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‘भारत आकर करें व्यापार, मेक इन इंडिया का फायदा उठाएँ’: US टैरिफ विवाद के बीच मजबूत जयशंकर पहुंचे रूस, कहा- भरोसेमंद साझेदारों की जरूरत

अमेरिका की ओर से भारत पर 50% टैरिफ लागू करने के बाद भारत अलग- अलग देशों के साथ बैठक कर रहा है और अन्य देश भी भारत के साथ अपने रिश्तों में बेहतरी लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस कड़ी में मास्को में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूसी कंपनियों को भारत से जुड़ने की अपील की है।

रूस की यात्रा के दौरान जयशंकर ने भारत की अर्थव्यवस्था और ‘मेक इन इंडिया’ का हवाला देते हुए रूसी कंपनियों को देश से जुड़ने और बेहतर कारोबार की बात कही है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर बुधवार को मॉस्को में भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (IRIGC-TEC) के 26वें सत्र की सह-अध्यक्षता कर रहे थे। यहाँ उन्होंने रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव से मुलाकात की। डेनिस के बुलावे पर ही वे रूस पहुँचे हैं।

इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत और रूस को पारंपरिक तरीकों से हटकर नए और रचनात्मक तरीके अपनाने चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच सहयोग को और बेहतर और मजबूत किया जा सके। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का मंत्र होना चाहिए: ‘Doing more and doing differently.’

अमेरिका के साथ तनाव है वजह

जयशंकर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने भारत के कुछ उत्पादों पर 50% टैरिफ (आयात शुल्क) को लगा दिया है। इसके अलावा, भारत के रूसी कच्चे तेल की खरीद पर अतिरिक्त 25% शुल्क लगाया गया है। इसके कारण भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में तनाव आया है।

ऐसे में रूस के साथ संबंधों को मजबूत करना भारत की बहुपक्षीय विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है। जयशंकर ने सुझाव दिया कि भारत और रूस को संयुक्त उपक्रमों (Joint Ventures), तकनीकी सहयोग और निवेश के नए क्षेत्रों में कदम आगे बढ़ाने चाहिए। इसके लिए उन्होंने बेहतर लक्ष्य और समय सीमा तय की जानी चाहिए ताकि सहयोग को समुचित तौर पर आगे बढ़ाया जा सके।

रूस-भारत के बीच व्यापारिक असंतुलन पर रखी विदेश मंत्री ने अपनी बात

पिछले चार वर्षों में भारत-रूस व्यापार में पाँच गुना से अधिक की वृद्धि हुई है। वर्ष 2021 में यह व्यापार जहाँ 13 अरब अमेरिकी डॉलर ( ₹1.08 लाख करोड़ ) था, वहीं 2024-25 में बढ़कर 68 अरब डॉलर ( ₹5.95 लाख करोड़) तक पहुँच गया है। इस वृद्धि का मुख्य कारण भारत द्वारा रूस से हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) का बड़े पैमाने पर आयात रहा है। नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास ने अनुमान लगाया है कि पिछले पाँच वर्षों में यह वृद्धि लगभग 700 प्रतिशत रही है।

हालाँकि ने इस बैठक में एक अहम मुद्दा व्यापार असंतुलन का भी रहा। भारत-रूस के बीच व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। जयशंकर ने इस व्यापार में बढ़ते असंतुलन को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि 2021 में यह $6.6 बिलियन (₹54,780 करोड़) था, जो अब $59 बिलियन ( ₹4.9 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच गया है। उन्होंने कहा, “हमें इस मुद्दे को तत्काल सुलझाने की आवश्यकता है।”

जयशंकर ने रूस से भारतीय निर्यात के लिए अपने बाजार को और अधिक खोलने की अपील की ताकि यह असंतुलन कम हो सके। उन्होंने लॉजिस्टिक्स और भुगतान प्रणाली को भी सरल और सुगम बनाने को आज की जरूरत बताई। उन्होंने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मार्ग जैसे विकल्पों पर भी काम किए जाने की बात कही।

अपने दौरे में विदेश मंत्री ने थिंक टैंक के प्रतिनिधियों और अन्य लोगों के साथ भी मुलाकात की। इस दौरान भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों, बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य और भारत के दृष्टिकोण पर दोनों देशों के बीच बातचीत हुई ।

जयशंकर ने इसे लेकर एक्स पर लिखा, “रूस के प्रमुख विद्वानों और थिंक टैंक प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करके खुशी हुई। भारत-रूस संबंधों, समकालीन वैश्विक भू-राजनीति और भारत के दृष्टिकोण पर चर्चा की।”

जयशंकर का ये दौरा और रूस के साथ व्यापार को लेकर चर्चा इस बात का साफ संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपने हितों को लेकर अधिक सक्रिय, रणनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना रहा है। यह बयान न केवल रूस के साथ संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश है, बल्कि अमेरिका के दबाव के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को भी दर्शाता है।

ड्रीम-11, पोकरबाजी, MPL… सब होंगे बंद: जानिए क्या है मोदी सरकार का ऑनलाइन गेमिंग बिल, प्रचार पर 3 साल जेल-₹1 करोड़ जुर्माना

हाल ही में लोकसभा ने एक नया कानून पास किया है। इसका नाम है ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025।’ यह बिल ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी समस्याओं को ध्यान में रखकर लाया गया है। देश में ऑनलाइन गेमिंग बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इससे कई लोगों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। बहुत से लोग हर साल हज़ारों करोड़ रुपए हार जाते हैं। इससे समाज में तनाव, झगड़े और मानसिक परेशानी जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं।

इस बिल का मुख्य उद्देश्य लोगों को इन खतरों से बचाना है। भारत में लगभग 45 करोड़ लोग ऑनलाइन गेम खेलते हैं। यह बिल उन्हें पैसे वाले गेम्स के जाल में फँसने से रोकेगा। यह कानून ऑनलाइन गेमिंग को एक नियम के दायरे में लाएगा। इससे भारत में गेमिंग का भविष्य सुरक्षित और साफ़ हो सकता है।

संसद में ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 पास होने के बाद ड्रीम11, माई11सर्किल, एमपीएल, विंजो, गेम्सक्राफ्ट, रम्मी, पोकरबाजी जैसे कई ऐप्स को बंद किए जाएँगे। क्योंकि यह एक ऑनलाइन जुआ की कैटेगिरी में आता है। कुछ गेमिंग कंपनियों का कहना है कि वे जुआ या गलत कामों में शामिल नहीं हैं। और वे कानूनी रूप से काम करती हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि पैसा लगाने वाले सभी गेम खतरनाक हैं। इसलिए उन पर रोक जरूरी है।

ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 क्या है?

सरकार ने एक नया कानून बनाया है। यह कानून भारत में ऑनलाइन गेमिंग को कंट्रोल करेगा। इसका मतलब है कि अब गेमिंग के कुछ नियम बनेंगे। सभी को इन नियमों का पालन करना होगा। अब जो ऑनलाइन गेम पैसे से खेले जाते हैं, उन पर रोक लग जाएगी। मतलब आप ऐसे गेम नहीं खेल पाएँगे जहाँ जीतने के लिए पैसे लगाने पड़ते हैं। और न ही ऐसे गेम जहाँ जीतने पर पैसे मिलते हैं। यह नियम लोगों को नुकसान से बचाने के लिए है।

जो गेम बिना पैसे के खेले जाते हैं, उन्हें सरकार बढ़ावा देगी। जैसे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग। इनमें खिलाड़ी अपने दिमाग और कौशल से खेलते हैं। ये गेम मनोरंजन और सीखने के लिए होते हैं। सरकार इन अच्छे गेम्स के लिए एक अलग विभाग बनाएगी। वह नई योजनाएँ भी शुरू करेगी। इससे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।

केंद्र सरकार यह बिल क्यों ला रही है?

केंद्र सरकार इस बिल को कई गंभीर कारणों से ला रही है-

सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या: आजकल बहुत लोग ऑनलाइन पैसे वाले गेम खेल रहे हैं। ये गेम अब एक बड़ी सामाजिक और सेहत से जुड़ी समस्या बन गए हैं। कई लोग इन गेम्स में लाखों रुपए हार रहे हैं। उनका पैसा बैंक से खत्म हो जा रहा है। इससे उनके घरों में झगड़े हो रहे हैं। कई बार परिवार बर्बाद हो जाते हैं। कुछ लोग इतना दुखी हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं। ये बहुत चिंता की बात है। सरकार चाहती है कि लोग इस परेशानी से बाहर आएँ। उसका लक्ष्य है कि ऐसी बर्बादी और आत्महत्याएँ रोकी जा सकें।

नकारात्मक प्रभाव: कुछ ऑनलाइन गेम ऐसे होते हैं जो चालाकी से बनाए जाते हैं। इनका डिज़ाइन लोगों को बार-बार खेलने पर मजबूर करता है। ऐसे गेम्स में कुछ छुपे हुए तरीके होते हैं जो दिमाग को धोखा देते हैं। लोग इन गेम्स के इतने आदि हो जाते हैं कि खुद को रोक नहीं पाते। जब लोग बार-बार खेलते हैं तो वे बार-बार पैसे भी लगाते हैं। इससे उनका बहुत सारा पैसा बर्बाद हो जाता है। इन गेम्स में यह साफ नहीं होता कि गेम को कौन चला रहा है। इससे लोगों की सुरक्षा पर खतरा भी बढ़ जाता है।

