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क्या भारत की राजनीति पहली बार पूरी तरह ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गई है?

इतालवी दार्शनिक एंटोनियो ग्राम्सी ने अपने ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (Cultural Hegemony) के सिद्धांत में यह समझाया था कि कोई भी वैचारिक व्यवस्था या राजनीतिक सत्ता अपनी असली जीत तब दर्ज करती है, जब वह समाज के भौतिक साधनों की जगह उसकी भाषा, उसके मानस और उसकी बहसों के केंद्र पर नियंत्रण पा लेती है। जब समाज की ‘डिस्कर्सिव बाउंड्री’ (Discourse Boundaries) तय हो जाती हैं, तब विकल्प चाहे जो हों, खेल उसी निर्धारित दायरे के भीतर खेला जाता है।

कुछ ऐसा ही प्रच्छन्न लेकिन गहरा बदलाव आज भारतीय राजनीतिक और सामाजिक मानस में घटित हो रहा है।

आज राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया स्टूडियो तक एक ही शोर है, ‘मोदी का पतन’ और एनडीए सरकार का कमजोर होना। चुनाव परिणामों, गठबंधन की मजबूरियों और सरकार विरोधी बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। ठीक इसी बीच, आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर आयोजित एक ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की सहज उपस्थिति और मंजीरा बजाने जैसी तस्वीरें भी सामने आईं, जिन्हें कुछ लोग क्षणिक पीआर मानकर खारिज कर सकते हैं, किंतु इसके गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं।

लेकिन इस सतही शोरगुल के बीच, विश्लेषकों की नज़र से एक ऐसा ऐतिहासिक और जमीन-स्तरीय बदलाव छूट गया है जो भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल रहा है। आज़ाद भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र पूरी तरह से ‘हिन्दू-केंद्रित’ हो गया है।

आज़ादी के बाद से लेकर अब तक, भारतीय राजनीति का मुख्य खाका ‘धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता’ या ‘तुष्टीकरण बनाम बहुसंख्यकवाद’ के दायरे में घूमता रहा है। चुनावों में राजनीतिक दलों का एजेंडा अल्पसंख्यकों को साधना, सेक्युलरिज्म का चोला पहनना और तथाकथित ‘वोट बैंक’ की राजनीति करना होता था।

लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। आज राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य से पारंपरिक अल्पसंख्यक राजनीति (Minority-Centric Politics) हाशिये पर चली गई है।

कांग्रेस का बदला रुख भी देखिए; जो कांग्रेस पार्टी कभी अल्पसंख्यकों के विशेष संरक्षण को अपनी राजनीति का मुख्य केंद्र मानती थी, वह आज ‘जितनी आबादी, उतना हक’ और जातिगत जनगणना के जरिए सामाजिक न्याय के दायरे में हिन्दू जातियों को ही आपस में साधने की होड़ में है। कांग्रेस अब खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण की पुरानी शैली से बचती नजर आती है।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का ‘PDA’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्य़क) समीकरण भी ज़मीन पर पूरी तरह से पिछड़ों और दलित जातियों के भीतर हिन्दू पहचान और जातियों के समीकरण पर ही टिका है।

पंजाब में सत्ता में बैठी ‘आप’ (AAP) मुस्लिम मुद्दों पर खुलकर बात करने से बचती है। बुजुर्गों को मुफ्त तीर्थ यात्रा कराना और धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह साबित करता है कि राजनीति का स्पेस अब पूरी तरह सांस्कृतिक प्रतीकों से भर चुका है।

यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, उपजातियों और अधिकारों को लेकर आपस में जूझ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक कारक अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं, बल्कि परिधि (Periphery) पर चला गया है।

वैचारिक एकाधिकार: अब बहस केवल ‘हिन्दू वर्सेज हिन्दू’ है

आज राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक और सामाजिक बहस इस बात पर नहीं हो रही है कि अल्पसंख्यकों को क्या रियायतें मिलें, बल्कि इस बात पर हो रही है कि ‘बेहतर हिन्दू हितैषी’ या ‘सच्चा हिन्दू’ कौन है।

यह भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूरी तरह से हिन्दू समाज के भीतर के अंतर्विरोधों, जातियों, और अधिकारों को लेकर आपस में लड़ रहे हैं। मुस्लिम या अल्पसंख्यक फैक्टर अब मुख्य राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं है।

जब से भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मुख्यधारा की राजनीति बनाया, तब से विपक्ष के लिए भी उस पिच पर खेलना अनिवार्य हो गया है। राहुल गांधी का मंदिर जाना, खुद को जनेऊधारी जताना या शिवभक्त बताना इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष ने भी मान लिया है कि बिना हिन्दू पहचान के स्पेस को स्वीकार किए राजनीति संभव नहीं है।

सभ्यतागत पुनर्निर्माण (Civilisational Reconstruction) रातों-रात नहीं होता

राजनीतिक विश्लेषक अक्सर चुनावों के परिणामों से सभ्यतागत बदलाव को मापने की भूल करते हैं। चुनाव 5 साल के चक्र पर चलते हैं, सरकारें आती-जाती हैं, और राजनीतिक दल हारते-जीतते हैं, यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है।

लेकिन सभ्यताएं दशकों और सदियों में बनती हैं। कार्ल पॉपर या अर्नाल्ड टायनबी जैसे इतिहासकारों का मानना रहा है कि सभ्यताएं दशकों, सदियों और सामूहिक चेतना के आंतरिक मंथन से बनती हैं।

भारत अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी प्राचीन सभ्यतागत जड़ों की ओर लौट रहा है। राम मंदिर का निर्माण, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और लोक-संस्कृति से जुड़ाव, ये केवल चुनावी मुद्दे न होकर एक राष्ट्र के रूप में मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रिया हैं। इस तरह के गहरे वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए समय लगता है। इसे किसी एक चुनाव या तात्कालिक राजनीतिक हलचल से नहीं आंका जा सकता।

तो फिर, मोदी का पतन या उभार एक तात्कालिक राजनीतिक घटना हो सकती है, लेकिन असली बदलाव यह है कि भारत का राजनीतिक और सामाजिक मानस हमेशा के लिए बदल चुका है। आज की तारीख में डिबेट का सेंटर पूरी तरह से ‘हिन्दू डिस्कोर्स’ बन चुका है। चुनाव कोई भी जीते, दल कोई भी सत्ता में आए, अब भारत की राजनीति को हिन्दू और उसके सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना असंभव हो गया है।


कुएँ में कूदने की जगह नहीं बची तो रोने लगीं हिंदू महिलाएँ: जानिए- 1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने क्यों किया ‘जौहर’

कल्पना कीजिये उस इंडिया की, जो पार्टीशन के पहले का अनडिवाइडेड भारतवर्ष है। उस भारत का पंजाब और उस पंजाब के रावलपिंडी का एक गाँव। गाँव के ठीक बीच में मौजूद एक कुएँ के चारों तरफ कई स्त्रियाँ खड़ी थी, जिनमें ज्यादातर सिख और कुछ हिंदू थी। ये एक ऐसा दौर था जब गाँव के कुएँ और तालाब महिलाओं के लिए बेस्ट हैंगआउट प्लेस हुआ करते थे।

यहाँ वो अपने रोज के कामों के साथ-साथ अपनी सहेलियों से मिलती-जुलती थी और तरह-तरह की बातें किया करती थी। कभी सास-ससुर की शिकायतें तो कभी मायके की यादें, कभी हंसी-मजाक तो कभी सुख-दुःख की बातें और जवान लड़कियाँ, किसी कुएँ की दीवार पर बैठकर अपने विवाह के सपने बुना करती थी।

लेकिन आज यहाँ ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा था, आज का दिन कुछ और था वो यहाँ कुछ ऐसा करने जा रही थी जिसकी शायद आज कोई कल्पना भी ना कर पाए। पानी से लबालब भरे हुए उस कुएंँ में अचानक एक स्त्री छलांग लगाती है और वो डूबने लगती है। उसके फेफड़ों में पानी भरने लगता है।

दम घुटने से वो छटपटाती है, हाथ-पैर मारती है, फिर थोड़ी देर बाद पानी में हवा के बुलबुले उठने लगते हैं और वो कुएँ की गहराई में गुम हो जाती हैं। हैरानी की बात ये कि वहाँ खड़ी बाक़ी स्त्रियों ने भी उसे कूदने से नहीं रोका था। ऊपर से इतना भयंकर दृश्य देखकर भी ऊपर खड़ी अन्य स्त्रियाँ घबराती नहीं हैं बल्कि एक के बाद एक वो सब भी उस कुएँ में कूदकर डूबती जाती हैं।

अंत में वहाँ केवल तीन स्त्रियां बच जाती हैं। वो रोती हैं, बिलखती हैं, छातियाँ पीटती हुई रो रही होती हैं। क्या आप जानते हैं कि वो तीनों रो क्यों रही थी? अगर आपको लग रहा हो कि वो इसलिए रो रही होंगी कि उनकी सहेलियाँ डूबकर मर चुकी हैं तो ऐसा नहीं था, वो इसलिए रो रही थीं क्योंकि कुआँ लाशों से पूरा भर चुका था और वहाँ अब उनके डूबने लायक ना तो पानी बचा हुआ था और ना ही जगह। वो इसलिए अपनी छातियाँ पीट रही थी क्योंकि वो मर नहीं पाई थी

ये सत्य घटना है रावलपिंडी के एक गांँव तोहा खालसा की, साल था 1947, मार्च का महीना, जब देश को आजादी नहीं मिली थी, ना ही मजहब के नाम पर भारत का बँटवारा हुआ था। Horrors of partitions, जिसके बारे में हम अक्सर सुनते हैं, मुसलमानों ने उसका ट्रेलर भारत की आज़ादी और भारत के पार्टीशन के एक साल  पहले ही दिखाना शुरू कर दिया था। 

मुहम्मद अली जिन्ना की पार्टी मुस्लिम लीग को पूरे भारत के मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने के लिए भर-भरकर वोट दिए और जिन्ना के आदेश पर 16 अगस्त 1946 के बाद पूरे देश में मुसलमानों ने जिहाद छेड़ा हुआ था। इसलिए अगर आपको लगता है कि हिंदुओं पर हिंसा का कहर केवल पार्टीशन के बाद ही टूटा था तो ये सच नहीं है।

हिंदुओं का ये नरसंहार विभाजन से बहुत पहले शुरू हो चुका था। और उसी के चलते, रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव में जो होने जा रहा था वो ख़िलजी और मुग़लों के बाद जिन्ना के दौर में हिंदू और सिख महिलाओं का एक अलग तरह का जौहर था।

ये ऐसा जौहर था जो अग्निकुंडों में नहीं बल्कि जलकुंडों में किया गया था। और आप ये अंदाजा मत लगाइए कि ये केवल एक गांव की कहानी होगी बल्कि जिहादी क्रूरता के इस दौर में सैकड़ों गाँवों में हिंदू और सिख स्त्रियों ने ऐसे जौहर किए। ये घटनाएँ कोई ख़िलजी या मुग़लों के दौर की नहीं हैं बल्कि इतनी रीसेंट हैं कि इनके आईविटनेस भी अभी ज़िंदा हैं।

इतिहास की दराजों में जौहर की ऐसी हजारों कहानियाँ हैं लेकिन इस वीडियो में हम बात करेंगे रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव की, ये वो दौर था जब पूरे देश में मुसलमान हिंदुओं पर वैसे ही बर्बर अत्याचार कर रहे थे जैसे ख़िलजी और मुग़लों के समय हुआ करते थे।

जिहाद के इस खुले ख़ूनी खेल में मर्द तो एक झटके में काट दिए जाते थे लेकिन हिंदू स्त्रियों की ऐसी दुर्दशा की जा रही थी जिसे देखकर शैतान भी काँप उठे।

लाशों से भर गया था कुआँ

जिहादी भेड़ियों की Modus oprandi एक ही रहती थी, पहले किसी हिंदू या सिख गाँव को टारगेट और फिर हजारों की भीड़ लेकर गाँव में घुसना। फिर जो हिंदू, जहाँ मिले, उसे वहीं पर काट देना। छोटे-छोटे बच्चों को, माताओं की गोद से छीनकर आग में फेंक देना, हवा में उछलकर तलवारों और भालों से बेधना।

पहले हिंदू और सिख स्त्रियों की नग्न परेड करवाना और फिर सैकड़ों जिहादियों द्वारा बारी-बारी से उनका रेप किया जाना। अंत में तलवारों से उनकी छातियाँ, नाक और कान काट देना। उन हैवानों की हवस ऐसी थी कि गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बख्शा जाता था। रेप करने के बाद उनका पेट चीरकर नवजातों को सड़कों पर फेंक दिया जाता था।

खैर, अब डिटेल में बात करते हैं उस घटना के बारे में, जो हमने इस वीडियो के शुरू में बताई। रावल पिंडी का गाँव तोहा खालसा। तारीख़ थी 12 मार्च, साल 1947। जिहादियों की ऐसी ही एक भीड़ रावलपिंडी के तोहा खालसा गांव को घेर लेती है।

गाँव के हिंदू और सिखों के पास दो बंदूकें थी जिनकी मदद से वे कुछ देर जिहादियों से लड़ते रहे लेकिन हजारों की भीड़ के आगे वे कब तक टिक पाते? जब उनकी गोलियाँ समाप्त हो गई तो जिहादियों से संघर्ष रोकने के लिए अपने घरों के आगे सफेद झंडे लगा दिए।

जिहादी भीड़ ने उनकी जान बक्श ने के लिए 10 हज़ार रुपए की डिमांड रखी जिसे तुरंत पूरा कर दिया गया। पैसे मिलने के बाद मुसलमानों की भीड़ ये कहते हुए लौट गई कि वो अब दोबारा नहीं आएँगे, लेकिन दूसरे ही दिन वे फिर से लौटे और अधिक भयानक और खूँखार भेड़िए बनकर।

जिहादी जानते थे कि अब गाँववालों के पास पैसा नहीं बचा है इसलिए इस बार उन्होंने पैसा नहीं माँगा बल्कि सीधे ही मार-काट मचाना शुरू कर दिया। ऐसा लग रहा था जैसे वो शैतान काफ़िरों के ख़ून से ईद मना रहे थे। जहाँ तक संभव था हिंदू और सिख पुरुष लड़े, लेकिन हजारों इस्लामी भेड़ियों के आगे वो निहत्थे कब तक टिकते।

एक-एक करके लाशें गिरने लगी, एक तरफ़ कलमा पढ़ा जा रहा था तो दूसरी तरफ़ नंगी तलवारें चमक रही थी। जिन्हें अपनी जान बचानी थी उनके लिए कलमा पढ़कर और रक्त चूता हुआ गोमांस का टुकड़ा खाकर मुसलमान बनने का ऑप्शन रखा गया था। 

जिन्हें ये मंजूर नहीं था उनके लिए नंगी तलवारें इंतजार कर रही थी। बहादुर और धर्म के पक्के हिंदू और सिख पुरुषों ने ख़ुशी से तलवारों के नीचे अपनी गर्दनें रख दी। सिरों के ढेर लग गए, ख़ून की नदियाँ बहने लगी। अब स्त्रियों की बारी थी। उन्हें बचाने वाले पुरुष जब काट दिए गए तो उन्होंने समझ लिया कि अब बचाव संभव नहीं है।

इसलिए उन्होंने वही रास्ता चुना जो कभी रानी पद्मिनी सहित लाखों हिंदू स्त्रियों ने चुना था। जिहादी हैवानों के हाथ आने से अच्छा उन्होंने ख़ुद ही अपने प्राण ले लेना उचित समझा। ख़िलजी-मुग़लों के दौर में हिंदू स्त्रियों ने अग्निकुंडों में कूदकर जौहर किया था लेकिन इस बार रास्ता थोड़ा अलग था।

जिहादियों ने डिमांड रखी थी कि अगर काफ़िर अपनी महिलाओं को उन्हें सौंप देते हैं तो वो उनकी जान बख़्श देंगे। लेकिन स्वाभिमानी हिंदू और सिख ये कैसे स्वीकार कर सकते थे? हजारों की संख्या में हिंदू और सिख स्त्रियों ने जिहादियों के हाथों नोचे जाने से बेहतर अपने ही परिवार के मर्दों से अपनी गर्दनें कटवा ली। जौहर का यह नया स्वरूप था।

जब जिहादी भीड़ गाँव में नरसंहार कर रही थी तब तोहा खालसा की 93 स्त्रियाँ गाँव के एक पुराने कुएँ पर इकट्ठा हुई। सबने थोड़ी देर आँखें बंद की और अपनों को याद किया। इसके बाद पहले एक महिला कूदी, उसके पीछे दूसरी, फिर तीसरी और देखते ही देखते पूरा कुआँ 90 स्त्रिओं की लाशों से भर गया।

इसमें केवल 3 महिलाएँ ही ज़िंदा बची और वो भी इसलिए क्योंकि कुएँ में अब डूबने लायक पानी ही नहीं बचा था।

बलात्कारियों की पैरोकार जिहादन

नेहरू-गाँधी के दौर ऐसे अनगिनत जौहर हुए। लेकिन दिल्ली के हिन्दू कॉलेज का मैगज़ीन Hindu College Gazette इसको लेकर क्या लिखता है वो सुनिए। इसकी वेबसाइट पर एक लेख मौजूद है जिसका शीर्षक है Partition and Patriarchy: The Story of Thoha Khalsa. इस लेख में लिखा हुआ है कि तोहा खालसा की स्त्रियों के सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे का कारण समाज की Patriarchal सोच है।

हिंदू कॉलेज गैजेट का मानना है कि हिंदू और सिख महिलाओं की सामूहिक आत्महत्या के पीछे की वजह जिहादी भेड़ियों से नोचे जाने का डर नहीं बल्कि हिंदू समाज की पितृसत्ता वाली मानसिकता थी। जिहादी नरसंहारों का सच कैसे दबाया जाता है ये आर्टिकल इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। जब हिंदू कॉलेज जैसे संस्थान का गैजेट भी जिहादी बलात्कारियों पर बात करने की जगह उनसे बचने के लिए जौहर करने वाली महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा कर देता है तो फिर स्वरा भास्कर से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

आज जौहर को कायरता और मुस्लिमों की बलात्कारी सोच का बेशर्मी से बचाव करने वाली स्वरा भास्कर और आरफा जैसी जिहादनों को ये वीडियो जरूर देखना चाहिए ताकि उन्हें पता चल सके कि लाखों हिंदू स्त्रियों को ऐसा ख़ौफ़नाक क़दम क्यों उठाना पड़ा था?

पर सिर्फ अरफ़ा और स्वरा ही क्यों, शायद हमारे देश की GEN-Z को भी ये एक Irrational या Act of cowardice लगे क्यूंकि वास्तव में आज जब सुसाइड इतने आम हो चुके हैं हम सुसाइड को लैक ऑफ टॉलरेंस, लैक ऑफ सोशल इंटरैक्शन या लैक ऑफ इम्पैथी मानते हैं। पर जौहर इन सब चीज़ों की वजह से उठाया हुआ कदम नहीं था।

बेशक रेप विक्टिम्स को डिग्निटी से जीने का हक है लेकिन जिहादियों ने जो किया था वो केवल रेप नहीं था। क्या आपको रोबोट फ़िल्म का वो सीन याद है जिसमे चिट्टी रोबोट एक नहाती हुई लड़की को बिना कपड़ों के ही आग से बचाकर बाहर लोगों की भीड़ के सामने ले आता है।

केवल इतने भर से ही उस लड़की को ऐसा मेंटल शॉक लगता है कि वो आग में कूदकर सुसाइड कर लेती है। ये तो केवल फ़िक्शन की बात है लेकिन अब आप जरा कल्पना कीजिए कि किसी स्त्री के पहले कपड़े फाड़े जाते हैं, फिर सरेआम उसकी नग्न परेड निकाली जाती है, फिर उसका गैंगरेप होता है और फिर उसे जानवरों की तरह बेच दिया जाता है और ये केवल इसलिए नहीं किया जाता कि वो एक महिला है, ये इसलिए किया जाता है क्योंकि वो काफ़िर है।

तब आप सोचिए कि उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी? आत्मसम्मान जिन्हें प्यारा होगा वो ऐसा होने से पहले मरना ही पसंद करेंगे। खैर, अब आत्मसमान की उम्मीद उनसे क्या रखनी जिन्होंने तलवारों के डर से इस्लामी सलवारें पहन ली लेकिन जिहादियों के आगे ख़ुद को परोस देने वाले जब आज जौहर को कायरता बताते हैं, तब विडंबना वहीं पर सैकड़ों मौत मर जाती है।

जिनकी पूर्वज मुस्लिम आक्रांताओं के हरमों की शान बढ़ाया करती थीं वो भी आज जौहर को कायरता और पैट्रियार्की से जोड़ते हैं। तैमूर, ख़िलजी, औरंगज़ेब और जिन्ना को अब्बू मानने वाली जिहादी बलात्कारियों की पैरोकार इन जिहादनों को बताना जरूरी है कि जौहर कोई सामान्य आत्महत्या नहीं है।

ये स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियों द्वारा एक रेगिस्तानी और हैवानी विचारधारा के मुँह पर मारा गया जोरदार तमाचा है। स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियाँ जिन्होंने आत्मसम्मान बचाने के लिए सैकड़ों जगह ऐसे जौहर किए और एक बार नहीं बल्कि बार-बार किए। उन्होंने अपने ही पिता, पति और भाइयों के हाथों अपनी गर्दनें कटवा दी, अग्निकुंडों में राख बन गई, पानी में डूब गई, लेकिन जिहादियों के क़ब्ज़े में जाना कभी स्वीकार नहीं किया।

पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता की जीत

और ये कोई अचानक आया हुआ विचार नहीं था। स्वरा भास्कर आज ये चाहती हैं कि जौहर करने वाली हिंदू स्त्रियों को मृत्यु को चुनने से अच्छा ख़ुद को जिहादियों को सौंप देना चाहिए था। उस दौर में भी समाज में कई ऐसी स्वरा भास्कर मौजूद थीं जिन्होंने ख़ुद को जिहादियों को सौंप दिया था। ऐसी हजारों महिलाओं के साथ जो हुआ वो बेहद डरावना था।

मशहूर चित्रकार KC आचार्य उस समय 28 साल के थे और उन्होंने ये सब अपनी आँखों से देखा था। रावलपिंडी की इस्लामी बर्बरता को उन्होंने अपनी एक पेंटिंग में दिखाया है। ये केवल चित्र नहीं है बल्कि इतिहास के उस काले अध्याय का जीवित और चीख-चीख कर गवाही देने वाला सबूत है क्योंकि इसे बनाने वाले चित्रकार ने हैवानियत के इस नंगे नाच को अपनी आँखों के सामने देखा था।

जिहादियों ने हिंदू स्त्रियों को नग्न करके सड़कों पर उनकी परेड निकलवाई। बारी-बारी उनका गैंगरेप किया गया, उन्हें जानवरों की तरह बेचा और लूटा गया। विरोध करने वाली स्त्रियों की छतियाँ, नाक और कान काट दिए गए। उनके जननांगों को तलवारों और भालों से छिन्न-भिन्न कर दिया गया। हैवानों की हवस ऐसी थी कि हिंदू और सिख स्त्रियों की लाशों तक से बलात्कार किए गए।

तोहा खालसा की महिलाओं ने हैवानियत की इन कहानियों को सुना और देखा हुआ था। उन्होंने अपनी आँखों के आगे गैंगरेप होते हुए देखे हुए थे। उन्होंने जिहादियों को बलात्कार के बाद गर्भवती महिलाओं के पेट चीरते हुए देखा था।

इस्लमिक दरिंदगी का शिकार बनाने वाली कुछ उनकी सहेलियाँ थी, तो कोई बगल के गाँव में ब्याही हुई उनकी बहन थी या उनके मायके में रहती, कुछ दिनों में माँ बनाने वाली उनकी भाभी थी। ये सब उनके अपने सगों के साथ हो चूका था। वो जानती थी कि अगर वो जीवित रहीं तो आगे उनके साथ यही होने वाला था।

और उससे बेहतर तो कुंए में कूद जाना है या फिर जलकर मार जाना। मौत दोनों तरफ़ थी लेकिन एक तरफ़ नरक जैसी यातना के बाद मरना था दूसरी तरफ़ सम्मान की मृत्यु थी। स्वरा भास्कर आज जो कह रही है उसके पीछे की सोच हिंदू कॉलेज जैसे संस्थानों के ऐसे ही गैजेट और लेखों से आती है।

एकेडमिक जिहाद यही तो है। धीरे-धीरे एक ऐसी चर्चा को जन्म दो कि विक्टिम ही शक के घेरे में खड़ा हो जाए। जिहादी हैवानों को एकदम क्लीन चिट दे दो। उनकी कोई गलती थोड़े ही है। उनका तो अधिकार है रेप करना क्योंकि मजहब इसकी इजाजत देता है।

लेकिन सवाल है कि ये हैवानी सोच क्या केवल ख़िलजी, मुग़ल या जिन्ना तक ही सीमित है? क्या आपको नोबेल ल्यूरेट्स नादिया मुराद याद है? नादिया मुराद एक यज़ीदी महिला है जो इराक़ और सीरिया में अल्पसंख्यक हैं। ISIS के जिहादियों ने हजारों यज़ीदी स्त्रियों को कई वर्षों तक सेक्स स्लेव बनाकर रखा।

नादिया बताती हैं कि जिहादियों ने हजारों यज़ीदी मर्दों और बच्चों को मार डाला। उसके बाद वे उनकी महिलाओं को अपने साथ ले गए। छोटी-छोटी बच्चियों तक को भी नहीं बख्शा गया। ये यज़ीदी स्त्रियाँ कई सालों तक ISIS के मुस्लिम आतंकियों के लिए बनाए गए सेक्स कैंप्स में रखी गई जहाँ उनका हजारों बार गैंगरेप किया गया।

सैकड़ों यज़ीदी महिलाओं ने इन सेक्स कैंप्स में आत्महत्याएँ की। बाद में जब इन्हें सेना ने रेस्क्यू किया तो हैवानियत की ऐसी कहानियाँ बाहर आई कि रोंगटे खड़े हो जाएँ। भारत हो या इराक़ या सीरिया, ख़िलजी हो, मुग़ल हों, जिन्ना हो या ISIS, बात चौदहवीं शताब्दी की हो चाहे आज की, काफ़िरों की स्त्रियाँ इस्लाम के लिए तब भी माल-ए-गनीमत थी, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी। क्योंकि ऐसा ‘दीन का फ़रमान’ है।

जौहर तब भी हुए थे जौहर आगे भी होंगे क्योंकि हैवान तब भी थे आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। हैवानियत तब तक होती रहेगी जब तक समाज में स्वरा भास्कर जैसी जिहादन मंचों से बलात्कार का बचाव करने की हिम्मत करती रहेगी। हैवान तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक दिल्ली के हिंदू कॉलेज जैसी संस्थाओं के ऑफिशियल गैजेट्स बलात्कारियों की हिमायत करते रहेंगे।

जौहर को पैट्रियार्की से जोड़ने वालों को पता होना चाहिए कि ये असल में पैट्रियार्की नहीं थी। असल में जौहर जीत थी उस हिंदू मैट्रियार्की की जिसने जिहादी नस्लें पैदा करने से अच्छा मौत को चुना।

क्या आंतरिक मतभेद को चुनावी हेरफेर का सबूत मानना सही है?

