Home Blog

मुफ्त इलाज का ढकोसला और महँगे मेडिकल बिल: कहाँ खर्च हो रहा है आम आदमी का पैसा?

दिल्ली में बीते 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक ऐसे मामले पर सुनवाई की जिसने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। एक दवा डीलर की पत्नी का इलाज एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था। जिस कैंसर के इंजेक्शन को डीलर बाजार से खुद 11,000 रुपए में खरीद सकता था, उसे अस्पताल ने बाहर से लाने नहीं दिया और बिल में उसकी कीमत 1.30 लाख रुपए जोड़ दी।

कोर्ट ने सख्त सवाल किया कि इस खुली लूट का क्या औचित्य है और मरीज की जेब से निकला यह पैसा आखिर कहाँ जाता है? सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि जो ग्लूकोज (सेलाइन ड्रिप) रिटेलर को सिर्फ 15 रुपए में मिलती है, उसे अस्पताल के बिल में 250 रुपए का दिखाया जाता है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि करीब 90 प्रतिशत दवाइयाँ आज भी प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर हैं और सरकार का हालिया फैसला बहुत छोटे हिस्से को छूता है। प्राइवेट वकीलों ने तर्क दिया कि अस्पताल खुद बुनियादी ढाँचे की कमियों को पूरा करते हैं, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि लोगों की जिंदगियाँ कोई कमर्शियल व्यापार नहीं हैं।

केंद्र की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार नीतियों पर लगातार नजर रखती है। लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि 11,000 रुपए के इंजेक्शन का बिल 1.30 लाख रुपए होना कोई आम बात नहीं है, ये लोगों की जिंदगी है कोई व्यापार नहीं। प्राइवेट अस्पतालों की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतागी ने तर्क दिया कि देश के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की कमियों को प्राइवेट अस्पताल ही पूरा करते हैं। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि अस्पताल दूसरे तरीकों से चल सकते हैं, लेकिन जो संस्थान पहले से बेड, टेस्ट और ऑपरेशन के पैसे ले रहा है, वह दवाइयों पर 100 से 200 गुना मुनाफा नहीं वसूल सकता। लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और सभी पक्षों को लिखित दलीलें देने को कहा।

कैंसर की 137 दवाओं पर कीमत तय, फिर भी महँगी दवाएँ बरकरार

कोर्ट में इस बहस से ठीक पहले, 8 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाया। मंत्रालय ने घोषणा की कि सभी गैर-सूचीबद्ध (Non-Scheduled) कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन, रिटेलर प्राइस (PTR) से अधिकतम 30% ज्यादा ही एमआरपी (MRP) तय करने के लिए सीमित किया जाएगा। सरकार का अनुमान है कि इससे कुछ कैंसर दवाओं की कीमतें 70 प्रतिशत तक कम होंगी और देश भर के मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपए की सीधी बचत होगी।

यहाँ ‘सूचीबद्ध’ और ‘गैर-सूचीबद्ध’ दवाओं का फर्क समझना जरूरी है। सरकार सूची वाली दवाओं के लिए अधिकतम कीमत (सील प्राइस) तय करती है, लेकिन गैर-सूचीबद्ध दवाओं पर ऐसा कोई नियंत्रण नहीं होता, जिससे कंपनियों और अस्पतालों को मनमाना मुनाफा कमाने का मौका मिलता है। सरकार का यह नया कदम इसी दूसरी श्रेणी के लिए है। फरवरी 2019 में भी एनपीपीए (NPPA) ने ऐसा ही कैप लगाया था। शुरुआती खबरों में 110 दवाओं की बात थी, लेकिन बाद में एनपीपीए की औपचारिक नोटिफिकेशन में कुल 137 गैर-सूचीबद्ध कैंसर दवाओं को शामिल किया गया, जो 9 नवंबर 2026 से पूरे देश में लागू होनी हैं।

एनपीपीए ने 543 कैंसर से जुड़ी दवाओं (अलग-अलग ब्रांड और पैक) के दाम संशोधित किए हैं। कुछ मामलों में कीमतें बहुत ज्यादा कम हुई हैं:-

  • ब्रेस्ट कैंसर की दवा ‘पाल्बोसिक्लिब’ (Palbociclib) के एक पैक की कीमत 40,421 रुपए से घटकर सीधे 2,720 रुपए रह गई।
  • कीमोथैरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘थायोटेडा’ (Thiotepa) के एक वॉयल की कीमत लगभग 80,072 रुपए से घटकर 7,150 रुपए हो गई।
  • दासटिनिब, लेंवाटिनिब और ओलापारिब जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के दाम भी काफी घटे।

इसके बावजूद कई सबसे महँगी और जीवनरक्षक दवाएँ इस दायरे से बाहर हैं और उनके दाम जस के तस हैं। उदाहरण के लिए, 21 से ज्यादा प्रकार के कैंसर के इलाज में काम आने वाली चर्चित इम्यूनोथेरेपी दवा ‘कीट्रुडा’ (Keytruda) अभी भी 2,16,500 रुपए में बिक रही है। ब्रेस्ट कैंसर की दवा ‘रिबोसिक्लिब’ 24,435 रुपए पर बनी हुई है। टैग्रिसो, टेसेंट्रीक, डारजैलेक्स और इम्फिंज़ी के दाम में भी कोई राहत नहीं मिली है।

मरीजों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ‘AIDAN’ की कार्यकर्ता मालिनी ऐसोला का कहना है कि एक बड़ा कारण यह है कि सरकार ने उन दवाओं को इस प्राइस कंट्रोल से बाहर रखा है जिन्हें कंपनियाँ ‘पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम’ (PAPs) के तहत मुफ्त या भारी छूट पर देती हैं। उनका तर्क है कि इससे अस्पतालों और बिचौलियों को बड़ा मुनाफा कमाने का मौका मिल जाता है।

स्वास्थ्य खर्च का सच: एनएसएस (NSS) के 80वें सर्वे की रिपोर्ट

अब तक की बात बड़े प्राइवेट अस्पतालों और कैंसर की महँगी दवाओं की थी, लेकिन देश के ज्यादातर मरीज बुखार, सामान्य संक्रमण, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी आम समस्याओं से जूझते हैं। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि ‘मुफ्त इलाज’ का दावा करने वाले सरकारी अस्पतालों में वास्तव में आम आदमी की जेब कितनी हल्की होती है?

इस सवाल का सबसे पुख्ता जवाब नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के 80वें दौर से मिलता है, जिसे MoSPI ने जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच 1,39,732 परिवारों पर कराया और जिसके नतीजे 20 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक किए गए। यह सर्वे इलाज के कुल खर्चे (OOPME) की सटीक गणना करता है, यानी बीमा या कंपनी से मिलने वाले पैसे को घटाकर मरीज को अपनी जेब से कितना देना पड़ा।

सर्वे के आँकड़े साफ तस्वीर दिखाते हैं:

  • अस्पताल में भर्ती होने का खर्च: प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च सरकारी अस्पताल के मुकाबले करीब साढ़े सात गुना ज्यादा है ( ₹50,508 बनाम ₹6,631)। मीडियन स्तर पर यह अंतर 22 गुना तक है ( ₹24,000 बनाम ₹1,100)।
  • संस्थागत प्रसव (डिलिवरी): सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी का औसत खर्च ₹2,299 है, जबकि प्राइवेट में यह औसत उछलकर ₹37,630 हो जाता है। देश में अब लगभग 96.2% डिलीवरी अस्पतालों में होती हैं।
  • ओपीडी (OPD) सेवाएँ: ओपीडी के मामले में सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च मात्र ₹289 था और मीडियन शून्य (Zero) था, जिसका मतलब है कि आधे से ज्यादा इलाज सरकारी ओपीडी में पूरी तरह मुफ्त हुआ।

इसके बावजूद सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इतने कम खर्च के बावजूद लोग सरकारी अस्पतालों की तरफ क्यों नहीं जा रहे? रिपोर्ट बताती है कि देश में कुल अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में से सरकारी अस्पतालों की हिस्सेदारी गिरकर सिर्फ 36.7% रह गई है, जबकि पिछले सर्वे (2017-18) में यह करीब 42% थी। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के विशेषज्ञ ऊम्मेन सी. कुरियन के विश्लेषण के अनुसार, 2025 में गाँवों में 57.9% और शहरों में 64.6% भर्तियां प्राइवेट अस्पतालों में दर्ज की गईं। इसका साफ मतलब है कि आज भी दो में से एक-दो मरीज मजबूरी में प्राइवेट सेक्टर का रुख कर रहे हैं।

सरकारी अस्पतालों की 3 बड़ी कमजोरियाँ: दवा की खिड़की, बंद मशीनें और खाली डॉक्टर कुर्सियाँ

सरकारी अस्पतालों में ‘मुफ्त इलाज’ का वादा तीन मोर्चों पर आकर टूट जाता है-

  1. कागज पर मुफ्त दवा, खिड़की पर खाली हाथ: कायदे से डॉक्टर द्वारा लिखी दवा अस्पताल के स्टोर से मुफ्त मिलनी चाहिए, लेकिन सीएजी (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट (उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान) बताती हैं कि सप्लाई चेन टूटने के कारण कई जरूरी दवाएँ महीनों गायब रहती हैं। मजबूरन मरीज को बाहर की दुकान से पूरी एमआरपी पर दवा खरीदनी पड़ती है।
  2. मशीनें हैं पर टेक्नीशियन नहीं: सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी जाँचें मुफ्त होनी थीं, लेकिन ट्रेंड टेक्नीशियन, रेडियोलॉजिस्ट या सही समय पर मेंटेनेंस (AMC) न होने के कारण करोड़ों की मशीनें धूल फाँकती हैं और मरीज को प्राइवेट लैब के चक्कर काटने पड़ते हैं।
  3. खाली पड़ी कुर्सियाँ, स्पेशलिस्ट डॉक्टर कहाँ हैं?: स्वास्थ्य मंत्रालय की ‘हेल्थ डायनामिक्स ऑफ इंडिया’ रिपोर्ट बताती है कि गाँवों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में सर्जन, फिजीशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञों की भारी कमी है। मार्च 2023 के आँकड़ों के अनुसार, जितने स्पेशलिस्ट डॉक्टर होने चाहिए थे, उसके मुकाबले करीब 79.9% पद खाली पड़े थे। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान जैसे राज्यों में यह स्थिति और भी खराब है। जब गाँवों में डॉक्टर नहीं होंगे, तो गंभीर मरीजों को जिला मुख्यालय या प्राइवेट नर्सिंग होम भागना ही पड़ेगा।

आयुष्मान भारत (PM-JAY) और छुपे हुए खर्चों का बोझ

आयुष्मान भारत योजना के तहत हर परिवार को साल में 5 लाख तक का कैशलेस इलाज मिलता है और सितंबर 2024 से 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों को भी जोड़ा गया है। अगस्त 2026 तक 38,700 से ज्यादा अस्पताल इस योजना से जुड़ चुके हैं।

लेकिन नीति आयोग की एक मूल्यांकन रिपोर्ट (IQVIA कंसल्टिंग द्वारा) के अनुसार, प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने वाले 65 प्रतिशत लाभार्थियों को भी किसी न किसी रूप में अपनी जेब से पैसे (औसतन ₹53,965) खर्च करने पड़े। पैकेज में एम्बुलेंस का खर्च शामिल नहीं है, और कई बार जरूरी दवाइयाँ व जाँचें अस्पताल में न मिलने के कारण बाहर से करानी पड़ती हैं। इसके अलावा, मरीजों के परिजनों का रहना-खाना, यात्रा और दिहाड़ी का नुकसान भी जेब पर भारी पड़ता है।

स्वास्थ्य का अधिकार पाने का असली रास्ता

नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) के 2022-23 के आँकड़ों के मुताबिक, सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च बढ़कर ₹3.85 लाख करोड़ (जीडीपी का 1.43%) हो गया है। इसके चलते इलाज में लोगों की जेब से होने वाला खर्च (OOPME) घटकर 43.4% पर आ गया है। सरकार की हिस्सेदारी भी बढ़कर 43.7% हो गई है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि आज भी इलाज पर होने वाले कुल खर्च में सरकार और जनता (अपनी जेब से) लगभग बराबर यानी 43-43% हिस्सेदार हैं। यानी आधी लागत आज भी परिवार खुद उठा रहे हैं। नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017 का जीडीपी के 2.5% खर्च का लक्ष्य अभी भी दूर है।

जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह इंसानों की जिंदगी है कोई व्यापार नहीं, वैसे ही जब तक जमीनी स्तर पर सरकारी अस्पतालों की कमियों को दूर नहीं किया जाता, डॉक्टरों और दवाओं की पूरी व्यवस्था सुचारू नहीं होती, तब तक ‘मुफ्त इलाज’ का दावा कागजों तक ही सीमित रहेगा।

(यह ओरिजिनल रिपोर्ट Chapter1Mag पर प्रकाशित की गई है। ओरिजिनल स्टोरी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

आर्कबिशप पीटर मचाडो कौन हैं, जो चाहता है धर्मांतरण विरोधी कानून और गोहत्या कानून में बदलाव: कर्नाटक में कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे से क्या चाहता है?

