Homeराजनीतिसोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने कराया भर्ती, क्या इरोम शर्मिला...

सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने कराया भर्ती, क्या इरोम शर्मिला की तरह ही होगा इस खेल का अंत?

वांगचुक के दिखावे ने उस मामले को और उलझा दिया है, जिसे सरकार और छात्रों के बीच बिना किसी राजनीतिक रंग दिए शांति से सुलझाया जाना चाहिए था।

जंतर-मंतर पर भूख-हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है। दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने हाई कोर्ट के आदेश पर ऐसा किया। हालाँकि सोनम वांगचुक की पत्नी ने दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल में न सिर्फ भर्ती कराने का विरोध किया, बल्कि उनकी अनुमति के बिना किसी तरह की दवाई-भोजन देने का भी विरोध किया।

यहाँ ये बताना अहम है कि जंतर-मंतर पर पिछले काफी दिनों से एक राजनीतिक तमाशा चल रहा है, जिसे युवाओं के विरोध प्रदर्शन के नाम पर पेश किया जा रहा है। अभिजीत दीपके द्वारा स्थापित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही है। दावा किया जा रहा है कि यह आंदोलन भारतीय छात्रों के भविष्य की रक्षा करने और पेपर लीक सहित शिक्षा व्यवस्था में हुई कई चूकों को लेकर केंद्र सरकार से जवाबदेही तय कराने के लिए किया जा रहा है।

हालाँकि इस पूरे प्रदर्शन का केंद्र मुख्य रूप से सोनम वांगचुक हैं, जो उपरोक्त माँगों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे। वह 28 जून से केवल पानी पीकर अनशन कर रहे थे, हालाँकि शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस हाई कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें जबरन अस्पताल ले गई।

इसलिए आमतौर पर इस तरह के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले समूहों में शामिल CJP, जिसे आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ा बताया जाता है, अन्य विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके सामने मोदी सरकार को खलनायक के रूप में दिखाया जा सके।

हालाँकि इन सभी ने जानबूझकर एक अहम सवाल को नजरअंदाज किया है। वह कौन-से रचनात्मक समाधान, वैकल्पिक प्रस्ताव या व्यवहारिक आलोचना पेश कर रहे हैं? यह सच है कि सरकार की कमियों, खासकर देश के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर, उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। लेकिन ये चुनौतियाँ न तो नई हैं और न ही अभूतपूर्व।

यह एक व्यवस्थागत समस्या है, जिसके लिए गहन और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें राजनीतिक नाटकबाजी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और छात्रों पर बिना किसी स्वार्थ या छिपे उद्देश्य के वास्तविक ध्यान दिया जाना चाहिए। हालाँकि यह बात वांगचुक पर लागू होती हुई नहीं दिखती, क्योंकि उनका अतीत भी काफी विवादास्पद रहा है।

छात्रों की समस्याओं से निपटने के लिए उनकी कार्ययोजना क्या है या वे वास्तव में उनके समाधान में क्या योगदान दे सकते हैं, इस पर स्पष्टता माँगने के बजाय उनकी झूठी महिमा गढ़ने का एक सुनियोजित प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

दिवंगत कॉन्ग्रेस विधायक के पुत्र वांगचुक को हाल ही में राजकुमार हिरानी की फिल्म 3 इडियट्स के किरदार फुंसुख वांगडू का वास्तविक जीवन का रूप बताया गया, जबकि स्वयं उन्होंने पहले इस दावे से इनकार किया था। इसके अलावा फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी और आमिर खान, जिन्होंने फिल्म में यह भूमिका निभाई थी, दोनों ने भी स्पष्ट किया था कि उनकी फिल्म सोनम वांगचुक के जीवन से प्रेरित नहीं थी।

जब वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच जल उठा लेह

छात्रों से जुड़ी गंभीर समस्याओं को मजाक, राजनीतिक दिखावे और एक स्पष्ट प्रहसन तक सीमित कर दिया गया है। हालाँकि यह वांगचुक के मामले में कोई नई बात नहीं लगती, क्योंकि वह पहले भी इसी तरह के तरीके अपना चुके हैं। पिछले साल सितंबर में उन्होंने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और उसे भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग को लेकर लेह में भूख हड़ताल शुरू की थी।

हालाँकि इसके बाद भड़के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान स्थानीय भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यालय में आग लगा दी गई, चार लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार करना पड़ा।

