Wednesday, October 20, 2021
157 कुल लेख

Shiv Mishra

क्रिएटिविटी के नाम पर हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कब तक, ऐसे उत्पादों या कंपनियों का आर्थिक बहिष्कार जरूरी

अपने विरुद्ध किए जाने वाले प्रोपेगंडा और चलाए जाने वाले एजेंडा के विरुद्ध आज भी हिंदुओं का सबसे बड़ा हथियार आर्थिक विरोध है और इसके लिए उनका आभार प्रकट किया जाना चाहिए।

काटेंगे-मारेंगे और दिखाएँगे भी… फिर करेंगे जिम्मेदारी की घोषणा: आखिर क्यों पाकिस्तानी कानून को दिल में बसा लिया निहंग सिखों ने?

क्या यह महज संयोग है कि पाकिस्तान की तरह 'किसान' आंदोलन की जगह पर भी हुई हत्या का कारण तथाकथित तौर पर ईशनिंदा है?

दुर्गा पूजा पंडालों पर हमला, मूर्तियों का भंजन, देवी-देवताओं का अपमान: 1200 साल से यही झेल रहे हिन्दू

अपनी असहिष्णुता पर गर्व करने वाले व्यक्ति और संस्थाएँ हिंदुओं को सहिष्णु न होने का उलाहना इसलिए दे पाते हैं क्योंकि अपने सिद्धांत के पालन के लिए हिंदू खुद से वचनबद्ध है।

डेमोग्राफी चेंज से खतरे में नैनीताल की संस्कृति: कारोबार से लेकर जमीन तक में ‘मुस्लिम घुसपैठ’, असम भी अछूता नहीं

कब्ज़े के कारण डेमोग्राफी बदल रही है या बदल रही डेमोग्राफी के कारण कब्ज़ा बढ़ रहा है, यह प्रश्न हमेशा खड़ा रहेगा।

‘तुम सांघी लोग अब कैब भी चलाने लगा, तुम IT सेल का है न?’ – लिबरल अर्थशास्त्री, ड्राइवर और मोदी बुराई की कहानी

"कंपनी से रिक्वेस्ट है कि ड्राइवर रखने से पहले उसकी प्रॉपर स्क्रीनिंग करके देख ले कि ड्राइवर कहीं संघी तो नहीं। ऐसे ड्राइवर मोदी की बुराई करने की जगह सवाल पूछने लगते हैं।"

बदली नहीं आतंकियों और कश्मीरी नेताओं की सोच, बना रखा है वही माहौल: एक खास विचारधारा का विस्तार है J&K की आतंकी घटनाएँ

कश्मीर में अचानक हो रहे इन आतंकवादी हमलों का क्या कारण हो सकता है? प्रश्न यह भी है कि ये हमले क्या 2019 से पहले होने वाले हमलों से अलग हैं?

लखीमपुर खीरी हिंसा में ‘संजीवनी’ तलाश रही कॉन्ग्रेस, यह राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि अराजकता

लगता है 'किसानों' के अलावा जो लोग मारे गए वे भारतीय थे ही नहीं और उनके प्रति संवेदना प्रकट करने के लिए किसी और देश के राजनीतिक दल या नेता आएँगे।

क्या है पैंडोरा पेपर्स, लीक दस्तावेजों से क्या कुछ बदलेगा: शेल कंपनियों से लेकर टेक्स हेवन तक, जानिए सब कुछ

पैंडोरा पेपर्स से एक बार फिर यह प्रश्न उठता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काले धन के पैदा होने और इस्तेमाल को रोकने के प्रति गंभीर दिखने वाले देश क्या सचमुच गंभीर हैं?

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