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बिहार में ‘महागठबंधन’ में मची सिर फुटव्वल, एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार रहे RJD-कॉन्ग्रेस-वामपंथी-VIP: तेजस्वी यादव के सहारे खोई सियासी जमीन की तलाश में राहुल गाँधी

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन की समय सीमा शनिवार (17 अक्टूबर 2025) को खत्म हो गई है लेकिन अब तक विपक्षी गठबंधन के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ही तय नहीं हो पाया है। NDA से लड़ाई की तैयारी के बीच महागठबंधन के दल आपस में ही भिड़े हुए हैं और कई सीटों पर तो राजद और कॉन्ग्रेस ने एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार दिए हैं।

इस कथित महागठबंधन की मौजूदा स्थिति दिखाती है कि इनकी चुनाव लड़ने की ही कोई साझा रणनीति या विचारधारा नहीं है। इस गठबंधन में केवल सत्ता की लालसा के लिए एकजुटता दिखने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी बिहार चुनाव के बीच विदेश में छुट्टियाँ मना रहे थे और जब लौटे तब भी उन्होंने सीट बँटवारे के लिए तेजस्वी के साथ बैठक नहीं की है।

तेजस्वी यादव सीट बँटवारे की समस्या के समाधान के लिए दिल्ली तक आए भी लेकिन उनकी राहुल गाँधी के साथ बैठक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलकर इस समस्या का समाधान खोजने की सलाह दी है लेकिन इससे भी कोई बात नहीं बनी है। अब भी यह रार लगातार जारी है और बढ़ती ही जा रही है।

RJD के सहारे बिहार में सियासी पैर जमाने की कोशिश में कॉन्ग्रेस

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कॉन्ग्रेस किसी भी हाल में अपनी पसंद की सीटों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। पार्टी करीब 60 सीटों पर दावेदारी कर रही है और इनमें कई ऐसी सीटें हैं जिन पर राजद की नजर भी है।

राजद, कॉन्ग्रेस को लगभग 60–61 सीटें देने को तैयार तो है लेकिन असली विवाद इस बात पर अटका है कि कौन-सी सीटें किसके खाते में जाएँगी। यानी यहाँ मामला सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि सियासी जमीन के कब्जे का है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के अलावा वामपंथी दल और मुकेश सहनी की वीआईपी भी शामिल हैं लेकिन असली मुकाबला फिलहाल दो बड़े दलों के बीच है। कॉन्ग्रेस सीमांचल और दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों पर अपना दावा ठोक रही है।

पार्टी का मानना है कि इन इलाकों में उसका सामाजिक आधार मजबूत है जबकि राजद इस बात से भली-भाँति वाकिफ है कि अगर उसने इन क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस को मौका दिया, तो भविष्य में इन इलाकों में उसकी पकड़ ढीली पड़ सकती है। कॉन्ग्रेस, राजद के कँधे पर चढ़कर अपने दशकों पुराने जनाधार को फिर से वापस पाने के जुगाड़ में लगी है।

हालाँकि, इसमें यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार में कॉन्ग्रेस का अपना आधार राजद के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है फिर भी वो राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी ताकत को भुनाने की कोशिश में है। कॉन्ग्रेस का यह भी दावा है कि राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से चुनाव का माहौल महागठबंधन के पक्ष में हो गया है और वे अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।

एक-दूसरे पर शायराना वार कर रहे RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में सीट बँटवारे की खींचतान में ‘शायरी वार’ भी देखने को मिल रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने अपनी नोकझोंक को अब कविताओं के जरिए बयाँ करना शुरू कर दिया है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने X पर गठबंधन के बीच रार को लेकर लिखा, “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय…”। उन्होंने इसे ‘हर अवसर के लिए प्रासंगिक’ बताया है।

कुछ ही समय में कॉन्ग्रेस का भी इस पर जवाब आ गया। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस पर तंज करते हुए लिखा, “पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है, अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है।”

आधा दर्जन से अधिक सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ महागठबंधन के प्रत्याशी

बिहार विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कहलगाँव में राजद के रजनीश यादव और कॉन्ग्रेस के प्रवीण कुशवाहा आमने-सामने हैं जबकि तारापुर में राजद के अरुण शाह का मुकाबला वीआईपी के सकलदेव सिंह से है।

बछवाड़ा, बिहारशरीफ, रोसड़ा और राजपाकर सीटों पर कॉन्ग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवारों के बीच सीधी है। बछवाड़ा से कॉन्ग्रेस के प्रकाश दास और सीपीआई के अवधेश राय, बिहारशरीफ से कॉन्ग्रेस के उमैर खान और सीपीआई के शिव प्रसाद यादव, रोसड़ा से कॉन्ग्रेस के बीके रवि और सीपीआई के लक्ष्मण पासवान जबकि राजपाकर से कॉन्ग्रेस की प्रतिमा कुमारी और सीपीआई के मोहित पासवान मैदान में हैं।

वहीं, वैशाली सीट पर राजद के अजय कुशवाहा और कॉन्ग्रेस के ई. संजीव सिंह के बीच टक्कर है। सबसे चर्चित लालगंज सीट पर राजद ने बाहुबली नेता मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को मैदान में उतारा है तो कॉन्ग्रेस से आदित्य कुमार राजा ने मोर्चा सँभाल लिया है।

बीबीसी ने राजद की एक पूर्व प्रवक्ता के हवाल से बताया है कि राजद और कॉन्ग्रेस की कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ होगी। इस प्रवक्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा है, “लगभग छह से सात ऐसी सीटें ऐसी हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस और राजद आमने-सामने हो सकते हैं।”

अविश्वास से भरी आगे की राह

यह भी स्पष्ट है कि राजद और कॉन्ग्रेस दोनों एक-दूसरे पर दबाव की राजनीति का खेल खेल रहे हैं। एक दल खुद को राष्ट्रीय स्तर की ताकत बताकर झुकने को तैयार नहीं, तो दूसरा दल अपने क्षेत्रीय प्रभाव की ताकत को आजमा रहा है। यही कारण है कि कई सीटों पर दोनों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर चुके हैं।

अगर देखा जाए तो यह केवल ‘सीट शेयरिंग’ का विवाद नहीं रहा बल्कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या महागठबंधन अब भी किसी साझा लड़ाई के लायक बचा है या फिर यह सिर्फ नाममात्र का गठबंधन है, जो इस चुनावी दौर में सत्ता की लालसा तक ही सीमित रह गया है।

इसके अलावा यह स्थिति बिहार की राजनीति में विपक्ष के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता यह देख रही है कि जो दल अपने भीतर तालमेल नहीं बना पा रहे, वे राज्य को स्थिर नेतृत्व कैसे देंगे? महागठबंधन लोगों के लिए अविश्वास के प्रतीक की तरह बन गए है। जहाँ साथी दल ही एक-दूसरे की जड़ों के मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।

मोदी सरकार में कमजोर नहीं ‘मजबूत’ हुआ है RTI का अधिकार, डिस्पोजल रेट 95% तक पहुँचा: CIC की रिपोर्ट से जानें आँकड़े, समझें डिजिटल इंडिया ने कैसे बढ़ाई पारदर्शिता

सूचना का अधिकार यानी RTI एक्ट आज भारत की लोकतंत्र की रीढ़ बन चुका है। कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने RTI को कमजोर कर दिया, सूचनाएँ छिपाई जा रही हैं और पारदर्शिता पर संकट है। खासकर बिहार में हालात ठप होने की बात कही। लेकिन अगर हम आँकड़ों की माने तो तस्वीर बिल्कुल उलट है।

सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) की ताजा रिपोर्ट्स और सरकारी डेटा साफ बताते हैं कि मोदी सरकार ने RTI को न सिर्फ मजबूत किया, बल्कि इसे और आसान, तेज और पारदर्शी बनाया। कोविड जैसे मुश्किल वक्त में भी RTI का डिस्पोजल रेट बढ़ा, वो भी डिजिटल इंडिया की बदौलत।

कॉन्ग्रेस के आरोप कितने सही, कितने गलत?

दरअसल, कॉन्ग्रेस ने अक्टूबर 2025 में RTI के 20 साल पूरे होने पर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला था। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा कि सरकार RTI को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। डेटा प्रोटेक्शन लॉ के नाम पर सूचनाएँ रोकने की कोशिश हो रही है।

जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाँच बड़े मुद्दे गिनाए: पीएम की डिग्री, फर्जी राशन कार्ड, नोटबंदी, राफेल डील और इलेक्टोरल बॉन्ड्स। उनका कहना था कि इन मामलों में RTI से सवाल पूछे गए, जिससे सरकार डर गई और 2019 में RTI एक्ट में संशोधन करके सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) को कमजोर कर दिया। संशोधन से चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर की सैलरी और टेन्योर पर सरकार का कंट्रोल बढ़ गया।

बिहार पर कॉन्ग्रेस ने खास जोर दिया। उनके मीडिया कोऑर्डिनेटर अभय दुबे और राजेश राठौड़ ने कहा कि बिहार में सूचना आयोग ठप है। 2017-18 के बाद कोई वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई। 25,101 अपीलें और शिकायतें लंबित हैं और एक केस निपटाने में औसतन पाँच साल लग रहे हैं।

RTI से जुड़े आँकड़ों की सच्चाई

अब आते हैं असल सच्चाई पर, जो आँकड़ों में छिपी है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में RTI की स्थिति पर विस्तार से जवाब दिया था और हाल के डेटा इसे और पुख्ता करते हैं। उनके मुताबिक, मोदी सरकार के पिछले आठ सालों में RTI केस डिस्पोजल रेट लगातार बढ़ा है। कोविड जैसे मुश्किल समय में भी रिजल्ट्स बेहतर रहे। कुछ पीरियड्स में तो कोविड के दौरान डिस्पोजल रेट सामान्य समय से भी ज्यादा था। क्यों? क्योंकि सरकार ने डिजिटल इंडिया के तहत पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन और आसान कर दिया।

यूपीए बनाम मोदी सरकार: आँकड़ों की तुलना

यूपीए और NDA के 7 साल में RTI (फोटो साभार: AI Grok, Data-PIB)

ये आँकड़े साफ दिखाते हैं कि डिस्पोजल रेट में 10% की बढ़ोतरी हुई, कंप्लायंस 17% ऊपर गया और रिजेक्शन रेट कम हुआ। इसका मतलब है कि ज्यादा लोगों को समय पर जवाब मिला और कम आवेदन रिजेक्ट हुए।

क्या कहती है आरटीआई से जुड़ी सीआईसी रिपोर्ट?

2023-24 की CIC रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 17.5 लाख RTI एप्लीकेशन्स फाइल हुईं, जो दस साल पहले के मुकाबले दोगुनी हैं। यानी जनता का RTI पर भरोसा बढ़ा है। डिस्पोजल रेट 90% से ऊपर रहा। नवंबर 2023 में चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर हीरालाल समरिया ने कहा कि वित्त वर्ष में पहली बार 90% से ज्यादा डिस्पोजल रेट हासिल हुआ। पेंडिंग केस 2020-21 के 38,116 से घटकर 2023-24 में 19,233 रह गए। जुलाई 2024 से जून 2025 तक के डेटा में पेनल्टी इम्पोजमेंट सिर्फ 1.2% रहा, लेकिन डिस्पोजल रेट हाई रहा।

जून 2025 तक CIC में 26,800 केस पेंडिंग थे, जो पूरे सिस्टम की तुलना में बेहतर है। सतर्क नागरिक संगठन की एक रिपोर्ट कहती है कि 29 सूचना आयोगों में 4,13,972 केस पेंडिंग हैं, लेकिन डिस्पोजल रेट में सुधार साफ दिखता है।

कैसे हुआ ये कमाल?

तो सवाल ये है कि मोदी सरकार ने ऐसा क्या किया कि RTI इतना बेहतर हुआ? चलिए कुछ पॉइंट्स में समझते हैं-

डिजिटल इंडिया का जादू: साल 2014 में पीएम मोदी ने डिजिटल इंडिया की शुरुआत की, जिसका असर RTI पर भी पड़ा। अब RTI 24 घंटे ऑनलाइन पोर्टल से फाइल हो सकती है। कहीं से भी, कभी भी। ई-ऑफिस, ऑनलाइन ट्रैकिंग और डिजिटल रिकॉर्ड्स ने प्रक्रिया को तेज किया। कोविड में जब सब कुछ बंद था, तब भी ऑनलाइन सिस्टम की वजह से CIC का काम नहीं रुका।

हाइब्रिड हियरिंग्स: CIC ने फिजिकल और वर्चुअल, दोनों तरह की हियरिंग्स शुरू कीं। ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपीलकर्ता और जवाबदेही अधिकारी आसानी से जुड़ सके। इससे समय बचा और ज्यादा केस निपटे।

टाइमलाइन्स की सख्ती: मोदी सरकार ने टाइमलाइन्स फिक्स किए। फर्स्ट अपील 30 दिन में, सेकंड अपील 45 दिन में। थर्ड अपील में भी समय सीमा तय की गई। अगर कोई अधिकारी देरी करता है, तो पेनल्टी का प्रावधान है। 2023-24 में सिर्फ 1.2% केस में पेनल्टी लगी, यानी ज्यादातर समय पर जवाब दे रहे हैं।

पब्लिक अथॉरिटीज की जवाबदेही: देश में करीब 25,000 पब्लिक अथॉरिटीज हैं, जो RTI के तहत जवाब देती हैं। इनका एनुअल रिटर्न फाइलिंग रेट 92% से ज्यादा है, जो यूपीए के समय 77% था। ये दिखाता है कि सरकारी दफ्तर अब ज्यादा जिम्मेदार हो गए हैं।

बजट आवंटन में भी इजाफा: CIC को 2023-24 में ₹120 करोड़ मिले, जिसमें ₹110 करोड़ खर्च भी हुए। इस दौरान स्टाफ बढ़ा और 500 CPIOs के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी चलाया गया। इस रिपोर्ट के चैप्टर 3 में CIC की एक्टिविटीज हैं: 19 इनकंबेंट्स, 28,000 अपील्स डिस्पोज्ड। पेनल्टी रियलाइजेशन 95 लाख रुपए। ये सब दिखाता है कि सिस्टम पहले से मजबूत है।

CIC में वैकेंसीज पर कंट्रोल: पहले कमीशन में कमिश्नर्स की कमी रहती थी, जिससे केस लटकते थे। अब सरकार समय पर वैकेंसीज भर रही है। जितेंद्र सिंह ने कहा कि सभी मेंबर्स की नियुक्ति समय पर हो रही है, जिससे सिस्टम तेज हुआ।

एआई और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: CIC ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल शुरू किया है। RTI पैटर्न एनालाइज करने और अप्लिकेंट्स की क्रेडेंशियल्स चेक करने में AI मदद कर रहा है। इससे फर्जी या गैरजरूरी आवेदनों को जल्दी छाँटा जा रहा है।

बिहार का क्या हाल?

