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40 दिनों में 70 बार राम मंदिर चढ़ावे की चोरी, CCTV कैमरों में रिकॉर्ड: जानिए SIT ने अपनी रिपोर्ट में क्या क्या बताया, OpIndia Exclusive

अयोध्या के प्रसिद्ध श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा पूरी श्रद्धा से चढ़ाए गए दान की राशि में हेराफेरी और गबन का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है । मामला संज्ञान में आने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 13 जून 2026 को SIT का गठन किया था।

SIT ने मामले की जाँच करने के बाद अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट शासन के अपर मुख्य सचिव (गृह) को सौंप दी है । SIT ने उत्तर प्रदेश शासन को जो रिपोर्ट सौंपी है उसकी एक कॉपी आपइंडिया के पास भी है।

इस टीम की अध्यक्षता लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत (IAS) को दी गई थी। उनके साथ पुलिस स्तर पर जाँच की जिम्मेदारी आईजी रेंज किरन एस (IPS) को सौंपी गई थी, जो मामले के आपराधिक पहलू और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों की भी जाँच कर रहे थे।

वहीं वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को दान राशि, ऑडिट और सभी वित्तीय प्रक्रियाओं की तकनीकी जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी। इस विशेष रिपोर्ट में मंदिर के चढ़ावे की चोरी से लेकर सुरक्षा व्यवस्था में हुई बड़ी मानवीय और प्रशासनिक लापरवाहियों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है, क्योंकि यह पूरा मामला सीधे तौर पर करोड़ों भक्तों की जनभावना, अटूट आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है।

SIT की रिपोर्ट की कॉपी

जनभावनाओं के दबाव के बाद ऐसे शुरू हुई SIT की जाँच

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया के जरिए मंदिर के चढ़ावा चोरी की खबरे चलने लगी। इन खबरों के कारण आम जनता के मन में मंदिर के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे थे।

आम लोगों की इसी गहरी आस्था और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 12 जून 2026 को सरकार को एक लेटर भेजा।

इस लेटर में ट्रस्ट ने जनभावनाओं के आदर और पारदर्शिता के लिए पूरे प्रकरण की जाँच  विशेष जाँच दल से कराने का अनुरोध किया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने बिना समय गंवाए SIT का गठन किया, जिसने अपनी शुरुआती जाँच  में पाया कि चढ़ावे की गिनती के दौरान वाकई में कुछ सेवारत कर्मियों ने पैसों की चोरी की है।

सोशल मीडिया पर उड़ीं अफवाहों का सच आया सामने

अपनी जाँच के दौरान SIT ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर चल रही उन खबरों का भी बारीकी से संज्ञान लिया, जिनमें करोड़ों के चढ़ावे और बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने के आरोप सीधे ट्रस्ट पर लग रहे थे।

इसमें मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें थीं। पहली खबर इंडियन बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत के प्रमुख अनुराग रस्तोगी और सराफा एसोसिएशन द्वारा 38kg और 22 Kg से ज्यादा की चाँदी की ईंटें दान करने और उनके गायब होने से जुड़ी थी।

दूसरी खबर विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी द्वारा बिना रसीद के 200Kg चाँदी की ईंटें भेंट करने के दावे की थी । तीसरी खबर मुंबई के व्यवसायी अनिल विश्वकर्मा के चाँदी के हार और चरण पादुकाओं को लेकर थी।

ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट के अनुसार, जब ट्रस्ट के बही-खातों और रिकॉर्ड का मिलान किया तो पाया कि सराफा संगठनों की चाँदी को तय प्रक्रिया के तहत गलाकर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा गया है।

वहीं सिंधी समाज और मुंबई के व्यवसायी का सारा सामान भी ट्रस्ट की सुरक्षित अभिरक्षा में मिला। इस तरह सोशल मीडिया के ट्रस्ट पर लगाए आरोप पूरी तरह झूठे साबित हुए, लेकिन SIT ने यह जरूर कहा कि भविष्य में ऐसी अफवाहों से बचने के लिए प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत तथा जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है।

CCTV कैमरों की फुटेज ने खोला चोरी का पूरा राज

इस गबन का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण मंदिर परिसर के भीतर लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगालने से मिला है। हालाँकि SIT को केवल 27 अप्रैल 2026 से लेकर 5 जून 2026 तक की ही फुटेज मिल सकी क्योंकि कैमरों की डेटा इकट्ठा करने की क्षमता सीमित होने के कारण पुरानी फुटेज अपने आप मिट चुकी थी।

लेकिन जितने दिनों के भी रिकॉर्डिंग मौजूद थे, उसने चोरी की बात को सामने लाकर रख दिया। इतने काम समय में ही CCTV कैमरों में कुल 70 चोरी की वारदातें साफ तौर पर रिकॉर्ड पाई गईं।

वीडियो फुटेज में देखा गया कि पैसे गिनने वाले कुछ खास कर्मचारी नोटों की गड्डियों और खुले नोटों को चुपके से अपने कपड़ों, जेबों और जूतों के भीतर छिपा रहे थे, जबकि कुछ अन्य कर्मचारी उन्हें आड़ देकर इस काम में मदद कर रहे थे।

पकड़े गए कर्मचारियों के बयानों और उनके बैंक खातों के लेन-देन से यह भी साफ पता चलता है कि यह चोरी 27 अप्रैल से बहुत पहले से ही लगातार की जा रही थी ।

तय सुरक्षा नियमों की धज्जियाँ उड़ाने से हुआ बड़ा नुकसान

SIT ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि यह अपराध सिर्फ एक सामान्य भूल नहीं थी, बल्कि सुरक्षा नियमों की जानबूझकर की गई घोर लापरवाही का नतीजा थी। चढ़ावे के प्रबंधन के लिए ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के बीच बकायदा एक समझौता (MoU) और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई थी।

इसके तहत गिनती करने वाले कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाले विशेष कपड़े पहनना, बायोमेट्रिक हाजिरी लगाना, मोबाइल फोन और निजी सामान को कमरे से बाहर रखना, दान पात्रों को अलग-अलग गिनना और कमरे में आते-जाते समय सुरक्षाकर्मियों द्वारा तलाशी लेना अनिवार्य था।

लेकिन इन नियमों का बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया । हद तो तब हो गई जब 6 फरवरी 2026 को बनी नई SOP में रोज होने वाली सख्त तलाशी के नियम को ढीला करके केवल ‘नियमित या रैंडम’ तलाशी का नियम जोड़ दिया गया।

इसके अलावा साल 2022 से 2026 तक की इन्टर्नल ऑडिट रिपोर्टों में भी इन कमियों को बार-बार सामने लाया गया था और 180 दिनों तक का CCTV बैकअप रखने की स्पष्ट सलाह दी गई थी, लेकिन ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने इन चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया ।

आरोपितों की नियुक्तियाँ और बैंक खातों का चौंकाने वाला खेल

SIT ने मुख्य रूप से छह कर्मचारियों को इस चोरी में सीधे तौर पर संलिप्त पाया है जिनमें अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं।

SIT की रिपोर्ट की कॉपी

ये सभी लोग एक प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से बैंक द्वारा इस काम पर लगाए गए थे, लेकिन इनकी नियुक्तियाँ खुद ट्रस्ट के ही कुछ पदाधिकारियों की सिफारिशों पर की गई थीं।

उदाहरण के लिए आरोपित मनीष कुमार यादव की नौकरी उसके ताऊ रामशंकर यादव उर्फ टिन्नु की सिफारिश पर लगी थी, जो खुद बिना किसी आधिकारिक आदेश या प्राधिकार के मंदिर के दान पात्रों की मुख्य चाबियाँ अपने पास रखते थे।

मजे की बात यह है कि इन कर्मियों का मासिक वेतन कटने के बाद केवल 15 हजार के आसपास था, लेकिन जाँच में इनके और इनके सगे-संबंधियों के बैंक खातों में भारी मात्रा में नकदी और बड़ी-बड़ी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जमा मिली हैं।

यही नहीं SIT के गठन से पहले ही ट्रस्ट ने इनके पास से करीब 78 लाख 94 हजार की नकदी, विदेशी मुद्रा और आभूषण बरामद किए थे, जबकि 4 जून को गिनती कक्ष के पास वाले बाथरूम से भी सवा दो लाख रुपए लावारिस हालत में मिले थे ।

लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और चोरों पर दर्ज होगी FIR

इस पूरी शुरुआती जाँच के आधार पर SIT ने दोषी कर्मचारियों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने वाले अधिकारियों पर भी सख्त कानूनी शिकंजा कसने की मजबूत सिफारिश की है।

सीधे तौर पर चोरी करने वाले 6 आरोपितों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की बात कही गई है । इसके साथ ही गिनती कक्ष के प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव, जिन्होंने इस पूरी ढीली और अनौपचारिक व्यवस्था को चुपचाप चलने दिया और नियमित तलाशी नहीं होने दी, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।

वहीं बिना किसी लिखित अधिकार के चाबियों को अपने कब्जे में रखने वाले और अपने रिश्तेदार की पैरवी करने वाले रामशंकर यादव उर्फ टिन्नु के खिलाफ भी साजिश रचने के आरोप में रिपोर्ट में दर्ज की गई।

SIT के अध्यक्ष विजय विश्वास पंत, सदस्य किरण एस तथा नील रतन ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक प्रारंभिक रिपोर्ट है अंतिम विस्तृत रिपोर्ट जाँच पूरी होने के बाद भेजी जाएगी ।

इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण में मदद करेगी भारत सरकार, कई देशों के हिंदू मंदिरों को देती रही है मदद: समझिए इन सभी में PM मोदी की भूमिका कितनी अहम

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की जड़ें केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित नहीं रही हैं, बल्कि सदियों से इसका प्रसार सुदूर पूर्व से लेकर खाड़ी देशों तक रहा है। समय के थपेड़ों और ऐतिहासिक उथल-पुथल के कारण इन देशों में मौजूद कई प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक धरोहरें जर्जर हो गईं या नष्ट कर दी गईं।

आधुनिक युग में भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति के एक प्रमुख हिस्से के रूप में इन वैश्विक धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया है। इस अभियान का एक बेहद जीवंत और ऐतिहासिक दृश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान देखने को मिला।

अपनी इंडोनेशिया यात्रा के समय प्रधानमंत्री ने वहाँ के सबसे बड़े और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर परिसर ‘प्रम्बानन’ (Prambanan) का दौरा करेंगे। प्रम्बानन मंदिर न केवल इंडोनेशिया की स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति, रामायण और महाभारत के गहरे ऐतिहासिक प्रभावों को भी प्रदर्शित करता है।

प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सीमाओं से परे बिखरी हुई इस साझी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सम्मान देता है, बल्कि इसके संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इंडोनेशिया के बाली, सुमात्रा और जकार्ता जैसे क्षेत्रों में आज भी भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।

इसी प्रतिबद्धता के तहत भारत सरकार ने कंबोडिया, वियतनाम, लाओस, बांग्लादेश, श्रीलंका और बहरीन जैसे कई देशों में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिससे इन देशों के साथ भारत के संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुए हैं।

इंडोनेशिया में 1100 साल पुरानी हिंदू विरासत को मिलेगा नया संबल: जानें प्रम्बानन मंदिर का इतिहास

प्रम्बानन मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी के मध्य, लगभग 850 ईस्वी में संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातन के शासनकाल में कराया गया था। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर और दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल हिंदू धार्मिक स्थलों में शामिल है।

प्रम्बानन मंदिर (फोटो साभार: worldhistory)

अपने मूल स्वरूप में इस परिसर में लगभग 240 छोटे-बड़े मंदिर थे, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव को समर्पित त्रिमूर्ति मंदिर सबसे प्रमुख हैं। इनमें भगवान शिव का केंद्रीय मंदिर लगभग 47 मीटर ऊँचा है, जिसे पूरे परिसर का मुख्य आकर्षण माना जाता है।

