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MD, इंस्टाग्राम, लूडो… ड्रग्स से लेकर ऑनलाइन गेमिंग तक, लव जिहादी खोज रहे नए-नए टूल्स: केबिन कैफे को इस्लामी कट्टरपंथियो में बनाया रेप का अड्डा

लव जिहाद और इस्लामी धर्मांतरण की खबरें अब मीडिया में रोज की हो गई हैं। एक समय था जब दक्षिणपंथियों को इन समस्याओं के बारे मे बताने के लिए आलोचना सहनी पड़ती थी, मगर अब आए दिन सामने आ रही पीड़िताएँ और उनकी कहानियाँ इस बात की गवाह हैं कि ये कोई आभासी शब्द नहीं हैं।

समय के साथ इसे अंजाम देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी रोज नए पैंतरे खोज रहे हैं। हर माध्यम का इस्तेमाल करके हिंदू लड़कियों को इस्लाम कबूल कराने के प्रयास हो रहे हैं। पिछले दिनों मीडिया में आई कुछ रिपोर्ट्स इस बात के प्रमाण हैं जिनसे साबित होता है कि अब लव जिहाद के लिए या धर्मांतरण से पहले ब्रेनवाश करने के लिए, सिर्फ पुरानी चालबाजी ही नहीं, बल्कि नई-नई तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है।

आज इस लेख में हम आपके सामने उस हर तरीके पर चर्चा करेंगे जिनके जरिए इस्लामी कट्टरपंथी अपने मकसद की ओर धड़ल्ले से आगे बढ़ कर रहे हैं। ये लेख निराधार नहीं, बल्कि उन्हीं घटनाओं पर आधारित है जिन्हें मीडिया रिपोर्ट कर चुका है और कभी न कभी अलग-अलग जगह और दिन आप भी उन खबरों से होकर गुजरे हैं, लेकिन उन्हें कभी जोड़कर आगामी परिणाम सोचने का प्रयास नहीं किया।

ड्रग की लत और धर्मांतरण रिजल्ट

हालिया खबरों से शुरू करें तो हिंदुओं के लिए चिंताजनक बात ये है कि ये जिहादी हिंदू बच्चियों को बर्बाद करके उन्हें धर्मांतरण की राह पर धकेलने के लिए उन्हें ड्रग्स की लत लगावा रहे हैं। भोपाल, बिजनौर, इंदौर, नैनीताल से आए मामले इसके सबूत हैं।

  • सबसे पहले बात मध्यप्रदेश के भोपाल वाले मामले से करते हैं। इस केस का खुलासा पिछले महीने तब हुआ जब ड्रग गैंग चलाने वाले यासीन मछली और शाहवर मछली की गिरफ्तारी हुई। छानबीन में पता चला कि इनका मकसद सिर्फ ड्रग्स की तस्करी करना नहीं था बल्कि इनके निशाने पर हिंदू लड़कियाँ थीं। ये लोग ये लोग हिंदू युवतियों को एमडी (MD) ड्रग देकर शारीरिक शोषण करते थे और उनसे ड्रग भी बिकवाते थे। इनका मकसद लड़कियों को बर्बाद करते हुए धर्मांतरण करवाना था ताकि उनके पास और कोई विकल्प न बचे।
  • भोपाल-इंंदौर से ऐसी ही एक मुस्लिम गैंग का खुलासा हुआ था। गैंग का मास्टरमाइंड फरहान था। इस गैंग ने निजी कॉलेज में पढ़ने वाली हिंदू लड़कियों को निशाने पर लिया हुआ था। पीड़िताएँ इस मामले में लंबे समय तक चुप थीं, लेकिन बाद में जब ये केस खुला तो एक-एक करके कई लड़कियाँ सामने आईं, जिन्होंने बताया कि कैसे उन्हें नशा देकर उनसे बलात्कार होता था और इसके बाद उनपर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।
  • इंदौर के मूसाखेड़ी में भी जीशान खान ने ‘अभिषेक ठाकुर’ बनकर हिंदू युवती को फँसाया हुआ था। उसने लड़की को अपने जाल में उलझाए रखने के लिए उसको ड्रग्स की लत लगाई, फिर उसका यौन शोषण किया और उसे ब्लैकमेल करके उसपर धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा।
  • इसी तरह का केस नैनीताल से भी जुलाई को सामने आया था… यहाँ 11 वीं क्लास की हिंदू युवती को 30 साल के मुस्लिम युवक ने प्रेम जाल में फँसा रखा था। लड़की का परिवार इतना बेबस था कि उन्हें मदद के लिए हिंदू संगठनों का सहारा लेना पड़ा। परिवार ने गिड़गिड़ा कर बताया कि उनकी बेटी को नशा दिया जाता है, उसे लत लगवा दी गई है। घरवाले इसलिए मजबूर हो गए हैं क्योंकि बेटी परिवार के विरोध पर उतर आई है।
  • एक अन्य मामला इंदौर से… यहाँ सुल्तान रोशन नागोरी ने कोचिंग सेंटर में जाने वाली हिंदू युवतियों को टारगेट पर ले रखा था। सारी पोल तब खुली जब एक ब्राह्मण लड़की शिकायत लेकर सामने आई। युवती ने बताया कि सुल्तान ने उसके साथ शारीरिक शोषण तो किया ही था। साथ में उसे अश्लील फोटो-वीडियो वायरल की धमकी देकर धर्म परिवर्तन का दबाव भी बना रहा था।
    पीड़िता का कहना था कि सुल्तान उसके ऊपर झाड़-फूँक भी कराता था और उसे नशे भी देता था। इस मामले में पीड़िता ने कॉल सेंटर्स में एक्टिव धर्मांतरण सेल का भी खुलासा किया था। उसका दावा था कि इस सेल में हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए मुस्लिम लड़कों को रखा जाता था। उनका ब्रेनवॉश ये कहकर होता था- अल्लाह ने तुम्हें हमारे लिए बनाया है। बाद में उन लड़कियों को नशे का आदी बनाया जाता था और उनका शारीरिक शोषण होता था।
  • कर्नाटक के मंगलुरु से भी 2024 में एक हिंदू युवती के गायब होने का मामला सामने आया था। जाँच हुई तो पता चला कि पुत्तूर के ड्रग तस्कर शाहरुख ने उसे अपने जाल में फँसा रखा था और वही उससे मिलने पेइंग गेस्ट हाउस में भी आता-जाता था।

ऊपर दी गई ये खबरें चंद उदाहरण हैं कि कैसे हिंदू लड़कियों को ड्रग की लत लगाकर धर्मांतरण की ओर धकेला जा रहा है। इस दरमियाँ उनके साथ ऐसे कुकर्म होते हैं, उनकी तस्वीरें-वीडियो निकाली जाती हैं कि वो बाद में चाहकर भी पीछे नहीं हट पातीं और इस दलदल में धँसती जाती हैं। कुछ को नशे का आदी बनाकर इतना ब्रेनॉश कर दिया जाता है कि वो इस्लाम के अलावा किसी और बात को सत्य ही नहीं मानती।

हिरोइन तक फँसी ड्रग और इस्लाम के चंगुल में

हैरानी की बात ये है कि ड्रग और धर्मांतरण के चंगुल में केवल सामान्य हिंदू लड़कियाँ शिकार नहीं बनती बल्कि बड़ी हस्तियाँ भी इसमें फँसती हैं। साल 2020 में एक कन्नड़ अभिनेत्री के ड्रग केस में जेल में बंद होने की खबर आई थी। बाद में खुलासा हुआ कि उसे 10 साल से इस्लाम के बारे में पढ़ाया जा रहा था। इस केस के बाद सोशल मीडिया पर खूब माँग उठी थी कि अब लव जिहाद के साथ ड्रग एंगल की जाँच भी होनी चाहिए कि कहीं लड़कियों को फँसाने के लिए नशे का आदी बनाकर तो ब्रेनवॉश नहीं किया जाता!

लव के साथ नार्कोटिक जिहाद का भी शिकार हो रहीं हिंदू लड़कियाँ- जब बिशप ने दी चेतावनी

एक बार इस मामले पर केरल के कोट्टयम में सायरो मालाबार चर्च पाला धर्मप्रांत के ‘मार जोसेफ कल्लारंगट’ नामक एक बिशप ने चेतावनी भी दी थी। उन्होंने केरल में कैथोलिक और हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण पर चिंता जताते हुए कहा था कि लड़कियाँ लव के साथ नार्कोटिक जिहाद की शिकार हो रही हैं। उन्होंने कहा था कि केरल में एक खास ग्रुप है जो विभिन्न इलाकों में कैथोलिक और हिंदू युवाओं को ड्रग व अन्य नशों का आदी बना रहे हैं। ऐसे लोगों का मकसद दूसरे धर्म को भ्रष्ट करने का है। लव जिहाद और नार्कोटिक्स जिहाद दो चीजें हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

एक तरफ हिंदू परिवार अपने बच्चों के नशे करने की आदत के लिए आधुनिक होते जमाने को कोसने में व्यस्त हैं और दूसरी तरफ इस्लामी कट्टरपंथी इसी ढिलाई का फायदा उठाते हुए अपने गजवा-ए-हिंद के मकसद की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

लव जिहाद से शुरुआत, नए माध्यम हथियार

याद दिला दें आज से दशक भर पहले जब लव जिहाद शब्द पर दक्षिणपंथियों ने आवाज उठानी शुरू की थी उस समय वामपंथी नैरैटिव चलाते थे कि कट्टर हिंदुओं द्वारा दी गई शब्दावली है जो सिर्फ इस्लामोफोबिया फैलाना चाहते हैं। इसका वास्तविकता से लेना-देना नहीं है। लेकिन आज अगर आप अखबार उठाकर देख लें तो आपको समझ आएगा कि एक भी दिन ऐसा नहीं होता जब किसी हिंदू पीड़िता की आपबीती मीडिया में खबर न बने। कई बार अपने साथ हुए अत्याचार को बताने के लिए लड़कियाँ जिंदा रहती हैं और कई बार सिर्फ उनकी लाश या फिर उसके टुकड़े मिलते हैं।

  • साल 2023 में उजागर हुआ दिल्ली का श्रद्धा वॉकर हत्याकांड याद है न आपको। आफताब के जाल में फँसी श्रद्धा ने अपने माता-पिता तक को छोड़ दिया था और उसके साथ लिव-इन में रहने लगी थी। हुआ क्या… 35 टुकड़े, जिन्हें दिल्ली के अलग-अलग जंगली इलाकों में फेंका गया ताकि जानवर उन्हें नोच लें। छानबीन में ये भी सामने आया था कि आफताब ने श्रद्धा को मारकर उसे काटा था, फिर फ्रिज में रखकर उन्हें धीरे-धीरे अलग-अलग जगह फेंकता था।
  • इसके बाद मेरठ का प्रिया-कशिश हत्याकांड। साल 2020 में प्रिया और उसकी बेटी कशिश की हत्या की गई थी। हत्या करने वाला कोई और नहीं बल्कि वो शमशाद था जो प्रिया से ‘अमित गुर्जर’ बनकर मिला था। धीरे-धीरे शमशाद की पोल खुली तो प्रिया ने सवाल किए, लड़ाइयाँ बढ़ीं और अंत क्या हुआ… प्रिया और कशिश का कत्ल। शमशाद ने प्रिया को मारने के बाद उसे उसी के घर के बेडरूम में गड्ढा खोदकर गाड़ा था और पूरे तीन महीने बाद जब ये गुत्थी सुलझी तो वहाँ सिर्फ दोनों माँ-बेटी का कंकाल था।
  • गाजियाबाद की पिंकी गुप्ता का मामला याद करें तो पता चलेगा कि लव जिहाद का शिकार एक हिंदू युवती कैसे एक लव जिहादी के शाकिब के चंगुल में फँसी। शाकिब ने उसे मिलते समय उसे अपना नाम बन्नी बताया और बाद में पता चला कि एक तो वो शाकिब है और दूसरा वो शादीशुदा है। पिंकी को उसने उस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया कि उसने परेशान होकर खुद ही फाँसी लगा ली। ये सब उसके साथ तब हुआ जब वो शाकिब के प्रेम में पड़कर इस्लाम कबूलने को भी तैयार थी।

लव जिहाद के ये चर्चित मामले न पहले हैं और न ही आखिरी। अगर साजिश नहीं होती तो एक के बाद एक मामले सामने नहीं आते। आपको जानकार हैरानी होगी कि साल 2023 में ऑपइंडिया ने लव जिहाद से जुड़ी 153 खबरों को रिपोर्ट किया था और 2022 में भी ये लिस्ट 152+ थी। साल बदले हैं, लेकिन लव जिहाद और धर्मांतरण की खबरों ने आना अब भी बंद नहीं किया है। खबरों का विश्लेषण अगर करेंगे तो पता चलेगा कि हर बार हिंदू युवतियों को फँसाने का पैटर्न एक सा होता है।

