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अमेरिका के 50+ शहरों में सड़कों पर उतरे हजारों लोग, राष्ट्रपति के एकतरफा फैसलों से नाराज: जानें No King प्रदर्शन की कहानी, ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों पर गंदगी फेंकते AI वीडियो किया शेयर

अमेरिका इन दिनों एक बड़े जनआंदोलन का गवाह बन रहा है। नो किंग (No King) नाम से चल रहे प्रदर्शन डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में है। इन प्रदर्शनों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं और नारा लगा रहे हैं, “यह देश किसी राजा का नहीं है।” ये प्रदर्शन सिर्फ किसी एक मुद्दे पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, सत्ता के केंद्रीकरण और नागरिक अधिकारों के सवाल पर हैं। लोगों की यह माँग है कि देश को ऐसे रास्ते पर न ले जाया जाए, जहाँ राष्ट्रपति किसी राजा की तरह खुद को कानून और संस्थाओं से ऊपर समझे।

क्या है ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

‘नो किंग’ यानी ‘कोई राजा नहीं’ नाम का ये जनआंदोलन अमेरिका के 50 से अधिक शहरों में फैल गया है। आंदोलन का नारा उस विचार के खिलाफ है, जिसमें राष्ट्रपति खुद को लोकतांत्रिक नियंत्रण से ऊपर समझने लगे। यहा आंदोलन डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और उनके शासन-शैली के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप की नीतियाँ और उनका व्यवहार ‘राजशाही’ जैसी प्रवृत्ति दिखा रहा है। जहाँ वे न्यायपालिका, जनता और मीडिया को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले ले रहे हैं।

जून 2025 में इस आंदोलन की पहली लहर आई थी, जब देशभर के 2 हजार से ज्यादा जगहों पर एक साथ प्रदर्शन हुए। तब लाखों लोग पार्कों, प्लाजा और सड़कों पर उतर आए थे। अक्टूबर 2025 तक आते-आते इस आंदोलन ने भयानक रूप ले लिया। अब यह करीब 2,700 शहरों में फैल चुका है। न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, शिकागो, लॉस एंजेलिस जैसे बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक ‘No Kings, No Crowns’ (कोई राजा नहीं, कोई ताज नहीं) जैसे नारे गूँज रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के तहत अमेरिका की जनता संदेश देना चाहती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी व्यक्ति की मर्जी पर नहीं चल सकती। लोग यह याद दिला रहे हैं कि देश की स्थापना ही इस विचार पर हुई थी कि ‘यहाँ कोई राजा नहीं होगा।’ यही कारण है कि यह आंदोलन ट्रंप विरोधी तो है लेकिन उससे भी ज्यादा लोकतंत्र समर्थक हैं।

क्यों हो रहे ‘नो किंग’ प्रदर्शन?

इन ‘नो किंग’ प्रदर्शनों के पीछे गहरी राजनीतिक और सामाजिक वजहे हैं। सबसे बड़ा कारण ‘सत्ता का केंद्रीकरण’ है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने कई बार संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी की है। उनके हालिया फैसलों और भाषणों से यह संकेत मिला है कि वे राष्ट्रपति पद को ‘असीमित अधिकारों’ की कुर्सी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

दूसरा बड़ा कारण ट्रंप की नीतियाँ हैं। खासकर प्रवासियों के खिलाफ कड़े कदम और संघीय एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने कई जगहों पर अप्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। लोगों का मानना है कि यह केवल कानून का पालन नहीं बल्कि शक्ति का प्रदर्शन है।

तीसरा पहलू है संस्थाओं पर दबाव। हाल के महीनों में संघीय एजेंसियों और न्यायपालिका के बीच खींचतान बढ़ी है। ट्रंप के आलोचको का कहना है कि राष्ट्रपति अपने विरोधियों पर नकेल कसने और मीडिया पर दबाव बनाने में लगे हैं। कई लोग इसे ‘लोकतंत्र के लिए खतरे’ के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि सड़कों पर उतरे लोग यह कहते नजर आ रहे हैं, ‘हम किसी राजा के अधीन नहीं, संविधान के अधीन है।’

डोनाल्ड ट्रंप का AI वीडियो

अमेरिका में जारी ‘नो किंग’ प्रदर्शन के बीच एक नया वीडियो सामने आया, जिसने देशभर में माहौल को और भड़का दिया। यह वीडियो डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया एक्स प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर शेयर किया। इस वीडियो ने ‘नो किंग’ प्रदर्शन में शामिल लोगों का गुस्सा दोगुना कर दिया।

इस AI-जेनरेटेड वीडियो ट्रंप को ‘राजा’ के रूप में दिखाया गया। वे एक लड़ाकू विमान के पायलट की तरह नजर आ रहे हैं, विमान पर बडे अक्षरों में लिखा है- ‘KING TRUMP।’ इसके बाद उन्हें विरोध कर रही भीड़ पर कीचड़ गिराते हुए दिखाया गया। वीडियो में ट्रंप ने ताज पहन रखा है और चेहरे पर विजयी मुस्कान है। यह AI वीडियो देखने में किसी फिल्मी सीन जैसा लगता है लेकिन इसका संदेश राजनीतिक था।

वीडियो पोस्ट करने के कुछ ही घंटो बाद वायरल हो गया। इस वीडियो ने न केवल प्रदर्शनकारियों को नाराज किया बल्कि यह सवाल भी उठाया कि क्या किसी सत्तारूढ़ नेता को AI तकनीक का इस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए। इस वीडियो के बाद प्रदर्शन और तेज हो गए। भीड में We will not bow down (हम झुकेंगे नहीं) और You are not our King (तुम हमारे राजा नहीं हो) जैसे नारे और जोर से गूँजने लगे।

ऑपइंडिया के वायरल वीडियो के बाद पिटी शहाबुद्दीन के बेटे की भद्द, ओसामा के समर्थन में कूदी राजद की फौज: अपराध के सरताज को ‘विकास पुरुष’ बताने लगी RJD

बिहार के सिवान के कुख्यात बाहुबली और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब से जुड़ा ‘ऑपइंडिया’ का वीडियो वायरल होने के बाद राजद बैकफुट पर आ गई है। राजद के नेता अब ओसामा शहाब को किसी भी तरह से नायक बनाने पर तुले हुए हैं। हो भी क्यों ना, ओसामा को विधानसभा चुनाव का टिकट देकर राजद ने साफ कर दिया है कि सत्ता की चाह में वह अपराध की विरासत को भी गले लगाने से पीछे नहीं हटेगी।

‘ओसामा पोस्टर फाड़ने वाले को जिंदा जला देंगे’

ओसामा से जुड़े जिस वीडियो को लेकर बवाल हुआ है वो उसके एक समर्थक द्वारा ‘आपइंडिया’ के कैमरे पर किया गया दावा है। चुनाव कवरेज के दौरान एक शख्स ने ‘ऑपइंडिया’ के कैमरे पर यह दावा किया है कि वो ‘I Love Muhammad’ का पोस्टर फाड़ने वाले एक युवक को ढूँढ रहे हैं और मिल गया तो ओसामा शहाब उसे जिंदा जला दंगे।

जाहिर है कि जिसके अब्बू का इतिहास तेजाब से लोगों को जिंदा जलाने का रहा हो वो अगर ऐसी धमकी भी दे रहा है तो इसमें आश्चर्यचकित होने वाली बात भी नहीं है। खैर, ओसामा के समर्थक ने यह दावा किया था कि अगर पोस्टर को जलाना वाला लड़का मिल जाएगा तो वो उसे बाँधकर ओसामा के घर ले जाएगा। ऑपइंडिया का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।

बिहार के सत्ताधारी दल बीजेपी ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर यह वीडियो शेयर कर लिखा, “RJD का टिकट मतलब बिहार में जंगलराज का आमंत्रण! अपराधियों के घराने को RJD का खुलेआम समर्थन — जनता देख रही है।” बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग्राउंड रिपोर्ट का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “यदि राजद प्रत्याशी शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा चुनाव हार जाते हैं, तो इस्लामी कट्टरपंथी सीवान को जला देने की धमकी दे रहे हैं।”

