पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मर्दान शहर के एक गुरुद्वारे में घुस कर सिख दंपति जगन्नाथ और उनकी पत्नी अस्मा वंती की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 17 जून 2026 को हुए इस हत्या ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालत को बयाँ करता है। लेकिन इस हत्याकांड पर वामपंथी लिबरल ग्रुप मौन है। देश में सीएए के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले इस प्रोपेगेंडाबाजों के मुँह में अब जुबान नहीं है। ये तो ईरान- अमेरिका डील को ‘ईरान की जीत’ बताते नहीं थक रहे हैं।
पेशावर के नजदीक गुरुद्वारे के सेवादार दंपति की हत्या
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दो हमलावरों ने एक गुरुद्वारे में घुसकर वहाँ की देखभाल करने वाले सिख दंपति की गोली मारकर हत्या कर दी। पति-पत्नी दोनों गुरुद्वारे की सेवा और देखरेख से जुड़े हुए थे। हत्या के बाद से गुरुद्वारे में लगा सीसीटीवी का फुटेज गायब है। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, हमलावर अज्ञात थे।
पुलिस मामले की जाँच की बात कर रही है, लेकिन घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान में सिखों और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।घटना की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने निंदा करते हुए हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने और सजा देने की माँग की है। यह हमला पेशावर से लगभग 60 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित मर्दाना के बाबू मोहल्ला इलाके में हुआ।
मर्दाना के जिला पुलिस अधिकारी मसूद अहमद ने बताया कि पुलिस हमले के मकसद का पता लगाने और इसमें शामिल लोगों को खोजने के लिए काम कर रही है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज गायब होने के बाद टारगेट किलिंग का अंदेशा जताया जा रहा है।
दरअसल हत्यारे किसी लूटपाट के लिए नहीं आए थे। ये लोग गुरुद्वारे में घुसकर दंपति पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई और फिर फरार हो गए। इसको लेकर स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय में डर का माहौल है। स्थानीय सिख समुदाय के लोगों का कहना है कि यह सिखों में डर का माहौल पैदा करने की एक और कोशिश है। इसलिए सुराग मिटाने की कोशिश की गई और डिजिटल सबूत मिटा दिए गए।
अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमले
यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें सिख दंपति को मारा गया है। पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में सिख व्यापारियों और गुरुद्वारा सेवकों के टारगेट मर्डर का दौर काफी पुराना है। 2023 में पेशावर में एक सिख व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। ऐसी घटनाओं की वजह से यहाँ सिखों की संख्या काफी कम हो गई है।
दरअसल पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई जैसे अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा, भेदभाव, जबरन धर्मांतरण और झूठे ईशनिंदा मामलों में फँसाना आम बात है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 1200 से लेकर 5,000 तक हिंदू धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान छोड़ देते हैं, जिनमें से ज्यादातर सिंध के होते हैं।
2023 की जनगणना के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 3.9 मिलियन यानी 39 लाख बच गई है, जो कुल आबादी का करीब 1.61 प्रतिशत है। इनमें से ज्यादातर सिंध के ग्रामीण इलाकों में रहती है।
जून 2025 में सिंध प्रांत में ही एक हिन्दू परिवार पर अत्याचार के मामले ने सुर्खियाँ बटोरी। परिवार में चार हिंदू भाई-बहनों जिया बाई (22 साल), दिया बाई (20 साल), दिशा बाई (16 साल) और उनके चचेरे भाई हरजीत कुमार (13 साल) का अपहरण कर लिया गया। इन मासूम बच्चों को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। काफी विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने चारों बच्चों को बरामद कर लिया। हालाँकि उनका अपहरण करने वाले आरोपितों को कोर्ट ने बरी कर दिया।
यही नहीं, कोर्ट ने 2 बालिग लड़कियों को सेफ हाउस भिजवा दिया, तो 2 नाबालिग बच्चों की कस्टडी के लिए माँ-बाप से ही 10-10 मिलियन पाकिस्तानी रूपए यानी 1-1 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का बॉन्ड भरवाया, ताकि दोनों बच्चों की घर वापसी न कराई जा सके और वो इस्लाम की प्रैक्टिस करते रहें यानी हिंदू माँ-बाप अपने ही जबरन मुस्लिम बनाए गए बच्चों को इस्लामी तरीके से पालते रहें और इसकी गारंटी भी दें कि वो हिंदू नहीं बनेंगे। एक दूसरे मामले में एक हिन्दू व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उसने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया।