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। बंगलुरू के आर्कबिशप ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलकर अपने माँगें उनके समक्ष रखी हैं। उनके साथ ईसाइयों का प्रतिनिधिमंडल भी साथ था। इनलोगों ने धर्मांतरण पर रोक लगाने वाला कानून हटाने, गोहत्या पर लगी पाबंदी की समीक्षा करने और ईसाइयों के लिए पिछड़ा वर्ग कटैगरी मे 1% आरक्षण देने की माँग की है।

बंगलुरु में मीडिया से बातचीत के दौरान आर्कबिशप पीटर मचाडो ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द करने की माँग की और बताया कि उन्होंने अल्पसंख्यक समुदायों, दलित समुदायों और किसान समुदायों की एक मीटिंग बुलाई थी। 30 अक्टूबर 2026 को बैंगलोर के आर्कबिशप पीटर मचाडो ने कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार से राज्य के एंटी-कन्वर्जन कानून को रद्द करने का अपना वादा पूरा करने की अपील की। ​पीटर मचाडो ने कहा कि राज्य में एंटी-कन्वर्जन कानून को रद्द करने से जुड़ी अपनी मांगों पर जोर देने के लिए माइनॉरिटी कम्युनिटी, दलित कम्युनिटी और किसान कम्युनिटी की एक मीटिंग बुलाई गई थी।

बैठक से एक दिन पहले कर्नाटक यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स ने एक बयान जारी किया जिसमें तीन क्षेत्र बताए गए जिनमें सरकार को दखल देना होगा, ये हैं- धार्मिक आज़ादी, सांप्रदायिक दुश्मनी से सुरक्षा और चुनावी वादों को पूरा करना।

उन्होंने कहा कि राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार बने लगभग तीन साल हो गए हैं और राज्य विधानसभा में भी उसके पास कानून को रद्द करने के लिए पर्याप्त संख्या है।

मचाडो ने कहा,“आज हमने माइनॉरिटी कम्युनिटी, दलित कम्युनिटी, किसान कम्युनिटी, खासकर उन लोगों की प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है जिन्हें राज्य के कानूनों से कुछ दिक्कतें आ रही हैं। सबसे पहले, हम ईसाई लोग सरकार से 2022 में पास हुए एंटी-कन्वर्जन कानून को रद्द करने की ज़ोरदार मांग कर रहे हैं। “…इसे पिछली सरकार ने पास किया था, और यह सरकार, जो उस समय सत्ता में आने की कोशिश कर रही थी, उन्होंने इसे मैनिफेस्टो में डाल दिया है कि अगर वे सत्ता में आए, तो वे तुरंत एंटी-कन्वर्जन कानून को वापस ले लेंगे…”

धर्मांतरण विरोधी कानून के अलावा, पीटर मचाडो ने यह भी कहा कि कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम समुदाय समेत अलग-अलग समुदायों से गोहत्या विरोधी बिल के बारे में वादे किए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि “यह उनकी तरफ से बहुत अच्छा नहीं लग रहा है क्योंकि इससे मुस्लिम और किसान परेशान हो रहे हैं।”

फिर उन्होंने दावा किया कि बूढ़े मवेशियों की देखभाल की ज़रूरत है और “अगर वे गौशाला नहीं जा सकते…,” उन्होंने इशारा किया कि बूचड़खाने ही एकमात्र दूसरी जगह हैं। “कुछ जगहों पर, सरकार ने ऐसा किया है। यह ठीक है,” उन्होंने आगे कहा।

इस साल सितंबर में, मचाडो एक ईसाई डेलीगेशन को कांग्रेस प्रेसिडेंट मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलने उनके बेंगलुरु वाले घर ले गए, जहाँ खड़गे के बेटे और कर्नाटक के होम मिनिस्टर, प्रियांक खड़गे भी मौजूद थे। डेलीगेशन ने राज्य के एंटी-कन्वर्जन कानून को खत्म करने और कम्युनिटी के लिए स्पेशल 1% रिज़र्वेशन की मांग की।

पीटर मचाडो ने एंटी-कन्वर्जन कानून और एंटी-गोहत्या कानून पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई, जबकि ये कानून सिर्फ़ गैर-कानूनी कामों को टारगेट करते हैं। इससे गुस्सा भड़क गया है।

आर्कबिशप पीटर मचाडो कौन हैं?

1954 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ में जन्मे पीटर मचाडो 8 दिसंबर 1978 को कारवार डायोसीज़ के पादरी बने।

फरवरी 2006 में, पोप बेनेडिक्ट XVI ने मचाडो को बेलगाम का बिशप नियुक्त किया और मार्च 2006 में उन्हें बिशप नियुक्त किया।

लगभग 12 साल तक वहाँ सेवा करने के बाद, पीटर मचाडो को मार्च 2018 में पोप फ्रांसिस ने बैंगलोर का आर्कबिशप नियुक्त किया।

आर्कबिशप पीटर मचाडो कर्नाटक रीजनल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल और ऑल-कर्नाटक यूनाइटेड फोरम फॉर क्रिश्चियन ह्यूमन राइट्स के प्रेसिडेंट भी हैं।

पिछले साल, मचाडो को कॉन्फ्रेंस ऑफ़ कैथोलिक बिशप्स ऑफ़ इंडिया (CCBI) का वाइस-प्रेसिडेंट चुना गया था और वे इसके कमीशन फॉर लैटी के चेयरमैन हैं।

मचाडो अपने भाषणों, कोर्ट में याचिकाओं और राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत के ज़रिए लगातार ‘ईसाइयों पर हमला हो रहा है’ का झूठ फैलाते रहे हैं।

जून 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका स्वीकार की, जिसमें आरोप लगाया गया था कि देश में ईसाई पादरियों और चर्चों पर हमले बढ़ गए हैं। यह याचिका नेशनल सॉलिडैरिटी फोरम, इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया और बैंगलोर डायोसीज़ के आर्कबिशप पीटर मचाडो ने दायर की थी।

याचिका में दावा किया गया है कि हर महीने ईसाई संस्थानों पर औसतन 40-50 हमले हो रहे हैं, और आरोप है कि अकेले मई 2022 में ऐसे 57 हमले हुए।

जनवरी 2020 में, बेंगलुरु के आर्कबिशप पीटर मचाडो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नागरिकता संशोधन एक्ट (CAA) पर अपने फैसले पर ‘दोबारा सोचने’ की अपील की थी। मचाडो ने CAA का विरोध तब किया जब पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक या मुस्लिम-बहुल देशों में अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान की वजह से ज़ुल्म का सामना करना पड़ा, और ऐसा कोई तरीका नहीं है कि किसी इस्लामिक देश में मुसलमानों को मुसलमान होने की वजह से मुसलमानों द्वारा ज़ुल्म का सामना करना पड़े।

जून 2020 में, बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज माइकल एफ सल्दान्हा ने मचाडो पर मैसूर के बिशप केए विलियम द्वारा कथित तौर पर की गई हत्याओं में मिलीभगत करने और उन्हें छिपाने का आरोप लगाया था। उन्होंने पीटर मचाडो और बिशप केए विलियम पर 2018 में कूर्ग आपदा राहत कार्य के लिए इकट्ठा किए गए ₹49.5 करोड़ का ‘आपराधिक रूप से दुरुपयोग’ करने का आरोप लगाया था।

मचाडो पर गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए, पूर्व जज माइकल एफ. सलदान्हा ने लिखा, “शायद आर्कबिशप पीटर मचाडो हमें बता सकते हैं कि उन्होंने बेघर लोगों के लिए कितने नाइट शेल्टर बनवाए हैं, क्योंकि यह उनकी अपीलों में से एक थी जो उन्होंने एक साल से भी पहले कॉन्सर्ट के समय की थी। अगर यह एनेक्सर में लिखकर है, तो वह निश्चित रूप से जवाबदेह हैं।”

2020 में, कर्नाटक कैथोलिक क्रिश्चियन एसोसिएशन (AKCCA) ने उन पर कई मिलियन डॉलर के स्कैम में शामिल होने का आरोप लगाया। पोप फ्रांसिस ने सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) के मुखर आलोचक मचाडो को बैंगलोर का मेट्रोपॉलिटन आर्कबिशप नियुक्त किया।

उस साल अगस्त में, AKCCA ने एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) से आशा चैरिटेबल ट्रस्ट के फाइनेंशियल हेराफेरी की जांच की मांग की, जिसका मालिकाना हक आर्कडायोसीज़ के पास है। बैंगलोर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, ग्रुप ने ट्रस्ट पर ₹3 बिलियन ($42 मिलियन) की हेराफेरी का आरोप लगाया।

AKCCA लीडर राफेल राज ने मीडिया को बताया, “यह तीन अरब का स्कैम है, और इसकी जांच होनी चाहिए।” राज ने कहा कि भले ही आर्चडायोसीज़ ने विदेशी डोनर्स से फंड इकट्ठा किया, लेकिन वादे के मुताबिक इसका इस्तेमाल नहीं किया गया।

राज ने कहा कि सालाना ऑडिट रिपोर्ट में फाइनेंशियल गड़बड़ियों को बताया गया था, लेकिन आर्चडायोसीज़ ने इसे नज़रअंदाज़ किया और ‘दोषियों’ के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

2021 में, पीटर मचाडो कर्नाटक राज्य में धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध करने वालों में सबसे आगे थे। मचाडो ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को एक मेमोरेंडम सौंपा था, जिसमें कहा गया था कि प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून गलत है और इससे कर्नाटक में ‘बेवजह सांप्रदायिक मुद्दे’ और ‘अशांति’ पैदा होगी।

मार्च 2024 में, मचाडो ने PM मोदी से अपनी पार्टी (BJP) के नेताओं पर ‘लगाम लगाने’ की अपील की थी , “जो छोटी-मोटी राजनीति और नफ़रत फैलाने वाले भाषणों से ऊपर उठने में नाकाम रहते हैं।”

यह तब हुआ जब एक छात्रा के माता-पिता ने उसी साल फरवरी में मंगलुरु दक्षिण पुलिस स्टेशन में मंगलुरु के सेंट गेरोसा कैथोलिक गर्ल्स स्कूल की एक शिक्षिका के खिलाफ हिंदू धर्म, भगवान राम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी करने की शिकायत दर्ज कराई थी।

बताया गया है कि प्रभा नाम की आरोपी टीचर ने 8 फरवरी को क्लास 7 के स्टूडेंट्स को ‘काम ही पूजा है’ चैप्टर पढ़ाते समय भगवान श्री राम और प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था।

घटना के बाद, माता-पिता, हिंदू संगठनों और दक्षिण कन्नड़ से BJP MLA वेदव्यास कामथ ने हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक और घटिया बातें करने और स्टूडेंट्स को ईसाई धर्म में बदलने की कोशिश करने के लिए आरोपी टीचर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। ईसाई टीचर की बुराई करने के बजाय, पीटर मचाडो ने हिंदू पीड़ितों का साथ देने के लिए BJP नेताओं की बुराई की।

कर्नाटक में बीजेपी सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाया

पिछली भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने कर्नाटक धर्म की आज़ादी के अधिकार का संरक्षण एक्ट, 2022 पास किया था। इसमें गलत जानकारी, ज़बरदस्ती, लालच या किसी भी धोखाधड़ी के तरीके से या इनमें से किसी भी तरीके से या शादी का वादा करके एक धर्म से दूसरे धर्म में बदलना कानून के तहत मना है।

जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर तीन से पांच साल की जेल और 25,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है।

कर्नाटक गाय वध रोकथाम और संरक्षण बिल 2020

कर्नाटक गाय वध रोकथाम और संरक्षण बिल 2020, जिसे राज्य की पिछली BJP सरकार ने पास किया था, फरवरी 2021 में लागू हुआ। इस एक्ट के अनुसार, 13 साल से ज़्यादा उम्र के भैंसों को छोड़कर किसी भी मवेशी को मारना एक गंभीर अपराध है, जिसके लिए सात साल तक की जेल हो सकती है।

अग्निवीरों के रोजगार पर कांग्रेस शासित राज्यों की चुप्पी क्यों? बीजेपी सरकारों ने बनाई नीति, विपक्षी राज्यों में अब भी इंतजार

31 दिसंबर 2026 तक सेना से बाहर हो जाएंगे पहले बैच के 18,300 अग्निवीर। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इनके रोजगार के लिए आरक्षण और भर्ती में छूट की व्यवस्था की है। लेकिन हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर अब भी स्पष्ट नीति का इंतजार है। सवाल है कि क्या अग्निवीरों के भविष्य की चिंता सिर्फ कुछ राज्यों को है?

क्या कांग्रेस शासित राज्यों को अग्निवीरों के रोजगार की चिंता नहीं है? क्या कांग्रेस नहीं चाहती कि चार साल तक सेना में देश की सेवा करने वाले युवा सैन्य अनुशासन और प्रशिक्षण के अनुभव के साथ सामान्य जीवन में लौटकर समाज और देश के विकास में योगदान दें?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अग्निवीर योजना के तहत सेना में भर्ती हुए पहले बैच के जवानों की सेवा अवधि अब पूरी होने जा रही है। ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि सेना से बाहर आने के बाद रोजगार कहां मिलेगा?

अग्निवीर योजना को लेकर राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन चार साल तक देश की सुरक्षा में योगदान देने वाले युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी से राज्य सरकारें कैसे बच सकती हैं?

