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धर्म- संस्कृति की रक्षा, NGOs पर सख्ती: जानिए भारत के नए FCRA नियमों से कैसे लगेगी विदेशी फंडिंग से होने वाले धर्मांतरण पर लगाम

FCRA Amendment Rules 2026 लागू कर दिए गए हैं। इससे धर्मांतरण में विदेशी फंडिंग पर रोक लगेगी। एफसीआरए नियमों में किए गए ये संशोधन विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता के नए मानक स्थापित करेंगे।

केंद्र सरकार ने विदेशी चंदे को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 (FCRA Amendment Rules, 2026) लागू कर दिए हैं। गृह मंत्रालय ने जो नए नियम बनाए हैं, उनमें धार्मिक गतिविधियों की पूरी सूची जारी की गई है, साथ ही धर्मांतरण से जुड़ी एक्टिविटीज पर पूरी तरह रोक लगाया गया है।

इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी धन प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों और अन्य संस्थाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी को और मजबूत बनाना है।

FCRA नियमों में 10वाँ संशोधन

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 (FCRA Rules) में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। यह FCRA नियमों में 10वाँ संशोधन है, हालाँकि यह समझना जरूरी है कि सरकार ने मूल FCRA अधिनियम, 2010 में कोई बदलाव नहीं किया है।

केवल उसके तहत बने नियमों और प्रक्रियाओं को संशोधित किया गया है। जैसे कि एफसीआरए पंजीकरण के लिए कौन पात्र है, उन्हें औपचारिक रूप से क्या घोषित करना होगा, उन्हें प्राप्त विदेशी धन के हर एक रुपये का हिसाब कैसे देना होगा, और किन गतिविधियों पर अब पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

इन नए नियमों का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाना है। अब किसी संस्था को FCRA पंजीकरण के लिए अपने उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताने होंगे। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक या आर्थिक कार्यों में से किस क्षेत्र में वह काम करती है, ये बताना पड़ेगा।

सरकार ने विदेशी धन के उपयोग पर निगरानी भी बढ़ा दी है। संस्थाओं को यह बताना होगा कि पैसा कहाँ से आया, उसका उपयोग किस काम में हुआ और प्रत्येक रुपये का हिसाब रखना होगा। सोशल मीडिया खातों और डोनर की जानकारी देना भी अनिवार्य किया गया है।

नए नियमों में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों पर विशेष जोर दिया गया है। धार्मिक और सामाजिक कार्यों की अनुमति रहेगी, लेकिन विदेशी धन का उपयोग धर्म परिवर्तन कराने के लिए नहीं किया जा सकेगा।

इसके अलावा, निष्क्रिय संगठनों पर भी शिकंजा कसा गया है। जिन संस्थाओं ने लंबे समय तक कोई उल्लेखनीय गतिविधि नहीं की है, उनके लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कठिन होगा। सरकार चाहती है कि केवल सक्रिय और पारदर्शी संगठन ही विदेशी फंड प्राप्त कर सकें।

कुल मिलाकर, इन बदलावों का मकसद विदेशी धन के उपयोग को अधिक पारदर्शी बनाना, उसके दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल केवल घोषित और वैध उद्देश्यों के लिए ही हो।

लंबे समय से विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग किया जाता रहा है

जब 2011 में मूल विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम तैयार किए गए थे, तब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में थी। उस समय, इन नियमों के तहत ‘धार्मिक’, ‘शैक्षिक’, ‘सामाजिक’ या ‘सांस्कृतिक’ जैसे व्यापक और लचीले उद्देश्यों के लिए पंजीकृत संगठनों को बाहरी दान स्वीकार करने की अनुमति दी गई थी, जबकि इन उद्देश्यों का वास्तव में मतलब क्या था, इसकी जाँच कम की गई। बुनियादी जानकारी दी जाती थी, वार्षिक रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य था और पंजीकरण जरूरी था। हालाँकि नियमों में ‘धार्मिक उद्देश्य’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। इसके गंभीर परिणाम हुए।

यूपीए शासन के दौरान, जब सोनिया गाँधी का सत्ताधारी गठबंधन पर काफी प्रभाव था, तब यह नियामकीय खामी सामने आई। 2011 के नियमों की अस्पष्टता का फायदा कई संगठनों ने उठाया। धार्मिक प्रचार-प्रसार का एक ऐसा ही उदाहरण था जाकिर नाइक का प्रचार-प्रसार। उस पर निगरानी काफी कम थी।

2005 और 2007 के बीच दुबई में पीस टीवी और उसके प्रचार नेटवर्क की स्थापना के बाद विदेशी फंडिंग नियमों की अनदेखी की गई। इसी समय गाँधी परिवार से जुड़े संगठनों में चीन की एंट्री को लेकर चिंताएँ भी सामने आईं। सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली राजीव गाँधी फाउंडेशन और राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट, दोनों के एफसीआरए पंजीकरण 2022 में रद्द कर दिए गए क्योंकि इनमें अनियमितता पाई गई और नियमों का उल्लंघन सामने आया।