इस मंदिर में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और महर्षि अगस्त्य की प्राचीन प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। प्रम्बानन की दीवारों पर पत्थरों पर उकेरी गई रामायण और भागवत पुराण की कथाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय महाकाव्यों का प्रभाव सदियों पहले इंडोनेशिया के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई तक पहुँच चुका था।

मंदिर परिसर में स्थित खुले मंच पर आज भी प्रसिद्ध ‘प्रम्बनन रामायण बैले’ का मंचन होता है, जिसमें रामायण की कथा को नृत्य और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह आयोजन दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। वर्ष 1991 में यूनेस्को ने पराम्बनन मंदिर परिसर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।

हिंदू-बौद्ध साम्राज्यों की विरासत आज भी जीवंत

लगभग 27 करोड़ की आबादी वाले इंडोनेशिया में करीब 24 करोड़ लोग इस्लाम धर्म का पालन करते हैं, लेकिन इस्लाम के आगमन से पहले यहाँ कई शताब्दियों तक शक्तिशाली हिंदू और बौद्ध राजवंशों का शासन रहा। पहली शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक कुताई, तारामुनगर, श्रीविजय, मताराम, कंदिरी, सिंघासारी और महान मजापाहित जैसे साम्राज्यों ने इस क्षेत्र पर शासन किया।

इन राजवंशों ने भव्य मंदिरों, स्तूपों और सांस्कृतिक स्मारकों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और बाली जैसे द्वीपों पर सुरक्षित हैं। इंडोनेशिया में इन प्राचीन मंदिरों को ‘चंडी’ कहा जाता है। बाली द्वीप को आज भी ‘देवताओं की भूमि’ के रूप में जाना जाता है।

यहाँ स्थित बेसकिह मंदिर परिसर, जिसे ‘मदर टेंपल’ भी कहा जाता है, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर समूह है। माउंट अगंग ज्वालामुखी की ढलानों पर स्थित इस परिसर में 80 से अधिक मंदिर हैं, जिनका मुख्य केंद्र पुरा पेनाटारन अगंग है। परंपराओं के अनुसार इसकी स्थापना 8वीं शताब्दी में ऋषि मार्कंडेय ने की थी।

वर्ष 1963 में माउंट अगंग में हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान भी मंदिर परिसर सुरक्षित बचा रहा, जिसे स्थानीय लोग दैवीय चमत्कार मानते हैं।

दियांग से सिंघासारी तक बिखरी है भारतीय संस्कृति की छाप, संरक्षण में भारत निभा रहा अहम भूमिका

इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित दियांग पठार, जिसका अर्थ ‘देवताओं का निवास’ माना जाता है, देश के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिरों का केंद्र है। यहाँ 7वीं और 8वीं शताब्दी के दौरान मताराम राजवंश ने मंदिरों का निर्माण कराया, जो पराम्बनन से भी पुराने माने जाते हैं।

वर्तमान में यहाँ आठ प्रमुख मंदिर सुरक्षित हैं, जिनके नाम महाभारत के पात्रों- अर्जुन, भीम, घटोत्कच और द्रौपदी पर रखे गए हैं। लावु पर्वत की ढलानों पर स्थित चंडी सुकुह मंदिर अपनी पिरामिड जैसी संरचना के कारण विशेष पहचान रखता है, जबकि चंडी चेतो पहाड़ी सीढ़ियों पर निर्मित एक अनूठा मंदिर है।

चंडी कंदल मंदिर में राजा अनुसापति की स्मृति से जुड़े अवशेष हैं और इसकी शिल्पकला में गरुड़ पुराण की वह प्रसिद्ध कथा उकेरी गई है, जिसमें गरुड़ अपनी माता विनिता को दासता से मुक्त कराने के लिए अमृत कलश लेकर आते हैं। वहीं चंडी सिंघासारी मंदिर भगवान शिव के भैरव स्वरूप को समर्पित है, जहाँ कभी विशाल शिवलिंग स्थापित था।

इस परिसर में देवी सरस्वती और प्रज्ञापारमिता की प्राचीन प्रतिमाएँ भी मिली हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा के दौरान पराम्बनन मंदिर परिसर के क्षतिग्रस्त हिस्सों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को लेकर भारत और इंडोनेशिया के बीच सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पहले से ही इस कार्य में भागीदारी निभा रहा है।

कंबोडिया में अंकोरवाट और ता प्रोहम मंदिरों का जीर्णोद्धार

दक्षिण-पूर्व एशिया में जब भी भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव की बात होती है, तो कंबोडिया का नाम सबसे ऊपर आता है क्योंकि यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर ‘अंकोरवाट’ स्थित है। बारहवीं शताब्दी में राजा सूर्यवर्मन द्वितीय द्वारा निर्मित भगवान विष्णु का यह ऐतिहासिक मंदिर समय के साथ बेहद जर्जर स्थिति में पहुँच गया था।

अंकोरवाट मंदिर (फोटो साभार: Facebook @ Many Wonders)

भारत सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से अंकोरवाट मंदिर के संरक्षण और मरम्मत का विशाल कार्य अपने हाथों में लिया था। सन 1986 से 1993 के बीच भारतीय विशेषज्ञों की टीम ने कंबोडिया के कठिन जंगलों और सीमित संसाधनों के बीच इस मंदिर के ढाँचे को गिरने से बचाया और इसके मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की।

अंकोरवाट की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद, भारत सरकार ने कंबोडिया में ही स्थित एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल मंदिर परिसर ‘ता प्रोहम’ (Ta Prohm) के संरक्षण का काम शुरू किया। ता प्रोहम मंदिर अपनी अनूठी स्थिति के लिए जाना जाता है जहाँ सदियों पुराने विशाल पेड़ों की जड़ें मंदिर के पत्थरों और दीवारों के साथ पूरी तरह से गुंथ चुकी हैं।

यहाँ चुनौती यह थी कि पेड़ों को काटे बिना और मंदिर के मूल ताने-बाने को नुकसान पहुँचाए बिना इसका संरक्षण किया जाए। भारत के ASI ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कंबोडियाई अधिकारियों के साथ मिलकर आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक संरक्षण तकनीकों के मिश्रण से ता प्रोहम मंदिर के जीर्णोद्धार के कई चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे यह वैश्विक पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक सुरक्षित केंद्र बन सका।

वियतनाम में ‘माई सन’ शिव मंदिर समूह का पुनरुद्धार

कंबोडिया के साथ-साथ वियतनाम में भी भारतीय संस्कृति के ऐतिहासिक पदचिह्न बेहद स्पष्ट हैं। वियतनाम के क्वांग नाम प्रांत में स्थित ‘माई सन’ (My Son) नाम की जगह पर चौथी से तेरहवीं शताब्दी के बीच चाम राजवंश द्वारा निर्मित एक हजार साल से भी अधिक पुराने शिव मंदिरों का एक विशाल समूह मौजूद है।

माई सन मंदिर (फोटो साभार: Vietnamcoracle)

यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है, जो वियतनाम युद्ध के दौरान हुए बमवर्षक हमलों और लंबे समय की उपेक्षा के कारण बेहद खराब और खंडित अवस्था में पहुँच गया था। भारत सरकार और वियतनाम सरकार के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और बहाली का काम अपने हाथों में लिया।

ASI ने वियतनाम के घने जंगलों के बीच स्थित इन ईंटों और पत्थरों से बने मंदिरों का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया और उनकी मूल वास्तुकला को बनाए रखते हुए उनका संरक्षण किया। संरक्षण कार्य के दौरान भारतीय विशेषज्ञों को कई महत्वपूर्ण प्राचीन मूर्तियाँ, शिलालेख और एक विशाल शिवलिंग भी प्राप्त हुआ, जिसने इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया।

लाओस के प्राचीन ‘वाट फाउ’ मंदिर का संरक्षण

दक्षिण-पूर्व एशिया के ही एक अन्य महत्वपूर्ण देश लाओस में भी भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति के तहत ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का काम कर रहा है। लाओस में स्थित ‘वाट फाउ’ (Vat Phou) एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर परिसर है जो मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है।

पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह मंदिर परिसर खमेर साम्राज्य की वास्तुकला और संस्कृति का एक अनूठा उदाहरण है और इसे भी यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। समय के साथ प्रकृति की मार और रखरखाव के अभाव में इस मंदिर के कई हिस्से ढहने की कगार पर पहुँच गए थे।

भारत सरकार ने लाओस सरकार के अनुरोध पर इस मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी संभाली और ASI के विशेषज्ञों को इस कार्य में लगाया। भारतीय विशेषज्ञों ने वाट फाउ मंदिर के विभिन्न हिस्सों, जैसे कि मुख्य गर्भगृह, दीर्घाओं और नक्काशीदार स्तंभों को वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से मजबूती प्रदान की।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ वर्षा जल के भराव और मिट्टी के खिसकने की गंभीर समस्या थी, जिसका समाधान भारतीय इंजीनियरों ने बेहद कुशलता से निकाला ताकि मंदिर के ढांचे को भविष्य में होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सके। यह परियोजना लाओस के लोगों के लिए उनकी सांस्कृतिक पहचान को वापस पाने जैसा है और इसमें भारत का सहयोग दोनों देशों के बीच के गहरे दोस्ताना और सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित करता है।

बांग्लादेश में ऐतिहासिक रमना काली मंदिर का पुनर्निर्माण

अपने सुदूर पड़ोसियों के अलावा भारत ने अपने निकटतम पड़ोसी देशों में भी ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित ऐतिहासिक ‘रमना काली मंदिर’ और श्री आनंदमयी आश्रम है।

यह मंदिर लगभग तीन सौ साल पुराना था और ढाका के सांस्कृतिक जीवन का एक मुख्य केंद्र माना जाता था। परंतु, सन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के तहत इस ऐतिहासिक मंदिर पर हमला कर इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था और यहाँ रहने वाले कई पुजारियों व श्रद्धालुओं की बेरहमी से हत्या कर दी थी।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक यह स्थल उपेक्षित रहा। भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और बांग्लादेश के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इस मंदिर के पुनर्निर्माण का पूरा खर्च उठाने और वित्तीय मदद देने का फैसला किया।

भारत की आर्थिक और तकनीकी सहायता से रमना काली मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया और इसे इसके प्राचीन गौरव के अनुरूप नया स्वरूप दिया गया। इस नवनिर्मित ऐतिहासिक मंदिर का औपचारिक उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान किया था।

श्रीलंका के प्राचीन तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर का जीर्णोद्धार

भारत के एक अन्य द्वीपीय पड़ोसी देश श्रीलंका में भी भारतीय संस्कृति और रामायण काल से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं। श्रीलंका के मन्नार जिले में स्थित ‘तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर’ (Thiruketheeswaram Temple) वहाँ के पाँच सबसे पवित्र शिव मंदिरों (पंच ईश्वरम) में से एक माना जाता है।

इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है और इसका संबंध रामायण काल से भी जोड़ा जाता है। श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के कारण यह पूरा क्षेत्र भारी अशांति और हिंसा की चपेट में रहा, जिसके परिणामस्वरूप इस पवित्र मंदिर परिसर को भारी नुकसान पहुँचा और श्रद्धालुओं का यहाँ आना-जाना लगभग बंद हो गया।

गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद, श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोद्धार का पूरा खर्च और जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया।

भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए भारी वित्तीय अनुदान जारी किया और भारतीय विशेषज्ञों की देखरेख में मंदिर के मुख्य गोपुरम, महामंडपम और इसके पवित्र तालाब (केनी) की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का कार्य अत्यंत बारीकी से करवाया गया।

भारत के इस सहयोग के कारण यह प्राचीन मंदिर एक बार फिर अपने भव्य रूप में लौट आया, जिससे न केवल श्रीलंका के तमिल और हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को संबल मिला, बल्कि युद्ध की विभीषिका से उबर रहे क्षेत्र में शांति और सांस्कृतिक सद्भाव की एक नई शुरुआत हुई।