बिहार स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन में 25,101 केस पेंडिंग हैं और एक केस निपटाने में पाँच साल लग रहे हैं। 2017-18 के बाद वार्षिक रिपोर्ट नहीं आई, जो चिंता की बात है। लेकिन ये स्टेट लेवल की कमी है, जिसकी जिम्मेदारी नीतीश सरकार की है। सेंट्रल लेवल पर मोदी सरकार ने गाइडलाइंस दीं और सिस्टम सुधारा, लेकिन स्टेट्स को भी इसे लागू करना होगा। बिहार में सुधार की जरूरत है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सेंट्रल RTI सिस्टम कमजोर है।

RTI से मिली कामयाबियाँ

RTI ने पिछले कुछ सालों में कई बड़े खुलासे किए। चाहे वो सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार हो, राशन कार्ड की धाँधली हो या स्कॉलरशिप की गड़बड़ी, RTI से लाखों लोगों को उनके हक मिले। मिसाल के तौर पर-

  • मनरेगा में मजदूरी के भुगतान की जानकारी RTI से मिली, जिससे हजारों मजदूरों को समय पर पेमेंट हुआ।
  • पेंशन स्कीम्स में गड़बड़ियाँ उजागर हुईं, जिससे बुजुर्गों को लाभ मिला।
  • सरकारी जमीनों के गलत आवंटन के केस सामने आए, जिससे भ्रष्टाचार रुका।

2023-24 में 17.5 लाख RTI फाइलिंग्स दिखाती हैं कि लोग अब ज्यादा जागरूक हैं। रिजेक्शन रेट सिर्फ 5.65% रहा, यानी ज्यादातर लोगों को जवाब मिला।

CIC की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

RTI की शुरुआत और इसका मकसद

RTI एक्ट 2005 में यूपीए सरकार के समय लागू हुआ था। इसका मकसद था आम लोगों को सरकार से सवाल पूछने का हक देना। चाहे वो राशन कार्ड हो, पेंशन हो, स्कॉलरशिप हो या सरकारी योजनाओं की जानकारी, RTI ने जनता को ताकत दी कि वो बिना डरे जवाब माँग सके।

इस कानून ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और पारदर्शिता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ इसकी प्रक्रिया में कुछ दिक्कतें भी सामने आईं, जैसे देरी, रिजेक्शन और जटिल प्रक्रिया। यूपीए के समय RTI ने अच्छा काम किया, लेकिन मोदी सरकार ने इसे और बेहतर करने की ठानी।

मोदी सरकार ने RTI को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डिजिटल सिस्टम, तेज डिस्पोजल, कम रिजेक्शन और सख्त टाइमलाइन्स ने इसे जनता के लिए और सुलभ बनाया। लेकिन कुछ चुनौतियाँ अभी बाकी हैं। बिहार जैसे राज्यों में स्टेट कमीशन्स को मजबूत करना होगा। एक्टिविस्ट्स की सेफ्टी के लिए और सख्त कानून चाहिए। साथ ही जनता को RTI के सही इस्तेमाल की जागरूकता बढ़ानी होगी, ताकि फर्जी आवेदन कम हों।

आँकड़े झूठ नहीं बोलते। यूपीए के 81% डिस्पोजल से मोदी सरकार के 94% तक पहुँचना छोटी बात नहीं। डिजिटल इंडिया ने RTI को नई ताकत दी। कॉन्ग्रेस के आरोपों में बिहार की बात को छोड़कर ज्यादातर दम नहीं दिखता। अगर बिहार में दिक्कत है, तो नीतीश सरकार को जवाब देना चाहिए। सेंट्रल लेवल पर RTI आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। ये पारदर्शिता और जवाबदेही की जीत है। उम्मीद है कि सरकार और विपक्ष मिलकर इसे और बेहतर बनाएँगे।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की तैयारी में जुटा भारत, क्या दिल्ली CWG 2010 के घोटालों को छोड़ पाएगा पीछे? जानें कैसे कॉन्ग्रेस राज में जमकर हुआ था भ्रष्टाचार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (15 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि भारत 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेजबानी करेगा। यह खेल भारत में 2010 के विवादों से घिरे गेम्स के 20 साल बाद फिर से आयोजित होंगे।

कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स की कार्यकारी समिति ने 2030 के शताब्दी संस्करण (100वें साल) के लिए अहमदाबाद को मेजबान शहर के रूप में सुझाया है। नाइजीरिया की राजधानी अबुजा भी एक प्रस्तावित शहर था, लेकिन आखिरकार अहमदाबाद को अंतिम रूप से चुना गया।

कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन की जनरल असेंबली में 26 नवंबर 2025 को ग्लासगो में औपचारिक मंजूरी मिलने की उम्मीद है। यह कदम भारत के 2036 के ओलंपिक्स की मेजबानी की महत्वाकांक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे ‘अत्यंत खुशी और गर्व का दिन’ बताया है।

अमित शाह ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास पर ध्यान देने की वजह से भारत अब एक महान खेल गंतव्य बन गया है। भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी टी उषा ने कहा कि यह गेम्स भारत की आयोजन क्षमता को दिखाएँगे और युवाओं को प्रेरित करेंगे। उन्होंने इसे ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

भारत ने आखिरी बार 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित किए थे, लेकिन वह आयोजन खराब योजना, निर्माण में देरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की वजह से प्रभावित हुआ था। उस विवाद की याद 2030 की तैयारी के दौरान हमेशा बनी रहेगी। अब सरकार के लिए जिम्मेदारी बड़ी हो गई है कि वह यह साबित करे कि उसने पहले से सीखे हैं और समय पर पारदर्शी, सफल और बजट में रहकर गेम्स आयोजित कर सकता है।

2010 की परछाईं- कैसे हुआ राष्ट्रमंडल खेल घोटाला

जब भारत ने 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी जीतकर नई दिल्ली को चुना, तो इसे देश के लिए गर्व की बात माना गया। लेकिन यह आयोजन जल्द ही कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया।

यह कहानी नवंबर 2003 में शुरू हुई, जब भारत ने 2010 के CWG की मेजबानी का अधिकार जीता। कनाडा मुख्य प्रतिस्पर्धी था। भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने इस आयोजन की कुल लागत केवल 1,200 करोड़ रुपए बताई थी, जिसे बाद में बहुत छोटा और असलियत से दूर माना गया। बाद में पता चला कि बजट काफी कम आंका गया था और अंतिम खर्च कई गुना बढ़ गया। इसके अलावा आरोप लगा कि भारत ने हर कॉमनवेल्थ देश की ओलंपिक समिति को 1,00,000 डॉलर का घुस देकर समर्थन खरीदा था। पूर्व खेल मंत्री मणि शंकर अय्यर ने इसे रिश्वत देने जैसा बताया था।

दिसंबर 2004 में कॉन्ग्रेस के सांसद सुरेश कलमाड़ी को प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि उस समय के खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। कलमाड़ी के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने गेम्स की तैयारियों पर पूरा नियंत्रण ले लिया। बाद में लेखा परीक्षकों ने इसे एक बड़ी गलती बताया।

स्टेडियम और शहर की संरचना का निर्माण 2006 से 2009 के बीच धीमी गति से हुआ। बजट कई बार बढ़ाया गया। अप्रैल 2007 से सितंबर 2010 तक आधिकारिक लागत का अनुमान सात बार बदला गया। शुरुआत में जो 1,100 करोड़ रुपए का अनुमान था, वह बढ़कर 3,566 करोड़ और फिर 11,687 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जो कि शुरूआती अनुमान से दस गुना ज्यादा था। गेम्स के समय कुल खर्च लगभग 18,532 करोड़ रुपए हो गया, जो लगभग 15 गुना अधिक था।

2009 के अंत में, कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष माइकल फेनेल ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि तैयारियाँ समय से पीछे हैं और ‘समय आपके दुश्मन है।’ इस वजह से CGF ने एक विशेष निगरानी पैनल बनाया जो हर महीने प्रगति की समीक्षा करता रहा।

भारत के खेल मंत्री एम एस गिल ने सरकार की ओर से अधिक फंड देने का भरोसा दिया ताकि आयोजन सफल हो सके। इससे साफ था कि खर्च पर नियंत्रण खो चुका था।

पूर्व खेल मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने जुलाई 2010 में आयोजन पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि 35,000 करोड़ रुपए एक सर्कस पर खर्च हो रहे हैं, जबकि देश के गरीब खिलाड़ियों की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अगर गेम्स सफल रहे तो वह नाखुश होंगे क्योंकि इससे इस तरह के खर्च बढ़ेंगे। उन्होंने भारत पर अन्य देशों को रिश्वत देने के आरोप भी लगाए। कलमाड़ी ने उन्हें लापरवाह और देश विरोधी कहा।

सितंबर 2010 में खेल शुरू होने से ठीक पहले अफरातफरी बढ़ गई। 21 सितंबर 2010 को मुख्य स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के बाहर 95 मीटर लंबा नया फुट ओवरब्रिज गिर गया, जिसमें लगभग 27 मजदूर घायल हो गए। इस घटना ने कमजोर निर्माण गुणवत्ता को उजागर किया। इस तरह 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक बड़ी सीख और चेतावनी साबित हुए।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा ध्वस्त पुल की तस्वीरें प्रकाशित। स्रोत: द गार्जियन।

खराब निर्माण ही अकेली समस्या नहीं थी। जब अंतरराष्ट्रीय टीमें दिल्ली पहुँचीं, तो उन्होंने एथलीट्स विलेज की हालत पर गंभीर शिकायतें कीं। उन्होंने कहा कि वहाँ की सफाई बेहद खराब थी, काम अधूरा था और वह जगह ‘इंसानों के रहने लायक नहीं’ थी।

जलभराव वाले फ्लैटों और कमरों में घूमते आवारा कुत्तों की तस्वीरें दुनियाभर की मीडिया में छा गईं। कई देशों के दल प्रमुखों ने खुले तौर पर सवाल उठाया कि क्या इतने खराब हालात में कॉमनवेल्थ गेम्स कराना भी ठीक है, क्योंकि खेल शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे और जरूरी सुविधाएँ अब भी अधूरी थीं। कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड ने साफ कहा कि स्थिति असुरक्षित है और अगर हालात में सुधार नहीं हुआ तो CGF को खेल रद्द करने पर विचार करना चाहिए।

गंदे शौचालयों और कमरों की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा साझा की गईं। स्रोत: नेशनलपोस्ट

एक असाधारण कदम के तहत आयोजनकर्ताओं की मदद के लिए भारतीय सेना को बुलाया गया। सेना के इंजीनियरों ने गिरे हुए फुटओवर ब्रिज की जगह सिर्फ चार दिनों में एक अस्थाई बैली ब्रिज बना दिया। उन्होंने दिन-रात काम किया ताकि सुरक्षा और व्यवस्थाओं से जुड़ी बड़ी समस्या को टाला जा सके।

इसके बावजूद, भारतीय अधिकारियों ने दावा किया कि सारी समस्याएँ समय पर ठीक कर ली जाएँगी और ज़्यादातर दिक्कतों को सिर्फ बाहरी दिखावटी बताया। आख़िरी समय में की गई आपातकालीन सफाई और मरम्मत से किसी तरह स्टेडियम और अन्य स्थानों को खेलों से पहले तैयार कर लिया गया।

ढहे हुए पैदल पुल के निर्माण के लिए भारतीय सेना को बुलाया गया। स्रोत: इंडिया टुडे

दिल्ली में 2010 में हुए 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) का आयोजन 3 से 14 अक्टूबर के बीच तय समय पर हुआ। 71 देशों के 6,000 से ज़्यादा एथलीट्स ने भाग लिया। खेल शुरू होने के बाद भारत ने एक हद तक सफल आयोजन किया और मेडल तालिका में दूसरा स्थान हासिल किया।

लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिकी। आयोजन से पहले हुए घोटालों और अव्यवस्थाओं की परछाई इन खेलों पर बनी रही। जैसे ही समापन समारोह हुआ, भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप चर्चा में आ गए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 25 अक्टूबर 2010 को पूर्व CAG वी के शुंगलू की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई, जिसका काम था पूरे आयोजन से जुड़ी एजेंसियों (जैसे आयोजन समिति, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के मंत्रालयों) की भूमिका की जाँच करना और कार्रवाई की सिफारिश करना। साथ ही, CVC (सेंट्रल विजिलेंस कमिशन) और CBI ने भी घोटालों की जाँच शुरू कर दी।