पहले के लव जिहाद और अब के लव जिहाद में आ रहा क्या अंतर

मालूम हो कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए पहले हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए सीमित माध्यम थे। इनके निशाने पर घर के बगल में रहने वाली लड़कियाँ, स्कूल में पढ़ने वाली छात्राएँ, कॉलेज या कोचिंग जाने वाली लड़कियाँ होती थीं। हालाँकि अब जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लव जिहादियों ने अपना दायरा बढ़ा लिया है। इंस्टा और फेसबुक के माध्यम से ये अलग-अलग राज्यों की हिंदू लड़कियों को फँसा रहे हैं क्योंकि सोशल मीडिया ने तो इनके इस काम को और सरल बना दिया है। सोशल मीडिया पर पहले ये लड़कियों के डीएम तक जाते हैं, उनसे मीठी बातें करके उन्हें बहलाते हैं, उन्हें प्रेम जाल में फँसाते हैं और फिर ब्रेनवॉश करके धर्मांतरण की कगार पर ले आते हैं

इंस्टाग्राम-फेकबुक और लव जिहाद

आप आज अखबारों या समाचार चैनलों में जब लव जिहाद की खबरें पढ़ते होंगे तो उनमें अधिकांश मामलों में एक एंगल कॉमन मिलता होगा- इंस्टाग्राम-फेसबुक से दोस्ती का। ड्रग्स की लत की तरह इस्लामी कट्टरपंथी आज युवाओं को लगी सोशल मीडिया की लत का भी फायदा उठा रहे हैं। कैसे? आइए समझते हैं।

दरअसल, हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए इंस्टाग्राम और फेसबुक का इसलिए भी इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि वहाँ पहचान, प्रमाण पत्र के साथ उजागर नहीं होती। एक आईडी बनाई, एडिट डीपी लगाई, फर्जी नाम लिखा और बन गई नई पहचान। आप इन प्लेटफॉर्म पर जो नाम लिख देते हैं, दुनिया उसी को सच मान लेती है। और, इस्लामी कट्टरपंथी इसी का फायदा उठाते हैं।

पहले सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें डालते हैं कि हिंदू लड़कियों को गुमराह करने में आसानी हो। अपने आपको सेकुलर दिखाते हैं। हाथ में कलावा, प्रोफाइल में मंदिर की तस्वीर होती है। इसके बाद हिंदू लड़कियों को मैसेज करके उनसे करीबी बढ़ाई जाती है, उनसे मुलाकात के लिए बोला जाता है, उन्हें प्रेम जाल में फँसाया जाता है, होटल या कमरे में बुलाकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, उनकी फोटो-वीडियो ली जाती है और फिर शुरू होता है ब्लैकमेलिंग का असली काम।

इतना सब होने के बाद लड़की के पास सिर्फ दो रास्ते बचते हैं या तो बदनाम हो जाए या फिर धर्मांतरण कर ले।

सोशल मीडिया की यारी दोस्ती कितनी भयावह

  • साल 2023 में दिल्ली के शाहबाद डेयरी से एक बच्ची की निर्मम हत्या का मामला प्रकाश में आया था। आरोपित उसी का दोस्त मोहम्मद साहिल था, जिसने बीच गली में पत्थर से कूचकर लड़की को मार डाला था। बाद में साहिल गिरफ्तार हुआ। जब छानबीन बढ़ी तो पता चला दोनों की बातचीत इंस्टाग्राम पर हुई थी और साहिल उसके बाद से लड़की के पीछे था।
  • साल 2025 का मामला देखिए। मेरठ के गौतमबुद्धनगर में मुबस्सिर ने सचिन बनकर हिंदू युवती से इंस्टाग्राम पर दोस्ती की थी। उसके बाद उससे जाकर शादी भी रचाई। जब लड़की प्रेगनेंट हो गई तो वो उसपर धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा। बाद में सामने आया कि कट्टरपंथी मुबस्सिर ने ऐसा पहली लड़की के साथ नहीं किया था वो कई लड़कियों को इस तरह फँसाकर धर्मांतरण करवा चुका था। 
  • यूपी के मैनपुरी से भी ऐसा केस सामने आया था। एक दिन एक 17 साल की लड़की अपने घर से अचानक गायब हो गई। घरवालों ने परेशान होकर पुलिस में शिकायत दी। छानबीन हुई तो पता चला कि वो इंस्टाग्राम पर एक मुस्लिम लड़के से बात करती थी। लड़के का नाम अब्दुल्ला था। उसी ने उसे अगवा किया है। पुलिस जहा इसके बाद अब्दुल्ला और लड़की की तलाश में जुटी। वहीं परिवार केवल ये सोचता रहा कि उनकी बेटी के साथ ये सब हुआ क्या।
  • इनके अलावा ऊपर जो प्रिया-शमशाद के मामले का जिक्र किया था उसमें भी प्रिया को फेसबुक के जरिए ‘अमित गुर्जर’ नाम की आईडी से फँसाया गया था। ये दिखाकर कि गुर्जरों के साथ रहने वाला शमशाद गुर्जर ही है। हालाँकि सच्चाई खुली तो पैरों तले जमीन खिसक गई, लेकिन प्रिया करती भी क्या उस समय तक वो शमशाद से शादी कर चुकी थी और उसके पास लौटकर परिवार के पास जाने का विकल्प भी नहीं था।

आप इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए ठगी गई हिंदू लड़कियों की स्थिति के बारे में पढ़ेंगे तो आपको उनपर दया और गुस्सा दोनों आएगा। समझ नहीं पाएँगे कि आखिर कैसे जिहादियों के ट्रैप में आपकी बच्चियाँ फँस रही हैं, लेकिन जिस समय आपके मन में ये बातें चल रही होंगी उसी वक्त कोई ‘अब्दुल्लाह’ अमित बनकर आपके आसपास रहने वाली किसी और हिंदू लड़की को निशाना बना रहा होगा।

हमारे लिए ये समझना भले ही मुश्किल हो कि आखिर इतने मामले खबरों में आने के बाद कैसे जिहादियों के चंगुल में लड़कियाँ फँस जाती है, लेकिन आप अगर गौर से देखेंगे तो समझ पाएँगे कि इस काम के लिए पूरा माहौल बनाया जाता है। ऐसा माहौल जिसके भीतर की साजिश को समझना एक 15-16 साल की लड़की के लिए मुश्किल होता है। उन्हें सिर्फ वो सुहानी तस्वीरें ही दिखती हैं जो उस लड़के ने अपने प्रोफाइल पर डाली हों, वो मीठी बातें ही अच्छी लगती हैं जो उसने डीएम में की हो। धीरे-धीरे उसे पता नहीं चलता कि हिंदू घर में पली-बढ़ी लड़की को बुर्का-हिजाब क्यों अच्छा लगने लगता है और मंदिर-भगवान से जुड़ी बातें उसे क्यों खटकती जाती हैं। कुछ दिन बाद उसके पोस्ट में एक सेकुलर झुकाव दिखाई देता है और एक समय आता है जब वो स्पष्ट तौर पर सिर्फ इस्लाम की बातों को प्रचारित-प्रसारित करना ही अपना उद्देश्य मान लेती है।

ऑनलाइन गेमिंग के बीच इस्लाम कबूलों की धुन

इस्लामी कट्टरपंथी इस बात को अच्छे से जानते हैं कि आज मॉर्डन होने की रेस में हिंदू परिवार बच्चों को धर्म से जोड़ने में उनके परिवारों से पीछे हैं। वो इसी लूपहोल का फायदा उठाकर अपने मजहब की बातें लड़कियों को पढ़ाते-समझाते हैं और अपने मकसद की ओर आगे बढ़ते हैं। हिंदुओं के लिए चिंताजनक बात ये है कि उनकी बेटियों को फँसाने के लिए ये कट्टरपंथी हर माध्यम पर अपनी पैठ बनाकर बैठे हैं। आप सोचते हैं कि बच्चे सोशल मीडिया नहीं चला रहे, फोन में सिर्फ गेम खेल रहे हैं और इससे वो जिहादी मानसिकता से बच्चे बच जाएँगे… तो आपकी ये गलतफहमी है।

आपको ये बता दें कि अब ‘ऑनलाइन गेमिंग’ भी जिहादियों के लिए धर्मांतरण के लिए एक मीडियम बन गया है। आज के युवाओं में एक ओर जहाँ ऑनलाइन गेमिंग (लूडो, पबजी) का क्रेज बढ़ रहा है और इसका असर उनके करियर, शिक्षा पर पड़ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए लव जिहाद और धर्मांतरण करने का एक हाईटेक माध्यम है। सोशल मीडिया की तरह यहाँ भी कट्टरपंथी नाम बदलकर हिंदू लड़कियों के साथ संपर्क में आते हैं। खेल खेलते-खेलते उनसे दोस्ती करते हैं और फिर शुरू होता है बातों-बातों में ब्रेनवॉश करने का सिलसिला। अचंभित करने वाली बात ये है इस हद तक हिंदू युवाओं को फाँसा जाता है कि बिन सामने वाले को जाने-पहचाने ही पीड़ित धर्म बदलने की बात को मान जाता है।

ऑनलाइन गेमिंग के जरिए किए जा रहे खेल को भी उदाहरण के साथ समझते हैं।

पिछले दिनों धर्मांतरण गिरोहों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन कालनेमि शुरू हुआ था। इस ऑपरेशन के तहत पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया जो हाईटेकनॉलजी का इस्तेमाल करके युवाओं का ब्रेनवॉश करता था, फिर उन्हें धर्मांतरित कराता था। छानबीन में पता चला कि इस गैंग का कनेक्शन सिर्फ पाकिस्तान से नहीं बल्कि दुबई से भी है। विदेश में बैठे इस्लामी कट्टरपंथी हिंदू लड़कियों को रिझाने के लिए काम पर लगाए गए हैं जो उन्हें बहला-फुसलाकर मुस्लिम बनने को कहते हैं, उन्हें इस्लाम कबूल करने के फायदे गिनाते हैं। 

मामला तब खुला था जब दो लड़कियों ने आकर इस संबंध में शिकायत दी और इसमें जो उन्होंने बताया उससे पता चला कि इस्लामी गैंग पहले ऑनलाइन गेम्स के जरिए लड़कियों को फँसाते थे और उसके बाद उन्हें पाकिस्तान से सीधा कुरान की तालीम दिलवाई जाती थी। बाद में दिल्ली बुलाकर उनका आधार कार्ड बदला जाता था और फिर उनका निकाह कर उन्हें मुस्लिम समाज से जोड़ा जाता था।

पुलिस ने बताया कि जिस लड़की ने इस संबंध में शिकायत दी उसका धर्मांतरण करवाकर नाम सुमैया किया जा चुका था। उसका कनेक्शन पाकिस्तान और मिस्र के लड़कों से था। वो लड़के ही इसे धर्मांतरण के लिए बार-बार बोलते थे और तरह-तरह के लालच देते थे। इन लड़कों ने समुैया के अकॉउंट में भी बहुत सारे पैसे डलवाए थे। उसे लगातार अरबी का ज्ञान दिया जा रहा था। पुलिस का कहना था कि एक लड़की के ब्रेनवॉश और उसके धर्मांतरण के लिए पूरी एक टीम काम में लगी हुई थी।

देहरादून पुलिस ने यहाँ एक महत्वपूर्ण खुलासा और किया कि ये गैंग लड़कियों को फँसाने के लिए रिवर्ट मुस्लिमों का इस्तेमाल करती थी। इसका अर्थ होता है कि जो लोग हिंदू से मुस्लिम बनाए गए हों और वो ब्रेनवॉश में सहायता करें। सुमैया के मामले में अब्दुल रहमान को आधार बनाया गया था। अब्दुल रहमान उसे बताता था कि कैसे मुसलमान बनने के बाद उसके जीवन में परिवर्तन आए।

लड़की इस जाल में फँसी और जब होश आया तो शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुँची। लड़की ने देश के हिंदुओं से अनुरोध किया कि अपने बच्चों को धर्म से जुड़ी जानकारी दीजिए, उनसे जुड़े रहिए, उनकी अच्छी-बुरी आदतों पर नजर रखिए, माता-पिता अपने बच्चों से जितना क्लोज कनेक्शन रखें उतना बच्चों के लिए अच्छा है।