बहरीन के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर का भव्य कायाकल्प

सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का यह भारतीय अभियान केवल दक्षिण या दक्षिण-पूर्व एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार खाड़ी देशों (पश्चिम एशिया) तक हो चुका है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में भारत के प्राचीनतम व्यापारिक संबंधों के गवाह के रूप में बहरीन की राजधानी मनामा में एक ऐतिहासिक मंदिर स्थित है।

मनामा के थाट बाजार में स्थित ‘श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर’ लगभग दो सौ साल पुराना है, जिसकी स्थापना थट्टा के सिंधी व्यापारी समुदाय द्वारा सन 1817 में की गई थी। यह मंदिर खाड़ी क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और यह बहरीन की धार्मिक सहिष्णुता तथा भारत के साथ उसके सदियों पुराने व्यापारिक व मानवीय संबंधों का एक जीवंत प्रतीक है।

इस ऐतिहासिक मंदिर की दो सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत सरकार के सहयोग से इसके भव्य पुनर्निर्माण और कायाकल्प के लिए एक विशाल पुनर्विकास परियोजना की शुरुआत की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपनी बहरीन यात्रा के दौरान इस 4.2 मिलियन डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपए से अधिक) की लागत वाली पुनर्विकास परियोजना का औपचारिक शुभारंभ किया था।

इस प्रोजेक्ट के तहत मंदिर परिसर का विस्तार किया जा रहा है, जिसमें पारंपरिक भारतीय वास्तुकला और आधुनिक सुविधाओं का समावेशन किया गया है ताकि वहां आने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक भव्य आध्यात्मिक अनुभव मिल सके। बहरीन और भारत के द्विपक्षीय संबंधों में यह मंदिर एक सेतु का कार्य करता है और इसका यह भव्य जीर्णोद्धार इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी वैश्विक विरासत को हर कोने में सहेजने के लिए तत्पर है।

भारत सरकार द्वारा विभिन्न देशों में किए जा रहे मंदिर संरक्षण कार्य

विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति और इतिहास के इन प्रतीकों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारत सरकार का विदेश मंत्रालय (MEA) और ASI मिलकर एक व्यापक और सुव्यवस्थित नीति के तहत काम कर रहे हैं।

भारत सरकार की इस दीर्घकालिक योजना के अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देशों में फैली भारतीय मूल की विरासतों की पहचान की जाती है और संबंधित देशों की सरकारों के साथ मिलकर उनके संरक्षण के लिए तकनीकी सहायता, विशेषज्ञता और शत-प्रतिशत वित्तीय अनुदान (Grant-in-aid) प्रदान किया जाता है।

चाहे वह कंबोडिया के जंगलों में स्थित अंकोरवाट और ता प्रोहम के पत्थरों को नई जिंदगी देना हो, वियतनाम के माई सन में खंडित हो चुके चाम काल के शिव मंदिरों को फिर से वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ना हो, लाओस के वाट फाउ मंदिर की पहाड़ी वास्तुकला को बचाना हो, या फिर युद्ध और हिंसा के इतिहास से प्रभावित रहे बांग्लादेश के रमना काली मंदिर और श्रीलंका के तिरुकेतीश्वरम मंदिर को उनके मूल स्वरूप में वापस खड़ा करना हो, इन सभी परियोजनाओं का पूरा वित्तीय और तकनीकी भार भारत सरकार स्वयं उठाती आ रही है।

इसके साथ ही बहरीन जैसे खाड़ी देशों में सदियों पुराने मंदिरों के पुनर्विकास में भारत का सहयोग यह दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का दायरा कितना व्यापक है।

ये सभी प्रयास केवल पत्थरों और इमारतों की मरम्मत मात्र नहीं हैं, बल्कि यह भारत द्वारा अपनी वैश्विक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को दुनिया भर में सहेजने, उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने और वैश्विक स्तर पर आपसी सद्भाव, शांति और साझी विरासत के महत्व को स्थापित करने का एक अत्यंत दूरदर्शी प्रयास है।

फीफा विश्व कप 2026: मिकेल मेरीनो के जादुई गोल से स्पेन क्वार्टर फाइनल में, पुर्तगाल की हार के साथ रोनाल्डो का सपना टूटा; अब मेस्सी और सालाह में टक्कर

नासिर आज़मी का एक बेहतरीन शेर है जो मेरे दिल के बेहद करीब है।

दाएम आबाद रहेगी दुनिया

हम न होंगे कोई हम सा होगा।

नासिर साहब की यह बात सही तो है परन्तु हर किसी के जीवन में कुछ लोग ऐसे जरूर होते हैं जिनके जाने के बाद उनकी कमी कभी भी पूरी नहीं हो पाती। खेल की दुनिया में भी ऐसे कुछ खिलाड़ी हुए हैं जो खेलप्रेमियों की स्मृतियों में हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं। फुटबॉल प्रेमियों के लिए आज भी पेले, माराडोना, योहान क्रुएफ, प्लातीनी आदि खिलाड़ी दिलों में बसते हैं। ऐसे ही कई सितारा खिलाड़ियों को इस विश्व कप में हम सब एक अंतिम बार खेलते हुए देख रहे थे। लूका मॉद्रिच, नेमार, गुईलेर्मो ओचोआ आदि ऐसे ही खिलाड़ी हैं जो अब आगे कभी हमें फुटबॉल खेलते हुए नहीं दिखाई देंगे। यह विश्व कप इसलिए भी कई मायनों में खास है।

खैर, बात करते हैं बीती रात (6 जुलाई 2026) हुए मुकाबलों की।

बीती रात निर्धारित समय पर भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे इस राउंड का सबसे ज्यादा चर्चा में रहा मुकाबला अनुभवी रेफरी एंथोनी टेलर की सीटी बजते ही डलास स्टेडियम में शुरू होता है। मौजूदा यूरो चैंपियन स्पेन का सामना युएफा नेशन्स लीग के फाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में उन्हें हराकर ट्राफी जीतने वाली पुर्तगाल की टीम से था।

दोनों ही टीमें काफी दमदार खिलाड़ियों की खेप लेकर इस मैच में उतरी थीं। पुर्तगाल का मिडफील्ड तो खैर फिलहाल संपूर्ण जगत में सब से खास है ही। मिडफील्ड में ब्रुनो फर्नानदेज़ के संग मौजूद थे पीएसजी के साथ लगातार दो चैंपियन्स लीग खिताब जीत चुके विटिन्हा और चौबीस वर्षीय सनसनीखेज खिलाड़ी ज़ाओ नेवेज़। अटैक का दारोमदार था होआओ फेलिक्स, क्रिस्टियानो व पेड्रो नेटो पर। वहीं बेंच पर लियाओ, बर्नार्डो सिल्वा, कोंकेकाओ, दिओगो दालो, ट्रिंकाओ, नूनेस व नेवेज़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी मौजूद थे, जो जीत के लिए भूखे हैं।

वहीं कोच लुई डे ला फुएन्ते ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। मिडफील्ड में रोड्री के संग पेड्री व दानी ओल्मो मौजूद थे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना व लामीन यमाल को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको, फेराँ तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, फैबियान रुईज़ जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। हालाँकि चोट से उबर रहे नीको को मैदान में देखने की उम्मीदें कम ही थीं।

दोनों ही टीमें मैदान में आती हैं। पुर्तगाल की टीम अपनी गहरी लाल रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी थी। वहीं स्पेनिश टीम ने अपनी क्रीम/सफेद रंग की बेहद प्यारी अवे जर्सी पहनी थी। रेफरी से इशारा मिलते ही मैच शुरू होता है।

शुरुआती क्षणों से ही स्पेनिश टीम पुर्तगाल पर शिकंजा कस देती है। तीसरे मिनट में ही मिकेल ओयारजाबाल पुर्तगाली गोलकीपर की परिक्षा लेते हैं। मगर गेंद निशाने से दूर रह जाती है। स्पेन का प्रयास था कि मैच के शुरुआती पलों से ही पुर्तगाली मिडफील्ड का दम घोंट दिया जाए जिसके चलते वह अपनी अटैकिंग लाइन के खिलाड़ियों तक गेंद पहुँचा ही न पाएँ। वह काफी हद तक इसमें सफल होते भी नजर आते हैं। मगर बारहवें मिनट में क्रिस्टियानो रोनाल्डो स्पेनिश पोस्ट पर एक जानदार किक लगाते हैं। मगर स्पेनिश गोलकीपर यह मजबूत शॉट रोक लेते हैं। जवाबी कार्रवाई करते हुए लामीन यमाल पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक हमला करते हैं, मगर स्कोर अब भी 0-0 ही रहता है।

पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक स्कोर बराबरी पर ही रहता है। शुरुआती दबाव को बेहतरीन तरीके से झेलकर पुर्तगाल अब मैच में अपना खेल खेलने लगे थे। होआओ फेलिक्स व नूनो मेंडेस लगातार बाईं ओर से स्पेन पर हमले करने लगते हैं। यह दोनों ही खिलाड़ी मिलकर लामीन यमाल को बांध कर रख देते हैं। वह उन्हें अपने गोलपोस्ट की ओर बढ़ने ही नहीं दे रहे थे।

स्पेनिश लेफ्ट बैक पेड्रो पोर्रो गोल लगाने का एक जोरदार प्रयास करते हैं मगर उन्हें सफलता नहीं मिलती। एलेक्स बाएना मैदान की बांई फ्लैंक से स्पेन के लिए मौके बनाने के प्रयास जरूर कर रहे थे मगर अब पुर्तगाल स्पेनिश मिडफील्ड को बिल्कुल बाँध कर रखे हुए थी। इकतालीसवें मिनट में नूनो मेंडेस एकबार फिर एक बेहद शानदार किक लगा कर गोल स्कोर करने का प्रयास करते हैं मगर गेंद स्पेनिश डिफेंडर से छिटक कर मैदान से बाहर चली जाती है। हाफ टाइम की समाप्ति पर 0-0 के स्कोर पर दोनों टीमें डगआउट की दिशा में बढ़ती हैं।

उम्मीदों के विपरीत अब तक यह मैच बेहद नीरस रहा था। दोनों ही टीमें कोई खास मूव्स बनाने में सफलता हासिल नहीं कर सकी थीं। खैर, दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों टीमें मैदान में वापस उतरती हैं। रेफरी सीटी बजा कर खेल आगे बढ़ाते हैं। मैच के चौवनवें मिनट में कुछ ऐसा होता है जो आगे के मैच का रुख मोड़ सकता था। वर्तमान समय में विश्व के सबसे शानदार लैफ्ट बैक पुर्तगाल के नूनो मेंडेस दर्द से कराहते नजर आते हैं। उनको हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के चलते मैदान से बाहर जाना पड़ा। नेल्सन सेमेडो चोटिल नूनो मेंडेस की जगह मैदान के भीतर लाए जाते हैं। खेल आगे बढ़ता है।

59वें मिनट में क्रिस्टियानो पुर्तगाल के लिए जबकि एक मिनट पश्चात ही स्पेन के लिए पेड्री विरोधी गोलपोस्ट पर एक शॉट लगाते हैं। दोनों ही खिलाड़ी गेंद को निशाने पर रखने में असफल रहते हैं। तुरंत ही लामीन यमाल भी एक शॉट लेते हैं, मगर यह प्रयास भी बचा लिया जाता है। कुछ ही देर में एलेक्स बाएना पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक शॉट लेते हैं, मगर वह गोल स्कोर नहीं कर पाते। खेल यूँ ही मंद गति से आगे बढ़ता रहता है। पुर्तगाल की तुलना में स्पेन ज्यादा अटैक करती नजर आ रही थी मगर टीम में एक अदद सेंट्रल फॉरवर्ड की कमी साफ खलती नजर आ रही थी। यह कैसा अजीब संयोग है कि स्पेन की माटी अब डेविड विया व फर्नान्दो तोरेस जैसे खिलाड़ी पैदा नहीं कर पा रही है।