CBI ने पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सुरेश कलमाड़ी को मुख्य आरोपित ने बताया। आरोप था कि उन्होंने एक स्विस कंपनी को Timing, Scoring, Results (TSR) सिस्टम का ठेका 141 करोड़ रुपए में दिलवाया, जो बाजार कीमत से लगभग 95 करोड़ ज्यादा था। 24 अप्रैल 2011 को कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया।

उनके करीबी सहयोगी जैसे आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा भी गिरफ्तार हुए। कलमाड़ी 9 महीने तक तिहाड़ जेल में रहे और जनवरी 2012 में जमानत मिली। CAG (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) ने 5 अगस्त 2011 को संसद में एक ऑडिट रिपोर्ट पेश की। इसमें बताया गया कि खेल परियोजनाओं में भारी खर्च बढ़ोतरी, गलत योजनाएँ और नियमों का उल्लंघन हुआ।

 शुंगलू समिति ने 2012 से 2015 के बीच 6 रिपोर्टें दीं। रिपोर्टों में दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को Games Village और शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर में लागत बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। इसके अलावा, प्रसारण सौदों में गड़बड़ी पाई गई और समिति ने प्रसार भारती के तत्कालीन CEO बी एस लाली के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की। 2012 तक CBI ने 19 FIR दर्ज कीं। इन मामलों में खेल स्थलों का निर्माण, स्ट्रीट लाइटिंग और अन्य कान्ट्रैक्ट शामिल थे।

एक विशेष कोर्ट ने 2014 में एक स्विमिंग पूल कान्ट्रैक्ट मामले में सबूत के अभाव में केस बंद कर दिया।  दिल्ली की एक कोर्ट ने 2015 में स्ट्रीट लाइट घोटाले में 6 लोगों को दोषी ठहराया। इनमें 4 दिल्ली नगर निगम के इंजीनियर और एक निजी कंपनी के 2 निदेशक शामिल थे। उन्हें 4 से 6 साल की सजा सुनाई गई, लेकिन सभी ने हाई कोर्ट में अपील की और सजा रोक दी गई।

CBI ने कई मामलों को 2016-17 के बीच चुपचाप बंद कर दिया। एक हाई प्रोफाइल केस में लंदन की इवेंट नॉलेज सर्विसेज को 70 करोड़ रुपए के कान्ट्रैक्ट देने में गड़बड़ी के आरोप थे, लेकिन सबूत नहीं मिलने पर केस बंद कर दिया गया।

दो ठेकेदारों को 2017 में स्टेडियम निर्माण में गड़बड़ी के लिए सजा हुई। लेकिन इसमें शामिल सरकारी अधिकारी बरी कर दिए गए। इसी साल स्कोरिंग सिस्टम वाले केस में 11 आरोपितों (जैसे कलमाड़ी और भनोट) को कोर्ट ने बरी कर दिया क्योंकि प्रमाण नहीं मिल सके।

2020 से 2025 के बीच, ज्यादातर केस या तो बंद हो गए या कोर्ट में लटक गए। 19 में से 11 केस CBI ने बिना आरोप तय किए बंद कर दिए। सिर्फ 2 मामलों में सजा हुई, जिनमें अपील चल रही है और किसी को अब तक जेल नहीं हुई।

दिल्ली की एक कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार की, जिसमें कहा गया कि कलमाड़ी, भनोट या किसी अन्य के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का कोई मामला नहीं बनता। जज ने कहा कि CBI पहले ही केस बंद कर चुकी है, इसलिए कोई ‘अपराध से अर्जित धन’ साबित नहीं हो सका।

15 साल बाद भी, इस बड़े घोटाले में कोई शीर्ष अधिकारी दोषी नहीं ठहराया गया। इससे भारत की जाँच प्रक्रिया और न्याय प्रणाली की कमजोरियाँ उजागर हुई हैं। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स को भले ही भारत ने सफलतापूर्वक आयोजित किया हो, लेकिन इससे जुड़ी भ्रष्टाचार की कहानी और लंबी कोर्ट लड़ाई भारत की छवि पर अब भी एक धब्बा बनी हुई है।

प्रमुख खिलाड़ी और भ्रष्टाचार का व्यापक स्तर

कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के घोटाले में केंद्र में उस समय के कॉन्ग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी थे, क्योंकि उनके पास गेम्स से जुड़ी ठेकेबाज़ी और खर्चों पर बड़ा नियंत्रण था। कलमाड़ी एक अनुभवी खेल प्रशासक माने जाते थे। उनके साथ आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वी के वर्मा जैसे नजदीकी सहयोगी भी थे। इनके अलावा टी एस दरबारी, एम जयरचंद्रन और दिल्ली की कई सरकारी एजेंसियों के अधिकारी भी आयोजन की तैयारियों में शामिल थे।

आरोपों के अनुसार इस घोटाले में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी हुई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस घोटाले में लगभग 70,000 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की आशंका है, जो कि पूरी गेम्स की अनुमानित लागत के बराबर है। इससे 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास के सबसे महंगे गेम्स बन गए।

तुलना करें तो 2006 में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुए पिछले CWG पर सिर्फ 7,000 करोड़ रुपए से भी कम खर्च हुआ था। CAG की रिपोर्ट में बताया गया कि 2003 से 2010 के बीच लागत 15 गुना तक बढ़ गई और इस पर किसी भी स्तर पर सही तरीके से नियंत्रण नहीं रखा गया।

खर्चों में बढ़ोतरी लगभग हर क्षेत्र में देखी गई। कनॉट प्लेस के नवीनीकरण का खर्च 76 करोड़ से बढ़कर 671 करोड़ रुपए हो गया। स्ट्रीट लाइटिंग परियोजना का बजट 13 करोड़ से बढ़कर 37 करोड़ पहुँच गया। CAG के अनुसार, सौंदर्यीकरण के नाम पर 101 करोड़ रुपए फिजूल में खर्च कर दिए गए। कई ठेके जरूरत से ज्यादा दरों पर, मनचाही कंपनियों को दिए गए। CVC ने भी खेलों से पहले ही चेतावनी दी थी कि लागतें बहुत अधिक बताई जा रही हैं।

मीडिया में कई चौंकाने वाले उदाहरण सामने आए, जैसे टॉयलेट पेपर रोल्स के लिए 4,000 रुपए प्रति पीस और छातों के लिए 6,000 रुपए प्रति छाता का बिल लगाया गया। CAG ने कहा कि जानबूझकर काम में देरी की गई ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर नियमों को दरकिनार कर दिया जाए और सीधे महँगे सौदे किए जा सकें।

सबसे चर्चित मामलों में से एक था 141 करोड़ रुपए का TSR (Timing, Scoring, Results) सिस्टम, जिसका ठेका स्विस कंपनी Swiss Timing को दिया गया था, जबकि इसकी असली लागत केवल 50 करोड़ रुपए थी। यानी इस अनुबंध में करीब 90 करोड़ रुपए की अनियमितता पाई गई।

गेम्स विलेज का निर्माण Emaar MGF ने किया था, जिसमें कई गड़बड़ियाँ सामने आईं। जब यह प्रोजेक्ट फंसा तो दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को 766 करोड़ रुपए लगाकर इसे बचाना पड़ा। बाद में इसकी कई यूनिट्स को व्यावसायिक रूप से बेच दिया गया, जिस पर भी सवाल उठे।

लंदन में हुई क्वीन की बैटन रिले यात्रा के दौरान भी घोटाले के आरोप लगे। इसमें बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के कुछ गुमनाम ब्रिटिश कंपनियों को 3.8 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया, जो कथित तौर पर  सुरेश कलमाड़ी के एक करीबी की व्यक्तिगत सिफारिश पर किया गया था। CAG ने इन भुगतानों को बेहद संदिग्ध करार दिया।

कुल मिलाकर सिर्फ 12 दिन के इस खेल आयोजन के लिए 18,000 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए गए। इसके बाद कॉमनवेल्थ गेम्स भारत में सरकारी भ्रष्टाचार, अफसरशाही की लापरवाही और अनियंत्रित खर्च का प्रतीक बन गए।

बुनियादी ढांचे में देरी, बढ़ी हुई लागत और राष्ट्रीय शर्मिंदगी

अक्टूबर 2010 से पहले के हफ्तों में, दिल्ली की तैयारियों की कमी ने पूरी दुनिया में सुर्खियाँ बटोरीं। खेलों का आयोजन द्वितीय पृष्ठ पर चला गया और हर कोई भारत की अव्यवस्था की चर्चा करने लगा। लगभग हर कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) प्रोजेक्ट में देरी थी। कई खेल स्थल या तो अधूरे थे या उद्घाटन समारोह से ठीक पहले हड़बड़ी में पूरे किए जा रहे थे।

मुख्य खेलों और समारोहों का स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम समय पर बस किसी तरह तैयार हो पाया। वहीं, शिवाजी स्टेडियम, जिसे हॉकी प्रशिक्षण स्थल बनना था, 2012 में यानी खेलों के दो साल बाद पूरा हुआ। सितंबर 2010 तक भी आयोजक बुनियादी ढाँचे को पूरा करने के लिए दौड़-भाग कर रहे थे, जिससे भारत की मेज़बानी पर सवाल उठने लगे।

21 सितंबर को सबसे शर्मनाक और गंभीर घटना हुई, जब नेहरू स्टेडियम के बाहर बना नया फुटओवर ब्रिज गिर गया। यह पुल 10.5 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जा रहा था। हादसे के समय मजदूरों द्वारा कंक्रीट डाला जा रहा था। इस दुर्घटना में 27 मजदूर घायल हुए, जिनमें से पाँच की हालत गंभीर थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

पुल के मलबे की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ बन गईं। दिल्ली के लोक निर्माण मंत्री (PWD) ने माना कि पुल में संरचनात्मक कमजोरी थी। स्थिति इतनी खराब हो गई कि सेना को तुरंत बुलाना पड़ा। एक हजार सैनिकों और इंजीनियरों ने केवल चार दिन में एक अस्थाई ‘बेली ब्रिज’ तैयार किया, जिसे 29 सितंबर को प्रशासन को सौंपा गया। सेना की ये कार्रवाई एक नागरिक संकट में बचाव अभियान के रूप में देखी गई।

खिलाड़ियों के ठहरने के लिए यमुना नदी के किनारे बनाया गया ‘एथलीट्स विलेज’ 6,500 खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए बनाया गया था। लेकिन स्कॉटलैंड और न्यूजीलैंड की शुरुआती टीमों ने इसे मानव निवास के लायक नहीं बताया। उन्होंने शिकायत की कि वहाँ पानी भरा हुआ था, गंदगी फैली थी, जंगली कुत्ते घूम रहे थे, नल और पाइपिंग खराब थी और बिजली की तारें खुली पड़ी थीं। कई टीमों ने तो प्रतियोगिता में हिस्सा न लेने या आने में देरी करने की धमकी दी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने स्थिति संभालने की कोशिश की। सफाई दल तैनात किए गए और खुद दीक्षित ने निगरानी की। अधिकारियों ने स्थिति के लिए मजदूरों को दोषी ठहराया और दावा किया कि कुछ ही दिनों में सब कुछ सही कर दिया जाएगा। लेकिन यह सफाई अभियान तब चला जब अंतरराष्ट्रीय आलोचना हो चुकी थी। इंग्लैंड और कनाडा की टीमें पहले होटलों में ठहरीं और बाद में, अंतिम समय पर सुधारों के बाद, विलेज में आईं।

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, खराब योजना और आखिरी समय की हड़बड़ी के कारण खर्च कई गुना बढ़ गया, जिसे रोका जा सकता था। दुनिया भर की मीडिया ने भारत की इस अव्यवस्था को उजागर किया और भारत की तुलना चीन के 2008 के शानदार बीजिंग ओलंपिक से की, जिससे भारत की छवि को गहरा नुकसान पहुँचा।

कैग रिपोर्ट और खुलासे जिसने भारत को चौंका दिया

जहाँ एक ओर मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्ष की आलोचना पहले से ही चर्चा में थीं, वहीं असली झटका तब लगा जब 5 अगस्त 2011 को संसद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट पेश की गई। यह रिपोर्ट 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की पहली आधिकारिक पुष्टि थी।

इसमें CWG 2010 की परफॉर्मेंस ऑडिट बेहद कठोर थी और उसने आयोजन समिति के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों की कई एजेंसियों को भी कटघरे में खड़ा किया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पूरे आयोजन में नियमों की अनदेखी, चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुँचाना और प्रशासनिक विफलताएँ आम बात थीं। इस रिपोर्ट के बाद पूरे देश में हलचल मच गई और कई जिम्मेदार लोगों पर सवाल उठने लगे।

सीएजी रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट ने दिखाया कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के दौरान लागत में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस पर किसी स्तर पर नियंत्रण नहीं रखा गया। 2003 में गेम्स की अनुमानित लागत सिर्फ 1,200 करोड़ रुपए थी, लेकिन 2010 तक यह बढ़कर 18,532 करोड़ रुपए हो गई।

CAG ने कहा कि सरकार ने हर स्तर पर लागत को न तो दोबारा जाँचा और न ही रोकने की कोशिश की। इससे आयोजन समिति (OC) को बिना किसी जवाबदेही के असीमित सरकारी फंडिंग मिलती रही। रिपोर्ट में इसे वित्तीय अनुशासन का पूरी तरह टूट जाना कहा गया।

