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पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों ने हिंदू पहचान को बनाया निशाना, बाजारों-बसों-ट्रेनों में हुए कत्लेआम: जानें- ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के पहले से ही कैसे बहाया जा रहा था खून

यह धारणा पूरी तरह गलत है कि खालिस्तानी आतंकियों का खूनी खेल जून 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद शुरू हुआ। इतिहास गवाह है कि 1981 में लाला जगत नारायण की हत्या और 1983 के ढिलवाँ हत्याकांड जैसी घटनाएँ ब्लू स्टार से काफी पहले हो चुकी थीं।

वो 6 जुलाई 1987 की रात थी। हरियाणा रोडवेज की एक बस चंडीगढ़ से ऋषिकेश के लिए रवाना हुई थी। बस में सवार यात्रियों में ज्यादातर तीर्थयात्री, मजदूर, महिलाएँ, बच्चे और पुरुष थे, जो सिर्फ यही उम्मीद कर रहे थे कि वे शायद थोड़ा देर से पहुँचेंगे। जब बस लालरू पार करने वाली थी, तभी एक कार ने उसका रास्ता रोक लिया। हथियारबंद लोग बस के अंदर चढ़ गए, बस को मेन हाइवे से दूर ले गए, यात्रियों को गालियाँ दी, उनके कीमती सामानों को लूट लिया गया और बस के दोनों तरफ से गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं।

खालिस्तानी आतंकियों के चंडीगढ़ बस हमले में उस रात पाँच महिलाओं और चार बच्चों समेत 38 लोग मारे गए। यह कोई आमने-सामने की मुठभेड़ नहीं थी। वहाँ कोई भ्रम नहीं था। पीड़ितों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा गया क्योंकि वे हिंदू थे, जो एक ऐसे इलाके में सफर कर रहे थे जहाँ खालिस्तानी आतंकवाद ने आम यात्रा को ही हथियार बनाना सीख लिया था।

यह कोई इकलौती घटना नहीं थी। पंजाब में उग्रवाद के दौरान इस तरह की घटनाओं को अलग-अलग तरीकों से दोहराया गया। कहीं बस रोकी गई, तो कहीं चेन खींचकर ट्रेन रोकी गई। दाढ़ी, पगड़ी, नाम, बोलने के तरीके या बंदूक की नोक पर पूछे गए सवालों के जवाब से पहचान की जाँच की जाती थी। सिख यात्रियों को एक तरफ हटने के लिए कहा जाता था। महिलाओं और बच्चों को कभी जाने दिया जाता था, तो कभी नहीं।

हिंदू पुरुषों को कतार में खड़ा किया जाता था, बस से उतरने का हुक्म दिया जाता था या ट्रेन के डिब्बे के भीतर ही फंसाकर उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी जाती थी। जब हत्याओं का यह सिलसिला सड़कों से आगे बढ़ा, तो इसने बाजारों, ईंट-भट्टों, सुबह की शाखाओं और कारखानों को भी अपनी चपेट में ले लिया। जब इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाता है, तो यह सिर्फ आम नागरिकों की आकस्मिक मौत नहीं, बल्कि सांप्रदायिक आतंकवाद का एक बार-बार दोहराया जाने वाला तरीका नजर आता है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही दिखने लगा था खालिस्तानी आतंकियों का यह तरीका

पंजाब में उग्रवाद को लेकर एक आम भ्रम यह है कि हिंदू नागरिकों की सुनियोजित हत्याएँ जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ही शुरू हुईं। लेकिन इतिहास के आँकड़े इस बात की गवाही नहीं देते। ‘हिंद समाचार समूह’ के संस्थापक और अलगाववादी उग्रवाद के प्रखर आलोचक लाला जगत नारायण की हत्या 9 सितंबर 1981 को ही कर दी गई थी।

