क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप और आपका दोस्त एक ही जगह खड़े होकर एक ही मंजिल के लिए कैब बुक कर रहे हों, लेकिन दोनों के फोन में किराया अलग-अलग दिख रहा हो? या कल तक जिस 5 किलोमीटर के सफर के लिए आपने 120 रुपए दिए थे, आज उसी रूट पर ऐप 300 रुपए माँग रहा हो? कभी बारिश आ जाए या ऑफिस छूटने का समय हो, तो कैब और बाइक टैक्सियों का किराया आसमान छूने लगता है।
अक्सर उपभोक्ताओं को लगता है कि ये कंपनियाँ अपनी मनमर्जी से पैसे वसूल रही हैं। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। लेकिन इसके पीछे एक पूरा गणित, तकनीकी एल्गोरिदम और सरकार के नए नियम काम करते हैं। आइए समझते हैं कि टैक्सियों के किराए का यह पूरा खेल क्या है और आप एक स्मार्ट उपभोक्ता बनकर अपने पैसे कैसे बचा सकते हैं।
किराए के उतार-चढ़ाव का असली गणित: सर्ज प्राइसिंग और सरकारी नियम
टैक्सी ऐप्स का किराया कभी कम तो कभी ज्यादा क्यों होता है, इसका सबसे बड़ा कारण ‘सर्ज प्राइसिंग‘ (Surge Pricing) या ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ है। Uber, ओला और Rapido जैसी कंपनियाँ पूरी तरह डिमांड (माँग) और सप्लाई (ड्राइवर्स की उपलब्धता) के सिद्धांत पर काम करती हैं।
जब किसी खास इलाके में एक ही समय पर कैब बुक करने वाले लोग (डिमांड) बहुत ज्यादा हो जाते हैं और वहाँ गाड़ियाँ या ड्राइवर्स (सप्लाई) कम होते हैं, तो ऐप का कंप्यूटर सिस्टम अपने आप किराया बढ़ा देता है।
कंपनियों का तर्क है कि वे ऐसा इसलिए करती हैं ताकि बढ़े हुए किराए को देखकर दूसरे इलाकों से ड्राइवर्स उस हाई-डिमांड वाले इलाके की तरफ आएँ और यात्रियों को जल्दी गाड़ी मिल सके। सुबह 8 से 11 बजे का ऑफिस टाइम, शाम 5 से 9 बजे का घर लौटने का वक्त, तेज बारिश, त्योहार या एयरपोर्ट-रेलवे स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में अक्सर यही स्थिति बनती है।
इसके अलावा, सरकार के नए नियमों ने भी इस खेल को बदल दिया है। केंद्र सरकार की मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस के तहत Uber, उबर और Rapido जैसी कंपनियों को पीक आवर्स (ज्यादा भीड़ वाले समय) में बेस किराए का दोगुना (2x) तक वसूलने की कानूनी मंजूरी दी गई है।
पहले यह सीमा केवल डेढ़ (1.5) गुना थी। हालाँकि, सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा और आय सुनिश्चित करने के लिए नॉन-पीक आवर्स (कम माँग वाले समय) में न्यूनतम किराया बेस किराए का कम से कम 50% रखने का नियम भी बनाया है, जिससे कंपनियाँ अब बहुत ज्यादा सस्ती राइड्स नहीं दे सकती हैं।
स्मार्ट उपभोक्ता कैसे बनें: पैसे बचाने के व्यावहारिक तरीके
अगर आप रोज-रोज के बढ़े हुए किराए से परेशान हैं, तो थोड़ा स्मार्ट बनकर अपनी जेब का बोझ कम कर सकते हैं। इसके लिए कुछ बेहद आसान और व्यावहारिक तरीके नीचे दिए गए हैं।
5 से 10 मिनट का इंतजार करें: अगर आपको कहीं पहुँचने की बहुत ज्यादा जल्दी नहीं है, तो किराया बहुत हाई दिखने पर तुरंत बुक न करें। थोड़ी देर रुक जाएँ। जैसे ही उस इलाके में माँग थोड़ी कम होगी या ड्राइवर्स बढ़ेंगे, सर्ज प्राइसिंग अपने आप खत्म हो जाएगी और किराया अचानक कम हो जाएगा।
मल्टी-ऐप स्ट्रेटेजी (Multi-App Strategy) अपनाएँ: कभी भी केवल एक ऐप के भरोसे न बैठें। बुकिंग करने से पहले अपने फोन में Uber, उबर और Rapido और इनड्राइव (InDrive) जैसी कम से कम दो-तीन ऐप्स पर किराया जरूर चेक करें। कई बार एक ही समय पर दोनों ऐप्स के किराए में 100 रुपए से लेकर 150 रुपए तक का अंतर देखने को मिल जाता है।
हाई-डिमांड जोन से थोड़ा बाहर निकलें: अगर आप किसी बड़े मॉल, एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के ठीक एग्जिट गेट पर खड़े हैं, तो वहाँ ऐप का एल्गोरिदम बहुत ज्यादा किराया दिखाएगा। ऐसे में थोड़ा सा पैदल चलकर मुख्य सड़क या थोड़ी आगे की लोकेशन डालकर सर्च करें। हाई-डिमांड जोन से बाहर आते ही कीमत काफी गिर जाती है।
पूल या शेयर्ड राइड का इस्तेमाल करें: जहाँ भी संभव हो, शेयर्ड राइड का विकल्प चुनें। यह अकेले सफर करने के मुकाबले आपकी जेब पर काफी हल्का पड़ता है।
क्या वाकई iphone और Android का रेट अलग है?