वित्तीय धोखाधड़ी और अवैध गतिविधियाँ: अब बहुत सारे ऑनलाइन गेम बिना किसी नियम के चल रहे हैं। इनमें लोग असली पैसे लगाते हैं। इन गेम्स की आड़ में कई बार धोखाधड़ी होती है। कुछ लोग इनका इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं। कुछ लोग इन गेम्स से कमाए पैसे को छुपा लेते हैं। वे टैक्स नहीं देते। इसे कर चोरी कहा जाता है। कई बार ये पैसे गलत लोगों तक पहुँचते हैं। कुछ मामलों में इनका इस्तेमाल आतंकवाद को पैसे देने में भी होता है। इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

राजस्व की चिंता नहीं: हालाँकि, इस नए कानून से सरकार को शायद करोड़ों रुपए का टैक्स मिलना बंद हो जाएगा, जो ऑनलाइन गेमिंग से आता था। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ कहा है कि सरकार की पहली प्राथमिकता पैसे कमाना नहीं है, बल्कि समाज को इन गेम्स के बुरे असर से बचाना है। उनका मानना है कि लोगों की भलाई और सुरक्षा पैसों से ज़्यादा ज़रूरी है।

लोगों की शिकायतें: इस बिल को लाने का एक और बड़ा कारण है लोगों की ढेरों शिकायतें। सरकार को ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी हजारों शिकायतें मिली थीं, जहाँ लोग अपनी समस्याओं के बारे में बता रहे थे। इसके अलावा, भारत के कई राज्यों ने भी केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि वे इस पर एक सख्त कानून बनाएँ। इन सभी माँगों को देखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है।

जिम्मेदारी से गेमिंग को बढ़ावा: सरकार ऐसे गेम्स को भी बढ़ावा देना चाहती है जो अच्छे हैं। ये वो गेम हैं जिनसे दिमाग तेज होता है और बच्चों में लीडरशिप की क्वालिटी बढ़ती है। सरकार चाहती है कि ऐसे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेम ज़्यादा से ज़्यादा लोग खेलें। इन गेमों को अब कानूनी पहचान मिलेगी और सरकार इन्हें आगे बढ़ने में पूरी मदद करेगी।

ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 के मुख्य प्रावधान क्या हैं?

इस नए कानून में ऑनलाइन गेमिंग को रोकने के लिए कई बड़े नियम बनाए गए हैं। सबसे खास बात यह है कि अब पैसे वाले सभी ऑनलाइन गेम पूरी तरह से बंद हो जाएँगे। इसका मतलब है कि आप Google Play Store जैसी जगहों से ऐसे गेम डाउनलोड नहीं कर पाएँगे, जिनमें आपको पैसा लगाना पड़ता है। इनमें ऑनलाइन फैंटेसी गेम, पोकर, रम्मी, ड्रीम11, माई11सर्किल, या ऑनलाइन लॉटरी जैसे गेम शामिल हैं।

जो लोग इन नियमों को तोड़ेंगे, उन्हें कड़ी सजा मिलेगी। जो लोग पैसे वाले गेमिंग ऐप चलाएँगे, उन्हें ₹1 करोड़ तक का जुर्माना और तीन साल तक की जेल हो सकती है। अगर कोई सेलिब्रिटी इन गेम्स का विज्ञापन करता है तो उसे भी दो साल तक की जेल और ₹50 लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है।

इतना ही नहीं, अगर कोई बैंक या कंपनी इन गेमों में पैसों का लेन-देन करती है तो उन्हें भी ₹1 करोड़ तक का जुर्माना और तीन साल तक की जेल हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार यही गलती करता है तो उसकी सजा और भी बढ़ जाएगी। इन बड़े अपराधों में पुलिस आपको बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और जमानत मिलना भी बहुत मुश्किल होगा।

इस कानून (ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025) को लाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पैसे वाले ऑनलाइन गेम हमारे समाज को बहुत नुकसान पहुँचा रहे थे। लोग इन गेम्स में अपनी सारी कमाई गँवा रहे थे। इससे परिवारों में झगड़े बढ़ रहे थे और पैसे की तंगी हो रही थी। इन गेमों की लत लगने से लोग मानसिक रूप से बहुत परेशान हो रहे थे, कुछ को तो डिप्रेशन हो जाता था और कुछ लोग तो आत्महत्या तक कर लेते थे।

आदमियों को कुल्हाड़ी से काटा, बच्चों को गोलियों से भूना… 300+ लाशों में दफन हुई रवांडा-कांगो की वह ‘शांति’ जो लाने का दावा कर रहे थे ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने रवांडा और कांगो के बीच शांति करा दी, लेकिन हकीकत उलट है। जुलाई 2025 में रवांडा समर्थित एम23 विद्रोहियों ने कांगो के नॉर्थ किवु में 14 गाँवों में 140 से 319 लोगों को मार डाला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवांडा और कांगो के बीच जिस शांति की बात ट्रंप कर रहे हैं, वहाँ खून की नदियाँ बह रही हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र (UN) की ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि जुलाई 2025 में 140 से 300 से ज्यादा लोग मारे गए। रवांडा समर्थित एम23 विद्रोही समूह ने नॉर्थ किवु प्रांत में नरसंहार मचाया, जिसमें बच्चों और औरतों को भी नहीं बख्शा गया। लोगों को कुल्हाड़ियों से काट डाला गया, लाइन में बैठा कर गोलियों से भून डाला गया।

हमले के चश्मदीद तीन किसानों ने इसकी जानकारी देते हुए बताया है कि 10-11 जुलाई को जब वे लोग कुछ सामान लेने घर से बाहर गए थे, उस वक्त एम 23 विद्रोहियों ने हमला किया था। एक किसान ने बताया कि वे कुछ दूर से छिप कर अपने परिवार के लोगों को देख रहे थे, जिन्हें विद्रोहियों ने गोलियों से भून डाला। उनकी पत्नी और तीन बच्चों को मौत के घाट उतार दिया।

एक और चश्मदीद ने बताया कि 11 जुलाई को किसेगुरु कस्बे से करीब 18 किलोमीटर दूर एक खेत में उन्हें एक 47 साल के व्यक्ति और उसके चार बच्चों के शव मिले। बच्चों की उम्र 11 से 17 साल के बीच थी। इन लोगों को दफनाने वाले एक व्यक्ति ने कहा, “हमने खेत में सिर कटे इन लोगों की लाश मिली। उन सभी को छुरों से मारा गया था। उनके गले काटे गए थे।”

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 300+ मौतों की दी जानकारी

ह्यूमन राइट्स वॉच ने हमले की जानकारी देते हुए कहा है कि रवांडा-नियंत्रित एम23 विद्रोहियों ने जुलाई 2025 में पूर्वी कांगो के विरुंगा नेशनल पार्क के पास कम से कम 14 गाँवों के 140 से अधिक नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये लोग हुतु समुदाय के हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई से अब तक इस क्षेत्र में मारे गए लोगों की संख्या 300 से अधिक हो सकती है। इन पर हमला करना वाला एम23 संगठन 2021 से काफी सक्रिय है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्च फेलो क्लेमेंटाइन डी मोंटजॉय ने कहा, “जब तक इन हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं मिलती, ये अत्याचार और बढ़ेंगे। उनका कहना है कि इस हमले में रवांडा के कई अधिकारी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इन हमलों में शामिल लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए और युद्ध में शामिल रवांडा के सैन्य कमांडरों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। साथ ही यूएन को इस मामले की जाँच करनी चाहिए।”

हमलों में रवांडा की सेना भी शामिल

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट तो और भी भयावह आँकड़ा देती है, जिसमें 9 से 21 जुलाई के बीच 319 लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। M23 विद्रोहियों ने कांगो के लोगों पर जुल्म की हर हद पार कर दी। एम23 ने कई लाशों को रुशुरु नदी में फेंक दिया, जिसमें औरतों और बच्चों की लाशें भी शामिल थीं। लोगों को लाशें दफनाने की इजाजत नहीं दी गई।

विद्रोहियों ने कहा कि लाशों को खेतों में ही छोड़ दो या दफना दो, लेकिन अंतिम संस्कार करने की मनाही थी। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हम अपने अपनों को दफनाने भी नहीं जा सकते थे। वो हमें धमकाते थे कि अगर हमने कोशिश की तो हमें भी मार देंगे।” बता दें कि रुत्शुरु नदी से बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों के शव बरामद हो चुके हैं।

इन हमलों में ज्यादातर हुतू समुदाय के लोग निशाना बने। एम23 का कहना है कि ये हमले डेमोक्रेटिक फोर्सेस फॉर द लिबरेशन ऑफ रवांडा (एफडीएलआर) के खिलाफ थे, जो 1994 के रवांडा नरसंहार में शामिल हुतू समुदाय के लोग हैं। लेकिन हकीकत में आम लोग, औरतें और बच्चे इस हिंसा का शिकार बने।

संयुक्त राष्ट्र ने एम23 और रवांडा डिफेंस फोर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। इन संगठनों का कहना है कि जिम्मेदार लोगों पर प्रतिबंध लगाए जाएँ और युद्ध अपराधों की जाँच हो। लेकिन रवांडा इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि हत्याएँ किसी और समूह ने कीं।

क्या है रवांडा और कांगो का विवाद?