इसके कुछ ही हफ्तों के भीतर दल खालसा के अपहरणकर्ताओं ने इंडियन एयरलाइंस के विमान 423 का अपहरण कर लिया और खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को रिहा करने की माँग की। लाला जगत नारायण की हत्या अलगाववादी उग्रवाद के विरोधियों के खिलाफ चलाए गए अभियान के शुरुआती दौर में ही कर दी गई थी, जो जून 1984 से काफी पहले की बात है।

अक्टूबर 1983 की शुरुआत तक इस हिंसा ने एक नया और बेहद खौफनाक रूप ले लिया था। 5 और 6 अक्टूबर 1983 को ढिलवाँ बस हत्याकांड में ढिलवाँ से जालंधर जा रही एक बस से छह हिंदू यात्रियों को उतार लिया गया। हमलावरों ने यात्रियों से उनका धर्म पूछने के बाद उन्हें गोली मार दी।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उग्रवाद के दौर में यह पहला ऐसा कुख्यात बस हत्याकांड था जिसमें हिंदुओं को चुनकर गोली मारी गई थी। इस घटना के तुरंत बाद पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

लेकिन राष्ट्रपति शासन भी इन हत्याओं को रोक नहीं सका। 18 नवंबर 1983 को कपूरथला जिले में एक और बस को रोका गया और चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई। ध्यान देने वाली बात यह है कि ढिलवाँ और कपूरथला दोनों ही घटनाओं में हाईजैक की गई बसों को अमृतसर के पास एक ही सीमावर्ती इलाके में लावारिस छोड़ दिया गया था। हालाँकि ये उग्रवाद के सबसे बड़े हमले नहीं थे, लेकिन इन्होंने दिखा दिया कि सार्वजनिक वाहन अब सांप्रदायिक आधार पर लोगों को चुनने और उन्हें मारने का जरिया बन चुके थे।

फरवरी 1984 में ब्लू स्टार से पहले का यह इतिहास और ज्यादा खून-खराबे वाला हो गया। 23 फरवरी को एक के बाद एक कई हमले हुए, जिसमें 11 हिंदुओं की मौत हो गई और दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस दौरान ट्रेनों और बसों दोनों को निशाना बनाया गया। भले ही यह किसी एक जगह पर हुआ हत्याकांड नहीं था और इसमें कई घटनाएँ शामिल थीं, लेकिन ये सभी हत्याएँ एक ही दिन के भीतर हुईं।

सेना के स्वर्ण मंदिर परिसर में दाखिल होने से महीनों पहले खालिस्तानी आतंकवादी आम लोगों को परिवहन नेटवर्क से खींचकर बाहर निकाल रहे थे और बसों तथा ट्रेनों को सांप्रदायिक आतंक का जरिया बना रहे थे। सरकारी और अखबारों के आँकड़ों के मुताबिक, ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू होने से पहले, 1984 के शुरुआती पाँच महीनों में ही सैकड़ों हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं और करीब 300 लोगों की जान चली गई।

मोगा के पास बस रूट पर जून से पहले की एक और घटना दर्ज हुई। 21 मई 1984 को छह खालिस्तानी आतंकवादियों ने मोगा के पास एक बस को हाईजैक कर लिया और चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी। इस हमले में दस अन्य लोग घायल भी हुए।

हिंदुओं को क्यों बनाया जा रहा था निशाना?

उस समय की रिपोर्टों में बेहद साफ तौर पर बताया गया था कि इन हमलों के दौरान हिंदुओं को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा था। जुलाई 1986 में मुक्तसर हत्याकांड के बाद ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने लिखा था कि यह हमला साफ तौर पर सिख और हिंदू समुदायों के बीच ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए चलाए जा रहे एक तेज अलगाववादी अभियान की ओर इशारा करता है। रिपोर्ट में इसे पंजाब से हिंदुओं को बाहर खदेड़ने के मकसद से चलाया गया एक व्यापक अभियान बताया गया।

नवंबर 1986 में होशियारपुर हत्याकांड के बाद ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन हत्याओं का मकसद सिख और हिंदू आबादी के बीच खाई पैदा करना था। पुलिस अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि आतंकवादी चाहते थे कि पंजाब से बाहर रहने वाले सिख पंजाब के अंदर आ जाएँ और पंजाब के अंदर रहने वाले हिंदू राज्य से बाहर चले जाएँ।

