जाति विहीन समाज बनाना था, हम बाँटने लगे: सुप्रीम कोर्ट, 2027 की जनगणना में DNTs की अलग गिनती से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने आगामी जनगणना में डीएनटी यानी खानाबदोश जनजातियों की गणना के लिए खास सवाल की माँग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकात और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि इस तरह का वर्गीकरण नीतिगत निर्णय है, जिसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

याचिका खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह ‘समाज को विभाजित करने की गहरी साजिश’ है, जो ‘भारत से नहीं आ रहा है, अगर हम जाँच करेंगे तो पता चलेगा कि कहाँ से हो रहा है’। हालाँकि शीर्ष अदालत ने जनगणना आयुक्त के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है।

याचिकाकर्ता के वकील सिद्धार्थ दवे ने कहा कि याचिका एसटी का दर्जा नहीं माँग रही है, बल्कि जनगणना में उनकी उपस्थिति दर्ज कराने की माँग कर रही है। सिद्धार्थ दवे ने कहा, अधिनियम अभी लागू नहीं है इसलिए कोई न कोई ऐसा तरीका होना चाहिए ताकि जनगणना से डीएनटी बाहर न रह जाएँ।

याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित सरकारी अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें रखने की स्वतंत्रता देकर याचिका का निपटारा कर दिया।

1911 में हुई थी जनगणना

घुमंतू जातियों की जनगणना में 1911 में अंग्रेजों के जमाने में हुई थी। हालाँकि आधिकारिक जनगणना में उनकी जनसंख्या दर्ज नहीं की गई थी। इन जातियों को आपराधिक जनजाति के रूप में बताने के लिए आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के तहत दर्ज किया गया था, लेकिन इसे 1949 में निरस्त कर दिया गया।

घुमंतूओं को एससी, एसटी या ओबीसी के किसी श्रेणी में नहीं रखा गया है इसलिए इनलोगों को आरक्षण का लाभ या सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।

कई आयोग ने अपनी सिफारिशें दी

रेनके आयोग ने 2008 में ऐसे घुमंतुओं की संख्या करीब 10-12 करोड़ बताई थी। जबकि इडेट आयोग ने बताया कि 1200 से अधिक समुदाय इसमें शामिल हैं, जो खानाबदोश या अर्द्ध खानाबदोश की जिंदगी बसर करते हैं। अय्यंगार समिति की 1949 की सिफारिश पर इन जातियों को आपराधिक अधिनियम से बाहर किया गया।

इसके अलावा 1965 में लोकर समिति ने इनके लिए अलग से विकास योजनाएँ शुरू करने की सिफारिश की गई थी।

घुमंतू जाति की जीवन शैली

घुमंतू जनजाति एक जगह से दूसरी जगह पर जाकर जीवन व्यतीत करते हैं ये गतिशील जीवन शैली अपनाते हैं। ये लोग पशुपालन और छोटे मोटे व्यापार के माध्यम से अपना जीवन जीते हैं। बंजारा और रबारी जैसी जातियाँ इसके अंतर्गत आती हैं।
अर्ध खानाबदोश जनजातियाँ भी इसमें अलग से आती हैं, जो मौसमी प्रवास करती हैं, यानी किसी खास स्थान पर खास वक्त पर जाकर रहती हैं जैसे गद्दी और मालधारी जातियाँ।