उस समय लद्दाख के पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे एसडी सिंह जमवाल ने कहा था, “हाल ही में हमने पाकिस्तान के एक पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑपरेटिव को गिरफ्तार किया था, जो पाकिस्तान को सूचनाएँ भेज रहा था। इसका रिकॉर्ड हमारे पास है। वांगचुक पाकिस्तान में डॉन के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वह बांग्लादेश भी गए थे। इसलिए उन पर एक बड़ा सवालिया निशान है। मामले की जाँच की जा रही है।”

उन्होंने कहा कि वांगचुक के विरोध मंच ने ऐसा माहौल बनाया, जिसने हिंसा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं और यह सब पहले से योजनाबद्ध तथा समन्वित था। उन्होंने आगे कहा, “वांगचुक का लोगों को भड़काने का इतिहास रहा है। उन्होंने अरब स्प्रिंग, नेपाल और बांग्लादेश का उल्लेख किया है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर उनकी फंडिंग की जांच चल रही है।”

लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था, “हिरासत के आधारों में उल्लेखित अनुसार वांगचुक राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और समुदाय के लिए आवश्यक सेवाओं के प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल थे। मैं उनकी हिरासत से संतुष्ट था और अब भी संतुष्ट हूँ।”

गृह मंत्रालय ने भी कहा था कि साथी नेताओं की ओर से बार-बार अपील किए जाने के बावजूद वांगचुक ने अपना अनशन जारी रखा, जैसा कि वह इस समय भी कर रहे हैं। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने “अरब स्प्रिंग और नेपाल में जनरेशन Z के प्रदर्शनों जैसे भड़काऊ संदर्भ देकर जनता को गुमराह किया।”

आखिरकार मार्च में वांगचुक को 170 दिन बाद जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। उनकी ये गतिविधियाँ उनके एजेंडे की स्पष्ट झलक पेश करती हैं और यह भी संकेत देती हैं कि आगे क्या हो सकता है।

सोनम वांगचुक से पहले थीं इरोम शर्मिला

जहाँ सोनम वांगचुक के समर्थक उन्हें गलती से फिल्मों के काल्पनिक किरदारों और यहाँ तक कि अन्ना हजारे के अनशन से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं भारत में एक ऐसी शख्सियत पहले भी रही है जिसने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए 16 वर्षों तक इसी तरह का तरीका अपनाया था। उनका नाम इरोम शर्मिला चानू है और वह मणिपुर से हैं।

5 नवंबर 2000 को मलोम में असम राइफल्स ने एक बस स्टॉप पर 10 नागरिकों को गोली मार दी थी। इससे पहले हमलावरों ने पास से गुजर रहे अर्धसैनिक बल के काफिले पर बम हमला किया था। इस घटना के बाद इरोम शर्मिला ने इसे आधार बनाकर एक ऐसा आंदोलन शुरू किया, जो 16 वर्षों तक चला।

उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह कानून उस संवेदनशील राज्य में लागू था, जो दशकों से हिंसक उग्रवाद से जूझ रहा था और जिसका असर आम नागरिकों के साथ-साथ सुरक्षा बलों पर भी पड़ा था।

उनका उद्देश्य केंद्र सरकार पर इस कानून को वापस लेने का दबाव बनाना था, जबकि ऐसे क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए इस कानून को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) – दोनों सरकारों ने उनकी इस रणनीति को स्वीकार नहीं किया।

उनका मानना था कि ऐसा करने से क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता था, साथ ही सीमा पार आतंकवाद और जातीय तनाव बढ़ने की आशंका भी थी। बेशक कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक बिना भोजन के जीवित नहीं रह सकता। इसलिए इरोम शर्मिला को भोजन देने के लिए उनकी नाक में नासोगैस्ट्रिक ट्यूब डाली गई।

दिलचस्प बात यह है कि इस ट्यूब को व्यक्ति स्वयं भी निकाल सकता है, लेकिन यह कहानी बनाई गई कि सरकार उन्हें ‘जबरन खाना खिला रही है’, ताकि उनके आंदोलन को अधिक महत्व दिया जा सके। बेशक मामला इतना आगे नहीं बढ़ता, लेकिन इरोम ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे का इस्तेमाल अपनी सार्वजनिक छवि बनाने के लिए किया।