जुलाई 1987 में लालरू हत्याकांड के बाद ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने भी कुछ ऐसा ही रुख अपनाया और लिखा कि आतंकवादियों ने ऐसी रणनीति अपनाई है जिसका मकसद हिंदुओं को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर करना और देश के अन्य हिस्सों में तनाव पैदा करना है।

अधिकारियों के बयानों ने भी इस बात की पुष्टि की। मुक्तसर हत्याकांड के बाद, बरनाला प्रशासन ने लोगों से अपील की कि वे ‘भाईचारे के खून-खराबे’ की साजिश रचने वाली ताकतों के जाल में न फँसें। होशियारपुर हत्याकांड के बाद कॉन्ग्रेस नेता राजीव गाँधी ने इसे धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे के लिए एक ‘गंभीर उकसावा’ करार दिया। 1989 में मोगा हत्याकांड के बाद तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह ने साफ शब्दों में इस हमले को आतंकवादियों द्वारा सांप्रदायिक तनाव भड़काने की एक कोशिश बताया।

यह कोई दशकों बाद जबरन थोपी गई कोई वैचारिक व्याख्या नहीं थी। यह उस समय की सरकार द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा थी, जो उस पैटर्न के जवाब में थी जिसे वे अपनी आँखों के सामने घटते देख रहे थे। आतंकवादियों का रणनीतिक मकसद बेहद क्रूर और सीधा था। अगर पंजाब में हिंदुओं को असुरक्षित महसूस कराया जा सके और देश के अन्य हिस्सों में सिखों के खिलाफ जवाबी हिंसा भड़क उठे, तो सदियों पुराना भाईचारा टूट जाएगा।

इसके बाद पंजाब को उग्रवादियों के फायदे के लिए एक ऐसे क्षेत्र के रूप में पेश किया जा सकता था, जहाँ गैर-सिख सुरक्षित नहीं रह सकते। यही वजह थी कि बसों, ट्रेनों, बाजारों और दफ्तरों जैसी जगहों को निशाना बनाया गया, जहाँ आम, मिली-जुली और बेफिक्र जिंदगी हर रोज चलती थी। उस माहौल में आतंक फैलाने का मकसद आपसी भाईचारे को शक में बदलना था।

यहां एक और जरूरी पहलू पर बात करना जरूरी है। यह खालिस्तानी आतंकवादियों की एक रणनीति थी और यह नहीं कहा जा सकता कि पूरे सिख समुदाय का भी यही मकसद था। आतंकवादी हमलों में खुद सिख भी मारे गए, जिनमें उदारवादी, नेता, पुलिसकर्मी और उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग शामिल थे।

हरचंद सिंह लोंगोवाल जिन्होंने जुलाई 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, की अगस्त में शांति प्रयासों के विरोधी आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। हिंदू विरोधी हत्याओं का अस्तित्व ऐतिहासिक रूप से सच है। ठीक उसी तरह, यह भी एक हकीकत है कि आतंकवादियों ने उन सिखों को भी निशाना बनाया जो उनके खिलाफ खड़े हुए थे। किसी भी ईमानदार इतिहास में इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ रखना होगा।

जब बसें और ट्रेनें बन गईं मौत का मैदान

ढिलवाँ, अक्टूबर 1983: ढिलवाँ की घटना इसलिए अहम नहीं है क्योंकि यह शुरुआती दौर की थी, बल्कि इसलिए क्योंकि इसने एक ऐसा खाका तैयार कर दिया जो सालों तक दोहराया गया। बस रोकी गई, पहचान पूछी गई और हिंदू यात्रियों को अलग करके गोली मार दी गई। लोगों के जेहन में छपी यह याद बेहद गहरी थी। इसने तय कर दिया कि परिवहन के रास्तों को सांप्रदायिक बँटवारे और मौत के मैदान में बदला जा सकता है।

