अयोध्या के राम मंदिर को अपनी जिंदगी भर की पूरी कमाई सौंपने वाले देश के पूर्व गृह सचिव एस लक्ष्मीनारायण का दर्द छलक पड़ा है। उन्होंने रामलला के लिए 5 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि दान की थी। इस पैसे से मंदिर के लिए 151 किलो की सोने-तांबे की बेहद खास ‘रामचरितमानस’ तैयार कराई गई थी।
लक्ष्मीनारायण ने एक इंटरव्यू में राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि चंपत राय का अहंकार सातवें आसमान पर था। इतनी बड़ी राशि देने के बाद भी उन्हें न तो कोई रसीद मिली और न ही इस पवित्र ग्रंथ को मंदिर में जगह दी गई।
जीवनभर की जमापूँजी प्रभु राम के चरणों में की अर्पित
एस लक्ष्मीनारायण 1970 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के सीनियर IAS अधिकारी रहे हैं। वे देश के गृह सचिव पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने बताया कि वे बेहद सादा जीवन जीते हैं। उनकी जरूरतें बहुत ही कम हैं। वे अपनी मासिक पेंशन भी पूरी खर्च नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से उन्होंने अपनी जिंदगी भर की पूरी कमाई यानी 5 करोड़ रुपए राम मंदिर ट्रस्ट को दान करने का बड़ा फैसला लिया था।
इस दान राशि से रामलला के सामने स्थापित करने के लिए एक अद्भुत महाकाव्य ग्रंथ तैयार कराया गया। इस ‘रामचरितमानस’ के सभी 10,902 श्लोकों को तांबे के पन्नों पर उकेरा गया है। इसके पन्नों को 24-कैरेट शुद्ध सोने में डुबोया गया है। इसके अक्षर भी सोने से जड़े हुए हैं। इसे बनाने में 140 किलो तांबा और करीब 5 से 7 किलो सोना लगा है। इसे संसद भवन का ‘सेंगोल’ बनाने वाले देश के मशहूर वुम्मिडी बंगारू ज्वेलर्स ने तैयार किया है।
‘चंपत राय का अहंकार लगातार बढ़ता गया, मिलने के लिए 9 घंटे तरसाया’
लक्ष्मीनारायण ने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के रवैये पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि पहली बार मिलने पर चंपत राय बहुत विनम्र थे। लेकिन धीरे-धीरे उनका अहंकार बढ़ता चला गया।
पूर्व गृह सचिव को उनसे मिलने के लिए पहले 4 घंटे और फिर एक बार 9 घंटे तक इंतजार कराया गया। लक्ष्मीनारायण ने कहा कि वहाँ सिर्फ VIP कल्चर चल रहा है। बड़े पुलिस एस्कॉर्ट आ-जा रहे हैं। छोटे अधिकारियों ने भी उनसे कह दिया कि ट्रस्ट के लोग अब बहुत बड़े हो गए हैं, वे किसी की नहीं सुनते।
‘मैं जो चाहूँगा वही करूँगा, मुझे बार-बार परेशान मत करो’
पूर्व गृह सचिव ने बताया कि उन्होंने भगवान और अपने माता-पिता की तरह चंपत राय के सामने हाथ जोड़े। उन्होंने प्रार्थना की कि इस पवित्र ग्रंथ की रोज पूजा हो और लोग इसके दर्शन कर सकें। लेकिन ट्रस्ट ने उनकी एक न सुनी। जब वे आखिरी बार चंपत राय से मिले, तो उन्होंने रूखे लहजे में कहा, “मैं जो चाहूँगा वही करूँगा। अब मुझे बार-बार परेशान मत करो।” इस बर्ताव से वे बेहद आहत हैं।
संघ प्रमुख मोहन भागवत से लगाई गुहार, पर अब तक नहीं मिली रसीद
ट्रस्ट के इस बर्ताव से परेशान होकर लक्ष्मीनारायण ने हैदराबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की। मोहन भागवत उनके इस अनोखे दान से बहुत खुश हुए। उन्होंने मामले की गंभीरता को समझा और चंपत राय को 3-4 बार फोन भी किया।
इसके बावजूद इस पवित्र ग्रंथ को अब तक मंदिर में सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया है। लक्ष्मीनारायण ने हैरान करने वाला खुलासा करते हुए कहा कि ₹5 करोड़ की इतनी बड़ी भेंट देने के बाद भी ट्रस्ट की तरफ से उन्हें आज तक कोई आधिकारिक रसीद नहीं दी गई है।