बाद में उन्होंने इसी छवि के आधार पर राजनीति में कदम रखा, हालाँकि उनका राजनीतिक सफर सफल नहीं रहा। इस दौरान भारत विरोधी वैश्विक ताकतों को भी भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का अवसर मिला। यह उल्लेखनीय है कि विशेष कानून और प्रावधान किसी क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए लागू किए जाते हैं।

समय के साथ जब हालात बदले, तो मोदी सरकार के दौरान इन विशेष कानूनों को भी धीरे-धीरे हटाया गया। बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और उग्रवाद की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आने के कारण पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में AFSPA का दायरा काफी घटाया गया।

त्रिपुरा और मेघालय से इसे पूरी तरह हटा दिया गया, जबकि असम, नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इसे केवल कुछ जिलों और पुलिस थाना क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया। हालाँकि तथ्यों से काफी दूर इरोम शर्मिला का यह प्रदर्शनकारी आंदोलन जारी रहा और वह लगातार भारतीय राज्य पर अपनी माँगें मानने का दबाव बनाती रहीं।

लेकिन हर दिखावा एक न एक दिन खत्म होता है और उनके मामले में भी ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया और राजनीति में कदम रखा।

उन्होंने ‘पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस’ (PRJA) नामक पार्टी बनाई और 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में थौबल सीट से चुनाव लड़ा, जहाँ उनका मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह से था। ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से प्रसिद्ध 54 वर्षीय इरोम शर्मिला को चुनाव में केवल 90 वोट मिले।

मार्च 2017 में विधायक बनने का उनका सपना बुरी तरह टूट गया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि यदि वह सफल नहीं हुईं तो 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि वह ‘इस राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुकी हैं’ और सक्रिय राजनीति छोड़ दी।

वर्तमान में उनकी शादी एक ब्रिटिश नागरिक से हो चुकी है और वह अपने पति और जुड़वा बेटियों के साथ बेंगलुरु में शांत जीवन बिता रही हैं।

क्या सोनम वांगचुक का अनशन भी इरोम शर्मिला की राह पर?

इरोम शर्मिला की प्रासंगिक बने रहने की कोशिश अंततः उनके असफल राजनीतिक करियर की कठोर सच्चाई पर जाकर समाप्त हुई। अब ऐसा प्रतीत होता है कि सोनम वांगचुक भी लगातार सुर्खियों में बने रहने की इसी राह पर चल रहे हैं।

यदि ऐसा नहीं होता, तो वह रचनात्मक संवाद शुरू करते या कम से कम छात्रों द्वारा उठाई गई समस्याओं के समाधान के लिए कोई सकारात्मक दिशा प्रस्तुत करते। लेकिन उन्होंने CJP का साथ चुना और छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया, जिससे विवाद पैदा हुआ और वास्तव में प्रभावित छात्रों के मुद्दों से ध्यान हटकर उन पर केंद्रित हो गया।

वांगचुक की इस नाटकीय शैली ने उस मामले को और उलझा दिया है, जो सरकार और छात्रों के बीच बातचीत से बिना किसी राजनीतिक रंग के सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन अब यह पूरा मुद्दा एक व्यक्ति और उसकी गतिविधियों तक सिमटकर रह गया है।

वहीं इस प्रदर्शन की गंभीरता पर भी सवाल उठे, जब CJP के नेता, जिनमें अभिजीत दीपके भी शामिल हैं, वांगचुक के अनशन के दौरान उनके साथ रहते हुए पकौड़े, कचौड़ी और अन्य नाश्ते का आनंद लेते हुए दिखाई दिए थे। हालाँकि सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा अस्पताल लिए जाने के बाद अभिजीत दीपके ने भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

सोनम वांगचुक अस्पताल में भर्ती, CJP ने ‘अपहरण’ और अज्ञात स्थान पर ले जाने का किया दावा, अभिजीत दिपके ने हिरासत को लेकर लगाए...

सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के बाद विवाद बढ़ा। सीजेपी के दावों, पुलिस कार्रवाई और 20 जुलाई के संसद मार्च को लेकर सियासत तेज।

‘वंदे मातरम’ का अपमान किया तो होगी 3 साल की जेल… मुस्लिमों के दबाव में नेहरू ने जिस राष्ट्रीय गीत का किया ‘अपमान’, उसे...

साल 1937 में नेहरू की नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने सार्वजनिक प्रोग्राम में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाने का फैसला किया था।
- विज्ञापन -