कपूरथला, नवंबर 1983: कपूरथला जिले में नवंबर में हुई हत्याओं ने दिखाया कि ढिलवाँ की घटना कोई इकलौती घटना नहीं थी। एक और बस को रोकने के बाद चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई। लोगों के मन में इस दोहराव ने इस तरीके को एक नया अर्थ दे दिया: जो अक्टूबर में एक अनहोनी घटना लग रही थी, वह अब एक सोची-समझी रणनीति बनती दिख रही थी।

मुक्तसर, 25 जुलाई 1986: जब हमलावरों ने मुक्तसर के पास हमला किया, तब तक यह तरीका बेहद क्रूर और सुनियोजित हो चुका था। ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के नुताबिक, खालिस्तानी आतंकवादी बस में चढ़े और उन्होंने महिलाओं, बच्चों और सिख यात्रियों (जिनकी पहचान उनकी पगड़ी और दाढ़ी से थी) को नीचे उतरने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने बचे हुए लोगों पर गोलियाँ चला दीं।

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मरने वालों में से कम से कम 14 लोगों के हिंदू होने का अंदेशा था और एक बिना दाढ़ी-मूँछ वाले सिख की भी मौत इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें गलती से हिंदू समझ लिया गया था। इस एक छोटी सी बात से हमले की पूरी सांप्रदायिक सोच उजागर हो जाती है। आपकी धार्मिक पहचान ही आपके जिंदा बचने का पैमाना बन चुकी थी।

होशियारपुर या खुड्डा, 30 नवंबर 1986: चार महीने बाद इस उग्रवाद के दौर का सबसे भयावह बस हत्याकांड हुआ। होशियारपुर जिले के खुड्डा के पास खालिस्तानी आतंकवादियों ने एक सरकारी बस से हिंदू यात्रियों को नीचे उतरने का हुक्म दिया और उतरते समय उन पर गोलियाँ बरसा दीं।

पुलिस के बयानों के आधार पर ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना में 24 लोग मारे गए और सात घायल हुए। रिपोर्ट में इसे उस साल पंजाब में हुई सबसे बड़ी आतंकवादी घटना बताया गया और इसे सीधे मुक्तसर हमले से जोड़ा गया, जिसमें कहा गया कि दोनों का मकसद सिखों और हिंदुओं को बाँटना था।

लालरू, 6 जुलाई 1987: लालरू अपनी क्रूरता और बड़े पैमाने पर हुई हत्याओं के कारण बेहद कुख्यात हुआ। बस को सिर्फ रोककर गोलियों की बौछार ही नहीं की गई थी। ‘द वाशिंगटन पोस्ट‘ और बाद में बचे हुए लोगों के बयानों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने गाड़ी का पीछा किया, उस पर कब्जा कर लिया, उसे हाईवे से दूर ले गए, यात्रियों को लूटा, पुलिस प्रमुख जूलियो रिबेरो का मजाक उड़ाया और फिर बस के दोनों छोरों से करीब पाँच मिनट तक गोलियाँ बरसाईं। मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

मौके पर छोड़े गए एक नोट में कथित तौर पर धमकी दी गई थी कि राज्य द्वारा मारे गए हर सिख युवक के बदले सौ हिंदुओं को मारा जाएगा। यह नरसंहार न केवल सांप्रदायिक था, बल्कि इसे एक खौफनाक संदेश और चेतावनी के रूप में फैलाने के लिए अंजाम दिया गया था।

फतेहाबाद, 7 जुलाई 1987: एक दिन बाद यह हिंसा हरियाणा की सीमा में दाखिल हो गई लेकिन यह पंजाब के उग्रवाद से ही जुड़ी थी। फतेहाबाद के पास दो बसों पर हमला किया गया; जिसमें 34 हिंदू यात्रियों की मौत हो गई और 18 घायल हो गए। बाद की रिपोर्टों में इस हमले के तरीकों को लालरू से मिलता-जुलता बताया गया, जिसमें बस को रोकने के लिए दूसरी गाड़ी का इस्तेमाल, लूटपाट, चीनी ऑटोमैटिक राइफलें और पंजाब सीमा की तरफ भागने का रास्ता शामिल था। लालरू और फतेहाबाद ने मिलकर दिखाया कि आतंक की लहरें एक के बाद एक उठ रही थीं, जहाँ एक सदमे से लोग उबर भी नहीं पाते थे कि दूसरा नरसंहार सामने खड़ा होता था।