रवांडा और कांगो का ये संघर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार से शुरू हुआ, जिसमें हुतू समुदाय ने तुत्सी समुदाय के लाखों लोगों को मार डाला था। नरसंहार के बाद हुतू उग्रवादी कांगो भाग गए और वहाँ एफडीएलआर जैसे समूह बनाए। तुत्सी समुदाय का एम23 ग्रुप रवांडा का समर्थन पाता है और एफडीएलआर के खिलाफ लड़ता है।

कांगो का कहना है कि रवांडा एम23 को हथियार और सैनिक देता है, जबकि रवांडा इससे इनकार करता है और कहता है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए कांगो में है। इस इलाके में सोना, कोल्टन और कोबाल्ट जैसे कीमती खनिजों की खदानें हैं, जो इस संघर्ष को और भड़काती हैं।

रवांडा-कांगो के बीच शांति समझौता

27 जून 2025 को ट्रंप की मौजूदगी में वॉशिंगटन में रवांडा और कांगो के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें रवांडा को अपनी सेना वापस बुलाने और कांगो को एफडीएलआर को खत्म करने का वादा करना था। लेकिन इस समझौते के बाद भी हिंसा रुकी नहीं। जुलाई में हुए नरसंहार ने साफ कर दिया कि ये समझौता कागजों तक ही सीमित है।

कांगो के विदेश मंत्रालय ने कहा, “इन हत्याओं ने वॉशिंगटन समझौते और दोहा वार्ताओं की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।” दोहा में कांगो सरकार और एम23 के बीच अलग से बातचीत चल रही थी, लेकिन वहाँ भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। एम23 ने कहा कि कांगो ने समझौते का पालन नहीं किया, जबकि कांगो का कहना है कि एम23 ने ही हमले किए।

ट्रंप भले ही शांति की बात करें, लेकिन नॉर्थ किवु के खेतों और नदियों में बहता खून बता रहा है कि शांति अभी कोसों दूर है। कांगो-रवांडा में जारी इस हिंसा ने ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही व्हॉइट हाउस के उन दावों पर भी… जिसमें ट्रंप द्वारा बीते 7 माह में 7 जंगों को रोकने का दावा किया था।



‘विषकन्या’ भेज फँसाता, रंगदारी नहीं मिलने पर करवा देता था रेप केस: अखिलेश दुबे का ₹1500 करोड़ का साम्राज्य BJP नेता ने ढहाया, शिकंजा कसा तो दिया उम्र-बीमारियों का हवाला

कानपुर में भाजपा नेता रवि सतीजा को झूठे रेप केस में फँसाने के पीछे अधिवक्ता अखिलेश दुबे का नाम सामने आया है। वह ‘विषकन्या’ जैसी लड़कियों का इस्तेमाल कर फाँसता था। ब्लैकमेल करता था।

रंगदारी नहीं मिलने पर रेप का फर्जी केस करवा देता था, पर बीजेपी नेता रवि सतीजा ने उसके सामने घुटने नहीं टेके। उनकी शिकायत से खुली फाइल ने कानपुर के अखिलेश दुबे के 1500 करोड़ के साम्राज्य को ढहा दिया है।

अखिलेश दुबे वैसे तो वकील है, लेकिन उसने जीवन में कभी प्रैक्टिस नहीं की। चर्चित मामलों की फर्द लिखकर उसने पुलिस महकमे में घुसपैठ की। फिर इन्हीं संपर्कों का धौंस दिखाकर अपना साम्राज्य खड़ा किया।

वह महिलाओं को भी ब्लैकमेल करने से नहीं हिचकता था। एक महिला होटल कारोबारी ने जब उसकी बात नहीं मानी तो कथित तौर पर अखिलेश दुबे ने पीड़िता की गंदी किताबें छपवाकर बँटवा दी। उसे शादी के मंडप से उठा लेने तक की धमकी दी।

रवि सतीजा के साथ की गई साजिश के पीछे अधिवक्ता अखिलेश दुबे, आयुष मिश्रा उर्फ लवी और शैलेंद्र यादव उर्फ टोनू का नाम सामने आया है। पुलिस की जाँच में यह भी पता चला कि ऐसे मामले पहले भी होते आए है, जिनमें ऐसे ही तरीकों से लोगों को झूठे मुकदमों में फँसाकर उनसे पैसे वसूले जाते रहे हैं।

इस पूरे मामले की जड़ एक महिला की शिकायत से जुड़ी है, जिसके जरिये भाजपा नेता पर फर्जी रेप का आरोप लगाने की कोशिश की गई। जब मामला दर्ज हुआ तो अखिलेश दुबे और उसके साथियों ने इस केस को खत्म कराने और FIR लगवाने के नाम पर पैसे की माँग शुरू की। इसी दौरान कई बार फोन पर धमकी दी गई और बातचीत की रिकॉर्डिंग भी हुई, जिसे अब पुलिस ने केस डायरी में पेश किया है।

साकेत धाम से चलता रहा पूरा शहर

वकील अखिलेश दुबे ने वर्ष 2000 में साकेत नगर में ‘साकेत धाम’ नाम से दफ्तर बनाया। यहीं से उसका सिंडीकेट खड़ा हुआ और धीरे-धीरे पुलिस अधिकारियों का आना-जाना शुरू हो गया।

रसूख इतना बढ़ा कि केडीए ने उसे पार्क तक लीज पर दे दिए जिन पर उसने स्कूल और गेस्टहाउस खोल लिए। शहर के बड़े अफसर उसके दरबार में बैठने लगे और हालत यह हो गई कि दरोगा-इंस्पेक्टर पोस्टिंग के लिए उसके दफ्तर सलाम ठोकने पहुँचते थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कानपुर में दुबे ने पुलिस की आड़ में फर्जी FIR दर्ज कराना शुरू किया। जो भी उसके खिलाफ जाता या जमीन कारोबार में बाधा डालता, उसके खिलाफ झूठे रेप और SC-ST एक्ट के मुकदमे दर्ज कराकर जेल भिजवा देता।

डर ऐसा कि कोई उसके खिलाफ खड़ा नहीं हो पाता। बिल्डर, नेता, कारोबारी सब उसकी शरण में जाते। सांसद अशोक रावत की शिकायत पर पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने SIT गठित की तो 54 झूठे रेप केस सामने आए, जिनमें 10-12 सीधे दुबे से जुड़े थे।

इन मुकदमों के लिए वह महिलाओं और लड़कियों को पैसे देकर इस्तेमाल करता था। एक FIR दर्ज कराने पर 50 हजार से एक लाख तक देता था। जाँच की भनक लगते ही उसने अपने गैंग की लड़कियों को झारखंड और छत्तीसगढ़ भेज दिया।

इतना ही नहीं, उसके पैर छूने वाले आईपीएस और पीपीएस अफसरों की लंबी लिस्ट थी। हालात ये थे कि कानपुर पुलिस कमिश्नर का पीआरओ तक दुबे का आदमी निकला। वहीं उसकी बेटी की शादी में 40-50 आईपीएस अफसर पहुँचे, एसपी और एएसपी स्तर के अफसर बारातियों की अगवानी और प्लेट परोसते नजर आए।

लखनऊ और दिल्ली तक दुबे ने पुलिस अफसरों की काली कमाई अपनी कंपनियों और जमीनों में लगाई। पत्रकारों और वकीलों को भी अपने सिंडीकेट में शामिल किया। खुद कभी कोर्ट में बहस न करने वाला दुबे अपने दफ्तर से ही पुलिस जाँच लिखता, फैसले करवाता और अफसरों का रूतबा तय करता था।

आखिर भाजपा नेता रवि सतीजा की शिकायत और मुख्यमंत्री तक मामला पहुँचने पर कानपुर पुलिस कमिश्नर ने दुबे को जेल भेजा। लेकिन जाँच में साफ हुआ कि यह सिर्फ एक वकील नहीं बल्कि पुलिस, अफसर, पत्रकार और वकीलों का विशाल सिंडीकेट था जिसने तीन दशक तक कानपुर में खौफ कायम रखा।

‘विषकन्या’ की एंट्री

अखिलेश दुबे का नाम झूठे रेप केसों और रंगदारी वसूली के खेल में सबसे ज्यादा सामने आया। पुलिस कस्टडी में मौजूद लड़की ने कबूल किया कि उसे वकील टोनू ने पैसे का लालच देकर अखिलेश से मिलवाया। बस्ती की कई महिलाएँ भी इस काम में शामिल थीं। जब SIT ने जाँच शुरू की तो टोनू ने कई महिलाओं को छत्तीसगढ़ भगा दिया।

दुबे के गैंग में मिस यूपी रह चुकी युवती भी शामिल थी, जिसे उसने ‘विषकन्या का नाम दिया। इसने झूठे मुकदमे कर करोड़ों वसूले और अखिलेश की खास बन गई। उसे राजनीतिक संरक्षण भी मिला और संगठन में महिला विंग का जिलाध्यक्ष बना दिया गया। सबसे पहले उसने होटल मालिक पर झूठा केस कर 2.5 करोड़ ऐंठे और फिर लापता हो गई।

असल में, दुबे मेरठ से कानपुर भागकर आया था। शुरुआत दीप सिनेमा के बाहर साइकिल स्टैंड चलाने और नशे का कारोबार करने से हुई। धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में कदम रखकर उसने खुद को इतना बड़ा बना लिया कि पुलिस, नेता और माफिया सब उसके सिंडीकेट का हिस्सा बन गए।

पुलिस जाँच और सबूत

नौबस्ता थाना प्रभारी शरद तिलारा इस मामले की विवेचना कर रहे हैं। उन्होंने भाजपा नेता से जुड़ी केस डायरी कोर्ट में पेश की, जिसमें कई अहम तथ्य सामने आए। रवि सतीजा, अखिलेश दुबे और लवी मिश्रा की कॉल डिटेल्स निकलवाई गईं।

रिपोर्ट में साफ हुआ कि इन तीनों के बीच लगातार फोन पर बातचीत होती रही है। इसके अलावा आरोपित अधिवक्ता शैलेंद्र यादव उर्फ टोनू और झूठे केस में फँसाने वाली युवती के बीच भी बातचीत के सबूत मिले।