यहाँ अल्पसंख्यक महिलाओं की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। जबरन धर्मांतरण कर निकाह का दबाव झेलने के साथ साथ हत्या के कई मामले सामने आए हैं। मानवाधिकारों की निगरानी करने वाली स्वतंत्र संस्था, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) के अनुसार, जनवरी और मई 2025 के बीच ‘सम्मान’ के नाम पर कम से कम 268 लोगों की हत्या कर दी गई, जिनमें 155 महिलाएँ थीं।
एक सवाल के जवाब में भारत सरकार ने भी संसद में बताया था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से हिंदू समुदाय के लोगों का पलायन हिंसा और भेदभाव के कारण जारी है। यहाँ अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध अत्याचार उत्पीड़न, धमकी, जबरन विवाह, जबरन धर्मांतरण, धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ आदि के रूप में किए जाते हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों की रिपोर्टों के आधार पर, भारत सरकार राजनयिक चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान सरकार के समक्ष उठाती है। पाकिस्तान सरकार से आग्रह किया जाता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों सहित अपने नागरिकों के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करे और सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता को खत्म करे। केंद्र सरकार ने बताया कि भारत ने 2021 से पाकिस्तान सरकार के सामने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 334 बड़े मामलों को उठाया है।
इस्लाम कबूल करा जबरदस्ती किया जाता है निकाह
हिंदू और दूसरे अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में निकाह के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस पर चिंता जताई है। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों ने 2025 में चेतावनी दी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, जबरन धर्मांतरण और नाबालिग लड़कियों के जबरन निकाह के मामलों में वृद्धि देखी गई है। इसको लेकर एक बुजुर्ग हिन्दू का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारे हजारों बहू-बेटियों को कट्टरपंथियों ने जबरन बना दिया मुस्लिम।
पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण किया जाता है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि इन लड़कियों की उम्र करीब 12 से 25 साल के बीच होती है। स्थिति ये है कि पुलिस ऐसा मामलों में कार्रवाई नहीं करती।
एक दूसरे मानवाधिकार संस्था जुबली कैंपेन और ओपन डोर्स ने दावा किया है कि अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। 2024 में 10 साल और उससे ऊपर की कई लड़कियाँ का अपहरण किया गया था। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक कई लड़कियाँ ऐसी त्रासदी झेलने के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो गईं। कोर्ट अक्सर ऐसे मामले में आरोपित की ये दलीलें मान लेती है कि लड़की ने अपनी मर्जी से धर्मपरिवर्तन’ कर निकाह किया था।
सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के अनुसार, अकेले 2024 में 47 हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण किया गया और जबरदस्ती उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार जबरन धर्मांतरण की शिकार महिलाओं और लड़कियों में लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। अधिकांश मामले सिंध प्रांत में दर्ज हुए।
संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान की 1.89 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का निकाह 18 साल से पहले हुई थी, जिनमें से 46 लाख 15 साल से कम उम्र की थी। इनलोगों को प्रेगेंट होने के लिए मजबूर किया गया। धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को जबरन निकाह करने और धर्मांतरण के मामले यहाँ सबसे ज्यादा हैं।
ईशनिंदा के नाम पर अत्याचार
पाकिस्तान के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस (CSJ) के अनुसार 2024 में कम से कम 344 लोगों पर ईशनिंदा के आरोप लगाए गए। इनमें अहमदी, हिंदू और ईसाई समुदाय के लोग ज्यादा हैं। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (HRCP) की हालिया रिपोर्ट ‘Streets of Fear: Freedom of Religion or Belief in 2024/25’ के मुताबिक, पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता का स्तर अब तक के सबसे निचले पायदान पर है।
