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सिनेमाई परदे पर यूरोप की सुलगती हकीकत है Citizen Vigilante Movie: समझें- क्यों परेशान हैं दुनिया भर के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल?

'सिटीजन विजिलांते' कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप मुस्कुराते हुए थिएटर से बाहर आएँ। यह एक ऐसी फिल्म है जो आपको परेशान करती है, सोचने पर मजबूर करती है और आपके भीतर एक गुस्सा भर देती है। बंदूकों के रॉ एक्शन, तेज रफ्तार कहानी और हकीकत के ठोस धरातल पर टिकी यह फिल्म उन लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो सच को दबाना चाहते हैं।

सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन जब कोई फिल्म समाज के उस हिस्से को दिखाती है जिसे राजनीतिक व्यवस्था और मुख्यधारा का मीडिया छिपाना चाहता है, तो विवाद होना तय है। साल 2026 में आई निर्देशक उवे बोल की फिल्म ‘सिटीजन विजिलांते’ (Citizen Vigilante) इसी तरह के एक बेहद संवेदनशील, कड़वे और सुलगते हुए मुद्दे पर चोट करती है।

यह फिल्म आज के यूरोप की उस जमीनी हकीकत को बयाँ करती है, जिससे वहाँ का आम नागरिक रोज जूझ रहा है यानी अनियंत्रित अवैध अप्रवासन (Illegal Migration), बढ़ता हुआ अपराध और इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकती प्रशासनिक व्यवस्था।

यह फिल्म एक साधारण ‘एक्शन-थ्रिलर’ नहीं है, बल्कि यह यूरोप के आम लोगों की उस दबी हुई चीख और हताशा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ‘वोक’ (Woke) राजनीति और लिबरल एजेंडे के तहत दबा दिया गया है। यही वजह है कि रिलीज होते ही इस फिल्म को जर्मनी और यूरोपीय संघ (EU) के कई हिस्सों में अघोषित रूप से प्रतिबंधित या सेंसर कर दिया गया। लेकिन इंटरनेट के इस दौर में सच को दबाना नामुमकिन था और यही कारण है कि एलोन मस्क जैसी वैश्विक शख्सियतों के समर्थन के बाद यह फिल्म दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई है।

क्या है ‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी और क्यों वामपंथियों को हो रहा दर्द?

‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी एक अनाम यूरोपीय शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो आज के किसी भी बड़े यूरोपीय शहर (जैसे पेरिस, बर्लिन या लंदन) की स्थिति को दर्शाता है। फिल्म की शुरुआत एक बेहद विचलित करने वाले दृश्य से होती है, जहाँ एक युवा माँ को उसके मासूम बच्चे के सामने ही एक अप्रवासी (Migrant) द्वारा सरेआम चाकू मारकर मार दिया जाता है। यह दृश्य ही फिल्म का टोन सेट कर देता है और दिखाता है कि कैसे कभी सुरक्षित माने जाने वाले यूरोपीय शहर अब असुरक्षा के गर्त में जा चुके हैं, जहाँ महिलाएँ शाम के बाद बाहर निकलने से डरती हैं।

फिल्म का मुख्य किरदार ‘माइकल सैंडर्स’ (आर्मी हैमर द्वारा अभिनीत) एक पूर्व अमेरिकी सैन्य अधिकारी है। वह अपने दिवंगत पिता के रियल एस्टेट व्यवसाय को संभालने के लिए यूरोप आता है, लेकिन वहां के बिगड़ते हालात और कानून-व्यवस्था के पतन को देखकर उसका खून खौल उठता है। जब वह देखता है कि पुलिस, अदालतें और सरकारी तंत्र अपराधियों को सजा देने के बजाय उनके मानवाधिकारों और ‘इंटीग्रेशन’ (समाज में घुलने-मिलने) के नाम पर उन्हें छोड़ रहे हैं, तो वह खुद कानून अपने हाथ में लेने का फैसला करता है। वह बनता है ‘सिटीजन विजिलांते’।

माइकल सैंडर्स का निशाना केवल वो अपराधी नहीं हैं जो सड़कों पर महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं या अपराध फैलाते हैं, बल्कि उसका असली गुस्सा उन जजों, वकीलों और नेताओं पर है जो अपनी तुष्टिकरण की राजनीति और ‘वोक’ विचारधारा के कारण इन अपराधियों को बचाते हैं। पूरी फिल्म में माइकल एक-एक करके ऐसे अपराधियों और उनके संरक्षकों का खात्मा करता है, जो कानून की कमियों का फायदा उठाकर खुलेआम घूम रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथ, वामपंथ और लिबरलों की नाराजगी का असली कारण

