सावन के पवित्र महीने में काँवड़ यात्रा का समापन हो चुका है। लाखों शिवभक्तों ने कठिन रास्तों को पार करते हुए अपनी आस्था की डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। लेकिन इस पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरा पहलू भी देखने को मिला, जो बेहद चिंताजनक था। कुछ कट्टरपंथी ताकतों, वामपंथी विचारकों और पक्षपाती मीडिया ने मिलकर काँवड़ यात्रा और काँवड़ियों को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
कहीं काँवड़ियों पर कातिलाना हमले हुए, तो कहीं सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाकर उन्हें उपद्रवी साबित करने की कोशिश की गई। इसमें हम जानेंगे कि कैसे इस साल की काँवड़ यात्रा पर सुनियोजित तरीके से हिंदू आस्था के खिलाफ भ्रम और नफरत फैलाई गई।
काँवड़ियों और हिंदुओं पर शारीरिक हमले: ग्वालियर से लखीमपुर तक हिंसा
काँवड़ यात्रा के दौरान देश के कई हिस्सों में शिवभक्तों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रात के उस समय भयानक तनाव फैल गया, जब काँवड़ यात्रा में शामिल होने जा रहे कुछ युवकों पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों ने हमला कर दिया। कार से टक्कर लगने को लेकर उपजा विवाद पल भर में हिंसक झड़प में बदल गया।
मुस्लिम हमलावरों ने तलवारों, हथौड़ों और पत्थरों से काँवड़ियों पर हमला किया। इस बर्बर हमले में विवेक यादव नाम का युवक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके सिर में 18 टांके लगाने पड़े। घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने थाने के बाहर विरोध किया और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में अरशद खान, गोलू खान, अकील खान और बंटू खान समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज की।
इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना खीरी क्षेत्र में भी काँवड़ियों के जत्थे पर पथराव किया गया। रुखिया गाँव से करीब 40-50 काँवड़िये नहर के पास स्थित मंदिर से जल लेकर जा रहे थे। जब उनका जत्था जुलाहनपुरवा के पास पहुँचा, तो अचानक उन पर पथराव शुरू हो गया, जिससे सड़क पर भगदड़ मच गई।
इस हमले में राजापुर के रहने वाले काँवड़िया विकास के सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति संभाली और जाँच में जुटी। हालाँकि पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग का हाथ बताया, लेकिन इस तरह की घटनाएँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने और हिंदुओं को निशाना बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे थे।
मीडिया और सोशल मीडिया का गंदा खेल: मेरठ की घटना पर फैलाया गया सफेद झूठ
सावन के महीने में वामपंथियों और कट्टरपंथियों की आँखों में काँवड़िए हमेशा से खटकते रहे हैं। वे हरसंभव तरीके से इनकी छवि को धूमिल करने की फिराक में रहते हैं। ऐसा ही एक घिनौना प्रयास मेरठ की घटना को लेकर किया गया। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल किया गया, जिसमें दावा किया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है, उनकी वर्दी फाड़ी है और उन्हें पीटकर भगा दिया है।
इस फर्जी नैरेटिव को फैलाने में कई जाने-माने सोशल मीडिया हैंडल और तथाकथित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘मुस्लिम वॉयस सेल’ के ट्वीट से लेकर पीयूष राय, सचिन गुप्ता और जाकिर त्यागी जैसे लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया। यहाँ तक कि चर्चित फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने भी इस भ्रामक दावे को रिपोस्ट किया।
जब इस मामले में मेरठ पुलिस का आधिकारिक बयान सामने आया, तो पूरा सच जनता के सामने आ गया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल वीडियो के दावे पूरी तरह झूठे हैं। असलियत यह थी कि 3 अगस्त की रात जब दो अलग-अलग काँवड़ियों के ग्रुप आमने-सामने आए, तो सोनू और गुड्डू नाम के युवकों का दूसरे काँवड़ियों से टकराव हो गया। दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ दिखाई और उन दोनों को अपनी जीप में बैठाकर सुरक्षित करने की कोशिश की।
तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर उन्हीं लोगों को गाड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। पुलिस के साथ कोई मारपीट नहीं हुई थी और न ही किसी की वर्दी फाड़ी गई थी। इसके बावजूद, मेनस्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों ने भी बिना पुलिस का पक्ष जाने ‘पुलिसकर्मियों की पिटाई’ की हेडलाइन के साथ सनसनीखेज खबरें चला दीं, जिससे साबित होता है कि मीडिया का एक वर्ग किस हद तक काँवड़ियों के खिलाफ पूर्वाग्रही है।
मुख्यधारा की मीडिया और वामपंथियों का एजेंडा: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर तुष्टिकरण का रोना
सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबारों ने भी काँवड़ यात्रा के खिलाफ अपने संपादकीय के जरिए वैचारिक जहर उगला। ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक लेख (शीर्षक: The problem isn’t the kanwar yatra. It’s a patronising state) में काँवड़ यात्रा और इसके भक्तों पर गंभीर कटाक्ष किए गए। इस लेख में तर्क दिया गया कि राज्य सरकारों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना, उन पर फूलों की वर्षा करना (जैसे प्रयागराज में आईजी और डीएम द्वारा किया गया) या यात्रा मार्ग पर गैर-वेज की दुकानों पर रोक लगाना और दुकानदारों के नाम लिखने के आदेश देना धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि सरकारें भक्तों का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं और उनकी तुलना जिन्ना या सावरकर की राजनीति से कर डाली। यह नजरिया पूरी तरह से दोहरे मापदंड को दिखाता है। जब अन्य मजहबों के आयोजनों या जुलूसों में प्रशासनिक व्यवस्थाएँ की जाती हैं, तब यही वर्ग मौन रहता है, लेकिन जब हिंदू युवा अपनी आस्था के साथ सड़कों पर निकलते हैं, तो उन्हें ‘असुविधा’ या ‘भीड़ का डर’ कहकर प्रोजेक्ट किया जाने लगता है।
सरकार के अधिकारियों द्वारा काँवड़ियों का स्वागत करना या उनके रास्ते की व्यवस्था संभालना एक जन कल्याणकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे वामपंथी विचारक हमेशा ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहिष्कार’ और ‘तुष्टिकरण’ का रंग देने की कोशिश करते हैं। यह सब इस बात का प्रमाण है कि एक खास वैचारिक वर्ग हिंदू आस्था को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाना चाहता है।
नफरती बयानों और सोशल मीडिया का जहर
काँवड़ यात्रा को बदनाम करने में मजहबी कट्टरपंथियों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने मर्यादा की सभी हदें पार करते हुए काँवड़ यात्रा पर जाने वाले शिवभक्तों को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी’ और नशेड़ी करार दिया। मौलाना साजिद ने अपनी नफरत भरी जुबान से आरोप लगाया कि काँवड़िए सड़कों पर नंगा नाच करते हैं, शराब पीते हैं, एंबुलेंस को रोकते हैं, स्कूल वैन के शीशे तोड़ते हैं और पुलिसवालों को पीटते हैं।
मौलाना साजिद ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अभद्र तंज कसे और काँवड़ यात्रा को रोकने की माँग की। एक तरफ जहाँ मौलाना जैसे लोग हिंदुओं की आस्था को कुचलने वाले बयान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर यह दुष्प्रचार किया गया कि काँवड़िए शिवजी का मूल मंत्र छोड़कर मनमाने नारे लगाते हैं।
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो#ढंग_की_पूजा_करो
— Narender Negi (दास ) (@NegiNarend98292) August 10, 2026
कांवड़ यात्रियों को अक्सर बम-बम बोलते हुए देखा जा सकता है यानी उन्होंने शिव जी का मूल मन्त्र छोड़ मनमाना मंत्र प्रारंभ कर दिया; जिसका न गीता में वर्णन है और न वेद में। pic.twitter.com/vEoZjJ0CTC
हद तो तब हो गई जब मुफ्ती शाहनवाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर खुलेआम जहर उगला। उसने कहा, “हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम की मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।”
कांवड़ियों को पानी पिलाना हराम है : मुफ्ती शाहनवाज
— Vipin patel 🚩 (@VVipinpatel) August 12, 2026
हमारे इस्लाम में किसी गैर मुस्लिम का मदद करना, पानी पिलाना या खाना खिलाना हराम है।
यह वीडियो उन हिंदुओं तक पहुंच जाना चाहिए जो इन कट्टरपंथी मुस्लिमों को अपना भाई मानते हैं। pic.twitter.com/jsewwGMjCg
यह बयान इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि कट्टरपंथी किस तरह समाज में नफरत की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं। एक तरफ जहाँ हिंदू समाज सहृदयता और सेवा भाव का परिचय देता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे कट्टरपंथी उपदेश देकर दो समुदायों के बीच नफरत का जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन तमाम बयानों और पोस्टों का मकसद सिर्फ और सिर्फ काँवड़ यात्रा को सांप्रदायिक रंग देना और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाना था।
हिंदू त्योहारों पर सुनियोजित तरीके से होता हमला…
इस वर्ष (2026) की काँवड़ यात्रा को लेकर भारत में सनातन धर्म और उसके प्रतीकों को बदनाम करने के लिए किस प्रकार एक सुनियोजित इकोसिस्टम काम कर रहा है। एक तरफ जहाँ भोले-भाले शिवभक्त अपनी कठिन यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी, वामपंथी विचारक, और कुछ बिकाऊ मीडिया संस्थान मिलकर उन पर हमले करवा रहे थे और दूसरी तरफ फर्जी वीडियो के जरिए उन्हें ही उपद्रवी साबित करने में जुटे थे।
मुहर्रम या अन्य जुलूसों के दौरान खुलेआम निकलने वाले हथियारों और हिंसक प्रदर्शनों पर आँखें मूंद लेने वाले लोग, काँवड़ियों के हाथों में एक छोटी सी लाठी या डंडे को भी बहुत बड़ा मुद्दा बना देते हैं। सरकार के कल्याणकारी कार्यों और जनता की आस्था को कुचलने का यह कुचक्र हमेशा से चलता आ रहा है। सनातन धर्म और हिंदू त्योहारों से नफरत करने वाले कट्टरपंथी और वामपंथी ऐसे समय में सुनियोजित तरीके से हमला करते हैं।