जब यह वीडियो वायरल हुआ तो ओसामा की गुंडई की कलई खुलने लगी जिससे राजद और उसके समर्थक बौखला गए। कुछ लोगों ने ओसामा को लेकर दावा करने वाले उस लड़के को ढूँढ लाए और दावा करवाया गया कि उसे ‘ऑपइंडिया’ की तरफ से ये सब बाते कहने के लिए 5000 रुपए दिए गए थे। उसने खुद को नशे में भी बताया।

‘ऑपइंडिया’ के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने वायरल वीडियो और पैसे देने के दावों की सत्यता का खुलासा करते हुए एक विस्तृत वीडियो बनाया है। अनुराग ने इसमें बताया है कि किस तरह उस लड़के को एक अन्य लड़का बातचीत के लिए बुलाकर लाया था ना कि ‘ऑपइंडिया’ ने उससे बातचीत करनी शुरू की थी।

ओसामा के डिफेंस में बैकफुट पर राजद

अब जब इन वीडियो से छीछालेदर होनी शुरू हुई तो राजद के सिपाही मैदान में ओसामा को डिफेंड करने के लिए कूद गए हैं। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और सिवान सदर विधानसभा सीट से पार्टी के उम्मीदवार अवध बिहारी चौधरी तो उन्हें बस जननायक साबित करने पर तुल गए हैं।

अवध बिहारी ने फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा, “पिछले कुछ दिनों से कुछ तथाकथित मीडिया और विरोधी दल, पैसे और प्रोपेगेंडा के सहारे मरहूम मोहम्मद शाहाबुद्दीन साहब के बेटे और राजद प्रत्याशी ओसामा साहब के खिलाफ गलत और भ्रामक बयान फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “इनका मकसद साफ़ है — सीवान की जनता के बीच आपसी भाईचारे को तोड़ना और लोगों को गुमराह करना। ओसामा बाबू एक ईमानदार, मिलनसार और क्षेत्र-सेवी नेता हैं। वो कभी धर्म की राजनीति नहीं करते, उनका लक्ष्य है सीवान का विकास, युवाओं का रोजगार और जनता का सम्मान।”

अपराध का सरताज, राजद का विकास पुरुष

अपने अब्बा की तरह ही ओसामा भी अपराध की दुनिया में एंट्री मार चुका है। वह कई आपराधिक मामलों में जेल की हवा खा चुका है। ओसामा पर सबसे पहला मामला हुसैनगंज थाना क्षेत्र के छपिया बुजुर्ग स्थित 42 कट्ठा जमीन में दर्ज हुआ था। उसके बाद मोतिहारी में उसके बहनोई से आपसी जमीन विवाद में फायरिंग करने पर भी ओसामा पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी।

लेकिन यही ओसामा RJD के लिए विकास पुरुष है और ऐसे हम नहीं कह रहे हैं, खुद राजद का यही दावा है। राजद ने अपने उम्मदीवारों को टिकट दिए जाने से जुड़ा फॉर्म C7 जारी किया है। इसमें प्रत्याशी की जानकारी होता है और मोटे तौर पर यह बताया जाता है कि उम्मदीवार पर क्या केस चल रहे हैं और उसका चयन क्यों किया गया है।

इसमें प्रत्याशी के चयन के कारण को लेकर राजद ने लिखा है, “वह अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय हैं और इलाके के विकास और भलाई के कामों में हमेशा सक्रिय रहते हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक है। पार्टी में उनके जैसा कोई और उम्मीदवार नहीं है।”

राजद ने जिस तरह से मोहम्मद शहाबुद्दीन की डर-खौफ की विरासत को ‘विकास’ का चेहरा बताने की कोशिश की है, वह बिहार की राजनीति के लिए सबसे शर्मनाक पल है। राजद के लिए सत्ता की चाभी डर और दहशत के चेहरे बेशक रहे हों लेकिन जिस तरह अब लोगों ने सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई तो उसे सियासी जमीन खिसके का डर सता रहा है। इसके बाद अब राजद किसी भी सूरत में ओसामा को डिफेंड करने में लग गई है।

‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या उम्मीद करें: दीपावली पर दीप ना जलाने का ज्ञान दे रहे सपा प्रमुख की लगी क्लास, क्रिसमस को बता रहे थे आदर्श; संस्कृति से रोजगार तक है दीपोत्सव का महत्व

जहाँ देशभर में दीपावली पर खुशी का माहौल है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव को इससे चिढ़ हो रही है। उनकी ये चिढ़ इस बार दीपावली पर जलने वाले दीयों को लेकर है। इतना ही नहीं उनके बयान से यह भी साफ है कि ईसाइयों का त्योहार क्रिसमस उन्हें ज्यादा पसंद है लेकिन हिंदू त्योहार दीपावली पर दीया जलाना उनके लिए पैसों की बर्बादी है।

यह अखिलेश यादव ने खुद कहा है। लखनऊ में धनतेरस (18 अक्टूबर 2025) पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने कहा, “मैं प्रभु राम के नाम पर एक सुझाव देना चाहता हूँ। क्रिसमस के समय कई महीनों तक शहर जगमगा जाते हैं। उन्हीं से सीख लो बस क्यों खर्चा करना बार-बार दीयों और मोमबत्ती का। इस सरकार से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? इसे तो हटा देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यहाँ और भी खूबसूरत रोशनियाँ हों…”

सोशल मीडिया पर अखिलेश के बयान का विरोध

दीपावली पर अखिलेश यादव का यह सुझाव हिंदू त्योहारों के प्रति घृणा को दर्शाता है। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी दीपावली मनाने वाले हिंदू लोगों ने अखिलेश के बयान का विरोध किया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कहा कि लगता है अखिलेश यादव हिंदू भी नहीं है।

वहीं कई लोगों ने अखिलेश यादव को ‘अखिलेशुद्दीन’ नाम दे दिया और कहा कि ‘अखिलेशुद्दीन’ से क्या ही आशा की जा सकती है।?

एक्स/ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा, “अब अखिलेश यादव को दीयों और मोमबत्तियों से दिक्कत हो गई है। आज उत्तरप्रदेश वालों को सोचना है ये ईसाई है या मुस्लिम?”

अन्य यूजर ने लिखा, “एक से बढ़कर एक नेता देखे पर इन के जैसा कोई नहीं जो खुद ही अपना स्टैंड क्लियर नहीं कर पाए। आखिर PDA के नाम पर लोगों को गुमराह कर झूठी तसल्ली दे अपना राजनीतिक करियर बनाने में माहिर नेता जी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और सर्वणों का विरोध करते करते हिन्दुओं का अभी अपमान करने लगे। एक तरफ कुम्हार जाति के हमारे भाई बहन सालभर मेहनत कर दिवाली के उत्सव के लिए दीपक बनाते हैं तो दूसरी ओर यह महोदय क्रिसमस का उदाहरण देकर झालर लटकाने को बोलते हैं। अब सनातन धर्म के लोग क्रिसमस से सलाह लें… ?”

एक एक्स यूजर ने तर्क दिया, “उसी तरह हर साल ईद पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जाती है? अगर आपने एक बार कर लिया तो क्या ये काफी नहीं है? पैसे बचाएँ और शायद एक मासूम जानवर भी। हर साल क्रिसमस पर पेड़ क्यों काटे जाते हैं?”