बाद के वर्षों में, केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकारों की खुफिया रिपोर्टों ने लगातार यह जानकारी दी गई कि विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका उपयोग धार्मिक क्रियाकलाप, शिक्षा और धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाना था, लेकिन इसका इस्तेमाल संगठित धर्मांतरण और लोगों को लालच देकर या बहला फुसलाकर धर्म परिवर्तन के लिए किया जा रहा था। खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में ये बखूबी जारी था। गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2014 से अब तक 20000 से अधिक एफसीआरए पंजीकरण निलंबित या रद्द किए जा चुके हैं, जिनमें से एक कारण धर्मांतरण गतिविधि को बताया गया है।

झारखंड, मणिपुर और मुंबई में काम करने वाले चार ईसाई प्रचारक संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस को गृह मंत्रालय ने सितंबर 2020 में निलंबित कर दिया था। यह निलंबन जनजातीय लोगों के धर्मांतरण से संबंधित खुफिया रिपोर्टों के आधार पर किया गया था। 2020 में ही 13 और गैर सरकारी संगठनों के लाइसेंस भी निलंबित कर दिए गए थे।

वर्ल्ड विजन इंडिया, चर्च की सामाजिक कार्रवाई सहायक संस्था और इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया जैसे प्रमुख संगठनों का पंजीकरण 2024 में रद्द कर दिया गया। इन सभी मामलों में एक ही पैटर्न था: कल्याणकारी या धार्मिक उद्देश्यों के लिए पंजीकरण, लेकिन जमीन पर इनका उद्देश्य टारगेटेड धर्मांतरण अभियान था। ये लोग कमजोर, गरीब और जनजातीय लोगों को फोकस करते और उनके धर्मांतरण का पूरा प्रयास करते थे। इसके लिए विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल किया जाता था।

धर्मांतरण से निपटने के लिए नियमों में स्पष्टता की जरूरत थी

एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकरण कराने के इच्छुक सभी संगठनों को अब सरकार ने जिन लक्ष्यों का अपने अधिसूचना में उल्लेख किया है उसमें से किसी एक को चुनना होगा। इन्हें पाँच हिस्सों में बाँटा गया है। सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षिक। यदि आपका उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो आप पंजीकरण नहीं करा सकते।

नियमों में अब स्पष्ट रूप से तय कर दिया गया है कि धार्मिक समुदाय के कई समूहों के लिए गतिविधियाँ ‘ धर्म परिवर्तन को छोड़कर ‘ संचालित की जानी चाहिए। धार्मिक शिक्षा, धार्मिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण, स्वदेशी मान्यताओं का संरक्षण, सत्संग, प्रवचन, ध्यान साधना सत्र इसमें शामिल हैं। साथ ही स्वदेशी और जनजातीय धार्मिक मान्यताओं का दस्तावेजीकरण, रखरखाव और पुनरुद्धार भी प्रभावित श्रेणियों में शामिल हैं।

अंतिम श्रेणी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि स्वदेशी आस्था के संरक्षण या पुनरुद्धार का दशकों तक व्यवस्थित धर्मांतरण के लिए बहाने की तरह इस्तेमाल किया था। अब नियमों ने एक ऐसी सीमा निर्धारित की है जो कानूनी रूप से सही और सभ्यतागत रूप से विवेकपूर्ण दोनों है। नए नियम के तहत कुछ गतिविधियों की अनुमति दी गई है, लेकिन धर्म परिवर्तन को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

विदेशी नागरिकों से जुड़े नियम सख्त किए गए

संशोधित नियमों के अनुसार, जिन संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारियों में भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) के अलावा अन्य विदेशी नागरिक शामिल हैं, उन्हें सामान्यतः एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति नहीं दी जाएगी। हालाँकि, केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों में अपवादस्वरूप अनुमति प्रदान कर सकती है।

नए नियम में ‘प्रमुख पदाधिकारी’ का अर्थ विस्तार से समझाया गया है, इसमें कंपनियों के निदेशक, व्यवसायों में साझेदार, न्यासी, हिंदुओं का संयुक्त परिवार के मुखिया और प्रभावी प्रबंधन नियंत्रण रखने वाले कोई भी व्यक्ति शामिल हैं। इससे उस कमी को दूर किया गया है, जिसमें नाममात्र के भारतीय अधिकारी शीर्ष पद पर बैठे होते थे और वास्तविक नियंत्रण विदेशी व्यक्ति के हाथों में होता था, जो बाहर से काम करते थे।

नए नियम में धन के लेन-देन को पारदर्शी बनाया गया है। इसे और सख्त किया गया है। पंजीकरण के दौरान गैर-सरकारी संगठनों को अपने सभी सोशल मीडिया खातों की जानकारी देना अनिवार्य है। डोनर या मध्यस्थों से मिलने वाले दान के मामले में वास्तविक डोनर या दान के मूल स्रोत का खुलासा होना आवश्यक है। यदि किसी संस्था को विदेशी धन डोनर एडवाइज्ड फंड (DAF) या अन्य मध्यस्थ वित्तीय माध्यमों से प्राप्त होता है, तो उसे अंतिम दाता (Ultimate Donor) की जानकारी देना अनिवार्य होगा। इससे विदेशी फंडिंग के स्रोतों की बेहतर निगरानी हो सकेगी।