पुलिस ने कोर्ट में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग और उसका लिखित रूपांतरण भी दाखिल किया है। यह बातचीत 11 फरवरी 2025 की बताई जा रही है, जिसमें अखिलेश दुबे मुकदमे में FIR लगवाने की बात कर रहे हैं और साथ ही धमकी भी दे रहे हैं।

भाजपा नेता ने दोबारा दिए बयान में साफ कहा कि अखिलेश ने उन्हें कई बार धमकाया और किस्तों में अलग-अलग रकम भी वसूली। इन सबूतों के आधार पर पुलिस ने मुकदमे में और गंभीर धाराएँ जोड़ीं। इनमें मौत या उम्रकैद से संबंधित मुकदमे का डर दिखाकर रंगदारी वसूलने और आपराधिक षड्यंत्र रचने की धाराएँ शामिल की गईं।

वही एक महिला ने आरोप लगाया है कि 2011 में अखिलेश ने उसकी शादी तुड़वाने का भी प्रयास किया। इतना ही नहीं उसके ऑर्डर्स सुनने वाले इंस्पेक्टर्स से फेरों से पहले उसका अपहरण करवाने की भी कोशिश की।

महिला का कहना है कि सोमवार (18 अगस्त 2025) सभी सबूतों के साथ पुलिस आयुक्त से शिकायत करने के बाद SIT ने जाॅंच शुरू कर दी है। वहीं स्टाफ ऑफिसर पुलिस आयुक्त राजेश पांडेय के अनुसार, महिला ने अरिधीश दुबे के खिलाफ मारपीट और लूट के अलावा जान से मारने की धमकी और उसके चरित्र पर दाग लगाने के लिए अश्लील बुकलेट बाँटने का भी आरोप लगाया है। उसने इससे जुड़े सबूत भी उपलब्ध करवाए हैं।

कोर्ट की कार्यवाही

मामले की सुनवाई सीजेएम सूरज मिश्रा की कोर्ट में हुई। कोर्ट में पेशी के दौरान पुलिस और अभियोजन पक्ष ने सबूत पेश किए। कोर्ट ने माना कि आरोप गंभीर हैं और नए तथ्यों के आधार पर बढ़ाई गई धाराओं में भी अभियुक्तों की न्यायिक रिमांड मंजूर करना जरूरी है।

कोर्ट ने भाजपा नेता से रंगदारी माँगने के मामले में अखिलेश दुबे और आयुष मिश्रा उर्फ लवी की 14 दिन की न्यायिक रिमांड मंजूर की। साथ ही कोतवाली थाने में दर्ज अधिवक्ता से रंगदारी वाले केस में भी अखिलेश की 14 दिन की न्यायिक रिमांड दी गई।

वहीं बढ़ाई गई धाराओं में जिनमें मौत या उम्रकैद से संबंधित मुकदमे का डर दिखाकर रंगदारी वसूलने की बात शामिल है, कोर्ट ने फिलहाल एक दिन की न्यायिक हिरासत मंजूर की है। इसका कारण यह था कि इस मुकदमे में पहले से ही 20 अगस्त तक की रिमांड स्वीकृत थी, इसलिए कोर्ट ने कहा कि आगे की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए 20 अगस्त को की जाएगी।

कोर्ट में पेशी के दौरान अखिलेश दुबे ने अपनी उम्र और तबीयत का हवाला देते हुए गुहार लगाई। उसने कहा कि वह लगभग 68 साल का है और कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित है।

डॉक्टरों ने उसे रोजाना कुछ विशेष दवाएँ लेने की सलाह दी है, लेकिन जेल में रहते हुए उसे वे दवाएँ नहीं मिल पा रही हैं, जिससे उसकी हालत बिगड़ रही है। इस पर उसके अधिवक्ता ने कोर्ट  में एक प्रार्थना पत्र दिया।

सीजेएम ने जेल अधीक्षक को निर्देश दिए कि अखिलेश को जरूरी दवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ और उसकी जाँच भी कराई जाए। जरूरत पड़ने पर उसे इलाज की सुविधा भी दी जाए।

इस पूरे मामले की सुनवाई के बीच कचहरी परिसर में एक और घटना चर्चा का विषय बन गई। मंगलवार को कचहरी के कई स्थानों पर एक स्टिकर चस्पा मिला, जिस पर लिखा था “अधिवक्ता या मुखबिर?”

इसमें इसके अलावा कुछ नहीं लिखा था। वकील आपस में इस स्टिकर को दिखाते और मुस्कुराते नजर आए। यह भी कहते रहे कि आखिर यह किसके लिए लिखा गया है।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात की गवाही देता है कि कैसे झूठे मुकदमों को हथियार बनाकर रंगदारी वसूली जा रही थी। भाजपा नेता से पचास लाख और एक अधिवक्ता से दस लाख की माँग ने कानपुर की कानूनी और राजनीतिक दुनिया को हिला दिया है।

पुलिस के पास अब कॉल डिटेल्स, ऑडियो रिकॉर्डिंग और गवाहों के बयान जैसे पुख्ता सबूत हैं, जिनके आधार पर कोर्ट  ने गंभीर धाराओं में भी अभियुक्तों की न्यायिक रिमांड मंजूर कर दी है।

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रबंधन और पुलिस पर उठे सवाल: न एंबुलेंस बुलाई, न परिवार को किया रिपोर्ट, लोगों ने किया प्रदर्शन

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी। घटना के बाद स्कूल में भारी संख्या में अभिभावक और हिंदू संगठनों के लोग पहुँचे और गुस्सा जताया।

हालात बिगड़ते देख पुलिस बल तैनात करना पड़ा। मृतक छात्र के परिजनों ने बताया कि कुछ दिन पहले स्कूल में ही उसका आठवीं कक्षा के कुछ छात्रों से मामूली बात पर झगड़ा हुआ था।

मृतक छात्र दसवीं कक्षा में पढ़ता था। मंगलवार (19 अगस्त 2025) को आरोपित छात्र स्कूल में उसके पास आए और चाकू मार दिया। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए।

स्कूल ने समय पर नहीं की कार्यवाही

जानकारी के मुताबिक, मृतक छात्र के दादा ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि कुछ दिन पहले उनका पोता स्कूल से छुट्टी के बाद सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था, तभी एक मुस्लिम छात्र से उसका झगड़ा हुआ था।

बाद में उस छात्र ने सॉरी कह दिया और मामला शांत हो गया। लेकिन घटना वाले दिन आठ-दस लड़के चेहरा ढक कर आए और उनके पोते पर चाकू से हमला कर दिया। दादा का आरोप है कि चाकू लगने के बाद भी स्कूल ने न तो उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया और न ही एम्बुलेंस को खबर दी।

परिवार के पहुँचने पर ही छात्र को अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने स्कूल की सुरक्षा पर भी सवाल उठाए कि आखिर चाकू जैसे हथियार लेकर लड़के स्कूल में कैसे घुस आए और सुरक्षाकर्मी क्या कर रहे थे।

मृतक के दादा ने बताया कि चाकू मारने वाले एक लड़के को पुलिस ने उसी रात शाह आलम इलाके से पकड़ लिया और तुरंत FIR दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्कूल में मुस्लिम छात्र अक्सर उनके पोते को परेशान करते थे। यहाँ तक कि वे मटन की सब्जी को पनीर बताकर उसे खिलाने की कोशिश करते थे, जबकि उनका परिवार शाकाहारी है।

मृतक छात्र के कुछ सहपाठियों ने बताया कि स्कूल में असामाजिक तत्वों का आतंक फैला हुआ है। उनका कहना है कि आरोपित अक्सर निचली कक्षाओं के बच्चों का गला दबाते हैं और उन्हें चाकू दिखाकर डराते-धमकाते हैं। मृतक छात्र के माता-पिता ने भी इस बारे में दो महीने पहले स्कूल में शिकायत की थी, लेकिन स्कूल प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।

गुस्साए अभिभावकों ने कहा- यहाँ हिंदू-मुस्लिम कहाँ पढ़ेंगे? 

स्कूल के बाहर जमा गुस्साए अभिभावकों ने बताया कि यहाँ पहले भी कई शिकायतें हो चुकी हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। उनका कहना था कि मुस्लिम छात्रों के उत्पीड़न के कारण लोग पूछ रहे हैं “यहाँ हिंदू कहाँ पढ़ेंगे, मुसलमान कहाँ पढ़ेंगे?” अभिभावकों की बस एक ही माँग है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

एक महिला ने गंभीर आरोप लगाया कि स्कूल में पहले भी शराब और ड्रग्स पकड़े गए थे, लेकिन पैसे लेकर मामले दबा दिए गए। उन्होंने कहा कि इस स्कूल में अगर पैसा हो, तो कुछ भी हो सकता है।

एक अन्य महिला ने बताया कि दो महीने पहले मुस्लिम छात्रों ने उसके बेटे से झगड़ा किया था। उस समय भी स्कूल ने केवल अभिभावकों को बुलाकर मामला सुलझा दिया, लेकिन किसी तरह की सख्त कार्रवाई नहीं की।

अभिभावकों ने यह भी आरोप लगाया कि घायल बच्चे को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचाया गया। उनका कहना था कि अगर एम्बुलेंस की व्यवस्था होती, तो शायद उसकी जान बच सकती थी।

स्कूल पर ताला लगा देना चाहिए: एबीवीपी

सिंधी समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में स्कूल के बाहर इकट्ठा होकर न्याय की माँग करने लगे। सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष कमल मेहतानी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।

