इस्लामियों ने ₹5 करोड़ चंदे का देखा था सपना, उम्माह से ₹1.5 करोड़ भी नहीं मिला: अयोध्या में ‘बड़े मस्जिद’ की जगह बनेगी छोटी सी इमारत, अस्पताल-लाइब्रेरी की योजना भी ठंडे बस्ते में

अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद परियोजना का पूरा ढांचा ही ध्वस्त हो गया है। भव्य राम मंदिर के निर्माण पर तमाम तरह की बयानबाजी करने वाले और राम विरोधियों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि अब मुस्लिम समुदाय की बेरुखी और चंदे के महासंकट के कारण इस मस्जिद का आकार बेहद छोटा कर दिया गया है।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) ने अस्पताल और लाइब्रेरी जैसी बड़ी योजनाओं को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में 5 एकड़ जमीन आवंटित की थी। यह जगह राम मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर लखनऊ-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

इस जमीन पर पहले एक बेहद भव्य मस्जिद बनाने का बड़ा दावा किया गया था। इस परियोजना में मुख्य मस्जिद के साथ-साथ एक 300 बिस्तरों का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, एक समृद्ध केंद्रीय पुस्तकालय और कम्युनिटी किचन बनाने का पूरा खाका तैयार था। लेकिन खुद मुस्लिम समुदाय ने ही इस परियोजना से पूरी तरह मुँह मोड़ लिया। अपनों की इस भारी बेरुखी के कारण अब यह पूरा भव्य प्रोजेक्ट औंधे मुँह गिर गया है।

चंदे की भारी किल्लत, तिजोरी में नहीं बचा पैसा

जो लोग भव्य राम मंदिर को लेकर आए दिन मीडिया में बड़ी-बड़ी बयानबाजी करते थे, आज उनके खुद के प्रोजेक्ट के लिए चंदे का बड़ा अकाल पड़ गया है। फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन ने साफ किया कि अब इस जगह पर केवल एक ‘छोटी मस्जिद’ का निर्माण किया जाएगा।

इस छोटी सी मस्जिद को बनाने के लिए भी कम से कम 3 करोड़ से 5 करोड़ रुपए के फंड की जरूरत है। लेकिन असलियत यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी फाउंडेशन अब तक सिर्फ 1.5 करोड़ रुपए का ही चंदा जुटा पाया है। यह रकम इस योजना के लिए पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है, जिसके कारण ट्रस्ट को घुटने टेकने पड़े हैं।

खुद के फायदे के लिए सरकारी फंड के इस्तेमाल पर टिकी निगाहें

मुस्लिम समुदाय से अपेक्षित चंदा और सहयोग न मिलने के कारण अब ट्रस्ट की हालत खराब है। सूत्रों के अनुसार, चंदा इकट्ठा करने में नाकाम रहने के बाद अब अंदरखाने सरकारी सहायता और फंड को अपने तरीके से इस्तेमाल करने की जुगत लगाई जा रही है।

आईआईसीएफ के अध्यक्ष जुफर अहमद फारूकी ने खुद माना कि समुदाय की ओर से इस प्रोजेक्ट को लेकर भारी उदासीनता और अरुचि देखी जा रही है। लोगों ने इस काम के लिए बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई, जिससे चंदे का यह संकट खड़ा हुआ है।

प्रशासनिक लेटलतीफी और नक्शे का पेंच

परियोजना के समय पर शुरू न हो पाने के पीछे केवल पैसों की कमी ही नहीं थी। ट्रस्ट की प्रशासनिक और तकनीकी कमियाँ भी इसके लिए जिम्मेदार रहीं। अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) से मस्जिद और पूरे परिसर का नक्शा पास कराने की प्रक्रिया में ट्रस्ट को लंबा वक्त लग गया।

शुरुआत में इस 5 एकड़ की जमीन के लैंड यूज (भू-उपयोग) को बदलने में पेंच फँसा। इसके बाद विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्ज) के रूप में एक बड़ी सरकारी राशि जमा करने की तकनीकी बाध्यता सामने आई। हालाँकि बाद में विकास प्राधिकरण ने इस नक्शे को मंजूरी दे दी थी, लेकिन तब तक बजट का संकट इतना बढ़ गया कि ट्रस्ट जमीन पर कोई भी काम शुरू नहीं कर सका।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ बदहाली

अयोध्या का यह विवाद दशकों पुराना रहा है। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पूरे देश में बड़े दंगे हुए थे, जिसमें करीब 2,000 लोग मारे गए थे। इसके बाद साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी जमीन का मालिकाना हक हिंदुओं को सौंपते हुए भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया था।

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को पूरा करते हुए उस पवित्र स्थान पर एक बेहद भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा कर लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले इस मंदिर का भव्य उद्घाटन भी किया था।

राम मंदिर को लेकर छिड़ा ताजा राजनीतिक घमासान

एक तरफ जहाँ मस्जिद का काम पूरी तरह ठप हो चुका है, वहीं राम मंदिर का प्रबंधन भी इस समय राजनीतिक हमलों का सामना कर रहा है। मंदिर के चंदे में कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के कुछ आरोपों के बाद हाल ही में इसके प्रबंधन और नेतृत्व में बड़ा फेरबदल किया गया है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे देखते हुए विपक्षी दल इस मामले को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तमाम विवादों के बीच, मस्जिद का भव्य सपना टूटना और इसका आकार बेहद छोटा होना अब सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका है।