31 दिसंबर तक सेना से बाहर होंगे 18300 अग्निवीर

अग्निपथ योजना के तहत वर्ष 2022 में सेना में भर्ती हुए पहले बैच के अग्निवीरों की चार साल की सेवा अवधि इस साल पूरी हो रही है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2026 तक करीब 18,300 अग्निवीर सेना से बाहर हो जाएँगे।

ये ऐसे युवा हैं, जिन्होंने चार साल तक सेना में प्रशिक्षण लिया, अनुशासन सीखा और देश की सेवा की। अब जब वे सामान्य जीवन में लौटेंगे, तो उनके सामने रोजगार और भविष्य की सुरक्षा का सवाल खड़ा होगा।

यह सिर्फ इन युवाओं का निजी मामला नहीं है। यह देश के उन युवाओं के भविष्य से जुड़ा विषय है, जिन्होंने सेना में सेवा देने का विकल्प चुना।

चार साल का सैन्य प्रशिक्षण उन्हें अनुशासित, प्रशिक्षित और जिम्मेदार नागरिक बनाता है। ऐसे युवाओं को पुलिस, अर्धसैनिक बलों, सुरक्षा सेवाओं और दूसरे सरकारी विभागों में अवसर देना एक स्वाभाविक विकल्प हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी राज्य सरकारें इस दिशा में तैयारी कर रही हैं?

जहां केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण, आयु सीमा में छूट और भर्ती प्रक्रिया में रियायतों की घोषणा की है, वहीं कई राज्यों में अब तक स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है।

केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए क्या व्यवस्था की है?

केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) और असम राइफल्स में भर्ती के दौरान विशेष व्यवस्था की है। इन बलों में कांस्टेबल और राइफलमैन जैसे पदों पर पूर्व अग्निवीरों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था घोषित की गई है।

इसके अलावा आयु सीमा में छूट का भी प्रावधान है। पहले बैच के अग्निवीरों को अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की छूट और बाद के बैचों को तीन साल की छूट दी गई है।

भर्ती प्रक्रिया में भी पूर्व अग्निवीरों को लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) और शारीरिक मानक परीक्षा (PST) में निर्धारित रियायतें दी जाएंगी।

सरकार की ओर से अग्निवीरों को कौशल प्रमाणपत्र और अनुभव प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी है, जिससे उन्हें सेना के बाहर रोजगार तलाशने में मदद मिल सके।

जो अग्निवीर नौकरी के बजाय अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए बैंक ऋण और उद्यमिता से जुड़ी सहायता के विकल्प भी उपलब्ध कराए गए हैं। आगे पढ़ाई जारी रखने के इच्छुक युवाओं के लिए भी योजनाएँ हैं, यानी केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों को रोजगार, स्वरोजगार और आगे की शिक्षा के रास्ते उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाए हैं।

अब सवाल राज्य सरकारों से है। क्या वे भी अपने यहाँ पूर्व अग्निवीरों के लिए इसी तरह की व्यवस्था कर रही हैं?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 20 प्रतिशत आरक्षण का किया ऐलान

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए पुलिस और विभिन्न वर्दीधारी सेवाओं में आरक्षण देने का ऐलान किया है।

राज्य में पुलिस, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC), माउंटेड पुलिस और फायर ब्रिगेड जैसी सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अधिकतम आयु सीमा में तीन साल की छूट का प्रावधान भी किया गया है।

जेल वार्डर और परिवहन विभाग के कांस्टेबल जैसे पदों पर भी 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है। इसका अर्थ है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने केवल पूर्व अग्निवीरों को रोजगार देने की इच्छा नहीं जताई, बल्कि भर्ती में उन्हें अवसर उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत कदम भी उठाए हैं।

हरियाणा में पुलिस से लेकर वन विभाग तक में आरक्षण

हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार ने भी पूर्व अग्निवीरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।

राज्य में पुलिस कांस्टेबल, वन रक्षक, जेल वार्डर, खनन रक्षक, वन्यजीव रक्षक और फायर ब्रिगेड विभाग में पूर्व अग्निवीरों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है।

इसके अलावा दूसरे ग्रुप-C पदों में पांच प्रतिशत और अग्निवीरों के कौशल प्रमाणपत्र के आधार पर ग्रुप-B पदों में एक प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।

हरियाणा सरकार ने 26 अगस्त से ही विभिन्न विभागों से पूर्व अग्निवीरों के लिए उपलब्ध पदों का ब्योरा मांगना शुरू कर दिया था। यह कदम बताता है कि राज्य सरकारें यदि चाहें तो अग्निवीरों की सेवा अवधि पूरी होने से पहले ही उनके रोजगार की योजना बना सकती हैं।

उत्तराखंड में रोजगार और स्वरोजगार के लिए विशेष व्यवस्था

उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए वर्दीधारी सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की है।

इसके साथ ही लिखित परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा में छूट देने का प्रावधान भी किया गया है। राज्य में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए विशेष पुनर्वास बोर्ड और अग्निवीर एम्प्लॉयमेंट सेल गठित किए गए हैं।

उत्तराखंड ऐसा राज्य है, जहां से बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती होते हैं। ऐसे में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार का सवाल राज्य के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

बिहार में पूर्व सैनिकों और अग्निवीरों के लिए आरक्षण

बिहार में भी वर्दीधारी सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। इसके तहत कुल 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान बताया गया है। इसमें 12.5 प्रतिशत अग्निवीरों और 12.5 प्रतिशत अन्य पूर्व सैनिकों के लिए निर्धारित है।

इस तरह बिहार में भी पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए व्यवस्था बनाई गई है।

मध्य प्रदेश में 5 वर्दीधारी सेवाओं में 20 प्रतिशत आरक्षण

मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने 5 वर्दीधारी सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की व्यवस्था की है। इनमें पुलिस कांस्टेबल, विशेष सशस्त्र बल, जेल प्रहरी, वन रक्षक और आबकारी कांस्टेबल के पद शामिल हैं।

इससे पूर्व अग्निवीरों को राज्य की विभिन्न सुरक्षा और प्रशासनिक सेवाओं में अवसर मिल सकेंगे।

महाराष्ट्र में वर्दीधारी ग्रुप-C सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने वर्दीधारी ग्रुप-C सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की है। इसमें पुलिस, जेल, अग्निशमन, वन, आबकारी और अग्नि सुरक्षा सेवाओं के पद शामिल हैं।

इसके अलावा भर्ती प्रक्रिया में पूर्व अग्निवीरों को लिखित परीक्षा, शारीरिक परीक्षा और आयु सीमा में छूट देने का प्रावधान भी किया गया है।

यानी महाराष्ट्र सरकार ने भी सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को राज्य की सुरक्षा और दूसरी वर्दीधारी सेवाओं में अवसर देने की दिशा में कदम उठाए हैं।

बीजेपी शासित राज्यों की तैयारी, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों की चुप्पी?

केंद्र सरकार के साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर विभिन्न व्यवस्थाएं बनाई हैं, लेकिन अब सवाल उन राज्यों से है, जहां अग्निवीर योजना को लेकर राजनीतिक विरोध अधिक रहा है।

हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में पूर्व अग्निवीरों के लिए स्पष्ट रोजगार नीति का इंतजार है।

इन राज्यों में अग्निपथ योजना को लेकर राजनीतिक बहस तो हुई, लेकिन पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की दिशा में अपेक्षित स्पष्टता दिखाई नहीं देती।

क्या इन राज्यों की सरकारें मानती हैं कि चार साल का सैन्य प्रशिक्षण पुलिस, जेल, वन विभाग या सुरक्षा सेवाओं में उपयोगी नहीं है? या फिर इन राज्यों ने पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर कोई ठोस तैयारी ही नहीं की?

कर्नाटक के पूर्व सैनिक सड़कों पर

कर्नाटक में पूर्व सैनिक लंबे समय से वर्दीधारी नौकरियों में आरक्षण की माँग करते रहे हैं। ऐसे में जब पूर्व अग्निवीर राज्य में वापस लौटेंगे, तो रोजगार का मुद्दा और गंभीर हो सकता है। वर्ष 2022 में जब राज्य में बीजेपी की सरकार थी, तब पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण की योजना बनाने के संकेत दिए गए थे, लेकिन 2023 में सरकार बदलने के बाद यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।

अब सवाल है कि जब दूसरे राज्य पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण की दरें तय कर रहे थे, तब कर्नाटक सरकार ने अपने युवाओं के लिए स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनाई?

क्या पुलिस, जेल और वन विभाग जैसे क्षेत्रों में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की जरूरत नहीं है? क्या चार साल का सैन्य अनुभव इन पदों के लिए उपयोगी नहीं माना जाता? इन सवालों का जवाब कर्नाटक सरकार को देना होगा।

तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में क्या है व्यवस्था?

तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में भी पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन राज्यों में राज्य पुलिस या राज्य की नागरिक सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए अलग से विशेष आरक्षण अथवा सीधी भर्ती की घोषणा को लेकर स्पष्टता नहीं है।

यहाँ भी सवाल वही है कि जब हजारों युवा सेना से बाहर लौटेंगे, तो उनके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

अग्निवीर योजना का राजनीतिक विरोध करने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है। लेकिन योजना के तहत सेवा देने वाले युवाओं के भविष्य को लेकर राज्य सरकारों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

पंजाब के 2,242 अग्निवीरों को रोजगार नीति का इंतजार

पंजाब से पहले बैच में 2,242 अग्निवीर भर्ती हुए थे। ऐसे में अनुमान है कि करीब 1,500 पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर राज्य सरकार को व्यवस्था करनी पड़ सकती है। लेकिन, अब तक राज्य में पूर्व अग्निवीरों के लिए रोजगार नीति को लेकर स्पष्टता नहीं है।

यहाँ भी घोषणा और उसे लागू करने के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है।

अगर राज्य सरकार समिति गठित करती है या नीति बनाने की बात करती है, तो उससे आगे बढ़कर यह बताना भी जरूरी है कि पूर्व अग्निवीरों को किन विभागों में रोजगार मिलेगा, कितना आरक्षण दिया जाएगा और भर्ती प्रक्रिया में क्या छूट होगी।

क्योंकि रोजगार का सवाल सिर्फ घोषणा से हल नहीं होगा। इसके लिए भर्ती नियमों में बदलाव और पदों की उपलब्धता भी जरूरी है।

अग्निवीरों का मुद्दा किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नारे लगाने का नहीं है। यह देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल है।

अगर बीजेपी शासित राज्य पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण, आयु सीमा में छूट और भर्ती प्रक्रिया में रियायतों की व्यवस्था कर सकते हैं, तो कांग्रेस शासित राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

अगर पंजाब सरकार नीति बनाने के लिए समिति गठित कर सकती है, तो हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में अब तक स्पष्ट नीति क्यों नहीं दिखाई देती?

केरल और तमिलनाडु की सरकारें कब बताएंगी कि उनके यहां पूर्व अग्निवीरों के लिए क्या व्यवस्था होगी? अग्निवीरों के रोजगार का सवाल सेना के सम्मान, युवाओं के भविष्य और सरकारों की जिम्मेदारी—तीनों से जुड़ा हुआ है।

चार साल तक देश की सेवा करने वाले युवाओं को सेना से बाहर आने के बाद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है।

सरकारें किसी योजना से सहमत हों या असहमत, लेकिन उस योजना के तहत देश की सेवा कर चुके युवाओं के भविष्य को लेकर जवाबदेह जरूर हैं।

अब सवाल यह है कि जिन राज्यों ने अग्निवीर योजना का विरोध किया, वे पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए कब ठोस नीति बनाएँगे? क्योंकि सेना से बाहर आने वाले इन युवाओं को सिर्फ आश्वासन नहीं, रोजगार के वास्तविक अवसर चाहिए। अग्निवीरों ने चार साल देश की सेवा की है। अब उनकी सेवा, प्रशिक्षण और अनुशासन का सम्मान करते हुए उनके भविष्य की जिम्मेदारी निभाने का वक्त सरकारों का है।

पहले रघुराम राजम की ‘पेचकसबाजी’, अब Bloomberg ने iPhone पर फैलाया झूठ: जानें भारत की मैन्युफैक्चरिंग पर कैसे फैलाया जा रहा चीनी प्रोपेगेंडा?