एक छोटी सी बात पर बच्चे को चाकू मार दिया गया, यह किसी भी छात्र के साथ हो सकता है। उन्होंने माँग की कि आरोपितों को तुरंत पकड़ा जाए, उन्हें सख्त सजा मिले और स्कूल प्रबंधन की भी जिम्मेदारी तय हो।

उन्होंने कहा कि स्कूल का काम सिर्फ फीस वसूलना नहीं है, बच्चों की सुरक्षा भी उनकी जिम्मेदारी है। एबीवीपी नेताओं ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब लाखों रुपए फीस लेने के बाद भी छात्र सुरक्षित नहीं हैं और असामाजिक तत्व स्कूल में चाकू लेकर घूम रहे हैं, तो ऐसे स्कूल पर ताला लगा दिया जाना चाहिए।

यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिंकन सेखड़िया ने लिखी है। मूल खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

साल 2023 में कमाई का सरप्लस से 2025 में कर्ज के गड्ढे तक: जानें- कॉन्ग्रेस सरकार की ‘खटाखट’ लुभावनी योजनाओं ने कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे किया बर्बाद

कर्नाटक की आर्थिक हालत दो साल में बिगड़ गई है। साल 2023 में बीजेपी सरकार के समय सरप्लस बजट था, लेकिन अब कॉन्ग्रेस के राज में राज्य कर्ज में डूब रहा है, वित्तीय घाटा बढ़ रहा है और विकास परियोजनाओं के लिए पैसा कम हो रहा है।

कम्पट्रोलर और ऑडिटर जनरल (CAG) ने 31 मार्च 2024 के लिए अपनी हालिया स्टेट फाइनेंस ऑडिट रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच ‘गारंटी’ योजनाएँ, जो बड़े धूमधाम से शुरू की गई थीं, राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही हैं।

CAG की रिपोर्ट ने चिंता जताई

इस हफ्ते कर्नाटक विधानसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट में कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच कल्याणकारी योजनाओं गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति, और युवा निधि के प्रभाव का पहला सरकारी ऑडिट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन गारंटी योजनाओं के लिए 2023-24 में 36,538 करोड़ रुपए का बजट रखा गया था, जो राज्य के कुल राजस्व खर्च का 15% है।

इसका असर साफ दिख रहा है। पिछले साल कर्नाटक की आय में सिर्फ 1.86% की बढ़ोतरी हुई, जबकि इन योजनाओं की वजह से खर्च 12.54% बढ़ गया। इस असंतुलन से राज्य को 9,271 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ, जो 2022-23 में कोविड-19 के बाद की रिकवरी को उलट रहा है।

राज्य का वित्तीय घाटा भी 2022-23 में 46,623 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 65,522 करोड़ रुपए हो गया। इस अंतर को भरने के लिए सरकार ने बाजार से 63,000 करोड़ रुपए उधार लिए, जो पिछले साल के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। CAG ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में कर्ज चुकाने का बोझ और ब्याज का खर्च बढ़ेगा।

दूसरी तरफ बुनियादी ढाँचे पर पूँजीगत खर्च 5,229 करोड़ रुपए कम हो गया। इससे ज्यादातर प्रोजेक्ट रुक गए हैं और अधूरे कामों की संख्या 68% बढ़ गई है। CAG ने साफ कहा कि इस तरह की उत्पादक पूँजी में कटौती कर्नाटक के भविष्य के विकास को नुकसान पहुँचाएगी।

कॉन्ग्रेस सरकार का दावा है कि ये योजनाएँ असमानता कम करती हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं और मानव पूँजी विकास को बढ़ावा देती हैं। लेकिन CAG ने चेताया कि अगर दूसरी सब्सिडी को कम या तर्कसंगत नहीं किया गया, तो ये गारंटी योजनाएँ ‘राज्य की वित्तीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डालेंगी।’

इन योजनाओं के शुरू होने के बाद कर्नाटक स्थिरता से कर्ज और वित्तीय तनाव की स्थिति में पहुँच गया है।

2023 में बीजेपी का संतुलित ‘सरप्लस’ बजट

वर्तमान स्थिति फरवरी 2023 के बिल्कुल उलट है, जब बीजेपी के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सरप्लस बजट पेश किया था। कई लोगों को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव के चलते बीजेपी लोकलुभावन वादों के साथ बड़ा दाँव खेलेगी। लेकिन बोम्मई सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं को वित्तीय जिम्मेदारी के साथ संतुलित कर सबको चौंका दिया।

बजट में हर विभाग को ध्यान में रखा गया, बिना राज्य के वित्त को नुकसान पहुँचाए। किसानों, युवाओं और महिलाओं को योजनाओं का केंद्र बनाया गया। कृषि को भारी आवंटन मिला और किसानों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा बढ़ाई गई। जैसा कि उम्मीद थी, कोई नया कर नहीं लगाया गया और शराब की कीमतों को भी नहीं छुआ गया।

शिक्षा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जिसमें 37,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया गया। बोम्मई ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त बस पास और महिलाओं – छात्रों के लिए सब्सिडी की घोषणा की।

बुनियादी ढाँचे को भी बोम्मई के बजट में जगह मिली। अपर भद्रा जल परियोजना को 5,300 करोड़ रुपए और कालसा बाँदूरी परियोजना को 1,000 करोड़ रुपए दिए गए। कर्नाटक में पानी के मुद्दे संवेदनशील हैं और ये आवंटन बीजेपी की योजनाओं में प्रमुख थे। बेंगलुरु को भी बेहतर गतिशीलता और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचा फंडिंग का वादा किया गया।

विपक्ष ने दावा किया कि बोम्मई और ज्यादा लोकलुभावन पहल कर सकते थे, खासकर कॉन्ग्रेस के मुफ्त बिजली और नकद पुरस्कारों की आक्रामक गारंटी के सामने। फिर भी दबाव के बावजूद बीजेपी सरकार ने लोगों के लिए केंद्रित और वित्तीय रूप से समझदार बजट पेश किया। उस साल राज्य को राजस्व सरप्लस भी मिला। यह नाजुक संतुलन अब मौजूदा आँकड़ों से साफ तौर पर उजागर हो रहा है।

सिद्धारमैया की मुफ्त योजनाएँ कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे डुबो रही हैं

2023 में कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व में कर्नाटक सरकार ने अपनी पाँच गारंटी योजनाएँ शुरू कीं। ये योजनाएँ कॉन्ग्रेस के चुनाव अभियान का आधार थीं और माना जाता है कि इनकी वजह से पार्टी को भारी जीत मिली। लेकिन अब इनका अर्थव्यवस्था पर खर्च साफ दिख रहा है।

कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के दो महीने बाद जुलाई 2024 में सिद्धारमैया के आर्थिक सलाहकार बसवराज रायरेड्डी ने स्वीकार किया कि इन गारंटी योजनाओं के लिए भारी राशि रखने की वजह से विकास परियोजनाओं के लिए पैसा नहीं बचा है।

उन्होंने खुलासा किया था कि इन योजनाओं पर करीब 65,000 करोड़ रुपए का खर्च आ रहा है। रायरेड्डी ने कहा “लोग विकास चाहते हैं। लेकिन मुझ पर विश्वास करें, बिल्कुल भी पैसा नहीं है। चूँकि मैं वित्तीय सलाहकार हूँ, मैंने यहाँ झील विकास परियोजना के लिए फंड जुटाया।”

कर्नाटक के सभी विधायक अपने क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने में असमर्थ हैं। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के नेता भी चुपके से स्वीकार कर रहे हैं कि ये गारंटी योजनाएँ सड़कों, सिंचाई और बुनियादी ढाँचे के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रही हैं।

बीजेपी विधायक रमेश जारकिहोली ने कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि वह बेंगलुरु पर ही बचे हुए थोड़े पैसे खर्च कर रही है और बाकी राज्य को अनदेखा कर रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार के समय शुरू हुईं अधिकांश परियोजनाएँ जैसे कि अथानी में बसवेश्वर और अम्माजेश्वरी सिंचाई परियोजनाएँ पूरी तरह ठप हो गई हैं।

कॉन्ग्रेस की मुफ्त योजनाओं ने पार्टी के अंदर भी तनाव पैदा किया है। कुछ कॉन्ग्रेस नेता दावा करते हैं कि इन योजनाओं से अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला और इतने भारी खर्च की कीमत सही थी या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं।

वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने कई बार वित्तीय तनाव को स्वीकार किया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जुलाई 2023 में माना कि पार्टी की गारंटी के लिए 40,000 करोड़ रुपए अलग रखने की वजह से विकास के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है।

मुफ्त योजनाएँ राज्य के बुनियादी ढाँचे के विकास को प्रभावित कर रही हैं

कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने 24 जून, 2025 को खुले तौर पर कहा कि वित्त मंत्रालय भी संभालने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त फंड नहीं है।

गृह मंत्री ने बागलकोट जिले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, “हमारे पास पैसा नहीं है, सिद्धारमैया के पास भी अब फंड नहीं है। हमने पहले ही सब कुछ लोगों को चावल, दाल और तेल के रूप में दे दिया है, हाँ तेल भी।”

परमेश्वर के मुताबिक, कॉन्ग्रेस सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च किया है, जिसके चलते नए पूंजीगत परियोजनाओं के लिए बजट में बहुत कम जगह बची है।

इससे पहले, कर्नाटक के लघु-स्तरीय उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री शरणबसप्पा दर्शनपुर ने कहा था कि कॉन्ग्रेस सरकार के पहले साल में बुनियादी ढाँचे का विकास कुछ हद तक प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि यह सिद्धारमैया सरकार की गारंटी योजनाओं की वजह से होगा।