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन दो चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी प्रस्ताव, प्रक्रिया या प्रशासनिक निर्णय पर आपत्ति दर्ज करना अपने आप में चुनावी प्रक्रिया के अवैध या संदिग्ध होने का प्रमाण नहीं हो सकता।

23 सितंबर 2026 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ ने चुनाव आयोग को लेकर एक प्रमुख खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसका शीर्षक है। ‘14 times in 10 months, two Election Commissioners objected on record to steps taken by Commission.‘

रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 अवसरों पर कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियाँ दर्ज कीं।

इनका संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6, चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में अपीलों की प्रक्रिया से बताया गया है। निश्चित रूप से ये विषय गंभीर हैं।

निर्वाचन सूची में एक भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना चिंता का विषय होना चाहिए। चुनावी डेटा की सुरक्षा और अधिकारियों की वैधानिक शक्तियों की रक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन यहीं से एक दूसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण बात शुरू होती है।

क्या किसी आंतरिक आपत्ति को सीधे ‘चुनाव आयोग की संवैधानिक विफलता’ या ‘चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर’ का प्रमाण मान लिया जाए? यहीं Indian Express की रिपोर्ट के तथ्य और उससे निकाला जा रहा व्यापक निष्कर्ष अलग-अलग दिखाई देते हैं।

पहला प्रश्न: आपत्ति और अंतिम निर्णय में अंतर क्यों नहीं किया जा रहा?

किसी भी संस्थागत व्यवस्था में नीति या प्रशासनिक निर्णय बनने से पहले अधिकारियों और सदस्यों द्वारा सवाल उठाना, सुझाव देना, कानूनी आपत्ति दर्ज करना और वैकल्पिक प्रक्रिया सुझाना सामान्य बात है। निर्वाचन आयोग स्वयं तीन-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे चुनावों के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।

2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act की धारा 18 में भी आयोग के कामकाज के लिए स्पष्ट व्यवस्था है। आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना है और यदि सदस्यों में मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘कितनी आपत्तियाँ दर्ज हुईं?’ बल्कि यह होना चाहिए ‘उन आपत्तियों के बाद अंतिम निर्णय क्या हुआ?’ क्या कोई निर्णय वास्तव में कानून के विरुद्ध पाया गया? क्या किसी सक्षम न्यायिक संस्था ने उसे अवैध घोषित किया? क्या किसी अंतिम आदेश को आयोग ने वापस लिया? क्या इन आपत्तियों के कारण किसी चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ? या फिर ये उन आंतरिक संवाद व विचार-विमर्श का हिस्सा थीं जिनके बाद अंतिम निर्णय विधिसम्मत तरीके से लिया गया? ये सभी प्रश्न अलग-अलग हैं।

14 का आंकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन अपने आप में निर्णायक नहीं

’10 महीनों में 14 बार आपत्ति’, यह निश्चित रूप से एक ध्यान आकर्षित करने वाला आंकड़ा है। लेकिन केवल संख्या से किसी संस्था की वैधानिकता निर्धारित नहीं होती।

यदि किसी कैबिनेट में मंत्री किसी प्रस्ताव पर आपत्ति करता है, तो वह आपत्ति सरकार के भीतर विचार-विमर्श का हिस्सा होती है। यदि न्यायालय में किसी मामले पर न्यायाधीशों के बीच मतभेद होता है, तो अंतिम निर्णय बहुमत से होता है। इसी प्रकार बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में भी आंतरिक मतभेद का होना अपने आप में असंवैधानिकता का प्रमाण नहीं है।

इसका दूसरा पहलू भी है। यदि किसी सदस्य को लगता है कि कोई प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है, तो उसका उस पर लिखित आपत्ति दर्ज करना संस्थागत नियंत्रण और संतुलन स्थापित करने की नीति का हिस्सा भी हो सकता है।

स्वयं निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को कहा कि लिखित टिप्पणियाँ, Observations, Technical Suggestions और Internal Checks and Balances उसकी नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अंतिम आदेश और निर्णय वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप तथा कानूनी अधिकार के साथ जारी किए गए हैं। इसलिए आपत्ति का अस्तित्व और अंतिम निर्णय की वैधता दो अलग प्रश्न हैं।

फॉर्म-6: गंभीर सवाल है, लेकिन निष्कर्ष के लिए और प्रमाण चाहिए

इंडियन एक्सप्रेस ने फार्म- 6 में किए गए बदलाव को विशेष महत्व दिया है। रिपोर्ट के अनुसार नए मतदाता के आवेदन में SIR से संबंधित एक प्रश्न जोड़ा गया और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस बदलाव को लेकर वैधानिक अधिकार और नियमों में संशोधन की आवश्यकता का प्रश्न उठाया गया था। यदि किसी वैधानिक फॉर्म में ऐसा परिवर्तन किया गया है जिसके लिए नियमों में संशोधन आवश्यक था, तो यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि वह परिवर्तन किस अधिकार के तहत किया गया और किसने उसे अनुमोदित किया।

लेकिन यहाँ भी दो अलग-अलग दावे हैं- पहला: फॉर्म-6 में एक प्रक्रियात्मक बदलाव हुआ। दूसरा: उस बदलाव के माध्यम से नागरिकों को जानबूझकर मताधिकार से वंचित किया गया। पहले दावे के लिए प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेज चाहिए। दूसरे दावे के लिए उससे कहीं अधिक ठोस प्रमाण चाहिए। दोनों को एक ही मान लेना पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श दोनों के लिए उचित नहीं होगा।

मतदाता डेटा का केंद्रीकरण: चिंता जायज़ है, लेकिन ‘केंद्रीकरण का मतलब हेरफेर’ नहीं होता रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ECI.Net और चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़ा है। दो चुनाव आयुक्तों ने कथित रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की पहुँच प्रभावित हो रही है और डेटाबेस के केंद्रीकरण की दिशा में बदलाव हो रहा है।

यह विषय तकनीकी और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से गंभीर है। लेकिन डिजिटल केंद्रीकरण को सीधे चुनावी हेरफेर का पर्याय बना देना भी उचित नहीं है। आज दुनिया भर में प्रशासनिक प्रणालियों का डिजिटाइजेशन और सेंट्रलाइज्ड डाटाबेस मैनेजमेंट बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य कई बार डेटा की एकरूपता, सुरक्षा, ऑडिट ट्रायल और डुप्लीकेट रिकॉर्ड्स या आंकड़ों को नियंत्रित करना भी हो सकता है।

इसलिए वास्तविक जांच निम्नलिखित सवालों के आधार पर होनी चाहिए, किस अधिकारी के पास किस स्तर की पहुंच है? कौन डेटा में बदलाव कर सकता है? प्रत्येक बदलाव का ऑडिट ट्रायल क्या है? क्या राज्य के वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ वास्तव में सीमित हुई हैं? क्या किसी अनधिकृत व्यक्ति ने डेटा में बदलाव किया? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम इसी कारण हटाया गया? और क्या उस हटाए जाने का कोई प्रमाणित चुनावी प्रभाव पड़ा? इन प्रश्नों के उत्तर तकनीकी ऑडिट से ही मिलेंगे, केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं।

गोवा के 97 मतदाता: हर वोट महत्वपूर्ण है, लेकिन आंकड़े का सही संदर्भ भी जरूरी है

रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है, जिनके बारे में कहा गया कि वे संबंधित प्रक्रिया में पात्र पाए गए, लेकिन सॉफ्टवेयर व्यवस्था के कारण उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। यह मामला निश्चित रूप से प्रश्न उठाता है।

एक भी पात्र मतदाता का वोट तकनीकी या प्रशासनिक कारण से छूटना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि पूरे देश की मतदाता सूची में व्यापक स्तर पर जानबूझकर हेरफेर हो रही है। इस मामले की निष्पक्ष जांच का रास्ता स्पष्ट है

कितने मतदाता प्रभावित हुए? किस स्तर पर गलती हुई? क्या इसमें सॉफ्टवेयर की प्रतिबंधित सीमा तय कर दी गई थी? क्या अधिकारियों को वैकल्पिक प्रक्रिया उपलब्ध थी? क्या बाद में सुधार किया गया? क्या जिम्मेदारी निर्धारित हुई?

यही उपर्युक्त सवालों के आधार पर साबित किए गए तथ्य तय करेंगे कि यह प्रशासनिक चूक थी, तकनीकी समस्या थी या उससे अधिक गंभीर मामला।

पश्चिम बंगाल की अपीलों का मामला भी दस्तावेजों से तय होना चाहिए

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में उन मतदाताओं से जुड़ी अपीलों का मुद्दा उठाया गया है जिन्हें SIR प्रक्रिया के दौरान हटाया गया या शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त संधू ने यह प्रश्न उठाया कि कुछ अपीलें किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं।

लेकिन यहाँ भी मूल प्रश्न होना चाहिए, किसने आदेश दिया? किस नियम के तहत दिया? किस अधिकारी ने अपील दायर की? किस रिकॉर्ड में उसका उल्लेख है? यदि दस्तावेज बताते हैं कि कोई अधिकारी अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर गया था, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यदि दस्तावेज वैधानिक प्रक्रिया का पालन दिखाते हैं, तो केवल यह तथ्य कि किसी आयुक्त ने उस प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया था, उसे स्वतः अवैध नहीं बना देता।

निर्वाचन आयोग का जवाब भी काफी महत्वपूर्ण है

इस पूरे विवाद में एक तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिसे किसी भी गंभीर विश्लेषण में शामिल किया जाना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अलग-अलग टिप्पणियाँ, सुझाव और आपत्तियाँ बहु-सदस्यीय संस्था के सामान्य संवाद एवं विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

आयोग ने कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और उसके आदेश वैधानिक प्रक्रिया तथा कानून के अनुरूप जारी हुए। आयोग का यह जवाब हर आरोप का अंतिम न्यायिक निपटारा नहीं है।

लेकिन उसी तरह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी प्रत्येक आरोप का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। दोनों को सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखकर तथ्यात्मक परीक्षण करना ही उचित लोकतांत्रिक तरीका है।

क्या संवैधानिक संस्थाओं के भीतर ‘आंतरिक मतभेद’ लोकतंत्र के लिए खतरा हैं?

यहाँ एक बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत समझना आवश्यक है। किसी संवैधानिक संस्था के भीतर मतभेद होना लोकतंत्र की विफलता का प्रमाण नहीं है। कई बार संस्थागत मतभेद ही बेहतर निर्णय की ओर ले जाते हैं।

खतरा तब पैदा होता है जब असहमति को दर्ज करने की अनुमति न हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के बाहर चली जाए, वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ मनमाने ढंग से छीनी जाएँ, डेटा में अनधिकृत परिवर्तन हो, या नागरिकों के वैधानिक अधिकार वास्तव में प्रभावित हों। इसलिए हमें ‘मतभेद हुआ’ और ‘संस्था ने कानून तोड़ा’ के बीच की रेखा स्पष्ट रखनी होगी।

पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, फैसला सुनाना नहीं

इंडियन एक्सप्रेस ने दस्तावेजों और अंदरूनी संवाद के आधार पर कुछ प्रश्न उठाए हैं। उन प्रश्नों का उत्तर निर्वाचन आयोग को देना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श में एक और सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण है।

खोजी पत्रकारिता का निष्कर्ष भी स्वतंत्र तथ्य जांच से परे नहीं होता। किसी रिपोर्ट में किसी अधिकारी द्वारा किसी कदम को गैर-कानूनी या अनधिकृत कहा जाना उस कदम को न्यायिक रूप से अवैध सिद्ध नहीं करता।

वह संबंधित अधिकारी की दर्ज की गई राय है। उसी प्रकार आयोग द्वारा ‘सब कुछ सर्वसम्मति से हुआ’ कहना भी उन विशिष्ट प्रक्रियात्मक सवालों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता समाप्त नहीं करता। इसलिए सही रास्ता है: कानून के आधार पर सबूत आधारित दस्तावेज सामने रखिए और फिर तथ्य के आधार पर निष्कर्ष निकालिए।

14 आपत्तियाँ कोई फैसला नहीं

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक सावधानी जिस चीज की आवश्यकता है, वह है हेडलाइन और सबूत के बीच अंतर करना। ‘दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति की’ यह एक रिपोर्टेड तथ्य है।

लेकिन इससे स्वतः यह सिद्ध नहीं होता कि चुनाव आयोग ने चुनावों में हेरफेर किया। यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि- मतदाता सूची जानबूझकर बदली गई। और यह भी स्वतः सिद्ध नहीं होता कि भारत की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता समाप्त हो गई है।

इनमें से प्रत्येक गंभीर आरोप के लिए अलग और ठोस प्रमाण चाहिए। और यही लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में बहस का सही मानदंड होना चाहिए। न चुनाव आयोग के प्रति अंधविश्वास, न उसके प्रति अंध-अविश्वास सिर्फ प्रमाण।

यदि आयोग के किसी निर्णय में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसे सामने लाया जाना चाहिए और सुधार होना चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो उसे तत्काल ठीक किया जाना चाहिए। यदि डिजिटल प्रणाली में सुरक्षा की कमी है, तो स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।

लेकिन यदि अंतिम निर्णय कानून के अनुरूप लिए गए, आंतरिक टिप्पणियाँ संवाद एवं विचार- विमर्श का हिस्सा थीं और कोई चुनावी हेरफेर प्रमाणित नहीं हुआ, तो केवल आंतरिक मतभेदों को लेकर पूरी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर अंतिम फैसला सुनाना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र आरोपों से नहीं, प्रमाणों से मजबूत होता है।

और अंततः यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होनी चाहिए, 14 आपत्तियाँ एक जांच का विषय हो सकती हैं; लेकिन वे अपने आप में “चुनाव आयोग दोषी है” का फैसला नहीं हैं। यही अंतर जवाबदेह पत्रकारिता और राजनीतिक जुमलेबाजी आधारित प्रोपेगेंडा के बीच भी है।

और अंत में यह भी सत्य है कि भारत में चुनावी राजनीति का संघर्ष इनदिनों केवल भाजपा या नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक मुकाबले तक सीमित दिखाई नहीं देता हैं। राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, पप्पू यादव, संजय राउत सहित विपक्ष के कई नेता लगातार चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।

चुनाव आयोग की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर लगातार ऐसे आरोप लगाना जिनके समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत न किए जाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग की भूमिका किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने की है। जाहिर है राजनीति की हताशा में संवैधानिक संस्थाएं निशाने पर हैं।

SIR यानी Special Intensive Revision को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। मतदाता सूची में नाम, पता, मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि अथवा पहचान से जुड़ी विसंगतियों की जाँच लोकतांत्रिक चुनाव की सामान्य आवश्यकता है।

यदि किसी मतदाता को नोटिस मिलता है, तो उसका उद्देश्य स्वतः उसका अधिकार समाप्त करना नहीं है; प्रक्रिया में जवाब देने और निर्धारित कानूनी उपायों का प्रावधान भी है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में की गई SIR को वैधानिक आधार वाला और चुनावी सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जुड़ा हुआ माना तथा प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील जैसे सुरक्षा उपायों को महत्वपूर्ण माना।

इसलिए वास्तविक बहस यह होनी चाहिए कि SIR पारदर्शी, निष्पक्ष और कानून के अनुरूप कैसे चले न कि हर सत्यापन को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया जाए। विपक्ष को चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर आपत्ति है तो वह तथ्य, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसे चुनौती दे सकता है।

लेकिन चुनावी असहमति और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। लोकतंत्र में सरकारें और राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता व संस्थागत विश्वसनीयता पूरे देश की साझा पूँजी है।

राम-कृष्ण-शिव भी हैं, लेकिन सबसे ऊपर स्वामीनारायण: समझिए- BAPS की शुरुआत से बड़ा बनने की पूरी कहानी

आख़िर कैसे ब्रिटेन का एक चर्च BAPS का मंदिर बन गया था और क्यों इस संगठन के मंदिरों में भगवान की प्रतिमाएं तो होती हैं लेकिन इनके अपने स्वनिर्मित भगवान की मूर्तियों के सामने बहुत छोटा रखा जाता है? और कैसे ये संगठन इतना ताक़तवर है कि अमेरिका में इसके ख़िलाफ़ मुक़दमा होता है, अदालत में बहस चलती है, दुनिया में हंगामा होता है और एक दिन बिना किसी सजा के इसे छोड़ दिया जाता है?

सितंबर 2026, फ्रांस का एफिल टॉवर एक दिन के लिए बंद होता है और अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं भारत से पहुँचे कुछ ‘भगवाधारी संत’। वजह उनके कपड़े नहीं थे, न कोई राजनीतिक बयान। चर्चा थी उनके उन सख्त धार्मिक नियमों की, जिनके तहत BAPS के साधु महिलाओं से दूरी रखते हैं। देखते ही देखते सवाल उठने लगे कि आखिर ये साधु कौन हैं? किस परंपरा से आते हैं? और वो कौन-सी संस्था है जिसके नियम इतने कठोर हैं, लेकिन जिसका विस्तार दुनिया के सबसे बड़े शहरों तक हो चुका है? यहीं से शुरू होती है BAPS की कहानी। 

गुजरात के एक छोटे से गांव बोचासन से निकली एक संस्था, जिसने दिल्ली से लंदन, अमेरिका से अबू धाबी और पेरिस तक विशाल मंदिर खड़े किए, तो आज न हम केवल BAPS की पूरी कहानी खोलेंगे बल्कि बताएँगे कि वो कहाँ से आया, किसे सर्वोच्च भगवान मानता है, बाकी स्वामीनारायण परंपरा से अलग कैसे हुआ।

अगर BAPS से आपको कहानी नहीं समझ आ रही है तो अगर आप दिल्ली आए हों तो आपने कभी ना कभी रास्ते में या मेट्रो में जाते हुए एक विशाल मंदिर देखा होगा जिसे अक्षरधाम कहते हैं, जहाँ जाने के लिए लंबी कतारें लगती हैं और इसकी खूबसूरती को देखकर लोग अनायास ही अपने फ़ोन की गैलरी में एक और बार इस मंदिर की तस्वीर खींच लेते हैं। इसे बनाने वाली संस्था का नाम है BAPS। 

कैसे हुई BAPS की शुरुआत?

अगर आपको BAPS को समझना है, तो इसकी शुरुआत इसके पूरे नाम से करते हैं। क्योंकि इसका नाम ही इसकी पूरी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है- BAPS यानी बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था। पहली बार सुनने पर ये नाम थोड़ा लंबा और मुश्किल लग सकता है लेकिन इसे चार हिस्सों में तोड़ दीजिए- बोचासनवासी, अक्षर-पुरुषोत्तम, स्वामीनारायण और संस्था। इन चार शब्दों को समझ लिया तो आपको ये भी समझ आ जाएगा कि BAPS कहाँ से आया, किसे भगवान मानता है बाकी स्वामीनारायण संप्रदाय से अलग कैसे हुआ और कैसे दुनियाभर में पहुँच गया।

सबसे पहले ‘बोचासनवासी’- बोचासन गुजरात के आदंण जिले में एक गांव है और BAPS की अलग संस्थागत कहानी इसी गांव से 1907 में शुरू होती है लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि स्वामीनारायण परंपरा भी 1907 में शुरू हुई थी। स्वामीनारायण परंपरा इससे करीब एक सदी साल पुरानी है। 1907 में हुआ ये कि शास्त्री महाराज ने बोचासन में एक मंदिर बनवाया और मंदिर के केंद्रीय गर्भगृह में भगवान स्वामीनारायण को ‘पुरुषोत्तम’ और गुणातीतानंद स्वामी  को ‘अक्षर’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है। BAPS अपनी औपचारिक संस्थागत स्थापना 5 जून 1907 की इसी घटना से मानता है। इसीलिए नाम के पहले हिस्से में बोचासन आया और संस्था हुई बोचासनवासी।

अब नाम के दूसरे हिस्से पर आइए- ‘अक्षर पुरुषोत्तम’। असल में BAPS को दूसरे स्वामीनारायण समूहों से अलग समझने की चाबी यही दो शब्द हैं। BAPS की मान्यता है कि भगवान स्वामीनारायण सर्वोच्च परमात्मा हैं, जिन्हें वह पुरुषोत्तम, परब्रह्म और सर्वोपरी मानता है। दूसरी तरफ गुणातीतानंद स्वामी को वह अक्षरब्रह्म मानता है। इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो पुरुषोत्तम सर्वोच्च परमात्मा हैं और अक्षर वह पूर्ण और आदर्श भक्त है जो परमात्मा के सबसे निकट है। BAPS का कहना है कि मनुष्य को अपने जीवन में अक्षर जैसा बनने का प्रयास करना चाहिए और फिर पुरुषोत्तम की भक्ति करनी चाहिए। इसी विचार को वह ‘अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना’ कहता है। संस्था की पूरी धार्मिक पहचान इसी पर टिकी है।

अब आखिरी शब्द ‘स्वामीनारायण’ की बात… सवाल उठता है कि ये भगवान स्वामीनारायण कौन थे और उनके नाम से इतनी बड़ी धार्मिक परंपरा कैसे खड़ी हुई? इसके लिए कहानी हमें 1781 में ले जाती है। भगवान स्वामीनारायण का जन्म 3 अप्रैल 1781 को अयोध्या के पास छपैया में हुआ था, ये अब गोंडा जिले में है। बचपन का नाम घनश्याम पांडे था। स्वामीनारायण परंपरा बताती है कि बहुत कम उम्र से ही उनमें वैराग्य और आध्यात्मिक रुचि दिखाई देने लगी थी और 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और नीलकंठ वर्णी के नाम से भारत की लंबी यात्रा पर निकल पड़े, उन्होंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक अनेक तीर्थों, आश्रमों और धार्मिक केंद्रों की यात्रा की।

कई वर्ष तक भ्रमण करने के बाद 1799 में वे गुजरात के लोज पहुँचे, जहाँ उनका संपर्क रामानंद स्वामी की परंपरा से हुआ। 1800 में रामानंद स्वामी ने उन्हें दीक्षा दी और सहजानंद स्वामी नाम दिया। इसके एक वर्ष बाद 1801 में रामानंद स्वामी ने उन्हें अपने धार्मिक समुदाय का नेतृत्व सौंप दिया।

भगवान स्वामीनारायण

मान्यता है कि रामानंद स्वामी के निधन के बाद सहजानंद स्वामी ने एक सभा में लोगों ने भी ‘स्वामिनारायण’ मंत्र का जाप करने कहा और उन्हें भी अक्षरधाम के दर्शन हुए। इसी घटना के बाद उनके लिए ‘स्वामिनारायण’ नाम और मंत्र प्रसिद्ध हुआ और उनके अनुयायी उन्हें स्वामिनारायण के नाम से पुकारने लगे। अब सहजानंद स्वामी स्वयं भगवान स्वामीनारायण के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।

यहीं एक बहुत जरूरी फर्क भी समझना चाहिए। स्वामीनारायण संप्रदाय और BAPS एक ही चीज नहीं हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय की जड़ भगवान स्वामीनारायण के समय में है, जबकि BAPS उसी बड़ी परंपरा के अंदर बाद में विकसित हुई एक खास शाखा है। भगवान स्वामीनारायण के जीवनकाल में ही मंदिर बनाए गए और धार्मिक व्यवस्था संगठित की गई। उनका पहला बड़ा मंदिर 1822 में अहमदाबाद के कालूपुर में बना, जहाँ नर-नारायण देव की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। इसके बाद भुज, जूनागढ़ और कई जगहों पर मंदिर बनते गए…तो पहला स्वामीनारायण मंदिर अहमदाबाद का था और BAPS का पहला मंदिर बोचासन वाला था जो 1907 में बना।

भगवान स्वामीनारायण की शिक्षाओं को भी व्यवस्थित रूप दिया गया। उनके उपदेशों का सबसे महत्वपूर्ण संग्रह ‘वचनामृत’ माना जाता है, जिसमें उनके आध्यात्मिक संवाद और प्रवचन दर्ज हैं। 1826 में उन्होंने ‘शिक्षापत्री’ लिखी, जिसमें 212 संस्कृत श्लोकों में गृहस्थों, साधुओं और अनुयायियों के आचरण के नियम बताए गए। BAPS वचनामृत और शिक्षापत्री को अपनी धार्मिक समझ का केंद्रीय आधार मानता है। इसके अलावा गुणातीतानंद स्वामी से जुड़ी ‘स्वामिनी वातो’ भी BAPS के अंदर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें गुणातीतानंद स्वामी के प्रवचन हैं।

1830 में भगवान स्वामीनारायण के देहावसान के बाद उनके बनाए संप्रदाय को आगे चलाने की जिम्मेदारी उनके द्वारा तय की गई व्यवस्था के अनुसार चली। भगवान स्वामीनारायण ने अपने जीवनकाल में संप्रदाय की देखरेख के लिए दो प्रमुख गादियाँ बनाई थीं एक अहमदाबाद में नर-नारायण देव गादी और दूसरी वडताल में लक्ष्मी-नारायण देव गादी। यहाँ ‘गादी’ का मतलब किसी धार्मिक संस्था के नेतृत्व और जिम्मेदारी का केंद्र है।

इन दोनों गादियों पर आचार्य होते थे, जो मंदिरों और संप्रदाय की धार्मिक व्यवस्था को संभालते थे और यह पद आगे आचार्य परंपरा में चलता रहा लेकिन BAPS जिस आध्यात्मिक परंपरा को मानता है, वह थोड़ी अलग है। BAPS के अनुसार भगवान स्वामीनारायण ने गुणातीतानंद स्वामी को अक्षरब्रह्म के रूप में प्रकट किया था। इसके बाद गुणातीतानंद स्वामी से भगतजी महाराज, फिर शास्त्रीजी महाराज, योगीजी महाराज, प्रमुख स्वामी महाराज और आज महंत स्वामी महाराज तक गुरु परंपरा चली आती है। ये BAPS की अपनी मान्यता है। स्वामीनारायण की दूसरी शाखाएँ इस गुरु परंपरा को इसी रूप में स्वीकार करें, यह जरूरी नहीं है। 

अब आते हैं उन व्यक्ति पर जिसके बिना BAPS की अलग कहानी शुरू ही नहीं होती- शास्त्रीजी महाराज। उनका जन्म 1865 में डुंगर भक्त के रूप में हुआ था, साधु बनने के बाद उनका नाम यज्ञपुरुषदास पड़ा। वे वडताल परंपरा के साधु थे और धार्मिक ग्रंथों के गहरे अध्ययन के कारण शास्त्रीजी महाराज कहलाए। शास्त्रीजी महाराज का मानना था कि भगवान स्वामीनारायण पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म के स्वरूप हैं।

वे चाहते थे कि इस अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना को मंदिरों में भी उसी रूप में स्थापित किया जाए। वडताल में उनके इस विचार का विरोध बढ़ता गया और उनके लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गईं। आखिरकार नवंबर 1905 में शास्त्रीजी महाराज ने वडताल छोड़ दिया। उस समय उनके साथ केवल पाँच साधु और कुछ भक्त थे। वे वडताल से अलग होकर भी इसी विचार का प्रचार करते रहे और ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जहाँ अक्षर और पुरुषोत्तम की उपासना मुख्य रूप से स्थापित की जा सके।

वडताल छोड़ने के बाद शास्त्रीजी महाराज ने गुजरात में घूम-घूमकर अपने विचार का प्रचार किया। इसके बाद 1907 में बोचासन में पहला मंदिर बनवाया, जहाँ मुख्य स्थान पर भगवान स्वामीनारायण को पुरुषोत्तम और गुणातीतानंद स्वामी को अक्षर के रूप में स्थापित किया गया। BAPS इसी बोचासन मंदिर की स्थापना को अपनी संस्था की औपचारिक शुरुआत मानता है और इसी से उसका पूरा नाम बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था सामने आया। इस तरह 1905 में वडताल से अलग होने और 1907 में बोचासन मंदिर की स्थापना के बीच शास्त्रीजी महाराज ने एक अलग संगठन और अपनी आध्यात्मिक पहचान की नींव तैयार की।

बोचासन के बाद काम रुका नहीं। 1916 में सारंगपुर में मंदिर बना, 1934 में गोंडल और बाद में अटलादरा सहित दूसरे स्थानों पर मंदिर स्थापित हुए। लेकिन इन मंदिरों की खासियत केवल उनकी बनावट नहीं थी। BAPS के लिए मंदिर उसके सिद्धांत को दिखाई देने वाला रूप भी था। मंदिर में कौन मुख्य स्थान पर है, किस तरह मूर्तियाँ स्थापित हैं और किस गुरु परंपरा को स्मरण किया जाता है। इन सबके जरिए उसकी धार्मिक पहचान साफ दिखाई देती थी। धीरे-धीरे यह केवल कुछ मंदिरों वाला समूह नहीं रहा बल्कि अपनी अलग साधु व्यवस्था, गुरु परंपरा, सत्संग व्यवस्था और भक्त समुदाय वाला संगठन बनता गया।