70वें मिनट में पुर्तगाल के कोच दो परिवर्तन करते हुए मैदान में नवीन ऊर्जा का प्रवाह करने का प्रयास करते हैं।

पांच मिनट बाद ही स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते भी एलेक्स बाएना की जगह फेराँ तोरेस को मैदान में उतारते हैं।

80 मिनट की समाप्ति पर भी दोनों ही टीमें गोल दागने में असफल रही थीं। अब यह मैच एक्स्ट्रा-टाइम की ओर बढ़ता दिख रहा था। पुर्तगाल के कोच रॉबर्टो मार्टीनेज़ कोंकेकाओ व बर्नार्डो सिल्वा को मैदान में उतारते हैं। कोंकेकाओ इस पूरे टूर्नामेंट में हमेशा बेंच से मैदान में आकर काफी असरकारी नजर आए थे। आज फिर एक बार तमाम समर्थकों को उनसे उम्मीद थी कि वह टीम के लिए एक घातक मौका बनाएं।

85वें मिनट तक भी जब स्कोर 0-0 पर ही अटका था और मैच एक्स्ट्रा टाइम की ओर बढ़ रहा था तो स्पेन के कोच पेड्री व दानी ओल्मो को बाहर बुलाकर फैबियान रुईज़ व मिकेल मेरीनो रुपी दो अनुभवी मिडफील्डरों को मैदान के भीतर लाते हैं। उनका यह कदम एक बेहद शानदार सामरिक चातुर्य की अनुभूति कराता है।

90+1 मिनट में फेराँ तोरेस एक मेस्सीस्क्यू ( मेस्सी की भाँति) अंदाज में तीन-चार पुर्तगाली डिफेंडरों को चकमा देते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी मिकेल मेरीनो की ओर बढ़ाते हैं। मिकेल गेंद को बिना कोई ग़लती किए बेहतरीन तरीके से जाल के भीतर पहुँचा देते हैं। अंतिम क्षणों में स्पेन उनके इस गोल के दम पर करो या मरो वाले इस मैच में अहम बढ़त ले लेती है। कुछ ही पलों में मैच समाप्त हो जाता है। स्पेन क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेती है। क्रिस्टियानो रोनाल्डो का विश्व कप जीतने का ख्वाब टूट जाता है। पूरा स्टेडियम लाल रंग के लहराते झंडों से पट जाता है। एस्पाना-एस्पाना के नारे लगाते स्पेनिश समर्थकों की खुशी में सारा स्टेडियम डूब गया था। मिकेल मेरीनो द्वारा अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल इस विश्व कप के मैचों में किसी टीम द्वारा अंतिम घड़ी में दागा गया दसवाँ गोल था।

एक मिडफील्डर होने के बावजूद मिकेल मेरीनो ने यूरो कप व यूएफा नेशन्स लीग के सेमीफाइनल मुकाबलों में भी स्पेन के लिए गोल स्कोर किए थे। और आज तो उनके इस ख़ास गोल के चलते ही ला रोजा आज पुर्तगाल व क्रिस्टियानो रोनाल्डो को घर की राह दिखा कर क्वार्टर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुकी थी। वह हमेशा ही एक बेहद क्लच खिलाड़ी रहे हैं जो बेंच से आकर भी स्पेन के लिए मैच बदल देते हैं।

इसके पश्चात अगला मैच आज सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल स्टेडियम में बेहतरीन फॉर्म में चल रही मेजबान अमेरिकी टीम बनाम बेल्जियम का था। यह भी एक रोचक मुकाबला होगा। इस मैच से पहले इस बात की चर्चा चल रही थी कि आखिर क्यों डोनाल्ड ट्रम्प के कहने पर फीफा ने पिछले मैच में रेड कार्ड पाने वाले अमेरिकी सेंट्रल फॉरवर्ड फोलारिन बालोगन का बैन हटा दिया था। बेल्जियम पिछले मैच में बेहद शानदार तरीके से लड़ते हुए अंतिम क्षणों में स्कोर किए गोलों की बदौलत यहाँ पहुँची थी। अमेरिका का अबतक का सफर बेहद शानदार रहा था। उन्हें अपने घरेलू समर्थकों का साथ भी मिलने जा रहा था। हजारों दर्शक आज अपनी टीम का हौसला बढ़ाने हेतु सीएटल स्टेडियम में मौजूद थे। खैर दोनों ही टीमें मैदान में उतरती हैं और खेल शुरू होता है।

यह मैच बेहद एकतरफा रहता है। बेल्जियम की टीम ने अपने अनुभव के दम पर अमेरिकी टीम को मैदान में कुछ करने ही नहीं दिया। बेल्जियम मैच के शुरुआती पलों से ही विरोधी गोलपोस्ट पर हमले करती रहती है। कुल पन्द्रह शॉट लगाए जाते हैं जिसमें से सात निशाने पर रहे। इसके चलते चार्ल्स डि किटिलीरी के दो व वानाकेन और लुकाकू के एक एक गोल के बदौलत बेल्जियम ने शानदार अंदाज में 4-1 से यह मैच जीत लिया और अब क्वार्टर फाइनल में उनका सामना होगा स्पेन की टीम से।

और आगे आज रात फीफा विश्व कप के गत विजेता अटलांटा स्टेडियम में अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में मिस्र का सामना करने उतरेंगे। गौरतलब है कि मिस्र की ओर से विपक्षी दल को उकसाने हेतु कुछ दिनों से बयानबाजी भी चल रही है। हाल ही में प्रेस-वार्ता में उनके असिस्टेंट कोच ने बयान दिया था कि क्या हुआ अगर उनके पास मेस्सी है। हमारे पास मोहम्मद सालाह है। हम मेस्सी को नहीं देखते। हम तो अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते हैं कि वो मैदान में जाएँ और बिन यह देखें कि उनके सम्मुख कौन खड़ा हे, अपना खेल खेलें। और हमारे पास कुल छब्बीस खिलाड़ी हैं, जो सभी हमारी नज़रों में हमारे लिए मेस्सी हैं।

ऐसे ही मेस्सी को लेकर कई और बयान भी किये गए। इसके चलते इस मैच से पूर्व माहौल गरमा गया है। अर्जेंटीना की टीम अपने पिछले मुकाबले में काबो वर्दे के खिलाड़ियों के सामने संघर्ष करती नजर आई थी। काबो वर्दे ने अपनी जिद से सारी दुनिया को बतला दिया था कि इस टीम की भी कई कमियाँ हैं और इस टीम को भी हराया जा सकता है। कहते हैं वीर भोग्य वसुंधरा।

आज रात एक दफा फिर जंगल के राजा को फिर साबित करना होगा कि आखिर क्यों वो इस जंगल का राजा है। आज एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का जादू हमें देखने को मिलेगा। इससे पहले कि वो सदैव के लिए इस खेल को अलविदा कह दें, हमें उनको खेलते हुए देखने का कोई भी मौका हाथों से जाने नहीं देना चाहिए। मगर मिस्र भी निश्चित ही बुलंद हौसलों के संग मैदान में उतरेगी।

मोहम्मद सालाह आज रात मैदान में बेहतरीन प्रदर्शन कर निश्चित ही अपने देश को खुशियाँ देना चाहेंगे। अर्जेंटीना का किसी भी उलटफेर का शिकार होने से बचने हेतु यह जरूरी है कि अबतक खामोश रहे उसके दो स्टार फॉर्वर्ड लाउतारो मार्टिनेज व हूलियन अल्वारेज़ जल्द से जल्द फॉर्म में लौटें और फॉरवर्ड लाइन में लियोनेल मेस्सी का अच्छा साथ निभाएं।

इसके बाद अगला मैच देर रात भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे वैंकूवर में खेला जाना है। इस मैच में स्विट्जरलैंड का सामना कोलंबिया की टीम से होगा। यह दोनों ही टीमें अलग विचारधारा के साथ फुटबॉल खेलती नजर आती हैं लेकिन दोनों ही टीमों ने अबतक इस विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन कर अपने समर्थकों का दिल जीता है। यहाँ कोई भी एक टीम फेवरेट नहीं होगी, जो कल रात नब्ज़ पर काबू रखते हुए अच्छा खेल जाएगा, वह क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेगा।

कल हमने नेमार को फुटबॉल की दुनिया को अलविदा कहते देखा। हमारी पीढ़ी के जो लोग फुटबॉल को लेकर पागलपन दिलों में लिए फिरते हैं, उनका 1998 या 2002 विश्व कप के दौरान फुटबॉल से पहला राब्ता हुआ था। 2002 के विश्व विजेता ब्राजीली टीम को जिसने अपने चिर-परिचित अंदाज में खेलते देखा था वह फिर किसी और टीम से दिल लगा ही नहीं सकता था। उनका खेल बेहद खूबसूरत हुआ करता था। उसमें लातिनी जादू और स्ट्रीट स्टाइल फुटबॉल की महक हुआ करती थी। नेमार उस अंदाज में खेलने वाले अंतिम खिलाड़ी थे।

वैश्विक फुटबॉल ने जब बाजारवाद के आगे झुक कर यूरोपीयन चेहरे को अपना लिया, तब ही से ब्राजीली टीमें भी अपना सांबा भूल बैठीं। अफसोस अब सांतोस के हरे मैदानों से कोई नेमार निकल कर नहीं आएगा। वह अपनी तरीके के आखिरी खिलाड़ी थे। उनके साथ फुटबॉल का लातिनी जादू भी अब फिर कभी देखने के लिए नहीं मिलेगा।

कौन जाने क्या पता बीती रात स्पेन के हाथों मिली हार के पश्चात टूर्नामेंट से बाहर हो गई पुर्तगाल के इकतालीस वर्षीय स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी जल्द फुटबॉल को अलविदा कह दें। शायद कल हमने उनका अंतिम नृत्य देखा हो।

Cherish them, while they are there. Football will never be this beautiful.

भारत और इंडोनेशिया मिलकर बदलेंगे समंदर का नक्शा, जानिए साबांग और ग्रेट निकोबार के नए गठजोड़ से क्यों परेशान है चीन

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया की आधिकारिक यात्रा पूर्वी हिंद महासागर और वैश्विक समुद्री व्यापार के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रही है। जकार्ता के मर्देका पैलेस में राष्ट्रपति प्रबोवो के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल भुगतान पर सहमति के साथ-साथ इंडोनेशिया के साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के पूरक हब के रूप में विकसित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया।

इस यात्रा के दौरान रक्षा, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल भुगतान प्रणालियों के एकीकरण और क्रिटिकल मिनरल्स पर व्यापक सहमति बनी है। लेकिन जिस एक दूरगामी और रणनीतिक फैसले ने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा है, वह है इंडोनेशिया के रणनीतिक साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के साथ एक पूरक समुद्री हब के रूप में विकसित करना।

दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई है कि साबांग बंदरगाह और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को जोड़ने वाले पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पूर्वी हिंद महासागर में न केवल व्यापारिक कनेक्टिविटी को अभूतपूर्व बढ़ावा देंगे, बल्कि दोनों देशों को एक अटूट रणनीतिक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेंगे।

भौगोलिक संयोग से भारत-इंडोनेशिया कंट्रोल करेंगे मलक्का स्ट्रेट का एंट्री प्वॉइंट

वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर साबांग और ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति किसी प्राकृतिक वरदान से कम नहीं है। इंडोनेशिया के सुमात्रा प्रांत के उत्तरी छोर पर वेह द्वीप पर स्थित साबांग और भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु ग्रेट निकोबार एक-दूसरे से महज सौ समुद्री मील से भी कम दूरी पर आमने-सामने स्थित हैं। यह पूरा क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर बैठता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री गलियारों में से एक माना जाता है। हर साल इस संकरे समुद्री रास्ते से अस्सी हजार से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज गुजरते हैं, जो पूरे एशिया को यूरोप, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ते हैं।