मंत्री ने बताया कि इन गारंटी योजनाओं से खजाने पर 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ पड़ेगा।

दर्शनपुर ने कहा, “हमें अपनी पाँच गारंटी योजनाओं को लागू करने के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की जरूरत है। इससे विकास कार्य आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।”

‘गृह ज्योति’ योजना को फंड करने के लिए बिजली दरें 2.89 रुपए प्रति यूनिट बढ़ाई गईं

गृह ज्योति योजना ने धूम मचाई, लेकिन अब नागरिकों को इसका दर्द महसूस होने लगा है। गृह ज्योति योजना के तहत मुफ्त बिजली देने के लिए, 200 यूनिट से ज्यादा खपत पर बिजली की दरें 2.89 रुपए प्रति यूनिट बढ़ा दी गईं। राहत देने के बजाय कई परिवारों को मुफ्त स्लैब से ज्यादा खपत होने पर बिल में ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं।

कॉन्ग्रेस सरकार पर SC/ST विकास के लिए फंड डायवर्ट करने का आरोप

कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्नाटक अनुसूचित जाति उप-योजना और जनजातीय उप-योजना (SCSP-TSP) के तहत आवंटित फंड का करीब 37% हिस्सा अपनी पाँच गारंटी योजनाओं के लिए डायवर्ट कर दिया। बीजेपी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी दलित समुदायों के कल्याण के लिए रखे गए फंड को डायवर्ट कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस सरकार ने ‘गृहलक्ष्मी’ योजना के लिए 7,881.91 करोड़ रुपए, ‘भाग्यलक्ष्मी’ योजना के लिए 70.28 करोड़ रुपए, ‘गृहज्योति’ योजना के लिए 2,585.93 करोड़ रुपए, ‘अन्नभाग्य’ योजना के लिए 448.15 करोड़ रुपए, ‘अन्नभाग्य’ के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के लिए 2,187 करोड़ रुपए, ‘शक्ति’ योजना के लिए 1,451.45 करोड़ रुपए और ‘युवा निधि’ योजना के लिए 175.50 करोड़ रुपए SCSP-TSP से उपयोग करने का फैसला किया है।

KSRTC वेतन संकट: ‘शक्ति’ ने कैसे तोड़ा सार्वजनिक परिवहन

इससे पहले, 5 अगस्त 2025 को कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KSRTC) और बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (BMTC) के कर्मचारियों ने वेतन संशोधन और 38 महीने के बकाया भुगतान की माँग को लेकर हड़ताल किया था।

वे 25% वेतन वृद्धि और 1,800 करोड़ रुपए के बकाया भुगतान की माँग कर रहे थे। हालाँकि वित्तीय तंगी की वजह से राज्य सरकार ने सिर्फ 14 महीने के बकाया का निपटारा करने का प्रस्ताव रखा।

कर्मचारियों को गुस्सा इस बात का था कि उनकी तनख्वाह रोकी जा रही है, जबकि सरकार शक्ति योजना पर हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिसमें महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा मिलती है। कॉन्ग्रेस सरकार पर चार सरकारी परिवहन निगमों (KSRTC, BMTC, NWKRTC, KKRTC) को शक्ति योजना के लिए 1,600 करोड़ रुपए का बकाया है।

इन कंपनियों पर पहले से ही 6,330 करोड़ रुपए का कर्ज है और इस मुफ्त योजना ने उनकी वित्तीय स्थिति को और खराब कर दिया है। वेतन रुक गए हैं और कर्मचारी अब सड़कों पर उतरकर न्याय की माँग कर रहे हैं। इस बीच कर्नाटक में हजारों यात्री बसों के बंद होने से परेशान हैं।

कर्नाटक का दो साल का अनुभव एक सबक है। कल्याणकारी योजनाएँ अल्पकालिक राजनीतिक फायदे के लिए मददगार हो सकती हैं, लेकिन बिना वित्तीय समझदारी के अंधाधुंध लोकलुभावन नीतियां अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकती हैं। बीजेपी का 2023 का सरप्लस बजट दिखाता है कि कल्याण और विकास में संतुलन बनाया जा सकता है, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार की जल्दबाजी में शुरू की गई गारंटी योजनाओं ने इन लाभों को रिकॉर्ड समय में उलट दिया।

राजस्व सरप्लस से राजस्व घाटे तक, रुके हुए बुनियादी ढाँचे से लेकर योजनाबद्ध परियोजनाओं तक और वित्तीय समझदारी से बढ़ते कर्ज तक, कर्नाटक की अर्थव्यवस्था आज लोकलुभावन राजनीति की कीमत चुका रही है। अगर सब्सिडी को तर्कसंगत करने और विकास-प्रधान प्राथमिकताओं जैसे सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य और गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया जाएगा।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

जेल से अब नहीं चलेगी सरकार, संविधान संशोधन बिल पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने बोला हमला: कहा- जिन्होंने लालू यादव की राजनीति खत्म की, अब उनके साथ दे रहे भाषण

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (20 अगस्त 2025) को लोकसभा में संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक-2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किए। इन विधेयकों का उद्देश्य राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है, लेकिन जैसे ही ये बिल सदन में पेश हुए, विपक्षी दलों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया।

नारेबाजी, कागज फाड़ने और हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इस बीच, गृह मंत्री अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष पर जमकर निशाना साधा और अपनी सरकार की मंशा को स्पष्ट किया।

अमित शाह ने बताया भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कदम

गृहमंत्री अमित शाह ने अपने बयान में कहा, “देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देखकर मैंने संसद में लोकसभा अध्यक्ष जी की सहमति से संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री जेल में रहते हुए सरकार न चला पाएँ।”

उन्होंने कहा कि इस बिल का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में गिरते नैतिकता के स्तर को ऊपर उठाना और राजनीति में शुचिता लाना है। बिल में तीन मुख्य प्रावधान हैं-

  1. कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता।
  2. संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा था कि भविष्य में ऐसे राजनेता आएँगे जो गिरफ्तारी के बावजूद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं देंगे। हाल के वर्षों में कुछ मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने जेल से सरकार चलाने की कोशिश की, जो अनैतिक है।
  3. बिल में यह प्रावधान है कि अगर कोई राजनेता 30 दिन के भीतर जमानत नहीं ले पाता, तो 31वें दिन उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। हालाँकि जमानत मिलने पर वह अपने पद पर वापस आ सकता है।

अमित शाह ने जोर देकर कहा, “अब देश की जनता को यह तय करना पड़ेगा कि क्या जेल में रहकर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा सरकार चलाना उचित है?” उन्होंने इस बिल को राजनीतिक नैतिकता को मजबूत करने वाला कदम बताया और कहा कि यह जनता की भावनाओं का सम्मान करता है।

मोदी बनाम कॉन्ग्रेस की नीति

अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को कानून के दायरे में लाने का संविधान संशोधन पेश किया है और दूसरी ओर कानून के दायरे से बाहर रहने, जेल से सरकारें चलाने और कुर्सी का मोह न छोड़ने के लिए कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने इसका विरोध किया है।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों का जिक्र करते हुए कहा कि 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान संशोधन संख्या-39 के जरिए प्रधानमंत्री को कानूनी कार्यवाही से ऊपर रखने का प्रावधान किया था। शाह ने तंज कसते हुए कहा, “यह कॉन्ग्रेस की कार्य संस्कृति है कि वे प्रधानमंत्री को कानून से ऊपर करते हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी की नीति है कि हम अपने प्रधानमंत्री, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को कानून के दायरे में ला रहे हैं।”

गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल को जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप बताया और कहा कि यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि कोई भी नेता गंभीर आपराधिक आरोपों में जेल में रहकर शासन नहीं कर सकता। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए इस बिल का विरोध कर रहे हैं।

व्यक्तिगत टिप्पणी पर भी दिया जवाब

विपक्षी सांसद केसी वेणुगोपाल ने शाह पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि जब शाह गुजरात के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने एक मामले में नैतिकता का पालन नहीं किया था। इस पर शाह ने तीखा जवाब देते हुए कहा, “मैं कॉन्ग्रेस को याद दिलाना चाहता हूँ कि मैंने अरेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और बेल पर बाहर आने के बाद भी, जब तक मैं अदालत से पूरी तरह निर्दोष साबित नहीं हुआ, तब तक मैंने कोई संवैधानिक पद नहीं लिया था। मेरे ऊपर लगाए गए फर्जी केस को अदालत ने यह कहते हुए खारिज किया कि केस political vendetta से प्रेरित था।”

केंद्रीय गृहमंत्री ने बीजेपी और एनडीए की नैतिकता का हवाला देते हुए कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी ने भी केवल आरोप लगने पर ही इस्तीफा दे दिया था। दूसरी ओर उन्होंने कॉन्ग्रेस पर लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को बचाने का आरोप लगाया।

अमित शाह ने कहा, “जिस लालू प्रसाद यादव को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने अध्यादेश लाया था, जिसका राहुल गाँधी ने विरोध किया था, आज वही राहुल गाँधी पटना में लालू जी को गले लगा रहे हैं। विपक्ष का यह दोहरा चरित्र जनता भली-भांति समझ चुकी है।”

केंद्र सरकार लाई कौन से बिल, जिस पर विपक्ष कर रहा आपत्ति

संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक-2025 में प्रावधान है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक मामले (5 साल या उससे अधिक सजा वाले) में 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन करता है। सरकार का दावा है कि यह बिल राजनीति में शुचिता लाने और जनता के प्रति नेताओं की जवाबदेही बढ़ाने के लिए है।