जाहिर है कि अखिलेश यादव के दीया जलाने पर पैसा बर्बाद करने वाले बयान से हिंदू धर्म के लोग नाखुश हैं। क्योंकि उन्हें दीपावली पर दीया जलाने का महत्व मालूम है। जो शायद सपा सुप्रीमो हिंदू होने के बावजूद नहीं जानते। तो अखिलेश यादव को जान लेना चाहिए कि दीपोत्सव का महत्व सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर भी जुड़ा है।

दीया जलाने का महत्व

दीपोत्सव की परंपरा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आत्म-चेतना और सामाजिक आर्थिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।

बतौर प्रतीय यह दर्शाती है कि अंधकार पर प्रकाश, ज्ञान पर अज्ञान, असत्य परसत्य की विजय संभव है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू परंपरा में दीपक को ‘आत्मा की ज्योति’ और ‘ईश्वर के दर्शन’ का माध्यम माना गया है। दीपक का उजाला न सिर्फ बाहरी बनाए हुए अंधकार को मिटाता है बल्कि भीतरी विचारों, भाव- निराशा और नकारात्मकता के अंधेरे को भी रोशन करता है।

इसके साथ ही सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दीया उन हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बन गया है जो दीपावली जैसे त्योहारों के समय इस काम में जुटते हैं। इसका उदाहरण अयोध्या में हर साल होने वाले दीपत्सव से भी समझा जा सकता है। दीपावली के लिए स्थानीय कुम्हार परिवारों को दीये बनाने के बड़े ऑर्डर्स मिलते हैं।

दीया बनाने से रोजगार

वहीं दीपावली पर अयोध्या दीपोत्सव में हर साल बनने वाला विश्व रिकॉर्ड इस साल 2025 में भी बरकरार रहेगा। पिछले साल 26 लाख से अधिक दीयों का रिकॉर्ड अब 29 लाख दीये जलकर टूटेगा। यह केवल दीपावली पर लोगों की आस्था नहीं बल्कि इससे रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि साल 2017 से दीपोत्सव के बाद से उनका जीवन बदल गया। जहाँ पहले कु्म्हार परिवार दीपावली पर केवल 20 हजार कमाते थे, उनकी आय अब लाखों में पहुँच गई है। देशभर में भी छोटे-छोटे गाँवों में सैंकड़ों परिवार दीया बनाने के कारण ही सहज आजीविका जुटा रहे हैं।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी उत्पाद पर जोर दे रहे हैं। दीपावली पर भी पीएम मोदी ने अपील की, “स्वदेशी अपनाएँ और इसे हर घर और बाजार का मंत्र बनाएँ।” पीएम मोदी की अपील से दीपावली के बाजार पर भी खासा असर देखने को मिला है। रंग-बिरंगे सजे बाजारों में दीपावली पर सारा सामान स्वदेशी है, जिसे खरीदने के लिए लोग भी उत्साहित नजर आ रहे हैं।

क्रिसमस पर पेड़ों का कटान

वहीं अखिलेश यादव के पसंदीदा त्योहार क्रिसमस पर लाखों पेड़ों को काटा जाता है, जो पर्यावरण और समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव डालती है। हर साल क्रिसमस पर पेड़ों को सजाने का चलन है और ये पेड़ या तो असली होते हैं या फिर प्लास्टिक के। प्राकृतिक क्रिसमस ट्री उगाने के लिए बड़े पैमाने पर कैमिकल फर्टिलाइजर्स और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जिससे इकोसिस्टम पर गहरा असर पड़ता है।

इसके अलावा, इन पेड़ों की कटाई से वन्यजीवों के घर नष्ट होते हैं, जिससे बायोडायवर्सिटी को नुकसान होता है। कटे हुए पेड़ जब लैंडफिल में जाते हैं तो वे कार्बड डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभावित होता है। वहीं आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं क्योंकि ये प्लास्टिक से बने होते हैं, जो नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और लैंडफिल में वर्षों तक बने रहते हैं।

इसके साथ ही क्रिसमस पर आर्टिफिशयल लाइटों को दीपोत्सव से तुलना करने वाले अखिलेश यादव जान लें कि ये लाइट बिजली की खपत बढ़ाते हैं वहीं दीप जलाने से बिना बिजली का उपयोग करे संसार जगमग हो जाता है।

अखिलेश यादव का दोगलापन

शायद अब अखिलेश यादव को दीपावली पर दीपोत्सव का महत्व समझ आ जाए। या शायद वे यहाँ भी आँख मींच लें। क्योंकि अखिलेश यादव साल 2024 में दीपावली पर दी गई शुभकामनाओं से तो लगता है कि उन्हें दीपोत्सव को थोड़ा बहुत ज्ञान तो जरूर है।

या फिर पिछली बार जो ट्वीट किया थो वो सिर्फ दिखावा था अखिलेश यादव? और इस बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में मन की बात निकाल दी। दीपावली पर अखिलेश यादव ने आसानी से दीपोत्सव न करने का सुझाव दे डाला। लेकिन ये सुझाव अखिलेश यादव को ईद, क्रिसमस या किसी अन्य धर्म के त्योहारों पर याद नहीं आते है क्या?

असल में उनका टारगेट अयोध्या में विश्व रिकॉर्ड दीपोत्सव है। उन्हें चिड़ है कि अयोध्या में बड़े संख्या में दीप जलाए जा रहे हैं, जिससे देश के नहीं बल्कि विदेशों के लोग भी जुड़ रहे हैं। अखिलेश यादव ने दीपावली पर जहरीला बयान देकर साफ कर दिया है कि अगर उनकी सरकार आती है तो उनके लिए दीपोत्सव का कोई महत्व नहीं है। हिंदू त्योहार दीपावली को पश्चिमी देशों में मनाए जाने वाले क्रिसमस से तुलना करना अखिलेश यादव की एक भद्दी हिंदू-विरोधी राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का साथ देकर अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी, तुर्की-अजरबैजान जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में आई 56% तक की कमी

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करने वाले तुर्की और अजरबैजान को अब भारतीय सैलानियों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मई से अगस्त 2025 के बीच इन दोनों देशों में भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या में जबरदस्त गिरावट देखी गई। अजरबैजान में भारतीय सैलानियों की संख्या में 56% की गिरावट हुई, जबकि तुर्की में यह गिरावट 33.3% तक पहुँच गई।

यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर किया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमावर्ती इलाकों में हमले की कोशिश की, जिसे भारत ने नाकाम कर दिया। इस दरम्यान तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान का खुल कर साथ दिया।

इन देशों के रुख ने भारतीय जनता के बीच असंतोष पैदा किया, जिसका सीधा असर इनकी पर्यटन आय पर पड़ा। भारत जैसे बड़े बाजार से आने वाले पर्यटकों की कमी ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और उनकी पर्यटन रणनीति को हिला कर रख दिया है।

बयानबाजी का तुर्की और अजरबैजान पर असर

कश्मीर के पहलगाम में मई 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया। भारत ने जवाबी कार्रवाई के तहत ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जो चार दिनों तक चला। इस दौरान, तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिए।
यहीं से भारतीय नागरिकों में नाराजगी बढ़ने लगी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बड़ी संख्या में लोगों ने इन देशों की यात्रा रद्द करने की अपील की और पर्यटन एजेंसियों पर भी दबाव पड़ा कि वे अपनी सेवाएँ रोक दें।

जिसके बाद, भारतीय ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स ने भी राष्ट्रीय भावना का सम्मान करते हुए इन देशों के लिए बुकिंग्स बंद करनी शुरू कर दीं। MakeMyTrip और EaseMyTrip जैसी कंपनियों ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि वे गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दे रही हैं। MakeMyTrip ने तो यहाँ तक कहा कि “हम अपने देश और सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए अज़रबैजान और तुर्की के लिए प्रमोशनल ऑफर बंद कर रहे हैं।”

अजरबैजान पर बयान का असर

ऑपरेशन सिंदूर से पहले अजरबैजान भारतीय यात्रियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। जनवरी से अप्रैल 2025 तक भारत से अजरबैजान जाने वाले सैलानियों की संख्या में 33% की वृद्धि हुई थी। लेकिन मई आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