दुनिया का लगभग एक-चौथाई समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति (80,000 से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज) इसी संकरे जलमार्ग के रास्ते से होती है। ऐसे में साबांग और ग्रेट निकोबार को एक साथ एक साथ पूरक हब के रूप में विकसित करने की भारत-इंडोनेशिया की साझा योजना का मतलब है कि इस महा-जलमार्ग के प्रवेश द्वार पर दो सबसे भरोसेमंद लोकतांत्रिक देशों की सीधी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति होगी।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर भारत का नौ अरब डॉलर का मास्टरस्ट्रोक

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार में लगभग नौ अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से एक विशाल और बहु-आयामी बुनियादी ढाँचा परियोजना विकसित कर रही है। नीति आयोग की देखरेख में चल रही इस ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का मुख्य आधार गलाथिया बे इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है। यह एक अत्याधुनिक डीप-वॉटर पोर्ट है जिसकी कंटेनर कार्गो क्षमता बेहद विशाल रखी गई है।

वर्तमान में भारत के पास इस क्षेत्र में गहरे पानी के बर्थ न होने के कारण देश का अधिकांश कंटेनर कार्गो कोलंबो, सिंगापुर या मलेशिया के पोर्ट क्लैंग के रास्ते रूट होता है, जिससे भारत को हर साल भारी वित्तीय और राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। गलाथिया बे में बीस मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है, जो दुनिया के सबसे विशालकाय जहाजों को आसानी से संभालने की क्षमता रखती है।

इसके साथ ही इस मेगा-प्रोजेक्ट के तहत एक नया ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है, जो सालाना लाखों यात्रियों और कार्गो को संभालने में सक्षम होगा। इस पूरे हब को ऊर्जा देने के लिए एक आधुनिक गैस और सौर-आधारित बिजली घर और एक आधुनिक ग्रीनफील्ड टाउनशिप का निर्माण भी किया जा रहा है, जो आने वाले समय में वाणिज्य, पर्यटन और वैश्विक लॉजिस्टिक्स का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

साबांग और ग्रेट निकोबार का आर्थिक जुड़ाव अहम

इंडोनेशिया के रणनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चिंता रही थी कि भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना उनके अपने साबांग मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) के लिए एक आर्थिक खतरा बन सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा ने इस नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया है।

सफल और टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्थाएँ कभी भी अकेले या अलग-थलग रहकर काम नहीं करतीं, बल्कि वे हमेशा इंटर-कनेक्टेड नेटवर्कों के माध्यम से ही फलती-फूलती हैं। साबांग को साल 2000 में ही इंडोनेशिया सरकार ने फ्री ट्रेड एरिया और फ्री पोर्ट घोषित किया था, लेकिन विदेशी पूँजी निवेश की कमी और कमजोर लॉजिस्टिक्स के कारण यह क्षेत्र सुमात्रा द्वीप के पाँच करोड़ लोगों के लिए वह आर्थिक प्रवेश द्वार नहीं बन पाया, जिसकी कल्पना की गई थी।

अब भारत के ग्रेट निकोबार में हो रहे भारी निवेश के समानांतर जब साबांग को विकसित किया जाएगा, तो दोनों बंदरगाह एक-दूसरे के विरोधी बनने के बजाय पूरक साथी के रूप में काम करेंगे।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रहे विशाल निर्माण कार्यों के लिए मुख्य भूमि भारत से संसाधन मंगाना बहुत महँगा पड़ता है, क्योंकि चेन्नई वहाँ से लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर है। इसके विपरीत साबांग वहां से बेहद करीब है और कैंपबेल बे से इसकी दूरी महज 166 किलोमीटर है। ऐसे में इंडोनेशिया का सुमात्रा प्रांत सीमेंट, निर्माण सामग्री और कुशल श्रमशक्ति को बेहद कम लागत पर ग्रेट निकोबार भेज सकता है।

इसके अलावा दोनों बंदरगाह मिलकर आने-जाने वाले कार्गो जहाजों को रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस, वेयरहाउसिंग और ट्रांसशिपमेंट की संयुक्त सुविधाएँ दे सकते हैं। यदि भविष्य में किसी एक बंदरगाह पर ट्रैफिक का अत्यधिक दबाव बढ़ता है, तो दूसरा बंदरगाह एक बेहतरीन बैकअप के रूप में काम कर सकेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की लॉजिस्टिक्स दक्षता कई गुना बढ़ जाएगी।

साबांग के विकास का इतिहास और भारत-इंडोनेशिया के ज्वॉइंड वर्किंग फोर्स की भूमिका अहम

भारत और इंडोनेशिया के बीच साबांग बंदरगाह को लेकर आधिकारिक और रणनीतिक बातचीत कोई नई बात नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत मई 2018 में प्रधानमंत्री मोदी की पहली आधिकारिक इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुई थी, जब इंडोनेशिया के तत्कालीन समुद्री मामलों के समन्वय मंत्री लुहुत पंडजाइतन ने नई दिल्ली को साबांग के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। उसी समय दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक में समुद्री सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा दृष्टिकोण पत्र जारी किया था।

इसके तहत दोनों देशों ने एक ‘संयुक्त कार्य बल’ (Joint Task Force) का गठन किया। इस टास्क फोर्स की पहली बैठक 2019 में बांदा आचे (Aceh) में और दूसरी बैठक 2022 में पोर्ट ब्लेयर में हुई थी। भारत की सरकारी इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी कंपनी ‘राइट्स’ (RITES) ने साबांग बंदरगाह के बुनियादी ढाँचा विकास पर अपनी प्री-फिजिबिलिटी स्टडी भी पूरी कर ली है।

अब 2026 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो के बीच हुई बैठक ने इस संयुक्त परियोजना को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारने के लिए नए फंड और समय-सीमा को निर्धारित कर दिया है।

चीन का मुद्दा और साबांग को BRI से बाहर रखने की इंडोनेशियाई रणनीति

इस मेगा प्रोजेक्ट के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझने के लिए ‘चीन के कोण’ (China Angle) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दक्षिण-पूर्वी एशिया और हिंद महासागर में चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) नीति के तहत बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है। इंडोनेशिया में भी चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है, जिसमें जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड ट्रेन और 23 अरब डॉलर के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत चार प्रमुख आर्थिक कॉरिडोर (उत्तरी सुमात्रा, उत्तरी कालीमंतन, उत्तरी सुलावेसी और बाली) शामिल हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंडोनेशिया ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत साबांग बंदरगाह को चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट्स से पूरी तरह बाहर रखा। हालाँकि एक समय चीन ने साबांग में भारी दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए चीनी प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ाया और साबांग के विकास के लिए चीन के बजाय भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को प्राथमिकता दी।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साबांग इंडोनेशिया की राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का एक अमूल्य प्रतीक माना जाता है। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एकता को दर्शाने के लिए वहाँ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ‘साबांग से मेरुके तक’ का नारा लगाया जाता है, जो ठीक वैसा ही है जैसे भारत में हम ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’ कहते हैं।

चूँकि साबांग इंडोनेशिया का सबसे पश्चिमी छोर है और इसके पास ही रोंडो और बेंगगाला जैसे संवेदनशील बाहरी द्वीप स्थित हैं, इसलिए इंडोनेशिया कभी नहीं चाहता कि यहाँ चीन जैसी किसी ऐसी विस्तारवादी ताकत का नियंत्रण या प्रभाव स्थापित हो जो भविष्य में उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा कर सके।

सैन्य अड्डा नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का माध्यम

भारत के रणनीतिक हलकों में अक्सर यह भ्रम फैल जाता है कि साबांग में विकास की अनुमति मिलने का मतलब है कि भारत को वहाँ ‘सैन्य अड्डा’ (Military Base) मिल रहा है। इंडोनेशिया की प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ देवी फॉर्च्यून अनवर और इंडोनेशियाई राजनयिकों ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि इंडोनेशिया की विदेश नीति ‘स्वतंत्र और सक्रिय’ (Bebas dan Aktif) के सिद्धांत पर चलती है, जो किसी भी विदेशी ताकत को अपनी धरती पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं देती।

इसलिए भारत की साबांग में एंट्री कोई सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह ‘स्टेटस-सिग्नलिंग’ (Status Signalling) और आर्थिक सुरक्षा का पुल है। साबांग परियोजना का सफल कार्यान्वयन भारत को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की तरह दक्षिण-पूर्वी एशिया में एक बड़े बुनियादी ढाँचा डेवलपर और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह भारत के एक्ट ईस्ट’ (Act East Policy) और महासागर विजन’ (MAHASAGAR Vision) को वास्तविक ताकत प्रदान करता है।

इस प्रोजेक्ट के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ, हालाँकि भारत-इंडोनेशियान निकाल लेंगे हल

इस शानदार और महत्वाकांक्षी साझा समुद्री सपने के सामने कुछ वास्तविक और व्यावहारिक चुनौतियाँ भी खड़ी हैं जिनसे दोनों देशों को मिलकर निपटना होगा। सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है और म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी कई परियोजनाएं काफी देरी से चल रही हैं।

साबांग के मामले में भारत को अपनी इस प्रशासनिक सुस्ती वाली छवि को पूरी तरह से बदलना होगा और कार्य की गति को तेज बनाए रखना होगा। इसके अलावा आचे और अंडमान के बीच पर्यटन, क्रूज जहाजों और नौकायन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों को अपने आव्रजन, सीमा शुल्क और वीजा नियमों को बेहद सरल, सुलभ और डिजिटल रूप से आधुनिक बनाना होगा ताकि व्यापारियों और पर्यटकों को कोई असुविधा न हो।

एक और बड़ी चुनौती पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की है, क्योंकि ग्रेट निकोबार एक बेहद संवेदनशील जैव विविधता क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। भारत सरकार को यह पूरी तरह सुनिश्चित करना होगा कि बंदरगाह और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ-साथ वहां की मूल जनजातियों के अधिकारों और प्राचीन वर्षावनों का संरक्षण पूरी कड़ाई के साथ किया जाए।

दो समुद्री सभ्यताओं का मिलन साबित हो सकता है ये मेगा प्रोजेक्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह इंडोनेशिया यात्रा साबांग और ग्रेट निकोबार को वैश्विक समुद्री व्यापार के नए जुड़वाँ स्तंभों के रूप में स्थापित करने की एक मजबूत और ऐतिहासिक नींव रख चुकी है। यह केवल दो बंदरगाहों का भौतिक विकास नहीं है, बल्कि दो महान समुद्री सभ्यताओं का एक ऐसा आधुनिक पुनर्मिलन है जो आने वाले कई दशकों तक पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शांति, स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सुरक्षा की दिशा और दशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।

इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

70 मिनट में एक के बाद एक फटे 21 IED, 57 की मौत और सैकड़ों घायल: पढ़ें- अहमदाबाद ब्लास्ट की कहानी, केरल के जंगलों में ट्रेनिंग कर आए थे SIMI और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी

अहमदाबाद ब्लास्ट केस में 18 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 49 दोषियों में से 11 को उम्रकैद और 38 को फाँसी की सजा दी है। इस मामले में 28 लोगों को पहले ही बरी कर दिया गया था, जबकि एक आरोपित सरकारी गवाह बन गया था।

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक के बाद एक 21 बम धमाके हुए थे, जिसमें 56 लोगों की जान चली गई थी और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। इसके तहत मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए और घायलों को 1 लाख रुपए देने को कहा है।

70 मिनट में 21 जगहों पर बम धमाके

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में शाम करीब 6:45 बजे से 8:00 बजे के बीच करीब 70 मिनट के अंतराल में 21 अलग-अलग जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन आतंकवादी हमलों में 56 लोग मारे गए और 240 से अधिक लोग घायल हो गए। पूरा शहर दहल चुका था। अस्पतालों में भारी अफरा-तफरी मच गई थी। घायलों को अस्पताल लाया गया था।