अब एक आम आदमी का सबसे सीधा सवाल आता है कि क्या BAPS में हिंदू देवी-देवाताओं की पूजा होती है, अगर नहीं तो फिर किसकी? इसका सीधा जवाब है कि भगवान स्वामीनारायण को सर्वोच्च परमात्मा माना जाता है। लेकिन पूरी बात समझने के लिए अक्षर की भूमिका भी समझनी पड़ेगी। BAPS पाँच शाश्वत तत्वों की बात करता है- जीव, ईश्वर, माया, अक्षरब्रह्म और परब्रह्म। जीव सामान्य आत्माएँ हैं। ईश्वर उससे ऊँची ब्रह्मांडीय शक्तियों की श्रेणी है। माया वह शक्ति है जो जीव को संसार और अज्ञान से बाँधती है। अक्षरब्रह्म माया से परे है और परब्रह्म यानी पुरुषोत्तम इन सब से सर्वोच्च है। BAPS क्या मानता है, वो मानता है कि भगवान स्वामीनारायण वही पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म हैं। इसी के चलते BAPS में गुरु की भूमिका बहुत बड़ी हो जाती है। यहाँ गुरु केवल प्रवचन देने वाला संत नहीं है। BAPS का मानना है कि अक्षरब्रह्म गुरु के रूप में संसार में प्रकट रहता है और वही साधक को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। इसलिए वर्तमान गुरु के प्रति बहुत गहरा सम्मान और समर्पण दिखाई देता है।

BAPS बताता है कि उसकी ताकत बड़े-बड़े मंदिरों नहीं बल्कि वो जीवनशैली है जो अपने अनुयायियों से अपनाने को कहता है। मतलब साफ है- नशे से दूर रहो, मांसाहार मत करो, चोरी-धोखाधड़ी से दूर रहो, विवाह के बाहर संबंधों से बचो,नियमित पूजा करो और परिवार को भी धार्मिक मूल्यों के साथ चलाओ। खाने-पीने में भी सात्विकता पर काफी जोर है और साफ तौर पर BAPS के अनुयायियों को प्याज-लहसुन तक ना खाने को कहा जाता है।

अब यहां एक बात समझने वाली है। BAPS के हिसाब से धर्म का मतलब केवल इतना नहीं है कि आप रविवार को मंदिर गए, दर्शन किए और वापस आ गए। बात ये है कि आप रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे इंसान हैं और यहीं से आता है BAPS का एक बहुत जरूरी शब्द ‘सेवा’ अब सेवा सुनकर आपके दिमाग में शायद दान-पैसा आए लेकिन यहाँ सेवा का मतलब उससे बड़ा है। मंदिर में जूते संभालना भी सेवा है, खाना बनाना भी सेवा है, सफाई करना भी सेवा है, बड़े कार्यक्रम में व्यवस्था संभालना भी सेवा है। कोई चिकित्सा शिविर में काम कर रहा है, कोई राहत कार्य में लगा है, कोई बच्चों को पढ़ा रहा है और कोई मंदिर निर्माण में अपना समय दे रहा है।

BAPS का बहुत बड़ा ढांचा स्वयंसेवकों के सहारे चलता है। संस्था अपने आधिकारिक आंकड़ों में 5000 से ज्यादा सत्संग केंद्र, करीब 55000 स्वयंसेवक और दस लाख से ज्यादा अनुयायियों की बात करती है। साधुओं की संख्या भी एक हजार से ज्यादा बताई गई है, ये संस्था के अपने आंकड़े हैं लेकिन इससे आपको इसके आकार का अंदाजा जरूर हो जाता है।

अब सवाल है कि इतने लोग संस्था के साथ जुड़ते कैसे हैं? अगर कोई आम व्यक्ति BAPS से जुड़ना चाहता है, तो इसके लिए कोई मुश्किल सदस्यता प्रक्रिया नहीं है। शुरुआत आम तौर पर नजदीकी BAPS मंदिर या सत्संग केंद्र जाने से होती है, जहाँ व्यक्ति नियमित सभा में बैठता है, संतों और कार्यकर्ताओं से मिलता है और धीरे-धीरे स्वामीनारायण परंपरा, अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना और BAPS के जीवन नियमों को समझता है। इसके साथ ही साप्ताहिक सभाएँ और आयु वर्ग के हिसाब से बनी बाल, युवा व महिला सभाएँ भी आयोजित की जाती हैं। जब व्यक्ति इस परंपरा को अपनाने का फैसला करता है, तो उसे सत्संग में दीक्षित किया जाता है, जिसे परंपरा में ‘वर्तमान’ कहा जाता है और तुलसी की कंठी धारण कराई जाती है.. साथ ही आधुनिक समय में डिजिटल ऐप्स, यूट्यूब चैनल्स और ऑनलाइन सत्संग परीक्षाओं के जरिए भी नई पीढ़ी तेजी से इस वैश्विक परिवार का हिस्सा बन रही है।

बचपन से ही इस परंपरा से जुड़ाव हो सके इसका विचार बहुत पुराना है। योगीजी महाराज के समय बच्चों और युवाओं के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ बन दी गई थी। 1950 के दशक से युवा मंडल और बाल मंडल तेजी से बढ़े, हर हफ्ते सभाएं होतीं, धार्मिक कहानियां सुनाई जातीं, भजन होते, नाटक और प्रतियोगिताएँ होतीं, सेवा के कार्यक्रम होते।

इसका असर खासकर विदेशों में बसे भारतीय परिवारों पर बहुत ज्यादा पड़ा, क्योंकि वहां मंदिर केवल भगवान के दर्शन की जगह नहीं रह गया। वो बच्चों को गुजराती या भारतीय संस्कृति से जोड़ने की जगह बन गया। परिवार मिलते हैं, बच्चे अपनी परंपरा सीखते हैं और अगली पीढ़ी भी समुदाय से जुड़ी रहती है। अब यहीं से हम उस व्यक्ति पर आते हैं जिसके दौर में BAPS दुनिया भर में बहुत तेजी से फैलता दिखाई देता है। वो हैं प्रमुख स्वामी महाराज, उनका जन्म 1921 में शांतिलाल के रूप में हुआ था। 1940 में वे साधु बने और उनका नाम नारायणस्वरूपदास रखा गया और फिर 1950 में, सिर्फ 28 साल की उम्र में, शास्त्रीजी महाराज ने उन्हें संस्था का प्रमुख बना दिया। इसीलिए आगे चलकर उन्हें प्रमुख स्वामी महाराज कहा गया।

1971 में योगीजी महाराज के निधन के बाद प्रमुख स्वामी महाराज ने आध्यात्मिक नेतृत्व संभाला। इसके बाद उन्होंने लगातार यात्राएं कीं। गांव, शहर, विदेश जहां भक्त थे, वहां पहुंचने की कोशिश की। इसी दौर में BAPS की पहचान गुजरात की संस्था से निकलकर एक वैश्विक हिंदू संगठन के रूप में बनने लगी लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। BAPS की विदेश वाली कहानी सीधे अमेरिका या लंदन से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआती मजबूत जमीन बनी थी, अफ्रीका में।

क्योंकि पहले से ही बड़ी संख्या में गुजराती व्यापारी और परिवार केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में बस चुके थे। इनमें स्वामीनारायण परंपरा से जुड़े लोग भी थे। नैरोबी में 1920 के दशक से सत्संग गतिविधियों का रिकॉर्ड मिलता है। 1945 में वहां एक प्रारंभिक अक्षर-पुरुषोत्तम मंदिर बना और 1955 में योगीजी महाराज अफ्रीका गए और मोम्बासा में मंदिर का उद्घाटन किया और BAPS विदेश में फैला कैसे? ये तरीका समझना बहुत जरूरी है।

मान लीजिए किसी शहर में पांच-दस गुजराती परिवार जाकर बसे। पहले वे किसी के घर पर मिलना शुरू करते। भजन होता, वचनामृत पढ़ा जाता, गुरु और भारत के साधुओं से संपर्क रखा जाता। धीरे-धीरे परिवारों की संख्या बढ़ती। फिर कोई साधु वहां जाता। उसके बाद छोटा प्रार्थना स्थल बनता और फिर जब समुदाय बड़ा हो जाता, तो स्थायी मंदिर खड़ा हो जाता।

ब्रिटेन में भी लगभग यही हुआ, 1950 के आसपास लंदन में भक्तों ने नियमित सत्संग शुरू किया। 1959 तक संस्था वहां औपचारिक रूप लेने लगी। फिर 1970 में इस्लिंगटन में एक पुराना चर्च खरीदा गया और उसे मंदिर में बदल दिया गया। इसके बाद 1972 में एक बड़ी घटना हुई। युगांडा के शासक ईदी अमीन ने एशियाई मूल के लोगों को देश छोड़ने का आदेश दिया। बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन पहुंचे और इनमें बहुत से गुजराती परिवार थे। इससे BAPS का समुदाय भी तेजी से बढ़ा।

फिर आगे चलकर नेस्डन में बड़ी जगह ली गई और 1995 में वहां पत्थर का प्रसिद्ध BAPS मंदिर खुला। अब BAPS सिर्फ छोटे प्रवासी धार्मिक समूह के रूप में नहीं दिख रहा था। अब वह ऐसे बड़े मंदिर बना रहा था जिन्हें पूरा देश नोटिस कर रहा था।

अमेरिका में भी यही कहानी आगे बढ़ी। 1974 में न्यूयॉर्क के फ्लशिंग में शुरुआती मंदिर बना। फिर न्यू जर्सी, ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, लॉस एंजिलिस जैसे शहरों में केंद्र और मंदिर बनते गए। इसी मॉडल से बाद में गांधीनगर का अक्षरधाम, दिल्ली का अक्षरधाम, लंदन का नेस्डन मंदिर और अमेरिका का रॉबिन्सविल अक्षरधाम जैसी बड़ी पहचानें सामने आईं।

अबू धाबी का मंदिर तो इस वैश्विक विस्तार का एक और बड़ा उदाहरण है। संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व ने मंदिर के लिए जमीन उपलब्ध कराई। 2015 में 13.5 एकड़ और बाद में अतिरिक्त जमीन मिलने के बाद कुल क्षेत्र करीब 27 एकड़ हुआ। फरवरी 2024 में मंदिर का उद्घाटन हुआ और फ्रांस की राजधानी पेरिस में सितंबर 2026 में यह मंदिर खुला है।

लेकिन अब एक और जरूरी हिस्सा समझिए… BAPS के साधु। बाहर से देखने पर लग सकता है कि कोई युवक घर छोड़ता है और सीधे भगवा पहनकर साधु बन जाता है। लेकिन प्रक्रिया इतनी सीधी नहीं है… पहले युवक संस्था के जीवन को करीब से समझता है। फिर पार्षद दीक्षा का चरण आता है। पार्षद आम तौर पर सफेद वस्त्र पहनते हैं और पूर्ण साधु जीवन की तैयारी करते हैं। इस दौरान सेवा, धार्मिक अध्ययन, अनुशासन और त्याग की परीक्षा होती है।

इसके बाद योग्य पार्षद को भागवती दीक्षा दी जाती है। तब वह भगवा वस्त्र धारण करके पूर्ण साधु बनता है और उसे नया साधु नाम मिलता है।

साधु बनने के बाद पांच प्रमुख व्रतों पर जोर दिया जाता है- निष्काम, निस्नेह, निस्वाद, निर्मान और निर्लोभ। आसान भाषा में समझें तो काम और यौन आकर्षण से दूरी, परिवार और सांसारिक मोह से दूरी, स्वाद पर नियंत्रण, अहंकार से दूरी और धन-संपत्ति के लोभ से दूरी और ब्रह्मचर्य के नियम यहां बहुत सख्त हैं। इसी वजह से BAPS साधुओं के महिलाओं से संपर्क को लेकर भी कड़े नियम रखता है।

swaminarayan.org में BAPS के discipline के नियम बताए गए हैं उनमें निष्काम में यह बात स्पष्ट होती है। इनमें साधुओं के लिए जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना। शादी न करना। महिलाओं से कोई संपर्क न रखना। महिलाओं को शारीरिक रूप से न छूना, उनसे न लिखना या बात न करना, उन्हें जान-बूझकर न देखना, या उनके बारे में सोचना भी नहीं… कहा गया है… यही वो हिस्सा है जिसे लेकर अभी बहस हो रही है.. संस्था इसे महिला-विरोध नहीं बल्कि संन्यास और ब्रह्मचर्य का हिस्सा मानती है… अब 

अब आते हैं उस सवाल पर जिसे सुनने को आप उत्सुक हैं और जिसे लेकर सबसे ज्यादा बहस या चर्चा हो रही है- क्या BAPS हिंदू धर्म से अलग है या उसने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ कुछ कहा है? baps.org के WhoWeAre सेक्शन में लिखा है, “BAPS एक सामाजिक-आध्यात्मिक हिंदू संप्रदाय है, जिसकी जड़ें वेदों में हैं। इसकी स्थापना की शुरुआत भगवान स्वामीनारायण द्वारा 18वीं शताब्दी के अंतिम दौर में हुई थी।” उनके मंदिरों में राम, कृष्ण, शिव, पार्वती, गणेश और हनुमान जैसे देवताओं की मूर्तियाँ भी होती हैं और साधु प्रशिक्षण में गीता, उपनिषद और रामायण भी पढ़ते हैं। 

लेकिन कहानी इतनी नहीं है, कहानी इसके बाद शुरू होती है। मूर्तियाँ तो होती हैं लेकिन वो सब मूर्तियाँ स्वामी स्वामीनारायण से छोटी होती हैं और इसे लेकर भी बड़ी संख्या में हिंदुओं की नाराजगी रहती है और इनके literature में किस तरह हिंदू देवी देवताओं को छोटा दिखाया गया है उसकी बात करें उससे पहले एक उदाहरण सुनिए।

हमारे एक सहयोगी हैं मेघलसिंह परमार, ऑपइंडिया गुजराती में काम करते हैं, वो करीब 1-2 साल पहले गुजरात में एक BAPS के मंदिर में गए, सर्दियों के दिन थे, तो भगवान स्वामीनारायण को बाकायदा गर्म कपड़े पहनाए हुए थे लेकिन बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ सामान्य ही थीं। उन पर कोई गर्म कपड़ा नहीं था। देखने सुनने में ये बात छोटी है लेकिन आस्थावान लोगों के लिए इसका क्या महत्व है ये मुझे बताने की जरूरत नहीं है।

अब आगे बढ़ते हैं और BAPS के literature पर आते हैं। हालाँकि, समय-समय पर इनके लिटरेचर में बदलाव होते रहे हैं, तो एक ही किताब के अलग-अलग संस्करणों में आपको अलग कहानियाँ मिलेंगी और अभी गुजरात में हुए विवाद के बाद ताजा संस्करणों से लगभग सभी विवादित बातें हटा दी गई हैं, अब क्योंकि संस्थान बड़ा है, अलग-अलग वेबसाइट्स हैं तो उन्हीं से हमने कुछ पुरानी किताबों को ढूँढा है और आपको बताएँगे कि किस तरह स्वामीनारायण को सबसे बड़ा दिखाया गया है।

एक किताब है ‘नीलकंठ चरित्र’। आपको याद होगा कि स्वामीनारायण जब घर से निकले थे तब उनका नाम नीलकंठ हुआ करता था और वहीं से यह नाम आया होगा। इस किताब में जो बाते हैं वो बेहद ही गंभीर है। इसमें लिखा है कि हनुमान जी ने खुद को नीलकंठ का सेवक बताया था। एक कथा में हनुमान नीलकंठ का ‘कथित अपमान’ करने वाले साधुओं की पिटाई करते हैं, इस पर उनका परिचय पूछते हैं तो वो कहते हैं कि ‘मैं अंजना का पुत्र हनुमान हूँ और नीलकंठ का सेवक हूँ’। जानते हैं इस कथा में नीलकंठ का अपमान क्यों हुआ था? क्योंकि उन्होंने पुरुषों और महिलाओं के साथ राम कथा सुनने पर आपत्ति जताई थी कि वो साथ बैठकर कथा कैसे सुन सकते हैं। इसी कहानी में एक जगह लिखा है कि हनुमानजी को हर दिन नीलकंठ के दर्शन करने की आदत थी। 

नीलकंठ चरित्र

सिर्फ हनुमानजी को लेकर ही नहीं लिखा गया है, एक जगह लिखा है, “वे लक्ष्मणझूला पहुँचे। नीलकंठ ने गंगा के ठंडे पानी में स्नान किया और फिर मंदिर में जाकर लक्ष्मणजी की मूर्ति के सामने प्रणाम किया, उसी समय लक्ष्मणजी स्वयं अपनी मूर्ति से प्रकट हुए और नीलकंठ के चरणों में झुक गए। नीलकंठ ने उनके हाथ पकड़कर उन्हें उठाया और उन्हें भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप में अपने दर्शन कराए।”

पुस्तक के एक चैप्टर में सूर्यनारायण को नीलकंठ के सामने दिखाया गया है। इस चैप्टर में लिखा है, “ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नीलकंठ के दर्शन करने और उनकी सेवा के लिए वहाँ आए।” आगे लिखा है, “इसके बाद सूर्यनारायण ने नीलकंठ से कहा, “हे प्रभु, आप स्वयं पुरुषोत्तम नारायण हैं। आप सबसे श्रेष्ठ हैं और सभी अवतारों के भी कारण हैं। आप पूर्ण रूप से पवित्र हैं।”

भगवान शिव और माता पार्वती को लेकर इसी तरह की बातें कही गई हैं। इसमें लिखा है, “नीलकंठ स्वयं भगवान थे, फिर भी वे शालिग्राम की बहुत गहरी श्रद्धा और भक्ति से पूजा करते थे। नीलकंठ अभी यही सोच रहे थे कि शालिग्राम के लिए भोजन कहाँ से मिलेगा, तभी वहाँ एक बैल पर सवार एक पुरुष और एक स्त्री आए। दोनों का रूप संन्यासियों जैसा था।  उन्होंने उनसे पूछा, “आप कौन हैं?” तब उस स्त्री ने कहा, “ये शिवजी हैं और मैं सती हूँ। आप कई दिनों से भूखे हैं, इसलिए हम आपके लिए साथवो लेकर आए हैं।” वास्तव में वे भगवान शिव और माता पार्वती थे। नीलकंठ की सेवा करने का अवसर पाकर दोनों बहुत प्रसन्न हुए।”

एक और किताब है नाम है घनश्याम चरित्र, इसमें स्वामीनारायण के जन्म से जुड़ी कथाएँ हैं। इसमें लिखा है, “हनुमानजी बाल घनश्याम को लेकर तुरंत गाँव वापस पहुँचे और उन्हें भक्तिमाता की गोद में सौंप दिया। इसके बाद हनुमानजी ने भक्तिमाता को प्रणाम किया और कहा, ‘माता, आपका यह बालक स्वयं भगवान है और मैं उनका सेवक हूँ। जब भी आपको मेरी सहायता की जरूरत हो, मुझे याद कर लीजिएगा। मैं हमेशा आपकी सेवा के लिए उपस्थित रहूँगा’।” अब दिलचस्प बात ये भी है कि आगे के संस्करणों में कहानी तो यही है लेकिन इसमें से भगवान कहने वाला हिस्सा हटा दिया गया है। 

घनश्याम चरित्र

इस नए संस्करण में लिखा है, “जैसे-जैसे घनश्याम बोलते गए, उनके शरीर से दिव्य प्रकाश की किरणें निकलने लगीं। वहाँ बैठे सभी लोगों को समाधि की अवस्था का अनुभव हुआ। हर विद्वान को घनश्याम के रूप में अपने-अपने आराध्य देव के दर्शन होने लगे। किसी को उनमें शंकराचार्य दिखाई दिए, किसी को भगवान शिव, किसी को श्रीराम और किसी को श्रीकृष्ण के दर्शन हुए।” उन्हें भगवान श्रीराम बताने वाली ऐसी कितनी ही कहानियाँ इसमें हैं।

गुणातीतानंद स्वामी पर लिखी एक किताब है। नाम है गुणातीतानंद स्वामी- विस्तृत जीवन और कार्य। वे स्वामीनारायण के पहले आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं। यह किताब गुजराती में है और इसमें एक जगह लिखा है, “महाविष्णु अपनी अनंत शक्ति मूल प्रकृति और मूल पुरुष से प्राप्त करते हैं। इस तरह ब्रह्मांड में करोड़ों भगवान माने जा सकते हैं, लेकिन उन सभी भगवानों के भी भगवान स्वामीनारायण हैं, इस विचार को इसी रूप में समझाया जाता है।”

साधु विवेकसागर दास अपने एक लेख ‘विश्वमा व्यापेली अद्भुत सृष्टि BAPS मंदिरों नी’ में लिखते हैं, “वचनामृत गढ्डा के आखिरी अध्याय 38 में भगवान स्वामीनारायण के कहे शब्दों की पुष्टि करते हुए स्वामी ने कहा कि दूसरे अवतार तो प्रणाम और पूजा के लायक हैं, लेकिन सिर्फ़ हमारे आराध्य भगवान स्वामीनारायण ही पूजा के लायक हैं।” यह लेख BAPS की वेबसाइट पर अभी भी मौजूद है।

ऐसे कहानियाँ इस पूरे literature में भरी पड़ी है। ये तो हुई literature के बाद, इसके अलावा BAPS से जुड़ा एक और विवाद है, जो खूब चर्चा में रहा।

अमेरिका के न्यू जर्सी में BAPS का बहुत बड़ा स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर बनाया गया। लेकिन 2021 में मंदिर बनाने वाले कुछ भारतीय मजदूर अदालत पहुँच गए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें भारत से धार्मिक काम करने वाले लोगों के वीजा पर अमेरिका बुलाया गया था, लेकिन वहाँ उनसे मंदिर बनाने का भारी काम कराया गया। मजदूरों का कहना था कि उनसे रोज करीब 12 से 13 घंटे और हफ्ते में 87 घंटे से भी ज्यादा काम कराया जाता था जबकि पैसे केवल करीब 450 डॉलर महीने मिलते थे। 

दावा किया गया कि भारत से जानबूझकर दलित, आदिवासी और दूसरे हाशिये के समुदायों से मजदूरों की भर्ती की।

कुछ मजदूरों ने यह भी कहा कि अमेरिका पहुँचने के बाद उनके पासपोर्ट अपने पास रख लिए गए, उन्हें बिना अनुमति बाहर जाने की आजादी नहीं थी और बाहरी लोगों से मिलने-जुलने पर भी रोक थी। मामला सामने आने के बाद अमेरिका की संघीय एजेंसियों ने भी जाँच शुरू की। दूसरी तरफ BAPS ने सभी गंभीर आरोपों से इनकार किया। संस्था का कहना था कि मंदिर का काम सामान्य नौकरी की तरह नहीं बल्कि धार्मिक सेवा के रूप में किया जा रहा था और बहुत से लोग अपनी इच्छा से सेवा कर रहे थे। 2023 में इस मामले में एक बड़ा बदलाव आया जब 12 मजदूरों ने अपने मुकदमे वापस ले लिए। उनके वकील ने अदालत को बताया कि मुकदमा वापस लेने के बदले उन्हें BAPS से कोई पैसा नहीं मिला और उन्होंने धार्मिक कारणों से केस आगे न बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन बाकी मजदूर मुकदमे में बने रहे, इसलिए पूरा मामला खत्म नहीं हुआ।

सितंबर 2025 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले से जुड़ी आपराधिक जाँच बिना किसी आपराधिक आरोप के बंद कर दी। यह BAPS के लिए बड़ी राहत थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि अदालत ने मजदूरों के सभी आरोप झूठे साबित कर दिए। आपराधिक जाँच बंद हुई लेकिन मजदूरों का अलग दीवानी मुकदमा चलता रहा। 2026 तक BAPS उस मुकदमे को खारिज कराने की कोशिश कर रहा था और मजदूरों की ओर से उसका विरोध किया जा रहा है।

इस कहानी में हमने आपको BAPS की शुरुआत से लेकर उसके देश-विदेश में फैलने तक सारे मुद्दे बता दिए हैं, तो BAPS को सिर्फ उसके संगमरमर के मंदिरों से मत देखिए। इसकी असली कहानी उन विचारों में छिपी है, जिन पर इसका पूरा ढांचा खड़ा है। अक्षर-पुरुषोत्तम की उपासना, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, बेहद सख्त साधु जीवन, और दुनिया भर में फैला संगठन। लेकिन जितना बड़ा इसका विस्तार हुआ, उतने ही इसके साहित्य, धार्मिक दावों और न्यू जर्सी मामलों को लेकर सवाल भी उठे। किसी संगठन को समझने का सही तरीका न उसकी केवल प्रशंसा है, न केवल आलोचना। असली तस्वीर तब बनती है जब उसकी आस्था, ताकत, इतिहास और विवाद। सबको एक साथ सामने रखा जाए। और BAPS की कहानी शायद यहीं सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

EC में कैसे आए 3 कमिश्नर? जब राजीव गांधी से भिड़े CEC शास्त्री, तो बदल दिया गया चुनाव आयोग का पूरा गेम

आज भारत में इस बात पर हंगामा मचा हुआ है कि चुनाव आयोग के तीन कमिशनर्स में से 2 बहुत से फैसलों से सहमत नहीं होते। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को लेकर एकदम आंदोलन की बात हो रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि आख़िर इलेक्शन कमीशन में तीन कमिश्रनर्स हैं ही क्यों? क्या हमेशा से भारत में तीन ही कमिश्नर हुआ करते थे? 

या फिर किसी ने अपने हित साधने को इस इंडिपेंडेंट इंस्टीटूशन को सिंगल मेंबर बॉडी से ट्रिपल मेंबर बॉडी में बदल दिया? आख़िर कैसे राजीव गांधी की बातें ना मानने का ख़ामियाज़ा एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को अपनी पॉवर्स के पर कतरने से चुकाना पड़ा। 

और कैसे तब चीफ इलेक्शन कमिश्नर को ही आख़िरी दिन तक पता नहीं था कि उसके पर कतरे जाने वाले है। तो ये कहानी शुरू होती है साल 1950 से, लेकिन इसका मेन प्लॉट है 1980 के दशक का। दरअसल जब भारत का संविधान लिखा जा रहा था तब चुनाव को लेकर काफ़ी बहस हुई।

इसके बाद 25 जनवरी, 1950 को इलेक्शन कमीशन बनाया गया, जिसे एक कान्सटीट्युशनल बॉडी का दर्जा दिया गया। इसका जिम्मा था देश में फ्री एंड फ़ेयर चुनाव करवाना। इसको हेड करने के लिए एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को नियुक्त किया गया जिसके कंधों पर ये ज़िम्मेदारी थी कि वो इस इलेक्शन कमीशन को चलाएगा। 

देश के पहले चुनाव यानी 1952 के आम चुनाव सफलतापूर्वक करवाए गए और ये व्यवस्था 1984 तक चली। किसी को कोई समस्या नहीं हुई। लेकिन इसके बाद साल 1984 में राजीव गाँधी सिंपथी लहर में प्रधानमंत्री बने। 400 से अधिक सीटें उन्होंने संसद में जीत ली, उनके हाथ में ये अधिकार आ गया कि वो किसी भी तरह का संशोधन कर सकें। 

राजीव गांधी ने शाह बानो जजमेंट को पलटना हो या फिर एंटी डिफ़ेक्शन लॉ लाना, अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल खूब किया। लेकिन उन्होंने इस ताक़त का मतलब ये भी समझ लिया कि वो चुनाव आयोग को अपने हिसाब से चला सकते हैं। 

उन्होंने चुनाव की तारीखों से लेकर उपचुनाव जैसे मामलों को अपने हिसाब से करवाने के लिए दबाव डालना शुरू किया ताकि उनकी पार्टी यानी कांग्रेस को बढ़त मिले। और उनका सीधा टकराव हुआ तब के मुख्य चुनाव आयुक्त RVS पेरी शास्त्री से। 

1 जनवरी 1986 को मुख्य चुनाव आयुक्त बने शास्त्री चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर काफ़ी गंभीर थे। राजीव गाँधी ने इसी कड़ी में साल 1987 में चुनाव आयोग पर दबाव बनाना शुरू किया। ये दबाव था हरियाणा विधानसभा और राष्ट्रपति चुनावों को लेकर। राजीव गाँधी चाहते थे कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से पहले ना हों। 

यानी वो हरियाणा विधानसभा चुनाव टालना चाहते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि तब हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी और भजनलाल मुख्यमंत्री थे, राष्ट्रपति चुनाव में विधायकों के भी वोट डलते हैं और अगर नए चुनाव हो जाते और कांग्रेस हार जाती तो शायद उनकी पोजिशन इसको लेकर कमजोर हो जाती। 

लेकिन RVS शास्त्री ने ये मानने से मना कर दिया। देश भर में राजीव गांधी के खिलाफ माहौल बन चुका था और शास्त्री ने तय समय पर यानी जून 1987 में ही हरियाणा में विधानसभा चुनाव करवाए और कांग्रेस की तगड़ी हार हुई। लोकदल-भाजपा गठबंधन यहाँ भारी मतों से जीत कर सत्ता में पहुँचा और ताऊ देवीलाल सीएम बने। 

इसके बाद RVS शास्त्री ने प्रेसिडेंशियल इलेक्शन भी तय समय पर यानी जुलाई 1987 में करवाए और इसमें कांग्रेस कैंडिडिएट R वेंकटरामन जीते। लेकिन CEC शास्त्री का दबाव में ना आना राजीव गांधी को पसंद नहीं आया और वो राजीव गांधी की आँखों में चढ़ गए! 