CAG ने यह भी बताया कि फैसलों में जानबूझकर देरी की गई, ताकि बाद में ‘तत्काल जरूरत’ दिखाकर टेंडरिंग प्रक्रिया को दरकिनार किया जा सके। इससे कई ठेके सीधे दिए गए या मनचाही कंपनियों को लाभ पहुँचाया गया। ये सभी कार्य नियमित प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं से हटकर किए गए, जो पूरी व्यवस्था की गंभीर खामी को दिखाते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया कि सुरेश कलमाड़ी को 2004 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की सिफारिश पर CWG आयोजन समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इसका विरोध किया था। PMO ने बाद में किसी गलती से इनकार किया, लेकिन CAG ने इसे एक बड़ी चूक बताया। इस फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी सवालों के घेरे में ला दिया, हालांकि उन्हें किसी आपराधिक आरोप में नहीं घसीटा गया।

CAG ने यह भी पाया कि हॉकी टर्फ, ट्रैक सतह और स्ट्रीट लाइटिंग जैसी चीजों के ठेके विदेशी कंपनियों को बिना निष्पक्ष तुलना के दिए गए। उदाहरण के लिए, विदेश से मंगाई गई स्ट्रीट लाइटें भारत में उपलब्ध लाइटों की तुलना में दो गुना महँगी थीं और दस्तावेजों से पता चला कि इसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की भूमिका रही थी।

गेम्स विलेज के लिए Emaar MGF को दिया गया ठेका और लंदन में क्वीन बैटन रिले से जुड़े खर्चों में भी नियमों की गंभीर अनदेखी हुई। ब्रिटेन की कंपनी AM Films और SIS Live को बिना पारदर्शिता के करोड़ों रुपए के कांट्रैक्ट दिए गए। खासतौर पर Rs 246 करोड़ का ब्रॉडकास्टिंग कॉन्ट्रैक्ट, जिस पर शुंगलू समिति ने आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की।

CAG ने बताया कि आयोजन की निगरानी के लिए कई ओवरलैपिंग कमेटियाँ बनाई गईं, जिससे जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई। एक भी एजेंसी अकेले जवाबदेह नहीं थी, जिससे चेतावनियों पर समय से कार्रवाई नहीं हो सकी और कामकाज में समन्वय की कमी बढ़ती गई।

रिपोर्ट में ठेकों की दरें बढ़ाने, फर्जी टेंडरों और दस्तावेजों में छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोपों का भी उल्लेख किया गया। उदाहरण के तौर पर, किसी सामान की टेंडर दर Rs 800 से बढ़ाकर Rs 1,800 कर दी गई। कुछ मामलों में टेंडर नियमों को तोड़ने के लिए ठेके टुकड़ों में बांटे गए। कई बार बदले गए दस्तावेजों की फॉरेंसिक जाँच तक नहीं करवाई गई।

हालाँकि CAG की भाषा संयमित थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट की गंभीरता को छुपाया नहीं जा सका। इस रिपोर्ट ने जनता के उस शक की पुष्टि कर दी कि गेम्स में भारी बर्बादी, पक्षपात और कुप्रशासन हुआ है। रिपोर्ट के सामने आते ही राजनीतिक भूचाल आ गया और विपक्ष ने जवाबदेही की माँग शुरू कर दी।

इसी दौरान शुंगलू समिति ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल तक को विलंब और लागत बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।

हालाँकि CAG रिपोर्ट ने घोटाला जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन यह साफ संकेत दिया कि पूरा सिस्टम विफल हो गया था। इस रिपोर्ट की गूंज सिर्फ CWG तक सीमित नहीं रही, यह भारत की संस्थागत कमजोरियों का प्रतीक बन गई।

कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कॉन्ग्रेस के अंदर के लोग भी निजी रूप से इस नुकसान को मानने लगे थे। संसद में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बचाव कमजोर साबित हुआ और यह पूरा मामला राजनीतिक बदलाव और सुधार की जरूरत का प्रतीक बन गया।

राजनीतिक परिणाम – यूपीए सरकार को जनता के आक्रोश का सामना कैसे करना पड़ा

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाला कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक परेशानी बन गया था। उस समय कॉन्ग्रेस पहले से ही 2G स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे अन्य भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर आलोचना झेल रही थी। 2010 से 2011 के बीच जनता का गुस्सा तेजी से बढ़ा  मीडिया के खुलासे, CAG की रिपोर्ट और शुंगलू समिति की लगातार रिपोर्टों ने हालात और बिगाड़ दिए।

इसी दौर में उस समय देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सरकार के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया। बीजेपी नेताओं ने कॉन्ग्रेस पर ‘राष्ट्रीय सम्मान को नुकसान पहुँचाने’ का आरोप लगाया और तत्कालीन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के इस्तीफे की माँग की। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगर दीक्षित इस्तीफा नहीं देतीं, तो उन्हें हटाया जाना चाहिए।

सरकार पर हमले इतने तीखे थे कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने एक-दूसरे पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। कलमाड़ी और दीक्षित के बीच खुली तकरार हुई, जिससे कॉन्ग्रेस पार्टी को बीच में आकर दोनों को चुप रहने के लिए कहना पड़ा।

वहीं डॉ मनमोहन सिंह के दफ्तर से भी सवाल पूछे गए कि कलमाड़ी की नियुक्ति कैसे हुई, जब तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त ने इस पर आपत्ति जताई थी। कॉन्ग्रेस ने बचाव में कहा कि CAG ने ‘भ्रष्टाचार’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है और कानून की प्रक्रिया चलने दी जानी चाहिए, लेकिन जनता का गुस्सा कम नहीं हुआ।

समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने अप्रैल 2011 में लोकपाल बिल की माँग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। यह आंदोलन कई घोटालों खासकर CWG और 2G  से नाराज जनता के समर्थन से तेजी से बढ़ा। इसी महीने सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार किया गया और कॉन्ग्रेस ने उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। उस समय तक उन पर आधिकारिक आरोप नहीं थे, लेकिन वो अपने गृहनगर पुणे में राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए।

प्रदर्शन और राजनीति में उठापटक का असर 2014 के आम चुनावों तक देखने को मिला। 2013 में बीजेपी ने चुनावी अभियान शुरू किया और UPA के कथित घोटाले जिनमें CWG प्रमुख था प्रचार का मुख्य मुद्दा बने।  

नरेंद्र मोदी, जो अब राष्ट्रीय नेता बन चुके थे, उन्होंने अपनी रैलियों में CWG घोटाले को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमला किया। एक भाषण में उन्होंने कहा कि “एक देश खेल के ज़रिये दुनिया में सम्मान कमाता है और दूसरा अपमान” यह तुलना भारत के CWG और दक्षिण कोरिया के ओलंपिक आयोजन को लेकर की गई थी।

इसी साल दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें कॉन्ग्रेस को आम आदमी पार्टी (AAP) से भारी हार का सामना करना पड़ा। AAP ने कॉन्ग्रेस के समर्थन से कुछ महीनों के लिए सरकार बनाई, लेकिन शीला दीक्षित का चुनाव हार जाना कॉन्ग्रेस के लिए बड़ा झटका था और इसमें CWG घोटाले की अहम भूमिका रही।

कुछ सालों बाद जब मुकदमे कमजोर पड़े और आरोपितों को राहत मिलनी शुरू हुई, तो कॉन्ग्रेस ने कहना शुरू कर दिया कि यह सब राजनीतिक साजिश थी। 2025 में, पुणे में कॉन्ग्रेस नेताओं ने कलमाड़ी की बरी होने और ईडी केस के बंद होने को सबूत बताते हुए कहा कि CWG घोटाला राजनीतिक रूप से प्रेरित आरोप था।

लेकिन इसके बावजूद, CAG और शुंगलू समिति की रिपोर्टें आज भी यह दिखाती हैं कि उस समय व्यवस्था पूरी तरह विफल थी। जनता की नजर में, CWG घोटाला आज भी कुप्रशासन और भ्रष्टाचार का प्रतीक बना हुआ है।

परिणाम – परीक्षण, गिरफ्तारियाँ और दोषसिद्धि

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाले से जुड़े कानूनी नतीजे लंबे, जटिल और निराशाजनक रहे। हालाँकि शुरुआत में जाँच तेजी से हुई और मुकदमे जल्द शुरू हो गए थे, लेकिन जवाबदेही तय करने में व्यवस्था पूरी तरह फेल रही। 2010 से 2012 के बीच CBI ने घोटाले के विभिन्न पहलुओं पर कुल 19 FIR दर्ज की थीं। सुरेश कलमाड़ी, वी के वर्मा और अन्य पर षड्यंत्र, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। कलमाड़ी और वर्मा को अप्रैल 2011 से जनवरी 2012 तक जेल में रहना पड़ा, इसके बाद उन्हें जमानत मिली।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में जाँच शुरू की। कई मामलों में रोज़ाना सुनवाई भी हुई, लेकिन भारी दस्तावेज़ी बोझ, गवाहों की अनुपलब्धता और कानूनी प्रक्रिया की देरी के कारण मामले धीरे-धीरे ठंडे पड़ गए। एक मामले में तो छेड़छाड़ किए गए टेंडर दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा ही नहीं गया, जिससे कोर्ट ने नाराज़गी जताई।

अब तक सिर्फ दो मामलों में छह लोगों को दोषी ठहराया गया, लेकिन वे मामले दिल्ली हाई कोर्ट में अपील के तहत विचाराधीन हैं और दोषियों की सजा पर रोक लगी हुई है। ज्यादातर मुख्य मामले या तो बंद हो गए या फिर अभियुक्त बरी हो गए। 2016 में, CBI ने स्विमिंग पूल कॉम्प्लेक्स मामले को सबूतों की कमी के कारण बंद कर दिया। 2017 में, सबसे अहम TSR कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मुकदमे में कलमाड़ी, भानोट और सभी आरोपित को बरी कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि कोई आपराधिक साजिश साबित नहीं हुई। इसी मामले से जुड़े ED के केस को भी 2025 में बंद कर दिया गया, क्योंकि कोर्ट ने माना कि मनी लॉन्ड्रिंग का कोई ठोस सबूत नहीं है।

अब तक किसी भी बड़े राजनीतिक व्यक्ति (राजनेता) को दोषी नहीं ठहराया गया, जिससे यह साफ हो गया कि जाँच में खामियाँ, सबूतों की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने सिस्टम की विफलता को उजागर किया है।

आज जहाँ कॉन्ग्रेस खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही है, वहीं बीजेपी और अन्य विपक्षी दल अब भी CAG और CVC की रिपोर्टों को भ्रष्टाचार के सबूत के रूप में सामने रखते हैं। भले ही कानूनी सज़ा न हुई हो, लेकिन जनता की नजर में CWG घोटाला अब भी भारतीय सिस्टम की विफलता और लापरवाही का प्रतीक बना हुआ है।

सबक सीखा या भुला दिया? बड़े आयोजनों में जवाबदेही

कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) जो 2010 के घोटाले के बाद कई बदलाव हुए। सुधारों की बात तो हुई, लेकिन उन्हें सही तरीके से लागू नहीं किया गया। कैग (CAG) की रिपोर्ट में सबसे बड़ी गलती यह बताई गई कि किसी एक केंद्रीय समन्वय संस्था की कमी के कारण पूरे आयोजन में अव्यवस्था फैली।

इसके बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए 2016 के साउथ एशियन गेम्स और 2017 के फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों को बेहतर निगरानी और सख्त नियंत्रण के साथ संभाला गया।

उस समय 2011 में खेल मंत्री अजय माकन ने नेशनल स्पोर्ट्स बिल पेश किया था। इसमें भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) जैसे खेल संगठनों को ऑडिट और सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने का प्रस्ताव था, जिससे पारदर्शिता आ सके। लेकिन इस बिल को विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।

CAG की 2009 में जो शुरुआती रिपोर्ट पहले नजरअंदाज कर दी गई थी, वह बाद में एक चेतावनी बन गई। इसके बाद योजना आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने दिशा-निर्देश जारी किए कि भविष्य में समय पर ऑडिट हो और शुरुआती चेतावनियों को नजरअंदाज न किया जाए।

सुरेश कलमाड़ी को हटाया गया और IOC (इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी) ने उन्हें बैन कर दिया। IOA को भी 2012 में दूसरी गड़बड़ियों के चलते निलंबित  कर दिया गया था। फिर 2014 में IOA ने एक नया संविधान अपनाया जिसमें निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया। अब पीटी उषा जैसी पूर्व खिलाड़ी इस संगठन की अध्यक्ष हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब ओलंपिक जैसे आयोजनों की तैयारी में ज्यादा गंभीर है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बदलाव हुए। कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) ने भी आगे के आयोजकों के लिए कड़े नियम और निगरानी प्रणाली बनाई। इससे ग्लासगो 2014 और गोल्ड कोस्ट 2018 गेम्स की तैयारियों में सुधार दिखा। हालांकि, हाल के सालों में कुछ आयोजक देशों को लागत के कारण पीछे हटना पड़ा। डरबन (2022) और विक्टोरिया (2026) ने खेलों की मेज़बानी से मना कर दिया। इसके बाद CGF ने खेलों की संख्या घटाकर 10 कर दी ताकि खर्च कम हो सके।

2010 के घोटाले ने भारत को कई सबक सिखाए, लेकिन सुधार अब भी अधूरे और बिखरे हुए हैं। सरकार अब डिजिटल खरीद प्रक्रिया और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता की बात कर रही है, लेकिन 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक मौका हैं यह साबित करने का कि हमने पिछली गलतियों से सच में सीखा है, वरना इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

इस बार क्या अलग है – नई पारदर्शिता और निगरानी रूपरेखा

भारत ने 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) की मेज़बानी के लिए जो दावेदारी पेश की, उसमें यह साफ कहा गया कि 2010 जैसी गलतियाँ दोहराई नहीं जाएँगी। भारत सरकार और कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF)  दोनों ने इस बार पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई सुधारों की बात की है।

हालाँकि इस बार भारत को तैयारी के लिए कम समय मिल रहा है, फिर भी तैयारियाँ समय पर चल रही हैं। अच्छी बात यह है कि कई खेल स्थलों पहले से मौजूद हैं या फिर उन्हें 2036 ओलंपिक के आयोजन की बिडिंग के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि 2010 जैसी अंतिम समय की अव्यवस्था और हड़बड़ी वाली निर्माण योजनाएँ नहीं होंगी।

मोदी सरकार ने इस बार ई-प्रोक्योरमेंट (डिजिटल टेंडर प्रणाली) और खुली निविदाओं को अपनाया है, जिससे खर्च और अनुबंधों में पारदर्शिता बनी रहेगी। वहीं, CGF की निगरानी प्रणाली भी पहले से ज्यादा सख्त हो गई है।

जनता, मीडिया और नागरिक निगरानी की भूमिका भी अब 2010 की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय है। अगर कोई अनुचित खर्च या देरी होती है, तो वह तुरंत राष्ट्रीय खबर बन जाती है, जिससे जिम्मेदार लोगों पर दबाव बढ़ता है।

राजनीतिक दाँव भी इस बार ज्यादा ऊँचे हैं। सरकार के लिए 2030 CWG सिर्फ एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि भारत के 2036 ओलंपिक की दावेदारी का पहला कदम है। गृहमंत्री अमित शाह समेत केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर के नेता खुद योजना और निगरानी में शामिल हैं, जिससे लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं बचती। इस बार का मकसद साफ है, भारत को एक दुनिया के भरोसेमंद खेल आयोजक के रूप में पेश करना।

2030 का रास्ता – क्या भारत अपनी छवि सुधार पाएगा?