धमाकों को अंजाम देने से ठीक पहले, इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने कई मीडिया घरानों को ईमेल भेजा था और हमलों की चेतावनी दी थी। उस वक्त इंडियन मुजाहिदीन का नाम आतंकी लिस्ट में नहीं था। उसे 2010 की पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट की जिम्मेदारी लेने के बाद प्रतिबंधित किया गया था। उस हमले में 17 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कुछ धमाके उन अस्पतालों के बाहर हुए जहाँ पहले विस्फोटों के घायलों को इलाज के लिए लाया जा रहा था। इससे अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान करने की कोशिश की गई थी। यह हमले शहर के बेहद भीड़-भाड़ वाले और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाकर किए गए थे। इनमें सिविल अस्पताल और एल.जी. अस्पताल मणिनगर, बापूनगर, और नरोडा इलाके के सार्वजनिक बसों, साइकिलों और बाजारों में ब्लास्ट कैसे किए गए।

साइकिल में टिफिन बम में हुआ ब्लास्ट

आतंकवादियों ने साइकिलों पर टिफिन में आईईडी छिपा कर ज्यादातर जगहों पर रखा था और उन्हें टाइमर के जरिए विस्फोट किया। कई जगहों पर दूसरे वाहनों का भी इस्तेमाल किया गया। 21 जगहों को इस तरह चुना गया, जहाँ काफी भीड़ भाड़ होती थी। धमाकों के दो दिन बाद गुजरात पुलिस और आतंकवाद निरोधी दस्ते ने सूरत के अलग-अलग इलाकों से 29 जिंदा बम बरामद किए थे, जो सही सर्किट या डेटोनेटर नहीं जुड़ने के कारण फटे नहीं थे। इन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने इनएक्टिव किया।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आतंकियों ने ईमेल में लिखा था कि यह 2002 के गोधरा के बाद गुजरात हिंसा का बदला लेने के लिए किया गया है।

तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में शांति की अपील की और घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी।

78 पर चला केस, 49 को मिली सजा

इस मामले में एक आरोपित अयाज सैयद सरकारी गवाह बन गया था। केस के दौरान ट्रायल कोर्ट में करीब 1163 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए। कोर्ट में रोजाना 491 दिनों तक हर दिन केस पर सुनवाई हुई और 100 से ज्यादा वकील इसमें शामिल हुए। इस मामले को देश के सबसे बड़े धमाकों में गिना जाता है। अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस माना।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने स्पेशल जज एआर पटेल ने अपने फैसले में 28 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। जबकि मृतकों के परिजनों को 1-1 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

जाँच के दौरान कई ऐसी घटनाएँ भी घटी, जिसकी चर्चा हुई। 2013 में जेल में बंद कुछ आरोपितों ने सुरंग बनाकर फरार होने की साजिश रची थी, लेकिन सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने मामले में 49 लोगों को दोषी ठहराया था। गुजरात हाईकोर्ट ने इन सभी 38 दोषियों की फाँसी की सजा और 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा दी थी, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 1 लाख से 5 लाख रुपये तक का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन ने रची थी साजिश

2008 के अहमदाबाद बम धमाकों की साजिश बहुत गहरी थी, जिसका ताना-बाना देश के अलग-अलग राज्यों में बुना गया था। पुलिस जाँच और अदालती कार्यवाही में इसके मास्टरमाइंड और आतंकियों की ट्रेनिंग से जुड़ी अहम जानकारी सामने आई थी।

प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और इंडियन मुजाहिदीन (IM) के शीर्ष नेताओं की तिकड़ी ने मिलकर इसकी पूरी साजिश रची थी। मुफ्ती अबू बशर को पूरे ब्लास्ट का मुख्य मास्टरमाइंड और वैचारिक मार्गदर्शक माना गया। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले इस मौलवी ने युवाओं को भड़काने और हमले के लिए उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने का काम किया था। सिमी के पूरे धमाकों की योजना को अंतिम रूप दिया।

हैदराबाद ब्लास्ट मामले में दोषी पाया गया यासीन भटकल इस मामले मं भी शामिल था। भटकल बंधु यानी रियाज और यासीन इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार आतंकियों में शुमार थे, जो बमों को बनाने, विस्फोटक जुटाने और उन्हें सही समय पर प्लांट करने का तकनीकी काम संभाल रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों की जाँच के मुताबिक, धमाकों को अंजाम देने से पहले आतंकियों के लिए घने जंगलों में गुप्त ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए गए थे।

केरल के वागामोन जंगल में दिसंबर 2007 में सिमी का एक बेहद गुप्त और बड़ा ट्रेनिंग कैंप आयोजित हुआ था। सफदर नागौरी की देखरेख में आयोजित इस कैंप में देश के करीब आधा दर्जन राज्यों (जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि) से आए 50 से अधिक कट्टरपंथी युवाओं ने हिस्सा लिया था।

इस कैंप में आतंकियों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के अलावा हथियार चलाने, कमांडो कॉम्बैट, रस्सी पर चढ़ने और आईईडी और टाइमर बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद गुजरात के स्थानीय युवकों जैसे- अयाज सैयद का इस्तेमाल अहमदाबाद में साइकिलों और बसों में बम रखने के लिए किया गया। फिर एक के बाद एक 21 जगहों पर 70 मिनट में धमाके किए गए।

कहाँ है बलिराजगढ़, जो ASI की खुदाई में उगल रहा मिथिला की प्राचीन सभ्यता और वैभव के अवशेष; राजा बलि से लेकर विदेह तक से है कनेक्शन

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ इन दिनों पुरातात्विक दुनिया में कौतूहल और गौरव का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में इस प्राचीन स्थल से मिले असाधारण पुरातात्विक साक्ष्यों ने न केवल इतिहासकारों को चौंकाया है, बल्कि मिथिलांचल के गौरवशाली अतीत को एक नया आयाम भी दिया है।

जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और संसदीय समिति के अध्यक्ष संजय कुमार झा के अनुसार, यहाँ चल रही वैज्ञानिक खुदाई में एक अत्यंत समृद्ध और उन्नत सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल की महत्ता को देखते हुए यहाँ अगले 10 वर्षों तक खुदाई जारी रखने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

इसके साथ ही इस सुदूर इलाके में ASI का एक नया दफ्तर खोलने और एक बड़ा संग्रहालय (म्यूजियम) बनाने की तैयारी भी चल रही है। रामायण काल से इसका जुड़ाव, राजा बलि से जुड़ी पुरानी लोककथाएँ और मौर्य व शुंग साम्राज्य की मजबूत दीवारें बलिराजगढ़ को भारत की प्राचीन सभ्यता का एक सबसे अनोखा केंद्र बनाती है।

(फोटो साभार: The Print)

पुरातत्वविदों का कहना है कि स्थल पर मौजूद टीम एक ऐसी सभ्यता की खोज कर रही है, जो लौह युग के विदेह साम्राज्य की समझ को पूरी तरह से बदल सकती है, जिसका संबंध राजा जनक और रामायण से है। यह नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भारत की प्राचीन जड़ों की गहराई में जाकर रामायण और महाभारत काल के ठोस प्रमाण खोजने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

खास खाइयों से मिले अनोखे सबूत: खुदाई में मिलीं पत्थर की गेंदें, दुर्लभ सिक्के और मिट्टी के खिलौने

बलिराजगढ़ में इस समय जो खुदाई चल रही है, उसमें पुरानी गलतियों से सीखकर बिल्कुल नए और आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले की खुदाइयों में जो सबसे बड़ी दिक्कत पानी भरने और मैपिंग की आती थी, उसे इस बार सैटेलाइट इमेजिंग, आधुनिक वैज्ञानिक ट्रेंचिंग और जीपीएस मैपिंग जैसी तकनीकों के जरिए दूर कर लिया गया है।

इस समय वैज्ञानिकों की टीम पूरी तरह से छह विशेष खाइयों (यानी ट्रेंच) पर काम कर रही है। इन्हें बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से दो मुख्य हिस्सों में बाँटा गया है-एक है किले की मुख्य दीवार का क्षेत्र (Fortification Area) और दूसरा है आम नागरिकों के रहन-सहन वाला दक्षिणी क्षेत्र (Southern Area)।

अगर हम इन खाइयों से मिली चीजों को देखें, तो किले वाले हिस्से की खाइयों (जैसे YC-30, YC-31 और YD-31) की खुदाई पूरी हो चुकी है, जहाँ से प्राचीन सुरक्षा दीवारें और दुश्मनों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की भारी गेंदें मिली हैं। वहीं दूसरी तरफ इसका दक्षिणी हिस्सा प्राचीन लोगों के रोजमर्रा के जीवन के सबसे बड़े राज खोल रहा है।

यहाँ की एक खाई (YD-12) की गहराई तो 5.40 मीटर तक नीचे चली गई है, जहाँ से 13 परतों वाला मिट्टी के छल्लों से बना एक शानदार कुआँ (रिंग-वेल) मिला है। जानकारों का कहना है कि इसका इस्तेमाल पानी या फिर अनाज को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता होगा।

इसी तरह एक और खाई (ZD-16) से पानी निकालने की आधुनिक नाली और सोख्ता गड्डा मिला है, जबकि खाई YL-14 से सात परतों वाली ईंटों का एक बहुत बड़ा ढाँचा सामने आया है। यह गहरी खुदाई हमें वक्त के पहिए में सदियों पीछे ले जा रही है।

प्राचीन नगर नियोजन और मिट्टी से निकला पुरावशेषों का खजाना

बलिराजगढ़ की मिट्टी से इस समय जो भी ढाँचे और पुरानी वस्तुएँ बाहर आ रही हैं, वे उस जमाने के एक बेहद उन्नत और योजनाबद्ध शहर की कहानी सुनाती हैं। खुदाई में मिलीं सात परतों वाली ईंटों की दीवारें, घरों के आँगन और पक्के फर्श यह साबित करते हैं कि यहाँ के लोग मकान बनाने की कला (इंजीनियरिंग) में बहुत माहिर थे।

उनके घरों का लेआउट दिखाता है कि यह शहर अचानक या बेतरतीब नहीं बसा था, बल्कि इसे पूरी प्लानिंग के साथ बनाया गया था। गंदे पानी को निकालने के लिए बनाई गई नालियों की व्यवस्था और सोख्ता गड्ढे यह साफ करते हैं कि उस दौर के लोग साफ-सफाई और सेहत को लेकर कितने जागरूक थे।

इसके अलावा यहाँ की मिट्टी से रोजमर्रा की जिंदगी, खेल-कूद और व्यापार से जुड़ी ढेरों प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं। खुदाई में उस दौर के सबसे कीमती और शाही माने जाने वाले ‘उत्तरी काली पॉलिश वाले बर्तन’ (NBPW) के टुकड़े मिले हैं, जो आमतौर पर मौर्य और शुंग काल के अमीर और संपन्न परिवारों की पहचान होते थे।

इनके साथ ही लाल, काले और धूसर (ग्रे) रंग के चमकीले बर्तनों की मौजूदगी यह बताती है कि यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीक कितनी लाजवाब थी।

बच्चों के खेलने के लिए मिट्टी की छोटी-छोटी खिलौना गाड़ियाँ, पासे, सुंदर मनके (बीट्स) और शिकार या सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की छोटी गेंदें यह साबित करती हैं कि यहाँ का सामाजिक जीवन बहुत खुशहाल और आर्थिक रूप से मजबूत था।

पुरानी खुदाइयों का इतिहासः 1962 से शुरू हुई खोज

बलिराजगढ़ की अहमियत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें इसके पुराने इतिहास और पहले हुई खुदाइयों पर एक नजर डालनी होगी। यह पहली बार नहीं है जब यहाँ जमीन को खोदा जा रहा है, बल्कि मौजूदा खुदाई इस जगह को समझने का चौथा बड़ा वैज्ञानिक प्रयास है।

इस टीले के नीचे छिपे इतिहास को सबसे पहले साल 1962-63 में पहचाना गया था, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहाँ पहली बार शुरुआती खुदाई का काम शुरू किया था। उस समय मिले चंद अवशेषों ने ही यह इशारा कर दिया था कि इसके नीचे कुछ बहुत बड़ा और ऐतिहासिक छिपा हुआ है।

