मुराद ने कहा है कि मुफ़्ती और अब्दुल्ला ने देश की सरकार के ख़िलाफ़ जनता को भड़काते हुए 370 हटाने का विरोध किया। उनके मुताबिक, "इन नेताओं ने देश के अन्य राज्यों के लोगों के बीच दुश्मनी बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने देश की एकता और अखंडता चोट पहुँचाई है।"
निर्मोही अखाड़ा ने खुद को पंजीकृत संस्था बताते हुए कहा कि विवादित भूमि पर उसका दावा 1934 से है, जबकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस पर अपना दावा उसके कई वर्षों बाद 1961 में किया था। कई दशक पहले मुस्लिमों ने वहाँ नमाज पढ़ना बंद कर दिया था।
दिग्विजय अकेले नहीं हैं कॉन्ग्रेस में। पार्टी के तौर पर जहाँ कॉन्ग्रेस ने दोनों सदनों में बिल के खिलाफ मतदान किया, वहीं लोकसभा में कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर मसले पर बिल लाने की सरकार की हैसियत को ही चुनौती दे डाली थी।
ताहिर को कश्मीर में सायरा नाम की युवती से प्यार करने के कारण झांसा देकर मार दिया गया था। लड़की के परिजनों ने ताहिर के आतंकी हमले में मारे जाने की जानकारी उसके परिवारवालों को दी थी। लोगों का मानना है कि अगर 370 नहीं होता तो ताहिर की जान नहीं जाती।
इस वर्ष की शुरुआत में चार ननों का सिर्फ़ इसीलिए ट्रांसफर कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने बलात्कार आरोपित पादरी के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया था। मुलक्कल को पिछले वर्ष सितम्बर में गिरफ़्तार किया गया था। जमानत पर बाहर आने के बाद अनुयायियों ने बड़ी संख्या में इकठ्ठा होकर उसका स्वागत किया था।
नामग्याल ने कहा कि विपक्ष के लोग सिर्फ़ एक रोड और छोटे से मार्केट को कारगिल समझ बैठे हैं। अगर असली करगिल देखना है तो ज़न्स्कार, वाखा, मुलबेक, शर्गोल, आर्यन घाटी आदि जगहों पर जाना चाहिए। उन्होंने कहा की 70% भू-भाग के लोग निर्णय का स्वागत करते हैं।
जब 1977 में जॉर्ज फर्नांडीस ने जेल से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरा तो सुषमा ही दिल्ली से मुजफ्फरपुर पहुॅंचीं और हथकड़ियों में जकड़ी जॉर्ज की तस्वीर दिखा प्रचार किया। उन दिनों 'जेल का फाटक टूटेगा, जॉर्ज हमारा छूटेगा' का उनका दिया नारा सबकी ज़ुबान पर था।
सुषमा स्वराज ने ट्विटर डिप्लोमेसी का दरवाजा खोला। ट्विटर पर सक्रिय रहते हुए लोगों की मदद करना इतना चर्चित हुआ कि वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें 'सुपरमॉम ऑफ द स्टेट' कहा। उनके देहांत के साथ ही भारतीय राजनीति का एक शालीन अध्याय समाप्त हो गया है।