हाल ही में सोशल मीडिया पर कई ऐसे स्क्रीनशॉट वायरल हुए, जिसमें देखा गया कि एक ही जगह के लिए आईफोन (iPhone) पर ज्यादा और एंड्रॉयड (Android) फोन पर कम किराया दिखाया जा रहा था। या कभी आईफोन पर कम और एंड्रॉयड पर ज्यादा दिखाने लगता है।
इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) ने ओला और Uber को नोटिस भेजकर किराया तय करने की पूरी प्रक्रिया का जवाब माँगा है। हालाँकि कंपनियाँ इस बात से इनकार करती हैं कि वे फोन देखकर किराया बदलती हैं, लेकिन तकनीकी एक्सपर्ट्स इसके पीछे ‘यूजर बिहेवियर’ (User Behavior) यानी उपभोक्ता के व्यवहार को बड़ी वजह मानते हैं।
ये ऐप्स आपकी पुरानी राइड्स, आपकी लोकेशन और आपकी हर एक्टिविटी को ट्रैक करते हैं। यदि आप एक रेगुलर कस्टमर हैं और ऐप को पता है कि आप इस रूट पर रोज सफर करते हैं, तो आपको थोड़ा ज्यादा किराया दिख सकता है, चाहे आपके पास कोई भी फोन हो।
ऐप का एल्गोरिदम यह भांप लेता है कि आप जरूरत में हैं और भुगतान करने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, फोन की बैटरी कम होने पर ज्यादा किराया दिखाने का दावा भी सोशल मीडिया पर बहुत किया जाता है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और कंपनियाँ इसे सिर्फ एक अफवाह बताती हैं।
कौन सी टैक्सी है सबसे फायदेमंद?
आजकल बाजार में टैक्सी बुक करने के कई नए विकल्प आ गए हैं। हाल ही में दिल्ली जैसे शहरों में ‘भारत टैक्सी’ की शुरुआत हुई है। यह सर्विस ओला और Uber से बिल्कुल अलग तरीके से काम करती है। जहाँ ओला, उबर और रैपिडो का किराया समय और भीड़ के हिसाब से बदलता रहता है, वहीं भारत टैक्सी का किराया हमेशा एक समान (फिक्स्ड) रहता है।
ओला-उबर में बारिश या ऑफिस के समय किराया दोगुना तक बढ़ जाता है, लेकिन भारत टैक्सी में ऐसा कोई बदलाव नहीं होता है। अगर आप ऑफिस के समय या भारी बारिश में 12 किलोमीटर से ज्यादा दूर जा रहे हैं, तो आपके लिए ‘भारत टैक्सी‘ सबसे बेस्ट है।
इसमें कोई सर्ज प्राइसिंग (बढ़ा हुआ किराया) नहीं लगती है। इस वजह से यह ओला और उबर के मुकाबले करीब 20% से 30% तक सस्ती पड़ती है। वहीं सामान्य दिनों में कम दूरी के लिए ओला मिनी या उबर गो भी अच्छे विकल्प हैं।
अगर आप अकेले सफर कर रहे हैं, तो आपके लिए ‘Rapido’ या ‘उबर मोटो’ जैसी बाइक टैक्सी सबसे बढ़िया हैं। दिल्ली जैसे भीड़भाड़ वाले शहरों में ये बाइक टैक्सियाँ तंग गलियों से आसानी से निकल जाती हैं। इससे आपके पैसे और समय दोनों की बचत होती है। इलेक्ट्रिक स्कूटरों के आने से अब इनका किराया भी काफी कम और किफायती हो गया है।
भारतीय और विदेशी टैक्सी मॉडल में क्या अंतर है?