इसके बाद, साल 1972-75 के दौरान यहाँ दूसरे दौर की और ज्यादा व्यवस्थित खुदाई की गई, जिसने यहाँ की ऐतिहासिक कड़ियों को और मजबूत किया।

फिर तीसरे दौर की खुदाई वर्ष 1998-99 के आसपास हुई। इन शुरुआती तीनों खुदाइयों में पुरातत्वविदों को मौर्य साम्राज्य (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) और शुंग राजवंश के समय की विशाल ईंटों से बनी सुरक्षा दीवारें, दुर्लभ मुहरें, पुराने सिक्के और खास तरह के मिट्टी के बर्तन मिले थे।

हालाँकि उस समय तकनीकी कमियों, संसाधनों की किल्लत और सबसे बढ़कर बारिश के दिनों में जमीन के नीचे का पानी (भूजल स्तर) अचानक ऊपर आ जाने की वजह से काम को बीच में ही रोकना पड़ा था। लेकिन आज आधुनिक तकनीकों के साथ यहाँ चौथे दौर की सबसे बड़ी खुदाई शुरू की गई है, ताकि अधूरे रह गए इतिहास को पूरा किया जा सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बारिश की वजह से काम को फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। बारिश थमने के बाद दोबारा खुदाई शुरू होने की संभावना है।

राजा बलि की कहानी और इस जगह के नाम का पुराना रहस्य

बलिराजगढ़ के नाम और इसकी पहचान के पीछे सदियों पुरानी लोककथाएँ और मान्यताएँ छिपी हुई हैं। यहाँ के स्थानीय लोग और बुजुर्ग हमेशा से यह मानते आए हैं कि इस विशाल मिट्टी के टीले और ऊँची दीवारों का संबंध पौराणिक काल के महाप्रतापी और दानी राजा बलि से है।

लोक-परंपराओं में कहा जाता है कि यह स्थान कभी राजा बलि की राजधानी या उनका ऐसा किला था जिसे कोई जीत नहीं सकता था। यह कहानी यहाँ के लोगों के दिलों में इस कदर रची-बसी है कि जब भी इस टीले के पास खुदाई की बात होती है, तो लोगों के मन में सबसे पहला कौतूहल राजा बलि के उसी प्राचीन महल और नगरी को देखने का जाग उठता है।

राजा बलि वही राजा हैं, जिनका जिक्र हिंदू पुराणों में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा में आता है। हालाँकि आज के पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह जगह किसी एक राजा की कहानी से कहीं आगे बढ़कर, समय की कई परतों को अपने अंदर समेटे हुए एक प्राचीन शहरी सभ्यता का जीता-जागता सबूत है।

रामायण काल से सीधा जुड़ाव और मिथिला का पुराना गौरव

बलिराजगढ़ का नाता सिर्फ पौराणिक कहानियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बहुत गहरा और सीधा संबंध रामायण काल और माता सीता की जन्मस्थली मिथिला से है। अगर नक्शे के हिसाब से देखें, तो यह जगह प्राचीन मिथिलांचल के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है।

यह वही महान भूमि है जो राजा जनक के ज्ञान, महर्षि याज्ञवल्क्य की विद्वता और भगवान राम-सीता के विवाह के इतिहास से महकती है। रामायण काल के रास्तों और जगहों पर शोध करने वाले जानकारों का मानना है कि प्राचीन समय में यह किला एक बहुत बड़ा प्रशासनिक या सुरक्षा केंद्र रहा होगा।

इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यह माता सीता की जन्मस्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) और नेपाल के जनकपुर के बीच एक बेहद मजबूत कल्पित सुरक्षा गढ़ या किले के रूप में दिखाई देता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार की मौजूदा सांस्कृतिक योजनाओं में बलिराजगढ़ को ‘रामायण सर्किट’ का एक बेहद जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।

मोदी सरकार की कोशिश है कि भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़ी जितनी भी ऐतिहासिक जगहें हैं, उन्हें एक साथ जोड़कर विकसित किया जाए। बलिराजगढ़ की इस नई खुदाई से मिथिलांचल के उस दौर के पक्के भौतिक सबूत सामने आ रहे हैं, जो अब तक सिर्फ धार्मिक किताबों और कहानियों में सुने जाते थे।

इससे स्पष्ट है कि रामायण काल की मिथिला सिर्फ विचारों या ज्ञान की नगरी नहीं थी, बल्कि उसके पास एक बहुत ही मजबूत, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से बसाया गया शहर भी था।

केंद्र सरकार के प्रयास और इस खोज से भविष्य में होने वाले बड़े बदलाव

बलिराजगढ़ से मिल रहे इन अनमोल और ऐतिहासिक सबूतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदलने के लिए एक बहुत बड़ा और लंबा प्लान तैयार किया है। सरकार की तरफ से यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया है कि यहाँ अगले 10 सालों तक लगातार वैज्ञानिक खुदाई का काम जारी रहेगा।

इतने लंबे समय तक चलने वाली खुदाई से यह फायदा होगा कि इतिहास का कोई भी पन्ना अछूता नहीं रहेगा और इस प्राचीन सभ्यता की पूरी कहानी दुनिया के सामने आ सकेगी। इस बड़े अभियान को अच्छे से चलाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक परमानेंट दफ्तर इसी ग्रामीण इलाके में खोला जा रहा है।

खुदाई से निकलने वाली हर छोटी-बड़ी चीज जैसे मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों को सुरक्षित रखने के लिए यहाँ एक भव्य और आधुनिक म्यूजियम (संग्रहालय) बनाया जाएगा। यह म्यूजियम न केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि देश-विदेश के इतिहासकारों और शोध करने वाले छात्रों के लिए पढ़ाई का एक बहुत बड़ा जरिया बनेगा।

इस पूरी खोज और विकास का सबसे बड़ा और सीधा फायदा आने वाले समय में पूरे मिथिलांचल और उत्तर बिहार के लोगों को मिलने वाला है। जब यह जगह रामायण सर्किट से पूरी तरह जुड़ जाएगी और यहाँ एक बड़ा म्यूजियम बन जाएगा, तो यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।

पर्यटन के इस विकास से इस सुदूर ग्रामीण इलाके में बेहतरीन सड़कें, होटल, गाड़ियाँ और संचार जैसी आधुनिक सुविधाएँ तेजी से पहुँचेंगी।

सबसे अच्छी बात यह होगी कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होटल, हस्तशिल्प और छोटे-मोटे व्यापार के रूप में रोजगार के हजारों नए मौके पैदा होंगे, जिससे इलाके के लोगों का आर्थिक जीवन सुधरेगा। यह खोज आने वाली पीढ़ियों को उनकी समृद्ध विरासत और मिथिला के गौरवशाली अतीत से रूबरू कराएगी, जिससे हर किसी को अपनी संस्कृति पर गर्व होगा।

पाकिस्तान की Cream, भारत में महिलाओं को फैला रही किडनी की गंभीर बीमारी: जानें- क्या है महाराष्ट्र का ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ विवाद और किन देशों में लग चुका है बैन

हर कोई खूबसूरत और गोरा दिखना चाहता है। इसी चाहत में लोग अक्सर बिना सोचे-समझे बाजार में मिलने वाली कोई भी ब्यूटी क्रीम चेहरे पर लगाने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी गोरा होने का यही शौक जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया। पाकिस्तान में बनी एक मशहूर ब्यूटी क्रीम को लगाने से भारत की कई महिलाओं की सेहत पूरी तरह बिगड़ गई। इस क्रीम ने न सिर्फ महिलाओं के चेहरे को खराब किया, बल्कि सीधे उनकी किडनी पर इतना बुरा असर डाला कि वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं।

इस पूरे हंगामे की वजह पाकिस्तान की ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (Goree Beauty Cream) है। इस क्रीम को लेकर दावा किया जाता था कि इसे लगाने से चेहरा तुरंत गोरा हो जाता है, लेकिन अब इसके पीछे का जहरीला सच सबके सामने आ चुका है। महाराष्ट्र के नागपुर में जब कई महिलाओं ने इस क्रीम को लगाया, तो उन्हें सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएँ होने लगीं। जब इसकी शिकायतें डॉक्टरों और सरकार तक पहुँचीं, तो जाँच टीमें तुरंत अलर्ट हो गईं। लैब में इस क्रीम की बारीकी से जाँच की गई, जिसमें खतरनाक केमिकल मिले। इसके बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने सच का पता लगाकर इस क्रीम को भारत में पूरी तरह बैन कर दिया है।

नागपुर से हुई जहरीले सच की शुरुआत

यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के नागपुर में कई महिलाओं की तबीयत अचानक खराब होने लगी। जब वे डॉक्टरों के पास पहुँचे, तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ पिछले दो साल से गोरा होने के लिए एक ही ब्रांड की क्रीम लगा रही थीं। जाँच में सामने आया कि इस क्रीम की वजह से उनकी किडनी खराब हो चुकी थी और उनके शरीर में खतरनाक जहर फैल गया था।

डॉक्टरों ने जब गहराई से जाँच की, तो मालूम पड़ा कि ये सभी 18 महिलाएँ इंटरनेट और सोशल मीडिया से खरीदकर ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (जो पाकिस्तान की है) इस्तेमाल कर रही थीं। यह बात पता चलते ही डॉक्टरों ने तुरंत इसकी जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासन को दी। इसके बाद सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए बाजार से इस क्रीम को जब्त कर लिया और जांच के लिए लैब में भेज दिया ताकि पता चल सके कि इसमें कौन से खतरनाक केमिकल मिलाए गए हैं।

प्रयोगशाला की जाँच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

जब महाराष्ट्र के सरकारी विभाग (FDA) ने इस ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ की लैब में जाँच की, तो नतीजे बहुत डराने वाले थे। जाँच में पता चला कि इस क्रीम में पारा (Mercury) और शीशा (Lead) जैसे बेहद खतरनाक और जहरीले केमिकल मिले हुए थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें पारे (Mercury) की मात्रा तय कानूनी सीमा से 752 गुना ज्यादा थी।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, कंपनियाँ इस पारे का इस्तेमाल इसलिए करती हैं ताकि त्वचा का रंग बहुत जल्दी गोरा और साफ दिखने लगे। लेकिन यह गोरापन कोई असली निखार नहीं होता, बल्कि केमिकल्स के कारण त्वचा को पहुँचने वाला नुकसान होता है। यह खतरनाक पारा स्किन के छोटे-छोटे छेदों (रोमछिद्रों) के रास्ते बहुत आसानी से शरीर के अंदर चला जाता है और धीरे-धीरे अंदरूनी अंगों को खराब करने लगता है।

किडनी पर सीधा हमला और ‘मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी’ का खतरा

रोज इस प्रतिबंधित (बैन) क्रीम को लगाने की वजह से महिलाओं के शरीर में यह खतरनाक पारा जमा होता गया, जिसने सीधे उनकी किडनी को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि त्वचा के रास्ते शरीर में पहुँचा यह जहर अंदरूनी अंगों को खराब करता है और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) को बिगाड़ देता है। इससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है, जिसका इलाज बहुत मुश्किल और महँगा होता है।

मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, ऐसे ज्यादा पारे वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से किडनी की एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में किडनी का फिल्टर करने वाला हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे शरीर का जरूरी प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर बहने लगता है। नागपुर की पीड़ित महिलाओं में भी ठीक यही बीमारी और लक्षण पाए गए, जो लंबे समय तक इस जहरीली क्रीम को लगाने की वजह से हुए थे।

भारतीय प्रशासनिक तंत्र और सरकार का कड़ा एक्शन

इस बड़े खतरे को देखते हुए भारत सरकार और महाराष्ट्र के विभाग (FDA) ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया है। प्रशासन ने ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ के साथ दो और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स- ‘फेस फ्रेश गोल्ड’ (क्रीम और सीरम) और ‘कॉस्मेटिक गोल्डन स्टार ब्यूटी क्रीम’ को पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया है। अब इन पर पूरी तरह बैन लगा दी गई है और लोगों से अपील की गई है कि वे इन्हें भूलकर भी न खरीदें।