आपने मारुति सुजुकी की 800 (Maruti Suzuki 800) कार तो जरूर देखी होगी। भारत में लाखों फैमिलीज की पहली कार। साल 1983 में लाँच हुई थी। लेकिन आप सोच रहे होंगे ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के भारत पर प्रोपेगेंडा की हेडलाइन के साथ आख़िर यहाँ 45 साल पहले की मारुति की बात क्यों हो रही है।

ये इसीलिए हो रही है ताकि इससे समझ आए कि मैन्यूफेक्चरिंग (उत्पादन) कोई एक दिन का खेल नहीं है। जब मारुति की ये गाड़ी भारत में बनना शुरू हुई थी तो क्या आपको पता है कि इसमें सिर्फ़ 3% के आसपास लोकल कंटेंट था। यानी 97% पार्ट्स बाहर से आते थे। भारत से सिर्फ MRF के टायर्स और क्लोराइड इंडिया की बैटरी ली गई थी जो इस कार में लगी थी।

इंजन और ट्रांसमिशन तो काम्प्लेक्स पार्ट्स हैं, शीशे, स्टीयरिंग, सीट्स और लगभग 97% पार्ट्स जापान से ही आए थे और भारत में उन्हें एक साथ जोड़ दिया गया था। अब अगर आज के ब्लूमबर्ग, एंडी मुखर्जी और रघुराम राजन की लैंग्वेज में कहें तो ये ‘पेचकसबाजी‘ होगी।

लेकिन इसके आगे की कहानी आपको जानना जरूरी है। साल 1984 तक भी इस गाड़ी में भारतीय सामान 10% तक नहीं पहुँचा। क्योंकि पार्ट्स भारत में बन ही नहीं पा रहे थे। इसके लिए मारुति को पूरा पार्ट सप्लायर्स का एक इकोसिस्टम बनाना पड़ा। साल 1986 में एक और जापानी कंपनी ने भारत के साथ मिलकर मारुति के लिए अल्टरनेटर बनाना शुरू किए।

अम्बुज सागर और पंकज चंद्रा का साल 2004 का एक पेपर बताता है साल 1988-89 तक मारुति में लोकल कंटेंट 86.2% हो गया। यानी मारुति के आने के 5 सालों में मेजॉरिटी कॉम्पोनेंट भारत में बनने लगे। इसके बाद मार्च 1992 तक Maruti 800 में 94.1% पार्ट्स भारत में बनने लगे। यानी मारुति सूजिकी के भारत आने के बाद मेजॉरिटी पार्ट्स को भारत में बनाने में और मैन्यूफैक्चरिंग को लोकलाइज करने में लगभग 10 साल लगे, वो भी तब जब मारुति 800 कोई बहुत कॉम्पलेक्स मशीन नहीं थी और भारत में गाड़ियाँ बनाने का ठीकठाक इस्कॉसिटम, सरकारी कंपनियों का और इनकंपीटेंट ही सही, लेकिन एक्सिस्ट करता था।

आईफोन बनाने में चीन का शेयर

अब साल 2009 में आइए, इस बार बात भारत की नहीं चीन की। दुनिया के पहले आईफोन चाइना में बने थे। लेकिन साल 2009 में चीन में बनने वाले आइफ़ोन (iPhone) में चीन का लोकल कंटेंट या लोकल वैल्यू एडिशन सिर्फ और सिर्फ 3.6% था।

ADBI की स्टडी बताती है कि तब iPhone की manufacturing cost करीब 179 डॉलर थी। उसमें चीन का assembly वाला हिस्सा सिर्फ 6.50 डॉलर। लेकिन इसके 8 साल बाद यानी साल 2017 में, जब iPhone 10 लान्च हुआ तो उसकी मैन्यूफैक्चरिंग में चीन का शेयर 25% से ज्यादा था।

(फोटो साभार: XING Yuqing Research)

जिंग यूकिंग का पेपर बताता है कि iPhone 10 की मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट 409 डॉलर थी, जिसमें से लगभग $104 की VLU लोकली चीन से आ रही थी। यानी iPhone 10 तक आते-आते चीन के लोकल सप्लायर बैटरी पैक्स, ग्लास कवर, फोन का फ्रेम, स्पीकर और सर्किट बोर्ड बना रहे थे।

10 वर्षों के इन अंतराल में चीन ने जो बहुत ज्यादा काम्प्लेक्स पार्ट नहीं हैं, वो बनाना सीख लिया था, उसका एक इकोसिस्टम क्रिएट कर लिया था। आज चीन का आईफ़ोन की मैन्युफ़ैक्चरिंग में लोकल शेयर लगभग 30% से ऊपर था। लक्सशेयर (Luxshare), डोंगशन प्रिसिजन (Dongshan Precision) और सनवोडा (Sunwoda) जैसी कंपनियों का एक इकोसिस्टम बन गया था।

आपको ये दोनों कहानियाँ जानकर समझ में आया होगा कि जैसे रोम (ROM) एक दिन में नहीं बना था वैसे ही किसी देश में मैन्यूफैक्चिरंग बेस एक दिन में नहीं बनता। पहले लोग पुर्जे जोड़ना सीखते हैं, फिर बेसिक पुर्जे बनाना सीखते हैं, फिर थोड़े से कॉम्पलेक्स पार्ट्स का इकोसिस्टम डेवल्प होता है, लोग इन्हें प्रिसिजन से बनाना सीखते हैं।

ब्लूमबर्ग ने इंडिया के आईफोन पर फैलाया झूठ

इसके बाद शेयर और ऊपर जाता है। लेकिन आज के समय में दुनिया में ऑलमोस्ट कॉम्पलेक्स मशीनों में 100% लोकलाइजेशन नहीं होता। आज भी चीन में बनने वाले आइफोन का कैमरा सेंसर जापान का सोनी तो उसका प्रोसेसर ताइवान की TSMC बनाती है, डिस्प्ले कोरिया में LG और सैमसंग बनाती है। ऐसी कॉम्पलेक्स ग्लोबल सप्लाई चेन में लोकलाइजेशन काफ़ी टफ होता है।

अब हम ब्लूमबर्ग के लेटेस्ट हिट जॉब पर वापस लौटते है। ब्लूमबर्ग में जो एंडी मुखर्जी ने लिखा है, उसमें तीन-चार मुख्य समस्याएँ बताई गई हैं। पहली समस्या बताई गई है कि भारत में आईफ़ोन की काम्प्लेक्स पार्ट नहीं बनते और यहाँ एसेंबलिंग ही हो रही है।

(फोटो साभार: Bloomberg)

दूसरी समस्या है कि भारत इन आईफोन को बनाने के लिए सब्सिडी दे रहा है जो ठीक नहीं है क्योंकि सब्सिडी के मुक़ाबले रिटर्न नहीं मिल रहे और इस सब्सिडी को देने के लिए टैक्सपेयर का पैसा यूज हो रहा है। तीसरी समस्या आईफोन नहीं बल्कि सेमीकंडक्टर्स का उदाहरण देते हुए बताई गई है और कहा गया है कि यहाँ भी सरकार सब्सिडी दे रही है लेकिन भारत अभी सेमीकंडक्टर बना नहीं रहा बल्कि सिर्फ़ पैकेजिंग और टेस्टिंग ही कर रहा है।

आपको पहली समस्या का आधा पार्ट बताया कि कैसे किसी भी देश में एसेंबलिंग और लो वैल्यू पार्ट्स ही बनते हैं। समस्या के साथ आईफ़ोन जैसी काम्प्लेक्स मशीन में लोकल कंटेंट बढ़ता है। मैंने आपको चीन का उदाहरण दिया कि साल 2009 में जो चीन सिर्फ़ 3% वैल्यू पर था वो कैसे 2017 तक 25% पर पहुँच गया।

अब आते हैं भारत में आईफ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग पर। भारत में आइफ़ोन बनना साल 2017 से शुरू हुए थे। तब एप्पल ने यहाँ IPhone SE बनाना शुरू किया था। इसके बाद भारत में ऐपल को लेकर कुछ रूल्स में चेंज हुए, कुछ रियायतें दी गईं, सप्लायर्स Foxconn और pegatron जैसी कम्पनियों को फैसिलिटेट किया गया। साल 2020 में भारत सरकार ने बूस्टर डोज दिया PLI के तौर पर। PLI के अंतर्गत जिन कंपनीज ने भारत में मैन्यूफ़ैचरिंग स्टार्ट की, उन्हें सरकार ने बिलिंग वैल्यू का 4% से 6% की सब्सिडी देने का ऐलान किया। इसका असर हुआ कि साल 2021 में भारत का ग्लोबल आईफ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग में शेयर लगभग 2% था वो अब 25% से ऊपर पहुँच रहा है।

अब आते हैं कि इस मैन्युफैक्चरिंग में आखिर लोकल कंटेंट कितना है। ब्लूमबर्ग के पीस में ख़ुद माना गया है कि भारत अब इन फ़ोन्स के केस बनाने से लेकर PCB तक बना रहा है। बैटरी के लिए भी TDK जैसी कंपनियांँ आगे आई हैं। जून 2026 में आई बिजनेस स्टैण्डर्ड की एक रिपोर्ट ने बताया था कि साल 2026 में iPhone का local value addition 12 से 17 प्रतिशत, औसतन 14.5 प्रतिशत था। यानी हम मैसिव मैन्युफैक्चरिंग के चौथे पाँचवे साल में 15% से ऊपर पहुँच रहे हैं। आने वाले सालों में हम चाइना को मैच करने लगेंगे।

स्टिल एंडी मुखर्जी, रघुराम राजन या कोई एक्सपर्ट आपको भारत की आईफ़ोन मैन्युफैक्चरिंग को पेचकसबाजी बताता है तो उसे थोड़ा जमीनी सच्चाई देखने की जरूरत है। अब आते हैं दूसरे पार्ट यानी सब्सिडी पर। देश के रेलवे और आईटी मामलों के मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने एक ट्वीट में बताया कि भारत ने फ़ोन मैन्यूफैक्चरिंग पर ₹19000 करोड़ की सब्सिडी दी है।

अब ये सब्सिडी पूरी एप्पल को नहीं गई है। अगर हम मान ले कि इसमें से ₹10,000 करोड़ की सब्सिडी भी एप्पल को मिली तो इसमें आख़िर एंडी मुखर्जी और ब्लूमबर्ग को समस्या क्या है? इस ₹10,000 करोड़ ने देश में वो एप्पल इकोसिटम बनाया है, जिसमें 3.5 लाख लोगों को रोजगार मिला है। इसके बदले में हमें वो इकोसिस्टम मिला है, जिससे हम काम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग की तरफ़ बढ़ रहे हैं, हमें स्किल्ड लेबरफ़ोर्स मिल रही है।

वैसे यहाँ पर मुझे याद आया कि देश में MGNREGA पर साल 2006 से लेकर 2026 तक 11 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च हुए, और इससे हमें कौन सा इकोसिस्टम मिला? कोई नहीं, बल्कि इससे हमें गड्ढे खोदने वाले लोग मिले। लेकिन MGNREGA को ऐसे दिखाया जाता है कि ज्याँ द्रेज ने कुछ क्रांतिकारी ही कर दिया हो।

देश के टैक्सपेयर का पैसा, देश के टैक्सपेयर के अनुसार लगेगा। किसी एंडी मुखर्जी या ब्लूमबर्ग के कहने पर नहीं। और ये पैसा अब देश में मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम डेवल्प करने में लग रहा है। एंडी मुखर्जी ने अपने हिटज़ॉब ओपिनियन में एक और बात कही है जो सेमीकंडक्टर्स को लेकर है। सेमीकंडक्टर्स के मामले में भी यही नीति है कि पहले कोई देश बेसिक प्रोसेस नोड्स सीखता है, पैकिंग और टेस्टिंग सीखता है और धीमे धीम अपनी कटिंग एज टेक की तरफ़ बढ़ता है। भारत इसके लिए इंसेंटिव्स दे रहा है और अब हम 28 नैनोमीटर के चिप्स बनाने वाले हैं।

असल बात ये है कि अब भारत अब फ़ोन और बाक़ी इलेक्ट्रॉनिक्स के मैन्युफैक्चरिंग में सीरियस कंटेंडर बन चुका है। यहाँ तक कि चाइनीज सोशल मीडिया में भी भारत के इस अचीवमेंट की चर्चा होती है। एंडी मुखर्जी जैसे लोग अपने फर्जी ओपिनियन देते रहेंगे , रघुराम राजन जैसे लोग इसे पेचकसबाजी बताते रहेंगे औ भारत मैन्युफैक्चरिंग में आगे बढ़ता जाएगा। ऐसे हिटजॉब्स एक्चुअली इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी बढ़त से लोगों को समस्या हो रही है और उसके ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा चलाने के लिए एंडी मुखर्जी जैसे भूरे सिपाही लगाए जा रहे हैं।

अरुणाचल के सियांग डैम से लेकर मध्यप्रदेश के न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट तक का विरोध क्यों? जानिए प्रदर्शन का विदेशी फंडिंग और पादरी कनेक्शन

देश में हर बड़े विकास प्रोजेक्ट के शुरू होने से पहले ही विरोध की आवाजें उठने लगती हैं। मध्य प्रदेश में परमाणु ऊर्जा परियोजना, अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर बांध, ओडिशा में खनन और केरल में बंदरगाह निर्माण के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। सवाल यह है कि जब देश को बिजली, पानी, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की जरूरत है, तो विकास के हर रास्ते में विरोध की दीवार क्यों खड़ी की जा रही है?

बढ़ती आबादी को चाहिए बेहतर सुविधाएँ

देश की आबादी तेजी से बढ़ रही है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ अब लोगों को बिजली, पानी, बेहतर परिवहन, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की भी जरूरत है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि किसी भी बड़ी परियोजना के आने से पहले ही विरोध शुरू हो जाता है।

कभी जल, जंगल और जमीन के नाम पर आंदोलन होता है, कभी पर्यावरण के नाम पर परियोजना रोकने की मांग उठती है और कभी स्थानीय लोगों की आजीविका को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं।

स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है। पर्यावरण की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। लेकिन क्या हर परियोजना को बिना उसके फायदे और नुकसान का आकलन किए रोक देना ही समाधान है?

यह विरोध किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उत्तर-पूर्व से लेकर मध्य प्रदेश तक, ओडिशा से लेकर तमिलनाडु तक और केरल से लेकर उत्तर प्रदेश तक विकास परियोजनाओं को लेकर संघर्ष देखने को मिल रहे हैं।

मध्य प्रदेश के टाटा पावर परमाणु परियोजना का विरोध

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के रोजहौई गांव में प्रस्तावित टाटा पावर की परमाणु ऊर्जा परियोजना इसका एक उदाहरण है। अक्टूबर 2026 में इस परियोजना के लिए जमीन का सर्वे शुरू करने की कोशिश हुई। लेकिन परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया।

कंपनी की योजना 220 मेगावाट क्षमता के दो संयंत्र स्थापित करने की है। यानी कुल 440 मेगावाट बिजली उत्पादन की परियोजना प्रस्तावित है। अभी जमीन आवंटन और परियोजना की शुरुआती प्रक्रिया ही आगे बढ़नी है, लेकिन विरोध का माहौल बन चुका है।

सवाल यह है कि जब किसी परियोजना की शुरुआती जांच और सर्वे की प्रक्रिया चल रही हो, तब उसके फायदे और नुकसान का आकलन किए बिना विरोध क्यों शुरू हो जाता है?