इस फिल्म को लेकर वामपंथी (Leftists), लिबरल (Liberals) और इस्लामी संगठन इस कदर नाराज क्यों हैं? इसका सीधा जवाब यह है कि यह फिल्म उनके बरसों से बनाए गए नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। लिबरल और वामपंथी ताकतों ने हमेशा ‘खुली सीमाओं’ (Open Borders) और बिना किसी जाँच-परख के अप्रवासियों के स्वागत की वकालत की है। लेकिन जब इन अप्रवासियों के बीच से निकले कुछ चरमपंथी और अपराधी तत्व वहां के मूल नागरिकों पर हमले करते हैं, तो यही लिबरल गैंग इसे ‘अपवाद’ बताकर दबाने की कोशिश करता है।

‘सिटीजन विजिलांते’ में ऐसी कई बातें दिखाई गई हैं जो इस लॉबी को सीधे तौर पर चुभती हैं-

अपराधियों को ‘विक्टिम’ बताने वाले तंत्र पर चोट: फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जहां एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता न्याय के लिए भटक रही है। छह अप्रवासी उपद्रवियों ने उसका सामूहिक बलात्कार किया, लेकिन अदालत के जज ‘रेनहोल्ड’ ने उन अपराधियों को यह कहकर छोड़ दिया कि “ये लोग बाहरी हैं, इन्हें समाज में घुलने-मिलने में दिक्कतें आ रही हैं, इसलिए ये भी एक तरह से पीड़ित हैं।”

यह दृश्य सीधे तौर पर यूरोप के वास्तविक कोर्ट फैसलों पर करारा व्यंग्य है, जहाँ अपराधियों के सीरियाई/अफ्रीकी/मिडिल ईस्ट की हिंसक बैकग्राउंड का हवाला देकर उन्हें हल्की सजा या माफी दे दी जाती है। जब माइकल सैंडर्स उस जज को उसके घर में घुसकर सजा देता है, तो यह वामपंथी न्याय प्रणाली के मुँह पर एक तमाचा है।

बिना लाग-लपेट के हकीकत दिखाना: फिल्म में यह साफ दिखाया गया है कि कैसे कुछ खास समुदाय के लोग बस में बिना टिकट यात्रा करते हैं, सड़कों पर गुंडागर्दी करते हैं और महिलाओं को वस्तु की तरह समझते हैं। जब माइकल सैंडर्स एक अपराधी ‘यूसुफ’ के घर पहुंचता है, तो उसका परिवार अपने बेटे के अपराध पर शर्मिंदा होने के बजाय उलटा पीड़िता को ही दोषी ठहराता है और अपने मजहब या सामाजिक स्थिति की दुहाई देता है। यह दृश्य दिखाता है कि कट्टरपंथ की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहां अपराध को भी सही ठहराने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक गलियारों का पाखंड: फिल्म यह भी उजागर करती है कि कैसे सरकारें जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल करके खाली पड़ी संपत्तियों को अप्रवासियों के आवास के लिए हथियाना चाहती हैं, जबकि अपने ही देश के गरीब या बेघर नागरिकों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। माइकल सैंडर्स का किरदार इस सरकारी नीति का डटकर विरोध करता है।

यूरोपीय नागरिकों की मनोस्थिति और जमीनी सच्चाई

यह फिल्म आज के समय में इतनी प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि यह यूरोप के बहुसंख्यक मूल निवासियों की वास्तविक मनोस्थिति को दर्शाती है। आज का आम यूरोपीय नागरिक डरा हुआ भी है और गुस्से में भी। सोशल मीडिया और पब्लिक डोमेन में ऐसे हजारों मामले मौजूद हैं जो इस फिल्म की कहानी को पूरी तरह सच साबित करते हैं।

ग्रूमिंग गैंग्स का कड़वा सच: अगर हम वास्तविक दुनिया की बात करें, तो यूनाइटेड किंगडम (UK) में ‘पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स‘ का मामला इसका सबसे बड़ा और भयानक उदाहरण है। रॉदरहैम (Rotherham), रोशडेल और ब्रिटेन के कई अन्य शहरों में सालों तक पाकिस्तानी मूल के गिरोहों ने हजारों श्वेत ब्रिटिश लड़कियों का यौन शोषण किया, उन्हें नशा दिया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