अगला मामला जबलपुर से है

मॉर्डन हिंदू परिवार बन रहे इस्लामी कट्टरपंथियों का शिकार

हिंदू आज ऐसी स्थिति में आ चुके हैं कि उनके सामने मॉर्डन होने और सेकुलर दिखने का एक सामाजिक दबाव ज्यादा है। शायद यही वजह है कि अपने बच्चों की एक्टिविटीज पर उनका ध्यान अब उतना नहीं रहा। नतीजा क्या है हम सब जानते हैं। ड्रग का लती बनाना हो, इंस्टाग्राम पर लड़कियों को फँसाना हो या ऑनलाइन गेमिंग के जरिए ब्रेनवॉश करना… इस्लामी कट्टरपंथी सब अच्छे से कर पा रहे हैं।

हालाँकि, ये उनकी गलतफहमी है कि उनके ये हथकंडे और ये नए पैटर्न कोई डिकोड नहीं कर पा रहा। हिंदू धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं और हिंदू संगठन सक्रिय। जगह-जगह जिहादियों के कुकर्मों की पोल इन्हीं कारणों से खुल रही है। आपको होटलों के कमरों और पार्क की झाड़ियों तक में किसी ऐसे मामले के बारे में यदि पता चलता है तो शुरू में शायद आपको ये किसी की निजता पर हमला करने का प्रयास तक लगे, लेकिन आपको ये पता होना चाहिए कि हिंदू लड़कियों को सोशल मीडिया पर फँसाकर मिलने के नाम पर जिहादी ऐसी ही जगहों पर लाते हैं। जहाँ कभी ड्रग्स देकर लड़कियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म होता है या कभी बहला-फुसलाकर उनके साथ संबध बनाकर उनकी वीडियो-फोटो बना ली जाती है।

कैफे-क्लब- लव जिहाद के मॉर्डन अड्डे

प्रेम का झाँसा देकर लड़कियों के धर्म से लेकर उनकी अस्मत को सब छीन लिया जाता है और ऐसा तब से और धड़ल्ले से होता दिख रहा है जब से इस्लामी कट्टरपंथियों को ये सब करने के लिए जगह उपलब्ध होने लगीं। इन जगहों में होटल-कैफे-क्लब जैसे स्थान आते हैं। यहाँ हिंदू लड़कियों को दोस्त बनाकर लाया जाता है, उन्हें नशा देकर फिर उनका यौन शोषण होता है।

मुरादाबाद से लेकर देहरादून तक में ऐसे कई कैफेज का खुलासा हो चुका है, जो धंधे की आड़ में लव जिहाद करवा रहे थे। हिंदू संगठनों को इनकी जानकारी हुई तो इनसे जुड़ी खबरें मीडिया में आईं और सामने आया कि कैसे मुस्लिम युवक हिंदू युवतियों को यहाँ लाते हैं और फिर उन्हें अलग से बैठकर गलत काम करने के लिए जगह उपलब्ध कराई जाती है। इस दौरान कुछ ऐसे भी कैफेज के बारे में भी पता चला जहाँ छोटे-छोटे केबिन बनाकर पर्दा लगा दिया जाता है। फिर उस स्पेस को 400-500 रुपए में आसानी से ऐसे लोगों को उपलब्ध करवाया जाता है

  • पिछले दिनों ऐसी घटना के लिए देहरादून के विकास मॉल में चल रहा ‘7th हेवन कैफे खूब बदनाम हुआ था। बताया गया था कि वहाँ हिंदू युवती के साथ लव जिहाद की कोशिश की जा रही थी। लड़की इतनी लाचार हो गई थी कि उसे बजरंग दल से इस मामले में मदद माँगनी पड़ी और बाद में ये मामला सामने आ पाया।
  • इसी तरह राजस्थान के भीलवाड़ा में मुस्लिम युवकों ने हिंदू लड़कियों को ब्लैकमेल और यौन शोषण के मामले में फँसाया था। घटना मार्च की है। पीड़िता का कहना था कि मार्च 2024 में वो अपनी सहेली के साथ कैफे गई थी। वहीं उसे कॉफी के नाम नशीला पदार्थ पिलाकर रेप किया गया, फिर आरोपितों ने यहाँ उसके अश्लील फोटो खींचे, वीडियो बनाए और बाद में उसे ब्लैकमेल किया गया। इसके बाद अन्य साथियों ने भी युवती का शोषण किया था। इस केस में कुल 8 गिरफ्तारियाँ हुई थीं- इनमें अशरफ अली, सनवीर मोहम्मद, शाहरुख खान, सोयबनूर, फैजान, सोहेब, खालिद और आमिर का नाम था।
  • इसी प्रकार ‘कैफे जिहाद’ से जुड़ा मामला ब्यावर से भी सामने आया था। फरवरी 2025 में सामने आई इस घटना ने अजमेर कांड की याद दिला दी थी। इस मामले में मुस्लिम गैंग कैफे में ले जाकर हिंदू लड़कियों के साथ गलत काम करती थी। उनका यौन उत्पीड़न किया जाता था। फिर उन्हें लालच देकर, बरगलाकर, धर्मांतरित करने का प्रयास किया जाता था।
  • फिर, भोपाल का कैफे‑क्लब ‘क्लब‑90’ भी लव जिहादों के कारण सुर्खियों में। आरोप लगा था कि यहीं हिंदू छात्राओं से बलात्कार कर उनका वीडियो बनाया गया और फिर उन्हें परेशान किया गया। जब प्रशासन के पास ये मामला खुला तो प्रशासन ने एक्शन में आया। छानबीन हुई तो पता चला कैफे सरकारी जमीन पर गैर कानूनी तरीके चल रहा था। प्रशासन ने फौरन उसकी लीज रद्द करके वहाँ बुलडोजर चलाया।

अजीबोगरीब बात ये है कि कैफे-होटल और क्लबों में होती ऐसी गतिविधियों के बारे में तमाम खबरें आने के बावजूद इनपर एक्शन तब लिया जाता है जब कोई हिंदू संगठन आवाज उठाए। उससे पहले जिस समय ये कैफे खुलते हैं, इनका विज्ञापन शुरू होता है और इसमें दी जाने वाली सुविधाओं के विजुअल्स दिखाए जाते हैं, तब कोई आवाज नहीं उठाता। बड़े-बड़े इन्फ्लुएंसर यहाँ लोगों को आने के लिए रील बनाते हैं। ऐसे कमरों को खुलेआम दिखाया जाता है जहाँ सेक्स टॉय आदि रखे हों। प्राइवेट स्पेस के लिए कैबिन बने हों।

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग का पैटर्न और भारत में इस्लामी कट्टरपंथियों में क्या समानता है

गौरतलब है कि भारत में हिंदू लड़कियों को जिस तरह से फँसाने के लिए अलग-अलग पैटर्न अपनाए जा रहे हैं और इ्न्हें देखकर सतर्क रहने की जो चेतावनी दी जा रही है वो बेकार की नहीं है। एक तरफ इस्लामी कट्टरपंथी है जिनका 2047 तक उद्देश्य है कि भारत को इस्लामी मुल्क बनाएँ और दूसरी तरफ हिंदू हैं जिन्हें आधुनिक होने में अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ना है। वही अंग्रेज जो खुद इस कट्टर मानसिकता से अपनी बच्चियों को नहीं बचा पाए।

जी हाँ! 1980 से लेकर 2011 के बीच ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग एक्टिव था। इस गैंग में अधिकांश सदस्य पाकिस्तानी मूल के थे जिनके लिए श्वेत लड़कियाँ सिर्फ यूज एंड थ्रो वाला सामान थीं। वो छोटी-छोटी मासूम लड़कियों को अपने जाल में फँसाते थे और फिर उनका ड्रग देकर उनसे रेप करते थे और दूसरों से भी रेप करवाते थे। इस गैंग का प्रभाव वहाँ इतना था कि अगर कोई पीड़ित शिकायत करने जाता था तो पुलिस उलटा उसे दोषी बताने में जुट जाती थी। न पीड़त परिजनों की सुनी जाती थी और न उस लड़की की जिसके साथ ग्रूमिंग गैंग ने अत्याचार पर अत्याचार किए हों। उन्हें सेक्स स्लेव बनकर जीने को मजबूर किया हो।

मीडिया में ही मौजूद पीड़िताओं के बयान को पढ़ेंगे तो आपकी रूह काँप जाएगी। पता चलेगा कि कैसे कट्टर मानसिकता वाले इन लोगों में ‘काफिर’ श्वेत युवतियों के लिए नफरत भरी थी। इन लड़कियों का ग्रूमिंग गैंग खुद तो रेप करती ही थी। साथ में दूसरों के आगे भी परोसती थी कि वो एक-एक कर बच्चियों को नोचें।

एमिली (बदला नाम) एक पीड़िता ने इस संबंध में मीडिया को बताया भी था। उसने खुलासा किया था कि कैसे एक उसे गैंग ने अपने चंगुल में तब फँसाया जब वो मात्र 14 साल की थी। एमिली ने खुलासा करते हुए बताया था कि ग्रूमिंग गैंग ने उसके साथ 1000 से अधिक बार रेप करवाया था। लड़के आते थे उसे गाली देते थे और दरिंदगी हद्द रोज पार होती थी। एमिली के मामले में और भारत में सामने आ रहे केसों में ज्यादा अंतर नहीं है। जितना आधुनिक हम दिखना चाह रहे हैं वहाँ लड़कियाँ एमिली वाली ही गलतियाँ कर रही हैं।

एमिली के केस में ग्रूमिंग गैंग ने उसे कबाब, शराब, फ्री सिगरेट और पार्टी के नाम पर अपने चंगुल में फँसाया था और भारत में लड़कियों को लक्जरी से भरी जिंदगी दिखाकर अपने वश में करने का काम हो रहा। एमिली को शराब-सिगरेट का लालच दिया गया था भारत में लड़कियों को MD जैसे ड्रग्स का लती बनाया जा रहा है। ब्रिटेन में रहकर वहाँ की मूल श्वेत लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा था और हिंदुस्तान में रहकर हिंदू लड़कियाँ निशाने पर हैं। आपके भीतर का सेकुलरिज्म चाहे स्वीकार करे या न करे लेकर जगह-जगह से आने वाली घटनाएँ इस बात का सबूत हैं कि इस्लामी कट्टरपंथियों का मकसद हर जगह एक ही है। चाहे वो भारत हो या ब्रिटेन। उन्हें नफरत हर उस शख्स से है जो उनके मजहब के अंतर्गत नहीं आता।

ऑपरेशन सिंदूर से लेकर राफेल, एअर इंडिया क्रैश से तेल खरीद तक… भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा कर रहा Reuters: पाकिस्तान-चीन का बना भोंपू, जानें ब्रिटिश संस्थान के कारनामे

भारत ने आजादी के बाद से तेजी से तरक्की की है। वर्ष 2025 में वह विश्व की चौथी सबसे बड़ी इकॉनमी है। उसके पास विश्व में सबसे ताकतवर में से एक सेना है। भारत लोकतंत्र के मोर्चे पर भी सफल रहा है। यह सभी उपलब्धियाँ जहाँ भारतीयों को गर्व से भरती हैं तो वहीं विदेशी मीडिया को इससे चिढ़ होती है। विदेशी मीडिया संस्थान भारत को गरीब, कमजोर, पिछड़ा और अनपढ़ देखना चाहते हैं। उनकी रिपोर्टिंग में औपनिवेशिक झलक अब तक दिखती है। इस काम में एक ब्रिटिश संस्थान सबसे आगे है, नाम है रायटर्स (Reuters)।

रायटर्स ब्रिटिश संस्थान है और इसका मुख्यालय लन्दन में है। इसका फोकस अमूमन बिजनेस से जुड़े मामले रहते हैं। हालाँकि, यह अंतरराष्ट्रीय मामलों में खबर देने वाली वैश्विक एजेंसी भी है। रायटर्स भारत में लम्बे समय से काम करता आया है। लेकिन इसकी भारत के प्रति रिपोर्टिंग हमेशा ही ईर्ष्या से भरी रही है। रायटर्स ने ऑपरेशन सिंदूर से लेकर ऑपरेशन महादेव और यहाँ तक कि एअर इंडिया विमान हादसे मामले तक में झूठी या फिर भ्रामक रिपोर्टिंग की है और भारत विरोधी प्रोपेगेंडा चलाया है। यह सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर बना चीन-पाकिस्तान का भोंपू

रायटर्स लगातार भारत विरोधी खबरें छापने में आगे रहा है। वह भारत का पक्ष तो अपनी खबरों में नहीं ही रखता, बल्कि पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के हवा-हवाई दावों के आधार पर रिपोर्ट भी बना देता है। इसका एक बड़ा उदाहरण रायटर्स ने मई, 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पेश किया। 9 मई, 2025 को रायटर्स ने भारतीय लड़ाकू विमानों के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गिरने की एक खबर प्रकाशित की।