विपक्ष ने इस बिल को संविधान के साथ छेड़छाड़ और गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने की साजिश करार दिया। विपक्षी सांसदों ने बिल की कॉपियाँ फाड़कर और शाह की ओर कागज फेंककर विरोध जताया।

जेपीसी के पास भेजा गया बिल

हंगामे के बीच शाह ने कहा कि सरकार इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का प्रस्ताव रखती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद शामिल होंगे। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि नैतिकता के मूल्य बढ़ें। हम ऐसे निर्लज्ज नहीं हो सकते कि हम पर आरोप लगें और हम संवैधानिक पद पर बने रहें।”

संविधान संशोधन बिल ने संसद में तीखी बहस और हंगामे को जन्म दिया है। अमित शाह ने इसे नैतिकता और पारदर्शिता का कदम बताया, जबकि विपक्ष इसे संविधान के साथ छेड़छाड़ करार दे रहा है। जेपीसी में इस बिल पर गहन चर्चा होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह विधेयक भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। जनता भी अब इस सवाल का जवाब ढूँढ रही है कि क्या जेल से सरकार चलाना उचित है, चूँकि वो कुछ समय पहले ही दिल्ली में ऐसा होते देख चुकी है, जिसमें पूरे दिल्ली की व्यवस्थाएँ चरमरा गई थी।

फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे… दुनियाभर से CSDS को मिलता है पैसा, संजय कुमार के ‘डाटा फ्रॉड’ के बाद फंड देने वाली सरकारी संस्थान ने भेजा नोटिस

देश में ‘वोट चोरी’ के नाम पर राजनीतिक बवंडर खड़ा करने वाले सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के संजय कुमार और कॉन्ग्रेस के युवराज राहुल गाँधी समेत कई लोगों के खिलाफ दिल्ली में शिकायत की गई है। फर्जी आँकड़ों के आधार पर ये खेल शुरू करने वाले संजय कुमार अब निशाने पर आ चुके हैं।

इस बीच, सीएसडीएस को सबसे ज्यादा फंडिंग देने वाली सरकारी संस्थान – भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) ने CSDS पर सवाल उठाए हैं और शो कॉज नोटिस जारी किया है। ICSSR ने सीएसडीएस पर फर्जी डेटा पेश करने और चुनाव आयोग की गरिमा को ठेस पहुँचाने का भी आरोप लगाया है। वहीं, सीएसडीएस की विदेशी फंडिंग खासकर जर्मनी की कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन से मिलने वाले करोड़ों रुपए अब जाँच के घेरे में हैं। आइए समझते हैं पूरा मामला..

मामला कैसे शुरू हुआ?

यह विवाद 17 अगस्त 2025 को तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि नासिक वेस्ट का वोटर संख्या लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव तक 47.38% बढ़ गई, जबकि हिंगणा में 42.08% की बढ़ोतरी हुई। साथ ही, रामटेक और देवलाली में वोटर संख्या में 40% की कमी आई। इन दावों को कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी बढ़ाया और चुनाव आयोग (ECI) पर सवाल उठाए। खेड़ा ने तो तंज कसते हुए लिखा, “अगली बार वे कहेंगे कि 2+2=420।”

लेकिन 19 अगस्त को संजय कुमार को कथित तौर पर अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने अपने पोस्ट को डिलीट कर दिया और माफी माँगी। उनका कहना था कि उनकी टीम ने डेटा की पंक्तियों को गलत पढ़ लिया था। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।

फर्जी आँकड़े सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर फैल चुके थे। असली डेटा देखें तो नासिक वेस्ट में वोटर संख्या में सिर्फ 6% और हिंगणा में 5.9% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि रामटेक और देवलाली में 3-4% की मामूली वृद्धि हुई।

ICSSR की कड़ी प्रतिक्रिया

इस घटना से नाराज होकर 19 अगस्त को ICSSR ने एक बयान जारी किया। शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली ICSSR सीएसडीएस को फंडिंग देने वाली मुख्य संस्था है। ICSSR के बयान में कहा गया कि सीएसडीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी (संजय कुमार) ने गलत डेटा पेश किया, जो बाद में वापस लेना पड़ा। इसके अलावा, सीएसडीएस ने चुनाव आयोग के SIR (सार्वजनिक जानकारी अभ्यास) को गलत तरीके से पेश करके मीडिया स्टोरीज छापीं।

ICSSR ने कहा कि चुनाव आयोग भारत की सबसे बड़ी लोकतंत्र की रीढ़ है और इसके सम्मान को ठेस पहुँचाना गंभीर अपराध है। उन्होंने सीएसडीएस पर डेटा से छेड़छाड़ और गलत नैरेटिव बनाने का आरोप लगाया, जो उनके अनुदान नियमों (Grant-in-Aid Rules) का उल्लंघन है। इसके जवाब में ICSSR ने सीएसडीएस को शो कॉज नोटिस जारी करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि यह घटना संस्थान और चुनाव प्रक्रिया दोनों की गरिमा को ठेस पहुँचाती है।

विनीत जिंदल ने दर्ज कराई एफआईआर

इसी बीच वकील विनीत जिंदल ने 19 अगस्त 2025 को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को एक शिकायत दी। उनकी शिकायत में राहुल गाँधी (विपक्ष के नेता), संजय कुमार (सीएसडीएस) और लोकसभा के सदस्य लोक सबा समेत कई लोगों पर आरोप लगाए गए। जिंदल का कहना है कि इन लोगों ने फर्जी डेटा फैलाकर जनता में अशांति फैलाई और सरकार के खिलाफ साजिश रची। उन्होंने कहा कि यह डेटा लोकसभा चुनावों को लेकर गलत था और चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी।

जिंदल ने अपनी शिकायत में लिखा कि ये लोग सोशल मीडिया और प्रेस के जरिए झूठी खबरें फैला रहे हैं, जिससे जनता का भरोसा लोकतंत्र पर कमजोर हो रहा है। उन्होंने माँग की कि इस मामले में सख्त कार्रवाई हो और जाँच शुरू की जाए।

सीएसडीएस की फंडिंग: कौन देता है पैसा?

अब सवाल उठता है कि सीएसडीएस को फंडिंग कहाँ से मिलती है? ICSSR सीएसडीएस का मुख्य फंडर है, जो सरकार के जरिए चलता है। लेकिन इसके अलावा सीएसडीएस को विदेशी फंडिंग भी मिलती है, जिस पर कई सवाल उठ रहे हैं।

सीएसडीएस की वेबसाइट और विदेशी योगदान की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों और संगठनों से पैसा आता है। इनमें फोर्ड फाउंडेशन, गेट्स फाउंडेशन (अमेरिका), आईडीआरसी (International Development Research Centre-कनाडा), डीएफआईडी (यूके), नॉराड (नॉर्वे), ह्यूलेट फाउंडेशन और जर्मनी की KAS जैसी एजेंसियाँ शामिल हैं। इसके अलावा स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान की कुछ एनजीओ से भी डोनेशन मिलते हैं।

हैरानी की बात है कि जर्मनी की सत्ताधारी पार्टी सीडीयू (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन ऑफ जर्मनी) से जुड़ी कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन सीएसडीएस के लिए सर्वाधिक फंडिंग करती है। सीएसडीएस की वेबसाइट पर विदेशी फंडिग से जुड़ी जो जानकारी साझा की गई है, वो जनवरी 2016 से लेकर अब तक की है।

हर तिमाही में कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को लाखों की फंडिंग की है। इन 10 सालों में देखा जाए, तो ये आँकड़ा कई करोड़ों में है। हालाँकि बदले में सीएसडीएस ने कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन के साथ मिलकर कुछ रिसर्स पेपर पब्लिश किए हैं, लेकिन फंडिंग के स्तर और काम को देखते हुए साफ है कि ये पैसा सिर्फ रिसर्च पेपर के लिए तो नहीं ही मिलता है।

CSDS के सहयोग से जर्मन संस्था द्वारा प्रकाशित पेपर

बीते एक साल की बात की जाए, तो कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को 25 लाख 9 हजार 190 रुपए ( 29 सितंबर 2024 को ₹4,58,950, 20 नवंबर 2024 को ₹4,39,300 / 17 दिसंबर 2024 को ₹4,38,600 रुपए / 27 फरवरी 2025 को ₹11,72,340) दिए।

वहीं, अमेरिका की UCLA लाइब्रेरी से ₹12.71 लाख का डोनेशन मिला। UCLA की लाइब्रेरी डिपार्टमेंट से जुड़ी रेचेल डेबलिंगर ने ये धन दिए हैं। उसने 24 जून 2024 को भी 24 लाख 92 हजार रुपए से ज्यादा की धनराशि दान दी है।

जनवरी 2024 में फ्रांस की FNSP संस्था के पास से 12 लाख रुपए से अधिक की धनराशि आई, तो ब्रिटिश लाइब्रेरी ने 5 फरवरी 2024 को 14 लाख रुपए से ज्यादा की धनराशि CSDS को दी।

इसके अलावा अतीत में जाकर देखें तो साल 2016 से अगले कई सालों तक कनाडा की संस्था की तरफ से हर साल करोड़ों की धनराशि लगातार मिलती रही। भारत सरकार ने एनजीओ की आड़ में विदेशी धन के प्रवाह को रोकने के लिए जब कदम उठाए, तो इसका असल सीएसडीएस की फंडिंग पर भी पड़ा। साल 2016 और 2025 के आँकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।