लेकिन ये शास्त्री और राजीव गांधी की आख़िरी लड़ाई नहीं थी। बल्कि इसके बाद कहानी और खराब हुई। साल 1988 में फरीदाबाद लोकसभा में उपचुनाव हुआ और कांग्रेस ने कहा कि यहाँ भयानक गड़बड़ी हुई और हिंसा भी हुई है। कांग्रेस ने शास्त्री से कहा कि लोकसभा में पूरा उपचुनाव दोबारा से करवाया जाए। 

शास्त्री ने इस माँग को ठुकरा दिया और उन 161 बूथों पर ही रिपोल करवाया जो हिंसा प्रभावित थे। ये दूसरा मौक़ा था जब राजीव गांधी और शास्त्री आमने सामने थे। इसके बाद असम में वोटर लिस्ट को लेकर भी तल्खी हुई। 

कहा गया कि शास्त्री असम गण परिषद का पक्ष ले रही है। बाद में AGP ने ये चुनाव भी जीत लिया। अब तक लड़ाई खुले में आ चुकी थी और शास्त्री पर रिजाइन करने तक का प्रेशर था। जब कोई रास्ता नहीं मिला तो  राजीव गाँधी ने शास्त्री को कट टू साइज करने का फैसला ले लिया। 

और ये हुआ अक्तूबर 1989 में।  9 अक्तूबर  1989 को देश के राष्ट्रपति ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन ने पिछले लगभग 4 दशक से चली आ रही चुनाव आयोग की व्यवस्था को बदल दिया। सरकार ने अब चुनाव आयोग में शास्त्री के साथ 2 और लोगों को अपॉइंट कर दिया। 

इस बदलाव का किसी को अंदाजा नहीं था। ये नोटिफिकेशन सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त की ताकतों को बाँटने का जुगाड़ थी। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने तुरंत ही दो और इलेक्शन कमिश्नर SS धनोआ और वीएस सहगल को अपॉइंट कर दिया, ये नियुक्ति 16 अक्तूबर 1989 को हुई थी। 

SS धनोआ ने ख़ुद इस बदलाव के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया है कि राजीव गाँधी ने पहले ही उन्हें इस बात के लिए राजी कर लिया था कि उन्हें सरकार में कोई पोजिशन दी जाएगी। यानी राजीव गांधी पहले ही बदलाव के लिए मन बना चुके थे और शास्त्री की ताक़त कम करना चाहते थे। 

धनोआ ने बताया है कि जब 16 अक्तूबर 1989 को वो शास्त्री के पास पहुँचे तो यहाँ पहले ही माहौल काफ़ी ख़राब था। शास्त्री के पास राजीव गांधी के कानून मामलों के सचिव आए हुए थे और उन पर ये दबाव बना रहे थे कि वो एडिशनल चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का फैसला मान लें। 

हालांकि शास्त्री एकदम गुस्सा थे और कह रहे थे कि वो प्रधानमंत्री की ये हरकत बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन फैक्ट धनोआ ने तो ये भी लिखा है कि शास्त्री क्या उन्हें ही अपनी इस अपॉइंटमेंट के बारे में उस दिन तक नहीं बताया गया था, उनकी कोई सलाह भी नहीं ली गई थी। 

यानी राजीव गांधी ने चुनाव आयोग के पर कतरने के लिए बिना मुख्य चुनाव आयुक्त को बताए ही नियुक्तियाँ कर दी थीं और वो लोग नियुक्त किए थे जो वो पहले से जानते थे। अब चूंकि चुनाव आयोग 1 की जगह तीन सदस्यीय हो चुका था तो सारे निर्णय भी बहुमत से होने थे। 

यानी राजीव गांधी ने अपनी मनमर्जी के लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को ख़त्म कर दिया था। लेकिन ये लोकतंत्र पर राजीव गांधी सरकार का आख़िरी हमला था, ऐसा बिल्कुल मत सोचिएगा। अपने मनमर्जी के आयुक्त चुनाव आयोग में बिठाने के बाद तुरंत राजीव गाँधी ने अपना एजेंडा इम्प्लीमेंट कर दिया। 

राजीव गांधी ने 17 अक्तूबर को ख़ुद ही अगले आम चुनाव की डेट अनाउंस कर दी, जो काम चुनाव आयोग का था, वो अब प्रधानमंत्री कर रहे थे। और जो डेट भी अनाउंस की गई वो सिर्फ़ एक महीने की थी, यानी विपक्षी पार्टियों को तैयारी करने की भी सहूलियत ना मिले। 

इन सब बातों को लेकर लगातार शास्त्री और राजीव गाँधी में तनातनी होती रही। CEC शास्त्री ने हालाँकि शांत दिमाग़ से काम लिया और चुनाव उसी तारीख़ में करवाए जो पीएम ने अनाउंस किए थे, अगर ऐसा नहीं होता तो देश संकट में फँस जाता।

लेकिन इस पूरी कहानी ने दिखा दिया था कि अपनी एब्सोल्यूट मेजॉरिटी में चूर राजीव गाँधी अपनी पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक तैयार थे और देश संवैधानिक संस्थाओं को भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ रहे थे। 

ज्यादा हँसी की बात ये है कि राजीव गांधी ख़ुद शुरुआत में चुनाव आयोग के बहु सदस्यीय होने के ख़िलाफ़ थे। 

एक साल पहले ही उन्होंने इस बात का संसद में विरोध किया था और साल भर बाद वो ये अनाउंस कर रहे थे कि सिर्फ़ एक चुनाव आयुक्त को बहुत ज़्यादा काम करना पड़ रहा है इसलिए 2 और लोगों की नियुक्ति जायज़ है। अब आपको समझना चाहिए कि तब तक मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले गांधी की छवि बोफोर्स घोटाले के चलते धूमिल हो चुकी थी।

राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है, कह कर देश भर में वीपी सिंह प्रचार कर रहे थे और उन्होंने ही बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी को निशाने पर ले रखा था। लेकिन यहाँ भी हार के डर से राजीव गांधी ने जनता दल को चुनाव चिह्न देने में रोड़े अटकाने शुरू किए। हालाँकि शास्त्री ने किसी तरह मसला सुलझा लिया। 

ये सब हरकतों के बावजूद भी राजीव गांधी चुनाव हार गए। उनके चुनाव हारते ही चुनाव आयोग की इस व्यवस्था पर भी नई वीपी सिंह की सरकार ने रोक लगा दी। 1990 में वापस से चुनाव आयोग को तीन की जगह एक ही सदस्यीय कर दिया गया। 

SS धनोआ इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वीपी सिंह सरकार के फैसले को सही माना। इस तरह से वापस चुनाव आयोग अपने मूल स्वरूप में लौटा। चुनाव आयोग में कमिशनर्स का नंबर बढ़ाना इश्यू नहीं है, लेकिन ये काम किस नीयत से हो रहा है, वो जरूरी है। 

लेकिन कांग्रेस इस मौके पर मुँह की खाके भी बाज नहीं आई। बल्कि उसने 1991 में सत्ता में दोबारा आने के बाद वापस यही हरकत की। 1993 तक टीएन शेषन देश के CEC बन चुके थे और वो कांग्रेस को अपनी मनमर्जी नहीं करने दे रहे थे। कांग्रेस ने अपनी 4 साल पुरानी प्लेबुक वापस से दोहराई। 

उसने 1993 में शेषन के साथ ही दो और लोगों की नियुक्ति चुनाव आयोग में करके इसे वापस से मल्टी मेंबर बॉडी बना दिया। इस नियुक्ति में एक नाम मनोहर सिंह गिल का भी था जो बाद में UPA की सरकार में मंत्री बने। जाहिर है, इन नियुक्तियों के ख़िलाफ़ टीएन शेषन सुप्रीम कोर्ट चले गए। 

1995 में सुप्रीम कोर्ट की एक पाँच सदस्यीय बेंच ने सरकार का फैसला सही माना और तब से ही तीन आयुक्तों की व्यवस्था परमानेंटली लागू हुई। लेकिन इस पूरी टाइमलाइन से आपको ये जरूर क्लियर हो गया होगा कि कांग्रेस को चुनाव आयोग की कितनी इज्जत है या फिर वो इसके फार्मेशन को लेकर कितनी गंभीर है। 

आज इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर हंगामा हो रहा है कि तीन चुनाव आयुक्त आपस में सहमत नहीं थे। लेकिन कांग्रेस ने इसे मल्टी मेंबर बनाया ही इसलिए था कि वो अपने फैसले बहुमत से करवा ले। ऐसे में अच्छा होगा कि लोग थोड़ा पुराने समय की तरफ़ भी देखें और आज के लिए हल्ला मचाना थोड़ा कम करें। अगर किसी को समस्या है तो वो सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार कर सकता है। 

खून वही, बस नैरेटिव बदल गया: प्राचीन बलि से ईसाई संस्कार तक, इतिहास ने ये फर्क कैसे बनाया?

इतिहास की किताबें अक्सर एक तरफा कहानी सुनाती हैं। पश्चिमी इतिहासकारों और धर्मशास्त्रियों ने सदियों से दुनिया के अतीत को एक खास फ्रेम में फिट किया। एक तरफ प्राचीन और स्वदेशी सभ्यताएँ- एज़टेक, अफ्रीकी जनजातियाँ, भारतीय परंपराएँ, जिन्हें बर्बर, हिंसक और खून-खराबे में डूबी बताया गया। दूसरी तरफ ईसाई धर्म, जिसे सार्वभौमिक नैतिकता, मानवाधिकार और आध्यात्मिक ऊँचाई की शुरुआत माना गया।

यानी तस्वीर कुछ ऐसी बनाई गई कि पुराने जमाने के देवताओं को ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए इंसानी शरीर और खून चाहिए था। इसके उलट ईसाई धर्म ने इस तरह की शारीरिक हिंसा से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रेम को एक विशुद्ध आध्यात्मिक रूप दिया।

लेकिन अगर इस कहानी को थोड़ा करीब से देखें, खासकर गैर-पश्चिमी या उपनिवेशवाद के बाद वाले नजरिए से, तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। ईसाई धर्म की सभ्य और परिष्कृत दिखने वाली परंपरा के केंद्र में भी एक ऐसा अनुष्ठान मौजूद है जिसमें ईश्वर के शरीर को ग्रहण करने की अवधारणा शामिल है। ‘Eucharist’ रोटी और वाइन को मसीह के शरीर और रक्त से जोड़ने वाला प्रमुख संस्कार। यानी जिस शारीरिक धार्मिक परंपरा को ईसाई धर्म ने प्राचीन दुनिया में बर्बरता का प्रतीक बताया, उसका एक बदला हुआ रूप खुद उसके धार्मिक जीवन के केंद्र में बैठा है।

The Last Supper

बात यहीं खत्म नहीं होती। ईसाई परंपरा खुद कहती है कि यह अनुष्ठान आकाश से नहीं टपका। इसकी जड़ Last Supper में है। सूली से एक रात पहले यीशु ने शिष्यों के साथ आखिरी भोजन किया। रोटी तोड़ी और कहा, कि ‘यह मेरा शरीर है’। फिर प्याला उठाया और कहा, ‘यह मेरा रक्त है’। बाद की सदियों में यही दृश्य चर्च का सबसे बड़ा संस्कार बन गया- Eucharist। यानी जिस धर्म ने पुरानी दुनिया की बलि और खून वाली रीतों को बर्बर बताया, उसके सबसे पवित्र क्षण की भाषा भी शरीर और रक्त से ही शुरू होती है। फर्क इतना है कि अब खून वेदी पर नहीं बहता, प्याले में प्रतीक बनकर आता है। लेकिन शब्द वही हैं। कल्पना वही है। शरीर को ग्रहण करने की बात वही है। इसलिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, सभ्यता के उस दावे पर सवाल है जिसमें एक रीत को जंगली कहा गया और उसी भाषा के दूसरे रूप को सभ्यता का शिखर मान लिया गया।

भूल जाने की सुविधा

पुरानी सभ्यताओं को ‘बर्बर’ और ‘सभ्य’ के पैमाने पर तौलने की प्रक्रिया को समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि ‘सभ्य’ होने की परिभाषा बनी कैसे। जब शुरुआती आधुनिक दौर में यूरोपीय खोजकर्ता और मिशनरी अमेरिका, अफ्रीका और दूसरी स्वदेशी सभ्यताओं तक पहुँचे, तो ‘बर्बरता’ का विचार सिर्फ वर्णन नहीं था। उसका इस्तेमाल साम्राज्यवादी शासन और दूसरे समाजों पर कब्जे को जायज ठहराने के लिए भी किया गया। 

एज़टेक सभ्यता में इंसानी दिल निकालने जैसी प्रथाओं या पूर्वजों से जुड़े जटिल अंतिम संस्कारों को उनके नैतिक पतन का सबूत बनाया गया। इन परंपराओं की आलोचना हमेशा निष्पक्ष नजरिए से नहीं हुई। ध्यान खास तौर पर उन चीजों पर गया जो देखने में सबसे भयावह थीं खून, शरीर और मांस का इस्तेमाल।

इसके पीछे एक धारणा काम कर रही थी जिसे शायद ही कभी सवालों के घेरे में रखा गया, अगर कोई सभ्यता सचमुच विकसित है, तो उसे शरीर और भौतिक दुनिया से जुड़ी इन पुरानी प्रथाओं से ऊपर उठकर विचार और आध्यात्मिकता की किसी ऊँची दुनिया तक पहुँचना चाहिए।

लेकिन इस नैतिक श्रेष्ठता की कहानी में इतिहास का एक बड़ा हिस्सा गायब हो जाता है। क्रूसेड, इंक्विजिशन और अलग-अलग धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं को दबाने के लिए ईसाई साम्राज्यों द्वारा इस्तेमाल की गई संस्थागत हिंसा अक्सर इस तस्वीर में पीछे छूट जाती है।

और इससे भी ज्यादा असहज करने वाली बात यह है कि ईसाई धर्म ने खून और शरीर से जुड़ी इस पुरानी धार्मिक भाषा को खत्म नहीं किया। उसने उसे अपने भीतर समाहित कर लिया और उसे अपने धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा बना दिया।

रोटी अब सिर्फ रोटी नहीं रही, वाइन सिर्फ पेय नहीं रहा। लेकिन प्रतीक भी उसी पुरानी भाषा से निकले हैं, जिसे कभी दूसरों पर बर्बरता का आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया गया। सभ्यता की कहानी अक्सर इतनी साफ नहीं होती, जितनी हमें पढ़ाई जाती है। कभी-कभी जिसे हम दूसरों में जंगलीपन कहते हैं, वही चीज हमारे अपने केंद्र में थोड़े बदले हुए कपड़ों में बैठी मिलती है।

हमें पितृसत्ता की अधूरी कहानी क्यों सुनाई गई? Patriarchy? Think Again

हमें इंसानी इतिहास की एक बहुत साफ-सुथरी और सुविधाजनक कहानी सुनाई गई है। आज की एक सोच के मुताबिक, अतीत की पूरी कहानी पुरुषों के दबदबे और महिलाओं को दबाकर रखने की रही है, मानो पुरुषों ने मिलकर एक सोची-समझी व्यवस्था बनाई हो, जिसका मकसद महिलाओं को हमेशा नीचे रखना था। 

यानी, एक्टिविस्टों के हिसाब से देखें, तो अतीत कुछ और नहीं बल्कि पुरुषों की दादागिरी का एक लंबा रिकॉर्ड भर है, एक सोची-समझी, ऑर्गेनाइज्ड साजिश, ताकि महिलाओं को दबाकर रखा जा सके। यह कहानी राजनीतिक बहस के लिए काफी आसान और असरदार हो सकती है। लेकिन जैसे ही हम अपने पूर्वजों की असली जिंदगी और उनकी चुनौतियों को समझने की कोशिश करते हैं, यह तस्वीर इतनी सीधी नहीं रह जाती।

इंसान ने अपने इतिहास का करीब 99 प्रतिशत हिस्सा ऐसी दुनिया में बिताया, जहाँ आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। न आधुनिक दवाइयाँ थीं, न मशीनें, न सुरक्षित घर और न ही हर वक्त उपलब्ध खाना। भूख, बीमारी, जंगली जानवर, हिंसा और मौसम जैसी चुनौतियों के बीच इंसान को हर दिन सिर्फ एक चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता था, ज़िंदा रहने के लिए।

ऐसे में पुराने समाजों में पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग भूमिकाएँ सिर्फ मनमाने नियम नहीं थीं। वे उस समय की जरूरतों और परिस्थितियों से धीरे-धीरे विकसित हुई थीं। जो व्यवस्था उस कठिन दुनिया में परिवार और समुदाय को जिंदा रखने में मदद करती थी, वही आगे चलकर समाज की सामान्य व्यवस्था बनती गई।

यानी, इन भूमिकाओं को सिर्फ किसी साजिश या महिलाओं को दबाने की योजना के तौर पर देखना पूरी कहानी नहीं बताता। इनके पीछे इंसानी समाज के सामने खड़ी एक बहुत बुनियादी चुनौती भी थी, मुश्किल से मुश्किल हालात में कैसे जिंदा रहा जाए और अगली पीढ़ी को कैसे बचाया जाए।

सबसे पहले सवाल था, ज़िंदा कैसे रहें?

इंसानी इतिहास के एक बहुत बड़े हिस्से में, हमारी प्रजाति फूड चेन के शीर्ष पर नहीं थी। हम ज़ीरो-सम गेम के बेहद कमज़ोर खिलाड़ी थे। ज़िंदगी छोटी, दर्दनाक और अनिश्चित थी। हमारे पूर्वजों के सिर पर हमेशा बड़े शिकारियों, संसाधनों की कमी, भयानक मौसम और इलाके पर कब्ज़े के लिए कबीलों के बीच होने वाली जंग का खतरा मंडराता रहता था।

ऐसे माहौल में किसी भी समाज के सामने सबसे पहली चुनौती थी, ज़िंदा रहना। भूख, बीमारी, हिंसा और बाहरी खतरों के बीच समाज के लिए यह जरूरी था कि हर जरूरी काम किसी न किसी तरह पूरा हो। कामयाबी का इकलौता पैमाना यही था कि आप अपनी नस्ल को आगे बढ़ते रहें।

इसलिए पुरुषों और महिलाओं से अलग-अलग तरह की जिम्मेदारियाँ निभाने की उम्मीद की जाती थी। यह काम का बँटवारा सिर्फ किसी पर अधिकार जमाने के लिए नहीं था, बल्कि उस समय की जरूरतों से पैदा हुआ था। कौन शिकार करेगा, कौन बच्चों की देखभाल करेगा, कौन बस्ती की सुरक्षा करेगा और कौन रोजमर्रा के संसाधनों को संभालेगा, इन सब कामों का बँटवारा समाज की जरूरत और उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से होता गया।

एवोल्यूशनरी ट्रेड-ऑफ और काम का बंटवारा

मानव इतिहास और इंसानी व्यवहार को समझने वाली रिसर्च हमें बताती है कि समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच काम का बँटवारा आखिर क्यों हुआ। इसकी एक बड़ी वजह थी दोनों के शरीर और शारीरिक क्षमताओं में मौजूद प्राकृतिक अंतर। समय के साथ समाज की अलग-अलग भूमिकाएँ इन्हीं प्राकृतिक अंतर और उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित होती गईं। सेक्सुअल डाइमॉर्फिज्म; यानी, महिला और पुरुष के बीच का शारीरिक अंतर, वह बुनियादी ढांचा था जिस पर ये रोल टिके थे।

औसतन पुरुषों का शरीर इस तरह बना है कि वे ज्यादा भारी वजन उठा सकें, ज्यादा शारीरिक ताकत लगा सकें और खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर सकें। हजारों सालों तक इंसानी समाज में इन्हीं क्षमताओं का इस्तेमाल शिकार करने, खाना जुटाने और अपने परिवार या समूह की सुरक्षा करने में होता रहा। इंसानी इतिहास,एवोल्यूशनरी साइकोलॉजी  पर हुई रिसर्च; जैसे मार्टिन डैली और मार्गो विल्सन का काम, यह दिखाता है कि पुरुष आम तौर पर ऐसे कामों में ज्यादा शामिल रहे हैं जिनमें शारीरिक खतरा ज्यादा था। बड़े और खतरनाक जानवरों का शिकार करना हो या किसी बाहरी खतरे से अपने समूह की रक्षा करनी हो, इन कामों में शारीरिक ताकत और जोखिम उठाने की क्षमता बेहद काम आती थी। 

माहौल के इस दबाव का सीधा और लॉजिकल जवाब था, स्पेशलाइजेशन (विशेषज्ञता) का मॉडल। आबादी के एक हिस्से ने शिकार, लड़ाई, कंस्ट्रक्शन और पहरेदारी के जरिए बाहर की खतरनाक दुनिया का सामना करने की ज़िम्मेदारी ली। वहीं दूसरे हिस्से ने बच्चों को पालने, बस्ती के अंदर के संसाधनों को संभालने और कल्चर को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने जैसे बेहद ज़रूरी कामों पर ध्यान दिया।

डेमोग्राफिक ज़रूरत: “बायोलॉजिकल बॉटलनेक” और जंग

काम के इस बँटवारे को समझने के लिए एक और जरूरी बात समझनी होगी, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, बायोलॉजिकल बॉटलनेक।

सीधे शब्दों में कहें तो, इंसानों की आबादी बढ़ने की रफ्तार इस बात पर भी निर्भर करती है कि कितनी महिलाएँ एक समय में बच्चे पैदा कर सकती हैं। यही प्राकृतिक सीमा समाज की संरचना और पुरुषों-महिलाओं की भूमिकाओं को समझने में अहम भूमिका निभाती है।

किसी भी आबादी के बच्चे पैदा करने की क्षमता बुनियादी तौर पर महिलाओं की संख्या से तय होती है। एक अकेला पुरुष कई महिलाओं को प्रेग्नेंट कर सकता है, लेकिन एक महिला अपने पूरे जीवनकाल में सीमित संख्या में ही बच्चों को जन्म दे सकती है। इसलिए, महिलाओं की संख्या का कम होना या खत्म होना, पुरुषों के नुकसान की तुलना में किसी आबादी के वजूद के लिए बहुत ज्यादा अचानक और जानलेवा झटका होता है।

इसी जनसंख्या से जुड़ी कमजोरी की वजह से इतिहास में युद्धों के दौरान महिलाओं को अक्सर निशाना बनाया गया। सदियों से चले आ रहे संघर्षों में, चाहे वे इस्लाम के शुरुआती विस्तार के दौर के युद्ध हों, मध्यकालीन धार्मिक संघर्ष हों या आज के समय में 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुआ हमला, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और दूसरी तरह की क्रूरता के मामले सामने आते रहे हैं।

यह हिंसा कई बार सिर्फ लोगों को डराने या तत्काल नुकसान पहुँचाने तक सीमित नहीं रही। महिलाओं पर हमला किसी समुदाय के परिवार, आने वाली पीढ़ी और सामाजिक ढाँचे को कमजोर करने का एक तरीका भी बन सकता था। यानी निशाना सिर्फ आज के लोगों पर नहीं, बल्कि उस समुदाय के भविष्य पर भी पड़ता था।

नतीजा यह हुआ कि पुराने समय में समाज ने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ सख्त नियम और व्यवस्थाएँ बनाई थीं। इन्हें सिर्फ लोगों को दबाने या नियंत्रित करने के तरीके के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उस दौर में इनका एक मकसद परिवार, समुदाय और आने वाली पीढ़ी को बाहरी खतरों से बचाना भी था।

इसी व्यवस्था में पुरुषों से ज्यादा जोखिम उठाने की उम्मीद की जाती थी। युद्ध हो, शिकार हो या किसी खतरे का सामना करना, पुरुषों को अक्सर आगे भेजा जाता था। इसकी एक वजह यह भी थी कि एक समुदाय के भविष्य के लिए महिलाओं की संख्या और उनकी सुरक्षा का बहुत महत्व था।

सरल शब्दों में कहें तो, पुराने समाजों में पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे बाहर के खतरे का सामना करें, ताकि परिवार और समुदाय का बाकी हिस्सा सुरक्षित रह सके।

‘मोनोलिथिक्स पैट्रियार्की’: क्या हर समाज में पितृसत्ता एक जैसी थी?

लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि हर दौर में और हर समाज में पुरुषों का दबदबा एक जैसा ही रहा है। अलग-अलग जगहों और अलग-अलग समय के समाजों को देखें, तो पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाएँ काफी अलग रही हैं। कहीं पुरुषों की भूमिका ज्यादा प्रभावशाली रही, तो कहीं महिलाओं की। यानी दुनिया के हर समाज में जेंडर रोल एक ही तरह के नहीं थे।

वाइकिंग्स का उदाहरण लीजिए। वैसे तो वे अपनी युद्ध कला के लिए जाने जाते हैं, लेकिन प्रॉपर्टी के मालिकाना हक और तलाक के मामले में उनका लीगल और सोशल सिस्टम काफी बराबरी वाला और समतावादी था। महिलाएं खेतों और संपत्तियों को संभालती थीं, उनके पास आर्थिक ताकत थी, और वे वैसी लाचार नहीं थीं जैसा कि आज की फिल्मों या कहानियों में दिखाया जाता है। 

इसी तरह, भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।

कई समाजों में उनकी व्यवस्था वहाँ की परिस्थितियों के हिसाब से बनी थी, जैसे लगातार होने वाले युद्ध या ऐसा खेती का काम जिसमें बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत की जरूरत होती थी।

इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ आज की जेंडर पॉलिटिक्स के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। उस समय की परिस्थितियाँ आज से बहुत अलग थीं, और उन्हें समझने के लिए उस दौर की जरूरतों और हालात को भी ध्यान में रखना होगा।

अतीत की विरासत को नए नजरिए से समझना

इंसानी इतिहास के इतने लंबे सफर में बने ये जेंडर रोल किसी को गुलाम बनाने के लिए रातों-रात तैयार की गई कोई साजिश नहीं थे। वे उस दौर की जरूरतों और हालात से पैदा हुए थे। पुरुषों और महिलाओं ने अलग-अलग तरह के जोखिम और जिम्मेदारियाँ उठाईं, लेकिन दोनों की भूमिका इंसानी समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी थी।

इसलिए पुराने समाजों को सिर्फ उत्पीड़न की एक कहानी के रूप में देखना शायद अधूरी तस्वीर होगी। हमारे पूर्वजों के सामने आज की दुनिया से बिल्कुल अलग चुनौतियाँ थीं, भूख, बीमारी, हिंसा, युद्ध और जीवित रहने की लगातार लड़ाई।

आज हम जिस सुरक्षित और सुविधाजनक दुनिया में रहते हैं, वह अचानक नहीं बनी। इसके पीछे पीढ़ियों की मेहनत, संघर्ष और त्याग है। और इतिहास में इस कीमत का एक बड़ा हिस्सा उन पुरुषों ने भी चुकाया, जो शिकार, युद्ध, भारी मेहनत और दूसरे खतरनाक कामों में सबसे आगे रहे।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आज भी हमें वही पुराने जेंडर रोल अपनाकर चलना चाहिए। पिछले कुछ सौ सालों में टेक्नोलॉजी, खेती और समाज में इतना बड़ा बदलाव आया है कि पुराने समय में काम बाँटने की जो जरूरत थी, वह आज पहले जैसी नहीं रही।

आज हमारे पास मशीनें, आधुनिक तकनीक और दूसरी सुविधाएँ हैं, जिनकी वजह से किसी काम के लिए सिर्फ पुरुष या महिला होना जरूरी नहीं रह गया है। अब समाज में यह ज्यादा मायने रखता है कि किसी इंसान में उस काम को करने की योग्यता और क्षमता है या नहीं। 

लेकिन इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि पुराने समय में समाज ऐसे क्यों बने थे। इंसानियत की कहानी सिर्फ अत्याचार और शोषण की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी भी है, जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात में जिंदा रहने और अपनी अगली पीढ़ी को बचाने के लिए मिलकर संघर्ष किया।

इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं ने कम कठिनाई झेली। अलग-अलग समाजों में दोनों ने ही अलग-अलग तरह के जोखिम और बोझ उठाए। इस संघर्ष में पुरुषों और महिलाओं ने हमेशा एक जैसे काम नहीं किए, लेकिन उनकी जिम्मेदारियाँ कई जगह एक-दूसरे की पूरक थीं। अपने अतीत को सही तरीके से समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि तभी हम यह तय कर सकते हैं कि अतीत से क्या सीखना है और भविष्य में क्या बदलना है।

संभल की डेमोग्राफी: हिंदू 13 हजार से हुए 47 हजार, मुस्लिम 23 हजार से हो गए 1 लाख 71 हजार – मुस्लिम भीड़ की दंगाई मानसिकता का यह है गणित

भगवान कल्कि के मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों पर ही संभल में शाही जामा मस्जिद बना दी गई। यह किया गया 1526 में। इतिहास और हिंदु-स्मृति में लेकिन सब दर्ज रहा। 498 साल बाद 2024 में न्यायिक प्रक्रिया के तहत हिंदुओं ने मस्जिद के सर्वेक्षण की याचिका दायर की। कोर्ट ने सर्वे का ऑर्डर भी दे दिया। सर्वे करने लेकिन जब सरकारी टीम पहुँचती है तो वहाँ मुस्लिम भीड़ दंगा करती है। आखिर पुलिस-प्रशासन पर हमला करने की हिम्मत आई कहाँ से भीड़ को? इस सवाल का जवाब संभल दंगों की जाँच करने वाली आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट है – संभल की बदलती जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी।

रिपोर्ट में 2011 की जनगणना के अनुसार संभल शहर की डेमोग्राफी 77.67% मुस्लिम आबादी जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 22% वाली बताई गई है। इससे ज्यादा चौंकाने वाला संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का वो बयान है, जहाँ वो वर्तमान में 80% मुस्लिम जबकि सिर्फ 20% हिंदुओं के होने की बात कह रहे हैं। मतलब संभल में हिंदू कम से कम होते जा रहे हैं, यह सरकारी आँकड़ा है।

क्या संभल का इतिहास हमेशा से मुस्लिम बाहुल्य ही रहा है? आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस पर भी विस्तार से बताया है। ‘संभल में हिंसा का इतिहास और शाही जामा मस्जिद का इतिहास’ रिपोर्ट के अध्याय-3 का शीर्षक ही यही है। जिस संभल में भगवान कल्कि का मंदिर हुआ करता था, वो संभल आखिर मुस्लिम-बहुल कैसे हुआ? मुस्लिम-बहुल होने के कारण वहाँ क्या-क्या सामाजिक बदलाव देखने को मिले, आयोग की रिपोर्ट इन परतों को भी खोलती है।

संभल जो कभी था शंभाला: महाभारत और पुराणों में है जिसका उल्लेख

संभल का पौराणिक नाम शंभाला है। इसका जिक्र महाभारत, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, कल्कि पुराण में विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार भगवान कल्कि के जन्मस्थान के रूप में उल्लेखित है। यही कारण है कि यहाँ ‘श्री कल्कि विष्णु मंदिर’ भी है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावे तिब्बती बौद्ध पौराणिक कथाओं में भी शंभाला को हिमालय के पार एक पौराणिक साम्राज्य और शुद्ध भूमि के रूप में वर्णित किया गया है।

सरकारी आँकड़ों की बात करें तो 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान संभल पर पाँचाल शासकों का राज था। बाद में यह मौर्य सम्राट अशोक के साम्राज्य का हिस्सा बना। किंवदंती यह भी है कि 12वीं सदी के दौरान दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान ने संभल में गाजी सैय्यद सालार मसूद (गजनी साम्राज्य का शासक महमूद गजनी का भांजा) के खिलाफ दो युद्ध लड़े थे।

13वीं और 14वीं शताब्दी में संभल दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बना। इस दौरान यह पहले कुतुब-उद-दीन ऐबक और बाद में फिरोज शाह तुगलक के अधीन रहा। 14वीं सदी की बात करें तो मोरक्कन यात्री व दिल्ली के काजी इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा वृत्तांत ‘रिहला’ में संभल का जिक्र किया है। इब्न बतूता के अनुसार चीन के युआन सम्राट तोगोन तेमुर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक को एक राजदूत भेजा था, जिसमें संभल में एक बौद्ध मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति माँगी गई थी। कारण था – तिब्बत से उस समय भारी संख्या में आने वाले तीर्थयात्री। मतलब संभल पर मुस्लिम आक्रांताओ का शासन जरूर हो गया था लेकिन पौराणिक-सामाजिक-धार्मिक मान्यताएँ न सिर्फ देश बल्कि विदेशियों तक की स्मृति से लोप नहीं हुई थी, यह आसानी से समझा जा सकता है।

संभल का क्या महत्व था, इसे ऐसे समझें। 15वीं शताब्दी में लोदी साम्राज्य के दूसरे शासक सिकंदर लोदी ने संभल को अपने साम्राज्य की राजधानियों में से एक घोषित किया था। यह चार वर्षों तक इसी तरह बना रहा। इसके बाद यहाँ मुगलों का राज हुआ। मुगल शासक बाबर ने अपने साम्राज्य के शुरुआती दिनों में इसी संभल में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित की थी। संभल में पहली बाबरी मस्जिद का निर्माण भी करवाया था। संभल का तब इतना महत्व हुआ करता था कि उसने अपने बेटे हुमायूँ को यहाँ का गवर्नर बनाया था। हुमायूँ जब राजा बना तो यह अकबर को सौंपा गया। कहा जाता है कि संभल अकबर के शासन-काल में फला-फूला। इसके बाद जब शाहजहाँ को यहाँ का प्रभारी बनाया गया, उसके बाद से इसकी लोकप्रियता और महत्व धीरे-धीरे खत्म होता गया।

संभल की जनसंख्या: 1881 से लेकर अब तक

साल 1881 में अंग्रेजों ने पहली बार भारत की जनगणना की। तब संभल की कुल जनसंख्या 35196 थी। 1891 में यह बढ़ कर 37226 हुई।

भारत की सबसे पहली और दूसरी जनगणना में संभल की आबादी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

जनसांख्यिकी मतलब डेमोग्राफी की बात करें तो इसका डेटा साल 1891 से ही उपलब्ध है। 1881 के उपलब्ध रिकॉर्ड से संभल का सिर्फ कुल आबादी का डेटा प्राप्त हुआ है। जबकि 1891 और उसके बाद जितनी बार भी जनगणना की गई, धार्मिक-मजहबी आबादी का डेटा भी संलग्न है।

1891 की जनगणना के अनुसार संभल की डेमोग्राफी, स्रोत साभार: North-Western Provinces and Oudh, Imperial Tables, Part II, Vol-XVII, Uttar Pradesh – Census 1891

1891 में संभल (वर्तमान का नगर पालिका परिषद) में रह रहे कुल 37226 लोगों में 13291 हिंदू थे, जबकि 23476 मुसलमान। मतलब कुल आबादी का 35.7 प्रतिशत हिंदू और 63.1 प्रतिशत मुस्लिम।

नीचे आप 1891 से लेकर 2011 तक हुए हर जनगणना को देख सकते हैं। जब आप आबादी में बढ़ोतरी का प्रतिशत देखेंगे तो चौंक जाएँगे। 120 वर्षों में संभल की कुल आबादी में 493.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान मुस्लिम आबादी बढ़ी है 632.1 प्रतिशत। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई सिर्फ 260 प्रतिशत। मतलब शहर की आबादी में बढ़ोतरी दर से लगभग आधी दर पर हिंदुओं की जनसंख्या संभल में बढ़ी है। यह चिंताजनक स्थिति है।

घटते गए हिंदू, फैलता गया मुसलमान: स्रोत साभार – 1891 से 2011 तक की गई जनगणना का सरकारी आँकड़ा, ग्राफिक्स साभार – Gemini AI

कोरोना काल के दौरान 2021 की जनगणना नहीं हो सकी। लेकिन संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग के समक्ष वहाँ के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार और अपर पुलिस अधीक्षक श्रीश्चंद का बयान हिंदुओं की संख्या में हो रही कमी की ओर इशारा करती है। उनके अनुसार 2011 में लगभग 22% हिंदुओं की तुलना में वर्तमान में लगभग 20% हिंदू ही बचे हैं संभल शहर में।

आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू

इस्लामी आक्रांताओं और अंग्रेजों की गुलामी के दौर में संभल के हिंदू अगर उपेक्षा के शिकार हुए तो क्या आजादी के बाद क्या हालात में सुधार हुआ?

1891 में संभल में हिंदू-मुस्लिम आबादी का अंतर सिर्फ 10000 के लगभग था। डाटा से यह स्पष्ट है कि संभल तब भी मुस्लिम-बहुल था लेकिन जनसंख्या का अंतर बहुत कम था। संभव है कि पृथ्वीराज चौहान की सत्ता जाने के बाद इस्लामी आक्रांताओं ने हिंदू-घृणा के कारण इस पौराणिक शहर के धार्मिक स्थलों को बर्बाद करने के साथ-साथ यहाँ के कुछ लोगों को इस्लाम में धर्मांतरित भी किया होगा, कुछ बाहरी मुस्लिमों को बसाया भी होगा, बदलती परिस्थितियों को देखते हुए कुछ हिंदू पलायन भी कर गए होंगे। 12वीं सदी से लेकर 1890 तक संभल जैसे प्रमुख हिंदू नगर का मुस्लिम-बहुल हो जाने के ये कुछ चंद कारक हो सकते हैं। लेकिन आजाद भारत (ऊपर के डाटा चित्र में, 1951 से 2011 के आँकड़ों पर नजर डालिए) में ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनीं कि यहाँ हिंदू 16920 से बढ़ कर 47846 पर ही सिमट गए, जबकि इसी समय-काल में मुस्लिमों की संख्या 43910 से 171857 हो गई?

इस सवाल का जवाब है – सांप्रदायिक दंगा। एक दंगे के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा… संभल में आजादी से कुछ साल पहले से यह जो चक्र चला, उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की आजादी के बाद भी न तो राजनीतिक मंशा कभी किसी की रही, न ही प्रशासनिक स्तर पर कभी प्रयास किया गया।

24 नवंबर 2024 की घटना संभल में दंगा का कोई अकेला मामला नहीं थी। शहर का एक लंबा और अशांत इतिहास है, जिसमें बार-बार सांप्रदायिक अशांति की घटनाएँ हुई हैं। संभल दंगों की जाँच के लिए बने आयोग ने यहाँ बार-बार होने वाली हिंसक घटनाओं का अध्ययन किया, जिनमें से अधिकांश हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़पों से संबंधित हैं। इसके लिए आयोग ने विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध सामग्री का अध्ययन किया। आयोग ने यह पाया कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया, जो यहाँ दो संप्रदायों के बीच विवाद का मूल है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 1936 से लेकर 2024 तक के सभी दंगों का वर्णन किया है। एक दंगा हालाँकि 1924 में भी हुआ था, जिसका जिक्र जवाहरलाल नेहरू ने खुद अपनी रिपोर्ट में की है, नीचे वो भी शामिल किया जा रहा है। ज्ञात और दर्ज स्रोतों के आधार पर कुल 16 दंगों का जिक्र नीचे है।

संभल में सांप्रदायिक दंगे: 1924 से 2024 तक – 100 वर्षों का इतिहास

“मुहर्रम महीने के 9वें दिन (11 अगस्त 1924, इस दिन श्रावण मास का आखिरी सोमवार भी था) संभल में दो हिंदू मंदिर तोड़ दिए गए। वहाँ स्थापित मूर्तियों को विखंडित कर दिया गया था। कई हिंदुओं को बुरी तरह मारा गया। जबकि मुहम्मडनों के साइड कोई क्षति या चोट के निशान नहीं देखे गए। यह इसलिए हुआ क्योंकि मुहम्मडन जहाँ से ताजिया लेकर जा रहे थे, वहाँ भगवान शिव के सूरजकुंड मंदिर में भजन-कीर्तन चल रहा था। उन्होंने मंदिर से आ रहे संगीत पर आपत्ति जताने के बाद मंदिर तोड़ा, मूर्ति विखंडित की, भक्तों को बहुत मारा। इसके बाद यहाँ से कुछ दूरी पर स्थित ठाकुरद्वारा मंदिर को भी इस्लामी भीड़ ने तोड़ डाला। हिंदू पीड़ितों ने यह भी बताया कि मंदिर निर्माण के लिए एक साधु को कुल 1305 रुपए दान-दक्षिणा में मिले थे। मुस्लिम दंगाइयों ने पहले उन साधु को नंगा किया, फिर उनको मिला दान भी छीन लिया।”

यह रिपोर्ट खुद जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है, वो भी संभल में 3 दिन रह कर, हिंदू-मुस्लिम पक्षों से आमने-सामने बातचीत करके।

एसपी संभल ने आयोग के समक्ष बताया कि उनके कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार संभल में इस दौरान सांप्रदायिक हिंसा की कुछ घटनाएँ हुई थीं। हालाँकि तारीख और स्थान का विवरण (संभवतः पुराने रिकॉर्ड के कारण) वो आयोग को उपलब्ध नहीं करा सके।

विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों से संभल भी अछूता नहीं था। दंगाई मुस्लिमों से बचने के लिए हातिमसराय और आसपास के क्षेत्रों के लोग संभल पुलिस स्टेशन में शरण लिए थे। दंगे शांत होने के बाद जगदीश शरण नाम के व्यक्ति के साथ 20-25 अन्य लोग पुलिस स्टेशन से पुलिस एस्कॉर्ट के साथ अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। जब इनके घर केवल 50 मीटर दूर रह गए थे, तो इन्होंने खुद का सुरक्षित मान कर पुलिसकर्मियों को वापस लौटने के लिए कह दिया। पुलिस वालों के वापस मुड़ते ही हिलाली सराय में कुरैशी वाली गली में इन लोगों पर दंगाई मुसलमानों ने हमला कर दिया। अन्य लोग भागने में सफल रहे, लेकिन जगदीश शरण को पकड़ लिया गया और मार डाला गया।

यह दंगा बड़े नवाब महमूद हसन खान (वर्तमान विधायक इकबाल महमूद का अब्बा) द्वारा भड़काया गया था। दंगों की शुरुआत बड़े नवाब ने ही गोलीबारी करके शुरू की थी। इसमें छह हिंदुओं की मृत्यु हुई थी। हिंदुओं को और ज्यादा क्षति पहुँचाने के लिए नवाब महमूद ने अनवर मिस्त्री से एक अस्थायी तोप बनवाई थी। हालात इतने खराब थे कि दंगों के बाद 20 दिनों से अधिक समय तक कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

1958 में हिंद इंटर कॉलेज में हिंदू और मुस्लिम छात्रों के बीच हिंसक झड़प हुई। ‘बेरा के कारखाना’ से आए मुस्लिम लड़कों ने लोहे के पंजों सहित हथियारों से हमला किया, जिसमें 10-12 हिंदू छात्र घायल हो गए। इसके बाद 2 दिन का कर्फ्यू लगाया गया।

संभल लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना था। इस दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और जेपी कृपलानी ने भी प्रचार किया। देखते-देखते सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा। इसी बीच पूर्व जनसंघ विधायक महेश गुप्ता को रुक्नुद्दीन सराय में दंगाई मुसलमानों ने चाकू मार दिया।

इसकी शुरुआत होती है 29 फरवरी को एक मौलवी की हत्या से। अफवाह फैलाया जाता है कि हत्या राजकुमार सैनी नाम के एक हिंदू ने की। जबकि जाँच से पता चल गया था कि मस्जिद समिति के भीतर विवाद के कारण मौलवी की हत्या एक अन्य मुस्लिम ने की थी। इसके बावजूद मंजर शफी और अताउल्लाह ततारी के नेतृत्व में मुस्लिम भीड़ ने सूरजकुंड मंदिर और मानस मंदिर सहित हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमला कर दिया। इस दौरान 2 लोगों की हत्या कर दी गईः सुखा सिंह के बेटे हरिसिंह की और रामेश्वर प्रसाद के बेटे राकेश वैश्य की।

इसके बाद 24 अप्रैल को कल्लू के घर में विस्फोट होता है। उसका बेटा सलाम इसमें घायल होता है और अगले दिन उसकी मौत हो जाती है। बिना यह जाने कि विस्फोट क्यों हुआ, मुस्लिम भीड़ दंगा शुरू कर देती है। इसमें बुजुर्ग हिंदू कमता प्रसाद की चाकू मारकर हत्या कर दी जाती है। जयचंद रस्तोगी की हत्या गोली मार कर की जाती है। इसी अशांति के दौरान संभल शहर के बाहर भी एक हिंदू की हत्या कर दी गई।

पुलिस ने क्या किया? संतुलन बनाया? कैसे? लगभग 20-22 दोषी मुसलमानों को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। इसलिए इतने ही निर्दोष हिंदुओं को भी गिरफ्तार किया गया। ‘निर्दोष हिंदुओं की गिरफ्तारी’ – चौंकना नहीं है, यह सब आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

1978 में संभल में हुआ दंगा वहाँ के हिंदुओं के लिए सबसे विनाशकारी दंगा था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इस दंगे में 183 से ज्यादा हिंदुओं की हत्या की गई थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 184 लोगों की हत्या की गई थी। इस दंगे की भयावहता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुरारी लाल की फड़ (कोठी/दूकान का वह भाग, जहाँ बैठ चीजें खरीदी-बेची जाती हैं) पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। दंगों के बाद सैकड़ों हिंदू घर-कारोबार छोड़कर पलायन कर गए थे।

25 मार्च 1978 को होली थी। लेकिन संभल में यह मनाई गई थी तनाव के बीच। क्योंकि होलिका दहन जिस स्थान पर होनी थी, वहाँ एक मुस्लिम दुकानदार ने लकड़ी का स्टॉल लगा दिया था। जबकि एक अन्य स्थान पर मंच बना दिया गया था। प्रशासन ने लकड़ी का स्टॉल और मंच तो समय रहते हटा दिया लेकिन होली तनाव में ही गुजरी। यह तनाव दंगों में बदल गया 29 मार्च को।

इस दंगे की साजिश रची थी मंजर शफी (1976 में हुए दंगों में भी इसका हाथ) और उसके गुर्गों ने। मंजर शफी अलीगढ़ में छात्र नेता था और इमरजेंसी के बाद 1977 में मुस्लिम लीग से चुनाव भी लड़ा था। इसे भीड़ जुटाना अच्छे तरीके से आता था। भीड़ को कैसे हमलावर बनाना है, 1976 के दंगों में यह अपना ‘कौशल’ दिखा चुका था। 29 मार्च 1978 को मंजर शफी ने कुछ चंद जुमले गढ़े, फिर उसे अफवाहों की तरह फैलाया:
(i) मंजर शफी मारा गया
(ii) मस्जिद तोड़ दी गई
(iii) पेश इमाम को जला दिया गया
(iv) कोतवाली के पास बनी मस्जिद ध्वस्त कर दी
(v) लूटपाट-कत्लेआम मचा है

नतीजा क्या हुआ? पूरे संभल में मुस्लिम भीड़ दंगाई बन कर घूमने लगी। कहीं एक साथ 24 हिंदुओं (कुछ मीडिया रिपोर्ट में 25 हिंदुओं को जलाए जाने की बात) को गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर जिंदा जला दिया गया। यह हुआ था मुरारी लाल की फड़ पर। क्योंकि दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। लेकिन मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दे दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया। यहाँ छिपे 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया।

अगर वहाँ मौजूद रसोईया हरिद्वारी लाल खुद को एक ड्रम में बंद नहीं करता, एक छोटे से छेद से पूरी घटनाक्रम नहीं देखता, और सबसे बड़ी बात… जिंदा बचकर वापस नहीं आता तो यह दर्दनाक कहानी सरकारी फाइलों में दब जाती, शायद सिंपल आगजनी बता दी जाती।

यहाँ जिनको जिंदा जलाया गया था, उनमें से बहुतों की अस्थियाँ तक उनके परिवार वालों को नसीब हो सकी थी, उन्हें सांकेतिक रूप (घास-फूस पर आटा लपेट पुतला बना कर) से उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा था।

सबसे बुरा हुआ था बनवारी लाल के साथ। दंगों के बावजूद वो प्रभावित इलाके में चले गए। उनकी पत्नी और बेटे ने उन्हें रोका भी। लेकिन वे यह कहते हुए गए:

“सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”

बनवारी लाल गोयल को लेकिन मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।

दंगाई भीड़ से जो हिंदू जान बचा कर आस-पास के गाँवों-जंगलों की ओर भाग रहे थे, ऐसे 160 लोगों की हत्या कर दी गई। दंगों के खत्म होने के कई दिनों बाद तक लाशें मिलती रही थीं।

1978 दंगों से पहले तक संभल के हिंदू कथित शाही जामा मस्जिद (जो हिंदुओं के लिए हरिहर मंदिर है) के अंदर जाते थे। PAC की निगरानी में परिसर के अंदर बने हवन कुंड के पास बैठ कर भजन-कीर्तन करते थे। 1978 के दंगों की आड़ में शफीकुर रहमान बर्क ने स्थानीय हिंदुओं से इनका यह हक भी छीन लिया। हवन कुंड को मुस्लिमों के पैर-हाथ धोने, कुल्ला करने (वजू करने की जगह) की जगह में तब्दील कर दिया।

यह दंगा इतना व्यापक था, पुलिस-प्रशासन इतनी लाचार थी इसे कंट्रोल करने में कि 29 मार्च से 20 मई तक संभल के नगर क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा रहा था। 169 FIR किए गए, इनमें से 3 मुकदमे पुलिस ने दर्ज करवाए थे, जबकि बाकि संभल के दोनों संप्रदाय के व्यक्तियों द्वारा पंजीकृत कराए गए थे।

मुलायम सिंह यादव कनेक्शन भी
1993-94 की बात है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। 23 दिसंबर 1993 को शासन (मतलब यूपी सरकार, मुलायम सिंह यादव की सरकार) द्वारा मुरादाबाद के डीएम को लिखा गया एक पत्र सामने आया। इसमें संभल में 1978 में हुए दंगों से संबंधित मुकदमे वापस लेने की बिंदुवार जानकारी दी गई थी।

इसी पत्र के आधार पर 5 जनवरी, 1994 को तत्कालीन जिला शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट में शासन के मुकदमे वापस लेने का पत्र दिया था। विभिन्न अदालतों में विचाराधीन 1978 दंगे के 16 में से आठ मुकदमों को तत्कालीन मुलायम सरकार ने वापस लिया था।

सुअर एक जानवर है। उसके पास इंसानी दिमाग नहीं। निश्चित तौर पर वो ईंट-सीमेंट की बनी मस्जिद और घर में फर्क नहीं कर पाता होगा। बेचारा बेजुबान सुअर बिना किसी साजिश या षड्यंत्र के मुरादाबाद में एक ईदगाह में चला गया। इस कारण से वहाँ दंगा भड़क गया। इसकी लपटें संभल तक भी पहुँचीं। यहाँ भी दंगे हुए। प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की हत्या भी हुई। ध्यान यह दीजिए कि हत्या किसकी हुई? प्रजापति समुदाय के एक व्यक्ति की – मतलब हिंदू की।

पुलिस ने क्या किया? 1976 वाला फॉर्मूला अपनाया। संतुलन बनाने का। कैसे? तस्दीक इलाही को गिरफ्तार किया। लेकिन इससे संतुलन नहीं बनता। संतुलन बनाते हुए विजय त्यागी नामक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत भी गिरफ्तार किया गया। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट का यह आधिकारिक बयान था, जो आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है।

बाबरी ढाँचे (मस्जिद) का ताला खोला गया वर्ष 1982 में। संभल के मुसलमानों को यह रास नहीं आया। विरोध के लिए चुना गया शुक्रवार मतलब जुमे की नमाज का दिन। 10-15 हजार मुसलमानों ने इस दिन जामा मस्जिद में काली पट्टियाँ बाँध कर नमाज अदा की। उसके बाद यह नमाजी भीड़ टंडन तिराहा तक आई। नमाजियों की इतनी बड़ी संख्या के कारण, हिंदुओं ने अपनी दुकानें बंद रखीं थीं और भय का माहौल था।

इसी दौरान दीपासराय के एक मुस्लिम ने पैसे के लेन-देन को लेकर हरिशंकर रस्तोगी की गोली मारकर हत्या कर दी। हिंदुओं ने हत्यारे की गिरफ्तारी के लिए विरोध-प्रदर्शन किए। स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। हिंदुओं के दबाव के कारण शफीकुर रहमान बर्क ने हत्यारे का आत्मसमर्पण तो करवाया, लेकिन बाद में हत्यारा बरी हो गया।

इसकी शुरुआत होती है 14 फरवरी 1986 से, मतलब जुमे की नमाज से। श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के विरोध में मुस्लिमों ने भारी संख्या में विवादित जामा मस्जिद में सामूहिक नमाज अदा की। इसी दौरान एक समाचार छपा। इसमें खबर थी कि कुंभ मेले के लिए हरिद्वार जा रहे नागा साधु महाशिवरात्रि के दिन संभल आएँगे और हरिहर मंदिर में जल चढ़ाएँगे। इस खबर ने संभल में तनाव बढ़ा दिया।

इसके बाद 8 मार्च 1986 को जब शिवरात्रि का जुलूस निकाला जा रहा था, किसी ने यह अफवाह फैला दी कि हरिहर मंदिर (विवादित जामा मस्जिद) में जल चढ़ाया जा रहा है। इसी अफवाह का फायदा उठाकर, ट्यूबवेल ऑपरेटर रहीसुर्रहमान ने मेन्था व्यापारी प्रदीप रस्तोगी की गोली मार कर हत्या कर दी। रास्ते में एक अन्य हिंदू की भी हत्या की गई।

सबसे बड़ा दुस्साहस (पुलिस-प्रशासन को डायरेक्ट चुनौती) दिखाया गया भगवत शरण रस्तोगी की हत्या के बाद। हुआ यह कि टंडन तिराहा के पास खेरू हलवाई की दुकान से चीनी खरीदने गए भगवत शरण रस्तोगी को दुकान के अंदर खींचकर मार डाला गया। लेकिन उनका शव यहाँ से बरामद नहीं हुआ। यह बरामद हुआ नई सराय पुलिस स्टेशन नखासा के अंदर से। भगवत शरण रस्तोगी की लाश को एक बोरे में बाँध कर वहाँ रखा गया था।