ऑपरेशन सिंदूर पर रायटर्स का पाकिस्तान समर्थक प्रोपेगेंडा

इस खबर में कहा गया कि पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स में शामिल चीन के बनाए लड़ाकू विमानों ने भारत के 2 लड़ाकू विमान गिरा दिए। दावा किया गया कि चीन में निर्मित यह विमान भारतीय वायु सेना के खिलाफ काफी कारगर रहा। यह खबर पूरी तरह से कथित अमेरिकी सूत्रों पर लिखी गई और इसे लिखने वाले भी 2 पाकिस्तानी पत्रकार हैं जो अमेरिका और लन्दन में रहते हैं। इनके नाम सईद शाह और इदरीस अली हैं। इन्होंने यह तथ्यहीन कहानी तब बेची जब भारत ने कोई भी लड़ाकू विमान गिरने की बात स्पष्ट ही नहीं की थी।

भारत के किसी लड़ाकू विमान गिरने की पुष्टि ऑपरेशन सिंदूर के 2 महीने पूरा होने बाद भी नहीं हो पाई है। लम्बे-लम्बे दावे करने वाला पाकिस्तान भी इससे जुड़े सबूत पेश नहीं कर सका है। हालाँकि, रायटर्स के लिए यह सब तथ्य मायने नहीं रखते। रायटर्स ने इन सब तथ्यों को किनारे करते हुए पाकिस्तान के प्रवक्ता की तरह भारतीय लड़ाकू विमानों के गिरने की घोषणा कर दी। उसने चीन का पक्ष लेने को बिना किसी सबूत के चीनी लड़ाकू विमान सफल भी बता दिए। रायटर्स यह अब भी कर रहा है।

अब भी जारी राफेल पर प्रोपेगेंडा

रायटर्स का प्रोपेगेंडा राफेल पर अब भी जारी है। ऑपरेशन सिंदूर के लगभग तीन महीने पूरे होने के बाद भी रायटर्स पाकिस्तान की बोली बोल रही है। रायटर्स ने अब एक प्रोपेगेंडा लेख में दावा किया है कि भारतीय सेनाएँ इस बात का अंदाजा नहीं लगा पाईं कि पाकिस्तान के पास जो चीनी हथियार हैं वह ज्यादा दूरी तक मार कर सकते हैं। रायटर्स का कहना है कि इसी के चलते भारतीय एयर फ़ोर्स के विमान पाकिस्तानी मिसाइल का निशाना बने।

रायटर्स का दावा है कि चीन में बनी इस PL-15 मिसाइल ने लगभग 200 किलोमीटर दूर भारतीय विमान मार गिराए। रायटर्स ने अपने इस आर्टिकल में पाकिस्तानी वायु सेना प्रमुख को किसी युद्ध के हीरो की तरह पेश किया है। इसके अलावा इस लेख में पाकिस्तानियों के पक्ष का बोलबाला है जबकि ना भारतीय वायु सेना के किसी अधिकारी का जिक्र है और ना ही भारत का पक्ष रखा गया है। रायटर्स का यह लेख पाकिस्तान को विजेता दिखाने के साथ ही चीन के हथियारों के लिए एड सरीखा लगता है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी पश्चिमी देश के मीडिया आउटलेट ने चीन के हथियार दुकानदार की तरह का रवैया अपनाया हो। इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी रायटर्स, ब्लूमबर्ग, FRANCE24 समेत बाकी पश्चिमी देशों के मीडिया आउटलेट्स ने चीन के हथियारों के लिए प्रशस्ति गान गाए थे। हालाँकि, सच्चाई यह है कि इस ऑपरेशन के दौरान चीन की बनाई PL-15 मिसाइल और उसके ड्रोन ताश के पत्तों की तरह जमीन में आकर गिरे। भारत को इनका मलबा भी बरामद हुआ है।

एअर इंडिया हादसे पर बोइंग के बचाव में उतरा

रायटर्स सिर्फ पाकिस्तानी या अमेरिकी हितों के लिए काम करता हो, ऐसा नहीं है। वह अपने अमेरिकी आकाओं के लिए भी वफादार है। 12 जून, 2025 को अहमदाबाद में हुए विमान हादसे में यही बात सामने आई। एअर इंडिया हादसे की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट आने से पहले ही रायटर्स समेत बाकी विदेशी मीडिया ने पायलट को दोषी ठहराना चालू कर दिया था। रायटर्स ने अपनी रिपोर्ट्स के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया जैसे पायलट की गलती की वजह से ही विमान क्रैश हुआ है।

इन्हीं रिपोर्ट्स में बोइंग को लेकर एक शब्द नहीं कहा गया था। बोइंग को साफ़ तौर पर इन रिपोर्ट्स में क्लीन चिट दी गई थी। 13 जुलाई, 2025 को भी एक रिपोर्ट में रायटर्स ने फिर से पायलटों को दोषी ठहराया। उसने AAIB की शुरूआती जाँच रिपोर्ट के सहारे पायलटों को दोषी बताया था। रायटर्स के रिपोर्ट करने के तरीके से यह भ्रम होता कि पायलट ने जान-बूझ कर फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद किया, जिसके चलते इंजन बंद हुए और 250 से अधिक लोग मारे गए।

कश्मीर में मारे गए आतंकियों को बताया ‘मेन’

कश्मीर को लेकर पश्चिमी देशों के प्रेस का पक्षपाती रवैया किसी से छुपा नहीं है। रायटर्स लेकिन कश्मीर पर प्रोपगेंडा करते-करते आतंकियों का पक्ष लेना भी चालू कर देता है। हाल ही में भारतीय सेना ने कश्मीर में ‘ऑपरेशन महादेव’ चला कर तीन आंतकी मार गिराए। यह वही आतंकी थे, जिन्होंने पहलगाम में 26 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। यह तीनों पाकिस्तानी आतंकी थे। इनकी पहचान को लेकर भी जानकारी स्पष्ट हो गई थी।

रायटर्स को इनके प्रति सहनुभूति का ज्वर आ गया और उसने इन्हें ‘मेन’ बता कर संबोधित किया। रायटर्स ने इस एनकाउंटर पर ऐसी खबर बनाई जिससे लगे कि सेना ने किन्हीं तीन निर्दोष नागरिकों को मार दिया है। रायटर्स की इस खबर को लेकर खूब ट्रोलिंग हुई। बाद में उसने चुपके से इस खबर में हैडलाइन भी बदल दी। हालाँकि, रायटर्स ने इस पर ना कोई माफी माँगी ना ही कोई सफाई पेश की। रायटर्स जम्मू-कश्मीर को इंडियन एडमिनिस्टर्ड कश्मीर लिखता है जबकि पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाए हिस्से को सीधे पाकिस्तानी बताता है।

रूसी तेल खरीद पर भी बोला झूठ

रायटर्स भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नीचा दिखाना चाहता है। उसने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर टैरिफ के ऐलान के बाद रूस से तेल खरीद को लेकर एक फर्जी खबर चलाई। रायटर्स ने दावा किया कि ट्रंप के टैरिफ के ऐलान के बाद भारतीय तेल कम्पनियों ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है। इसका आधार रायटर्स ने कोई ‘सूत्र’ बताए। रायटर्स की खबर में सूत्र कौन थे, बस यह स्पष्ट नहीं किया गया। इस खबर का सन्देश था कि भारत सरकार, ट्रंप की धमकी से डर गई है।

रायटर्स के इस झूठ का खंडन सरकार ने ही कर दिया। सरकारी सूत्रों ने मीडिया को बताया कि किसी के कहने से भारत तेल की खरीद ना चालू करता ना रोकता है। न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, दो वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत की तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाल से दावा किया गया है कि सरकार ने तेल कंपनियों को रूस से आयात कम करने का कोई निर्देश नहीं दिया है।

रायटर्स ने लेकिन इस बीच यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि भारत के निर्णय अमेरिका के दबाव में तय होते हैं। दरअसल, रायटर्स के लगातार भारत पर झूठी और भ्रामक खबरें फ़ैलाने का एक बड़ा कारण है पहचान। यह एक ब्रिटिश संस्थान है। ब्रिटिश मीडिया संस्थान आज भी भारत को औपनिवेशिक चश्मे से ही देखते हैं। उनको भारत 1947 से पहले वाला ही दिखाई पड़ता है जहाँ आधे जनों के पास कपड़े नहीं हैं, करोड़ों के पास अन्न नहीं है और जो एलीट हैं वो खुद काले अंग्रेज हैं।

रायटर्स को यह समझना चाहिए कि यह नया भारत है जो बदल चुका है।

‘तमिलनाडु की चुनावी प्रक्रिया में दखल दे रहे बिहारी’: P चिदंबरम ने दिखाई कश्मीर के 370 वाली सोच, बिहारियों के खिलाफ घृणा पर कॉन्ग्रेस की साथी RJD ने साधी चुप्पी

कॉन्ग्रेस के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने एक ट्वीट करके तमिलनाडु में रहने वाले ‘बाहरियों’ खासकर बिहार के लोगों को नीचा दिखाने का काम किया है। उन्होंने तमिलनाडु में रहने वाले बिहारी प्रवासी मजदूरों को ‘बाहरी’ बताकर उनके वोटर बनने के हक पर सवाल उठाए। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘गैरकानूनी और खतरनाक’ है।

चिदंबरम ने बिहार में 65 लाख वोटरों के नाम कटने का खतरा होने की बात कही। उनके ट्वीट का लहजा ऐसा है, जैसे बिहारी मजदूर तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही न हो।

चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर और उनके ‘स्थाई घर’ को बिहार बताकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाई। ये बातें सुनने में तो चुनावी नियमों की चिंता जैसी लगती हैं, लेकिन असल में ये बिहारियों को बाहरी और खतरे के रूप में दिखाने की कोशिश थी। वैसे भी, यह कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काकर वोट की राजनीति करता रहा है। चिदंबरम का ये बयान उसी पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसे कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी चुपचाप बढ़ावा देते रहे हैं।

चिदंबरम ने की बिहारियों को नीचा दिखाने की कोशिश

चिदंबरम ने रविवार (3 अगस्त 2025) को X पर ट्वीट किया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘खतरनाक और गैरकानूनी’ है। उन्होंने सवाल उठाया कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों बन रहे हैं, जब उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है। उन्होंने छठ पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि ये मजदूर बिहार लौटते हैं, तो फिर तमिलनाडु में वोटर बनने का क्या हक? चिदंबरम ने इसे चुनाव आयोग की साजिश बताकर तमिलनाडु के ‘चुनावी चरित्र’ को बदलने का आरोप लगाया।

ये बातें सुनने में तो तकनीकी लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद बिहारियों को तमिलनाडु में बाहरी और अनचाहा दिखाना था। चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर उनकी पहचान को सिर्फ मजदूरी तक सीमित कर दिया, जैसे वे तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही नहीं हैं। यह न सिर्फ बिहारियों का अपमान है, बल्कि भारत के संविधान का भी उल्लंघन है, जो हर नागरिक को देश में कहीं भी रहने, काम करने और वोट देने का हक देता है। चिदंबरम का ये बयान बिहारियों को दोयम दर्जे का नागरिक बताने की कोशिश है।

बिहारी क्यों नहीं, जब राहुल को हक है?

चिदंबरम का बयान और कॉन्ग्रेस की नीति तब और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम राहुल गाँधी की बात करते हैं। राहुल गाँधी दिल्ली के स्थाई निवासी हैं, लेकिन वे केरल के वायनाड और उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ चुके हैं। अगर राहुल गाँधी दिल्ली में रहकर दूसरे राज्यों में वोटर बन सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं, तो बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों नहीं बन सकते? क्या नियम सिर्फ बिहारियों के लिए अलग हैं?