सबसे शर्मनाक बात यह थी कि वहाँ की स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने केवल इसलिए कार्रवाई नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि उन पर ‘नस्लवादी’ (Racist) या ‘इस्लामोफोबिक’ होने का ठप्पा लग जाएगा। राजनीतिक शुद्धता (Political Correctness) के चक्कर में मासूम बच्चियों को दरिंदों के हवाले छोड़ दिया गया।

अवैध घुसपैठ और अपराधों में बाढ़: जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और इटली जैसे देशों में पिछले एक दशक में अप्रवासियों द्वारा किए जाने वाले चाकूबाजी (Stabbing), बलात्कार और दंगों के मामलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। स्वीडन, जिसे कभी दुनिया का सबसे सुरक्षित देश माना जाता था, आज यूरोप की ‘गैंग वार राजधानी’ बन चुका है। फ्रांस के कई इलाकों में पुलिस जाने से डरती है, जिन्हें ‘नो-गो जोन्स’ कहा जाता है।

जब ‘सिटीजन विजिलांते’ में इन वास्तविकताओं को हूबहू दिखाया गया, तो यूरोपीय अभिजात वर्ग (Elites) सिहर उठा। उन्हें लगा कि अगर यह फिल्म आम लोगों ने देख ली, तो उनका बनाया हुआ ‘मल्टीकल्चरलिज्म’ (बहुसंस्कृतिवाद) का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। इसी डर के कारण जर्मनी के सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को एज रेटिंग देने से मना कर दिया, जिसका सीधा मतलब था कि इसे न तो सिनेमाघरों में दिखाया जा सकता था और न ही इसका विज्ञापन किया जा सकता था। यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने जैसा था।

एक्स पर एलन मस्क ने सच को दिया मंच

जब यूरोप के पारंपरिक तंत्र ने फिल्म का रास्ता रोकने की कोशिश की, तब डिजिटल दुनिया के सबसे बड़े मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और उसके मालिक एलन मस्क ने इस सेंसरशिप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मस्क ने न सिर्फ इस फिल्म की तारीफ की, बल्कि इसे अपने हैंडल से पूरे 48 घंटों के लिए मुफ्त में प्रसारित कर दिया।

मस्क का तर्क सीधा था कि अगर आप किसी फिल्म को इसलिए प्रतिबंधित कर रहे हैं क्योंकि वह समाज के एक कड़वे सच को दिखाती है, तो यह ‘स्ट्रैसैंड इफेक्ट’ (Streisand Effect) को जन्म देगा, यानी जिसे आप छिपाना चाहेंगे, लोग उसे और ज्यादा देखेंगे। और हुआ भी यही। मस्क के इस कदम के बाद फिल्म को X पर करोड़ों व्यूज मिले। देखते ही देखते यह फिल्म एप्पल टीवी और अमेजन प्राइम वीडियो पर नंबर-1 डिजिटल परचेज बन गई।

सोशल मीडिया पर आम नागरिकों ने इस कहानी का पुरजोर समर्थन किया। लोगों का कहना था कि जो बात उनके राजनेता संसद में स्वीकार करने से डरते हैं, उसे उवे बोल ने बड़े पर्दे पर खुलकर रख दिया है। फिल्म के अंत में माइकल सैंडर्स का यह संदेश कि “जब तक नागरिक खुद की रक्षा करना नहीं सीखेंगे, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी” आज के यूरोप के लिए एक चेतावनी की तरह गूँज रहा है।

डायरेक्टर से लीड एक्टर तक झेल रहे थे निजी जीवन में समस्याएँ

फिल्म के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। निर्देशक उवे बोल ने इस फिल्म को बनाने के लिए भारी जोखिम उठाया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि फिल्म के अंतिम हिस्से में एक मुस्लिम परिवार की भूमिका निभाने के लिए कलाकार ढूँढना उनके लिए सबसे कठिन काम था। उन्होंने सैकड़ों अभिनेताओं से संपर्क किया, लेकिन इस संवेदनशील और यथार्थवादी भूमिका को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि सभी को अपने करियर और सुरक्षा का डर था।

आखिरकार क्रोएशिया के जगरेब में इस फिल्म की शूटिंग बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच पूरी की गई। फिल्म का शुरुआती नाम ‘The Dark Knight’ रखा गया था, लेकिन वार्नर ब्रदर्स के कानूनी नोटिस के बाद इसे बदलकर ‘Citizen Vigilante’ किया गया।