मई से अगस्त के बीच भारत से अजरबैजान जाने वाले पर्यटकों की संख्या 1 लाख से घटकर सिर्फ 44,000 रह गई। यह 56 प्रतिशत की भारी गिरावट थी, जो किसी भी देश के लिए एक बड़ा झटका मानी जाती है।

अजरबैजान पर्यटन बोर्ड के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में भारत से वहाँ आने वाले कुल यात्रियों की संख्या 1.25 लाख रही, जो पिछले साल की तुलना में 22% कम है। यह वही अजरबैजान था जिसने कुछ महीने पहले तक भारत को अपने टॉप-5 प्राथमिक पर्यटन बाजारों में शामिल किया था।

लेकिन अगस्त 2025 तक भारत की रैंक फिसलकर 11वें स्थान पर पहुँच गई। यह गिरावट केवल संख्याओं की नहीं बल्कि एक चेतावनी है कि किसी देश की विदेश नीति उसके पर्यटन पर कितना गहरा असर डाल सकती है।

तुर्की: इस्तांबुल और कप्पाडोसिया में घटती भारतीय रौनक

तुर्की लंबे समय से भारतीयों के बीच पसंदीदा पर्यटन स्थल रहा है। इस्तांबुल, कप्पाडोसिया, अंताल्या जैसे स्थान भारतीय कपल्स, फिल्म शूटरों और हनीमून ट्रैवलर्स के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद तुर्की की पाकिस्तान समर्थक स्थिति ने इस छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया।

मई से अगस्त 2025 के बीच तुर्की जाने वाले भारतीय यात्रियों की संख्या 1.36 लाख से घटकर 90,400 रह गई, यानी 33.3% की गिरावट। इस साल के पहले चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) में यह संख्या लगभग स्थिर थी (83,300 बनाम 84,500), लेकिन मई के बाद गिरावट तेज हो गई।

जनवरी से अगस्त 2025 में भारत से तुर्की जाने वाले कुल पर्यटकों की संख्या 21% घटकर 1.74 लाख रह गई। पिछले साल यानी 2024 में इसी वक्त के दौरान तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या में 28.5% की वृद्धि दर्ज की गई थी। यानी एक साल के भीतर पूरा ट्रेंड पलट गया।

यह गिरावट तुर्की की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर है, क्योंकि वहाँ का पर्यटन क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 12% तक योगदान देता है। भारतीय सैलानियों की कमी से न केवल होटल और एयरलाइन कंपनियाँ प्रभावित हुईं, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और टूर ऑपरेटर्स को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा।

आर्थिक और कूटनीतिक असर: पर्यटन से परे की कहानी

यह घटना यह दर्शाती है कि आज के समय में कूटनीति और पर्यटन एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। भारत जैसे विशाल बाजार के सैलानियों की नाराजगी का असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ सकता है।

पहला असर आर्थिक है, होटल बुकिंग्स, एयरलाइंस की टिकट सेल, ट्रैवल गाइड, टैक्सी सर्विस और स्मारिका बाजारों में गिरावट। जब लाखों पर्यटक एक साथ किसी देश की यात्रा रद्द करते हैं, तो स्थानीय रोजगार पर इसका सीधा असर होता है।

दूसरा सामाजिक और मानसिक असर है, अब भारतीय यात्रियों की सोच बदल रही है। वे किसी देश की यात्रा करने से पहले सिर्फ सुंदर जगह या सस्ता पैकेज नहीं देखते, बल्कि यह भी ध्यान रखते हैं कि उस देश का भारत के प्रति रवैया कैसा है। सोशल मीडिया पर ऐसे ट्रेंड बनना अब सामान्य बात हो गई है, जो ट्रैवल ट्रेंड्स को प्रभावित करते हैं।

तीसरा असर कूटनीतिक है, तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों को यह समझना होगा कि भारत का जनसमर्थन अब किसी भी राजनीतिक रुख से प्रभावित हो सकता है। यदि कोई देश पाकिस्तान जैसे भारत-विरोधी देश का खुलकर साथ देता है, तो उसकी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद की यह पूरी कहानी इस बात की मिसाल है कि आज की वैश्विक दुनिया में राष्ट्रीय भावना एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर चुकी है। अजरबैजान में 56% और तुर्की में 33% की गिरावट केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि भारतीय यात्रियों की सोच अब पहले से कहीं अधिक संवेदनशील और जागरूक हो चुकी है। भारत जैसे बड़े टूरिस्ट मार्केट को खोना किसी भी देश के लिए बड़ा झटका है।

न आतिशबाजी होगी, न होंगे कोई स्टेज शो: ब्रिटेन के लीसेस्टर में ‘पब्लिक सेफ्टी’ के नाम पर लगा दीवाली पर बैन, हिंदू बोले- अब हमारे पर्व भी खतरे में

भारत के बाहर दुनिया के सबसे बड़े दिवाली उत्सव में एक ब्रिटेन के लीसेस्टर में होने वाले उत्सव पर रोक लगा दिया गया है। दिवाली पर यहाँ आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों इस साल नहीं हो रहा है। सिटी काउंसिल की इस घोषणा को हिन्दू समुदाय ने पक्षपातपूर्ण करार दिया है।

हर साल यहाँ बड़े पैमाने पर पारंपरिक उत्सव आयोजित होते थे। आतिशबाजी और स्टेज शो जैसे कार्यक्रम होते थे। इस साल बेलग्रेव रोड पर यातायात बंद रहेगा। हालाँकि लैंपपोस्ट पर सजावट किए जाएँगे। इसके पीछे पब्लिक सेफ्टी का हवाला दिया गया है।

आवाजाही बंद, लेकिन ‘गोल्डन माइल’की होगी सजावट

लीसेस्टर सिटी काउंसिल के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी बेलग्रेव रोड पर मशहूर ‘गोल्डन माइल’ लाइटों से जगमगाएगा और 20 अक्टूबर 2025 को सड़कों पर ट्रैफिक भी बंद रहेगा। लेकिन इस बार आतिशबाजी नहीं होगी, ना ही मंच पर कोई कार्यक्रम होगा। पिछले सालों की तरह दीवाली का मेला भी नहीं लगेगा।

यह कदम शहर के सुरक्षा सलाहकार समूह (SAG) के निर्देश के बाद उठाया गया है, जिसमें काउंसिल, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं के प्रतिनिधि शामिल थे। SAG ने कहा कि पिछले साल दीपावली पर करीब 50 हजार लोग इकट्ठा हुए थे, जो कि सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है।

भारतीय मूल की लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि दीपावली का जश्न खतरे में है। शिवानी राजा ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, “हमारी दीवाली का जश्न अब भी खतरे में, हमारे जश्न पर संकट मंडरा रहा है।”

पिछली दीवाली में परोसा गया नॉन वेज- शराब

यह पहली बार नहीं है जब ब्रिटेन में दीवाली के जश्न पर विवाद खड़ा हुआ है। पिछले साल 2024 में भी पीएम कीर स्टार्मर की सरकार के दौरान 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर दीवाली रिसेप्शन कार्यक्रम में मीट और शराब परोसी गई थी।

उस वक्त भी हिंदू, सिख और जैन समाज के लोगों ने इसका विरोध किया था और इसे धार्मिक भावनाओं के खिलाफ बताया था। लीसेस्टर सांसद शिवानी राजा ने तब भी स्टार्मर को पत्र लिखकर कहा था कि खाने का मेन्यू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं था। उन्होंने आगे से गाइडेंस देने की पेशकश भी की थी।

लीसेस्टर में हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की हुई कोशिश

ब्रिटेन के लीसेस्टर में 18 प्रतिशत हिंदू समाज के लोग रहते हैं। यही कारण है कि लीसेस्टर की दीवाली दुनियाभर में मशहूर है। इसके अलावा बाकी हिंदू त्योहार भी धूमधाम से मनाए जाते हैं। हालाँकि, शहर में कई बार हिंदू-विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई है।

गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। जब मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने इसे ‘हिंदू कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की थी।