भारत का कानून साफ कहता है कि कोई भी नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। इसके लिए फॉर्म 6 भरना होता है, जिसमें निवास स्थान बदलने की अर्जी दी जाती है। और ये जरूरी नहीं कि आपके पास अपना मकान हो। किराए के घर में रहने वाला भी वोटर बन सकता है।

चिदंबरम और कॉन्ग्रेस ये बात अच्छे से जानते हैं, लेकिन फिर भी बिहारियों को ‘स्थायी रूप से बसे हुए’ कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। ये लोग भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों से बिहारियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहारी इतने भोले नहीं हैं।

जेडीयू के प्रवक्ता और विधान परिषद के सदस्य नीरज कुमार ने चिदंबरम के ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नीरज कुमार ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी का आज जो हश्र है, वो क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान न करने की वजह से है। क्षेत्रीय भावनाओं के उभार के साथ कॉन्ग्रेस का समर्थन कम होता गया। कॉन्ग्रेस ने अपने राज्य में असमान विकास किया। बिहार के साथ भेदभाव किया। अब इनकी स्थिति ये है कि ये देश में संविधान को खतरा बनाते हैं। ये चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जो लोग तमिलनाडु या किसी भी अन्य राज्य में रहते हैं, वो वहाँ के वोटर बनते हैं। ये सामान्य है। बिहार में रहने वाली तमिलनाडु की नर्सें भी वोटर रही हैं, लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। ये तो इंडी गठबंधन सुविधा की बात हुई। राहुल गाँधी कहीं से भी चुनाव लड़ लें… आरजेडी किसी को हरियाणा से लाकर राज्यसभा भेज देती है। लेकिन बिहार का नाम आते ही ये लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।”

नीरज कुमार ने आगे कहा, “बिहार SIR में तेजस्वी यादव के नाम 2 EPIC नंबर मिले हैं। अब उन्होंने चुप्पी साध ली है। क्या राहुल गाँधी का यही परमाणु बम था, तेजस्वी यादव ने अपने सर पर फोड़ा।” उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस का मूल चरित्र सुविधा के हिसाब से बदलने का है। बिहार बोझ किसी का नहीं है, वो बोझ उठाने वाले लोग हैं। चंपारण के सत्याग्रह से लेकर आजादी की लड़ाई में बिहार का योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि चिदंबरम जैसे लोग जो कह रहे हैं, वो बैकवर्ड राज्यों के लिए उनकी घृणा दिख रही है।

इंडी गठबंधन का बिहार विरोधी रवैया

चिदंबरम का बयान कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों को निशाना बनाकर राजनीति करता रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने बिहारी प्रवासियों को बीजेपी का समर्थक बताकर बंगाली अस्मिता के खिलाफ खड़ा किया। ममता बनर्जी ने हिंदी भाषी प्रवासियों खासकर बिहारियों को ‘बाहरी’ कहकर बंगाल की जनता को भड़काया। इस दौरान बिहारियों के योगदान को नजरअंदाज किया गया, जो कोलकाता से लेकर छोटे शहरों तक मेहनत करके बंगाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र में इंडी गठबंधन का हिस्सा शिवसेना ‘मराठी माणूस’ के नाम पर बिहारियों को निशाना बनाती रही है। 2000 के दशक में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई और अन्य शहरों में बिहारी मजदूरों पर हमले किए, उन्हें नौकरियाँ छीनने वाला बताया। मारवाड़ी और गुजरातियों को भी निशाना बनाया गया, लेकिन बिहारी सबसे आसान शिकार थे। कॉन्ग्रेस ने इन हमलों पर चुप्पी साधे रखी। यह दिखाता है कि कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी बिहारियों के खिलाफ नफरत को चुपचाप बढ़ावा देते हैं।

आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) चिदंबरम के बयान पर चुप्पी साधे हुए है। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी RJD जो सामाजिक न्याय की बात करती है, वो इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ने पी चिदंबरम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “चिदंबरम का बयान बिहारियों के लिए अपमानजनक है। वे हमें दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं। कॉन्ग्रेस को माफी माँगनी चाहिए और आरजेडी की चुप्पी बिहार के गौरव के साथ धोखा है।” उन्होंने कहा कि बिहारी मजदूर देश भर में मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार अपमान सहना पड़ता है।

जदयू के मुख्य प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बिहार के लोगों ने देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने खून पसीने से सींचा है। अगर वो तमिलनाडु में लंबे समय से हैं, और वहाँ की वोटिंग प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इससे चिदंबरम या किसी को तकलीफ क्यों हो?”

उन्होंने कहा कि चिदंबरम और कॉन्ग्रेस का मकसद चुनाव को बिहारी वर्सेज बाहरी बनाने की है। जो कि पूरी तरह से गलत है। ऐसा कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार कर रही है। उन्होंने कहा कि SIR पर कॉन्ग्रेस और सहयोगी दल ऊल-जलूल बयानबाजी करके सिर्फ राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं, जबकि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में है और सुप्रीम कोर्ट ने खुद SIR को हरी झंडी दी है।

राजीव रंजन ने कहा, “चिदंबरम का बयान कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति को दिखाता है। ये लोग गरीबों की बात करते हैं, लेकिन बिहारी मजदूरों को राजनीतिक बोझ मानते हैं। आरजेडी की चुप्पी बताती है कि वे बिहार के लोगों से ज्यादा राहुल गाँधी के वफादार हैं।”

आरजेडी की चुप्पी इसलिए और दुखद है, क्योंकि ये वही पार्टी है जो बिहार में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के हक की बात करती है। लेकिन जब उनके अपने लोग, बिहारी मजदूर, अपमानित हो रहे हैं, तो आरजेडी राहुल गाँधी के सामने सिर झुकाए खड़ी है। ये बिहार के लोगों के साथ गद्दारी है।

हालाँकि बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ ने चिदंबरम के बयान का ये कहकर बचाव किया कि चुनाव आयोग आरएसएस के इशारे पर ऐसे काम कर रहा है, जिसमें गैर-कानूनी तरीके से बाहरी लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाता है। कुछ खास वर्ग के लोगों के नाम हटाए जाते हैं, जबकि कुछ खास लोग हर चुनाव में राज्य बदलते हैं।

असित नाथ ने कहा कि बिहार के मजदूर धान की रोपाई-कटाई या खेती के कामों से बाहर जाते हैं, लेकिन बाद में लौट आते हैं। किसके पास इतनी फुरसत है कि वो वहाँ का वोटर बने? असित नाथ ने SIR की गड़बड़ियाँ भी गिनाई। उन्होंने ये भी कहा कि खुद उनकी पत्नी का नाम SIR की लिस्ट में नहीं है, जबकि लोकसभा चुनाव में उन्होंने वोट डाला था। अगर आखिरी लिस्ट में पत्नी का नाम नहीं आता, तो वो कोर्ट का रुख करेंगे। हालाँकि उन्होंने चिदंबरम के बिहार के मजदूरों को लेकर दिए बयान पर सीधे-सीधे कोई विरोध नहीं किया, भले ही वो बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता हैं।

बिहारी मजदूर है देश की रीढ़, फिर भी निशाना

बिहारी प्रवासी मजदूर देश के हर कोने में मेहनत करते हैं। 2018 में गुजरात में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म की अफवाह के बाद बिहारी मजदूरों पर हमले हुए। करीब 50,000 मजदूरों को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा। 2023 में तमिलनाडु में भी ऐसी अफवाहें फैलीं कि बिहारी मजदूरों पर हमले हो रहे हैं। हालाँकि डीएमके सरकार ने इन अफवाहों को खारिज किया और मजदूरों को सुरक्षा का भरोसा दिया, लेकिन चिदंबरम का ताजा बयान फिर से बिहारियों को निशाना बनाने का काम कर रहा है।

तमिलनाडु में करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं, जिनमें ज्यादातर बिहारी हैं। ये लोग टेक्सटाइल उद्योग, निर्माण कार्य और छोटे-मोटे व्यवसायों में योगदान देते हैं। बिहारी मजदूर सिर्फ मजदूर नहीं हैं; कई उद्यमी, शिक्षक और कुशल पेशेवर भी हैं। फिर भी चिदंबरम जैसे नेता उन्हें सिर्फ ‘मजदूर’ कहकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। यह न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि देश की एकता के लिए भी खतरनाक है।

चिदंबरम का तर्क कानूनी और नैतिक रूप से भी गलत

चिदंबरम का ये कहना कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर नहीं बन सकते क्योंकि उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है, कानूनी रूप से गलत है। भारत का संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 कहता है कि कोई भी भारतीय नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। अगर कोई बिहारी मजदूर सालों से तमिलनाडु में रह रहा है, तो वह वहाँ वोटर बनने का हकदार है। चिदंबरम का इसे ‘गैरकानूनी’ कहना कानून की गलत व्याख्या है।

छठ पूजा का जिक्र करके चिदंबरम ने बिहारियों को अस्थाई निवासी दिखाने की कोशिश की। लेकिन छठ पूजा के लिए बिहार लौटना कोई सबूत नहीं कि वे तमिलनाडु में स्थायी रूप से नहीं रहते। क्या तमिलनाडु कोई अलग देश है, जहाँ बाहरी लोग बस नहीं सकते? यह तर्क जम्मू-कश्मीर के पुराने आर्टिकल 370 जैसा लगता है, जो बाहरी लोगों को वहाँ बसने से रोकता था।

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे पी चिदंबरम

चिदंबरम का बयान ऐसे समय में आया है, जब बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। लेकिन चिदंबरम ने इसे तमिलनाडु बनाम बिहार का मुद्दा बनाकर 2026 के तमिलनाडु चुनावों के लिए क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काने की कोशिश की। यह रणनीति न सिर्फ बिहारियों को तमिलनाडु में अलग-थलग कर सकती है, बल्कि राज्यों के बीच तनाव भी बढ़ा सकती है।

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी की अगुवाई वाला इंडी गठबंधन बार-बार ऐसी राजनीति करता है, जो देश को बाँटने का काम करती है। एक तरफ वे ‘एकता में विविधता’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ चिदंबरम जैसे नेता बिहारियों को बाहरी बताकर नफरत फैलाते हैं। आरजेडी की चुप्पी इस बात का सबूत है कि वह बिहार के हितों से ज्यादा गठबंधन की राजनीति को तरजीह दे रही है।

जहर फैलाने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत

पी. चिदंबरम का बयान सिर्फ चुनाव आयोग की आलोचना नहीं, बल्कि बिहारी मजदूरों को अपमानित करने की कोशिश है। उन्हें तमिलनाडु में बाहरी और खतरे के रूप में दिखाकर वह क्षेत्रीय नफरत को हवा दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस का ये दोहरा चरित्र, जहाँ राहुल गाँधी खुद दूसरे राज्यों से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन बिहारियों को वोट देने का हक नहीं दिया जाता.. बेहद शर्मनाक है। इंडी गठबंधन का बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काने का इतिहास और आरजेडी की चुप्पी इस बात को और गंभीर बनाती है।

बिहारी मजदूर देश की रीढ़ हैं। वे करदाता हैं, वोटर हैं और भारत के विकास में हिस्सेदार हैं। उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, न कि अपमान। चिदंबरम और कॉन्ग्रेस को अपने बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए। आरजेडी को भी फैसला करना होगा कि वह बिहार के लोगों के साथ है या राहुल गाँधी की गुलामी करेगी। भारत की एकता को बनाए रखने के लिए ऐसे नेताओं को जवाबदेह बनाना जरूरी है।

मालेगाँव ब्लास्ट में लो योगी-मोदी का नाम, मोहन भागवत को भी केस में फँसाओ: साध्वी प्रज्ञा से लेकर ATS अधिकारी के बयान से समझें- कैसे रची गई थी देश से हिंदू नेतृत्व को खत्म करने की साजिश?

2008 के मालेगाँव विस्फोट के मामले में पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी 7 लोगों को बरी कर दिया गया है। इस हमले से जुड़ी कई साज़िशों का खुलासा होना बाकी है, जाँच एजेंसियाँ उसमें लगी हैं। इस ब्लास्ट की साज़िश के अलावा इस पूरे केस से जुड़े लोगों के बयानों को जोड़कर देखने से एक बात नजर आती है कि संभवतः इस ब्लास्ट की आड़ में देश से हिंदू नेतृत्व खत्म करने का भी प्रयास हो रहा था।

ऐसा कहने के पीछे कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं बल्कि लोगों के एक के बाद एक कई बयान हैं। इस बयानों से पता चलता है कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज में काम कर रहीं एजेंसियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(तब गुजरात के मुख्यमंत्री) , आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ (तब सांसद) को किसी भी तरह मालेगाँव विस्फोट के मामले में फंसाने के लिए लोगों पर दबाव बनाया था। इस केस से जुड़े कुछ लोगों के बयानों के ज़रिए समझते हैं कि किस तरह एजेंसियाँ लोगों पर दबाव बना रही थीं।

जबरन मोदी, योगी, भागवत का नाम लेने को कहा गया: साध्वी प्रज्ञा

मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भी आरोपित बनाया गया था। अब प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कहा है कि जाँच एजेंसियों ने उन पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत आरएसएस और बीजेपी के कई नेताओं का नाम लेने का दबाव बनाया था।

साध्वी प्रज्ञा ने कहा कि उस वक्त वह सूरत में रह रहीं थीं तो उनसे नरेंद्र मोदी का नाम लेने को कहा गया था। उन्होंने कहा, “मुझसे विशेष तौर पर नरेंद्र मोदी, मोहन भागवत, राम माधव, योगी आदित्यनाथ, इंद्रेश कुमार और कई अन्य बड़े नेताओं के नाम लेने को कहा गया था। मैंने वो नाम नहीं लिए इसलिए मुझे प्रताड़ित किया गया था।”

साध्वी प्रज्ञा ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन UPA सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इस पूरे झूठे मामले के पीछे कॉन्ग्रेस थी। उन्होंने कहा कि यह मामला भगवा और सशस्त्र बलों को बदनाम करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा था।

मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के लिए कहा गया: पूर्व ATS अधिकारी

साध्वी प्रज्ञा ऐसे दावा करने वालीं इकलौती नहीं है। मालेगाँव विस्फोट केस की जाँच में शामिल रहे महाराष्ट्र ATS के रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर मेहबूब मुजावर ने भी ऐसा ही दावा किया था। मुजावर ने कहा कि उस वक्त उन्हें कुछ खास लोगों को गिरफ्तार करने के गुप्त आदेश दिए गए थे, जिनमें RSS प्रमुख मोहन भागवत का नाम भी शामिल था।

मुजावर ने दावा किया कि इनका मकसद ‘भगवा आतंकवाद’ की झूठी कहानी गढ़ना था। हालाँकि, उन्होंने यह आदेश मानने से इंकार कर दिया था। उनका कहना है कि आदेश न मानने के बाद, उनके ऊपर आईपीएस अधिकारी परमवीर सिंह ने एक झूठा केस डाल दिया जिससे उनकी 40 साल की पुलिस सेवा खत्म हो गई।

कर्नल पुरोहित पर बनाया गया योगी का नाम लेने का दबाव

इस मामले में आरोपित बनाए गए लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित ने मई 2024 में कोर्ट में बताया था कि उन पर RSS, VHP के नेताओं और योगी आदित्यनाथ का नाम लेने का दबाव बनाया गया था।

कर्नल पुरोहित ने मुंबई के एक कोर्ट को बताया, “मेरे साथ युद्ध बंदी से भी बदतर व्यवहार किया गया। हेमंत करकरे, परमबीर सिंह और कर्नल श्रीवास्तव लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि मैं मालेगाँव बम धमाके के लिए खुद को जिम्मेदार बता दूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं RSS, VHP के वरिष्ठ नेताओं और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लूँ। उन्होंने मुझे 3 नवम्बर, 2008 तक यातनाएँ दीं।”

हिंदू लीडरशिप को खत्म करने की थी साज़िश!

कॉन्ग्रेस राज में जिन लोगों का नाम लेने के लिए आरोपितों और जाँच अधिकारियों पर दबाव बनाया गया उनमें RSS के बड़े नेता, BJP के नेता और नई उभरती लीडरशिप के अलावा RSS से जुड़े अन्य संगठनों के लोग भी शामिल हैं। इन कड़ियों को जोड़ने से अंदेशा होता है कि किस तरह पूरे देश में हिंदू लीडरशिप को खत्म करने की साज़िश की जा रही थी।

अगर तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार अपनी इस साज़िश में कामयाब हो जाती तो देश में हिंदू हितों की आवाज उठाने वाले नेताओं को शायद वर्षों के लिए जेलों में डाल दिया जाता। अगर नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार कर लिया जाता तो शायद वो 2014 में कभी देश के प्रधानमंत्री ना बन पाते, जो बदलाव आज देश में हमें नज़र आते हैं वैसा शायद कभी ना हो पाता।

वहीं, अगर मोहन भागवत को गिरफ्तार किया जाता तो कॉन्ग्रेस का अगला निशाना RSS ही होता और पहले तीन बार की तरह एक बार फिर शायद RSS को बैन कर दिया जाता। योगी आदित्यनाथ के गिरफ्तारी के जरिए शायद बीजेपी की भावी पीढ़ी को खत्म करने और संत समाज को बदनाम करने की साजिश की जाती।

मोटे तौर पर समझ आता है कि अगर यह साज़िश सफल होती तो RSS और BJP को वैचारिक तौर पर कमजोर कर हिंदुत्व की विचारधारा को सार्वजनिक विमर्श से बाहर करने की कोशिश सफल हो जाती। हिंदू जनमानस जो संगठित नजर आने लगा था, उसमें शायद फिर टूट पड़ जाती और अयोध्या में भव्य श्रीराम का मंदिर देखना लोगों का सपना ही रह जाता।

सिर्फ इतना ही नहीं दुनिया भर के मंचों पर मुस्लिम आतंकवाद के बराबर ही हिंदू या भगवा आतंकवाद को खड़ा कर दिया जाता। अगर हिंदू आतंकवाद के कुचक्र की एक बार शुरुआत हो जाती तो यह कहाँ तक जाता इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

ऐसा सिर्फ एक घटना तक ही सीमित नहीं था लेकिन मुख्य तौर पर इसके बाद से ही हिंदू और भगवा को आतंकवाद बताने की साजिश शुरू हो गई थी। सितंबर 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट के बाद मुंबई में 26 नवंबर 2008 को बड़ा आतंकी हमला हुआ था।

इस हमले में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हिंदू धर्म को बदनाम करने की साज़िश रची थी। हमले में शामिल आतंकी अजमल कसाब हाथ पर कलावा बाँधकर आया था और लश्कर-ए-तैयबा का प्लान था कि कसाब की अगर इस हमले में मौत हो जाए तो उसे हिंदू आतंकी घोषित कर दिया जाए।

मुंबई पुलिस कमिश्नर रहे राकेश मारिया ने अपनी किताब में दावा किया था कि ‘कसाब के पास समीर दिनेश चौधरी नाम का पहचान पत्र था जो बेंगलुरू के पते पर था’। अब अगर देश में हिंदू आतंकवाद की थ्योरी फैलाई जाती तो पाकिस्तान के अलावा इस केस को बनाने के लिए भारत के लोगों का भी इसमें शामिल होने ज़रूरी होता लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

कसाब को जिंदा पकड़ा गया और जाँच में यह सामने आया कि वह पाकिस्तान का रहने वाला था। इतने सब के बाद भी 26/11 के हमले के लिए RSS को बदनाम करने की साज़िश खत्म नहीं हुई। RSS के खिलाफ पुस्तक लिखी गई और उसके विमोचन में कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह पहुंचे।

पत्रकार अजीज बर्नी ने ’26/11: RSS की साज़िश’ की साज़िश नाम से किताब लिखकर लश्कर को क्लीन चिट देने की कोशिश हुई और RSS को इन हमलों का ज़िम्मेदार बताने की कोशिश हुई और इस किताब के विमोचन में कांग्रेस के बड़े नेता दिग्विजय सिंह तक शामिल हुए थे।

‘इंडियन पॉलिसी फाउंडेशन’ के एक डॉक्यूमेंट में इस किताब के कुछ अंशों को प्रकाशित किया गया है। इसमें लिखा गया है, “मुंबई के 26/11 हमलों के लिए भाजपा और संघ जिम्मेदार हैं और इसकी जाँच में देरी के खिलाफ भाजपा ने आवाज़ नहीं उठाई थी।”

इस किताब में नरेंद्र मोदी की मुंबई हमलों में भूमिका तक को लेकर दावा किया गया और इसमें लिखा गया, “संघ परिवार के हमले की साजिश में मोसाद और सीआइए ने मदद की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमलावर को मुंबई पहुंचाने और होटल में रुकवाने में मदद की (पृः 41)।”

इस किताब में ऐसे और भी कई मनगढ़ंत दावे किए गए थे और दिग्विजय सिंह जैसे कॉन्ग्रेस के नेता इन दावों को बढ़ाने-चढ़ाने की पूरी कोशिश में लगे थे। ऐसा दिग्विजय सिंह केवल अपनी मर्जी से नहीं कर रहे होंगे इसमें बड़े नेताओं की भी भूमिका होगी क्योंकि इस विषय पर बड़े कॉन्ग्रेसी नेता खामोश ही रहे हैं इसका कोई विरोध उन्होंने नहीं किया है।

भगवा और हिंदू को आतंकवाद बनाने की साजिश

दिग्विजय सिंह के अलावा गृह मंत्री रहे पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे ने भी भगवा और हिंदू आतंकवाद जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। पी. चिदंबरम ने गृह मंत्री रहते हुए 2010 में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘भगवा आतंक’ का बम धमाकों से संबंध का पता चला है।

चिदंबरम ने पुलिस महानिदेशकों से कहा था, “भारत में युवा पुरुषों और महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आई है। हाल ही में भगवा आतंकवाद की घटना का पर्दाफाश हुआ है, जिसकी अतीत में हुए कई बम विस्फोटों में संलिप्तता पाई गई है। मेरी आपको सलाह है कि हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए।”

चिदंबरम के अलावा सुशील कुमार शिंदे ने भी गृह मंत्री रहते हुए जनवरी 2013 में कहा था कि बीजेपी और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।”

शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था, “रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं।समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

कई वर्षों बाद शिंदे ने स्पष्ट किया कि भगवा आतंकवाद शब्द कहने के लिए उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस ने बोला था। शिंदे ने कहा कि वे इस शब्द का इस्तेमाल करना नहीं चाहते थे, लेकिन मजबूरी में उन्हें इसका इस्तेमाल करना पड़ा।

यह वर्षों का सिलसिला अब तक भी खत्म नहीं हुआ है। सबूतों के नाम पर कोर्ट में भगवा आतंकवाद की थ्योरी फेल हो गई लेकिन कांग्रेस के नेता अब भी इससे जुड़ा नैरेटिव बनाने में जुटे हैं।

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता पृथ्‍वीराज चव्‍हाण ने शनिवार (2 अगस्त) को कहा कि आतंकवादियों के लिए ‘भगवा’ शब्द का प्रयोग न करके ‘सनातन’ या ‘हिंदुत्ववादी’ शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

हिंदू को आतंकवादी साबित करने की थ्योरी असल में किसी और को बचाकर तुष्टिकरण करने की रणनीति है। लेकिन अब यह थ्योरी फ्लॉप हो गई है, होनी ही थी। जिस विचार में पेड़, पहाड़, जल, जंगल, जीव सबको पवित्र और पूजनीय माना गया है उस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने की कोशिश करना यकीनन बेईमानी ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता अब भी हिंदू धर्म को बदनाम करने के नए-नए बहाने ढूंढते हैं लेकिन ‘सनातन’ को बदनाम करते-करते पार्टी खुद कहाँ पहुँच गई है, ये सब भी हमारे सामने है। देश के मूल विचार को बदनाम करने की साजिश और कोशिश पर हर तरह से लगाम लगाए जाने की जरूरत है।

‘हम ही छाती पीट कर कह रहे पाकिस्तान जिम्मेदार’: पहलगाम हमले पर कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने दी आतंकी मुल्क को क्लीन चिट, गृह मंत्री ने दे दिए थे हमलवारों के पाकिस्तानी वोटर नम्बर तक

कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट दे दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को हमले में दोषी ठहराना भारत सरकार की अपनी सोच है। कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मणिशंकर अय्यर ने कहा, “शशि थरूर और उनकी डेलिगेशन टीम ने 33 देशों के दौरान पहलगाम आतंकी हमले का जिम्मेदार पाकिस्तान को नहीं ठहराया है। यहाँ तक की UN और अमेरिका ने भी पाकिस्तान को हमले का जिम्मेदार नहीं ठहराया।”

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे कहा, “हम (भारत) ही छाती पीट कर कह रहे हैं कि इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है, लेकिन कोई भी हमारी बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं है।” अय्यर ने यह भी कहा, “हम ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाए हैं, जिससे लोगों को यकीन हो सके कि किस पाकिस्तानी एजेंसी ने इस हमले को अंजाम दिया है।”

मणिशंकर का यह बयान तब सामने आया जब हाल ही में ऑपरेशन महादेव के तहत POK में पहलगाम आतंकी हमले में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी ताहिर हबीब को भारतीय सेना ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया। इसके बाद रावलकोट में उसका जनाजा निकला, जिसमें खाई गाला के पूर्व पाकिस्तानी फौजी भी शामिल हुए।

इससे आतंकी ताहिर का पाकिस्तान से कनेक्शन साफ हो गया है। यह भी स्पष्ट हो गया कि 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ है। इतना ही नहीं गृह मंत्री अमित शाह तो संसद में तक पाकिस्तान कनेक्शन का प्रमाण दे चुके हैं।

‘ऑपरेशन महादेव’ को लेकर बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, “02 अगस्त 2025 को ऑपरेशन में तीन आतंकवादी- सुलेमान, अफगान और जिबरान मारे गए। जो लोग उन्हें खाना पहुँचाते थे, उन्हें पहले ही हिरासत में ले लिया गया था। जब इन आतंकवादियों के शव श्रीनगर पहुँचे तो हिरासत में लिए गए लोगों ने इनकी पहचान की।”

गृह मंत्री ने आगे कहा, “पहलगाम में धर्म पूछकर मारने वाले इन तीनों आतंकवादियों को मार गिराया गया है। इसके सबूत भी हमारे पास हैं। तीन में से दो आतंकियों के पाकिस्तानी वोटर नंबर मिले हैं। इनके पास से मिली राइफलें और चॉकलेट्स भी पाकिस्तान निर्मित हैं। इससे पुष्टि हुई है कि इन्हीं लोगों ने पहलगाम में निर्दोष लोगों पर हमला किया था।”

इन सबूतों के बाद भी विपक्ष पाकिस्तान को क्लीन चिट देने में लगी हुई है। आए दिन कॉन्ग्रेस नेता सरकार पर पहलगाम आतंकी हमले के अपराधियों पर सवाल खड़ा करते हैं। यहाँ तक की हमले में पाकिस्तान की भूमिका के सबूत माँगते हैं।

70% मुस्लिम आबादी वाले किशनगंज में घटे 145000 वोटर, SIR से 11.8% नाम लिस्ट से कटे: पुनरीक्षण चालू होते ही 5x बढ़े थे डोमिसाइल के आवेदन, जिले में जनसंख्या के मुकाबले 126% हैं आधार

बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद संशोधित वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। नए ड्राफ्ट में लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। वह वोटर हटाए गए हैं जिनकी या तो मौत हो चुकी या फिर वह दिए गए पते पर मिले नहीं।

इस SIR प्रक्रिया में बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज में 1.45 लाख मतदाता के नामों को नई सूची से हटा दिया गया है। यह आँकड़ा जिले के कुल मतदाताओं की संख्या का करीब 11.8% है। विधानसभा चुनावों में जहाँ 4-5% वोटों की संख्या पर हार-जीत तय हो जाती है, वहाँ इस आँकड़े के महत्व को समझना कोई बड़ी बात नहीं है।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में किशनगंज में मुस्लिमों की आबादी करीब 70% है और यहाँ अवैध घुसपैठ बड़ी समस्या है। यह जिला पश्चिम बंगाल से सीमा भी साझा करता है। यह तेजी से डेमोग्राफी बदलाव की बात भी पहले सामने आ चुकी है।

किशनगंज में बचे कितने वोटर?

पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इस जिले में 4 विधानसभा क्षेत्र हैं। चुनाव आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि SIR की प्रक्रिया किए जाने से पहले 24 जून 2025 को जिले में मतदाताओं की संख्या 12,31,910 थी। इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग को 10,86,242 गणना प्रपत्र ही प्राप्त हुए। यानी अब जो नया ड्राफ्ट चुनाव आयोग ने जारी किया है उसमें 1,45,668 मतदाताओं के नाम कट गए हैं। यानी वोटर लिस्ट से 11% से अधिक वोटर कम हो गए हैं।

SIR से पहले ही शुरू हुआ फर्जी वोटर बनाने का खेल?

चुनाव आयोग द्वारा SIR की प्रक्रिया शुरू किए जाने से पहले ही किशनगंज में नए निवास प्रमाण पत्र बनवाने वालों लोगों की कई गुना तक बढ़ गई थी। इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी को वोटर लिस्ट में गड़बड़ी किए जाने की आशंका से भी जोड़कर देखा जा रहा था।

बिहार के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कुछ हफ्तों पहले दावा किया था कि किशनगंज में 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से 28 हजार तक आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए आ रहे थे लेकिन जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन आ गए।

सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पैन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में समय और प्रमाण लगते हैं जबकि निवास प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा था।

किशनगंज में 100 की आबादी पर 126 आधार कार्ड

किशनगंज में फर्जी वोटर बनाए जाने से जुड़ा शक केवल निवास प्रमाण पत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि कुछ दिनों पहले सामने आए आधार कार्ड सैचुरेशन के आँकड़ों से भी ऐसे कई सवाल खड़े हुए थे।

बिहार के कई मुस्लिम बहुल ज़िलों में आधार कार्ड सैचुरेशन 100% से भी ज्यादा था और किशनगंज में यह आँकड़ा 126% था। यानी यहाँ 100 लोगों की आबादी पर 126 आधार कार्ड जारी किए गए हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से देखें तो किशनगंज की आबादी 20,26,541 है लेकिन वहाँ 21,31,172 आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं। मतलब यहां आबादी से 1 लाख से भी ज्यादा आधार कार्ड बनाए गए।

जाहिर है कि ये आँकड़े बताते हैं कि या तो फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं या अवैध घुसपैठियों को आधार कार्ड जारी किए गए हैं। किशनगंज की सीमा नेपाल से लगी हुई है और जिस सीमांचल क्षेत्र में यह स्थित है उसमें लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या रही है।

किशनगंज में बड़ी समस्या है अवैध घुसपैठ

पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा किशनगंज देश की आजादी के वक्त हिंदू बहुल जिला हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यहां की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, किशनगंज में मौजूदा वक्त में मुस्लिम की आबाद करीब 70% है।

सम्राट चौधरी तक यह दावा कर चुके हैं कि किशनगंज जैसे जिलों में अवैध घुसपैठियों की संख्या बहुत अधिक है।

किशनगंज से बांग्लादेश की दूरी भी बहुत ज्यादा नहीं है और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि जब से बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया है, तब से अवैध घुसपैठ में तेज़ी आ गई है।

जुलाई महीने में ही किशनगंज में अलग-अलग जगहों पर 4 बांग्लादेशियों को पकड़ा गया है। ये लोग अवैध घुसपैठ कर यहां पहुँचे और लोगों के घरों में काम कर यहीं स्थाई तौर पर बसने का प्लान बना रहे थे। यहाँ बसने के लिए बांग्लादेशी अपना नाम तक बदल लेते हैं और फर्जी कागजात बनवाते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, SIR की प्रक्रिया के दौरान भी किशनगंज में ऐसे बहुत लोग मिले जो नेपाल, बांग्लादेश या म्यांमार से यहाँ आए थे और अब इन लोगों ने यहीं पर आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं।

शिवम बन ले गया हुक्का बार, फिर गन्दी वीडियो बनाई … अरबाज ने हिन्दू लड़की पर बनाया इस्लाम कबूलने का दबाव: भाई को दे रहा जान से मारने की धमकी, UP के बदायूँ का मामला

उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान ने शिवम बनकर हिंदू युवती से रेप किया। अश्लील वीडियो बनाकर युवती को धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया। युवती को जबरन इस्लामी किताबें और नमाज पढ़ने को मजबूर करता था। ऐसा ना करने पर अरबाज ने युवती के भाई को जान से मारने की भी धमकी दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने आरोपित अरबाज के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया कि जुलाई 2022 में वह अपने सहेली के साथ नई सराय पुलिस चौकी के पास स्थित हुक्काबार गई थी। यहाँ माथे पर तिलक लगाए अरबाज मिला, जिसने अपना असली नाम शिवम उर्फ बॉबी बताया।

अरबाज ने पीड़िता को जबरन हुक्का पिलाया और बेहोशी हालत में पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो बनाए। इसके बाद पीड़िता की सहेली आए दिन हु्क्काबार ले जाने लगी, जिससे पीड़िता को नशे की आदत लग गई। हर बार अरबाज मिलता और पीड़िता की बेहोशी हालत का फायदा उठाकर वीडियो बनाया करता था।

इन्हीं वीडियो के सहारे ब्लैकमेल कर अरबाज 14 सितंबर 2022 को पीड़िता को दिल्ली ले गया। दिल्ली में पीड़िता का रेप किया और अपनी असली पहचान उजागर की। अरबाज ने बताया कि वह हाईकोर्ट के जज का ड्राइवर है। पीड़िता ने जब चंगुल से भागना चाहा तो अरबाज ने पीड़िता के इकलौते भाई को जान से मारने की धमकी दी।

पीड़िता ने बताया कि अरबाज बदायूं में इस्लामी स्थलों पर ले जाता था, यहाँ इस्लाम से जुड़ी किताबें पड़ने का दबाव डालता था। अरबाज ने पीड़िता से धर्मांतरण कर निकाह करने का भी दबाव डाला। इसके बाद फरवरी 2025 में पीड़िता ने अरबाज से दूरी बना ली, लेकिन अब अरबाज फिर उसे ब्लैकमेल करने लगा।

पीड़िता ने शनिवार (02 अगस्त 2025) को अरबाज और उसके साथी फैज खान, रियान पठान, अदनान के खिलाफ तहरीर दी है। कोतवाल प्रवीण सिंह ने बताया कि अरबाज अली खान के खिलाफ हिंदू लड़की से दुष्कर्म, धर्मांतरण और ब्लैकमेल का केस दर्ज किया गया है। पुलिस आरोपित की तलाश में जुटी हुई है।

लड़कियों को ड्रग्स देकर अश्लील वीडियो के आरोप में पहले भी जा चुका जेल

साल 2022 में भी बदायूं के हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान जेल जा चुका है। अरबाज और उसके भाइयों पर नाबालिग लड़कियों को नशा देकर छेड़छाड़ का वीडियो वायरल करने का केस दर्ज किया गया था। इसमें कई वीडियो पुलिस के हाथ लगी थीं, जिनमें अरबाज हुक्का पीते और बार में लड़कियों के साथ डांस करते हुए दिखा। कुछ वीडियो में अरबाज तमंचों के साथ भी नजर आया था।

GDP में रिकॉर्ड लो, बेरोजगारी चरम पर… कपड़े की फैक्ट्रियाँ बंद: बांग्लादेश इकॉनमी की मोहम्मद यूनुस ने लगाई ‘माचिस’, हसीना के दौर में ‘एशियन टाइगर’ बनने की राह पर था

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुए एक वर्ष पूरा होने को है। हसीना की जगह पर मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। वह ‘अंतरिम सरकार’ के ‘मुख्य सलाहकार’ हैं। इस एक वर्ष में बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ा है। हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों का भी जीना मुहाल हो गया है। लेकिन इन सबसे इतर बांग्लादेश एक और फ्रंट पर भी फेल हो रहा है। यह फ्रंट है अर्थव्यवस्था का। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बीते एक वर्ष में अराजकता के चलते बड़े नुकसान झेलने पड़े हैं।

तख्तापलट आंदोलन ने किया अरबों का नुकसान

शेख हसीना और आवामी लीग को बांग्लादेश की सत्ता से बेदखल करने के लिए जून-जुलाई से हिंसा चालू हो गई था। इस दौरान बांग्लादेश भर में पहले बंद बुलाए गए। फैक्ट्रियों पर ताले डलवाए गए। पूरे देश में हिंसा हुई और पुलिस को तक निशाना बनाया गया। इस दौरान वह फैक्ट्रियाँ भी निशाने पर रहीं, जिनके मालिक आवामी लीग से जुड़े हुए थे। इस दौरान बांग्लादेश अर्थव्यवस्था के केंद्र ढाका और चटगाँव आदि पूरी तरह बंद रखे गए और यहाँ भी खूब बवाल हुआ।

2 महीने से ज्यादा चले इस बवाल के चलते बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को 10 बिलियन डॉलर (₹85 हजार करोड़) का नुकसान हुआ। यह बांग्लादेश की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 2%-2.5% तक था। बांग्लादेश में इस हँगामे के दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, इससे हजारों लोग बेरोजगार हुए। एक रिपोर्ट कहती है कि इस दौरान बांग्लादेश में लगभग 1.3 लाख कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वालों को अपनी नौकरी खोनी पड़ी। इसके अलावा इस दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद होने के चलते बांग्लादेश के निर्यात भी गोता लगा गए।

एक और रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त तक के इस हंगामे के चलते 800 मिलियन डॉलर (₹7000 करोड़) के आयातों का नुकसान हुआ। इसी दौरान ₹32 हजार करोड़ के से भी अधिक विदेशी आर्डर बांग्लादेशी कपड़ा निर्माताओं के हाथ से निकल गए। यह ऑर्डर उन देशों में गए जहाँ स्थिरता थी। बड़ी मात्रा में कपड़ो के ऑर्डर भारत और विएतनाम जैसे देशों में गए। इससे बांग्लादेश में बेरोजगारी तो हुई ही, उसको विदेशी मुद्रा का नुकसान भी हुआ।

आंदोलन के बाद भी हालात सही नहीं

आंदोलन के दौरान जहाँ बांग्लादेश को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ तो वहीं आंदोलन के बाद भी कोई हालात नहीं बदले। एक साल के भीतर बांग्लादेश की इकॉनमी संघर्ष कर रही है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वर्तमान में काफी धीमे बढ़ रही है। बांग्लादेश में GDP वृद्धि डर 2024-25 में 4% से भी नीचे आ गई जबकि इससे पहले के सालों में यह औसतन 6.5% रही थी। बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर सफल देश माना जाने लगा था।