इन विदेशी फंडिंग का आँकड़ा हर तिमाही की रिपोर्ट में उपलब्ध है, जो सीएसडीएस की वेबसाइट पर सार्वजनिक है। आरोप है कि यह पैसा हिंदू समाज को जाति के आधार पर बाँटने और गलत नैरेटिव बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम में हिंदुओं को ओबीसी, ईबीसी, दलित और सवर्ण में बांटकर वोटिंग पैटर्न की रिपोर्ट छापी जाती है, जो अखबारों में सुर्खियाँ बनती हैं। लेकिन मुसलमानों की अंदरूनी जातीय दरारों (जैसे दलित मुसलमान, अशरफ) पर चुप्पी साध ली जाती है।

कई लोग इसे साजिश मानते हैं और कहते हैं कि सीएसडीएस का मकसद हिंदू समाज को तोड़कर कॉन्ग्रेस जैसे दलों को फायदा पहुँचाना है। योगेंद्र यादव और संजय कुमार जैसे नाम इस एजेंडे को हमेशा आगे बढ़ाते दिखते हैं। फिर, योगेंद्र कुमार किसान आंदोलन से लेकर उन तमाम मंचों पर खड़े नजर आते हैं, जो सरकार के विरोध में खड़े होते हैं।

फंडिंग रोकने की आशंका

ICSSR ने साफ कर दिया है कि सीएसडीएस का यह व्यवहार उनके नियमों का उल्लंघन है। शो कॉज नोटिस के बाद अगर सीएसडीएस संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता, तो फंडिंग रोकने की नौबत आ सकती है। यह कदम न सिर्फ सीएसडीएस के लिए बड़ा झटका होगा, बल्कि इस बात की भी जाँच शुरू हो सकती है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। अगर साबित हो जाता है कि विदेशी पैसा किसी खास राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल हुआ तो कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

विदेशी फंडिंग की वजह से अफवाहों में शामिल हुआ CSDS?

यह पूरा मामला अब साजिश के दावों से भरा हुआ है। एक तरफ जहाँ ICSSR और विनीत जिंदल इसे जानबूझकर फैलाई गई अफवाह मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सीएसडीएस इसे तकनीकी गलती बता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि एक प्रतिष्ठित संस्थान जैसे सीएसडीएस की टीम ने बिना जाँच-पड़ताल के डेटा क्यों पेश किया? क्या यह गलती सचमुच भूल थी या इसके पीछे कोई बड़ा प्लान था?

आरोप हैं कि विदेशी फंडिंग का दबाव सीएसडीएस पर है, जिसके चलते वह गलत डेटा पेश कर रहा है। हालाँकि ये तो तय है कि यह घटना भारतीय लोकतंत्र और शोध संस्थानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।

दूर तलक जाएगा ये मामला

सीएसडीएस को ICSSR के शो कॉज नोटिस और विनीत जिंदल की एफआईआर से साफ है कि यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख बचाने और फर्जी डेटा से नुकसान को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अगर सीएसडीएस दोषी पाया जाता है, तो न सिर्फ उसकी फंडिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि उसके शोध कार्यों पर भी सवाल उठेंगे।

दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग की जाँच शुरू होने से सीएसडीएस को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जनता के लिए भी यह सब एक सबक है कि सोशल मीडिया पर आने वाली हर खबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई जाँच लेनी चाहिए।

यह पूरा मामला सीएसडीएस, ICSSR और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। फंडिंग को लेकर उठे सवाल, फर्जी डेटा का विवाद, और एफआईआर सब कुछ मिलाकर यह दिखाता है कि शोध संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। ICSSR का कड़ा रुख और जिंदल की शिकायत से उम्मीद है कि सच सामने आएगा और दोषियों पर कार्रवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि जाँच निष्पक्ष हो, ताकि किसी का भी राजनीतिक फायदा न हो।

जुमे पर नमाज नहीं पढ़ी तो होगी 2 साल की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना: मलेशिया में तालिबानी फरमान का हो रहा विरोध, इसी मुल्क में है भारत का भगोड़ा जाकिर नाइक

मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज पढ़ने में नहीं शामिल होने वाले मुस्लिमों पुरुषों को 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। शरिया कानून को सख्ती से लागू करते हुए सरकार ने ये फरमान सुनाया है।

इसमें कहा गया है कि अगर बिनी किसी उचित कारण बताए शुक्रवार की नमाज में अनुपस्थित रहे, तो मुस्लिम पुरुषों को जेल जाना पड़ेगा। साथ ही 3000 रिंगिट यानी 61,000 रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

पहले लगातार 3 जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य था

टेरेंगानू में पीएएस यानी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी की सरकार है। पहले लगातार तीन शुक्रवार को नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को ये सजा दी जाती थी। लेकिन अब हर जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य के कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने बेरिटा हरियन अखबार को बताया, “नमाज केवल मजहबी प्रतीक नहीं है, बल्कि मुस्लिमों की खुदा के आज्ञा मानने से भी जुड़ा हुआ है।”

तालिबान बन जाएँगे हम- अजीज

इस पर मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने तर्क दिया है कि कुरान में कहा गया है कि ‘मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं’ होती। सरकार का फरमान इसके खिलाफ है। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन इसे अपराध बनाना गलत है। हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता है, वरना हम तालिबान बन जाएँगे।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया के इस राज्य में कोई विपक्षी पार्टी नहीं है। 12 लाख की आबादी है, जिसमें अधिकतर स्थानीय मुस्लिम हैं। सत्ताधारी पीएएस पार्टी ने 2022 में सभी 32 सीटों पर जीत हासिल की थी। ये हथकंडा पीएएस को अपनी सत्ता बचाने के लिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि दो साल के अंदर चुनाव होने वाले हैं।

इस्लाम मलेशिया का आधिकारिक मजहब है। मलेशिया का संविधान राज्यों को इस्लामी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उसका क्षेत्र परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए।

दूसरे राज्य ने भी कानून बनाना चाहा था

2019 में, मलेशियाई राज्य केलंतन ने अपने शरिया कानून को विस्तार देना चाहा था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यहाँ मलेशियाई संघ का कानून सबसे अहम है। इस फैसले को पीएएस नेताओं ने इस्लामी सत्ता पर हमले के रूप में प्रचारित किया और जमकर बवाल काटा।

तेरेंगानु के नए फरमान के खिलाफ भी लोग सड़कों पर आ गए हैं। कई लोगों ने कानूनी दबाव के जरिए मजहबी रिवाजों को मनवाने की ‘समझदारी’ पर सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कहा, “धर्मनिष्ठा दिल से आनी चाहिए, न कि लोगों के डर से”। कुछ लोगों ने चेताया है कि ऐसे कानून दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं।

मलेशिया में ही है भगोड़ा जाकिर नाइक

भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

पूजा ने ठोक दिया रेप-SC/ST एक्ट का केस, जाँच में पता चला वह मौके पर थी ही नहीं: जमीन विवाद में फर्जी मुकदमा करवाने वाले वकील को उम्रकैद, जानिए क्या है मामला

लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक वकील परमानंद गुप्ता को झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही ₹5.10 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। वकील ने एक जमीन विवाद में पड़ोसियों को फँसाने के लिए पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली महिला से झूठा रेप केस दर्ज करवाया। जाँच में सभी आरोप बेबुनियाद निकले।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वकील परमानंद गुप्ता ने एक जमीन विवाद में अपने पड़ोसी अरविंद यादव और उनके परिवार को फँसाने के लिए दलित महिला पूजा रावत से बलात्कार और उत्पीड़न का फर्जी केस दर्ज कराया। पूजा रावत वकील की पत्नी संगीता गुप्ता के ब्यूटी पार्लर में काम करती थी।

मुकदमे में आरोप लगाया गया कि मार्च से जुलाई 2024 के बीच उसके साथ दुराचार हुआ। वकील परमानंद गुप्ता का मकसद था कि इस आरोप के बाद उसके विरोधियों को जेल हो जाएगी और वह व्यक्तिगत बदला भी ले लेगा।

जाँच में कैसे खुला फर्जीवाड़ा?

सीबीआई जाँच अधिकारी ने पाया कि पूजा रावत घटना के समय 1 मार्च 2024 से 24 जुलाई 2024 तक मौके पर मौजूद नहीं थी। जहाँ उसे किरायेदार बताया गया था, वह मकान उस समय निर्माणाधीन था। मोबाइल लोकेशन, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज़ों से साबित हुआ कि मामला पूरी तरह फर्जी है।

पूजा रावत ने कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि वकील परमानंद गुप्ता और उसकी पत्नी ने दबाव बनाकर झूठे बयान दिलवाए। वह डर के कारण मजिस्ट्रेट के सामने झूठा बयान देने को मजबूर हुई।

कोर्ट का फैसला: उम्रकैद और AI निगरानी का आदेश

स्पेशल जज विवेकानंद त्रिपाठी ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि दूध से भरे महासागर में खट्टे पदार्थों की बूंदों को गिरने से नहीं रोका गया तो पूरा महासागर खराब और नष्ट हो जाएगा।” जज ने यह भी कहा कि अगर ऐसे वकीलों को नहीं रोका गया तो भारतीय न्यायपालिका पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।

कोर्ट ने बताया कि परमानंद गुप्ता ने 11 और पूजा गुप्ता ने 18 फर्जी मुकदमे दर्ज करवाए, इसलिए दोषी वकील को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा कोर्ट ने झूठे मुकदमों को रोकने के लिए AI का उपयोग करने का निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ रोकी जा सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR दर्ज होते ही मुआवजे की राशि न दी जाए, बल्कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही दी जाए।

कोर्ट ने पूजा रावत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। हालाँकि, अदालत ने उसे चेतावनी दी कि अगर वह भविष्य में ऐसा करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।