भारत को 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी मिलने से 2010 की बदनाम छवि को सुधारने का एक बड़ा मौका मिला है। अब आने वाले पाँच साल में तैयारी और आयोजन की गुणवत्ता यह तय करेगी कि भारत पर जो भरोसा जताया गया है, वह सही था या नहीं।

अगर ये गेम्स समय पर बिना भ्रष्टाचार और देरी के सफलतापूर्वक आयोजित किए जाते हैं, तो भारत न सिर्फ 2010 की नकारात्मक छवि से बाहर निकल सकेगा, बल्कि यह भी साबित कर देगा कि वह ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत एक ऐसा देश बनना चाहता है जो विश्व में खेल आयोजनों के लिए पसंदीदा गंतव्य  बन जाए।

भारत के लिए इस सफलता का लंबे समय का असर भी महत्वपूर्ण है। 2010 दिल्ली CWG के बाद वहाँ बना इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाया। लेकिन अगर अहमदाबाद में बहुउद्देश्यीय स्टेडियम, बेहतर शहरी सेवाएँ और टिकाऊ विकास हो पाया, तो यह आयोजन शहर के लिए लंबे समय के फायदे ला सकता है। हालांकि यह सब पारदर्शिता और खर्च पर नियंत्रण के दायरे में ही होना चाहिए।

2030 भारत के लिए दूसरा मौका है। इस बार नई पीढ़ी की अगुआई में, डिजिटल तकनीकों और पिछली गलतियों से सीखी गई सीखों के साथ तैयारी हो रही है। अगर यह पीढ़ी सफल होती है, तो 2030 का उद्घाटन समारोह भारत के लिए पूरा चक्र पूरा करने जैसा क्षण बन सकता है, जहाँ से देश पुरानी शर्म से निकलकर, ईमानदारी और क्षमता के साथ वैश्विक मंच पर अपनी नई पहचान बना सकेगा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

हिमाचल प्रदेश की आर्थिक हालत बदहाल, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने CM-मंत्री-MLAs की सैलरी 25% तक बढ़ाई: जनता बेहाल पर माननीयों की मौज

दिवाली का त्योहार करीब आते ही हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने माननीयों को बड़ा तोहफा दे दिया। मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों और यहाँ तक कि पूर्व विधायकों की सैलरी और भत्तों में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई। एक तरफ मार्च 2025 में लाया गया सुक्खू सरकार का बिल अब राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू हो गया, तो दूसरी तरफ राज्य का खजाना खाली पड़ा है।

हिमाचल प्रदेश सरकार का कर्ज बढ़ता जा रहा है, सरकारी कर्मचारियों को वेतन-भत्ते समय पर नहीं मिल रहे, विकास के काम रुक गए हैं और रोडवेज की बसें तक कम पड़ रही हैं। जनता बेहाल है, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार माननीयों को दिवाली का तोहफा दे रही है।

CM-मंत्रियों-विधायकों की सैलरी बढ़ी

हिमाचल प्रदेश सरकार ने 28 मार्च 2025 को विधानसभा में तीन बिल पेश किए थे। इनमें विधायकों के वेतन, भत्तों और पूर्व विधायकों की पेंशन से जुड़े बदलाव थे। अब राज्यपाल ने हरी झंडी दे दी और नोटिफिकेशन जारी हो गया। दिवाली से पहले ये बढ़ोतरी लागू हो गई

सरल शब्दों में कहें तो मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पहले हर महीने 2.65 लाख रुपये मिलते थे, अब ये ₹3.50 लाख हो गए। यानी 85 हजार रुपए का फायदा। विधानसभा स्पीकर को 2.55 लाख से 3.45 लाख, कैबिनेट मंत्री को 2.55 लाख से 3.10 लाख, डिप्टी स्पीकर को 2.50 लाख से 3.40 लाख। विधायकों की तो बात ही अलग है। पहले 2.10 लाख मिलते थे, अब 2.80 लाख। बेसिक सैलरी 55 हजार से बढ़कर 85 हजार हो गई।

पूर्व विधायकों की भी बल्ले-बल्ले

पूर्व विधायकों की पेंशन में भी अच्छा इजाफा किया गया है। बेसिक 36 हजार से 50 हजार, डीए मिलाकर कुल 93 हजार से बढ़कर 1.29 लाख रुपए महीना हो गया है। हालाँकि अधिसूचना में साफ लिखा है कि हर पाँच साल में ऐसी समीक्षा होगी। 9 साल बाद ये बढ़ोतरी हुई है। सरकार का कहना है कि ये विधायकों को बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहन है। लेकिन सवाल ये है कि जब खजाना सूना है, तो ये पैसा कहाँ से आएगा?

कर्ज से कराह रहा हिमाचल प्रदेश, सुक्खू सरकार ने किया बेड़ा गर्क

अब आते हैं असली मुद्दे पर – हिमाचल की आर्थिक तंगी। राज्य सरकार कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। अगस्त 2025 में ही सुक्खू सरकार ने ₹1500 करोड़ का नया कर्ज लिया। ये दो हिस्सों में था – ₹1000 करोड़ 15 साल के लिए और 500 करोड़ 10 साल के लिए। जुलाई के आखिर में भी ₹1000 करोड़ लिया गया था। कुल मिलाकर ढाई साल में कॉन्ग्रेस सरकार ने ₹37,739 करोड़ का कर्ज चढ़ा लिया

तुलना करें तो भाजपा की 2017-22 वाली सरकार ने पूरे पाँच साल में ₹30 हजार करोड़ लिया था। अब प्रदेश का कुल कर्ज एक लाख करोड़ पार कर गया। वित्त मंत्रालय की सीमा है कि दिसंबर तक 7 हजार करोड़ और कर्ज लिया जा सकता है, लेकिन अगस्त तक ही ₹6700 करोड़ की लाइन लग चुकी। बाकी ₹300 करोड़ के साथ वित्त वर्ष खत्म हो जाएगा। केंद्र से राहत की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल तो हालत पतली है।

जनता और सरकारी कर्मचारियों पर पड़ रहा बोझ

हिमाचल प्रदेश के इस कर्ज का बोझ सीधे जनता और कर्मचारियों पर पड़ रहा है। सरकारी कर्मचारियों को मई में घोषित 3 फीसदी महँगाई भत्ता (डीए) अब जाकर घोषित किया गया है। कब मिलेगा, पता नहीं। विकास कार्य ठप पड़े हैं। सड़कें टूटी हैं, पुल निर्माण लटके हैं। ठेकेदारों के बिल अटके हैं।

जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने तो चेतावनी ही दे दी। एक ठेकेदार शशि ठाकुर की याचिका पर कोर्ट ने कहा कि बकाया न चुकाने पर अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल घोषित कर देंगे। मामला 2022 का है – 13.88 लाख का बिल और 18 फीसदी ब्याज। सरकार ने माना कि पैसा देना है, लेकिन खजाने में कमी का रोना रोया। कोर्ट ने बार-बार समय दिया, लेकिन भुगतान नहीं किया। हिमाचल सरकार ने 2022-23 में 2376 लाख के टेंडर दिए थे, बजट सिर्फ 357 लाख का ही रखा गया था। ठेकेदार परेशान हैं, लेकिन सुक्खू सरकार बहानेबाजी में मस्त है।

कर्मचारियों का हाल तो और बुरा। आउटसोर्स वाले तो तरस रहे हैं। 16 अक्टूबर 2025 की खबर आई कि दिवाली से पहले ठेकेदारों को 10 लाख तक पेमेंट मिलेगा। लेकिन कुल 800 करोड़ का बकाया अभी भी लटका है। ये वो लोग हैं जो स्कूलों, अस्पतालों में काम करते हैं। उनका मानदेय महीनों से अटका है। सरकार कहती है कि कोशिश कर रही, लेकिन कर्ज ही तो सहारा है। ये अलग बात है कि सुक्खू सरकार ने कर्ज लेने में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

रोडवेज का हाल बेहाल, कई रूट बंद

हिमाचल रोडवेज का तो हाल देखिए। 29 अप्रैल 2025 से निगम ने रूट बंद करने की कवायद शुरू कर दी। आर्थिक संकट में बसें कम, घाटा ज्यादा। 31 डिपो, 2684 रूट, 3871 बसें रोज 5.60 लाख किलोमीटर दौड़ती हैं। लेकिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा वाले रूट घाटे में हैं। पहले ही 6 रूट बंद हो चुके – दिल्ली और हरिद्वार के। अब रोडवेज के लोग डाटा जुटा रहे हैं कि कौन से रूट मर्ज हों, कौन बंद। दो साल में 52 नए रूट शुरू हुए हैं, लेकिन 88 बंद भी कर दिए गए। ग्रामीण क्षेत्र इससे बेहद प्रभावित हैं।

मंदिरों के पैसों पर भी सरकार की नजर

और तो और सरकार ने मंदिरों की नजर कर ली। फरवरी 2025 में भाषा एवँ संस्कृति विभाग ने 35 बड़े मंदिरों को पत्र लिखा। सुखाश्रय और सुख शिक्षा योजना के लिए पैसे माँगे-जरूरतमंद बच्चों की मदद के नाम पर। डीसी ने भी पत्र जारी किए। लेकिन अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया। 14 अक्टूबर को जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और राकेश कैंथला की बेंच ने दान की राशि पर सख्त निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने कहा, “धन देवता का है, सरकार का नहीं।”

कोर्ट ने साफ कहा कि दान वेद-योग की शिक्षा, गुरुकुल, पुजारी प्रशिक्षण, अंतर्जातीय विवाह बढ़ावा, नेत्र शिविर, गौशाला, वृद्धाश्रम पर खर्च हो। यज्ञशाला, संस्कार हॉल बनें। लेकिन सड़क-पुल, सरकारी योजनाएँ, होटल-मॉल, वीआईपी गिफ्ट्स पर सख्त पाबंदी लगा दी।

कुल मिलाकर हिमाचल में दोहरी तस्वीर। एक तरफ माननीयों की मौज, दूसरी तरफ जनता का रोना। क्या ये बढ़ोतरी विकास लाएगी या बोझ बढ़ाएगी? आने वाले दिनों में विधानसभा सत्र में ये मुद्दा गरमाएगा। फिलहाल दिवाली के तोहफे में नेताओं को खुशी तो मिल ही रही है। बाकी हिमाचल की जनता सोच रही – सरकार कब सुनेगी हमारी?