परमाणु ऊर्जा भारत के लिए कोई नई तकनीक नहीं है। देश के कई राज्यों में पहले से ही परमाणु ऊर्जा संयंत्र काम कर रहे हैं। इनसे पैदा होने वाली बिजली देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती है।

ऐसे में मध्य प्रदेश में प्रस्तावित परियोजना को लेकर भी वैज्ञानिक आकलन, पर्यावरणीय अध्ययन और स्थानीय लोगों की चिंताओं के आधार पर फैसला होना चाहिए, लेकिन अगर सर्वे की शुरुआत में ही विरोध इतना तेज हो जाए कि परियोजना आगे बढ़ ही न सके, तो देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का रास्ता कैसे निकलेगा?

अरुणाचल प्रदेश के सियांग अपर बांध का विरोध

अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को लेकर भी विवाद गहराता जा रहा है। यह परियोजना सिर्फ बिजली उत्पादन का मामला नहीं है। इसके साथ भारत की जल सुरक्षा, चीन की गतिविधियों और पूर्वोत्तर में बाढ़ की समस्या जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं।

चीन तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक पर काम कर रहा है। इस परियोजना की प्रस्तावित क्षमता करीब 60,000 मेगावाट बताई जा रही है। यह क्षेत्र ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी प्रवाह के पास स्थित है। ब्रह्मपुत्र भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करती है और असम के लिए जीवनरेखा है यानी दोनों राज्यों के लिए खतरे की घंटी है।

भारत और चीन के बीच नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कोई व्यापक बाध्यकारी जल-बंटवारा संधि नहीं है। ऐसे में चीन की ऊपरी धारा पर बनने वाली विशाल परियोजना को लेकर भारत की चिंताएं स्वाभाविक हैं। अगर चीन अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ता है, तो निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं पानी के प्रवाह में बड़े बदलाव से भी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

इसी रणनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भारत में सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। इस परियोजना की प्रस्तावित क्षमता करीब 11,200 मेगावाट है और इसकी अनुमानित लागत लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। प्रस्तावित बांध में करीब 9.2 अरब घन मीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता होगी।

यह परियोजना बिजली उत्पादन के साथ-साथ पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने और बाढ़ के प्रभाव को कम करने में भी मदद कर सकती है। अगर चीन की ओर से अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो भारत के पास पानी के प्रवाह को संभालने और संभावित नुकसान को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण जलाशय उपलब्ध हो सकता है।

इसके अलावा ब्रह्मपुत्र और सियांग में हर साल आने वाली भीषण बाढ़ से पूर्वोत्तर को राहत देने की संभावना भी इस परियोजना से जुड़ी है, लेकिन सितंबर-अक्टूबर 2026 में परियोजना के सर्वे और ड्रिलिंग को लेकर विरोध तेज हो गया।

30 सितंबर 2026 को हिंसा की घटनाएं सामने आईं। बीजेपी नेता के घर पर हमले और वाहनों को आग लगाने की घटनाओं की खबरें आईं। बाद में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और प्रशासन ने जमावड़े पर प्रतिबंध लगाया।

अरुणाचल बांध का विरोध और विदेशी फंडिंग कनेक्शन

इस मामले में विदेशी फंडिंग का मुद्दा भी सामने आया है। सीबीआई ने आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता भानु टाटक के खिलाफ विदेशी फंडिंग और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के कथित उल्लंघन को लेकर मामला दर्ज किया है।

यहां सवाल उठता है कि क्या किसी आंदोलन के पीछे विदेशी फंडिंग की भूमिका है? अगर है, तो उसका उद्देश्य क्या है? क्या भारत की रणनीतिक और ऊर्जा परियोजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है?

इन सवालों की जांच जरूरी है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि स्थानीय लोगों की आशंकाओं, पर्यावरणीय प्रभाव और पुनर्वास जैसे मुद्दों को गंभीरता से सुना जाए, क्योंकि सियांग अपर प्रोजेक्ट सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

ओडिशा में खनन का विरोध

ओडिशा भारत के खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों में शामिल है। यहां बॉक्साइट, लौह अयस्क और दूसरे खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, लेकिन खनन परियोजनाओं को लेकर राज्य में लगातार विरोध देखने को मिलता है।

सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक इसका एक उदाहरण है। 2023 में वेदांता को सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक के खनन अधिकार मिले। इस परियोजना के लिए करीब 1,549 हेक्टेयर जमीन का क्षेत्र प्रस्तावित है, जिसमें लगभग 699 से 708 हेक्टेयर वन भूमि शामिल बताई गई है। इस ब्लॉक में करीब 311 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता वाले बॉक्साइट भंडार होने का अनुमान है।

बॉक्साइट एल्युमिनियम उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है। एल्युमिनियम का इस्तेमाल परिवहन, निर्माण, बिजली और कई आधुनिक उद्योगों में होता है।

लेकिन इस परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर जमीन, जंगल, आजीविका और विस्थापन से जुड़े सवाल उठे हैं।

आदिवासी समुदायों की जमीन और उनके पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। वन अधिकार कानून और पर्यावरणीय नियमों का पालन भी जरूरी है।

लेकिन सवाल यह भी है कि अगर खनिज संपदा से समृद्ध इलाकों में हर परियोजना लंबे समय तक अटकी रहेगी, तो वहां उद्योग, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का विकास कैसे होगा? ओडिशा में खनन विरोधी आंदोलनों के दौरान कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी विवाद सामने आए हैं।

सिजिमाली परियोजना से जुड़े आंदोलन में डॉ. रान्डेल सेक्वेरा और लक्ष्मण नाइक की गिरफ्तारी हुईं। दोनों पर आरोप लगे हैं कि स्थानीय लोगों को सुरक्षाकर्मियों पर हमले के लिए इन्होंने उकसाया था।

इन आरोपों की जाँच और न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह है। लेकिन मूल सवाल वही है—क्या प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किए बिना खनिज प्रधान राज्यों का आर्थिक विकास संभव है?

अगर खनन होगा, तो पर्यावरणीय सुरक्षा, स्थानीय अधिकारों और उचित मुआवजे का ध्यान रखना होगा। लेकिन अगर खनन ही नहीं होगा, तो खनिज संपदा का इस्तेमाल कैसे होगा?

केरल में विझिंजम पोर्ट के खिलाफ आंदोलन

विकास परियोजनाओं का विरोध सिर्फ ऊर्जा और खनन तक सीमित नहीं है। आधुनिक बंदरगाहों के निर्माण को लेकर भी आंदोलन हुए हैं। केरल के विझिंजम में अडानी समूह के बंदरगाह के खिलाफ 2022 में बड़ा आंदोलन हुआ।

इस आंदोलन में मछुआरा समुदाय शामिल था, जिन्होंने तटीय कटाव, घरों पर असर, आजीविका और समुद्री पर्यावरण को लेकर सवाल उठाए। लेकिन आंदोलन में लैटिन कैथोलिक चर्च की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। प्रदर्शन का नेतृत्व लैटिन आर्चडायस से जुड़े पादरियों ने किया। आंदोलन के दौरान हिंसा और पुलिस थाने में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं।

स्थानीय मछुआरों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समुद्र के किनारे रहने वाले समुदायों के लिए तट और समुद्र उनकी आजीविका का आधार हैं, लेकिन विझिंजम बंदरगाह जैसे आधुनिक पोर्ट का महत्व भी समझना होगा।

आधुनिक बंदरगाह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है। जहाजों की आवाजाही, माल ढुलाई और समुद्री परिवहन की क्षमता बढ़ती है। इससे रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

भारत को वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी है, तो आधुनिक बंदरगाहों की जरूरत होगी। ऐसे में सवाल यह है कि स्थानीय लोगों की चिंताओं का समाधान करते हुए क्या इस तरह की परियोजनाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता?

तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ लंबा आंदोलन

तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ भी बड़ा आंदोलन हुआ था। यह आंदोलन परमाणु सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर था। स्थानीय लोगों ने परमाणु संयंत्र से जुड़े संभावित जोखिमों पर सवाल उठाए।

कुडनकुलम का विरोध किसी शुरुआती सर्वे तक सीमित नहीं था। यह संयंत्र के निर्माण और सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक चला। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के मामले में सुरक्षा के उच्चतम मानकों का पालन जरूरी है। लोगों को सुरक्षा संबंधी जानकारी देना और उनकी आशंकाओं का जवाब देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

लेकिन, परमाणु ऊर्जा को पूरी तरह खारिज कर देने से भारत की ऊर्जा जरूरतों का समाधान कैसे होगा?

भारत को आने वाले वर्षों में लगातार बढ़ती बिजली की माँग पूरी करनी है। इसके लिए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों का इस्तेमाल करना होगा।

केन-बेतवा परियोजना का विरोध

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। सूखा, कम बारिश और सिंचाई की सीमित सुविधाओं के कारण यहां किसानों को लंबे समय से परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान के लिए केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना प्रस्तावित है।

लेकिन इस परियोजना का भी विरोध हुआ है। जुलाई 2026 में छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में प्रभावित परिवारों ने मुआवजे, पुनर्वास और जमीन से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन किया।

सरकार का कहना है कि पात्र परिवारों में अधिकांश को मुआवजा दिया जा चुका है। लेकिन प्रभावित लोगों की ओर से असंतोष जताया गया है।

दूसरी ओर पर्यावरणविदों ने पन्ना टाइगर रिजर्व पर संभावित प्रभाव और बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र के नुकसान को लेकर चिंता जताई है। यहाँ भी विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल है, लेकिन इस परियोजना के संभावित लाभों को भी समझना होगा।

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से बुंदेलखंड के झांसी, बांदा, महोबा और ललितपुर जैसे जिलों में करीब 2.51 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र विकसित होने की संभावना है। करीब 3 लाख किसानों को सिंचाई के लिए पानी और लगभग 21 लाख आबादी को पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

इससे बुंदेलखंड के किसानों को राहत मिल सकती है। खेती की उत्पादकता बढ़ सकती है और पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों में जीवन आसान हो सकता है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या परियोजना के पर्यावरणीय और पुनर्वास संबंधी मुद्दों का समाधान करते हुए इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता? क्या हर समस्या का समाधान परियोजना को रोक देना ही है?

नर्मदा घाटी: विरोध के बावजूद बदली पानी की तस्वीर

नर्मदा घाटी का उदाहरण भी हमारे सामने है। मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर बांध से प्रभावित लोगों के विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को उठाया।

इस आंदोलन ने बड़े बांधों के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया, लेकिन सरदार सरोवर परियोजना के लाभों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस परियोजना से गुजरात के हजारों गांवों और लाखों किसानों को सिंचाई और पेयजल की सुविधाएं मिली हैं। राजस्थान के बाड़मेर और जालोर जैसे रेगिस्तानी इलाकों तक भी नर्मदा का पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को भी इस परियोजना से बिजली और पानी के लाभ मिलते हैं यानी एक बड़ी जल परियोजना का प्रभाव सिर्फ उस जगह तक सीमित नहीं रहता, जहां बांध बनाया जाता है। उसका लाभ दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच सकता है।

इसलिए किसी परियोजना का आकलन करते समय उसके स्थानीय प्रभाव के साथ-साथ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय लाभों को भी समझना जरूरी है।

विकास का विरोध या विकास की शर्तों पर बहस?

देश के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। स्थानीय लोगों की जमीन और आजीविका की रक्षा होनी चाहिए। पर्यावरणीय नियमों का पालन होना चाहिए।

प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिलना चाहिए, लेकिन इन सबके साथ देश की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बिजली की मांग बढ़ रही है। सिंचाई के लिए पानी चाहिए। उद्योगों को खनिज चाहिए। व्यापार के लिए आधुनिक बंदरगाह चाहिए। शहरों और गांवों को बेहतर सुविधाएँ चाहिए।

अगर हर बाँध, हर बिजली परियोजना, हर पोर्ट और हर खनन परियोजना का विरोध इसी तरह होता रहा और परियोजनाएँ अनिश्चितकाल तक अटकी रहीं, तो देश की ऊर्जा, सिंचाई, परिवहन और औद्योगिक जरूरतें कैसे पूरी होंगी?

सरकार का काम है कि वह स्थानीय लोगों की आशंकाओं को सुने, नुकसान का आकलन करे, उचित मुआवजा दे और पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित करे।

वहीं स्थानीय लोगों को भी यह समझना होगा कि विकास परियोजनाओं का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचता है। बंदरगाह से व्यापार बढ़ता है। परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा होती है। खनन से उद्योगों को कच्चा माल मिलता है।

इन सबका लाभ देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन जब विकास परियोजनाओं का विरोध होता है, तो यह देखना भी जरूरी है कि विरोध के पीछे वास्तविक स्थानीय चिंताएं हैं या किसी राजनीतिक अथवा अन्य हित की भूमिका है।

किसी आंदोलन में विदेशी फंडिंग की भूमिका इस मामले को और भी गंभीर बनाता है। आखिर देश की परियोजनाओं को विदेशी शक्तियाँ क्यों रोकना चाहती हैं? इसकी जाँच होनी चाहिए। भारत को विकास के रास्ते में आने वाली वास्तविक बाधाओं की पहचान करनी होगी और उसका समाधान करना होगा।

चीन तिब्बत के संवेदनशील इलाके में सबसे ऊँचा बांध बना रहा है। उसकी परियोजनाओं से भारत की जल सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है। भारत अपनी नदी के प्रवाह को संभालने और बाढ़ से बचने के लिए परियोजना बनाना चाहता है, तो उसे विरोध का सामना करना पड़ता है। यह विरोध क्यों?