लुधियाना जिला, 15 जून 1991: लुधियाना जिले में दो यात्री ट्रेनों पर हुए हमलों ने इस परिवहन आतंक को और भी बड़े पैमाने पर पहुँचा दिया। मरने वालों की सही संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं; उस समय की रिपोर्टों में मरने वालों की संख्या कम से कम 80 बताई गई थी, जबकि बाद के आँकड़ों में यह संख्या 100 से ऊपर पहुँच गई। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि उग्रवादियों ने इमरजेंसी चेन खींचकर ट्रेनों को रोका और चुनावी हिंसा के बीच डिब्बों के अंदर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं।

जून 1991 के हमलों में मारे गए हर शख्स को शायद एक ही तरह से चुनकर निशाना नहीं बनाया गया था, इसलिए इसके सांप्रदायिक पहलू को बेहद सावधानी से समझने की जरूरत है। लेकिन यह नरसंहार साफ तौर पर इस बात का हिस्सा है कि कैसे पंजाब में रेल यात्रा को आम नागरिकों के कत्लेआम की जगह में बदल दिया गया था।

सोहियाँ, 26 दिसंबर 1991: सोहियाँ के पास दिसंबर में हुआ नरसंहार और भी अधिक चुनिंदा था। आतंकवादियों ने लुधियाना से फिरोजपुर जा रही एक लोकल ट्रेन पर कब्जा कर लिया, सोहियाँ के पास इमरजेंसी चेन खींची और फिर 50 से अधिक उन यात्रियों को गोली मार दी जो हिंदू जैसे दिख रहे थे।

बाजार, ईंट-भट्टे और कारखाने में भी कल्तेआम

सार्वजनिक परिवहन भले ही इन हत्याओं का सबसे बड़ा जरिया था, लेकिन यह अकेला नहीं था। 29 मार्च 1986 को आतंकवादियों ने जालंधर के पास मल्लियाँ में करीब 20 मजदूरों की हत्या कर दी।

25 जून 1989 के मोगा हत्याकांड ने दिखाया कि निशाना किसी एक जगह पर इकट्ठा हुए हिंदू भी हो सकते हैं। आतंकवादियों ने नेहरू पार्क में आरएसएस की सुबह की शाखा पर एक वैन से अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया कि कम से कम 24 लोग मारे गए; बाद के आँकड़ों और मोगा जिला मेमोरियल पेज के अनुसार मरने वालों की संख्या 25 या 26 थी, जिसमें गोलीबारी के बाद हुए बम धमाकों में भी कई लोगों की मौत हुई थी। बूटा सिंह ने इसे सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने की एक गंभीर साजिश बताया था। शहीदी पार्क में बना आधिकारिक स्मारक आज भी स्थानीय लोगों की यादों में इस घटना को जिंदा रखे हुए है, लेकिन देश की बड़ी यादों में ये आँकड़े सिर्फ बनकर रह गए हैं।

7 मार्च 1990 को अबोहर में इस आतंक को एक शहर के व्यावसायिक केंद्र के भीतर लाया गया। बंदूकधारियों ने एक भीड़भाड़ वाले बाजार में गोलियाँ चलाईं और 22 हिंदुओं की जान ले ली। आम नागरिकों से भरे बाजार को इसलिए चुना गया क्योंकि ऐसी जगह डर को कई गुना बढ़ा देती है। एक बाजार युद्ध के मैदान का बिल्कुल उल्टा होता है; और आतंकवादियों ने ठीक इसी वजह से उसे चुना।