इसके बाद मनोकामना मंदिर के पास एक अन्य हिंदू की हत्या की गई। इस दौरान दंगों के बीच में असंख्य दुकानों को लूटा गया और जलाया गया।

8 मार्च 1986 से 6 जून 1986 के बीच मुस्लिम दंगाइयों ने धर्म के आधार पर कुल 7 हिंदुओं की हत्या की:
(i) प्रदीप रस्तोगी
(ii) भगवत शरण रस्तोगी
(iii) सीताराम (मोतीराम के पुत्र)
(iv) ओमिशंकर (छेदलाल के पुत्र)
(v) मास्टर कृपाल सिंह
(vi) एक अन्य हिंदू (शिवरात्रि के जुलूस वाले दिन रास्ते में हत्या)
(vii) एक अन्य हिंदू (मनोकामना मंदिर के पास हत्या)

3 महीने तक चले इन दंगों के संबंध में 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 250 लोगों को निवारक कार्रवाई के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा, विजय प्रकाश त्यागी, रहीसुर्रहमान और तस्दीक इलाही के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया। 1976 और 1980 की तरह ही ‘संतुलन बनाने वाले फॉर्मूला’ के तहत ही विजय प्रकाश त्यागी को हिरासत लिया गया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हालाँकि इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी दौरान श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन में पूर्व विधायक महेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक जुलूस निकाला। इसके विरोध में 2 नवंबर 1990 (शुक्रवार, जुमे के ही दिन) को, नखासा क्रॉसिंग पर बड़ी संख्या में सशस्त्र मुस्लिम भीड़ एकत्र हो गई, जबकि धारा 144 लागू थी। भीड़ “नारा-ए-तकबीर”, “अल्लाह हू अकबर” और “हिंदुओं को मारो” जैसे नारे लगा रही थी।

पुलिस उस भीड़ को काबू नहीं कर पाई। हिंसा भड़क उठी। भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, जिसमें दो सिपाही घायल हो गए। इसके बाद पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। 9 नवंबर 1990 को अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि में नींव स्थापना का समारोह हुआ। संभल में इसके बाद सांप्रदायिक विभाजन और बढ़ गया।

6 दिसंबर 1992 बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिरा दिया गया। संभल के मुस्लिम इससे भड़क उठे। बदला लेने के लिए लगभग 20000 मुसलमान नखासा तिराहा और छग्गल की कोठी पर एकत्र हो गए।

7 दिसंबर को इस मुस्लिम भीड़ ने पक्का बाग पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। इनका आरोप था कि पुलिस हिंदुओं का समर्थन कर रही है। मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, गोलीबारी भी की। इसमें पीएसी के 4 सिपाही घायल हो गए। तब जाकर इंस्पेक्टर अरविंद कुमार ने आत्मरक्षा में गोली चलाई और भीड़ तितर-बितर हो गई।

8 दिसंबर को लेकिन मुस्लिम दंगाई शांत नहीं बैठे। फिर से हिंसा शुरू की। चौधरी सराय के पास 2 हिंदुओं की हत्या इन लोगों ने कर दी।

22 दिसंबर को हयातनगर में 3 अन्य हिंदू पीड़ितों के शव बरामद हुए। मतलब 8 से 22 दिसंबर तक संभल शांत था, ऐसा नहीं है। मुस्लिम भीड़ हिंसा की ताक में थी, बाबरी ढाँचे (मस्जिद) को गिराए जाने के जवाबी फिराक में तैयार बैठी थी।

2 मार्च 1995 को संभल में फिर से दंगा भड़क उठा। रुक्नुद्दीन सराय या मंडीसराय में बाहर से आए 2 हिंदुओं की हत्या कर दी गई। पुलिस-प्रशासन को व्यवस्था बहाल करने के लिए 8 दिनों का कर्फ्यू लगाना पड़ा था।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ वर्ष 2019 में संभल में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। सरायतरिन और दीपा सराय जैसे इलाकों से हजारों की संख्या में मुस्लिम भीड़ नगर पालिका मैदान में एकत्रित हुई। यह शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नहीं था, यह आए थे अपने स्ट्रीट-पावर को दिखाने।

भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। देखते-देखते रोडवेज की 2 बसों को आग लगा दी। कुछ देर में गोलीबारी भी शुरू कर दी। इस बार हालाँकि हिंसा में 2 मुस्लिमों की ही मृत्यु हुई।

इसके बाद शफीकुर रहमान बर्क के नेतृत्व में मुस्लिम महिलाओं (एकदम दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर) ने पक्का बाग, थाना नखासा में दो महीने तक धरना दिया। इसको बड़ा मुद्दा बनाने के लिए इसमें संभल के बाहर से विभिन्न मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने भाग लिया। तब तक हालाँकि COVID-19 महामारी आ चुकी थी। इसके कारण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ। तब जाकर यह विरोध-प्रदर्शन समाप्त हुआ।

विवादित शाही जामा मस्जिद के भीतर हरिहर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं? इसके संबंध में संभल न्यायालय में एक याचिका डाली गई। कोर्ट ने सुनवाई के बाद सर्वे का आदेश दे दिया। लेकिन यह समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल को रास नहीं आया। उन्होंने अपने-अपने समर्थकों को जमा किया, उन्हें भड़काया।

19 नवंबर 2024 को मस्जिद के भीतर जब सर्वे करने सरकारी टीम पहुँची तो इन लोगों ने वहाँ स्थानीय मुस्लिमों को फिर से भड़काया। धमकी देते हुए सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाई और अंततः उस दिन सर्वे पूरा होने नहीं दिया। 22 नवंबर को शुक्रवार यानी जुमे के दिन औसतन भीड़ से कहीं ज्यादा नमाजियों की भीड़ शाही जामा मस्जिद में नमाज के लिए पहुँचती है। यह स्वाभाविक नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए इस भीड़ को साजिशन बुलाया गया था। नमाज के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर भड़काऊ भाषण भी दिया।

अंततः जब 24 नवंबर 2024 को मस्जिद के शेष सर्वे के लिए सरकारी टीम फिर से आती है, तो इन लोगों पर जानलेवा हमला किया जाता है। पत्थरबाजी-गोलीबारी की जाती है। इस दंगे में पुलिस अधिकार कई सहित पुलिसकर्मी घायल होते हैं। मुस्लिमों की आपसी रंजिश के कारण हालाँकि इस फसाद में मौत 4 मुस्लिमों की ही होती है।

‘आजाद भारत में क्यों नहीं फले-फूले संभल के हिंदू’ – अगर हम वापस इस सवाल पर आते हैं तो ऊपर दर्ज 16 दंगे इसका एक प्रमुख कारक दिखते हैं। समय-दर-समय कोई भी समाज हमेशा डर और खौफ के साये में जी नहीं सकता। संभल के हिंदुओं का पलायन आजादी के बाद भी नहीं रुका, क्योंकि दंगों को रोकने या दंगाइयों पर अंकुश लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ प्रशासनिक मनोबल भी न के बराबर था।

2017 के बाद हालाँकि वातावरण बदल गया उत्तर प्रदेश शासन का। तभी 2019 और 2024 के दंगों का विवरण उसके पहले हुए बाकी के अन्य 14 दंगों से अलग पढ़ने को मिलेगा। इतना ही नहीं, योगी सरकार ने संभल में ऐसे हिंदुओं को वापस लाने के लिए भी पहल शुरू कर दी है, जो दंगों के भय से पलायन कर गए थे, जिनकी जमीनें मुस्लिमों ने कब्जा कर रखी थीं। इन हिंदुओं को फिर से उनकी जमीनों का मालिकाना हक दिलाया गया है।

हिंदुओं का पलायन, मुस्लिम आबादी बढ़ी: संभल में आतंकी पैठ का कारण

सरकारी आँकड़े मतलब जनगणना से यह तो स्पष्ट हो गया कि संभल में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं की तुलना में हद से ज्यादा बढ़ी है। हिंदू आबादी क्यों नहीं बढ़ी, क्यों इनका समय-समय पर पलायन हुआ – यह 1924 से लेकर 2024 तक हुए दंगों से परिलक्षित है। लेकिन इस डेमोग्राफी चेंज के कारण संभल में एक और बदलाव हुआ – आतंकी संगठनों की पैठ यहाँ आसान हुई। कैसे? आयोग की रिपोर्ट में इसका भी जिक्र है। पुलिस अधिकारियों ने रिकॉर्ड के साथ इस संबंध में अपने-अपने बयान दर्ज करवाए हैं।

2024 में हुए संभल दंगों की जाँच वाले आयोग को बयान देते हुए तब के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बताया कि सांप्रदायिक दंगों के लंबे इतिहास के कारण संभल शहर में हिंदू आबादी लगातार घटी है और अब यह लगभग 20 प्रतिशत से कम रह गई है। इसके कारण मुस्लिमों में न सिर्फ मजहबी उग्रवाद बढ़ा बल्कि मजहबी उग्रवाद को बढ़ावा देने और उकसाने वाले तत्वों को बल भी मिला। इसी कारण से यहाँ आतंकवादी संगठनों ने पैठ जमाई। इनमें प्रमुख हैं:

(i) अल-कायदा (इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट – AQIS: Al-Qaeda in the Indian Subcontinent)
(ii) हरकत-उल-मुजाहिदीन
(iii) एसोसिएशन ऑफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (SAMU ISIS: Students of Aligarh Muslim University connection with ISIS)
(iv) प्रतिबंधित संगठन सिमी

उपरोक्त सभी संगठनों के संभल जिले में सक्रिय होने की जानकारी सामने आई है, यह संभल के तात्कालिक एसपी कृष्ण कुमार का बयान है। इनके अलावा श्रीश्चंद [संभल जिला (उत्तरी) में तब पदस्थापित रहे अपर पुलिस अधीक्षक] ने भी इन संगठनों के संभल से ऑपरेट करने का बयान दर्ज करवाया है। संभल के अत्यधिक संवेदनशील नखासा पुलिस स्टेशन में तैनात सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह फैसल का बयान इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि वो खास उसी इलाके की बात कर रहे हैं, जहाँ पर से इन आतंकी संगठनों के गुर्गे ऑपरेट करते हैं। सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल ने आयोग को बताया:

“मैं नखासा पुलिस स्टेशन में दीपासराय चौकी इंचार्ज के रूप में तैनात हूँ। यह चौकी राजनीतिक, सांप्रदायिक और आपराधिक दृष्टिकोण से अत्यधिक संवेदनशील है। चौकी क्षेत्र में अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के सदस्य रहते हैं। वर्ष 1976 की घटना (दंगे) के बाद से संभल क्षेत्र लगातार तनावपूर्ण रहा है।”

अब ऐसा सवाल कोई कर सकता है, और यह सवाल जायज भी है कि क्या सिर्फ पुलिस वालों के बयान के आधार पर ही यह मान लिया जाए कि सच में संभल शहर में अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों ने अपनी पैठ बना ली है? क्या सच में यहाँ अल-कायदा और ISIS जैसे आतंकी संगठनों के सदस्य रहते हैं?

इस सवाल का जवाब है – 2024 में संभल में हुए दंगों से बरामद हथियार। एक-एक हथियार की छानबीन की गई। सबको रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। फिर आयोग के सामने भी इनसे संबंधित बयान दर्ज किए गए। संभल में रहने वाला एक आम मुस्लिम के पास (अगर वो मजहबी तौर पर भड़का दिया गया हो तो) दंगा के समय चाकू मिल सकता है, देसी गोली-कट्टा-बम आदि-इत्यादि मिल सकते हैं – इसकी संभावना है। लेकिन मिले क्या-क्या हैं, जरा इसकी लिस्ट देखिए:

(i) 9 एमएम कारतूस, जिस पर POF मतलब पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री का चिह्न बना था
(ii) 12-बोर कारतूस, जिस पर लिखा था – Made in USA

संभल से कोई आम मुस्लिम नागरिक अमेरिका या पाकिस्तान जाकर तो लाया नहीं होगा इन हथियारों को। आया होगा आतंकी रास्ते से ही। लाया या मँगवाया गया तो कहीं न कहीं रखा भी गया होगा। आखिर कहाँ? उन्हीं विदेशी आतंकी संगठनों के गुर्गों के यहाँ, जिसकी बात संभल एसपी कृष्ण कुमार से लेकर चौकी इंचार्ज सब-इंस्पेक्टर शाह फैसल तक कर चुके हैं।

जिस शाही जामा मस्जिद के लिए मजहबी सनक, आखिर क्या है उसका इतिहास

2024 में संभल में हुए दंगे की जाँच करने वाली आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया है कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में हरि मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर ही शाही जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा बनाया गया। आयोग के अनुसार दोनों संप्रदायों (हिंदू-मुस्लिम) के बीच विवाद का मूल यही है।

अगर यह विवाद का मूल है, तो समाधान भी इसी से निकलेगा। और समाधान है इतिहास को खँगालना। विवादित जामा मस्जिद के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानने के लिए आयोग ने मुरादाबाद के गजेटियर और इस संबंध में उपलब्ध विभिन्न रिकॉर्ड्स का अध्ययन भी किया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इतिहासकारों के अनुसार संभल प्राचीन काल में हिंदुओं के लिए पवित्र स्थान माना जाता था। यहाँ स्थित पुराने शहर के केंद्र में कोट के नाम से प्रसिद्ध बड़े टीले पर भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध मंदिर (हरि मंदिर) था। विभिन्न समय-काल और विभिन्न स्वरूपों में इसके निर्माण का श्रेय पृथ्वी राज, राजा जगत सिंह और राजा विक्रम सेन के परपोते नाहर सिंह को दिया जाता है।

आयोग ने स्पष्ट लिखा है कि यह मंदिर अब मौजूद नहीं है और इसकी जगह एक बहुत ही प्रभावशाली मस्जिद ने ले ली है, जो आसपास के परिदृश्य में मीलों तक एक प्रमुख विशेषता बन गई है। इस मस्जिद की स्थलाकृति का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि यह भवन मुख्य रूप से पत्थर का है। केंद्रीय गुंबद, बाहरी दीवारें, पोर्च और विशाल आंगन के फर्श के लिए पत्थर का ही उपयोग किया गया है।

ब्रिटिश काल में इस विवादित मस्जिद को लेकर पुरातत्वविदों की क्या राय थी, आयोग ने इसे भी दर्ज किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि हरि मंदिर-जामा मस्जिद को लेकर तब भी मुकदमेबाजी हुई थी। इसी सिलसिले में साल 1874 में कार्लाइल (Archibald Campbell Carlleyle) नाम के एक पुरातत्वविद ने इस मस्जिद का निरीक्षण किया था।

निरीक्षण के बाद कार्लाइल ने यह निष्कर्ष निकाला था कि मस्जिद का मुख्य गुंबद हिंदू कारीगरी का है, लेकिन उसके साइड से बने स्ट्रक्चर में छोटी मुसलमानी ईंटों का काम है। तब कार्लाइल ने यह भी लिखा था कि मस्जिद का पूरा हिस्सा प्लास्टर से ढका हुआ है, इसलिए उसके अंदर की सामग्री का पता लगाना असंभव है। उन्होंने यह भी नोट किया था कि मस्जिद की दीवारों पर दर्ज पुरानी लिखावटें ऑरिजिनल नहीं हैं बल्कि इसके मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ कर साजिश के तहत, फर्जीवाड़ा करके बाद में लिखा गया है।

अंत में कार्लाइल ने अपना निष्कर्ष लिखा था कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित हाल में किया गया है। साथ ही यह भी लिखा था कि मस्जिद का इतिहास जो भी हो, पूर्व में हिंदू अधिग्रहण के कई निशान इस मस्जिद में अभी भी मौजूद हैं।

पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने हालाँकि कार्लाइल के तर्क को खारिज कर दिया था। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ कि फील्ड से लाए गए डेटा को एसी कमरे में बैठे-बैठे खारिज करना। वैसे भी टॉप पर बैठा कोई ब्रिटिश अधिकारी यह क्यों चाहता कि किसी मस्जिद के नाम पर हिंदू-मुस्लिम में अगर तनाव हो तो उसका हल खोजा जाए, इससे तो उनकी ‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति ही समाप्त हो जाती।

अब जरा नजर डालते हैं इतिहासकारों ने क्या लिखा है संभल जामा मस्जिद को लेकर। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस संदर्भ को भी डाला है, जो बहुत जरूरी था। रिपोर्ट के अनुसार भारत के जाने-माने इतिहासकारों ने आइन-ए-अकबरी और बाबरनामा किताबों के आधार पर बताया है कि विवादित स्मारक हरिहर मंदिर के खंडहरों पर साल 1526 में बाबर के आदेश पर हिंदूबेग नाम के शख्स ने बनवाया था। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि बाबरनामा और आइन-ए-अकबरी किसी हिंदू इतिहासकार ने नहीं लिखी थी। बाबरनामा बाबर की आत्मकथा है जिसे खुद बाबर ने लिखा था और आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फ़ज़ल हैं।

इन इतिहासकारों ने जो इतिहास दर्ज किया है, उससे भी ब्रिटिश पुरातत्वविद कार्लाइल द्वारा दिए गए निष्कर्ष को बल मिलता है कि मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित किया गया था।

‘यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी’: संभल दंगे की न्यायिक जाँच आयोग रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का जिक्र 100+ बार, 199 साक्षियों से पूछताछ, खुद के बयान भी विरोधाभासी

“यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी” – यह कहा था समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने। और यह कहा गया था उत्तर प्रदेश के संभल में जमा हुई मुस्लिम भीड़ के सामने। फिर यही भीड़ 24 नवंबर 2024 को दंगा करती है। भीड़ के निशाने पर होती है संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने गई टीम। इस टीम में पुलिस-प्रशासन-न्यायालय के लोग थे। और इनको यह काम सौंपा था कोर्ट ने। ताकि पता लगाया जा सके कि मस्जिद के भीतर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं। लेकिन इस सरकारी काम के आड़े आ गया एक सांसद और भीड़ को उकसाने के लिए दिया गया उसका नारा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” अब जब संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट आई है तो सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का इसमें 100 बार से भी अधिक जिक्र (PDF पेज 3 से लेकर PDF पेज 365 तक) किया गया है।

संभल दंगों की जाँच को लेकर न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट (हिंदी वाली) कुल 369 PDF पेज की है। 100 से ज्यादा बार सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का नाम इसी रिपोर्ट में दर्ज है। और यह हवा-हवाई नहीं है। सिर्फ पुलिस या प्रशासन के लोगों द्वारा लगाए गए आरोप नहीं हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और गवाहों के आधार पर इनका नाम लिखा गया है। वीडियो, ऑडियो, डिजिटल हिस्ट्री, वॉट्सऐप चैट्स, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट सहित राष्ट्रीय व स्थानीय मीडिया कवरेज जैसे तमाम सबूतों के साथ सांसद महोदय का नाम दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट की शुरुआत होती है 3 पन्नों की प्रस्तावना से। प्रस्तावना के पॉइंट 5 में यह स्पष्ट लिख दिया गया है कि कैसे जिया-उर-रहमान बर्क और इनके समर्थकों के कारण 19 नवंबर 2024 को संभल स्थित शाही जामा मस्जिद का सर्वे पूरा नहीं किया जा सका। मतलब यह रिपोर्ट शुरू भी होती है बर्क से और अंत भी इसी नाम के साथ।

24 नवंबर 2024 को दंगा… षड्यंत्र रचा था 19 नवंबर को ही

19 नवंबर 2024 को मंगलवार था। तिथि के साथ-साथ दिन भी जरूरी है, यह थोड़ी देर में स्पष्ट हो जाएगा। मंगलवार को सबको सूचित (संभल स्थित जामा मस्जिद की प्रबंध समिति और उनके अध्यक्ष तक को) करके मस्जिद का सर्वे करने जाती है टीम। साथ में पुलिस-प्रशासन भी, कवरेज के लिए मीडिया भी। इससे पहले कि सर्वे पूरा होता, भारी संख्या में मुस्लिम भीड़ मस्जिद को चारों तरफ से घेर चुकी थी। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों की भीड़ लेकर मस्जिद पहुँच गए थे। माहौल तनावपूर्ण हो गया था। शाम में रोशनी की कमी और अनियंत्रित भीड़ के बढ़ते दबाव के कारण सर्वे उस दिन स्थगित करना पड़ा।

3 दिन के बाद आया 22 नवंबर 2024। दिन शुक्रवार। मतलब जुम्मे की नमाज। मुस्लिमों को तब तक भड़काया जा चुका था। संभल जामा मस्जिद के अंदर और उसके आसपास माहौल तनावपूर्ण था। हर शुक्रवार को जितने नमाजी इस मस्जिद में आते थे, उससे कहीं अधिक और असामान्य भीड़ इस दिन नमाज के लिए जमा थी। इसी भीड़ में संभल के सांसद भी थे, मतलब जिया-उर-रहमान बर्क। इन सबको देखते हुए, कानून और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था। कायदे से होना यह चाहिए था कि एक नेता के तौर पर बर्क को पुलिस-प्रशासन का साथ देना चाहिए था, भीड़ के गुस्से को दूर करने का प्रयास किया जाता… लेकिन किया गया ठीक इसके उल्टा।

नमाज के बाद सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद से बाहर निकल कर मीडिया से बातचीत की। मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देने के बहाने मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए कहा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” इस भड़काऊ भाषण से भीड़ को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गया – जामा मस्जिद का जब भी शेष सर्वे किया जाएगा, उसके लिए तैयार रहो। ठीक 2 दिन बाद भीड़ ने वैसा ही सुलूक किया, जिस अंदाज में सांसद ने भड़काया था।

23 नवंबर को सपा सांसद की राजनीतिक हार, 24 नवंबर को संभल में दंगा

22 नवंबर के ठीक एक दिन बाद 23 नवंबर 2024 को एक और घटना हुई, जो सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क से संबंधित थी। इस घटना का जामा मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसने बर्क के समर्थकों के लिए आग में घी का काम किया।

सांसद बनने से पहले बर्क कुंदरकी विधानसभा के विधायक थे। यहाँ उपचुनाव करवाना पड़ा था क्योंकि विधायक रहते हुए इन्होंने सांसदी का चुनाव लड़ा था, जीता था। उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बुरी तरह हार गए और यह नतीजा आया था 23 नवंबर 2024 को। मतलब एक दिन पहले सांसद बर्क ने मुस्लिमों का रहनुमा बन कर उनको जामा मस्जिद के सर्वे के खिलाफ भड़काया, दूसरे ही दिन एक तरह से उनको और उनकी समाजवादी पार्टी को राजनीतिक हार का सामना करना पड़ा।

जामा मस्जिद के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने शेष सर्वे के काम को संपन्न करने के लिए संभल के जिलाधिकारी (डीएम) से 23 नवंबर 2024 को अनुमति माँगी। 4 दिन पहले 19 नवंबर को सर्वे के दौरान जिस तरह की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई थीं, उनको ध्यान में रखते हुए उचित पुलिस व्यवस्था का अनुरोध भी उन्होंने किया। प्रशासन की तरफ से शेष सर्वे की अनुमति मिली, दिन तय हुआ – 24 नवंबर का। इसके बाद 23 नवंबर की रात को ही संभल के एसडीएम/सीओ ने जामा मस्जिद के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली को इसकी सूचना दे दी थी, ताकि वो मस्जिद प्रबंध समिति के साथ शेष सर्वे के वक्त मौजूद रहें, भीड़ को नियंत्रित करें। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क को भी सूचित किया गया था, जो उस समय बेंगलुरु में थे। संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल के साथ-साथ मस्जिद समिति के अन्य सदस्यों को भी रात में ही सूचित कर दिया गया था।

भीड़ नियंत्रण के लिए संवेदनशील स्थानों पर बैरिकेडिंग, पैरा-मिलिट्री कंपनियों की तैनाती, जामा मस्जिद में खुद संभल के डीएम-एसपी की मौजूदगी – मतलब पुलिस-प्रशासन ने भी शेष सर्वे के लिए हर संभव तैयारियाँ की थीं। लेकिन जैसे ही सर्वे शुरू हुआ, मजहबी नारों के साथ मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद को घेर लिया। पथराव की शुरुआत के साथ भीड़ धीरे-धीरे और हिंसक होती चली गई। कई वाहनों में दंगाई भीड़ ने आग लगा दी। कुछ जगहों पर पुलिस दल पर हमला किया गया, उनके सरकारी हथियार छीन लिए गए। पत्थरबाजी के कारण कई पुलिस अधिकारी और जवान गंभीर रूप से घायल भी हुए। आत्मरक्षा में पुलिस ने भी लाठीचार्ज किया, आँसू गैस, मिर्च बम और रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल किया गया।

इस बीच सर्वे टीम को सर्वेक्षण पूरा करने के बाद जामा मस्जिद से सुरक्षित निकाल कर संभल पुलिस स्टेशन तक हिंदू मोहल्ले के रास्ते बचते-बचाते लाया गया। पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी और पर्याप्त बैरिकेडिंग के कारण दंगाई हिंदू मोहल्ले में प्रवेश नहीं कर पाए। इससे दंगा जामा मस्जिद के आसपास ही सीमित रहा, नियंत्रित कर लिया गया। हालाँकि दंगाइयों ने 4 लोगों (अयान, नईम, बिलाल, मोहम्मद कैफ) को मार डाला। इस दंगे से संबंधित कुल 12 FIR संभल कोतवाली और नखासा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है, जसमें 7 पुलिस की और से है, जबकि 5 अन्य निजी व्यक्तियों द्वारा दर्ज करवाई गई है।

जिया-उर-रहमान बर्क के भड़काऊ भाषण/धमकी

1.
“यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

2.
“मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।”

3.
“जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

4.
“पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

5.
“जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”

6.
“आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

7.
“जो भी तमाशा करना चाहते हो, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

8.
“हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”

9.
“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने धर्म का पालन करें और अपने धार्मिक स्थलों की रक्षा करें। जिस तरह से यहाँ संविधान का गला घोंटा जा रहा है, जिस तरह सरकार संविधान को तार-तार कर रही है; हम इस मस्जिद के लिए लड़ने के लिए तैयार हैं। इंशाल्लाह, हम हमेशा जामा मस्जिद की हर तरह से रक्षा करने के लिए मौजूद रहेंगे। हम 1947 से पहले हमारे राज्य और देश में मौजूद धार्मिक स्थलों और मस्जिदों को किसी को लेने नहीं देंगे।”

10.
“बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

11.
“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

24 नवंबर 2024 को संभल में हुआ दंगा सुनियोजित था। विवादित जामा मस्जिद के सर्वेक्षण को लेकर कोर्ट के आदेश के बावजूद समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने इसके लिए साजिश रची थी। भड़काऊ भाषण, मजहबी नारों आदि से उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसके लिए उकसाया था। इस संदर्भ में तमाम गवाहों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर उनके खिलाफ FIR भी दर्ज किया गया है:
– अपराध संख्या 335/2024 (थाना: संभल, जिला संभल): स्टेट बनाम जियाउर रहमान बर्क और एक अन्य नामजद, साथ ही 700-800 अज्ञात व्यक्ति
– इस मामले में 23 आरोपितों के खिलाफ चार्ज-शीट नंबर 96/2025 न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका है, शेष आरोपितों के खिलाफ जाँच जारी है।

सपा सांसद बर्क के विरोधाभासी बयान

संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग के समक्ष स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने भी अपनी गवाही दी है। पूरी गवाही में उन्होंने खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की है। अपने ऊपर लगे किसी भी तरह के आरोपों से इनकार किया है। लेकिन कुछ तथ्य और गवाह ऐसे हैं, जो सांसद द्वारा दी गई गवाही से विरोधाभास रखते हैं।

(i) सांसद बर्क के अनुसार वो 19 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान अकेले जामा मस्जिद में प्रवेश किए, समर्थकों के बिना। पुलिस-प्रशासन से जुड़े 10 लोगों की गवाही इससे विपरीत है। कोर्ट कमिश्नर और उनके कैमरामैन की गवाही में भी यह बात स्पष्ट है कि सांसद भीड़ के साथ मस्जिद में घुसे। वादी पक्ष के अधिवक्ताओं, सरकारी अधिवक्ताओं के साथ-साथ महंत श्री ऋषिराज गिरी ने भी सांसद को भीड़ के साथ मस्जिद में प्रवेश करने की गवाही दी है। सबसे दिलचस्प है जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली की गवाही। इन्होंने भी आयोग को बताया है कि 19 नवंबर को सांसद जिया-उर-रहमान बर्क अपने समर्थकों के साथ मस्जिद में आए।

(ii) सांसद बर्क ने आयोग को बताया कि 19 नवंबर 2024 को उन्होंने मीडिया से बात की, ऐसा उन्हें याद नहीं। जब उन्हें वीडियो रिकॉर्डिंग दिखाई गई, तब उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। आश्चर्यजनक यह है कि स्थानीय सांसद के अलावा जितने भी लोगों ने (मस्जिद समिति के लोगों ने भी) आयोग के सामने अपने बयान दर्ज करवाए, सबने बर्क द्वारा मीडिया से बात करने वाली बात बताई – यहाँ तक की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली ने भी।

(iii) ‘मन्नत’ वॉट्सऐप ग्रुप और ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए मैसेज (22 नवंबर को जुमे की नमाज के लिए जामा मस्जिद में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुँचे, किसी और मस्जिद न जाएँ) के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि वो जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए ऐसे ग्रुपों को छोड़ नहीं सकते लेकिन ऐसा कोई भी मैसेज उन्होंने पढ़ा नहीं है।

(iv) 22 नवंबर 2024 के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि उस दिन जुमे की नमाज के बाद उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था बल्कि वहाँ मौजूद मीडिया के सवालों का सिर्फ जवाब दिया था। अगर ये भाषणबाजी नहीं कर रहे थे, भीड़ को उकसा नहीं रहे थे, तो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली को अपनी गवाही में यह क्यों कहना पड़ा – “जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।”

इसके अलावा मशहूद अली फारूकी, जो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य और अधिवक्ता हैं, उन्होंने अपनी गवाही में यह क्यों लिखवाया – “22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।”

सांसद बर्क मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों का सिर्फ जवाब दे रहे थे, आयोग ने इसके विपक्ष में उन्हें एक वीडियो क्लिप दिखाई। यह वीडियो 22 नवंबर को ही इंडिया टीवी पर प्रसारित की गई थी। इस क्लिप में वहाँ मौजूद मीडिया कोई भी सवाल नहीं कर रही थी, केवल सांसद बोल रहे थे.