क्या भारत को अपनी ऊर्जा और जल सुरक्षा मजबूत करने का अधिकार नहीं है? क्या देश की बढ़ती आबादी को बिजली और पानी उपलब्ध कराने की जरूरत नहीं है? क्या बुंदेलखंड के किसानों को सिंचाई का पानी नहीं चाहिए? क्या ओडिशा की खनिज संपदा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए? क्या भारत को आधुनिक बंदरगाहों और वैश्विक व्यापार की क्षमता नहीं बढ़ानी चाहिए? विकास परियोजनाओं का विरोध करने से पहले इन सवालों पर भी विचार करना होगा।

भारत को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करे, पर्यावरण को ध्यान में रखे और देश की जरूरतों को पूरा करे। विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है। लेकिन अगर हर परियोजना को शुरुआत में ही रोक दिया जाएगा, तो भारत अपनी ऊर्जा, जल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में कैसे सक्षम होगा?

कभी ईद पर तो कभी होली के बाद दंगे, मंदिरों पर पड़ा ताला और छीन लिए गए बिजनेस: जानें कैसे मुरादाबाद में विक्टिम मुस्लिम नहीं, हिंदुओं ने खोई पहचान

क्या देश के किसी हिस्से में मुस्लिम 70 साल तक प्रताड़ित हुए हों तो वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सा 12% कम होना चाहिए? क्या मुस्लिम व्यापारियों से अगर धंधा छीना जाए तो किसी बनवारी लाल गुप्ता के परिवार को अपना दशकों में बनाया हुआ बिजनेस और घरबार छोड़ कर भागना पड़ेगा?

क्या आम मुस्लिम पीड़ित होगा तो किसी गौरीशंकर मंदिर पर 44 साल तक ताला पड़ा रहेगा? आपका जवाब होना चाहिए कि यह कैसे संभव है कि पीड़ित मुस्लिम बताया जा रहा है जबकि जनसंख्या हिंदुओं की घट रही है, बिजनेस छोड़ कर हिंदू भाग रहे हैं और मंदिर हिंदुओं के ही बंद हो रहे हैं।

ये सबकुछ आसिम अली नाम का एक व्यक्ति कह रहा है जो एक कॉलमनिस्ट हैं, पोलिटिकल रिसर्चर हैं और टेलीग्राफ से लेकर न्यूजलॉंड्री तक सब कहीं लिखते रहते हैं। एक ट्वीट में आसिम अली ने अगस्त 1980 में मुरादाबाद में UP PAC द्वारा मुस्लिम नमाजियों के नरसंहार को जलियांवाला बाग शैली के नरसंहार से तुलना करते हुए लिखा, “यहाँ मारे गए लोगों की संख्या 1903 के किशिनव यहूदी नरसंहार से भी अधिक थी, जिसके बारे में अधिकांश शिक्षित यूरोपीय जानते हैं। यहाँ न तो कोई स्मारक बनाया गया, न ही किसी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। दंगे के बाद दंगे।”

इस ट्वीट के अलावा हाल ही में आसिम अली ने एक और जिहादी शरजील को बचाते हुए एक अख़बार में कॉलम लिखा है।

लेकिन आसिम अली और उनके कारनामों पर कभी और बात की जाएगी। आज हम जिस मुरादाबाद की कहानी में आसिम मुस्लिमों को विक्टिम पेंट कर रहा है, वहाँ की सच्चाई जानेंगे। सबूत के साथ जानेंगे कि हर बार दंगा करके कैसे मुरादाबाद से हिंदुओं को बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक बनाया गया और यही नहीं बल्कि उनके धंधे छीन लिए गए, उनके पुजारी मार दिए गए और उनके मंदिरों पर ताले जड़ दिए गए। जिस कहानी में मुस्लिमों को विक्टिम बताया जा रहा है असल में वहाँ सबसे ज़्यादा नुकसान में हिंदू ही हैं।

मुरादाबाद में हिंदुओं की घटती आबादी के आँकड़े

आसिम अली एक इंसिडेंट के बारे में बात करते हैं, जहाँ 1980 में कथित तौर पर PAC की फायरिंग में मुस्लिम की मौत हुई थी।

आसिल अली के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (X-@AsimAli6)

अब आसिम अली के ट्वीट को क्वोट करते हुए कुछ लोग दुहाई देते हैं कि कैसे मुस्लिम मुरादाबाद में पीड़ित हो गए और उनके धंधे छीने गए।

लेकिन इसकी हकीकत कुछ और है। आजादी के बाद पहली साल 1951 की जनगणना में मुरादाबाद जिले के आँकड़े बताते हैं कि जिले की कुल आबादी में लगभग 61.41% हिंदू थे, मुस्लिमों का हिस्सा तब 37.06% था। बाक़ी लगभग 2%-3% आबादी सिखों, ईसाइयों और बौद्धों की हुआ करती थी। यानी आजादी के तुरंत बाद जब धूल थमी थी तब मुरादाबाद एक हिंदू बहुल जिला हुआ करता था।

वहीं, मुरादाबाद जिले की आधिकारिक वेबसाइट में लिखा गया है कि मुरादाबाद से संभल ज़िला अलग होने के बाद यहाँ की कुल जनसंख्या 31,26,507 थी। इन 31.26 लाख लोगों में से 15,88, 297 लोग मुस्लिम थे। यानी 50.8% जनसंख्या मुस्लिम थी।

यानी साल 2012 आते आते हिंदू यहाँ 50% से नीचे आ चुके थे। दूसरे शब्दों में कहें तो अल्पसंख्यक हो चुके थे। लेकिन अगर 70 साल यहाँ मुस्लिम को पीड़ित किया गया तो आख़िर हिंदुओं का मुरादाबाद की आबादी में हिस्सा लगभग 12-13% क्यों गिर गया और मुस्लिम बहुसंख्यक कैसे हो गए?

ऐसा तो नहीं हो सकता कि कोई पीड़ित भी होता रहे, उसके पलायन की बात होती रहे, उसके कारोबार छीने जाने की बात भी होती रहे और इसके बाद भी उसकी आबादी बढ़ती रहे और जो हिंदू यहाँ शोषक दिखाए जाएँ, उनकी आबादी साल दर साल घटती रहे। ये दोनों बातें तो मेल नहीं खातीं?

यानी साफ़ है कि मुस्लिम यहाँ फलते फूलते रहे जबकि हिंदू या तो बाहर पलायन करते रहे या उस हिसाब से अपनी जनसंख्या नहीं बढ़ा पाए, जैसे मुस्लिमों ने बढ़ाई। मतलब ये है कि आसिम अली असल में मुस्लिमों को फेक विक्टिम पेंट कर रहा है, मुरादाबाद जैसी जगहों के असली पीड़ित तो हिंदू हैं।

हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने की राजनीतिक साजिश

मुरादाबाद में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने में सिर्फ़ डेमोग्राफी ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक खेल भी छुपा है। साल 2011 में बसा सुप्रीमो मायावती और फिर साल 2012 में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मुरादाबाद की संभल तहसील को अलग करके जिला बना दिया था। इससे पहले तक 2011 की जनगणना के अनुसार, मुरादाबाद में हिंदू 51% हुआ करते थे लेकिन संभल के जिला बनने के बाद ये नंबर भी गिर गया और हिंदू अल्पसंख्यक हो गए।

बनवारी लाल गोयल हत्या: मुरादाबाद में कैसे अल्पसंख्यक हुए हिंदू?

अब जानिए कि आख़िर यहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हुए कैसे? आख़िर कैसे उनको एक एक करके धंधों से बाहर कर दिया गया। कैसे यहाँ बांग्लादेशी लाए गए ताकि हिंदुओं को टेरराइज किया जा सके।

अब सबसे पहले बात साल 1978 के संभल दंगे की। तब संभल जिला मुरादाबाद का ही हिस्सा हुआ करता था। होली के बाद एक अफ़वाह को मुस्लिम भीड़ ने मार्च के अंत में बहाना बनाया। इसके बाद एक एक करके हिंदुओं को टारगेट किया जाने लगा। इस दंगे में मुस्लिम भीड़ ने स्पेसिफिकली हिंदू बिजनेसेज को निशाना बनाया।

दंगे में 23 हिंदुओं की लाशें गिरी। लेकिन सबसे ज्यादा डरवाना केस बनवारी लाल गोयल का है। बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल ने बताया है कि तब उनका संभल में बहुत बड़ा एक अहाता था, जिसमें व्यापार होता था। दंगाइयों ने ट्रैक्टर लगाकर उस अहाते का गेट तोड़ दिया फिर अंदर आके हिंदुओं को ढूँढने लगे।

यहीं पर विनीत गोयल के पिता बनवारी लाल भी बाकी लोगों के साथ छुपे हुए थे। यह सभी दंगों के चलते दूसरी मंजिल की कोठरी में थे। दंगाइयों को जब यह बात पता लगी तो वह बनवारी लाल समेत सबको नीचे ले आए। इसके बाद बनवारी लाल के हाथ पैर दंगाइयों ने काट दिए।।

उनकी पूरी दुकान और अहाते में पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। यहाँ पर टायरों में आग लगाई गई और विनीत गोयल के पिता समेत बाकी लोगों को इसी आग में झोंक दिया गया। इसी आग में जलकर सारे लोग मारे गए। किसी की हड्डियां तक नहीं बची।

विनीत गोयल ने बताया कि इस कारण से उनको अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं मिली थी। दंगे के एक महीने के बाद उन्होंने फूल-पत्तों पर आटा लपेटकर उनका सांकेतिक दाह संस्कार किया था। इस दंगे का ऐसा ट्रॉमा यहाँ के हिंदुओं पर हुआ कि वो पलायन करने लगे। विनीत गोयल ख़ुद भी संभल छोड़ कर दिल्ली-NCR मूव हो गए।

दशकों तक बनाया उनका बिजनेस एक झटके में दंगाइयों ने बर्बाद कर दिया और विनीत गोयल को वापस जीरो से शुरू करना पड़ा। तो जो लोग मुरादाबाद में मुस्लिम कारोबारियों को पीड़ित बताते हैं उन्हें एक बार बनवारी लाल गोयल की कहानी पर भी गौर करना चाहिए। संभल में हिंदू सिर्फ़ कारोबार से ही बाहर नहीं हुए बल्कि वहाँ उनके मंदिर भी छीने गए।

यहाँ एक मंदिर 1978 के ही दंगे से बंद पड़ा था। दरवाज़े पर ताला था और दशकों से देवता अपने भक्तों का इंतज़ार कर रहे थे। योगी सरकार ने इस मंदिर को वापस खुलवाया और पूजा अर्चना शुरू करवाई। संभल की ये कहानी ये जानने के लिए काफी है कि आखिर दशकों तक यहाँ से हिंदू पलायन करते रहे हैं।

ईद पर हिंदू-विरोधी दंगे

लेकिन हिंदुओं की प्रताड़ना यहीं नहीं रुकती। आसिम अली के दावे के उलट मुरादाबाद में भी हर बार हिंदू ही निशाना बने हैं। अब साल 1980 में लौटते हैं। इस बार मुरादाबाद में ही हिंदुओं के ऊपर कहर बरपाया गया। संभल में होली के बाद जहाँ हिंदू दंगे की चपेट में आए थे तो यहाँ मुरादाबाद में मौका ईद का था। इन दंगों में 83 मौतें हुईं।

मुरादाबाद के इस पूरे दंगे की कहानी जस्टिस एमपी सक्सेना की जाँच रिपोर्ट ने सामने लाई, जिसे योगी सरकार ने पब्लिक किया। ये दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। इस रिपोर्ट में गवाह दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। बहाना बनाया था कि ईदगाह की नमाज़ के दौरान एक सुअर मुस्लिमों के बीच घुस गया।

भाजपा नेता हरिओम शर्मा ने उस दिन को याद करते हुए बयान में बताया है कि ईद के मौके पर ईदगाह के पास लगाए गए शिविरों में इसके बाद मुस्लिमों की भीड़ ने आग लगा दी। इसमें उन 2 शिविरों को छोड़ दिया गया, जिन्हें मुस्लिम लीग चला रही थी। उनके पास जो भी हथियार थे, उनसे भीड़ ने हिंदुओं पर हमले किए। इस दौरान सभी मुस्लिम नेता उस भीड़ के समर्थन में थे।

हरिओम शर्मा ने अपने बयान में कहा कि इन सब कामों के लिए मुस्लिम नेताओं को पाकिस्तान व अन्य बाहरी देशों से मदद मिली थी। एक और अफवाह फैलाई गई कि पुलिस ने सैकड़ों मुस्लिमों को ईदगाह के अंदर मार दिया है, इस अफ़वाह से हिंसा और भी भड़की।

एक और गवाह संतोष सरन ने बताया दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत यहाँ लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था ताकि डेमोग्राफी बदले और दंगों के दौरान हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा करने में जिहादियों को मदद मिले।