बांग्लादेश की सबसे तेज आर्थिक वृद्धि प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में ही हुई। 2010-24 के बीच बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई। जहाँ 2010 में यह (लगभग) 1300 डॉलर (₹1.12 लाख) से 2600 डॉलर (₹2.25 लाख) के पास पहुँच गई थी। बांग्लादेश को नए एशियन टाइगर का ख़िताब दिया जाने लगा था। लेकिन यह आर्थिक वृद्धि का सिलसिला 2024 में आकर रुक गया। बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति को इस्लामी हिंसा और कट्टरपंथ की नजर लग गई।

मई, 2025 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में वर्तमान में बेरोजगारी ऐतिहासिक ऊँचे स्तर पर है। यह अक्टूबर-दिसम्बर 2024 की तिमाही में 4.63% के स्तर पर पहुँच गए। इस दौरान बांग्लादेश में 27 लाख से अधिक लोग बेरोजगार थे। इसके पीछे का सीधा कारण बांग्लादेश में हुई हिंसा और उसके बाद आई अस्थिरता समझ आता है। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियाँ भी यूनुस सरकार ने नहीं निकाली हैं। इससे बड़ी संख्या में फैक्ट्रियाँ बंद हुईं तो लोग बेरोजगार हुए।

इसके अलावा बांग्लादेश में अंतरिम सरकार होने के चलते कई गतिविधियाँ रुकी हुई हैं। यह स्थिति आगे और गंभीर हो सकती है। बेरोजगारी का यह आँकड़ा 5% तक पहुँच सकता है, यह आंशका जताई गई है। बांग्लादेश में तख्तापलट के पहले हुई हिंसा के चलते बाहरी निवेशकों का भी विश्वास भी डगमगाया है। यह बांग्लादेश के लिए चिंता का सबब है। बांग्लादेश की इ समस्या में और भी बढ़ावा विएतनाम जैसे देश हैं, जो कपड़ों से लेकर बाकी सामानों में उसे कई बाजारों में पटखनी दे रहे हैं।

भारत से रिश्ते बिगाड़ कुछ नहीं हुआ हासिल

भारत से रिश्ते बिगाड़ने के चलते बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर नुकसान भी झेलना पड़ा है। भारत ने मई, 2025 में बांग्लादेश से आने वाले रेडिमेड कपड़ों, प्रोसेस्ड फ़ूड और फ्रूट ड्रिंक्स आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भारत ने बांग्लादेश से आने वाले प्लास्टिक और लकड़ी के सामान पर भी कई तरह के प्रतिबन्ध लगाए थे। भारत ने कहा था कि वह अब बांग्लादेश से आने वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स और कन्फेक्शनरी सामान को असम, मेघालय, त्रिपुरा-मिजोरम और पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं देगा।

भारत द्वारा लगाए इन प्रतिबन्धों के चलते बांग्लादेश को वार्षिक तौर 770 मिलियन डॉलर (₹6500 करोड़+) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था। यह बांग्लादेश के भारत को कुल निर्यातों का लगभग 42% बनता है। भारत व्यापार के मामले में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा पार्टनर है। हालाँकि, इसकी शुरुआत बांग्लादेश की तरफ से हुई थी। बांग्लादेश ने अप्रैल, 2025 में भारत मछली, कपड़े समेत कई उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी। उसने रास्ते के लिए भी भारत से 1.8 टका प्रति टन का शुल्क लेना चालू कर दिया था।

हिंसा, अराजकता और लोकतंत्र के गिरावट का रहा एक साल

बांग्लादेश जहाँ आर्थिक मोर्चे पर यूनुस सरकार के एक वर्ष के दौरान गोते लगा रहा है तो वहीं इसी समय में हिंसा भी जम कर हुई है। लोकतंत्र का भी गला यूनुस सरकार ने घोंटा है। बांग्लादेश में तख्तापलट के एक वर्ष के भीतर हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों पर 2400 से अधिक हमले हुए हैं। इनमें कई हमले बहुचर्चित रहे हैं। हाल ही में एक हिन्दू महिला का BNP के एक नेता घर में घुस कर रेप किया था और इसका वीडियो भी वायरल कर दिया था।

इस्लामी कट्टरपंथियों को तो छोडिए, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुद ढाका में रेलवे की जमीन पर बता कर एक पुराना हिन्दू मंदिर ढहा दिया। हिन्दुओं के लिए जिन्होंने आवाज उठाई, उनका भी इस एक वर्ष में बुरा हाल किया गया। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जारी अत्याचार के चलते चटगाँव में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसका नेतृत्व संत चिन्मय दास ने किया। चिन्मय दास से चिढ़े इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगा दिया। उनको महीनों तक सुनवाई भी नहीं मिली। उनके वकील तक पर हमला हुआ।

जब आखिर में उनको जमानत भी मिली तो फिर इस्लामी कट्टरपंथी भड़के और उन्होंने जमानत पर रोक लगवा दी। इसके अलावा मोहम्मद यूनुस सरकार विपक्ष का दमन भी कर रही है। वह लोगों की स्मृतियों से तक उसे मिटा देना चाहती है। मोहम्मद यूनुस सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास को टूटने दिया। दंगाइयों ने उस धानमंडी घर की ईंट-ईंट तक तोड़ दी, जिससे बांग्लादेश को आजादी मिली।

यह सब इसलिए होने दिया गया क्योंकि इसका कनेक्शन शेख हसीना से है। गुरु रबीन्द्र नाथ टैगोर के घर को तोड़ा गया। मोहम्मद यूनुस सरकार देखती रही। सत्यजित रे का घर भी गिरते-गिरते बचा। इस पर भी मोहम्मद यूनुस सरकार ने बेशर्म रवैया दिखाया। कहानी यहीं तक नहीं रुकती बल्कि शेख मुजीब से जुड़ा हर एक चिन्ह मिटाने का प्रयास लगातार किया गया। चाहे उनकी जयंती पर होने वाले समारोह को रोका जाना हो या फिर नोटों पर से उनका फोटो हटाना।

बांग्लादेश की सरकार इस विरासत मिटाने का हर प्रयास कर रही है। मोहम्मद यूनुस की सरकार के इन क़दमों के पीछे उसका इस्लामी कट्टरपंथ का एजेंडा है, जो मुजीब को नहीं देखना चाहता। यह सब करने के बाद के बाद मोहम्मद यूनुस बिना चुने ही बांग्लादेश को हमेशा के लिए अपने शासन तले रखना चाहते हैं। मोहम्मद यूनुस को जब सत्ता सौंपी गई थी, तब ही उसका कोई संवैधानिक आधार नहीं था। उन्हें अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में लाया गया था।

मोहम्मद यूनुस को सत्ता पर काबिज हुए 1 वर्ष हो गया है। लेकिन चुनाव का नाम लेते ही वह बिदक जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश में इसी को लेकर एक संकट तक पैदा हो गया था। आखिर में मोहम्मद यूनुस ने 2026 के मध्य तक चुनावों की बात किसी तरह कही। उनके इन सब क़दमों से लगता है कि वह स्वयं ही बांग्लादेश के बिना चुने तानाशाह बनना चाहते हैं।

कौशांबी में शादीशुदा हिंदू महिला से गैंगरेप कर बनाया अश्लील वीडियो, धर्मांतरण का डालने लगे दबाव: मोहम्मद कैफ गिरफ्तार, इरफान-शाह आलम और मौलाना इमरान की तलाश जारी

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के पश्चिम शरीरा थाना क्षेत्र में एक शादीशुदा हिंदू महिला के साथ गैंगरेप, अश्लील वीडियो वायरल करने और जबरन धर्मांतरण का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पुलिस ने मुख्य आरोपित मोहम्मद कैफ को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना गढ़ी बाजार की है, जहाँ पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि दो साल पहले उसकी मुलाकात कैफ से हुई थी। उसने प्रेमजाल में फंसाकर उसका भरोसा जीता। पाँच महीने पहले पीड़िता की शादी हो गई, लेकिन कैफ ने उसे धमकाना शुरू कर दिया। वह उससे मिलने और शादी तोड़ने की धमकी देता था।

पीड़िता ने बताया कि कैफ की बहन ने उसे अपने घर बुलाकर भाई को समझाने की बात कही। लेकिन जब वह वहाँ पहुँची, तो कैफ, इरफान और शाह आलम ने उस पर निकाह का दबाव बनाया। इंकार करने पर तीनों ने उसके साथ मारपीट की और बारी-बारी से दुष्कर्म किया। इस दौरान उन्होंने उसकी अश्लील वीडियो बनाई।

इसके बाद कैफ, इरफान और शाह आलम ने एक मौलाना इमरान को बुलाकर पीड़िता को इस्लाम अपनाने और कुरान की आयतें पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। उसे बुर्का पहनने का भी दबाव डाला गया। डर और धमकी के बीच पीड़िता किसी तरह घर पहुँची और अपने परिवार को आपबीती बताई।

इसके बाद कैफ ने पीड़िता को बदनाम करने के लिए उसकी अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। पीड़िता के पिता ने 26 जुलाई को पश्चिम शरीरा थाने में शिकायत दर्ज की। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शुक्रवार (1 अगस्त 2025) रात पुनवार नहर के पास से कैफ को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस ने आईपीसी, आईटी एक्ट और धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

कौशांबी डीएसपी जेपी पाण्डेय ने बताया कि जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है। पीड़िता के बयान और बरामद बुर्के के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

छत्तीसगढ़ NIA कोर्ट ने दी केरल की ननों को मानव तस्करी-धर्मांतरण केस में सशर्त जमानत: गिरफ्तारी के बाद बचाव में उतरा पूरा वामपंथी-कॉन्ग्रेसी-मिशनरी इको-सिस्टम

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में विशेष NIA कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को केरल की दो कैथोलिक ननों, प्रीति मेरी और वंदना फ्रांसिस और एक जनजातीय युवक सुकमन मंडावी को सशर्त जमानत दे दी।

इन तीनों को 25 जुलाई को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर सरकार रेलवे पुलिस (GRP) ने गिरफ्तार किया था। उन पर मानव तस्करी और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप था, जो एक स्थानीय बजरंग दल कार्यकर्ता की शिकायत पर आधारित था।

शिकायत में दावा किया गया था कि तीनों नन तीन आदिवासी लड़कियों को नारायणपुर से आगरा ले जा रहे थे और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश कर रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, जमानत पर रिहा हुई आरोपित प्रीति मेरी, वंदना फ्रांसिस (दोनों असीसी सिस्टर्स ऑफ मैरी इमैक्युलेट – एएसएमआई) और सुकमन मंडावी को कोर्ट ने कई सख्त शर्तों के साथ राहत दी है।

उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा, 50-50 हजार रुपये का जमानत बांड भरना होगा और दो-दो जमानतदार पेश करने होंगे। कोर्ट ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि तीनों बिना NIA कोर्ट की अनुमति के देश नहीं छोड़ सकते।

NIA कोर्ट के जज सिराजुद्दीन कुरैशी ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और FIR मुख्यतः संदेह के आधार पर दर्ज की गई थी। अदालत के अनुसार, आरोपितों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और तीनों कथित पीड़ित लड़कियों के माता-पिता ने अपने हलफनामों में स्पष्ट किया है कि उनकी बेटियों को ननों ने न तो बहलाया और न ही जबरन धर्म परिवर्तन कराया।

लड़कियों ने अपने बयानों में पुलिस को बताया कि वे वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रही हैं और वे अपनी मर्जी से आगरा जा रही थीं, जहाँ उन्हें काम के लिए ले जाया जा रहा था।

निचली अदालतों से पहले जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी। दुर्ग की फास्ट ट्रैक सत्र अदालत ने इस आधार पर याचिका खारिज की थी कि मामला NIA कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके बाद आरोपित ने बिलासपुर स्थित विशेष अदालत का रुख किया।

इस मामले पर केरल में व्यापक विरोध देखने को मिला था। चर्च संगठन, एलडीएफ सरकार और विपक्षी कॉन्ग्रेस समेत कई दलों ने गिरफ्तारी की निंदा की थी। सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे ‘संविधान की जीत’ बताया और कहा कि एफआईआर को रद्द कराने के लिए लड़ाई जारी रहेगी।

वहीं सीपीएम नेता वृंदा करात ने जनजातीय समुदाय की आवाज को मान्यता मिलने पर खुशी जताई और बजरंग दल तथा हिंदू वाहिनी पर झूठी शिकायत दर्ज कराने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की।

मामले पर केरल और छत्तीसगढ़ भाजपा इकाइयों में भी टकराव देखने को मिला। केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने गिरफ्तारी को गलतफहमी बताया था और कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार जमानत का विरोध नहीं करेगी।

फिलहाल,आरोपितों की रिहाई के बाद मिशनरी और वामपंथी खेमे में खुशी की लहर है। छत्तीसगढ़ में समर्थक उन्हें रिसीव करने पहुँचे, जबकि कानूनी प्रक्रिया अब NIA अदालत की निगरानी में आगे बढ़ेगी।