यह हिंसा पंजाब से बाहर भी फैली। उत्तर प्रदेश के रुद्रपुर में 17 अक्टूबर 1991 को रामलीला उत्सव के दौरान दो बम धमाके हुए, पहला धमाका मेला मैदान में और दूसरा उस अस्पताल के पास हुआ, जहाँ घायलों को ले जाया जा रहा था। इस घटना में 40 से अधिक लोगों की मौत और करीब 140 लोगों के घायल होने की खबर थी। बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि खालिस्तानी समूहों ने इसकी जिम्मेदारी ली थी। रुद्रपुर की यह घटना इसलिए मायने रखती है क्योंकि यह दर्शाती है कि वही उग्रवादी नेटवर्क पंजाब की सीमाओं के बाहर भी सांप्रदायिक भय पैदा करने की रणनीति के तहत हिंदू नागरिकों को निशाना बना सकता था।

इसके बाद 11 मार्च 1992 को हरकिशनपुरा की घटना हुई। रिपोर्टों के अनुसार, उग्रवादियों द्वारा 16 हिंदू मजदूरों की हत्या कर दी गई थी। ये पीड़ित एक फैक्ट्री के कर्मचारी थे और आतंकवादी कथित तौर पर पुलिस की वर्दी में आए थे, जबकि कुछ रिपोर्टों में इस हमले को उग्रवादियों के बंद के आदेश की नाफरमानी से जोड़ा गया। काम पर लगे पुरुषों को एक कारखाने के भीतर ही मार दिया गया क्योंकि वे उसी नागरिक समूह का हिस्सा थे जिसे उग्रवाद ने बार-बार निशाना बनाया था।

पीड़ित सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि राहगीर, मजदूर और परिवार थे

इन नरसंहारों में मारे गए लोग केवल कागजी आँकड़ों में ‘यात्री’ या ‘नागरिक’ नहीं थे। वे बसों में बच्चों को गोद में लिए महिलाएँ थीं, मंदिरों की ओर जाते पुरुष थे, भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर थे, सुबह की शाखाओं में हिस्सा लेने वाले स्वयंसेवक थे, बाजार जाने वाले लोग, फैक्ट्री कर्मचारी, प्रवासी और दफ्तर जाने वाले लोग थे। अकेले लालरू में महिलाओं और बच्चों को मारा गया; मुक्तसर में कुछ महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया जबकि पुरुषों को मार डाला गया, जो अपने आप में दिखाता है कि कैसे आतंकवादियों ने अपने खौफनाक प्रभाव के लिए इस आतंक का पूरा खाका तैयार किया था। इसे इस तरह अंजाम दिया गया ताकि जीवित बचे लोग इसे देखें, याद रखें और दूसरों को सुनाएँ।

कई हमलों से यह भी पता चलता है कि कैसे बाहरी धार्मिक पहचान ही जिंदगी और मौत का फैसला करने लगी थी। मुक्तसर में अपनी पगड़ी और दाढ़ी से पहचाने जाने वाले सिख यात्रियों को बस से उतरने को कहा गया, जबकि एक बिना दाढ़ी-मूँछ वाले सिख की मौत सिर्फ इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें हिंदू समझ लिया गया था। सोहियाँ में यात्रियों को कथित तौर पर इसलिए गोली मार दी गई क्योंकि वे हिंदू ‘दिख’ रहे थे। इसलिए यह हिंसा केवल शरीरों पर नहीं थी; यह एक मिले-जुले समाज में धार्मिक पहचान की सामाजिक पहचान पर हमला था। हमलावर का सवाल यह नहीं था कि किसने क्या किया, बल्कि यह था कि कौन कैसा दिखता है।

यही वजह है कि इन नरसंहारों को सरकार और आतंकवादियों के बीच की लड़ाई में केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण ‘अप्रत्यक्ष नुकसान’ (कोलैटरल डैमेज) कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बार-बार अपनाया गया यह तरीका कुछ और ही बयाँ करता है। गाड़ियों को रोका गया। यात्रियों से पूछताछ की गई। धार्मिक पहचान जाँची गई। कुछ को छोड़ दिया गया और दूसरों को गोली मार दी गई। मोगा और रुद्रपुर की तरह कभी-कभी आतंक को बढ़ाने या बचाने वालों को मारने के लिए बमों का इस्तेमाल भी किया गया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के जितना करीब जाएँगे, इस सांप्रदायिक साजिश से इनकार करना उतना ही मुश्किल हो जाएगा।