इन दंगों की प्लानिंग भी लंबे समय से चल रही थी क्योंकि दंगे से ठीक पहले भी कई घटनाएँ हुई थीं। हरिओम शर्मा के अनुसार कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने वोट बैंक और दबदबे की राजनीति के लिए कई गलत काम किए। इनमें 13 अगस्त 1980 के दंगे से तीन माह पहले से ही कई हिंसक वारदातों को अंजाम देने की साजिश भी शामिल थी।

रियाज नाम के एक मुस्लिम ने 1980 में एक दलित लड़की का अपहरण करने के बाद गैंगरेप किया था। यहाँ मुस्लिम नेता शमीम उस रेपिस्ट को बचाने की पूरी कोशिश करता है। पुलिस ने बहुत कोशिश के बाद उस लड़की को बरामद किया और उसके परिवार के हवाले कर दिया। बस इसी बात पर मुस्लिम भड़क गए और दलितों के लिए रंजिश लेकर बैठ गए।

इसके बाद आता है 31 मई का दिन जब चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस के हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी के मुस्लिम गुंडों ने जमकर हिंसा की। सिद्दीकी के समर्थक जिहादियों ने तब ‘आधी रोटी खाएँगे, पाकिस्तान बनाएँगे’… ‘पंजाबियों को भगाएँगे, और ‘नया असम बनाएँगे’ जैसे जहरीले नारे मुरादाबाद टाउन हॉल के बाहर लगाए।

हिंदुओं के खिलाफ 1980 के दौर की दर्दनाक घटनाएँ

एक अन्य घटना में जावेद नाम के एक गुंडे ने जून 1980 में रोडरेज की एक घटना में जानबूझकर झगड़ा किया था। इस लड़ाई में वो काफी चोटिल हो गया था। इसके बाद पुलिस जब उसे बचाकर ले जा रही होती है उसी दौरान वो रास्ते में दम तोड़ देता है। खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा हमदर्द साबित करने के लिए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का शमीम अहमद खान इसे पुलिस के द्वारा की गई हत्या बताने लगता है और जावेद के शव के साथ कब्रिस्तान तक एक जुलूस निकालता है।

इस जुलूस में कॉन्ग्रेस नेता मोहम्मद सिद्दीकी भी शामिल होता है। नफ़रती नारों के साथ मुस्लिम भीड़ को उकसाया जाता है जो अंत में जाकर एक पुलिस थाने पर हमला कर देती है। इस हमले में पुलिस वालों को बुरी तरह से पिता जाता है। पूरे मुरादाबाद में ऐसे ही अनेक हमले किए गए।

जिहादी हिंसा का सतर आप इसी बात से समझ सकते हैं कि एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट यानी ADM डीपी सिंह को मुरादाबाद के एसपी और डीएम के सामने ही पीट-पीट कर मार डाला गया। जिहादी भीड़ ने गलशहीद पुलिस चौकी पर हमला बोलकर 2 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी और हथियार लूट ले गए। थाने को भी आग के हवाले कर दिया गया।

इसी कड़ी में अगला मामला उसी दलित समाज की बच्ची से जुड़ा था, जिसे अगवा करके रियाज ने गैंगरेप किया था। पुलिस पर हमले की घटनाओं के बाद बच्ची के परिजन डर गए और लड़की की शादी तय कर दी। 27 जुलाई को जब बारात इंदिरा चौक पहुँची तो मुस्लिम भीड़ ने उन पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस दौरान हथियारबंद मुस्लिमों की भीड़ ने दलितों के घरों में आग लगा दी। इस हिंसा में कई लोग घायल हो गए, जिसमें बनवारी नाम के युवक की मौत भी हो गई।

मुरादाबाद दंगों के एक गवाह दयानंद गुप्ता ने बताया कि मुस्लिमों ने शहर भर में सुअरों को जहर देकर मारना शुरू कर दिया. इन सब घटनाओं का मिलाजुला परिणाम ये रहा कि मुरादाबाद में सांप्रदायिक तनाव चरम पर पहुँच गया।

इसी तनाव का फायदा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने 13 अगस्त 1980 को ईद के दिन उठाया। उन्होंने अपने समर्थकों के माध्यम से सुअरों वाली घटना को अंजाम दिया और पूरे मुरादाबाद को दंगों की आग में धकेल दिया।

इस दंगे में गौरी शंकर मंदिर के पुजारी की भी हत्या हो गई और मंदिर बंद हो गया। 44 सालों तक इस मंदिर का दरवाजा भी वापस किसी ने नहीं खोला। साल 2024 में जाकर मंदिर का वापस जीर्णोद्धार हुआ।

यानी हर मौके पर मुरादाबाद में पिछले 70 वर्षों मे हिंदू ही निशाना बनते रहे और इसके बाद भी आसिम अली जैसे लोग चाहते हैं कि हम उनकी मुस्लिम विक्टिम वाली थ्योरी मान लें। दरअसल आसिम अली जैसे लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ जिहादी शरजील जैसे लोगों का दूसरा रूप हैं। शरजील ने अपनी बातें साफ़ तौर पर बता दी, आसिम अली उसे शुगरकोट करता है। दोनों का टारगेट एक ही है, टारगेट है हिंदुओं को इस देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना।

PM की सुरक्षा के लिए खाली कराई गई 100 एकड़ जमीन, सिर्फ़ एक मस्जिद पर क्यों मचा है बवाल?

प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित 7 रेसकोर्स रोड की एक मस्जिद को खाली करने का नोटिस मिलने के बाद यह मामला चर्चा में है। मस्जिद के बाहर मीडिया का जमावड़ा है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रशासन की कार्रवाई का निशाना सिर्फ मस्जिद है? लेकिन ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में जब इलाके के लोगों से बात की गई, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आई।

मामला क्या है?

7 रेसकोर्स रोड के आसपास प्रधानमंत्री आवास और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) स्थित हैं। इस इलाके में सेना और वायुसेना के कार्यालय भी हैं। प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े इंतजामों के तहत प्रशासन ने आसपास की करीब 100 एकड़ जमीन खाली कराई है

इस कार्रवाई के तहत तीन बस्तियां हटाई गईं, डीआईडी कॉलोनी, मस्जिद कैंप और राम कैंप। इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग आसपास के घरों और सरकारी दफ्तरों में खाना बनाने, झाड़ू-पोंछा करने और साफ-सफाई जैसे काम करते थे। अब इन बस्तियों की जगह मलबा, टूटी ईंटें और ढही हुई दीवारें नजर आती हैं।

इन्हीं बस्तियों के बीच एक मस्जिद भी है। प्रशासन ने इसे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बताते हुए खाली करने का नोटिस दिया है। मस्जिद की उम्र को लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। कुछ जगहों पर इसे 125 से 150 साल पुराना बताया गया है, जबकि मस्जिद कमेटी का दावा है कि यह करीब 300 साल पुरानी है।

हालांकि, मस्जिद के पास स्थित एक क्लब के 1940 के रिकॉर्ड के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण क्लब के बाद हुआ था। ऐसे में मस्जिद की वास्तविक उम्र को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं। मस्जिद को खाली करने की समय-सीमा नजदीक आने के साथ ही यहां मीडिया की मौजूदगी बढ़ गई है। अब इस कार्रवाई को लेकर सार्वजनिक चर्चा का बड़ा हिस्सा मस्जिद पर ही केंद्रित है।

सिर्फ मस्जिद की चर्चा क्यों?

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में एक दूसरा पहलू भी सामने आया। रिपोर्टर संजय राजपूत के मुताबिक, डीआईडी कॉलोनी में स्थित एक मंदिर को लगभग ढहा दिया गया है। फिलहाल वहां सिर्फ शिवलिंग बचा है, जिसे नवरात्रि के कारण अभी नहीं हटाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बाद में नई जगह पर प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी।

मस्जिद के पीछे की तरफ स्थित एक अन्य मंदिर को भी हटाया जाना है। इस कार्रवाई में हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के घर टूटे हैं।

सवाल उठता है कि जब पूरी बस्तियां हटाई गईं और अलग-अलग समुदायों के लोगों के घरों के साथ उनके घरों में बने छोटे मंदिर भी टूटे, तो इन घटनाओं पर वैसी चर्चा क्यों नहीं हुई जैसी मस्जिद को मिले नोटिस के बाद हो रही है?

इसी इलाक़े में मौजूद एक ध्वस्त किया गया मंदिर

लोगों को कहाँ बसाया गया?

तीनों बस्तियों से हटाए गए लोगों को दिल्ली के सावदा घेवरा इलाके में स्थित DDA फ्लैट कॉलोनी में बसाया गया है। नरेश कुमार के मुताबिक, वर्ष 2024 में इन परिवारों का सर्वे किया गया था। इसके बाद उन्हें नोटिस दिए गए और लॉटरी के जरिए फ्लैट आवंटित किए गए। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में बिना किसी भेदभाव के सभी को हटाया गया।

बस्ती खाली कराने के दौरान लोगों का सामान दूसरी जगह पहुँचाने के लिए सरकार की ओर से ट्रक और बसों की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए लोगों से कोई किराया नहीं लिया गया।

आवंटित फ्लैट करीब 35 गज के हैं और इनमें एक कमरा है। इनकी कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये बताई गई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत इसमें से 1.2 लाख रुपये सरकारी अनुदान के रूप में दिए गए हैं, जबकि शेष करीब 30 हजार रुपये लाभार्थियों को पाँच साल में चुकाने हैं।

हालाँकि, इन फ्लैटों का मालिकाना हक अभी लोगों को नहीं मिला है। फिलहाल उन्हें दो दस्तावेज दिए गए हैं।

लोगों की शिकायतें

  • बच्चों के एडमिशन नहीं हो पा रहे और वे पुराने स्कूलों में ही जा रहे हैं।
  • कई लोग काम के लिए 40-50 किलोमीटर दूर से रोज आते हैं और किराये में 150 से 200 रुपये तक खर्च हो रहे हैं।
  • नए इलाके में रोजगार नहीं है। मोबाइल रिपेयर का काम करने वाले एक निवासी ने कहा कि वहॉं सब जमा-जमाया था, यहॉं कैसे गुजारा होगा।
  • ₹30,000 एक साथ देना सबके लिए आसान नहीं है।
  • नई कॉलोनी में कोई मस्जिद नहीं है। मुस्लिम निवासी फिलहाल 2-3 किलोमीटर दूर पुरानी जेजे कॉलोनी की मस्जिदों में जाते हैं।

बस्ती के कुछ निवासियों ने सवाल उठाया कि जब उनका परिवार चार पीढ़ियों से वहां रह रहा था, तो उस बस्ती को अवैध कैसे माना जा सकता है? वहीं, नरेश कुमार समेत कई लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें पता था कि जिस जमीन पर वे रह रहे थे, वह अवैध कब्जे वाली जमीन थी। इस बीच, एक महिला ने अपनी स्थिति को दूसरे नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि बुलडोजर के डर में लगातार जीने से बेहतर है कि अब उनके सिर पर छत तो है। इसके लिए उन्होंने सरकार का धन्यवाद भी किया।

अदालत में हारे बस्ती के लोग, मस्जिद के मामले में केंद्रीय मंत्री से लगाई गुहार

बस्ती के निवासियों के मुताबिक, जमीन से जुड़े मामले में मार्च से सितंबर तक अदालत में सुनवाई चली, लेकिन अंततः उन्हें हार का सामना करना पड़ा। एक निवासी ने दावा किया कि राहुल गांधी ने उनकी मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार ने उन्हें मामले में आगे लड़ने का मौका नहीं दिया। मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि उनके पास जमीन पर अपने अधिकार के पर्याप्त दस्तावेज होते, तो वे भी अदालत का रुख करते। फिलहाल, मस्जिद के मामले में उन्होंने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से संपर्क किया है।

राजनीति का रंग

जेजे कॉलोनी में रहने वाले कुछ मुस्लिम निवासियों ने कांग्रेस के शासनकाल में मिली सुविधाओं का जिक्र किया। उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी और शीला दीक्षित के दौर में कई जगह झुग्गी-बस्तियां बसाई गईं या विस्थापित परिवारों को दोबारा बसाया गया। हालांकि, उस समय लोगों को फ्लैट के बजाय खाली प्लॉट दिए जाते थे। बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलने में भी लंबा इंतजार करना पड़ता था।

एक निवासी ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि फाइल पर हस्ताक्षर होने के बावजूद केजरीवाल ने लोगों को स्थिति के बारे में सही जानकारी क्यों नहीं दी।

वहीं, कुछ निवासियों ने आशंका जताई कि 2027 के चुनाव को देखते हुए मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शायद टल जाए। एक मुस्लिम निवासी ने यह भी बताया कि वह खुद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट देते हैं।

इस्लाम के नजरिए से भी अवैध जमीन पर मस्जिद ठीक नहीं

जेजे कॉलोनी में कुछ मुस्लिम निवासियों ने खुद माना कि सरकारी जमीन पर बनी मस्जिद कागज के बिना टिक नहीं सकती। एक निवासी ने कहा कि मस्जिद की जमीन अपनी खरीदी हुई होनी चाहिए और इस्लाम के नजरिए से भी अवैध जमीन पर मस्जिद ठीक नहीं है। उसने यह भी माना कि मंदिर के मुकाबले मस्जिद का हल्ला ज्यादा है। एक निवासी ने बताया कि कुछ लोग ग्रुप में संदेश डालकर पुराने इलाके में लौटने और झुग्गियॉं रुकवाने के लिए बुला रहे हैं।

