजुट और अभेद्य किले में तब्दील करना होना चाहिए।”

लालदुहोमा ने आगे कहा, “मैं यहाँ मौजूद सभी लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका आने का निमंत्रण इसलिए स्वीकार किया है, ताकि हम सभी के लिए एकता का मार्ग खोज सकें। हम एक ही लोग हैं, भाई-बहन हैं और हम आपस में बँटकर या एक-दूसरे से अलग होकर नहीं रह सकते… भले ही किसी देश की सीमाएँ हों, लेकिन एक सच्चा राष्ट्र इन सीमाओं से परे होता है। हमें अन्यायपूर्ण तरीके से बाँटा गया है, हमें तीन अलग-अलग देशों में तीन अलग-अलग सरकारों के अधीन रहने के लिए मजबूर किया गया है और यह ऐसी बात है जिसे हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।”

भारत में हुई तीखी प्रतिक्रिया के जवाब में, मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने ‘सांस्कृतिक एकता’ की वकालत की थी, न कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी थी।

प्रस्तावित ‘जो’ राज्य ‘जालेंगम’ का मानचित्र जिसमें बांग्लादेश, म्यांमार और मिज़ोरम शामिल हैं। (साभार-स्वराज्य )

जून 2023 में, वर्ल्ड कूकी-ज़ो इंटेलेक्चुअल काउंसिल (WKZIC) ने संयुक्त राष्ट्र और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने संघर्ष-ग्रस्त मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से एक अलग कूकी राज्य बनाने के लिए उनके हस्तक्षेप की माँग की थी।

दुनिया में कहीं भी कोई जातीय संघर्ष होता है, अमेरिका की दखलंदाजी होने लगती है

भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में धर्म-आधारित संघर्ष भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं, वहीं, कुछ उग्रवादी कुकी-चिन समूहों ने अफीम और नशीले पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क पहले ही स्थापित कर लिए हैं और ‘जमातुल अंसार’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों के साथ हाथ मिला लिया है। मणिपुर में यह पहले ही देखा जा चुका है कि कैसे ईसाई कुकी-चिन उग्रवादी समूहों ने मैतेई हिंदुओं के साथ संघर्ष शुरू कर दिया था।

मणिपुर और मिजोरम के स्थानीय लोग चिंतित है कि कई इलाकों में म्यांमार से आए घुसपैठियों की संख्या उनसे ज्यादा हो गई है। भारतीय अधिकारी लगातार मणिपुर में अवैध प्रवासियों को नकली आधार कार्ड और वोटर आईडी जारी करने वाले एक रैकेट का भंडाफोड़ करते रहे हैं। कई बार म्यांमार के नागरिकों के पास से नकली आधार कार्ड मिले, जिसके सहारे ये लोग मिजोरम और मणिपुर में रह रहे थे।

मोदी सरकार भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्रों पर बाड़बंदी का विस्तार करने के प्रयास कर रही है। 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने के निर्णय की घोषणा की। 8 फरवरी 2025 को, शाह ने आंतरिक सुरक्षा और पूर्वोत्तर राज्यों की डेमोग्राफी को बदलने से बचाने के लिए म्यांमार में आसानी से आवाजाही को रोकने की घोषणा की।

हालाँकि कई नागा और कुकी ईसाई संगठन इसके विरोधी हैं। जनवरी 2025 में ‘यूनाइटेड नागा काउंसिल’ (UNC) मिजोरम की ‘मिजो जिरलाई पॉल’ (MZP), और कुछ संगठनों ने केंद्र सरकार से भारत-म्यांमार सीमा बाड़बंदी परियोजना को रोकने की माँग की।

उन्होंने इसे भारत सरकार की एक ‘नापाक साजिश’ बताया, जिसका उद्देश्य ‘कृत्रिम सीमाएँ’ थोपकर नागा लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल करना है। जबकि मैतेई हिंदुओं ने इस बाड़बंदी परियोजना का स्वागत किया। उनका कहना था कि इससे मणिपुर में जारी संकट पर अंकुश लगेगा।

यह स्पष्ट है कि मणिपुर संकट से लेकर म्यांमार संघर्ष तक में विदेशी नागरिक और ईसाई मिशनरी का हाथ रहा है। ये लोग पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय हैं। वे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘छद्म युद्ध’ छेड़ रहे हैं, जिसका मकसद ईसाई राष्ट्र की स्थापना करना है।

इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे एक ऐसा संघर्ष-क्षेत्र तैयार करना चाहते हैं जिसे ईसाई कठपुतली आसानी से नियंत्रित कर सके। लेकिन भारत ऐसे नापाक हरकत को कभी सफल नहीं होने देगा। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के हित में कई कदम उठाए गए हैं। अमेरिकी और यूक्रेनी ईसाई विद्रोहियों के समर्थकों की हालिया गिरफ्तारियाँ इसी बात की पुष्टि करती हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Senior Sub-Editor at OpIndia. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

MOU के बाद भी सुस्ती में रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के ₹29000 करोड़: समझिए कैसे चंद्रबाबू नायडू के...

प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी में ₹5289 करोड़ देंगे, जबकि MDL मुख्य निवेशक के रूप में ₹23964 करोड़ का निवेश करेगा।

पूरी तरह से ‘ड्राई स्टेट’ नहीं था लक्षद्वीप, 47 साल बाद सरकार ने बदले शराब के नियम: जानिए क्यों, कभी विकास परियोजनाओं के विरोध...

भारत के केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने लागू शराबबंदी कानून को समाप्त कर दिया है।
- विज्ञापन -