वहीं साल 2022 में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद हिंसा के जख्म अब तक नहीं भरे हैं। सोशल मीडिया पर हिंदुओं के खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई गई थीं। इन अफवाहों के बाद हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडो का अपमान किया गया और सरेआम लोगों पर चाकू से वार किए गए थे।

कुछ समय बाद नवंबर 2022 में आई घटना की जाँच रिपोर्ट में साफ हो गया था कि हिंसा ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी।

नेक्सपेरिया पर चीन के एक्सपोर्ट बैन के बाद यूरोप में हड़कंप, मंडराया चिप का संकट: जानिए कैसे ट्रंप की सख्ती ने EU का ऑटो उद्योग ठप होने की कगार पर पहुँचा

यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने गुरुवार  (16 अक्टूबर 2025) को एक बयान जारी कर कहा कि यूरोप की कार कंपनियों के लिए जरूरी चिप्स की सप्लाई में भारी रुकावट आ सकती है, जिससे वाहन उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यह संकट डच चिप निर्माता कंपनी नेक्सपीरिया से जुड़ा है, जो अब यूरोपीय कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।

इस संकट की शुरुआत तब हुई जब डच सरकार ने चीन की स्वामित्व वाली नेक्सपीरिया कंपनी को सीज कर दिया। यह कदम अमेरिका के दबाव में लिया गया, जिसने नेक्सपीरिया के चीन से जुड़े होने पर प्रतिबंधों की धमकी दी थी। इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर एक एक्सपोर्ट बैन (निर्यात प्रतिबंध) लगा दिया।

इस फैसले का असर अब यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री पर पड़ रहा है क्योंकि कारों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चिप्स की सप्लाई बंद होने का खतरा है। नेक्सपीरिया ने कहा है कि वह अब यूरोपीय कार कंपनियों को सप्लाई की गारंटी नहीं दे सकती। ACEA ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है और कहा है कि अगर यह समस्या तुरंत नहीं सुलझी, तो यूरोप में वाहनों का उत्पादन रुक सकता है।

यह पूरा मामला वैश्विक स्तर पर बढ़ते राजनीतिक और व्यापारिक दबावों का नतीजा है, जिसकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल में अमेरिका ने वैश्विक व्यापार पर दबाव काफी बढ़ा दिया था। अब उसी दबाव के चलते यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री भी संकट में आ गई है।

नेक्सपीरिया और इसका सामरिक महत्व

नेक्सपीरिया एक डच चिप निर्माता कंपनी है, जिसका मुख्यालय नीदरलैंड्स के निजमेगेन शहर में है। यह कंपनी बड़ी मात्रा में सेमीकंडक्टर बनाती है, जो दुनियाभर की कारों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनों में इस्तेमाल होते हैं।

ये चिप्स बहुत हाई-टेक नहीं होतीं, जैसे GPU या AI चिप्स लेकिन ये गाड़ियों के इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स (ECUs) और अन्य जरूरी हिस्सों को चलाने के लिए अनिवार्य होती हैं। नेक्सपीरिया दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है जो डायोड्स, ट्रांजिस्टर और MOSFETs जैसे बेसिक चिप्स बनाती है, जो हर इलेक्ट्रॉनिक और बिजली से चलने वाले उपकरण में बड़ी मात्रा में लगते हैं।

कंपनी की शुरुआत 2017 में NXP से अलग होकर हुई थी और 2019 में चीन की विंगटेक टेक्नोलॉजी ने इसे करीब 3.6 अरब डॉलर में खरीद लिया। इस खरीद के बाद कंपनी का मालिकाना ढांचा दो हिस्सों में बँट गया। शंघाई में सूचीबद्ध कंपनी विंगटेक के पास इसके नियंत्रण है। वहीं, नेक्सपीरिया ने वैश्विक उपस्थिति के साथ अपनी परिचालन स्वतंत्रता बनाए रखी है।

हालांकि, नेक्सपीरिया ने अब भी अपनी वैश्विक पहचान और संचालन में स्वतंत्रता बनाए रखी है और इसकी मौजूदगी यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई देशों में है। कंपनी के पास 14,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं और इसका कारोबार अरबों डॉलर का है।

नेक्सपीरिया का उत्पादन मॉडल ऐसा है कि इसका डिजाइन और शुरुआती निर्माण यानि वेफर निर्माण यूरोप जर्मनी और ब्रिटेन में होता है और फिर अंतिम असेंबली और टेस्टिंग एशिया (चीन, मलेशिया, फिलीपींस) में की जाती है।

इसे समझने के लिए भारत की टाटा ग्रुप के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट का उदाहरण लिया जा सकता है, जिसमें गुजरात में चिप्स का निर्माण होगा और असम में पैकेजिंग और टेस्टिंग। नेक्सपीरिया का यह हाइब्रिड मॉडल लागत में कमी और उत्पादन में तेजी लाने में मदद करता है, लेकिन यह सीमा पार निर्भरता के कारण बहुत संवेदनशील भी हो गया है।

हाल ही में कंपनी भारी राजनीतिक संकट में फंस गई है। डच सरकार ने अमेरिका के दबाव में आकर नेक्सपीरिया को जब्त कर लिया, क्योंकि इसकी मालिक कंपनी विंगटेक का चीन से गहरा संबंध है।

अमेरिका को डर है कि चीन तकनीकी कंपनियों के जरिए महत्वपूर्ण तकनीक पर नियंत्रण पा रहा है। इस कदम के जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया पर निर्यात प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे कंपनी अब यूरोपीय कार निर्माताओं को चिप्स की सप्लाई की गारंटी नहीं दे पा रही है।

यह संकट यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए बहुत बड़ा खतरा है, क्योंकि ये चिप्स उनके लिए जरूरी हैं। पहले ही COVID-19 और अन्य वैश्विक तनावों के दौरान चिप्स की भारी कमी हो चुकी है, जिससे उत्पादन रुक गया था।

अब अगर नेक्सपीरिया की सप्लाई बंद हो गई, तो यूरोप की गाड़ियों की उत्पादन लाइनें फिर से बुरी तरह प्रभावित होंगी। दूसरी कंपनियों से चिप्स लेने में कई महीने लग सकते हैं, क्योंकि हर नए पार्ट को पहले टेस्ट और अप्रूव समरूपीकरण करना पड़ता है।

नतीजा यह है कि नेक्सपीरिया, जो अब तक यूरोपीय तकनीक और चीनी उत्पादन क्षमता का बेहतरीन मेल थी, अब अमेरिका-चीन टेक युद्ध का शिकार बन गई है। इससे न केवल एक कंपनी, बल्कि पूरे यूरोपीय वाहन उद्योग के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।

अमेरिकी दबाव के कारण डच सरकार का अधिग्रहण हुआ

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।

उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।

वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।

अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।

इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।

डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।

इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन Guido Dierick को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।

इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।

इस कदम की  विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।

इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।

चीन का जवाबी निर्यात प्रतिबंध और यूरोप पर इसका प्रभाव

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने दुनिया भर में तकनीकी सप्लाई चेन पर चीन के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि नेक्सपीरिया पर चीन का स्वामित्व एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।

उनका मानना था कि चीन इस कंपनी के जरिए यूरोप और अमेरिका में हो रहे रिसर्च और टेक्नोलॉजी तक पहुँच सकता है। इसी वजह से अमेरिका को आशंका थी कि संकट की स्थिति में चीन इस सप्लाई का दुरुपयोग कर सकता है।

वॉशिंगटन ने जून 2025 में डच सरकार को चेतावनी दी कि अगर कंपनी में बदलाव नहीं किए गए, खासकर इसके चीनी CEO Zhang Xuezheng को लेकर, तो नेक्सपीरिया को अमेरिकी एंटिटी लिस्ट (ब्लैकलिस्ट) में डाला जा सकता है। इस लिस्ट में आने का मतलब है कि कंपनी को अमेरिकी तकनीक और उपकरणों की सप्लाई पर रोक लग जाएगी।