सिद्धारमैया को UK की जिस ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ से मिला सर्टिफिकेट वो पहले से बंद, कर्नाटक सरकार ने खुद ही किया था आवेदन: जानें ‘ऑपइंडिया’ को जाँच में क्या मिला?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (16 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उनकी सरकार की ‘शक्ति योजना’, जो राज्य की महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देती है, को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (LBWR) ने दुनिया में सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ली गई मुफ्त बस यात्राओं के लिए प्रमाणित किया है। इसके साथ ही, कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) को भी LBWR ने मान्यता दी है।

हालाँकि, इस घोषणा के बाद लोगों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ वास्तव में किसी विश्वसनीय संस्था द्वारा दिया गया है या सिर्फ एक प्रचार अभियान है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने X पर लिखा, “कर्नाटक ने दो ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड के साथ वैश्विक मंच पर प्रवेश किया है, जिन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा प्रमाणित किया गया है। शक्ति योजना: महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा मुफ्त बस यात्राओं का लाभ उठाया गया, 564.10 करोड़ यात्राएँ, रोजमर्रा की गतिशीलता को सशक्त बनाया।”

उन्होंने आगे कहा, “KSRTC: दुनिया का सबसे अधिक पुरस्कार विजेता सड़क परिवहन निगम, 1997 से अब तक 464 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुका है। हमारी शासन दृष्टि सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और विश्वस्तरीय जनसेवा पर आधारित है। ये मान्यताएँ इस बात का प्रतिबिंब हैं कि समावेशी और संवेदनशील नीति-निर्माण से क्या हासिल किया जा सकता है।”

मुख्यमंत्री द्वारा जारी एक्स पोस्ट में शक्ति योजना और केएसआरटीसी के लिए जारी किए गए ‘प्रमाण-पत्र’ भी शामिल हैं।

LBWR के प्रमाण-पत्र के अनुसार, “कर्नाटक में 11 जून 2023 को शुरू हुई ‘शक्ति योजना’ के तहत 30 सितंबर 2025 तक महिलाओं ने कुल 564.10 करोड़ मुफ्त बस यात्राएँ कीं। महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देकर सशक्त बनाने की इस पहल को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सामाजिक कल्याण और लैंगिक समानता में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में मान्यता देती है।”

दूसरे प्रमाण-पत्र में कहा गया, “कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने 1997 से लेकर 3 अक्टूबर 2025 तक कुल 464 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए हैं। सार्वजनिक सड़क परिवहन सेवा में उत्कृष्टता और नवाचार के लिए यह उपलब्धि वैश्विक मानक स्थापित करती है।”

दोनों प्रमाणपत्रों पर डॉ अविनाश डी सकुंडे (LBWR के इंटरनेशनल चेयरमैन, भारत) और डॉ इवान गाचीना (यूरोपीय संघ प्रमुख, क्रोएशिया) के हस्ताक्षर हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर विपक्ष ने आलोचना की है।

विपक्ष का कहना है कि कॉन्ग्रेस सरकार मुफ्त योजनाओं जैसे ‘शक्ति योजना’ पर अधिक खर्च कर रही है, जबकि राज्य की परिवहन कंपनियाँ गंभीर वित्तीय संकट झेल रही हैं। कर्नाटक की चार परिवहन कंपनियाँ — KSRTC, BMTC, NWKRTC और KKRTC पर कुल 6,330.25 करोड़ रुपए का कर्ज है।

कौन है अविनाश सकुंडे और बाल्कनोफैंटास्टिका के अध्यक्ष इवान गैसीना?

मुख्यधारा की मीडिया ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस ऐलान को खूब कवर किया जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (London Book of World Records – LBWR) से प्रमाणपत्र मिला है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि यह संस्था असल में है क्या और इसे चलाता कौन है।

OpIndia की जाँच में पता चला कि लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स वास्तव में एक निजी कंपनी थी, जिसे 15 जुलाई 2025 को यूके सरकार के रिकॉर्ड्स में भंग (dissolved) दिखाया गया है। कंपनी के कामकाज में इवेंट कैटरिंग, न्यूज एजेंसी गतिविधियाँ, किताबें प्रकाशित करना और मीडिया प्रतिनिधित्व सेवाएँ शामिल थीं।

दस्तावेजों के अनुसार, अविनाश धनंजय सकुंडे को 28 जून 2024 को इस कंपनी का डायरेक्टर नियुक्त किया गया था।

जब उनकी सोशल मीडिया इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर प्रोफाइल देखी गईं, तो पता चला कि अविनाश खुद को दिल्ली सरकार के Delhi Minorities Commission (DMC) की एक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य बताते हैं। लेकिन DMC की आधिकारिक वेबसाइट पर उनका नाम कहीं दर्ज नहीं है।

अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सकुंडे ने कई वीडियो पोस्ट किए हैं, जिनमें वे अलग-अलग लोगों को ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ के सर्टिफिकेट देते हुए दिखते हैं। एक वीडियो में वे अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट देते नजर आए हैं और यह कार्यक्रम जयपुर (राजस्थान) में हुआ था।

अब बात करते हैं डॉ इवान गाचीना (Ivan Gacina) की, गाचीना का नाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के प्रमाणपत्र पर ‘European Union Head’ के रूप में लिखा था।

जाँच में पता चला कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर वे खुद को ‘HRHHE Pangeran Prince Love YM Dato Rdo Sri Academician Amb Prof Dr Kt Exp LM GM Genius’ बताते हैं। उनके एक पोस्ट के अनुसार, वे ‘President of Balkanofantastika’ भी हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ‘Pangeran’ शब्द मलेशिया और इंडोनेशिया की भाषा में राजा और रानी के पुत्र के लिए प्रयोग होता है। उनका लिंक्डइन रिज्यूमे बताता है कि वे जादार (Zadar), क्रोएशिया के रहने वाले हैं।

उनके कामकाजी अनुभव में कंप्यूटर इंजीनियरिंग टीचर, फिजिक्स टीचर, एडल्ट एजुकेशन में गणित शिक्षक, कैशियर, और वेटर जैसी भूमिकाएँ शामिल हैं। वे खुद को कवि भी बताते हैं। उनकी ऑनलाइन मौजूदगी काफी अजीब है। ढेरों उपाधियाँ और सर्टिफिकेट्स लेकिन इंटरनेट पर उनकी कुछ ही असली तस्वीरें मिलती हैं।

इन संदिग्ध व्यक्तियों के अलावा, लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बारे में एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह खुद को ‘UK-based’ बताता है, लेकिन इसका मुख्य कार्यालय (Head Office) दिल्ली के पहाड़गंज में स्थित है।

इसकी वेबसाइट पर पता लिखा है: Hotel Superb, तिलक गली, चूना मंडी, पहाड़गंज, नई दिल्ली। इसके अलावा वेबसाइट पर यह भी लिखा है कि इसका ‘International Office (UK Branch)’ — 71–75 Shelton Street, London, United Kingdom, और ‘Registered Office (USA)’ — 30 N Gould St Ste R, Sheridan, WY 82801 बताया गया है।

अविनाश सकुंडे ने ऑपइंडिया को बताया: कर्नाटक सरकार ने प्रमाणपत्र के लिए किया आवेदन

OpIndia ने ‘London Book of World Records’ (LBWR) से संपर्क किया और इसके कामकाज को लेकर कई सवाल पूछे। वेबसाइट पर दिए संपर्क नंबर से बात करते हुए अविनाश सकुंडे ने बताया कि LBWR अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे खेल, कला और मनोरंजन, सामाजिक सेवा आदि में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों या संस्थानों को उनके कार्यों के आधार पर सर्टिफिकेट देता है।

जब उनसे पूछा गया कि कर्नाटक सरकार और KRSTC को यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट कैसे मिला, तो उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद आवेदन किया था। सकुंदे ने बताया, “हमने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ों के विश्लेषण के आधार पर उन्हें प्रशंसा पत्र दिया। यह उनके अच्छे कार्य की सराहना के रूप में था। हाल ही में हमने अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट दिया है।”

OpIndia ने उनसे इवान गाचिना (Ivan Gacina) की भूमिका के बारे में भी पूछा। इस पर सकुंदे ने कहा, “वो सिर्फ नाम के लिए हैं। असल में मैं ही सब कुछ सँभालता हूँ, प्रशासन मेरे नाम से चलता है।”

जब उनसे पूछा गया कि LBWR भारत में किस रूप में पंजीकृत है, NGO या निजी कंपनी और यूके में इसकी स्थिति क्या है, तो उन्होंने कहा, “हम भारत में NGO के रूप में रजिस्टर्ड हैं और यूके में यह एक प्राइवेट बुक पब्लिशिंग कंपनी के रूप में पंजीकृत है।”

यह जानना दिलचस्प है कि एक ‘बुक पब्लिशिंग’ कंपनी, जो भारत में NGO होने का दावा करती है, ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ जैसे प्रमाणपत्र बाँट रही है। सबसे अहम बात, बातचीत के दौरान अविनाश सकुंडे ने एक बार भी यह नहीं बताया कि उनकी कंपनी लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स यूके में इस साल जुलाई में आधिकारिक रूप से बंद (dissolved) हो चुकी है।

OpIndia की जाँच कई सवाल खड़े करती है। जैसे- आखिर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने एक यूके-आधारित निजी कंपनी से ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन क्यों किया?

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘I Love Muhammad’ विवाद में इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा को छिपाया, अल-जजीरा ने की भारत को विलेन बनाने की कोशिश: इस्लामोफोबिक नैरेटिव का प्रोपेगेंडा चला रहा विदेशी मीडिया

भारत और हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात कतर की सरकार के पैसे पर चलने वाले ‘अल-जजीरा’ का एक बार फिर भारत विरोध चेहरा सामने आया है। भारत में ‘I Love Muhammad’ से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को लेकर ‘अल जजीरा’ ने एक लंबा-चौड़ा लेख लिखा है। हालाँकि, इसमें ‘अल-जजीरा’ ने तथ्यों को छिपाते हुए मुस्लिमों को प्रताड़ना का शिकार दिखाने की कोशिश की है।

अल जजीरा की खबर की हेडलाइन

‘अल-जजीरा’ के इस भारत विरोधी प्रोपेगेंडा की शुरुआत उसकी हेडलाइन से ही हो गई। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा “Why is India prosecuting Muslims who said ‘I love Muhammad’?” यानी “भारत उन मुसलमानों पर मुकदमा क्यों चला रहा है जिन्होंने ‘I Love Muhammad’ कहा था?” जाहिर है कि ‘अल-जजीरा’ ने पहले ही फैसला सुना दिया है कि ‘किन मुसलमानों पर मुकदमा चलाया जा रहा है’ और वो सब ये बता रहा है कि मुकदमा क्यों चलाया जा रहा है।

विवाद की शुरुआत को लेकर ‘अल-जजीरा’ का झूठ?

‘अल-जजीरा’ ने इस विवाद की शुरुआत को लेकर भी सच्चाई छिपा ली। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा की 4 सितंबर को कानपुर में मुस्लिमों द्वारा ‘I Love Muhammad’ का बोर्ड लगाने को लेकर विवाद हुआ और इसकी शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई। ‘अल-जजीरा’ की रिपोर्ट में दी गई जानकारी आधी-अधूरी है।

अल-जजीरा के लेख के अंश

यह बात सही है कि ‘I Love Muhammad’ के बैनर लगाने को लेकर विवाद हुआ था लेकिन असली कहानी इसके बाद की है। इस बोर्ड को दूसरी जगह लगवाए जाने के बाद यह मामला शांत हो गया था और यह दोनों पक्षों की जानकारी में हुआ था। लेकिन असली विवाद इसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को हुआ।

5 सितंबर के दिन बारावफात का जुलूस निकाला जाना था और इस दिन मुस्लिम युवकों ने हिंदू समुदाय के पोस्टर को जानबूझकर फाड़ दिया था। FIR के मुताबिक, “जुलूस निकाले जाने पर रावतपुर गाँव में हिंदू बस्ती से जुलूस निकाल रहे मुस्लिम समुदाय के कुछ अज्ञात मुस्लिम युवकों के द्वारा रास्ते में लगे हिंदू समुदाय के धार्मिक पोस्टर को जानबूझकर जुलूस में शामिल गाड़ी…में सवार मुस्लिम युवको द्वारा डंडों की मदद से फाड़ दिया गया।”

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का एक हिस्सा

आप इन शब्दों पर भी ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह मामला केवल ‘I Love Muhammad’ के बैनर से जुड़ा हुआ नहीं है। यानी ‘अल-जजीरा’ जो कहानी बेचने की कोशिश कर रहा है वो दरअसल एक आध-अधूरा और अपने मन से चुना गया ‘सच’ है जो कई मायनों में झूठ से भी खतरनाक होता है। ‘अल-जजीरा’ का प्रोपेगेंडा सिर्फ इतना भर नहीं है।

बरेली और गुजरात को लेकर भी अल-जजीरा ने फैलाया झूठ

यूँ तो कई राज्यों में इसे लेकर बवाल हुआ था लेकिन इसकी सबसे अधिक तीव्रता बरेली और गुजरात में नजर आई। अल-जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में इन दोनों घटनाओं का जिक्र किया है लेकिन यहाँ भी उसने सच को छिपाया ही है। अल-जजीरा ने कहा कि बरेली में प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हिंसक झड़प हुई।

बरेली के दंगे पर अल-जजीरा

मीडिया आउटलेट ने यह नहीं बताया कि बरेली में प्रदर्शनकारियों की बस हिंसक झड़प नहीं हुई थी बल्कि पुलिस पर हमले की प्लानिंग के साथ कथित प्रदर्शनकारी वहाँ पहुँचे थे। जाँच में ये तक सामने आया कि तौकीर रजा ने पुलिसकर्मियों की हत्या तक की साजिश रची थी।

कथित प्रदर्शनकारियों ने इस बात की पुरी तैयारी की थी कि किसी तरह बरेली में दंगा भड़काया जा सके। बाहर से सैकड़ों लोगों को बुलाया गया, उन्हें अलग-अलग मस्जिदों में ठहराया गया था। कथित प्रदर्शन के दिन पुलिस पर दंगाइयों ने पेट्रोल बम से हमला किया, पुलिस पर फायरिंग की और पथराव किया गया। इस्लामी कट्टरपंथियों की इस पूरी साजिश को ‘अल-जजीरा’ ने सिर्फ ‘हिंसक झड़प’ कहकर टाल दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात भी इसे लेकर हुई हिंसा पर भी ‘अल-जजीरा’ ने सच नहीं बताया। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा, “गुजरात समेत कई राज्यों में सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियोज़ के लिए मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें ‘I Love Muhammad’ के नारे थे।”

गुजरात में एक्शन पर अल-जजीरा

गुजरात के गोधरा में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव किया था। गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ के पोस्ट को लेकर खूब हंगामा हुआ। इस्लामी कट्टरपंथियों ने चुन-चुनकर हिंदुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया। गरबा पंडाल और आस-पास पत्थरबाजी तक की गई लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों से मोहब्बत का चश्मे पहने ‘अल-जजीरा’ को ये सब नहीं दिख रहा है।

