15 अगस्त 2026 को तालिबान के काबुल पर कब्जे के पाँच साल पूरे हो गए। इन पाँच वर्षों में जहाँ तालिबानी शासन ने अस्थिरता पर विजय पाई और कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण कायम किया है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में 2024-26 तक थोड़ी सुधार दिखाई दी, वहीं मानवाधिकार हनन, खासकर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार पर प्रतिबंध लगा कर वैश्विक संगठनों के निशाने पर रहा। बेरोजगारी, गरीबी, प्राकृतिक आपदा और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के कारण अफगानिस्तान की जनता त्रस्त हो गई।
तालिबान के साथ दुनिया के रिश्ते
2021 में तालिबान ने अमेरिका और नाटो की वापसी के बाद काबुल पर कब्जा कर लिया और इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान की स्थापना की। न तो चुनाव हुआ और न ही जनता ने इन्हें चुना। सिर्फ हथियारों के दम पर इनलोगों ने अंतरिम सरकार का गठन किया।
तालिबान को समर्थन देने वाले देशों में पाकिस्तान का नाम अहम है, जिसने उसकी सरकार बनने पर जश्न मनाया, लेकिन धीरे-धीरे रिश्तों में कड़वाहट आ गई और हालात यहाँ तक आ गए कि पाकिस्तान ने एयर स्ट्राइक किया और इसका जवाब देते हुए अफगानिस्तान ने पाकिस्तानी सीमा के अंदर घुस कर उसके फौजियों को सीमा की चौकियों से भगा दिया।
सीमा पर तनाव का अभी भी माहौल है। पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के आतंकवादी अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकाना पाते हैं। तालिबान इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता। दरअसल पाकिस्तान को जिस तालिबान के सत्ता में आने से रणनीतिक लाभ की उम्मीद थी, वही तालिबान बाद में पाकिस्तान के लिए सुरक्षा चुनौती बन गया।
चीन ने 2021 में ही तालिबानी सरकार से संपर्क बढ़ाना शुरू कर दिया था, जबकि रूस ने जुलाई 2025 में तालिबानी सरकार को मान्यता दे दी। अमेरिका, चीन, ईरान और मध्य एशियाई देशों ने तालिबान को औपचारिक मान्यता तो नहीं दी, लेकिन उसके साथ राजनयिक और आर्थिक संपर्क बनाए रखा। अमेरिका कुवैत समेत दूसरे देशों के माध्यम से बातचीत करता है। अमेरिका मानवाधिकार हनन, खासकर महिलाओं और लड़कियों की स्थिति को देखते हुए तालिबानी शासन को मान्यता देने से इनकार करता रहा है।
भारत-अफगानिस्तान संबंध
भारत का पड़ोसी देश होने के बावजूद भारत ने मानवाधिकार हनन, महिलाओं की गंभीर स्थिति को देखते हुए औपचारिक मान्यता तो नहीं दी है, लेकिन 2021 में बंद दूतावास को 4 साल बाद खोल दिया है। विदेश मंत्री जयशंकर के दौरे के दौरान ये घोषणा हुई थी। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मुत्तकी भी भारत के दौरे पर आए और रिश्ते सुधारने की अच्छी पहल हुई।
इससे पहले 1990 में जब पहली बार तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुआ था तब भारत ने उसे मान्यता नहीं दी थी, लेकिन दूसरी बार जब 2021 में तालिबानी सरकार बनी और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए भारत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए तालिबानी शासन से संपर्क बढ़ाए।
तालिबान ने पहलगाम आतंकी हमले का विरोध किया था और आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खड़े होने की बात की थी। दरअसल भारत चाहता रहा है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए न हो। इस पर तालिबानी सरकार सहमत है। वहीं तालिबान भी अपनी सत्ता को स्थिर करने के लिए आईएसआईएस-के जैसे संगठनों को कमजोर करना चाहता है।
2021 से पहले भारत ने अफगानिस्तान में संसद भवन, अस्पताल, सड़कें बनवाई और इस पर 3 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किए। तालिबानी सरकार को भी भारतीय मदद की जरूरत है। वैसे भी भारत-अफगानिस्तान के सांस्कृतिक संबंध काफी गहरे हैं, लेकिन भारत मानवीयता को काफी आगे रखता है, यही वजह है कि आज तक तालिबानी सरकार को भारत ने मान्यता नहीं दी।