नियमों के अनुसार, एफसीआरए पंजीकरण के नवीनीकरण और पंजीकरण रद्द होने से बचने के लिए संस्था को पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये की विदेशी राशि को अनुमोदित गतिविधियों पर खर्च करना होगा। अगर पहले से अनुमति मिल चुकी है तो रकम प्राप्त करने वाले ग्रुप को अगली किश्तें तभी दी जाएँगी जब पिछली किश्त का 75% उपयोग हो चुका हो। दूसरे शब्दों में, निष्क्रिय लाइसेंस स्वतः समाप्त हो जाएँगे।

एफसीआरए के तहत पंजीकृत सभी मौजूदा संगठनों को अधिसूचना की तारीख से एक वर्ष के भीतर नए शेड्यूल के अंतर्गत अपने उद्देश्यों और संचालन के तरीकों की औपचारिक घोषणा करनी होगी। यह संक्रमणकालीन प्रावधान सार्वजनिक जवाबदेही अनिवार्य बनाता है और यह केवल प्रशासनिक नहीं है। आजकल, प्रत्येक संगठन को विशिष्ट और स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्यों के प्रति औपचारिक रूप से प्रतिबद्ध होना आवश्यक है।

यदि कोई संस्था अपने कार्यक्षेत्र में नए राज्य, केंद्र शासित प्रदेश या अतिरिक्त उद्देश्य जोड़ना चाहती है, तो प्रत्येक अतिरिक्त प्रविष्टि के लिए 300 रुपए बतौर शुल्क जमा करना होगा। पहले से पंजीकृत संगठनों को नए नियम लागू होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपने उद्देश्यों और कार्यक्षेत्र की जानकारी देनी होगी।

22 जून को नियमों में किए गए बदलाव का महत्व सिर्फ इतना ही नहीं है। यह व्यवस्थित रूप से तैयार किए जा रहे सरकार के व्यापक विधायी ढाँचे का हिस्सा है। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026, मार्च में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। फिलहाल यह विचाराधीन है। विधेयक मूल एफसीआरए अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव करता है।

अब तक के नियम के मुताबिक, जब किसी संगठन का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो विदेशी रकम से वर्षों में बनाई गई उसकी संपत्तियाँ मसलन भूमि, मकान, अस्पताल, विद्यालय और उपकरण अक्सर कानूनी रूप से हाशिए पर चले जाते हैं। इस विधेयक से यह समस्या पूरी तरह से दूर हो जाएगी।

एफसीआरए नियमों के उल्लंघन की स्थिति में संस्था पर दुरुपयोग की गई राशि का 30 प्रतिशत या 1 लाख रुपये, जो भी अधिक हो, तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह दंड बिना अनुमति विदेशी चंदा प्राप्त करने, प्रशासनिक खर्च की निर्धारित सीमा से अधिक खर्च करने तथा धन का अनधिकृत गतिविधियों या क्षेत्रों में उपयोग करने पर लागू होगा।

सभ्यता और संस्कृति की होगी रक्षा

भारत की कार्रवाई भय से प्रेरित नहीं है। जिस सभ्यता ने गुरु ग्रंथ साहिब, त्रिपिटक, वेद और उपनिषदों को जन्म दिया, वह स्वतंत्र धार्मिक अनुष्ठानों या खुले धार्मिक विमर्श से नहीं डरती। लेकिन विदेशी धन के दम पर होने वाले धर्मांतरण परियोजनाओं को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके माध्यम से व्यवस्थित रूप से कमजोर लोगों, गरीबों, असहायों , जनजातीय लोगों को टारगेट किया जाता है। विदेशों से सारी योजनाएँ निर्देशित होती हैं और फलती-फूलती हैं। हर सच्चा लोकतंत्र विदेशी धन के हेरफेर से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने की रक्षा करता है। अमेरिका में FARA लागू है। फ्रांस में विदेशी धार्मिक संगठनों पर कड़े नियम लागू हैं। भारत का कड़ा FCRA ढाँचा सामाजिक आत्मनिर्णय का एक सामान्य अभ्यास है, कोई अपवाद नहीं।

22 जून, 2026 को जारी नियमों की अधिसूचना सटीक, तर्कसंगत और लंबे समय से विचाराधीन है। संसद की सहमति के बाद वर्तमान संशोधन विधेयक को अमली जामा पहनाया जा सकेगा। इन संशोधनों को मिलाकर एक स्पष्ट लेकिन महत्वपूर्ण गारंटी मिलती है कि भारत की जनता की सहायता करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति बिना किसी प्रतिबंध के ऐसा कर सकता है, बशर्ते वह भारत की शर्तों पर, स्पष्ट इरादों और घोषित लक्ष्यों के साथ ऐसा करे और विदेशी फंड की मदद से किसी भी धर्मांतरण एजेंडा का पालन न करे। भारत के धार्मिक ताने-बाने की अब पूरी सतर्कता से रक्षा करने की दिशा में यह अहम पहल है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसके मूलरूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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