(v) 24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण होगा, इसकी जानकारी सांसद बर्क को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने फोन पर दी। आयोग के सामने इस बात पर सांसद ने सहमति जताई। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी सांसद बर्क ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर किया था, जिसमें कहा गया था – “24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।”

(vi) सांसद बर्क ने जफर अली से 23-24 नवंबर 2024 की रात कई बार बात की, इस तथ्य से सांसद ने इनकार किया। जबकि विरोधाभास यह है कि सांसद बर्क ने 23 नवंबर की रात 11:04 बजे जफर अली को कॉल किया। फिर सांसद बर्क से जफर अली को रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुई है। इसमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। यह सब कुछ CDR में दर्ज है, वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी।

संभल सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के खिलाफ गवाही

गवाह नंबर 1 – जिला मजिस्ट्रेट संभल, डॉ राजेंद्र पेंसिया:

सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क की संलिप्तता (भीड़ को उकसाना, मस्जिद के भीतर जबरन घुसना और सर्वे करने गई टीम को धमकाना) को लेकर आयोग की रिपोर्ट में सबसे पहली गवाही संभल जिला मजिस्ट्रेट डॉ राजेंद्र पेंसिया की है। इनके अनुसार 19 नवंबर 2024 को सांसद बर्क ने स्थानीय विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल) के साथ 200 लोगों की भीड़ का नेतृत्व किया, पुलिस को धक्का देकर जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। इन लोगों ने सर्वे को बाधित किया और धमकियाँ भी दीं।

जिले में धारा 163 (BNSS) लागू होने के बावजूद 3 दिन बाद 22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई, विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए भड़काऊ बयान दिया।

23 नवंबर 2024 को कुंदरकी उप-चुनाव में जब समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी हार गया तो सांसद बर्क ने इसके लिए भी पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया, “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या” जैसे शब्दों की प्रयोग कर अपने समर्थकों को भड़काया, हिंसा के लिए अनुकूल वातावरण बनाया।

गवाह नंबर 2 – अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट संभल, प्रदीप वर्मा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

गवाह नंबर 3 – उप-जिलाधिकारी संभल, डॉ वंदना मिश्रा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई। साथ ही विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकत्र होने का भड़काऊ बयान दिया।

यह सब कुछ संभल की उप-जिलाधिकारी डॉ वंदना मिश्रा की आँखों के सामने हुआ क्योंकि उस दिन शुक्रवार की नमाज को शांतिपूर्वक कराने की प्रशासनिक जिम्मेदारी इनको दी गई थी। इनके अनुसार सांसद बर्क ने 22 नवंबर को एक नहीं बल्कि 2 बार प्रेस से बात की – एक बार मस्जिद की सीढ़ियों पर, दूसरी बार अपनी गाड़ी के पास पहुँच कर। इन्होंने मामला अदालत में लंबित होने के कारण सांसद से किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करने का 3 बार अनुरोध भी किया, लेकिन वो नहीं माने।

संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा के अनुसार पूरी घटना पूर्व-नियोजित थी। इसका उद्देश्य शहर में भय का माहौल बनाना और सर्वेक्षण टीम को अपना काम पूरा करने से रोकना था। साथ ही भविष्य में भी ऐसी किसी टीम को किसी भी तरह के सर्वेक्षण करने से रोकना था।

गवाह नंबर 4 – अधिशासी अधिकारी, संभल नगर पालिका, मणिभूषण तिवारी:

मणिभूषण तिवारी संभल के जिलाधिकारी द्वारा गठित 3 सदस्यीय समिति में थे। 19 नवंबर को जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इनकी मौजूदगी में सांसद, विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल)ने सर्वेक्षण कार्य में बाधा पहुँचाई। 24 नवंबर के दंगों के बाद की स्थिति (पत्थरबाजी के कारण) ऐसी थी कि नगर पालिका की टीम को मलबा हटाने में 4-5 दिन लग गए। कुल 6 ट्रॉली ईंट-पत्थर-मलबा हटवाया गया।

गवाह नंबर 5 – संभल पुलिस अधीक्षक, कृष्ण कुमार:

19 नवंबर को जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने जब सर्वे टीम पहुँची, तो संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल अपने 200 समर्थकों के साथ मस्जिद में मौजूद थे। इसके 30 मिनट के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों के साथ पहुँच गए। उन्हें धारा 163 BNSS के बारे में सूचित किया गया, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया और 10-15 समर्थकों के साथ जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। उन्होंने सर्वे टीम से कहा – “आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। शाम के वक्त अंधेरा होने और बार-बार व्यवधान के कारण सर्वे का काम उस दिन स्थगित कर दिया गया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने पत्रकारों को सर्वेक्षण की जानकारी दी। सांसद बर्क ने भी इस समय मीडिया से बातचीत की। भीड़ एकत्र करके सर्वे को सफलतापूर्वक बाधित करने के बाद सांसद बर्क और मस्जिद समिति का आत्मविश्वास बढ़ा। इसी आत्मविश्वास के कारण इन लोगों ने आगे की साजिश रची।

जिले में धारा 163 BNSS लागू थी। इसके बावजदू 21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ के नाम से बने वॉट्सऐप ग्रुप में अब्दुल्ला और कासिफ हुसैन नाम के दो व्यक्तियों ने एक मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था – “संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।” इसी तरह का मैसेज ‘मन्नत’ नामक एक वॉट्सऐप ग्रुप के माध्यम से किया गया ताकि शुक्रवार की नमाज के लिए शाही जामा मस्जिद में बड़ी भीड़ एकत्र हो।

22 नवंबर को जामा मस्जिद में भीड़ को सुनियोजित ढंग से एकत्रित किया गया। सांसद बर्क और संभल विधायक का घर जामा मस्जिद से 2 किलोमीटर दूर है, वो आमतौर पर अपने-अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं लेकिन 22 नवंबर (शुक्रवार) को सांसद बर्क के साथ-साथ संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल ने अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करने के बजाय जामा मस्जिद आकर नमाज पढ़ी। इतना ही नहीं, सांसद बर्क ने धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मजहबी भावनाओं को भड़का कर भीड़ को उकसाया भी। साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेस भी आयोजित की। मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा – “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

इन उकसाने वाले बयानों को समर्थकों ने वॉट्सऐप ग्रुपों और अन्य माध्यमों से प्रसारित किया ताकि लोगों को भड़काया जा सके। ऐसा सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि यदि सर्वेक्षण फिर से शुरू हुआ तो इसे किसी भी कीमत पर रोका जाए। राजनीतिक लाभ के इरादे से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर न्यायालय के आदेश से असहमति भी व्यक्त की, साथ ही समुदाय विशेष (मुस्लिमों) को इसके लिए उकसाया भी।

प्रेस को संबोधित करते हुए सांसद बर्क ने भड़काऊ भाषण भी दिया। इस भाषण से वहाँ खड़ी भीड़ को यह संदेश गया कि सर्वेक्षण के माध्यम से जामा मस्जिद को हड़पने की कोशिश की जा रही है। इसके फलस्वरूप 24 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान हिंसक घटनाएँ हुईं। 22 नवंबर को सांसद बर्क के कार्यों के संबंध में 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस भी जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी उप-चुनाव के परिणाम घोषित हुए। यहाँ से जिया-उर-रहमान बर्क पहले विधायक थे, जो सीट उनके सांसद बनने के बाद खाली हो गई थी। समाजवादी पार्टी इस सीट पर हार गई, निश्चित ही यह चुनाव परिणाम सांसद बर्क की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। इस बात को लेकर भी उन्होंने पुलिस और प्रशासन को हार के लिए दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण फिर से शुरू किया जाएगा, इसकी सूचना 23 नवंबर की शाम को मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली को उनके निवास पर दी गई। इसके बाद जफर अली ने 23 नवंबर की रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है। चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।

सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।

“24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।” – इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सांसद बर्क ने यह जो शपथ-पत्र दायर किया है, वो पूरी तरह से असत्य है। पुलिस पर दबाव डालने, झूठे और गंभीर आरोप लगाते हुए 25 नवंबर को जफर अली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़े गए हैं। जबकि सत्य यह है कि सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के साथ मिलकर जफर अली ने सर्वे को रोकने के लिए साजिश रची। इसके संबंध में संभल कोतवाली पुलिस स्टेशन में सांसद बर्क और सुहेल इकबाल के खिलाफ क्राइम नंबर 335/24 दर्ज किया गया है।

गवाह नंबर 6 – श्रीश्चंद, संभल अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी):

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों की भीड़ जामा मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई। इन लोगों ने नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। सर्वे के दौरान व्यवधान किए गए, इसलिए कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी।

22 नवंबर को संभल सांसद ने बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के (पहले से लागू धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए) दोपहर लगभग 1 बजे बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद पहुँचे। सामान्य रूप से सांसद जामा मस्जिद में नमाज नहीं अदा करते और अपने क्षेत्र दीपा सराय में नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद उन्होंने जामा मस्जिद के मुख्य गेट की सीढ़ियों पर खड़े होकर प्रेस/मीडिया के व्यक्तियों को संबोधित किया। इस पर प्रशासन के अनुरोध के बावजूद उन्होंने अपना संबोधन जारी रखा, जिसमें उन्होंने कहा – “पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

सांसद बर्क ने इसके अलावा खुद को सर्वेक्षण का कर्ताधर्ता बताते हुए यह भी घोषणा कर दी कि सर्वे में मस्जिद के अलावा कुछ नहीं मिला है। वहाँ मौजूद अधिकारियों ने सांसद को फिर से अनावश्यक भीड़ जमा करने से बचने का अनुरोध किया क्योंकि धारा 163 BNSS लागू थी, जिसके बाद वे पास के एक मैदान में चले गए और वहाँ जाकर एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान सांसद ने न्यायालय के आदेश से अपनी असहमति व्यक्त की और एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने के लिए बोला। उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए भीड़ को उकसाया भी। परिणामस्वरूप संभल का माहौल संवेदनशील से अत्यधिक संवेदनशील हो गया। 22 नवंबर को सांसद के कृत्य को ध्यान में रखते हुए 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा का उप-चुनाव का परिणाम घोषित किया गया। इसमें समाजवादी पार्टी ने वह सीट खो दी, जो पहले जिया उर रहमान बर्क के पास थी। उप-चुनाव की हार के जवाब में सांसद बर्क ने पुलिस और प्रशासन को दोष देना और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना जारी रखा। प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से उन्होंने “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या कर दी गई है” जैसे बयानों का उपयोग किया, जिसने जनता को पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़का कर हिंसा के लिए अनुकूल माहौल बनाया।

23 नवंबर की रात को सांसद बर्क दिल्ली और बाद में बेंगलुरु पहुँचे लेकिन अपने समर्थकों और जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ देर रात तक मोबाइल और वॉट्सऐप के माध्यम से संपर्क में रहे। हालाँकि उच्च न्यायालय (इलाहाबाद) में दायर एक रिट में उन्होंने दावा किया कि उन्हें 24 नवंबर को निर्धारित दूसरे सर्वेक्षण की कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने इस बारे में किसी से चर्चा नहीं की थी। जबकि सत्य यह है कि 23/24 नवंबर की रात को लगभग 12:00 बजे जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ उनकी वॉट्सऐप और नियमित कॉल्स हुई थीं।

स्थानीय नेताओं ने दंगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जामा मस्जिद में उकसाने वाले भाषणों के माध्यम से दंगाइयों को भड़काया गया। मोबाइल फोन, मैसेज आदि के माध्यम से संदेश फैला कर भीड़ जमा की गई, दंगों के लिए अनुकूल माहौल बनाया गया। स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) की जानकारी के अनुसार सांसद बर्क, विधायक इकबाल महमूद और मस्जिद समिति के अधिकारी जफर अली, लड्डन और आपराधिक तत्व इस मामले में सक्रिय रूप से शामिल थे और बाहरी लोगों को आश्रय दे रहे थे। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने इस घटना में सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों को उकसाया।

LIU की जानकारी से यह भी पता चला कि लोकसभा चुनावों के दौरान दोनों पक्षों (सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद) ने अपने-अपने विवादों को सुलझा लिया था लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने सतही रूप से सुलह की थी। जब जामा मस्जिद के सर्वे का मामला सामने आया तो इन दोनों ने अपने-अपने समूहों/समर्थकों को उकसा कर मुस्लिम हितों के बड़े रक्षक के तौर पर खुद को पेश किया, उनका मसीहा बनने की कोशिश की।

गवाह नंबर 7 – अनुज कुमार चौधरी, संभल सर्किल अधिकारी:

19 नवंबर को सर्वेक्षण लगभग डेढ़ घंटे तक चला। सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद परिसर और आसपास के क्षेत्रों में भीड़ एकत्र हो गई थी। भीड़ में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थक शामिल थे। इन्होंने सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। यह पूर्व नियोजित प्रतीत हुआ, जिसमें विघटनकारी तत्व भीड़ को उकसा रहे थे, यह कहते हुए कि सर्वेक्षण टीम मस्जिद से नहीं हटेगी तो भीड़ वापस नहीं होगी। सर्वेक्षण में कई बार व्यवधान हुआ। राजनीतिक हस्तियों के हस्तक्षेप और विरोध के कारण सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने जिला प्रशासन की अनुमति के बिना और धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मस्जिद में भीड़ एकत्र की और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त की। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान यह कहते हुए किया, “मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।” सांसद बर्क के प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह स्पष्ट था कि राजनीतिक लाभ के लिए माहौल को जानबूझ कर अस्थिर बनाया गया। सांसद बर्क, मस्जिद समिति, सुहेल इकबाल और असामाजिक तत्वों द्वारा रची गई साजिश के कारण दंगे हुए।

संभल दंगा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य लोगों द्वारा 19 नवंबर 2024 के न्यायालय के आदेश से नाराज होकर उकसाया गया था ताकि सर्वेक्षण को पूरा होने से रोका जाए। इसके लिए इन्होंने भीड़ को उकसाया, इसमें इनका राजनीतिक लाभ भी शामिल था। उन्होंने जिला पुलिस और प्रशासन की भूमिका और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा उप-चुनाव के परिणाम घोषित किए गए, जिसमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हार गए। सांसद बर्क और समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने हार के लिए पुलिस और प्रशासन को दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए। चुनावी हार और जामा मस्जिद सर्वेक्षण के चल रहे मुद्दे से नाराज समाजवादी पार्टी के समर्थकों और विघटनकारी तत्वों ने सर्वेक्षण को बाधित करने और इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने की योजना बनाई और संभल और अन्य क्षेत्रों से एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) के सदस्यों को नियोजित तरीके से आगामी सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद में एकत्र होने और अशांति पैदा करने के लिए बुलाया। इसके बाद सांसद बर्क ने पूर्व नियोजित तरीके से क्षेत्र छोड़ दिया।

गवाह नंबर 8 – अनुज कुमार तोमर, प्रभारी (कोतवाली संभल):

19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वेक्षण के दौरान कई व्यवधान हुआ क्योंकि सांसद जिया उर रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों सहित भारी भीड़ मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई और सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी की। राजनीतिक हस्तियों की सक्रिय भागीदारी और विरोध के कारण उस दिन सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ नामक वॉट्सऐप ग्रुप में मैसेज भेजा गया कि शुक्रवार को अधिक से अधिक से लोग जामा मस्जिद में एकत्र हों। जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने प्रशासनिक अनुमति के बिना जामा मस्जिद के गेट पर भीड़ एकत्र कर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। उन्होंने सर्वेक्षण के लिए न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त करते हुए भाषण दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को इसके संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा – “जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।” स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 23 नवंबर को सांसद बर्क को धारा 168 BNSS के तहत नोटिस जारी किया गया।

गवाह नंबर 9 – राजीव कुमार मलिक, इंस्पेक्टर-इन-चार्ज (कैला देवी पुलिस स्टेशन, संभल):

19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने के लिए टीम पहुँची। इंस्पेक्टर राजीव कुमार मलिक की ड्यूटी मस्जिद के पास ढलान वाले बैरियर चौराहे पर कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त की गई थी। मस्जिद में प्रवेश करने से पहले सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने अपनी गाड़ी मस्जिद के पीछे ढलान वाले बैरियर चौराहे की सड़क पर पार्क की। उन्होंने सांसद बर्क को सूचित किया कि कोर्ट के आदेश के तहत सर्वे किया जा रहा है और उनकी उपस्थिति सर्वे के लिए आवश्यक नहीं है लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

सांसद बर्क के साथ उनके 25-26 समर्थक भी थे। इन सब ने जबरदस्ती मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश की। जब इंस्पेक्टर ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो इन लोगों ने “अल्लाह-हु-अकबर” और “नारा-ए-तकबीर” जैसे मजहबी नारे लगाने शुरू कर दिए। सांसद ने तब इंस्पेक्टर को यह कहते हुए धमकी दी – “जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

इसके बाद ये सभी लोग जबरदस्ती शाही जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। उन्होंने सर्वे टीम को सर्वे पूरा करने नहीं दिया। सांसद के विरोध के कारण सर्वे पूरा नहीं हो सका। 24 नवंबर को संभल में हुआ दंगा सांसद बर्क और उनके समर्थकों द्वारा आम लोगों को उकसाने के कारण हुआ। इन लोगों ने दंगों के लिए साजिश रची।

गवाह नंबर 10 – दीपक राठी, सब-इंस्पेक्टर (कोतवाली पुलिस स्टेशन, संभल)

विवादित जामा मस्जिद संभल के इसी कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है। 19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान सांसद जिया उर रहमान बर्क के कारण उत्पन्न व्यवधान और अपर्याप्त प्रकाश के कारण सर्वे कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। सांसद अपने समर्थकों, जिनमें पूर्व जिला अध्यक्ष फिरोज खान, अधिवक्ता जफर अली और कई अन्य शामिल थे, के साथ मस्जिद में मौजूद थे। सांसद ने मस्जिद में अपने समर्थकों को उकसाया और उत्तेजक बयान दिए, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ नमाज अदा की गई। सांसद ने जानबूझकर सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण यह पूरा नहीं हो सका।

इसके बाद मस्जिद की सीढ़ियों से उतरते समय मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए सांसद ने कहा – “बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

जिले में धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद सांसद बर्क ने 22 नवंबर को शुक्रवार की नमाज के दौरान शाही जामा मस्जिद पर बिना प्रशासनिक अनुमति के भीड़ इकट्ठा की और उत्तेजक बयान दिए। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों को) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य संवेदनशील माहौल को भड़काना था। इसके बाद सांसद ने कहा:

“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

जिस कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत संभल का जामा मस्जिद आता है, उसके सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी के अनुसार यह दंगा सांसद के उत्तेजक भाषणों, लोगों के उकसाने के कारण हुई। सर्वे के पहले दिन मतलब 19 नवंबर को भी दीपक राठी ने सांसद के उग्र व्यवहार को अपनी आँखों के सामने देखा, मीडिया से उत्तेजक बातें करते देखा। जुमे की नमाज यानी 22 नवंबर को भी मस्जिद की सीढ़ियों से उनको भाषण देते सुना। सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी का मानना है कि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल इस दंगे के मास्टरमाइंड थे।

गवाह नंबर 11 – रमेश सिंह राघव, सर्वे कमिश्नर (विवादित जामा मस्जिद का सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कोर्ट द्वारा नियुक्त)

जामा मस्जिद के सर्वे-निरीक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और वर्तमान विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो भी तमाशा करना चाहते हो, दस मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

इसके बाद मस्जिद के बाहर जमा भीड़ ने विरोध शुरू कर दिया, मजहबी और उत्तेजक नारे लगाए। इसके अतिरिक्त रोशनी की भी समस्या थी। इसलिए उन्होंने निरीक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कारण बताते हुए निरीक्षण कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित कर दिया।

सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव की राय में यह घटना स्थानीय सांसद बर्क, स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली की दुर्भावनापूर्ण मंशा और पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 12 – विष्णु शर्मा, सर्वे कमिश्नर के कैमरामैन

19 नवंबर 2024 और 24 नवंबर 2024 – इन दोनों दिनों में विष्णु शर्मा ने जामा मस्जिद में सर्वेक्षण के दौरान वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की है। 19 नवंबर को इनके साथ 2/3 सहायक भी थे, जिन्हें मस्जिद समिति के सदस्यों ने अंदर घुसने से रोक दिया। इसलिए इन्होंने वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी अकेले ही की। इनके मस्जिद पहुँचने से पहले ही सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल भीड़ के साथ वहाँ मौजूद थे। इनके अनुसार वो ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ कर रहे थे, जिन्हें ये दोहरा भी नहीं सकते।

सर्वे की कार्यवाही लगभग 45 मिनट से 1 घंटे तक चली। यदि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल चाहते तो स्थिति नहीं बिगड़ती और सर्वे प्रक्रिया 19 नवंबर को ही पूरी हो सकती थी। हालाँकि उन्होंने माहौल खराब कर दिया और सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। घटनाओं के वीडियो और फोटो कोर्ट कमिश्नर को सौंप दिए गए थे। यदि उन वीडियो और फोटो की समीक्षा की जाए तो मस्जिद के अंदर की स्थिति और माहौल, साथ ही किस तरह की नारेबाजी हो रही थी, कौन क्या कह रहा था, कौन किसे उकसा रहा था, स्पष्ट हो जाएगा। मस्जिद की सीढ़ियों पर नेताओं द्वारा भाषण दिए जा रहे थे, माहौल तनावपूर्ण था। मस्जिद की प्रबंध समिति लाउडस्पीकर के माध्यम से सभी से शांत रहने और सहयोग करने की अपील कर रही थी, लेकिन चुपके से भीड़ को उकसा रही थी।

विष्णु शर्मा ने बताया कि 19 नवंबर की घटनाओं के बारे में वो बहुत कुछ कह सकते हैं, लेकिन अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता के कारण वे खुलकर नहीं बोल सकते। इनकी राय में पूरी घटना पूर्व नियोजित थी, जिसमें संभल के बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल थे। इनका मानना है कि मुस्लिम समुदाय को 24 नवंबर के सर्वे के बारे में पहले से सूचित किया गया था। सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, सुहेल इकबाल और प्रबंध समिति के सदस्य पूरी घटना के लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने भीड़ को इकट्ठा किया और उकसाया।

गवाह नंबर 13 – विष्णु शंकर जैन, वादी के अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को शाम 6 बजे जैसे ही सर्वेक्षण की कार्यवाही शुरू हुई, लगभग 200-300 अज्ञात लोग (मुस्लिम समुदाय से) मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए। इसके 15 मिनट बाद परिसर के बाहर एक बड़ी भीड़ जमा हो गई और नारे लगाने लगी (नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर आदि) और कथित मस्जिद में प्रवेश करने लगी। लगभग 6:45-7:00 बजे कथित मस्जिद के अंदर एक हजार लोग मौजूद थे और कई लोग बाहर से मस्जिद को घेरे हुए थे। स्थिति तब और बिगड़ने लगी, जब स्थानीय विधायक (सुहेल इकबाल) का बेटा और क्षेत्र का सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) कथित मस्जिद में प्रवेश कर गए।

सांसद बर्क और स्थानीय विधायक का बेटा इसके बाद सर्वे कर रही टीम को अपनी शर्तें बताने लगे, धमकी देने लगे। उन्होंने नमाज का समय होने का हवाला देकर सर्वे टीम को तुरंत मस्जिद परिसर छोड़ देने का फरमान भी सुना डाला था। धमकी भरे लहजे में यह भी कहा था कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी और कोई भी भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाएगा। इसके बाद कोर्ट कमिश्नर ने सर्वे का काम उस दिन के लिए स्थगित कर दिया था।

गवाह नंबर 14 – गोपाल शर्मा, वादी के अधिवक्ता

मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” इसके बाद भीड़ ने मजहबी और उन्मादी नारे लगाने शुरू किए और विरोध प्रदर्शन किया। भीड़, धमकी, शाम का समय और प्रकाश की समस्या के कारण कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वेक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

इनके अनुसार यह घटना सांसद बर्क, विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल और मस्जिद की पूरी प्रबंधन समिति द्वारा एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी, जिसमें हजारों लोग मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे ताकि वादियों और उनके अधिवक्ताओं, कोर्ट कमिश्नर को सबक सिखाया जा सके।

गवाह नंबर 15 – महंत श्री ऋषिराज गिरी, महंत कैलादेवी

19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण टीम मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गई। लेकिन महंत श्री ऋषिराज गिरी ने गेट के बाहर रहना चुना और जामा मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं किया। इस बीच मुस्लिम समुदाय के कई लोग जामा मस्जिद के पीछे और ढलान वाली सड़क पर इकट्ठा होने लगे। मुस्लिम भीड़ अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रही थी, उन्हें धमकी दे रही थी। उस समय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। इसके बाद भीड़ की आक्रामकता और विरोध को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने उन्हें बाजार मार्ग के माध्यम से संभल कोतवाली तक सुरक्षित पहुँचाया। जैसी भीड़ वहाँ इकट्ठा हुई थी, उसे देख कर यह कहा जा सकता है कि यह घटना एक पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 16 – प्रिंस शर्मा, संभल जिले के जिला सरकारी अधिवक्ता (सिविल)