अमेरिका ने सितंबर 2025 में एक नया नियम जारी किया, जिसके अनुसार अगर कोई कंपनी 50% या उससे ज्यादा हिस्सेदारी किसी पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी के पास है, तो वह भी अपने आप इस लिस्ट में आ जाएगी। ये नियम सीधे विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी पैरेंट कंपनी) पर लागू हुआ, जिससे नेक्सपीरिया पर भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध लगने लगे।

इस राजनीतिक दबाव के अलावा, नेक्सपीरिया में अंदरूनी प्रबंधन को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे। कंपनी पर 200 मिलियन के अनावश्यक वेफर ऑर्डर जबरन करने, विरोध करने वाले अधिकारियों को निकालने और CEO Zhang की अन्य कंपनियों के साथ हितों के टकराव जैसे आरोप लगे।

डच सरकार ने 30 सितंबर 2025 को 1952 के ‘Goods Availability Act’ (जो कि शीत युद्ध के समय का आपातकालीन कानून है) का इस्तेमाल करते हुए नेक्सपीरिया का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। सरकार ने कहा कि उन्हें डर है कि कंपनी की तकनीक चीन को ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे यूरोप में सेमीकंडक्टर की कमी और ऑटो इंडस्ट्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।

इस फैसले के तहत, कंपनी को अस्थायी बाहरी प्रबंधन के तहत रखा गया और CEO Zhang को उनके सभी पदों से हटा दिया गया। एक डच अदालत ने पहले ही Zhang को कंपनी के कार्यकारी निदेशक पद से सस्पेंड कर दिया था और उनकी जगह डच बिजनेसमैन गुइडो डिएरिक को निर्णायक अधिकारों के साथ नियुक्त किया गया। साथ ही, नेक्सपीरिया के अधिकतर शेयरों का नियंत्रण एक डच वकील को सौंप दिया गया, ताकि कंपनी का संचालन स्थानीय कानूनों के तहत पारदर्शी तरीके से हो।

इस कार्रवाई में कंपनी का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया, बल्कि एक साल तक के लिए सीमित नियंत्रण लगाया गया है। इस दौरान नेक्सपीरिया कोई बड़ा बिजनेस फैसला, संसाधनों का ट्रांसफर या कर्मचारियों में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती, जिससे कि प्रोडक्शन चलता रहे और टेक्नोलॉजी चीन न जाए।

इस कदम की  विंगटेक ने कड़ी आलोचना की और इसे भूराजनीतिक पक्षपात से प्रेरित बताया। कंपनी ने कहा कि नेक्सपीरिया ने सभी स्थानीय नियमों का पालन किया है और यूरोप में भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। उन्होंने शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में एक फाइलिंग के जरिए बताया कि इस डच फैसले के कारण उनके नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर अस्थायी असर पड़ा है।

इससे पहले भी 2022 में अमेरिका के दबाव में ब्रिटेन सरकार ने नेक्सपीरिया को अपनी न्यूपोर्ट वाली चिप फैक्ट्री बेचने के लिए मजबूर किया था, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया था। अब वही स्थिति डच इकाई में दोहराई जा रही है।

ACEA का संकट संकेत

नेक्सपीरिया ने 10 अक्टूबर 2025 को यूरोप की वाहन कंपनियों और उनके सप्लायर्स को सूचित किया कि चीन द्वारा लगाए गए एक्सपोर्ट बैन के कारण अब वह चिप्स की सप्लाई की कोई गारंटी नहीं दे सकती।

कंपनी ने कहा कि उनके पास मौजूद स्टॉक केवल कुछ ही हफ्तों तक चलेगा, इसके बाद सप्लाई पूरी तरह रुक सकती है। नेक्सपीरिया ने बताया कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि वे अब ऑटोमोटिव सप्लाई चेन को चिप्स देना जारी नहीं रख सकते।

इस सूचना के बाद, 16 अक्टूबर 2025 को यूरोपीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACEA) ने एक आपात चेतावनी (distress note) जारी की। ACEA ने कहा कि नेक्सपीरिया की चिप्स के बिना ऑटो कंपनियों के सप्लायर्स जरूरी पार्ट्स और कंपोनेंट्स नहीं बना सकते, जिससे पूरे वाहन उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही बाजार में ऐसे ही चिप्स दूसरे सप्लायर्स से भी मिलते हैं, लेकिन नई कंपनियों को अप्रूव करने और उत्पादन बढ़ाने में कई महीने लग सकते हैं। इस बीच नेक्सपीरिया की चिप्स का स्टॉक खत्म हो जाएगा।

ACEA की डायरेक्टर जनरल सिग्रिड डी व्रीस ने चिंता जताते हुए कहा, “हम अचानक बहुत गंभीर स्थिति में आ गए हैं। अब हमें जल्द और व्यावहारिक समाधान चाहिए, वो भी उन सभी देशों से जो इसमें शामिल हैं।”

यूरोप की बड़ी कार कंपनियों ने भी स्थिति को लेकर सतर्कता दिखाई है। BMW ने कहा कि उसके सप्लायर नेटवर्क पर असर पड़ा है, लेकिन अभी उत्पादन रुका नहीं है। Volkswagen ने भी नेक्सपीरिया की चिप्स पर अपनी निर्भरता मानी और कहा कि वे स्थिति पर नजर रख रहे हैं।

Mercedes-Benz और Stellantis संभावित असर का आकलन कर रहे हैं और समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं, हालांकि हर कंपनी की स्थिति अलग-अलग है। Bosch जैसी बड़ी सप्लायर कंपनियाँ, जो नेक्सपीरिया की चिप्स इस्तेमाल करती हैं, अलर्ट मोड पर हैं।

इस संकट की गंभीरता को समझते हुए नीदरलैंड्स की सरकार ने अब संवाद का रास्ता अपनाने की बात कही है। आर्थिक मामलों के मंत्री विंसेंट कर्रेमन्स ने कहा कि वह चीन के साथ इस एक्सपोर्ट बैन पर समाधान निकालना चाहते हैं और उन्हें उम्मीद है कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी।

यह संकट अब सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी ऑटो इंडस्ट्री पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ऑटोमोटिव नवाचार के लिए गठबंधन, जो अमेरिकी ऑटो कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसने आगामी सप्लाई संकट की चेतावनी दी है। यह दिखाता है कि आज की दुनिया में सप्लाई चेन कितनी आपस में जुड़ी हुई है, एक देश की नीति का असर पूरी दुनिया की फैक्ट्रियों पर पड़ सकता है।

ट्रम्प के आदेश यूरोप में व्यवधान पैदा कर रहे हैं

हालांकि नेक्सपीरिया चिप संकट सीधे तौर पर डच और चीनी सरकारों की कार्रवाइयों से शुरू हुआ, लेकिन इसके पीछे की मुख्य वजह हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक व्यापार और विदेश नीतियाँ। ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और चीन के बीच चल रही टेक्नोलॉजी जंग और तेज हो गई है।

उनका प्रशासन चीन से डिकपलिंग (तकनीकी रूप से अलगाव) को प्राथमिकता दे रहा है। इसके तहत ट्रम्प सरकार ने चीन की कंपनियों को एन्टिटी लिस्ट में डालना शुरू किया और यूरोप और एशिया के सहयोगी देशों पर दबाव डाला कि वो सभी चीन से जुड़ी कंपनियों पर सख्त कदम उठाएँ।

अमेरिका ने दिसंबर 2024 में विंगटेक (नेक्सपीरिया की चीनी मूल कंपनी) को सुरक्षा कारणों से ब्लैकलिस्ट कर दिया। फिर सितंबर 2025 में नेक्सपीरिया को भी इसी लिस्ट में डाल दिया गया। अमेरिका ने नेक्सपीरिया के CEO Zhang Xuezheng को हटाने की माँग की, जिसे डच सरकार ने मान लिया और नेक्सपीरिया पर नियंत्रण ले लिया।