भारत और विदेशों (जैसे अमेरिका या यूरोप) के टैक्सी सिस्टम में नियमों, ड्राइवरों की कमाई और लोगों की जरूरतों का बड़ा अंतर है। विदेशी देशों में लेबर कानून बहुत कड़े होते हैं और वहाँ ड्राइवरों के लिए एक न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इस वजह से वहाँ टैक्सियों का शुरुआती (बेस) किराया हमेशा बहुत ज्यादा होता है।
इसके विपरीत, भारत में ओला और Uber जैसी कंपनियाँ ड्राइवरों की कुल कमाई का 20% से 25% तक हिस्सा कमीशन के रूप में खुद रख लेती हैं। लेकिन अब भारत में रैपिडो जैसी देसी ऐप्स ने एक नया ‘ज़ीरो कमीशन मॉडल’ शुरू किया है। इसमें ड्राइवर कंपनियों को रोज का सिर्फ 20 या 30 रुपए का छोटा सा चार्ज देते हैं और बाकी की पूरी कमाई अपने पास रखते हैं।
साथ ही, भारत की सड़कों और ट्रैफिक को देखते हुए यहाँ बाइक टैक्सी और ऑटो बुक करने का चलन विदेशों से कहीं ज्यादा बड़ा और सफल है। एक और अच्छी बात यह भी है कि भारत सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए 5 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस और 10 लाख रुपए का लाइफ इंश्योरेंस अनिवार्य किया है, जो कि पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ा और सराहनीय कदम है।
जब ड्राइवर माँगे ऐप से ज्यादा किराया, तो???
कई बार कैब या बाइक टैक्सी से सफर करते समय ग्राहकों को धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। जैसे, एक यात्री ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि Rapido बुक करते समय उसका किराया 450 रुपए तय हुआ था, लेकिन सफर खत्म होने पर ड्राइवर ने अपने फोन में एक फर्जी मीटर ऐप दिखाकर जबरन 784 रुपए वसूल लिए।
अगर आपके साथ भी कभी ऐसी स्थिति बनती है, तो आपको कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए। सबसे पहले तो ड्राइवर को ऐप में दिखाए गए किराए से एक भी रुपया अतिरिक्त कैश न दें। बुकिंग के समय ऐप जो ‘अपफ्रंट फेयर’ यानी तय किराया दिखाता है, हमेशा उसी के हिसाब से भुगतान करें और ड्राइवर के किसी भी बाहरी ऐप या अलग मीटर की रीडिंग को पूरी तरह से खारिज कर दें।
इस तरह की धोखाधड़ी से बचने का एक और बेहतरीन तरीका यह है कि आप हमेशा ऑनलाइन पेमेंट को ही प्राथमिकता दें। जब आप ऐप के माध्यम से सीधे डिजिटल पेमेंट (UPI या वॉलेट) करते हैं, तो ड्राइवर आपसे जबरदस्ती नकद पैसे नहीं माँग पाता है। इसके अलावा, अगर आप परिवार के साथ सफर कर रहे हैं और सुरक्षा के लिहाज से आपको उस समय मजबूरी में ड्राइवर को माँगे गए पैसे देने भी पड़ जाएँ, तो बिल्कुल घबराएँ नहीं।
आप सफर खत्म होने के तुरंत बाद ऐप के ‘हेल्प’ सेक्शन में जाएँ और ‘ट्रिप इश्यूज’ के तहत अपनी शिकायत दर्ज कराएँ। इसके साथ ही, आप भारत सरकार की नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन के टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके भी इस धोखाधड़ी की रिपोर्ट आसानी से दर्ज करा सकते हैं।
तकनीक के इस दौर में समझदारी ही सबसे बड़ा डिस्काउंट है
सीधे शब्दों में कहें तो ओला, Uber या Rapido जैसी ऐप्स कोई चैरिटी नहीं चला रही हैं। उनका पूरा सिस्टम एक ऐसे दिमाग (एल्गोरिदम) से चलता है जिसे सिर्फ मुनाफा और संतुलन समझ आता है। वो आपकी मजबूरी, आपका समय और यहाँ तक कि आपके फोन के ब्रांड को भी भाँपने की ताकत रखता है। ऐसे में खीझने या परेशान होने से बेहतर है कि आप खुद एक ‘स्मार्ट यूजर’ बनें।
अपने फोन में दो-तीन विकल्प हमेशा तैयार रखिए। जब कंपनियों के पास एल्गोरिदम की ताकत है, तो आपके पास ‘तुलना करने और चुनने’ की आजादी है। थोड़ा रुककर, ऐप्स बदलकर और सही गाड़ी का चुनाव करके आप हर महीने अपनी जेब से होने वाले फिजूल खर्च को आसानी से रोक सकते हैं। डिजिटल दौर का यही नियम है, जो सतर्क है, वही फायदे में है।


