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जुमे पर नमाज नहीं पढ़ी तो होगी 2 साल की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना: मलेशिया में तालिबानी फरमान का हो रहा विरोध, इसी मुल्क में है भारत का भगोड़ा जाकिर नाइक

मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज नहीं पढ़ने पर 2 साल जेल की सजा काटनी होगी, साथ ही 61000 रुपए जुर्माना भी देना होगा। पहले लगातार तीन बार जुमे की नमाज नहीं पढ़ने पर सजा होती थी।

मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज पढ़ने में नहीं शामिल होने वाले मुस्लिमों पुरुषों को 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। शरिया कानून को सख्ती से लागू करते हुए सरकार ने ये फरमान सुनाया है।

इसमें कहा गया है कि अगर बिनी किसी उचित कारण बताए शुक्रवार की नमाज में अनुपस्थित रहे, तो मुस्लिम पुरुषों को जेल जाना पड़ेगा। साथ ही 3000 रिंगिट यानी 61,000 रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

पहले लगातार 3 जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य था

टेरेंगानू में पीएएस यानी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी की सरकार है। पहले लगातार तीन शुक्रवार को नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को ये सजा दी जाती थी। लेकिन अब हर जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य के कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने बेरिटा हरियन अखबार को बताया, “नमाज केवल मजहबी प्रतीक नहीं है, बल्कि मुस्लिमों की खुदा के आज्ञा मानने से भी जुड़ा हुआ है।”

तालिबान बन जाएँगे हम- अजीज

इस पर मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने तर्क दिया है कि कुरान में कहा गया है कि ‘मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं’ होती। सरकार का फरमान इसके खिलाफ है। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन इसे अपराध बनाना गलत है। हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता है, वरना हम तालिबान बन जाएँगे।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया के इस राज्य में कोई विपक्षी पार्टी नहीं है। 12 लाख की आबादी है, जिसमें अधिकतर स्थानीय मुस्लिम हैं। सत्ताधारी पीएएस पार्टी ने 2022 में सभी 32 सीटों पर जीत हासिल की थी। ये हथकंडा पीएएस को अपनी सत्ता बचाने के लिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि दो साल के अंदर चुनाव होने वाले हैं।

इस्लाम मलेशिया का आधिकारिक मजहब है। मलेशिया का संविधान राज्यों को इस्लामी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उसका क्षेत्र परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए।

दूसरे राज्य ने भी कानून बनाना चाहा था

2019 में, मलेशियाई राज्य केलंतन ने अपने शरिया कानून को विस्तार देना चाहा था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यहाँ मलेशियाई संघ का कानून सबसे अहम है। इस फैसले को पीएएस नेताओं ने इस्लामी सत्ता पर हमले के रूप में प्रचारित किया और जमकर बवाल काटा।

तेरेंगानु के नए फरमान के खिलाफ भी लोग सड़कों पर आ गए हैं। कई लोगों ने कानूनी दबाव के जरिए मजहबी रिवाजों को मनवाने की ‘समझदारी’ पर सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कहा, “धर्मनिष्ठा दिल से आनी चाहिए, न कि लोगों के डर से”। कुछ लोगों ने चेताया है कि ऐसे कानून दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं।

मलेशिया में ही है भगोड़ा जाकिर नाइक

भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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