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कश्मीरी लड़कियों का शोषण, जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने 'लव लेटर्स' के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं।

पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

युवाओं का शोषण

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

अब उन्हें समझ आने लगा था कि जिहाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जा रहा है जिसका मजहब या इंसाफ से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने महसूस किया कि युवाओं को इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें मरने के लिए तैयार किया जा रहा है। और जो लोग उन्हें भेज रहे हैं, वे खुद कभी मैदान में नहीं उतरते।

यहीं से उन्होंने तय किया कि उन्हें इस रास्ते से बाहर निकलना है। मुश्ताक बताते हैं कि वापसी का फैसला आसान नहीं था, जो संगठन छोड़ना चाहता था, उस पर नजर रखी जाती थी। उसकी निष्ठा पर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपनी बाकी जिंदगी इसी रास्ते पर नहीं बिताएँगे।

भारतीय सेना के साथ नई शुरुआत

वापसी के बाद उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव आया, उन्होंने भारतीय सेना के साथ काम करना शुरू किया। यह एक असाधारण परिवर्तन था, जो व्यक्ति कभी सीमा पार जाकर प्रशिक्षण ले चुका था, वही बाद में आतंकवाद के खिलाफ अभियानों का हिस्सा बना। मुश्ताक बताते हैं कि भारतीय सेना ने उन पर भरोसा किया, उन्हें मौका दिया।

मुश्ताक के अनुसार, “जो मेरी आर्मी है इंडियन आर्मी यह पूरी वर्ल्ड की ऐसी आर्मी है जिसने कल के दहशतगर्द को अपनाया और इसको अपना बेस्ट दे दिया और उसने भी अपना बेस्ट दे दिया। यह बहुत बड़ी बात है मेरी आर्मी की, इंडियन आर्मी की कि दुनिया में कहीं भी आपको मिसाल नहीं मिलेगी।”

मुश्ताक ने करीब 31 वर्षों तक भारतीय सेना के साथ काम किया। उनका अनुभव उपयोगी साबित हुआ क्योंकि वे उस दुनिया को भीतर से जानते थे। उन्होंने देखा था कि आतंकवादी नेटवर्क कैसे काम करता है, कैसे युवाओं को फँसाया जाता है, कैसे प्रोपेगेंडा फैलाया जाता है और कैसे सीमा पार बैठे लोग कश्मीर को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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