इसके साथ ही, पूरे महाराष्ट्र में नकली और खराब कॉस्मेटिक्स बेचने वालों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की देखरेख में सिर्फ जून के महीने में ही 34 जगहों पर छापे मारे गए। इस कार्रवाई में 4 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकली दवाएँ और खतरनाक ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब्त किए गए हैं। साथ ही, नियम तोड़ने वाले दुकानदारों के खिलाफ 9 FIR दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

नियमों का सरेआम उल्लंघन और मुंबई में क्रिमिनल केस

जाँच करने वाले अधिकारियों को पता चला कि इन पाकिस्तानी क्रीमों के पैकेट पर कानून के मुताबिक कोई भी जरूरी जानकारी नहीं लिखी थी। पैकेट पर न तो बनाने वाली कंपनी का नाम-पता था, और न ही यह लिखा था कि क्रीम कब बनी है और कब खराब (Expire) होगी। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था, जिससे ग्राहकों को धोखे में रखकर उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।

इसी बीच, मुंबई पुलिस ने चेंबूर इलाके के एक दुकानदार पर केस दर्ज किया है। इस दुकानदार पर आरोप है कि पाकिस्तान से सामान मँगाने पर रोक होने के बावजूद, वह छिपकर यह खतरनाक ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ बेच रहा था। अब पुलिस और एजेंसियाँ इस बात की गहराई से जाँच कर रही हैं कि रोक होने के बाद भी यह प्रतिबंधित क्रीम भारतीय बाजारों और दुकानों तक किस रास्ते से पहुँच रही थी।

ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत में एंट्री

इस मामले में एक और बड़ी चिंता की बात यह है कि रोक होने के बाद भी यह पाकिस्तानी क्रीम लोगों के घरों तक कैसे पहुँची। जाँच में पता चला कि इसे बेचने के लिए इंस्टाग्राम पेजों, रील्स और इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। यहाँ तक कि मीशो (Meesho) जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी कुछ बाहरी दुकानदारों (थर्ड-पार्टी सेलर्स) द्वारा यह खतरनाक क्रीम धड़ल्ले से बेची जा रही थी, जहाँ से आम महिलाओं ने इसे आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया।

सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापनों और झूठे दावों को देखकर सीधी-सादी महिलाएँ इसके जाल में फँस गईं और इसे चेहरे के लिए बहुत अच्छा मान बैठीं। इंटरनेट पर इस क्रीम से बहुत जल्दी गोरा होने का झूठा प्रचार किया गया था, जिसे देखकर लोगों ने इसे खरीदा। अब सरकार ने सभी ऑनलाइन वेबसाइटों और छोटे-बड़े दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी है कि वे इस क्रीम को तुरंत बेचना बंद कर दें, वरना उनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुके हैं इस क्रीम पर प्रतिबंध

इस पाकिस्तानी क्रीम का यह सच सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सामने आ चुका है। यह ब्रांड विदेशों में भी अपनी बदनामी के लिए जाना जाता है। साल 2021 में न्यूजीलैंड की सरकारी दवा संस्था ने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए इस क्रीम को लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, क्योंकि वहाँ की लैब जाँच में भी इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में जहरीला पारा और शीशा पाया गया था।

इसके बाद, साल 2025 में फिलीपींस सरकार ने भी इस क्रीम के सभी प्रोडक्ट्स को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए चेतावनी जारी की थी। फिलीपींस सरकार का कहना था कि इस क्रीम को देश में बेचने की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। दुनिया भर में बार-बार बैन होने के बाद भी, यह पाकिस्तानी ब्रांड तस्करी और इंटरनेट के गलत रास्तों के जरिए दुनिया के बाजारों में छिपकर बिकने की कोशिश कर रहा है।

सोशल मीडिया पर दिखा भारी आक्रोश और जनता का रिएक्शन

इस खुलासे के बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग बहुत गुस्से में हैं और इस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस मामले को सबसे पहले ‘X’ (ट्विटर) पर चिराग बरजात्या नाम के एक व्यक्ति ने पोस्ट शेयर करके सामने लाया था, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई। इस पोस्ट को देखकर हजारों लोगों ने गुस्सा जताया और इसे भारतीयों के खिलाफ एक तरह का ‘केमिकल हमला’ (केमिकल टेररिज्म) कहा।

लोग न सिर्फ इस पाकिस्तानी क्रीम को कोस रहे हैं, बल्कि भारत की ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के इसे अपनी साइट पर कैसे बिकने दिया। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स को कोई भी विदेशी सामान बेचने से पहले उसकी सरकारी मंजूरी और लैब रिपोर्ट जरूर चेक करनी चाहिए। इसके साथ ही, लोग इंटरनेट पर अभियान चलाकर अपील कर रहे हैं कि अपने रिश्तेदारों और घर के काम करने वाले सहायकों को इसके बारे में सावधान करें, और अगर किसी के पास भी यह क्रीम दिखे, तो उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें।

गोरेपन का जानलेवा भ्रम और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

पाकिस्तानी क्रीम का यह मामला दिखाता है कि गोरा होने की चाहत, टीवी-इंटरनेट के झूठे विज्ञापन और हमारी आज की आदतें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। कुछ ही दिनों में गोरा करने का दावा करने वाली ये क्रीम असल में खूबसूरती बढ़ाने की चीज नहीं, बल्कि बोतलों में बंद धीमा जहर हैं, जो धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को खराब कर रही हैं। इस घटना से साफ है कि बिना डॉक्टर की सलाह या बिना सरकारी मंजूरी के इंटरनेट से कोई भी क्रीम या कॉस्मेटिक खरीदना जानलेवा हो सकता है।

अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें, बल्कि खुद भी सोचें। हमें यह समझना होगा कि जैसा हमारा प्राकृतिक रंग है, वही सबसे अच्छा और सेहतमंद है। गोरा होने की अंधी दौड़ में पड़कर अपनी जान जोखिम में डालना बहुत बड़ी बेवकूफी है। सरकार का इस क्रीम को बैन करना और छापे मारना बहुत अच्छा कदम है, लेकिन यह समस्या तभी पूरी तरह खत्म होगी जब हम खुद समझदार बनेंगे, झूठे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आएँगे और चोरी-छिपे आने वाले ऐसे जहरीले विदेशी सामानों को पूरी तरह ना कह देंगे।

‘आधी रात को निकाले हजारों प्रवासी’: बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भारत की सख्त पुश-बैक नीति के खिलाफ Financial Times का विलाप, बंगाल सरकार पर बेबुनियाद हमला

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।

नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।

दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक ​​कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।

घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट

1 जुलाई 2026 को फाइनेंशियल टाइम्स ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।

कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”

इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।

लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”

आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।

इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”

बेशक फाइनेंशियल टाइम्स ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।

धार्मिक रंग देने की कोशिश

लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।

असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।

आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।

संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।

फाइनेंशियल टाइम्स ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।

अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।

बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।

न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले

शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।

गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”

असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।

दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन

अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।

स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।

लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।

एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।

फाइनेंशियल टाइम्स के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।

कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

हमें याद रखना चाहिए कि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

हालाँकि एफटी जैसे संगठनों के लिए, हिंदुओं को अपनी संस्कृति और भविष्य की रक्षा करने के अधिकारों से वंचित कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे भारत को अपनी नीतियाँ तय करने की स्वायत्तता नहीं होनी चाहिए। ये आजादी केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें इस्लामी-वामपंथी गुट उपयुक्त समझते हैं।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Insta से चाइल्ड पोर्न हटाने के आदेश को ‘ब्लूमबर्ग’ बता रहा META के लिए ‘सिरदर्द’, पड़ी गालियाँ: जानिए कैसे विदेशी मीडिया के लिए बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा भारत का विरोध है जरूरी

भारत को अक्सर मानवाधिकारों, संवेदनशीलता, न्याय, बाल संरक्षण और न जाने किस-किस पर ज्ञान देने वाला पश्चिमी मीडिया अपनी बारी आते ही सारी नैतिकता को भूल जाता है। कुछ दिन पहले जब भारत सरकार ने इंस्टाग्राम से चाइल्ड पोर्नोग्राफी हटाने के लिए अमेरिकी टेक कंपनी मेटा को एक नोटिस जारी किया तो ब्लूमबर्ग ने इस एक्शन की सराहना करने की जगह, इसे अपनी रिपोर्ट में Regulatory Headache बताया, जिसकी वजह से अब उन्हें गाली पड़ रही है।

मामला यह था कि भारत के आईटी मंत्रालय ने मेटा कंपनी को एक नोटिस भेजा था। इसमें इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़ी अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री (Child Pornography) वाले विज्ञापनों को तुरंत हटाने और 7 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।

इस सीधी और संक्षिप्त खबर को ब्लूमबर्ग ने ‘कानूनी सिरदर्द’ करार दिया और लिखा- “भारत ने मेटा कंपनी को इंस्टाग्राम से बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री हटाने को कहा है, जो इस अमेरिकी कंपनी के लिए एक नया नियामकीय सिरदर्द है।”

गौरतलब हो कि बच्चों का शोषण और उनसे जुड़ी अश्लील सामग्री कोई छोटा-मोटा कॉरपोरेट मसला नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गंभीर और घिनौना अपराध है। ब्लूमबर्ग ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस गंभीर अपराध को ऐसे पेश किया जैसे ये कोई सामान्य बात है और भारत सरकार मेटा कंपनी को कोई बेवजह का काम देकर टेक कंपनी को परेशान कर रही हो।

उनकी इस करतूत ने जाने-अनजाने में बच्चों के साथ होने वाले अपराध से ध्यान भटकाकर पूरा फोकस इस बात पर डाल दिया कि मेटा कंपनी को कितनी ‘असुविधा’ हो रही है, जबकि हकीकत तो यह है कि कंपनी ऐसे घटिया विज्ञापनों से पैसे कमा रही थी।

ब्लूमबर्ग और खबर लिखने वाले पत्रकार ‘संकल्प भरतियाल’ को यह समझने की ज़रूरत है कि बाल यौन शोषण कल्पना से सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। इस खबर से ब्लूमबर्ग की संपादकीय नीति और उनकी नैतिकता पर सीधे सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी वजह से उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है।

ब्लूमबर्ग की ऐसी असंवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए, एक भारतीय एक्स यूज़र ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा- “सिरदर्द? बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को हटाना कहना आपके लिए एक सिरदर्द है?”

एक अन्य यूज़र ने सवाल किया, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बाल यौन सामग्री को हटाना किसी अमेरिकी टेक दिग्गज के लिए रेगुलेटरी सिरदर्द क्यों होगा? क्या अमेरिका मेटा प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन सामग्री की अनुमति देता है?”

एक और एक्स यूज़र ने लिखा, “ब्लूमबर्ग की समस्या यह नहीं है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री मौजूद है- उनकी समस्या यह है कि भारत मेटा को इसे हटाने के लिए मजबूर कर रहा है। वे इस नैतिक जिम्मेदारी को ‘रेगुलेटरी हेडएक’ कहते हैं।

ब्लूमबर्ग का मानसिक स्तर गिर चुका है और वे अब ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे पीडोफिलिया कोई मुद्दा ही न हो।”

गौरतलब है कि ब्लूमबर्ग की यह हरकत देखकर ऐसा लगता है कि ने यह संवेदनहीनता उन्होंने सिर्फ इसलिए दिखाई क्योंकि यह मामला भारत के आदेश से जुड़ा था। और चूँकि ब्लूमबर्ग अक्सर अपने ओपिनियन वाले आर्टिकल के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव चलाने के लिए पहले से ही बदनाम रहा है इसलिए इस बार भी हैरानी की बात नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया। मगर, दुखद यह है कि ब्लूमबर्ग पर ऐसी हरकतें अक्सर भारतीय मूल के लेखकों द्वारा करवाई जाती है।