तालिबानी शासन में महिलाओं की स्थिति
तालिबानी शासन की आलोचना मुख्यरूप से महिलाओं के प्रति व्यवहार को लेकर किया जाता है। तालिबानी सरकार के बनते ही उन्हें पर्दे के पीछे भेज दिया गया, चार दीवारी में कैद कर दिया गया। नौकरी छोड़ने, पढ़ाई छोड़ने और कम उम्र में निकाह करने पर मजबूर कर दिया गया। महिलाओं पर प्रतिबंध के इन पाँच सालों में हालात यहाँ तक आ गए हैं कि हायर एजुकेशन से लड़कियाँ बाहर हैं। स्कूलों में उनकी शिक्षा लड़कों से बिलकुल अलग है। पूरी तरह महिलाओं वाले स्कूल में पूरी तरह ढकी हुई वे पहुँचती हैं और फिर क्लास के बाद उसी तरह उन्हें घर जाना पड़ता है। रास्ते में किसी पुरुष का साथ होना भी जरूरी है।
आँकड़ों की बात करें तो 2021 में जहाँ 10 लाख लड़कियाँ उच्च स्तरीय शिक्षा ले रही थीं, वहीं 2026 तक करीब 24 लाख अफगानी लड़कियाँ माध्यमिक और उच्च स्तरीय शिक्षा से बाहर हो गई हैं। UNESCO के मुताबिक, अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ लड़कियों और महिलाओं को औपचारिक रूप से सेकेंड्री और हायर एजुकेशन से बाहर रखा गया है। इसका मतलब यह है महिलाओं की पूरी एक पीढ़ी शिक्षा से वंचित हो गई है। डॉक्टर इंजीनियर टीचर, वकील और दूसरे क्षेत्रों में नई पीढ़ी नजर नहीं आएगी।
इतना ही नहीं, जो महिलाएँ पेशेवर थीं, उन्हें काम करने से रोक दिया गया। इसका असर न सिर्फ उस महिला पर पड़ा बल्कि पूरा परिवार आर्थिक रूप से तंगहाल हो गया।
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान में कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखे गए हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में युद्ध समाप्त हो गया। इससे सड़क यात्रा अपेक्षाकृत आसान हुई। चेकपोस्ट और स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण बढ़ा। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि अफगानिस्तान पूरी तरह सुरक्षित हो गया। ISIS-K जैसे आतंकी संगठन अभी भी खतरा हैं और पाकिस्तान के साथ सीमा तनाव भी बढ़ा है।
तालिबान ने 2022 में अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगाया। इसके बाद अफीम की पैदावार में बहुत गिरावट आई। यह तालिबान सरकार की उन नीतियों में से है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक वास्तविक नीति परिवर्तन माना जाता है। लेकिन बगैर वैकल्पिक उपाय किए ये कार्य किए गए, जिससे अफीम से जुड़े लाखों किसानों और परिवारों की आय का विकल्प तैयार नहीं हुआ और वे गरीबी के गर्त में चले गए।
अफगानिस्तान युवाओं का देश है। लेकिन देश में बेरोजगारी, अशिक्षा, अवसर की कमी, गरीबी से ये परेशान हैं। देश की जीडीपी में मामूली सुधार हुआ है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2024 में ग्रोथ रेट करीब 2.5 फीसदी थी, जो 2025 में 4.3 फीसदी हो गई। इसके 2026 में और सुधार होने की उम्मीद है, लेकिन इसका फायदा अफगानी जनता को मिलता नहीं दिख रहा है। विश्व बैंक ने भी स्वीकार किया है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद लोगों के जीवन स्तर में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है।
2021 के बाद विदेशी सहायता में काफी कमी आई है। इसका असर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। स्वास्थ्य सेवाओं पर भी इसका असर पड़ा है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा ने इसकी मुश्किल और बढ़ाई है, लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल इसकी महिलाओं को लेकर रूढिवादी सोच है। यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर देशों ने तालिबानी शासन को मान्यता नहीं दी है।