वर्ष 2024 और 2025 के दौरान 450 से अधिक लोगों को झूठे ईशनिंदा के मामलों में फँसाया गया। इस दौरान भीड़ ने उन्हें मार डाला। कई मामलों में जेलों में बंद किए जाने पर पुलिस की मिलीभगत से कई आरोपितों की हत्या कर दी गईं।
जुलाई 2016 में सिंध के घोटकी में एक हिंदू व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगने से तनाव बढ़ गया और अगले ही दिन दो हिंदुओं को गोली मार दी गई।
दुनिया भर में आलोचना, लेकिन फर्क नहीं पड़ता
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ, अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF), अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और पाकिस्तान का अपना मानवाधिकार आयोग बार-बार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग और सांप्रदायिक हिंसा को लेकर चिंता जताते हैं।
हर बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आलोचना होती है, रिपोर्टें जारी होती हैं, जाँच की माँग उठती है और सरकार निष्पक्ष जाँच का भरोसा देती है, लेकिन यहाँ न तो सरकार, न ही पुलिस और यहाँ तक कि कोर्ट पर भी भरोसा करना मुश्किल है। पुलिस मुस्लिम भीड़ के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती।
कट्टरपंथियों के धर्मांतरण कराने और अल्पसंख्यकों की बेटियों को उठा ले जाने का अंदरखाने समर्थन करती है। यही वजह है कि अल्पसंख्यकों की हत्या, हिंदू लड़कियों के अपहरण, ईसाइयों पर हमले के साथ-साथ शिया और अहमदियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।
वामपंथी-लिबरल ग्रुप का दोगलापन
मर्दान के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। यह उस व्यापक संकट की याद दिलाती है जिसमें पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यक वर्षों से जी रहे हैं। कभी किसी हिंदू लड़की के अपहरण और धर्मांतरण की खबर आती है, कभी किसी सिख की हत्या।
इन घटनाओं को लेकर भारत में भी चयनात्मक रवैया अपनाया जाता है। फिलिस्तीन और गाजा हमला हो या ईरान युद्ध- इन पर मुखर रहने वाला वामपंथी लेबरल ग्रुप पाकिस्तान का नाम आते ही चुप्पी साध लेता है। हिन्दुओं पर बर्बरता हो या सिखों की हत्या इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और जब बात पाकिस्तान की आती है तो कुछ कहना ही नहीं है।
अरे पाकिस्तान क्या इन्हें तो बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की हत्याओं पर भी बोलना गँवारा नहीं हुआ। शेख हसीना के हटने के बाद जिस तरह से हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, उनके घरों में आग लगा दिए गए, महिलाओं के साथ रेप हुए, वामपंथियों ने कोई विरोध नहीं जताया। फिलिस्तीन के पक्ष में विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर सकते।
अब तक के इतिहास में काफी कम मामले सामने आए होंगे जब वामपंथी- लिबरल ग्रुप ने पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई या अहमदी समुदायों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर अपना मुँह खोला हो। भारत में CAA का विरोध करने वाला राजनीतिक और सामाजिक ग्रुप भी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की दुर्दशा पर उतनी मुखरता नहीं दिखाते, जितना दूसरे मुद्दों पर दिखाते हैं।
CAA के खिलाफ शाहीन बाग में डेरा जमाए कट्टरपंथी-वामपंथी-लिबरल की जमात के लिए फ्री में लंगर लगाने वाले डीएस बिंद्रा को ही देख लीजिए। खुद सिख हैं, लेकिन पाकिस्तान में गुरुद्वारा सेवादार दंपति की हत्या पर जुबान नहीं खुली। डीएस बिंद्रा जैसे लोग जिनकी चिंता ये रहती है कि शाहीन बाग से लेकर हज पर गए मुस्लिमों के साथ क्या हो रहा है। इतना ही नहीं भारत के वामपंथी जो फिलीस्तीन की चिंता में सूऱ रहे हैं, ईरान के लिए रोने रोते हैं उन्हें भी इससे लेना-देना नहीं है कि पड़ोसी मुल्कों में कैसे अल्पसंख्यकों को, उनके धार्मिक स्थलों, उनके बच्चों को निशाना बनाया जाता है।
कुछ ऐसा ही हालत दूसरे वामपंथी- लिबरल गैंग के लोगों की है। यह ‘गैंग’ मानवाधिकारों के मुद्दे पर दोहरा मापदंड अपनाता है। जब पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार होते हैं, या कश्मीर में बहुसंख्यक भीड़ जब हिन्दू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं, तो यह धड़ा चुप रहता है, लेकिन भारत में किसी अल्पसंख्यक के साथ कोई सामान्य आपराधिक घटना भी हो जाए, तो ये उसे ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट’ बना देते हैं। वामपंथी-लिबरल फिलीस्तीन या ईरान के मुद्दों पर तो बहुत मुखर रहता है, लेकिन CAA के तहत आने वाले पीड़ित शरणार्थियों का दर्द इन्हें नहीं दिखता।