19 नवंबर 2024 की शाम लगभग 6:00 बजे सभी लोग (सर्वे टीम के लोग) जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए और आयोग की कार्यवाही शुरू की। सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था, जब तक कि शाम लगभग 6:30 बजे सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं कर गए। मुस्लिम पक्ष के कई लोग भी विवादित संरचना के बाहर इकट्ठा हो गए, जो मजहबी नारे लगा रहे थे, जो मस्जिद परिसर के अंदर सुनाई भी दे रहे थे।

मस्जिद परिसर के अंदर सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और उनके समर्थक इकट्ठा होकर निरीक्षण में बाधा डाल रहे थे। इसके बाद शाम लगभग 7:00 बजे मस्जिद समिति के अध्यक्ष और अधिवक्ता जफर अली ने कोर्ट कमिश्नर को बताया कि अंधेरा हो रहा है और नमाज का समय है, इसलिए आयोग की कार्यवाही जल्दी पूरी की जानी चाहिए। इस कारण, आयोग की कार्यवाही उस दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

प्रिंस शर्मा ने बताया कि इस घटना के पूर्व नियोजित न होने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ का इतनी दूर से और इतनी संख्या में आना संभव नहीं था।

गवाह नंबर 17 – विष्णु कुमार शर्मा, संभल जिला कोर्ट में भारत सरकार के स्थायी अधिवक्ता

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए और कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” वहाँ खड़ी भीड़ भी सर्वे का विरोध कर रही थी, मजहबी और उन्मादी नारे लगा रही थी। इसके अलावा शाम के समय और प्रकाश की समस्या के कारण, कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वे को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद के पास सैकड़ों से हजारों लोगों की उपस्थिति जिसमें दूर-दराज से आए लोग भी शामिल थे, यह पुष्टि करता है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। भीड़ को कोर्ट के आदेश में बाधा डालने और उन पर (सर्वे टीम पर) हमला करने के लिए इकट्ठा किया गया था।

गवाह नंबर 18 – कासिम जमाल, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में हुए सर्वे के दौरान कासिम जमाल वहाँ उपस्थित थे। शाम में लगभग 6-6:15 के बीच जब ये मस्जिद पहुँचे, तो उस समय स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल पहले से ही वहाँ मौजूद था।

गवाह नंबर 19 – मशहूद अली फारूकी, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

मशहूद अली फारूकी 19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में होने वाले सर्वे के लिए शाम में लगभग 6 बजे पहुँचे। इनके पहुँचने से पहले ही वहाँ स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल मौजूद था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। अपने बयान में मशहूद अली फारूकी ने सहमति जताई कि मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।

गवाह नंबर 20 – जफर अली, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष

जफर अली ने बताया कि 19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण के लिए वो जामा मस्जिद शाम के लगभग 6 बजे पहुँचे थे। इनके अनुसार सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 6:30 बजे अपने समर्थकों के साथ मस्जिद पहुँचे। फिर 6:45 बजे उन्होंने संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल को मस्जिद के अंदर देखा। यह भी बताया कि सांसद के साथ इन्होंने प्रेस के लोगों और इकट्ठा हुई भीड़ को संबोधित भी किया था।

पिछले 7 वर्षों से संभल के जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष रहे जफर अली ने बताया कि 22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज में लगभग 2000 लोग आए थे, जबकि अन्य जुमे के दिन सामान्य तौर पर यह संख्या 1000 के आस-पास रहती थी। जब जफर अली को ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने वाले मैसेज दिखाए गए तो इन्होंने स्वीकार किया कि भेजे गए मैसेज से ऐसा प्रतीत होता है कि नमाज के लिए अधिक से अधिक लोगों को इकट्ठा करने का आह्वान किया गया था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क के साथ जफर अली ने भी वहाँ इकट्ठा नमाजियों को संबोधित किया था, यह खुद स्वीकार किया। इस दौरान घटी एक दिलचस्प बात भी इन्होंने बताई। जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब इन्होंने उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। इन्होंने कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने इनकी अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।

जफर अली ने यह भी स्वीकार किया कि 24 नवंबर 2024 को होने वाले शेष सर्वे की सूचना उन्होंने सांसद बर्क को फोन कर दी थी। उन्होंने स्पष्ट बताया कि रात 11:00-11:30 बजे के बीच उन्होंने सांसद के पीआरओ से उनके मोबाइल पर बात की और दूसरी बार उन्होंने डायरेक्ट सांसद बर्क से बात की, उन्हें सूचित किया कि अगले दिन फिर से सर्वेक्षण हो रहा है।

कुल कितने साक्षी, गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया क्या

आयोग ने 24 नवंबर 2024 के दंगों से संबंधित 72 अभियुक्तों (जो मुरादाबाद जेल में बंद हैं) के बयान भी दर्ज किए। इनके अलावे संभल में 62 व्यक्तियों के बयानों की दोबारा जाँच भी की गई, इनमें से 28 गवाहों के साक्ष्य फिर से दर्ज किए गए। प्रशासनिक लोगों में दंगों के दौरान घायल हुए पुलिस वाले, वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी, डीएम/एसपी/एडीएम/अतिरिक्त एसपी/सीओ/एसडीएम, मृतकों का पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों तक को बयान दर्ज करने के लिए आयोग ने बुलाया। सर्वे कमिश्नर और उनके साथ गई टीम के हर सदस्य को भी आयोग के सामने अपना-अपना बयान दर्ज करवाना पड़ा। 24 नवंबर के साथ-साथ 19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वे के दौरान जो-जो मीडियाकर्मी वहाँ कवरेज के लिए मौजूद थे, उन सबका भी बयान लिया गया।

जामा मस्जिद प्रबंध समिति के पदाधिकारियों की सूची मँगवा कर उन सबके भी बयान दर्ज करवाए गए। सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक (ये भी समाजवादी पार्टी के ही) इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल का भी बयान लिया गया। जिन 4 लोगों की हत्या दंगाइयों ने कर दी थी, उनके रिश्तेदारों को भी आयोग ने साक्ष्य दर्ज करने बुलाया। चूँकि इन्होंने FIR भी दर्ज करवाई थी, इसलिए इनके बयान शिकायतकर्ता के तौर पर दर्ज किए गए। इस बात का भी ध्यान रखा गया कि जब ये शिकायतकर्ता अपने बयान दर्ज करवाएँ तो कोई भी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति उनके पास मौजूद न रहे।

पूरी प्रक्रिया में आयोग ने कुल 199 साक्षियों से पूछताछ की। इनमें से 106 साक्षियों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज किए गए। जबकि 84 साक्षियों के बयान संभल में डाक बंगले पर और 8 साक्षियों के बयान लखनऊ में जाँच आयोग के कार्यालय में दर्ज किए गए।

संभल जामा मस्जिद का सर्वे क्यों? सर्वे टीम में कौन-कौन?

संभल जिले के चंदौसी स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय है। यहीं पर सीनियर डिवीजन के सिविल जज न्यायालय में 19 नवंबर 2024 को एक याचिका (182/2024) दायर की गई थी। याचिका में बताया गया कि साल 1526 में संभल स्थित शाही जामा मस्जिद उस जगह बनाई गई, जहाँ कभी प्राचीन हरिहर मंदिर (भगवान कल्कि का मंदिर) हुआ करता था। पहले मंदिर को ध्वस्त किया गया, फिर उसके अवशेषों पर ही मस्जिद बना दी गई।

याचिका पर सुनवाई करते हुए सिविल जज ने शाही जामा मस्जिद के सर्वे (फोटो और वीडियोग्राफी दोनों) का आदेश दिया। इसके लिए अधिवक्ता रमेश सिंह राघव को सर्वे कमिश्नर नियुक्त किया गया। मामले की गंभीरता को समझते हुए 19 नवंबर 2024 को ही संभल के जिलाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक को पर्याप्त पुलिस बल के साथ जामा मस्जिद जाकर कोर्ट के आदेश पर कार्रवाई के लिए कहा।

पर्याप्त पुलिस बल से साथ सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव, याचिकाकर्ता और अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, गोपाल शर्मा (अधिवक्ता), प्रिंस शर्मा (अधिवक्ता) और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता जफर अली की उपस्थिति में 19 नवंबर 2024 की शाम को संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे शुरू किया गया। हालाँकि उस दिन सर्वे का काम पूरा नहीं हो सका। इसके पीछे 2 वजहें रहीं: (i) शाम होने के कारण कम रोशनी (ii) सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल द्वारा मुस्लिम भीड़ को भड़काना।

न्यायिक जाँच आयोग का गठन क्यों?

कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया। पुलिस-प्रशासन मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए और कानून एवं शांति व्यवस्था को बनाए रखते हुए सर्वे करने पहुँचती है। लेकिन शिकार होती है हिंसक भीड़ का। 4 लोग मारे जाते हैं, कई घायल होते हैं। और उँगली उठती है उत्तर प्रदेश की पुलिस पर। जबकि हकीकत में पुलिस की तरफ से गोली चलाई भी नहीं गई थी। आत्मरक्षा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने सिर्फ आँसू गैस, मिर्च बम, रबर बुलेट आदि ही फायर किए थे।

मस्जिद के सर्वे का विरोध करने वाली भीड़ भी मुस्लिम, मारे गए 4 लोग भी मुस्लिम। ऐसे में उत्तर प्रदेश पुलिस को अपराधी बताने, गोलीबाज बताने का नैरेटिव गढ़ दिया गया। फेक चीजों को वायरल किया गया, सच कहीं दब गया। जबकि घटनास्थल पर तमाम मीडिया चैनल मौजूद थे, लगातार कवरेज किया जा रहा था। इसी सच को बाहर लाने के लिए घटना के 4 दिन बाद 28 नवंबर 2024 को तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के अध्यक्ष थे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा। जबकि दो अन्य सदस्य थे – (i) सेवानिवृत्त आईएएस अमित मोहन प्रसाद (ii) सेवानिवृत्त आईपीएस अरविंद कुमार जैन।

आयोग पर एकतरफा जाँच का आरोप नहीं लगे, इसको सुनिश्चित किया गया। घटना से जुड़े हर छोटे-बड़े पहलू को देखा-परखा गया। प्रत्यक्षदर्शी या गवाह भी विविध हों, इसका भी ख्याल रखा गया। पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों, वादियों, प्रतिवादियों के साथ-साथ उनके अधिवक्ताओं, मीडिया कर्मियों (प्रत्यक्षदर्शी), जामा मस्जिद इंतेजामिया समिति के सदस्यों, अन्य प्रत्यक्षदर्शियों, एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक (एफएसएल) की रिपोर्ट, बैलिस्टिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट के साथ-साथ अन्य रिकॉर्डों की भी साक्ष्य सहित सूक्ष्म जाँच की गई। पूरी प्रक्रिया के बाद न्यायिक जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट बनाई है। न्यायिक प्रक्रिया के तहत इसे कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, तारीख-पर-तारीख भी आएँगे… लेकिन देर-सबेर अपराधी सलाखों के पीछे होंगे, यही उम्मीद है।

100 नाराज़ ≠ 100 वोट: भारतीय राजनीति में सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ का फ़ैक्टर कभी निर्णायक क्यों नहीं रहा

BJP के लिए सबसे बड़ा ख़तरा क्या है सवर्णों की नाराज़गी, SC/ST Act, आरक्षण की राजनीति या जातीय असंतोष? यदि आपका उत्तर केवल ‘CASTE’ है, तो संभव है कि आप भारतीय चुनावी राजनीति के उस बिंदु को देख ही नहीं रहे, जहाँ से असली कहानी शुरू होती है।

राजनीति को केवल भावनाओं की भाषा में पढ़ना सुविधाजनक है। फलाँ समुदाय नाराज़ है, फलाँ वर्ग क्षुब्ध है, फलाँ जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, फलाँ कानून से असंतोष है और फिर मान लिया जाता है कि नाराज़गी अपने आप वोट में बदल जाएगी। मगर चुनावी राजनीति इतनी सरल मशीन नहीं है कि उसमें ‘नाराज़गी’ डालिए और दूसरी तरफ़ सत्ता परिवर्तन की पर्ची निकल आए।

सत्ता का प्रश्न भावनाओं से कम और उन भावनाओं के राजनीतिक संगठन से अधिक तय होता है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे समझे बिना BJP और उसके सामाजिक आधार की वर्तमान राजनीति को समझना कठिन है।

सवर्ण समाज का एक हिस्सा BJP से नाराज़ है। SC/ST Act को लेकर असंतोष है, आरक्षण की राजनीति को लेकर शिकायतें हैं, प्रतिनिधित्व को लेकर प्रश्न हैं, जातीय गणित में लगातार हो रहे बदलावों से बेचैनी है और BJP द्वारा दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े तथा आदिवासी समुदायों की ओर बढ़ाए जा रहे राजनीतिक हाथ को लेकर स्वाभाविक रूप से एक वर्ग में यह प्रश्न भी है कि इस बदलते समीकरण में उसका अपना स्थान क्या रह जाएगा।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सवर्ण BJP से नाराज़ हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि उस नाराज़गी का राजनीतिक गंतव्य क्या है? यहीं से चुनावी राजनीति का वह अध्याय शुरू होता है जिसे सोशल मीडिया की नाराज़ पोस्टें अक्सर बीच रास्ते में छोड़ देती हैं।

राजनीति में एक पुराना मेकियावेलियन सत्य है; जनता का आपसे नाराज़ होना अपने आप में सत्ता के लिए घातक नहीं है; घातक तब होता है जब वह नाराज़गी संगठित होकर आपको सत्ता से हटाने की क्षमता हासिल कर ले।

लोकतंत्र में हर सत्तारूढ़ दल से लोग नाराज़ रहते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नाराज़ कौन है। प्रश्न यह है कि नाराज़ होकर कौन किसके साथ जा रहा है। और BJP की राजनीति को यदि इसी कसौटी पर देखा जाए, तो सवर्ण असंतोष का प्रश्न कुछ अलग रूप में सामने आता है। 

BJP का हिसाब ‘कितने नाराज़ हैं’ का नहीं, ‘किधर जाएँगे’ का है

BJP के लिए सवर्ण अब भी उसके राजनीतिक ढाँचे की एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत स्थिर धुरी हैं। इसलिए उसकी रणनीति का अर्थ यह कतई नहीं कि वह सोचती है, ‘सवर्णों को नाराज़ होने दो, वे कहीं नहीं जाएँगे।’

राजनीतिक दल इतने मूर्ख नहीं होते। अधिक यथार्थवादी गणित यह है कि ‘उन्हें इतना नाराज़ मत होने दो कि वे सामूहिक रूप से किसी वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के पीछे खड़े हो जाएँ।’

यही अंतर है असंतोष और राजनीतिक संकट के बीच। किसी समाज में असंतोष बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन यदि वह सामाजिक समूहों, उप-जातियों, क्षेत्रों, स्थानीय नेतृत्व और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं में बँटा हुआ है, तो वह सत्ता परिवर्तन की संगठित शक्ति नहीं बन पाता। भारतीय समाज की जातीय संरचना इस मामले में BJP को एक दिलचस्प राजनीतिक लाभ देती है।

सवर्ण कोई एक राजनीतिक वर्ग नहीं हैं।

ब्राह्मण की राजनीतिक प्राथमिकताएँ हर जगह राजपूत की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं। बनिया का आर्थिक हित और राजनीतिक व्यवहार कई बार दूसरे समूहों से अलग हो सकता है। क्षेत्र, स्थानीय उम्मीदवार, परिवार, पंचायत, संसदीय क्षेत्र और राज्य की राजनीति इस समीकरण को और जटिल बना देते हैं। कोई BJP के साथ है, कोई कांग्रेस के साथ, कोई क्षेत्रीय दल के साथ और कोई स्थानीय उम्मीदवार को ही अपनी राजनीति का केंद्र मानता है।

अर्थात जिस असंतोष को सोशल मीडिया पर एक सामूहिक ‘सवर्ण आक्रोश’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ज़मीनी राजनीति में वह आवश्यक नहीं कि एक ही दिशा में बह रहा हो। और यहीं BJP की संरचनात्मक बढ़त दिखाई देती है। उसे यह आवश्यक नहीं कि हर सवर्ण उससे प्रसन्न हो। उसे केवल इतना सुनिश्चित करना है कि सवर्णों की नाराज़गी एक संगठित Anti-BJP electoral bloc में परिवर्तित न हो।

यह चुनावी राजनीति का बड़ा फर्क है।

100 नाराज़ वोट और 100 संगठित वोट, दोनों एक चीज़ नहीं

इसे एक बहुत साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी चुनाव क्षेत्र में 100 सवर्ण मतदाता BJP से नाराज़ हैं। उनमें से 30 कांग्रेस की ओर चले जाते हैं, 20 किसी क्षेत्रीय दल की ओर, 10 स्वतंत्र उम्मीदवार के साथ चले जाते हैं, कुछ मतदान ही नहीं करते और शेष अंततः BJP को ही वोट कर देते हैं।

तो BJP के लिए राजनीतिक नुकसान हुआ, लेकिन वह आवश्यक रूप से सत्ता के लिए अस्तित्वगत संकट नहीं बना। लेकिन वही 100 मतदाता यदि किसी एक राजनीतिक विकल्प के पीछे एकजुट हो जाएँ और उनके साथ दूसरे सामाजिक समूहों का असंतोष भी जुड़ जाए, तब परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है।

इसलिए चुनावी राजनीति में नाराज़गी की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी संगठनात्मक दिशा होती है। और यही वह बात है जिसे अक्सर ‘वोट बैंक’, ‘जातीय ध्रुवीकरण’ और ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ जैसे आसान शब्दों के नीचे दबा दिया जाता है। 

BJP का असली भय: असंतोष नहीं, उसका एकजुट होना

यहीं पहुँचकर BJP के सामने वास्तविक चुनौती दिखाई देती है। BJP के लिए सबसे बड़ा खतरा सवर्णों की नाराज़गी नहीं है। खतरा है,  जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation, विपक्षी मतों का एकीकरण और BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का क्षरण।

यह फर्क मामूली नहीं है। यही चुनावी सत्ता की पूरी संरचना बदल सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने कम-से-कम इतना संकेत अवश्य दिया कि BJP का ऊपरी जातियों में आधार काफी हद तक उसके साथ बना रहा, लेकिन अनेक क्षेत्रों में SC और कुछ OBC समूहों के राजनीतिक झुकाव में बदलाव ने BJP के पुराने सामाजिक समीकरण को चुनौती दी।

इसका अर्थ यह नहीं कि BJP का सामाजिक आधार ध्वस्त हो गया। बल्कि इससे एक और गंभीर प्रश्न पैदा हुआ कि क्या अलग-अलग जातियों की अलग-अलग नाराज़गियाँ कभी एक साझा राजनीतिक असंतोष में बदल सकती हैं?

क्योंकि सत्ता के लिए खतरा तब पैदा होता है जब अलग-अलग असंतोष एक-दूसरे से जुड़ने लगें। एक जाति आरक्षण को लेकर असंतुष्ट हो, दूसरी प्रतिनिधित्व को लेकर, तीसरी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर, चौथी स्थानीय सत्ता-संरचना को लेकर; तो ये अलग-अलग शिकायतें हैं।

लेकिन यदि कोई राजनीतिक शक्ति इन्हें एक साझा कथा, साझा शत्रु और साझा चुनावी विकल्प में बदल दे, तब ये शिकायतें राजनीतिक शक्ति बन जाती हैं। शिकायत स्वयं शक्ति नहीं है; शिकायत का राजनीतिक संगठन उसे शक्ति में बदलता है।

और BJP की रणनीति को समझने की कुंजी यहीं है।

BJP ने अपना सामाजिक गठबंधन बदला है, लेकिन छोड़ा नहीं

BJP एक तरफ़ अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी तरफ़ वह लगातार Ambedkar, दलित राजनीति, OBC नेतृत्व, EBC mobilisation और आदिवासी राजनीति की ओर बढ़ रही है। यह कुछ लोगों को विरोधाभास अवश्य प्रतीत हो रहा होगा, लेकिन यह तो BJP की राजनीतिक रणनीति का मूल तत्व है।

पुरानी BJP का सामाजिक समीकरण मोटे तौर पर Upper Caste + Hindutva के फ्रेम में समझा जाता था।

लेकिन आज की BJP का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा है।

उसका राजनीतिक प्रोजेक्ट है, Upper Caste + OBC + EBC + Dalit + Tribal + Welfare Beneficiaries + Hindutva

अर्थात एक ऐसा विस्तृत हिंदू चुनावी गठबंधन, जिसमें प्रत्येक सामाजिक समूह को हर नीति से संतुष्ट करना आवश्यक नहीं है। राजनीति में सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं होती। पर्याप्त बहुमत की आवश्यकता होती है।

यही कारण है कि BJP के लिए यह आवश्यक नहीं कि सवर्ण आरक्षण से प्रसन्न हों, दलित हर नीति से प्रसन्न हों, OBC नेतृत्व से हर पिछड़ा समूह प्रसन्न हो या Welfare politics से हर वर्ग समान रूप से संतुष्ट हो। उसके लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या इन समूहों में से कोई बड़ा सामाजिक समूह एकजुट होकर विपक्ष के साथ जा रहा है? यदि नहीं, तो असंतोष प्रबंधनीय है। और यदि हाँ, तो वही असंतोष सत्ता के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

‘हम BJP से नाराज़ हैं’ और ‘हम BJP को हराएँगे’ में बहुत बड़ा अंतर है

यही वह वाक्य है जिसके बीच भारतीय चुनावी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा छिपा हुआ है। ‘हम BJP से नाराज़ हैं।’ और ‘हम BJP को हराने के लिए किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े हैं।’

इन दोनों वाक्यों को एक समझ लेना राजनीतिक विश्लेषण की सबसे सामान्य भूलों में से एक है। पहला एक भावनात्मक कथन है। दूसरा एक संगठित राजनीतिक निर्णय।

पहले में असंतोष है। दूसरे में राजनीतिक दिशा। पहले में शिकायत है। दूसरे में शक्ति-संचय। और चुनाव अंततः इसी दूसरे प्रश्न पर फैसला करते हैं।

इसीलिए सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर दिखाई देने वाला आक्रोश और मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट कई बार दो बिल्कुल अलग राजनीतिक वास्तविकताएँ होते हैं। सोशल मीडिया पर क्रांति की घोषणा करना और बूथ पर एकजुट होकर वोट डालना, भारतीय लोकतंत्र में अभी तक दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं।

तो BJP के सामने असली अस्तित्व का संकट क्या है?

यदि प्रश्न को बिल्कुल साफ़ शब्दों में रखा जाए तो मेरा उत्तर होगा, जाति अपने आप में BJP का Existential threat नहीं है। सवर्णों की नाराज़गी भी अपने आप में Existential threat नहीं है।

असली खतरा तब पैदा होता है जब जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation + विपक्षी वोट का एकीकरण + BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का टूटना, ये सब एक साथ घटित होने लगे।

और यह केवल सैद्धांतिक संभावना नहीं है। भारतीय चुनावों का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन अक्सर किसी एक वर्ग की नाराज़गी से नहीं, बल्कि विभिन्न असंतोषों के एक साझा राजनीतिक गठबंधन में बदल जाने से होता है। 

तीन शर्तें पूरी हुईं तो कहानी बदल सकती है

BJP के लिए वास्तविक ख़तरा तब आकार लेगा जब तीन प्रक्रियाएँ एक साथ चलें।

1. सवर्णों की नाराज़गी वास्तविक वोट के नुकसान में बदल जाए

इसके लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि सवर्ण BJP से शिकायत करें। उन्हें वास्तव में BJP से मतदान स्तर पर दूर जाना होगा।

2. SC, OBC और EBC जैसे समूहों में BJP के विरुद्ध बड़ा राजनीतिक Consolidation हो

अलग-अलग जातियों की अलग-अलग शिकायतें यदि अलग-अलग राजनीतिक दिशाओं में जाती रहेंगी, तो BJP के लिए उनका प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

लेकिन यदि उनमें एक साझा राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा होता है, तो स्थिति गंभीर होगी।

3. विपक्ष उस असंतोष को एक ही राजनीतिक विकल्प के पीछे समेट दे

यही शायद सबसे कठिन शर्त है।

क्योंकि BJP के विरुद्ध असंतोष पैदा करना और उस असंतोष को एक साझा चुनावी विकल्प में बदल देना, दो अलग राजनीतिक कार्य हैं। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

जाति, आरक्षण और SC/ST Act, क्या ये 2029 तय कर देंगे?

SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।

लेकिन यह मान लेना कि यही मुद्दे अकेले 2029 का चुनाव तय कर देंगे, उससे भी बड़ी राजनीतिक भूल होगी। क्योंकि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं लड़े जाते। राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव है। हिंदुत्व का प्रभाव है। अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।

कल्याणकारी योजनाएँ हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा है। स्थानीय उम्मीदवार है। जातीय प्रतिनिधित्व है। विपक्ष का चेहरा और उसकी विश्वसनीयता है। स्थानीय स्तर की सत्ता-संरचना है। और अंततः Anti-incumbency भी है।

इन सभी का योग मिलकर वोट में बदलता है। राजनीति कोई एक-चर वाला समीकरण नहीं है।

भारतीय चुनाव में ‘एक मुद्दा’ अक्सर केवल सोशल मीडिया का मुद्दा होता है; बूथ पर पहुँचते-पहुँचते वह दर्जनों अन्य हितों, पहचान और राजनीतिक गणित से होकर गुजर चुका होता है। 

BJP की असली चिंता क्या है?

इसलिए यदि BJP की राजनीति को ठंडे दिमाग़ से पढ़ा जाए, तो संभवतः उसकी चिंता यह नहीं है कि ‘क्या हर जाति हमसे खुश है?’

क्योंकि कोई भी सत्तारूढ़ दल हर सामाजिक समूह को हर समय खुश नहीं रख सकता। उसकी वास्तविक चिंता इससे कहीं अधिक ठंडी और व्यावहारिक है, ‘क्या अलग-अलग समूहों की नाराज़गी एक-दूसरे से जुड़कर हमारे खिलाफ़ एक व्यापक चुनावी गठबंधन बना सकती है?’

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो असंतोष मौजूद रहते हुए भी सत्ता-समीकरण उसके पक्ष में रह सकता है। यदि उत्तर ‘हाँ’ हो जाता है, तब वही छोटी-छोटी दरारें मिलकर दीवार में दरार पैदा कर सकती हैं। और राजनीति में दीवार तब नहीं गिरती जब उसमें एक दरार दिखाई दे।

दीवार तब गिरती है जब अलग-अलग दरारें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। यही BJP के सामाजिक गठबंधन की असली परीक्षा है। इसलिए सोशल मीडिया पर सवर्णों की नाराज़गी के बढ़ते शोर को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि BJP किसी बड़े संकट में है, शायद जल्दबाज़ी होगी। और इसके उलट यह मान लेना कि सवर्ण हमेशा BJP के साथ रहेंगे, उससे भी बड़ी भूल होगी।

राजनीतिक दलों का भाग्य स्थायी भावनाओं से नहीं, बदलते हितों और बदलते गठबंधनों से तय होता है। आज BJP का आत्मविश्वास संभवतः इसी गणित से निकल रहा है कि उसके विरुद्ध असंतोष मौजूद होने के बावजूद वह असंतोष अभी तक पर्याप्त रूप से एकीकृत राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हुआ है।

और विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। उसे केवल लोगों को BJP से नाराज़ नहीं करना है। उसे यह सिद्ध करना है कि उस नाराज़गी का एक विश्वसनीय राजनीतिक घर भी है। अंततः चुनाव में प्रश्न यह नहीं होता कि कितने लोग आपसे नाराज़ हैं। प्रश्न यह होता है कि कितने नाराज़ लोग एक ही दिशा में चलने को तैयार हैं।

और शायद BJP आज सबसे अधिक इसी गणित पर भरोसा कर रही है। क्योंकि चुनावी राजनीति में नाराज़ होना आसान है; नाराज़ वोट को एक जगह पहुँचा देना, यही असली राजनीति है।