‘अल-जजीरा’ ने इस खबर में आगे भी एमनेस्टी जैसे संस्थानों से जुड़ों लोगों के बयानों के जरिए पूरा प्रोपेगेंडा खड़ा करने की कोशिश की है लेकिन इसमें कहीं भी तथ्य नहीं है। नालों-तालाबों और अन्य सरकारी जमीनों पर कब्जा कर किए गए अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई को भी मुस्लिमों के घर तोड़ने की तरह दिखाया गया है। लेकिन यह नहीं बताया कि ये घर अवैध अतिक्रमण कर बनाए गए थे।

बम-बंदूक नहीं नैरेटिव की लड़ाई

अल-जजीरा, बीबीसी, वॉशिंगटन पोस्ट जैसी संस्थाएँ बार-बार भारत की हर आंतरिक घटना को ‘मुस्लिम बनाम राज्य’ के चश्मे से दिखाने की कोशिश करती हैं। वे सिर्फ खबर नहीं देते बल्कि नैरेटिव बनाने की कोशिश करते हैं कि भारत को एक हिंदू बहुल और मुस्लिम विरोधी देश के रूप में किस तरह दिखाया जाए। जाहिर है इसके जरिए वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख को चोट पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

किसी भी धर्म में अपने पैगंबर के लिए प्रेम होना स्वाभाविक है। लेकिन जब ऐसे भावनात्मक नारों का इस्तेमाल भीड़ को भड़काने, राजनीति करने या किसी समुदाय के खिलाफ लामबंदी के लिए किया जाता है, तो वह धार्मिक प्रेम नहीं बल्कि ‘धार्मिक हथियार’ बन जाता है।

ऐसे में इस हथियार का इस्तेमाल कट्टरपंथी करते हैं और उनके खिलाफ जब जब पुलिस कानून के तहत कार्रवाई करती है, विदेशी मीडिया इसे मुस्लिमों के खिलाफ षड्यंत्र बताते हैं। ये संस्थान कभी ये सवाल नहीं उठाते हैं कि क्या पत्थरबाज़ी, दंगे या हिंसा की योजना बनाना किसी मजहब का हिस्सा है? क्या पुलिस को केवल इसलिए हाथ बाँध लेना चाहिए कि आरोपी एक विशेष समुदाय से आते हैं?

आज का दौर सिर्फ बम और बंदूक का नहीं नैरेटिव की लड़ाई का है। भारत जब अपने कानून-व्यवस्था के कदमों को मजबूती से लागू करता है तो वैश्विक मीडिया उसका इस्तेमाल अपनी सुविधा के हिसाब से भारत के खिलाफ ही करना चाहता है। ऐसे संस्थानों की कोशिश रहती है कि किसी भी तरह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया जा सके।

‘जिंदा जला देंगे’: I Love Muhammad पोस्टर हटाने वाले को ढूँढ रहा RJD प्रत्याशी (ओसामा, शहाबुद्दीन का बेटा) का समर्थक- बिहार से ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के कानपुर से शुरू हुआ ‘I Love Muhammad’ पोस्टर का विवाद देश भर में दंगा, फसाद और हंगामे के बाद भी अब तक शांत नहीं हुआ है। अब भी इस्लामी कट्टरपंथियों के मन में इसे लेकर एक चिंगारी सुलग रही है। बिहार के सिवान में एक शख्स ने ‘ऑपइंडिया’ के कैमरे पर यह दावा किया है कि वो कथित तौर पर ‘I Love Muhammad’ का पोस्टर फाड़ने वाले एक युवक को ढूँढ रहे हैं और मिल गया तो उसे जिंदा जला दंगे।

दरअसल, ‘ऑपइंडिया’ की टीम बिहार चुनाव की कवरेज को दौरान सिवान पहुँची थी। इस जिले की रघुनाथपुर सीट पर RJD ने बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया है। कवरेज के दौरान हमारी मुलाकात ओसामा शहाब के एक समर्थक से हो गई।

खुली धमकी और शहाबुद्दीन का खौफ

ऑपइंडिया के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा से बातचीत में मुस्लिम युवक ने कहा कि “भाईजान (ओसामा) बोले- पोस्टर फाड़ने वाले को जिंदा जला देंगे।” उसने यह भी बताया कि पोस्टर फाड़ने वाले को वे ढूँढ़ रहे हैं और अगर वह मिला तो उसे सीधे शहाबुद्दीन के घर ले जाया जाएगा। युवक ने यह भी कहा कि शहाबुद्दीन के रहते किसी की हिम्मत नहीं होती कि कोई पोस्टर हटा दे।

‘I Love Muhammad’ विवाद कहाँ-कहाँ हुआ था

‘आई लव मुहम्मद’ वाले पोस्टर का विवाद केवल सीवान तक सीमित नहीं है। इससे पहले, इस तरह के पोस्टर कई अन्य राज्यों में भी विवाद का कारण बने हैं। यह विवाद सबसे पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर में शुरू हुआ था, जब बारावफात जुलूस के दौरान ‘I Love Muhammad’ लिखा साइन बोर्ड लगाया गया। इसके बाद यह विवाद यूपी के कानपुर, उन्नाव, बरेली, बागपत, कौशांबी, लखनऊ, महाराजगंज, शाहजहाँपुर तक फैला। इसके अलावा, उत्तराखंड के काशीपुर, महाराष्ट्र के नागपुर, गुजरात के गोधरा, तेलंगाना के हैदराबाद तक हुआ।

जिस नूर वली महसूद को पाक ने ‘मार गिराने’ का किया दावा, उसने वीडियो जारी कर खोल दी झूठ की पोल: जानें कैसे मदरसे में बच्चों को तालीम देने वाला बन गया TTP का सरगना?

पाकिस्तान की फौज ने 9 अक्टूबर 2025 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हवाई हमला किया और दावा किया कि उन्होंने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के कुख्यात सरगना नूर वली महसूद को मार गिराया है।

पाकिस्तानी मीडिया ने इसे बड़ी जीत बताया, लेकिन सिर्फ एक हफ्ते बाद गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को TTP ने ऐसा वीडियो जारी किया जिसने पूरे पाकिस्तान की पोल खोल दी। 7 मिनट 55 सेकंड के उस वीडियो में नूर वली न केवल जिंदा नजर आया, बल्कि उसने खुलकर कहा कि वो अफगानिस्तान में नहीं, पाकिस्तान की खैबर पहाड़ियों में रह रहा है।

उसने दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वाह की कुकी खेल और कंबर खेल कबीले उसके साथ हैं। यानी पाकिस्तान ने झूठे इनपुट पर हमला किया, रिश्ते बिगाड़े और आखिर में अपनी ही नाकामी का तमाशा दुनिया के सामने कर दिया।

पाकिस्तानी खुफिया की सबसे बड़ी चूक

काबुल पर एयर स्ट्राइक पाकिस्तान के इंटेलिजेंस इनपुट पर की गई थी। फौज को यकीन था कि नूर वली महसूद काबुल में है और उसकी गाड़ी को निशाना बनाया गया।

पाकिस्तान ने इसे सटीक ऑपरेशन बताया, लेकिन जब नूर वली का वीडियो सामने आया तो साफ हुआ कि वो न तो अफगानिस्तान में था, न ही हमले में मरा। इस एक गलती से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ संबंध और भी खराब किए और खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर हँसी का पात्र बना लिया।

नूर वली महसूद: जन्म, तालीम और शुरुआती जीवन

नूर वली महसूद का जन्म 26 जून 1978 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के दक्षिण वजीरिस्तान में तियारजा नामक गाँव में हुआ। वह पश्तून जनजाति के मेहसूद कबीले के मेचीखेल उपकबीले से ताल्लुक रखता है। उसने शुरुआती तालीम मदरसा सिद्दीकिया उस्पास में ली।

1990 के दशक में उसने फैसलाबाद, गुजरांवाला और कराची जैसे शहरों के अलग-अलग मदरसों में मजहबी तालीम ली। 1996-97 के दौरान उसने पढ़ाई बीच में छोड़ी और अफगानिस्तान चला गया, जहाँ उसने अफगान तालिबान के साथ रहकर अहमद शाह मसूद की नॉर्दर्न अलायंस के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया।

काबुल और मजार-ए-शरीफ के मोर्चों पर उसने तालिबान के साथ लड़ाई लड़ी। बाद में अब्बू हाजी गुल शाह खान की सलाह पर पाकिस्तान लौटकर 1999 में इस्लामी अध्ययन में स्नातक किया और मुफ्ती की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उसने गोरगोराय में स्थित मदरसा इमदाद-उल-उलूम में 1999 से 2001 तक तालीम देने का भी कार्य किया।

तालिबान से जुड़ाव और नेतृत्व की ओर सफर

2003 में नूर वली महसूद ने पाकिस्तानी तालिबान (TTP) की मेहसूद शाखा में शामिल होकर सशस्त्र गतिविधियाँ शुरू कीं। उस समय पाकिस्तान फौज फाटा क्षेत्र में सैन्य अभियान चला रही थी, जिसे वह पश्तून परंपराओं और ‘पश्तूनवाली’ के खिलाफ मानता था। उसने इसे अमेरिका के प्रभाव के खिलाफ ‘रक्षात्मक जिहाद’ बताया।

2004 में वाना की लड़ाई के दौरान उसने पाकिस्तानी फौज पर कई हमले किए। जल्द ही वह बैतुल्लाह महसूद का भरोसेमंद साथी बना और संगठन में काजी (जज) के रूप में नियुक्त हुआ। बाद में उसे डिप्टी कमांडर का दर्जा भी मिला। बैतुल्लाह की मौत के बाद उसने गोरगोराय में एक प्रशिक्षण शिविर संचालित किया, उस वक्त उसके सिर पर 20 लाख रुपए का इनाम था।

2013 में उसे कराची चैप्टर का प्रमुख बनाया गया, जहाँ TTP ने फिरौती, अपहरण और बैंक लूट जैसी घटनाएँ अंजाम दीं। 2015 के बाद सुरक्षा अभियानों के कारण नेटवर्क कमजोर हुआ। इसके बावजूद नूर वली संगठन में प्रभावशाली बना रहा और खालिद महसूद का डिप्टी नियुक्त हुआ।

2018 में खालिद की मौत के बाद उसने मौलाना फजलुल्लाह के साथ काम किया और जून 2018 में फजलुल्लाह के मारे जाने के बाद उसे TTP का अमीर (मुखिया) घोषित किया गया उसके नेतृत्व में TTP ने अपनी रणनीति बदली। उसने आम नागरिकों को निशाना बनाना बंद किया और केवल सुरक्षा बलों पर हमले केंद्रित किए।

विचारधारा, लेखन और हाल की घटनाएँ

नूर वली महसूद मजहबी रूप से प्रशिक्षित विद्वान और सैन्य अनुभव रखने वाला कमांडर है। 9/11 के बाद उसने अफगान तालिबान का समर्थन किया। वह पहले TTP के प्रकाशन विभाग का प्रमुख था और 2007 में बेनजीर भुट्टो की हत्या का जिक्र अपनी लिखी किताब में किया।

2017 में उसने ‘इंकलाब-ए-मेहसूद: साउथ वजीरिस्तान फिरंगी राज से अमेरिकी सम्राज्य तक’ नाम की 690 पेज की किताब लिखी, जिसमें उसने संगठन के इतिहास, विचारधारा और वित्तीय नेटवर्क का वर्णन किया।

अमेरिका ने 2019 में उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया और 2020 में संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल किया। 2021 के बाद TTP ने अफगानिस्तान से पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर हमले तेज कर दिए। 9 अक्टूबर 2025 को संगठन ने एक हमला किया जिसमें 11 पाकिस्तानी फौजी मारे गए।

इसके जवाब में पाकिस्तान ने काबुल, खोस्त, जलालाबाद और पक्तिका में हवाई हमले किए। कहा गया कि इन हमलों में नूर वली को निशाना बनाया गया, लेकिन तालिबान और TTP दोनों ने उसकी मौत की खबरों को झूठा बताया। बाद में TTP ने उसका एक ऑडियो जारी कर दावा किया कि नूर वली महसूद जिंदा है और सुरक्षित है।

निष्कर्ष: जिंदा नूर वली, मुसीबत में पाकिस्तान

नूर वली महसूद का जिंदा होना पाकिस्तान के लिए सिर्फ खुफिया नाकामी नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। उसकी मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान अपने ही देश में आतंक को खत्म करने में नाकाम रहा है। अब नूर वली महसूद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पाकिस्तान की असफल नीतियों और झूठे दावों का प्रतीक बन गया है।

अलीगढ़ में मंदिर विवाद की वजह से करन अहेरिया की हत्या, असद का परिवार फेंकता था हड्डियाँ: पीड़ित परिवार के आरोप गंभीर, प्रशासन ने चलाया बुलडोजर

अलीगढ़ जिले के जवाँ कस्बे में शनिवार(11 अक्टूबर) की रात 20 वर्षीय करन अहेरिया की असद ने गला रेतकर दर्दनाक तरीके से हत्या कर दी। हत्या के बाद हिंदुओं में आक्रोश पैदा हुआ तो हिंदू आरोपितों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए घर पर बुलडोजर कार्रवाई की माँग करने लगे। युवक की हत्या के पीछे पुलिस द्वारा एक सोशल मीडिया पर पोस्ट होना बताया गया तो दूसरी ओर मुस्लिम समाज की जिस महिला को करन दवा दिलाने अलीगढ़ ले गया था, हत्या के पीछे उनका हाथ भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

घटना की इसी गुत्थी को सुलझाने और करन की हत्या की असली वजह जानने के लिए हम मंगलवार (14 अक्टूबर 2025) दोपहर को दिल्ली के करीब 150 किलोमीटर दूर जवाँ कस्बे में पहुँचे। हमने देखा कि जवाँ पुलिस स्टेशन से करीब 100 मीटर आगे बड़ी सँख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजर कार्रवाई हो रही है। बाजार बंद है, लेकिन लोगों जमावड़ा लगा हुआ है।