साजिश पूरी तरह सफल नहीं हुई, पर यादें धुँधली पड़ गईं

उग्रवादी केवल हत्याओं से बढ़कर कुछ चाहते थे। वे एक बड़ा बिखराव चाहते थे। एक ऐसा पंजाब जहाँ हिंदुओं और सिखों का आम जीवन कभी सामान्य न रह सके और एक ऐसा भारत जहाँ हर अत्याचार देश के किसी दूसरे हिस्से में एक और जवाबी हिंसा को जन्म दे। कुछ पल ऐसे भी आए जब वे इसके बेहद करीब पहुँच गए थे।

मुक्तसर हत्याकांड के बाद पश्चिमी दिल्ली में हिंदू-सिख दंगे भड़क उठे और होशियारपुर हत्याकांड के बाद भी जवाबी हमलों का डर पैदा हो गया। लेकिन यह साजिश कभी पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। कई सिखों ने इस अलगाववादी अभियान को सिरे से खारिज कर दिया और कईयों ने इसके लिए अपनी जान भी गँवाई। लोंगोवाल की हत्या इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, लेकिन वे अकेले नहीं थे।

यह कहना कि खालिस्तानी आतंकवादियों ने हिंदू नागरिकों के नरसंहार की योजना बनाई, सिखों पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि अपराधियों की सही पहचान करना है। असल में इतिहास खुद इस अंतर की माँग करता है, क्योंकि उग्रवाद ने उन सिख राजनेताओं, सिख पुलिसकर्मियों, सिख विरोधियों और सिख नागरिकों को भी मारा जो उनकी बात नहीं मान रहे थे। जिन लोगों ने बसों और ट्रेनों को रोका, वे एक ऐसा बँटवारा पैदा करने की कोशिश कर रहे थे जिसका पंजाब की सामाजिक जिंदगी ने हमेशा विरोध किया था।

इसके बाद जो हुआ वह एक शांत अन्याय की तरह है। मोगा जैसी कुछ जगहों पर आज भी स्मारक बने हुए हैं। लेकिन ज्यादातर घटनाएँ केवल जगहों के नाम और हताहतों की संख्या के रूप में ही लोगों के जेहन में बची हैं। कई पीड़ितों के नाम ढूँढ पाना उन उग्रवादियों की जीवनी तलाशने से ज्यादा मुश्किल है जिन्होंने उन्हें मारा था। जहाँ दस्तावेज मौजूद भी हैं, वे बिखरे हुए हैं। कहीं अखबार की कोई कतरन है, कहीं जिला स्मारक है, तो कहीं कोई पुरानी तारीख। नतीजा यह है कि मारे गए लोग आँकड़ों में तो दर्ज हैं, लेकिन इंसानी शक्ल में उनकी यादें गायब हो चुकी हैं।

इसलिए ध्यान फिर से उसी लालरू की बस, मुक्तसर की बस, होशियारपुर के पास की बस, लुधियाना जिले में रोकी गई ट्रेनों, अबोहर के बाजार और मोगा की उस सभा पर जाता है। वहाँ मौजूद लोग कोई लड़ाके नहीं थे। वे वर्दी पहने सैनिक नहीं थे, न ही थाने पर हमला करने वाले लोग थे और न ही किसी गुटीय रंजिश में हथियार उठाए प्रतिद्वंद्वी थे। वे बस यात्रा कर रहे थे, काम कर रहे थे, खरीदारी कर रहे थे, कसरत कर रहे थे और अपने घरों को लौट रहे थे। उन पलों में केवल उनकी हिंदू पहचान ही उनके खिलाफ एकमात्र गुनाह बन गई। पंजाब उग्रवाद का कोई भी सच्चा इतिहास इसे कभी छोड़ नहीं सकता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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