मस्जिद अभी गिराई नहीं गई है, उसे खाली करने का नोटिस ही दिया गया है। रास्ते पर दिल्ली पुलिस, BSF और निजी सुरक्षाकर्मी तैनात हैं और मीडिया को भीतर नहीं जाने दिया जा रहा। लोगों में डर है कि कहीं सहारनपुर की तरह रातों-रात कार्रवाई न हो जाए।

दुनिया पर छाया भोजन का संकट, 140+ करोड़ भारतीयों का पेट भरने के लिए क्या कदम उठा रही मोदी सरकार: जानिए सब कुछ

वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, गहराते भू-राजनीतिक युद्धों और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के टूटने के कारण दुनिया के सामने एक गंभीर खाद्यान्न संकट (Food Supply Crisis) का खतरा मंडरा रहा है। Chapter1Mag की इस स्पेशल सीरीज के पहले 2 पार्ट्स में हमने पढ़ा कि भारत ने किस तरह मजबूत ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ (उर्वरक कूटनीति) के जरिए अंतरराष्ट्रीय उर्वरक संकट का सामना किया और 2026 के रबी सीजन के लिए खाद, बीज और सिंचाई की त्रिस्तरीय तैयारी की है। अब इस सीरीज के तीसरे और अंतिम भाग में इस बात का बारीकी से मूल्यांकन किया गया है कि क्या दुनिया भर में गहरा रहे इस खाद्य संकट के बीच भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली (Food Security System) पर्याप्त रूप से मजबूत है और भारत इस झटके को सहने के लिए कितना तैयार है।

संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक खाद्य संगठनों की चेतावनियों के अनुसार, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, लाल सागर (Bab-al-Mandeb) मार्ग में जहाजों पर हमले, रूस-यूक्रेन संघर्ष और अल-नीनो व जलवायु अनिश्चितताओं के कारण वैश्विक कृषि व्यापार में भारी व्यवधान आ चुका है। दुनिया के कई देश खाद्यान्न की कमी और बेकाबू खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) का सामना कर रहे हैं। भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले विशाल देश के लिए यह स्थिति न केवल कृषि सुरक्षा का बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता का भी विषय बन जाती है। ऐसे में भारत की वर्तमान तैयारी और बफर स्टॉक की स्थिति को समझना बेहद जरूरी है।

भारत की खाद्य सुरक्षा का सबसे मजबूत ढाँचा देश का राष्ट्रीय खाद्यान्न भंडार (Buffer Stock) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) की प्रबंधन प्रणाली है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत में गेहूँ और चावल का कुल स्टॉक तय न्यूनतम बफर मापदंडों (Buffer Norms) से काफी ऊपर बना हुआ है। भारत के पास वर्तमान में लगभग 550 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद्यान्न का सुरक्षित भंडार मौजूद है। इसमें चावल का स्टॉक तय सीमा से लगभग दोगुना है, जो किसी भी आपातकालीन स्थिति या मानसूनी असफलता के समय देश की आबादी को भुखमरी से बचाने के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

खाद्य सुरक्षा को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए केवल गेहूँ और चावल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इसीलिए भारत सरकार ने दलहन (Pulses) और तिलहन (Oilseeds) के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। भारत अपनी खाद्य तेलों (Edible Oils) की जरूरत का लगभग 50% से 55% हिस्सा आयात करता है, जो वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशील है। इसे ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम ऑयल मिशन और पीली क्रांति (Yellow Revolution 2.0) के तहत घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही चना, अरहर और उड़द के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि करके किसानों को दलहन उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

तीसरा बड़ा पहलू है प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत लगभग 80 करोड़ नागरिकों को मिलने वाला मुफ्त खाद्यान्न। वैश्विक बाजार में जब अनाज के दाम आसमान छू रहे हों, तब यह योजना देश के निम्न-आय वर्ग को महँगाई की मार से बचाती है। इसके अलावा भारत ने समय-समय पर घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए गैर-बासमती चावल और गेहूँ के निर्यात पर रणनीतिक प्रतिबंध (Export Restrictions) लगाए हैं। हालाँकि इन फैसलों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई, लेकिन भारत सरकार का रुख साफ रहा है कि घरेलू नागरिकों की खाद्य सुरक्षा उसकी पहली प्राथमिकता है।

यह स्पेशल रिपोर्ट कुछ गंभीर चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचती है। भारत में खाद्यान्नों के भंडारण (Storage Capacity) में आधुनिक साइलो (Modern Silos) और कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण हर साल हजारों टन अनाज खराब हो जाता है। साथ ही भूजल के अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी या बेमौसम बारिश से फसलों को होने वाला नुकसान एक सतत चिंता का विषय है। भारत को यदि वैश्विक संकटों के बीच पूरी तरह निश्चिंत रहना है, तो उसे आधुनिक भंडारण तकनीक और जलवायु-सहनशील कृषि प्रणाली को और तेजी से अपनाना होगा।

बहरहाल, Chapter1Mag का विश्लेषण यही दर्शाता है कि वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बावजूद भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत और सुरक्षित है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी‘, रबी सीजन की मजबूत जमीनी तैयारी और विशाल अन्न भंडार के संयोजन ने भारत को वैश्विक खाद्य संकट के मुहाने पर एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में खड़ा किया है।

Chapter1Mag की यह पूरी सीरीज पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें:

Part-I: How India’s ‘Fertiliser Diplomacy’ safeguarded food security amid global crisis

Part-II: Fertiliser, irrigation and seeds: India braces for the 2026 Rabi season amid critical challenges

Part-III: A food supply crisis looms over the world: How prepared is India?

फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी के बाद भारत के सामने रबी सीजन की परीक्षा: जानिए खेती की चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने की है कैसी तैयारी

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी मजबूत ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ (उर्वरक कूटनीति) के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी खाद्य संकट से अपनी कृषि व्यवस्था को सुरक्षित रखा है। Chapter1Mag की खास सीरीज के पार्ट-I में बताया गया है कि भारत ने रूस, मोरक्को और मध्य पूर्व के देशों के साथ रणनीतिक करार और ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक के भारी-भरकम सब्सिडी आवंटन के जरिए कैसे देश में खाद की कमी नहीं होने दी। अब इस सीरीज के दूसरे भाग में Chapter1Mag ने यह विश्लेषण किया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को साधने के बाद भारत साल 2026 के आगामी रबी फसल सीजन की घरेलू और जमीनी चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह खुद को तैयार कर रहा है।

भारत में रबी का मौसम देश की खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय खाद्यान्न भंडार (Buffer Stocks) की रीढ़ माना जाता है। गेहूँ, सरसों, चना और जौ जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन पूरी तरह से सही समय पर मिलने वाले उर्वरक, पर्याप्त सिंचाई और उन्नत किस्म के बीजों पर टिका होता है। साल 2026 के इस रबी सीजन में भारत सरकार का मुख्य फोकस देश में कृषि उत्पादन के रिकॉर्ड लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मानसूनी पैटर्न से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने पर है। कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों ने इसके लिए संयुक्त रूप से बहुस्तरीय कार्ययोजना तैयार की है।

रबी सीजन की बुआई के लिए डीएपी (DAP) और यूरिया की माँग सबसे अधिक होती है। पिछले सीजन के अनुभवों और अंतरराष्ट्रीय बाधाओं को देखते हुए इस बार केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर बुआई शुरू होने से पहले ही उर्वरकों की अग्रिम बफरिंग (Advance Buffering) शुरू कर दी है। देश भर के प्रमुख कृषि राज्यों में लगभग 55 लाख टन डीएपी और यूरिया का अग्रिम स्टॉक सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि किसानों को बुआई के एन वक्त पर लंबी लाइनों और किल्लत (Shortage) का सामना न करना पड़े। इसके अलावा, तरल नैनो यूरिया (Nano Urea) और नैनो डीएपी के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम किया जा सके।

उर्वरकों के साथ-साथ सिंचाई और जलाशयों का जलस्तर रबी फसलों की पैदावार में निर्णायक भूमिका निभाता है। हाल के मानसूनी सत्रों के बाद देश के मुख्य जलाशयों की भंडारण क्षमता और भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए सरकार ने जल प्रबंधन के विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सेंट्रल वाटर कमीशन (CWC) के आंकड़ों के मुताबिक, रबी सीजन की शुरुआत में प्रमुख जलाशयों में जल स्तर को 80% से ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और ड्रिप इरिगेशन के दायरे को बढ़ाया जा रहा है, जिससे कम पानी में भी फसलों की सिंचाई को सुरक्षित रखा जा सके।

तीसरा और सबसे अहम स्तंभ है उच्च गुणवत्ता वाले जलवायु-सहनशील बीजों (Climate-Resilient Seeds) की उपलब्धता। तापमान में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव और असमय बारिश के खतरे से फसलों को बचाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित गेहूँ और सरसों की नई किस्मों के बीजों का वितरण शुरू किया गया है। वर्ष 2026 के रबी सीजन के लिए देश में लगभग 165 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों (Certified Seeds) की व्यवस्था की गई है। इसमें गर्मी सहन करने वाली गेहूँ की विशेष प्रजातियों (जैसे HD-3385 और DBW-303) के बीजों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि मार्च में अचानक बढ़ने वाली गर्मी से गेहूँ का दाना प्रभावित न हो।

Chapter1Mag की यह स्पेशल रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि खाद्य सुरक्षा बनाए रखना केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर आपूर्ति तंत्र को दुरुस्त रखना उतना ही अनिवार्य है। उर्वरक कूटनीति के जरिए वैश्विक झटकों से बचने के बाद, अब सही समय पर खाद, पानी और बीजों का यह त्रिस्तरीय प्रबंधन भारत को 2026 के रबी सीजन में कृषि आत्मनिर्भरता और रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की ओर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार कर रहा है।

मूल रिपोर्ट विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

दुनिया में हाहाकार, फिर भी भारत में नहीं हुई खाद की कमी: जानिए मोदी सरकार ने अपनी कूटनीति ने कैसे सुरक्षित रखा देश का अन्न भंडार

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध और समुद्री व्यापारिक मार्गों में तनाव के कारण बीते कुछ वर्षों में दुनिया भर की कृषि आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) चरमरा गई थी। जब रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गईं, तब कई विकासशील और विकसित देशों में खाद्यान्न संकट गहराने लगा था। हालाँकि भारत ने अपनी मजबूत विदेश नीति, दीर्घकालिक समझौतों और सरकारी सहायता के जरिए इस संकट का डटकर मुकाबला किया। भारत की इस दूरदर्शी रणनीति को अब विशेषज्ञ ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ (उर्वरक कूटनीति) का नाम दे रहे हैं।

भारत में कृषि उत्पादन काफी हद तक सही समय पर यूरिया, डीएपी (DAP) और एनपीके (NPK) जैसे जरूरी पोषक तत्वों की निर्बाध उपलब्धता पर निर्भर करता है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। जब वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित हुई, तो भारत सरकार ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई। भारत ने रूस, ओमान, सऊदी अरब, मोरक्को और मिस्र जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय बातचीत की।

आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, भारत ने रणनीतिक करारों (global pacts) के जरिए लगभग 86 लाख टन से अधिक उर्वरक की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित की। इसके अलावा, अकेले वर्ष 2025 में भारत ने रूस से उर्वरक आयात में करीब 41% की बढ़ोतरी की, जिससे संकट के समय भी देश में यूरिया और डीएपी का स्टॉक बना रहा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डीएपी और यूरिया की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब भारत सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रण में रखने की थी। यदि खाद के दाम बढ़ते, तो खेती की लागत बढ़ती और देश में खाद्य पदार्थों की महंगाई अनियंत्रित हो सकती थी।

इस स्थिति को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने सब्सिडी का वित्तीय बोझ खुद उठाया। वर्ष 2014 में जहाँ भारत का उर्वरक सब्सिडी बजट करीब ₹71,000 करोड़ हुआ करता था, वहीं वैश्विक संकट के दौरान यह बढ़कर ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक हो गया। हाल के वित्तीय वर्षों में भी सरकार ने लगातार ₹1.77 लाख करोड़ से ₹1.95 लाख करोड़ से अधिक का सब्सिडी आवंटन जारी रखकर किसानों पर अंतरराष्ट्रीय महँगाई का असर नहीं पड़ने दिया।

इस मजबूत कूटनीतिक और वित्तीय नीति का असर यह रहा कि देश में खरीफ और रबी सीजन के दौरान बुआई का काम समय पर हुआ और खाद्यान्न उत्पादन का पहिया रुकने नहीं पाया। देश में बफर स्टॉक सुरक्षित रहे और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करोड़ों लोगों तक मुफ्त राशन की निर्बाध आपूर्ति बनी रही। साथ ही भारत ने घरेलू स्तर पर भी उत्पादन क्षमता को मजबूत किया, जिससे पीएंडके (P&K) उर्वरकों का घरेलू उत्पादन वर्ष 2014-15 के 159.54 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 211.22 लाख टन तक पहुँच गया।

Chapter1Mag की विश्लेषण रिपोर्ट यह साफ करती है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में खाद्य सुरक्षा केवल एक कृषि नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। भारत की यह ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ आने वाले समय में दुनिया के अन्य देशों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल साबित हो सकती है।

(मूल रिपोर्ट से ये रिपोर्ट चैप्टर1मैगजीन पर अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)