आरोपित के घर पर चलता बुलडोजर
आरोपितों के अतिक्रमण पर चला बुलडोजर

यह बुलडोजर कार्रवाई करन की हत्या के बाद मेन बाजार में अतिक्रमण के खिलाफ हो रही थी, लेकिन इस कार्रवाई का भी मुस्लिम दुकानदार मीडिया के सामने विरोध कर रहे थे। मिठाई की दुकान करने वाले इमरान खान कहते हैं कि हमें तीन दिन का नोटिस दिया गया था लेकिन दूसरे दिन ही बुलडोजर आ गया। अतिक्रमण तो हिंदुओं ने भी कर रखा है लेकिन कार्रवाई हमारे (मुसलमानों) खिलाफ ही हो रही है ये गलत है। दूसरे दुकानदार ने कहा, “करन के साथ जो हुआ गलत है लेकिन ये कार्रवाई भी गलत है।”

इसके बाद हम मुख्य सड़क से 200 मीटर अँदर मृतक करन के घर जाते हैं इससे पहले आरोपित असद के घर के आस-पास पुलिस लगी हुई है। असद के घर पर ताला लटका हुआ है आस-पास के घरों की छत व खिड़कियों से महिलाएँ झाँकते हुए बाहर के हालात से रूबरू होने की कोशिश में जुटी हैं। इस बीच हम उस खंडहर मकान में पहुँच गए, जहाँ असद ने अपने परिवार के साथ मिलकर करन को मौत के घाट उतारा था।

खंडहर पड़े मकान के एक हिस्से में (हत्या वाली जगह) मिट्टी और पत्थरों के बीच करन का खून बिखरा हुआ था जोकि सूख चुका था। दीवारों पर खून के छींटे करन की दर्दनाक मौत का मंजर बयाँ कर रहे थे। मकान के बाहर खड़ी रेहड़ी पर रखे एक औजर (रेती) को पड़ोसियों ने दिखाया जिससे असद ने अपने चाकू को धार दी थी। ताकि करन के लगे को आसानी से काटा जा सके।

इसके बाद हम मृतक करन के घर पहुँचे। आँगन में साँत्वना देने वाली महिलाओं से घिरी और बेसुध बैठी माँ महारानी देवी व चाची राधा देवी की आँखों से आँसू मानो सूख चुके हैं, जिस कमरे में करन अपनी माँ के साथ रहता था, उस बेड पर तीन कंबल पड़े हुए हैं। छोटे से कमरे में सामने पूजा की अलमारी है। आँगन में दो चूल्हे हैं दोनों साफ सुथरे पड़े हैं, मानो करन की हत्या के बाद से घर में चूल्हा नहीं जला।

हत्यारोपितों का बंद पड़ा मकान
हत्यारोपितों का बंद पड़ा मकान

करन के परिवार की गरीबी का अँदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आँगन में सिल-बटना रखे हुए हैं जिस पर चटनी बनाई जाती है। पूछने पर माँ कहती है, “बेटा नोएडा से दीवाली पर छुट्टी लेकर घर आया था लेकिन आते ही पड़ोसी मुस्लिम महिला को दवा दिलाने अलीगढ़ चला गया। इसके बाद वह तो घर वापस नहीं आया उसकी मौत की खबर घर पर आ गई।”

मंदिर पर हड्डियाँ फेंकता था असद का परिवार

आगे पेट पर हाथ रखते हुए माँ कहती है, “मेरे बेटे ने खाना भी नहीं खाया था वो भूखा ही चला गया” और फिर बिलखने लग जाती है। माँ के पीछे बैठी चाची राधा कहती है कि जब से पीपल के नीचे मंदिर बना ,है तभी से असद और उसके परिवार को हमसे दिक्कत थी। वो लोग हमारे मँदिर पर हड्डियाँ फेंकते थे। गंदगी फैलाते थे। इसलिए हम सभी ने मिलकर मंदिर बनवाया और तब मंदिर निर्माण का भी असद के परिवार ने खुलकर विरोध किया था। माँ ने भी कहा कि असद का परिवार मंदिर पर हड्डियाँ फेंकता था।

घटनास्थल के पास मौजूद पुलिस
घटनास्थल के पास मौजूद पुलिस

करन के दूसरे दोस्त राजकुमार ने बताया कि असद और उसका पूरा परिवार भी गुंडा टाइप का है। ये लोग मंदिर का विरोध करते थे, मंदिर पर विवाद करते थे, मंदिर पर हड्डियाँ तक डालते थे। करन के करीबी दोस्त ने बताया कि असद व उसका परिवार पहले से ही झगडालू किस्म का है। पहले से गुंडागर्दी में ही रहता है। दोस्त का दावा है कि करन की हत्या के समय असद का अब्बू भी खंडहर मकान में बैठकर शराब पी रहा था और उसने ही बेटे असद के साथ मिलकर करन के लगे को काटा था।

भाई की चीख सुनकर घर से भागे थे गोविंद और सनी

गोविंद ने बताया कि वह बरामदे में चारपाई पर लेटा हुआ था। अचानक से भाई करन के चिल्लाने की आवाज आई, पहले छोटा भाई सनी बाहर भागा, उसने आरोपितों को करना की हत्या करते हुए देखा तो शोर मचाने पर मैं भी चला गया। मैंने देखा कि खंडहर मकान से 7-8 लोग असद के साथ निकल रहे थे। अंदर देखा तो भाई जमीन में पड़ा हुआ था और बहुत खून निकल रहा था।

पड़ोस में रहने वाली जिस मुस्लिम महिला को करन दवा दिलाने के लिए अलीगढ़ ले गया था, उस अमीना ने बताया कि करन बहुच अच्छा लड़का था। हमारे घर में कोई मर्द नहीं है तो वह अक्सर दवा दिलवाने या अन्य किसी काम के लिए जाता रहता था। उसे मार दिया बहुत गलत हुआ है। आरोपितों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए। अमीना की माँ ने कहा कि असद को फाँसी दे दो और पूरे परिवार को खत्म कर दो, यही उसकी सजा है।

अलीगढ़ में बीजेपी के जिलाध्यक्ष कृष्णपाल सिंह ने कहा, “हत्यारे सभी जेल जा चुके हैं किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा। योगी सरकार की नीति साफ है कानूनी प्रक्रिया के तहत अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”

अलीगढ़ की एसडीएम महिमा सिंह ने कहा, “प्रशासन लगातार आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। पीड़ित परिवार के हम साथ हैं, उनकी लगातार मदद कर रहे हैं। मृतक के भाई को नगर पंचायत में नौकरी दी गई है और हम परिवार की सभी माँगें नियमानुसार पूरी करने का हर संभव प्रयास करेंगे।”

बता दें कि करन की हत्या के बाद आरोपित असद ने खुद थाने जाकर अपना जुर्म कुबूल किया था। इसके बाद पीड़ित परिवार की तहरीर पर पुलिस ने सभी आठ आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। वहीं प्रशासन ने आरोपित असद के उस खंडहर मकान पर भी बुलडोजर चला दिया है, जिसमें करन की हत्या की गई थी।

अहमदाबाद में बनाए जा रहे 10 नए स्टेडियम, 650 एकड़ में सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव: कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 के साथ ओलंपिक 2036 पर नजर

कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 अब अहमदाबाद में होने लगभग तय हैं, केवल औपचारिकताएँ बाकी हैं। इन खेलों के लिए भारत के अलावा नाइजीरिया ने भी बोली लगाई थी। लेकिन 15 अक्टूबर 2025 को हुई राष्ट्रमंडल कार्यकारी बोर्ड की बैठक में अहमदाबाद के नाम पर मुहर लगी। नवंबर 2025 में ग्लासगो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में अहमदाबाद की औपचारिक तौर पर घोषणा की जाएगी।

ओलंपिक एसोसिएशन ऑफ इंडिया की अध्यक्ष पीटी उषा ने इस पर खुशी जताते हुए कहा कि भारत के लिए यह गर्व की बात है कि उसे इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की मेजबानी का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि ये खेल भारत की आयोजन क्षमता दिखाएँगे और 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की दिशा में भी योगदान देंगे।

पीटी उषा ने आगे कहा कि ये खेल युवाओं को प्रेरित करेंगे, भारत की दूसरे देशों से दोस्ती मजबूत करेंगे और कॉमनवेल्थ देशों के साथ हमारे अच्छे भविष्य को आगे बढ़ाएँगे।

दरअसल, कॉमनवेल्थ गेम्स अहमदाबाद में आयोजित होने की चर्चा लंबे समय से जारी है। गुजरात सरकार भी इसमे सक्रिय रूप से रूचि दिखा रही है। केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर अहमदाबाद को एक खेल हब बनाने पर काम कर रही हैं और यहाँ खेलों के लिए ढाँचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) तैयार किया जा रहा है।

अहमदाबाद में खेल हब का विकास किस प्रकार किया जा रहा है?

इसी कड़ी में अहमदाबाद में दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम, नरेंद मोदी स्टेडियम बनाया गया है। इसकी क्षमता एक लाख से ज्यादा दर्शकों की है। इसके अलावा अहमदाबाद में 650 एकड़ में सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव भी तैयार किया जा रहा है, जो स्टेडियम का ही हिस्सा है।

निर्माणाधीन इस खेल परिसर में कुल 10 नए स्टेडियम बनाए जा रहे हैं, जहाँ जिमनास्टिक, स्केटबोर्डिंग, सॉफ्टबॉल, टेनिस जैसे खेलों के लिए स्थायी और अस्थायी सुविधाएँ होंगी। इन सभी प्रोजेक्ट्स का काम गुजरात स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड कर रही है। यहाँ एक फुटबॉल स्टेडियम, एथलीट विलेज और होटल भी बनाने की तैयारी है। इस एथलीट विलेज में तीन हजार खिलाड़ियों के रहने की सुविधा होगी।

इसके अलावा, हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने नारनपुरा में वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का भी उद्घाटन किया। आधुनिक सुविधाओं से लैस इस स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में कई खेलों के लिए आयोजन स्थल भी उपलब्ध होंगे। इस कॉम्पलेक्स को कॉमनवेल्थ गेम्स के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है। इसमें 20 से ज्यादा खेलों को शामिल किया जाएगा। इस कॉम्पलेक्स पर सरकार ने ₹824 करोड़ खर्च किए हैं।

खेलों के साथ-साथ यातायात सुविधाओं को भी बेहतर किया जा रहा है। अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन 2030 तक शुरू हो जाएगी। सरखेज-गांधीनगर हाईवे पर भी एक बड़ा स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की योजना है।

साथ ही, साबरमती रिवरफ्रंट का पुनर्विकास किया जा रहा है, जहाँ वॉटर स्पोर्ट्स के लिए भी सुविधाएँ तैयार की जा रही हैं। इस तरह अहमदाबाद को एक विश्वस्तरीय खेल शहर बनाने की दिशा में सरकार तेजी से काम कर रही है ताकि 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स को सफल और यादगार बनाया जा सके।

भारत अपनी ओलंपिक दावेदारी को कैसे मजबूत करेगा?

ये सारी तयारियाँ 2036 ओलंपिक के लिए है, जिसकी मेजबानी के लिए भारत सरकार लगातार काम कर रही है। लेकिन ओलंपिक जैसे विश्वस्तरीय खेल आयोजन से पहले, कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को सफलतापूर्वक आयोजित करना बेहद जरूरी होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए भी पूरी तैयारी और गंभीरता दिखाई है।

कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक बड़ा मौका होंगे, जहाँ वह दुनिया को यह दिखा सकेगा कि उसके पास विश्वस्तरीय खेल बुनियादी ढाँचा, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और संगठित खेल व्यवस्था मौजूद है। यह आयोजन भारत को एक जिम्मेदार, आधुनिक और खेलों के लिए तैयार राष्ट्र के रूप में पेश करने में मदद करेगा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब भारत ने 2010 में पहली बार दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की थी तब कई घोटाले और वित्तीय अनियमितताएँ सामने आई थीं, जिससे देश की छवि को नुकसान पहुँचा था। उसके बाद भारत में कोई बड़ा खेल आयोजन नहीं हुआ। अब मोदी सरकार और गुजरात सरकार इस छवि को सुधारने और भारत को खेलों की दुनिया में एक नई पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं।

साल 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले अहमदाबाद में कई अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन होंगे। साल 2025 में यहाँ कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप और एशियाई तैराकी चैंपियनशिप का आयोजन होगा। 2027 में महिला वॉलीबॉल वर्ल्ड चैंपियनशिप, 2028 में विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप और 2029 में विश्व पुलिस और अग्निशमन खेल (World Police and Fire Games) भी अहमदाबाद में ही आयोजित किए जाएँगे। ये सभी आयोजन भारत की मेज़बानी क्षमता को दुनिया के सामने दिखाने का अवसर होंगे।

हालाँकि, यह संभव है कि 2036 ओलंपिक की मेजबानी का फैसला 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ही हो जाए लेकिन तब तक भारत की तैयारियों, आयोजनों की सफलता और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर दुनिया का ध्यान जा चुका होगा। इन सबका सीधा लाभ भारत की ओलंपिक दावेदारी को मिलेगा।

मोदी सरकार ने G20 जैसे बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक कर यह साबित किया है कि वह ऐसे आयोजनों को कितनी गंभीरता और योजना से पूरा करती है। अहमदाबाद में होने वाले सभी आगामी खेल आयोजन भी उसी सोच और तैयारी के साथ किए जाएँगे, जो भारत को खेलों की दुनिया में एक ऊँचा स्थान दिलाएँगे।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)