इस अमेरिकी दबाव ने यूरोप को बहुत मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। यूरोपीय देशों को अब अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते और चीन के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

डच सरकार ने नेक्सपीरिया पर नियंत्रण लेने का जो फैसला किया, वह भले ही देश के अंदर गवर्नेंस समस्याओं के आधार पर लिया गया हो, लेकिन यह फैसला अमेरिकी धमकियों और दबाव से ही तेजी से लागू हुआ।

इसके जवाब में चीन ने नेक्सपीरिया की चिप्स के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया, जिससे यूरोप में चिप्स की भारी कमी हो गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री को हो रहा है, जो पहले से ही टैरिफ, माँग में कमी और चीन की इलेक्ट्रिक कार कंपनियों से हो रही कड़ी प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। नेक्सपीरिया की चिप्स न मिलने से उत्पादन रुकने की नौबत आ गई है।

यह सिर्फ एक उदाहरण है कि कैसे ट्रम्प की एकतरफा नीतियाँ पूरी दुनिया के लिए व्यापारिक अस्थिरता  पैदा कर रही हैं। अमेरिका की चीन और रूस विरोधी नीतियों का सीधा खामियाजा उसके सहयोगी देशों, खासकर यूरोप को भुगतना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, ट्रम्प ने रूसी तेल और गैस की खरीद पर भी प्रतिबंध लगाने का दबाव डाला है, जिससे ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर यूरोप को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


केवल मंदिर में आरती नहीं, गाइडेड मेडिटेशन और मंत्रों की रील्स बनीं भक्ति का नया स्वरूप: कैसे भारत के Gen Z आध्यात्म को बना रहे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा?

भारत एक ऐसा देश है जिसकी आत्मा आध्यात्म में बसती है। यह परंपरा, दर्शन और भावनात्मक जुड़ाव से भरी हुई एक सांस्कृतिक विरासत है। लेकिन बदलते दौर में जहाँ तकनीक, ग्लोबल सोच और मानसिक दबावों का बोलबाला है, वहाँ एक नई पीढ़ी जनरेशन Z (1997 से 2012 के बीच जन्मी) आध्यात्म को नए अंदाज में अपना रही है।

इस पीढ़ी के लिए आध्यात्म अब सिर्फ पूजा-पाठ या कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक शांति, आत्म-खोज और व्यक्तिगत जुड़ाव का माध्यम बन चुका है। यह बदलाव नकारात्मक नहीं, बल्कि बेहद सकारात्मक और सशक्तिकरण से भरा हुआ है।

सोच में बदलाव: परंपरा से सवाल तक और जवाब अपने अंदाज में

जनरेशन Z वह पीढ़ी है जो इंटरनेट और सूचना की दुनिया में पली-बढ़ी है। पहले जहाँ धर्म को बिना सवाल किए स्वीकार किया जाता था, अब यह पीढ़ी पूछती है “क्यों?, क्या ये मेरे लिए प्रासंगिक है?” यह पीढ़ी आध्यात्म को एक निजी अनुभव मानती है, न कि सामाजिक या पारिवारिक जिम्मेदारी।

वे शास्त्रों को पढ़ते हैं, पर सरल भाषा में। वे भक्ति संगीत सुनते हैं, पर लो-फाई बीट्स के साथ। वे प्रार्थना करते हैं, पर उसकी परिभाषा बदल गई है, अब यह अभिव्यक्ति भी हो सकती है, प्रतिज्ञा भी।

उदाहरण के तौर पर, बनारस का 24 साल का देवेश सिंह, जो खुद को धार्मिक नहीं मानता, वो बताता है कि उसने मंदिर जाना तब शुरू किया जब वह मानसिक स्वास्थ्य के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था। आज भी वो नौकरी की तलाश में हैं पर आध्यात्म ने उसे आत्म-संवाद और शांति दी है।

आँकड़े कहते हैं: आध्यात्मिकता बढ़ रही है, धार्मिकता नहीं घट रही

भारत में जहाँ बाकी देशों की तुलना में धर्म से जुड़ाव कम हो रहा है, वहीं एक खास बात सामने आई है, भारत की युवा पीढ़ी आध्यात्म से जुड़ रही है, पर अपने ढंग और समझ से। एक YouGov-Mint सर्वे के अनुसार, 53% भारतीय Gen Z मानते हैं कि धर्म महत्वपूर्ण है और 62% नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं।

लेकिन यह प्रार्थना अब केवल मंदिर में आरती या हवन नहीं है, बल्कि कई बार यह Spotify पर 10 मिनट का गाइडेड मेडिटेशन होता है या इंस्टाग्राम पर मंत्रों की रील्स सुनना होता है।

यह ट्रेंड सिर्फ शहरी भारत में नहीं है। छोटे शहरों और गाँवों में भी यह बदलाव दिख रहा है। WhatsApp भक्ति ग्रुप्स, यूट्यूब प्रवचन और मेलों में युवाओं की भागीदारी ये सब बताते हैं कि यह बदलाव गहराई से हो रहा है, न कि सिर्फ सतही तौर पर।

आध्यात्म: अब मानसिक स्वास्थ्य का भी सहारा

मानसिक स्वास्थ्य आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। युवा पीढ़ी अकेलेपन, प्रतिस्पर्धा, करियर की अनिश्चितता और सामाजिक दबावों से जूझ रही है। इस संदर्भ में आध्यात्म सिर्फ एक विश्वास प्रणाली नहीं, बल्कि एक थेरेपी बन कर उभरी है।

काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट मानवी खुराना बताती हैं कि उनके Gen Z क्लाइंट्स कई बार ध्यान, मंत्र-जप, चंद्रमा पर जर्नलिंग, या टेरोट कार्ड जैसे अभ्यास करते हैं। ये सब उन्हें मानसिक स्पष्टता और आत्मबल देने में सहायक हैं।

डिजिटल आध्यात्म: इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ऐप्स बनें नए ‘मंदिर’

Gen Z की भाषा डिजिटल है और आध्यात्म भी उसी भाषा में ढल गया है। अब युवा पूरे वेद नहीं पढ़ते, लेकिन ‘Gita wisdom in 60 seconds’ जैसी रील्स देखते हैं। वे साधु-संतों के प्रवचन यूट्यूब पर सुनते हैं, Instagram Live पर सवाल पूछते हैं और मोबाइल ऐप्स से अपनी कुंडली देखते हैं।

2023 की OMTV रिपोर्ट के अनुसार, 80% भारतीय युवा (18–30 साल) नियमित रूप से आध्यात्मिक कंटेंट ऑनलाइन देखते हैं। ये कंटेंट छोटे, सरल और भावनात्मक रूप से जुड़ने वाले होते हैं, जो आज की तेज रफ्तार जिंदगी में फिट बैठते हैं।

आध्यात्मिक यात्राएँ: अब सेल्फ-डिस्कवरी का माध्यम

कभी तीर्थयात्राएँ बुज़ुर्गों का काम मानी जाती थीं, पर अब केदारनाथ, ऋषिकेश, वाराणसी, ईशा फाउंडेशन जैसे स्थानों पर युवाओं की भीड़ बढ़ रही है। 2024 में केदारनाथ यात्रा में 30% से ज्यादा यात्री 30 साल से कम उम्र के थे। ये लोग अकेले यात्रा करते हैं, अपने अनुभव शेयर करते हैं और उस यात्रा को अपनी आत्मिक खोज का हिस्सा मानते हैं।

कई सारे ट्रैवल इन्फ्लुएंसर बताते हैं कि वे धार्मिक वजहों से नहीं बल्कि आत्म-शांति और अनुभव के लिए जाती हैं। जो इस नए आध्यात्मिक ट्रेंड से प्रेरित हो रहे हैं।