फिल्म के मुख्य अभिनेता आर्मी हैमर (Armie Hammer) का इस फिल्म से जुड़ना भी उनके करियर का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। आर्मी हैमर कभी हॉलीवुड के ए-लिस्ट सितारों में शुमार थे, लेकिन कुछ साल पहले उनके निजी जीवन से जुड़े गंभीर विवादों और आरोपों के कारण हॉलीवुड उद्योग ने उन्हें पूरी तरह दरकिनार (Cancel) कर दिया था। लंबे समय तक काम न मिलने और मानसिक व सामाजिक रूप से कटे रहने के बाद, हैमर ने इस फिल्म के जरिए वापसी की कोशिश की।

हालाँकि मुख्यधारा के आलोचकों ने उनके अभिनय और इस फिल्म की यह कहकर आलोचना की कि यह उनके करियर को और नुकसान पहुँचाएगी, लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग ने हैमर के अभिनय की सराहना की है। फिल्म में उनके चेहरे की हताशा, गुस्सा और अकेलापन कहीं न कहीं उनके वास्तविक जीवन के संघर्षों को भी दर्शाता है।

ठीक इसी तरह निर्देशक उवे बोल को भी हॉलीवुड और मुख्यधारा के समीक्षकों द्वारा हमेशा एक विवादित और ‘खराब’ निर्देशक के रूप में पेश किया गया है, लेकिन इस फिल्म के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि वे बिना किसी डर के कड़े फैसले लेने वाले फिल्मकार हैं।

हालाँकि उन्होंने 2010 में होलोकास्ट पर एक बहुत जबरदस्त फिल्म Auschwitz बनाई थी, जो सच्चाई के बेहद करीब थी। उस फिल्म में भी Citizen Vigilante जैसा एकदम रॉ फुटेज एक्शन और डॉक्यूमेंट्री से जुड़े असली फुटेज इस्तेमाल किए गए थे, तब भी उन्हें ‘एकदम’ असली और परेशान करने वाले सीन दिखाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी। इस बार उन्होंने असली तो नहीं, लेकिन सिनेमाई कला के जरिए ऐसी साफगोई दिखाई है, जो हैरान-परेशान और रोंगटे खड़ी खरने वाली है।

सिटीजन विजिलांते ने कर दिया काम, छाती पीटता रहे इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल गैंग

‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म न्याय प्रणाली की विफलता पर कानून को हाथ में लेने का समर्थन करती है, जो नैतिक रूप से बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह उस गुस्से को पूरी तरह से वैध ठहराती है जो आज यूरोप का आम नागरिक महसूस कर रहा है।

लिबरल और वामपंथी समीक्षक ‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म को चाहे कितनी भी कम रेटिंग क्यों न दें, इस फिल्म ने अपना काम कर दिया है। इसने यूरोप के तुष्टिकरण, अवैध अप्रवासन के खतरों और प्रशासनिक रीढ़हीनता को दुनिया के सामने पूरी तरह नंगा कर दिया है। यह फिल्म आने वाले समय में एक ऐसी ‘कल्ट क्लासिक’ (Cult Classic) के रूप में याद की जाएगी, जिसने सिनेमा के जरिए एक वैश्विक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन को हवा दी। यदि आप आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य और यूरोप के संकट को समझना चाहते हैं, तो ‘सिटीजन विजिलांते’ एक बेहद जरूरी और आँखें खोल देने वाली फिल्म है।

कुल मिलाकर एक बात तो साफ है कि ‘सिटीजन विजिलांते’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप मुस्कुराते हुए थिएटर से बाहर आएँ। बल्कि यह एक ऐसी फिल्म है जो आपको परेशान करती है, सोचने पर मजबूर करती है और आपके भीतर एक गुस्सा भर देती है। बंदूकों के रॉ एक्शन, तेज रफ्तार कहानी और हकीकत के ठोस धरातल पर टिकी यह फिल्म उन लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो सच को दबाना चाहते हैं। यह आधुनिक सिनेमा का एक ऐसा साहसिक मोड़ है, जिसे नजरअंदाज करना अब किसी के बस की बात नहीं है।

फिल्म समीक्षा: सिटीजन विजिलांते (Citizen Vigilante)

निर्देशक: उवे बोल (Uwe Boll)

मुख्य कलाकार: आर्मी हैमर, कोस्टास मैंडिलोर, डेसिरी जियोर्गेटी

स्टार : ****1/2

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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