नई भाषा, नई रस्में: आध्यात्म का Gen Z के अनुसार अनुवाद

Gen Z के लिए स्नान अब ऊर्जा शुद्धिकरण (energy cleansing) है, प्रार्थना अब manifestation और ध्यान अब mindfulness बन चुका है। वे क्रिस्टल चार्ज करते हैं, चक्र बैलेंसिंग म्यूजिक सुनते हैं और मंदिर में घंटों बैठने के बजाय 10 मिनट का निर्देशित ध्यान (guided meditation) करते हैं।

हमारी पीढ़ी के लोग आध्यात्म को एक जीवनशैली की तरह अपनाते हैं, टैटू में ओम बनवाना, ध्यान के लिए जगह बनाना या vision boards में धार्मिक प्रतीक जोड़ना, ये सब दर्शाते हैं कि परंपरा और आधुनिकता एक साथ चल सकती है।

भारत सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में धार्मिक स्थलों को पुनः विकसित करने में सक्रिय है। राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक जैसे प्रोजेक्ट्स आध्यात्म को संरचनात्मक रूप से मज़बूत कर रहे हैं। सरकारों द्वारा आयोजित ‘स्पिरिचुअल सर्किट टूरिज्म’ ने आध्यात्मिकता को एक युवा अनुकूल अनुभव बना दिया है।

उद्यमिता और आध्यात्म: एक नया मेल के साथ LGBTQIA+ के लिए नई राह

Gen Z केवल आध्यात्म को जी नहीं रही, बल्कि उसे व्यवसाय में भी बदल रही है। चाहे वह Daily Dharma कार्ड्स हों, ध्यान आधारित जर्नल्स, या धार्मिक प्रतीकों की मॉडर्न मर्चेंडाइज, ये सब आध्यात्म को और भी सहज और आकर्षक बना रहे हैं।

परंपरागत धर्मों ने अक्सर LGBTQIA+ समुदाय को हाशिए पर रखा, लेकिन अब Gen Z के क्वीर युवा आध्यात्म में अपने लिए जगह बना रहे हैं। अर्धनारीश्वर, कृष्ण का प्रेम और भारतीय दर्शन की लचीलापन इन सब को वे अपने अनुभव के रूप में देख रहे हैं। इंस्टाग्राम पर समावेशी भक्ति पेज, कविताएँ और आर्टवर्क इस बात की पुष्टि करते हैं।

Gen Z का आध्यात्मिक पुनर्जागरण

Gen Z आज भगवान की आरती में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति में विश्वास करती है। वो मंदिर में कम समय बिताते हैं, लेकिन खुद से जुड़ने में ज्यादा समय देते हैं। यह आध्यात्म अब व्यक्तिगत है, डिजिटल है और सबसे बड़ी बात प्रासंगिक है।

‘कान में हेडफोन, दिल में प्रार्थना’ – यही है आज की आध्यात्मिक पीढ़ी की पहचान। यह बदलाव केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक गहरी और स्थायी प्रक्रिया है। भारत की युवा पीढ़ी आध्यात्म को न केवल जीवित रख रही है, बल्कि उसे अपना स्वरूप देकर आगे बढ़ा रही है। शांत और बेहद सुंदर रूप में।

जिन शरद यादव ने लालू को बनवाया CM, अपनी पार्टी का RJD में कर दिया विलय उनके बेटे संग ही तेजस्वी ने कर दिया धोखा: ‘हिंदू विरोधी’ चंद्रशेखर को मधेपुरा से दिया टिकट

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले टिकटों के लिए खूब मारा-मारी मची है। मधेपुरा विधानसभा सीट से राजद से दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव के बेटे शांतनु यादव को टिकट मिलने की चर्चा थी लेकिन पार्टी ने पूर्व मंत्री प्रो. चंद्रशेखर को आखिरी वक्त में अपना उम्मीदवार बना दिया। प्रो. चंद्रशेखर वही नेता हैं जो अपने हिंदू विरोधी बयानों के लिए कुख्यात हैं और रामचरित मानस को ‘नफरती ग्रंथ’ तक बता चुके हैं।

इसके बाद राजद में अपनी पार्टी का विलय करने वाले शरद यादव के बेटे शांतनु यादव ने तेजस्वी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कॉन्ग्रेस की नेता और शांतनु यादव की बहन सुभाषिनी यादव भी अपने भाई के पक्ष में आ गईं और तेजस्वी यादव को आड़े हाथों लिया।

शांतनु यादव और सुभाषिनी यादव ने क्या कहा?

बीते 13 अक्टूबर को शांतनु यादव ने तेजस्वी यादव के ‘बीजेपी से लड़ने’ के एक X पोस्ट पर जवाब देते हुए कहा था, “हम लड़ेंगे और जीतेंगे। ✊?” लेकिन शनिवार (17 अक्टूबर) आते-आते यह स्थिति बदल गई।

शांतनु यादव ने शनिवार सुबह X पर तेजस्वी यादव के साथ अपनी और अपने पिता शरद यादव की एक तस्वीर साझा की। इसके साथ शांतनु ने लिखा, “मेरे खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र हुआ। समाजवाद की हार हुई।”

शांतनु यादव के इस पोस्ट के बाद उनकी बहन सुभाषिनी यादव भी उनके समर्थन में आ गईं। सुभाषिनी यादव ने X पर लिखा, “जो अपने खून के नहीं हुए, वो दूसरों के क्या सगे होंगे। जो अपने ही परिवार के वफादार नहीं, वो किसी और के लिए कैसे भरोसेमंद हो सकते हैं? ये विश्वासघात की पराकाष्ठा और उनकी असहजता का उत्कृष्ट उदाहरण है। जो षड्यंत्र इन्होंने रचा है, अब वही षड्यंत्र इनके खिलाफ जनता रचेगी।”

टिकट देने का वादा कर मुकर गए लालू-तेजस्वी: शांतनु ने सुनाया किस्सा

इसके बाद शांतनु यादव ने शनिवार (18 अक्टूबर) को X पर एक वीडियो पोस्ट किया। उन्होंने X पर वीडियो के साथ लिखा, “राजनीति में हम झाल बजाने नहीं आए हैं मुझे भी अपने पिता का नाम और उनकी विरासत को आगे बढ़ाना है। मेरा विरोध सिर्फ आवाज उठाना नहीं, बल्कि जिंदा होने और अपने हक के लिए डटे रहने का सबूत है।”

इस वीडियो में शांतनु ने बताया है कि किस तरह उनके पिता उन्हें मधेपुरा से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। शांतनु ने कहा, “मेरे पिता ने अस्वस्थ होने पर इच्छा जताई थी कि शांतनु मेरी विरासत को आगे बढ़ाएँगे। उनका पहला कदम अपनी पार्टी (लोकतांत्रिक जनता दल) को आरजेडी में विलय करना था।”

शांतनु बताते हैं कि पिता के निधन के बाद वह आश्वस्त थे कि वह आरजेडी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे और उन्होंने इसके लिए पूरी तैयारी भी कर ली थी। उन्होंने कहा, “लोकसभा चुनाव से पहले लालू यादव जी और तेजस्वी यादव जी बोले कि शांतनु लोकसभा की नहीं, आप विधानसभा चुनाव की तैयारी करिए। मैंने सोचा कि वो हमारे अभिभावक है और वो कह रहे हैं तो हम विधानसभा चुनाव की तैयारी करते हैं।”

हालाँकि, शांतनु नहीं चाहते थे कि वह विधानसभा चुनाव लड़ें लेकिन लोगों के कहने पर वह इसके लिए भी तैयार हो गए थे। उन्होंने कहा, “हम गए लेकिन आखिरी में हमारी जगह किसी और को टिकट दे दिया।” उन्होंने आगे कह, “राजनीति में हम झाल बजाने नहीं आए हैं हमें भी अपने पिताजी का नाम आगे बढ़ाना है।” शांतनु का कहना है कि वह लोगों के साथ बैठेंगे और आगे का फैसला करेंगे।

आखिरी वक्त तक शांतनु को भरोसा देते रहे तेजस्वी

पत्रकार अजय झा ने 17 अक्टूबर को एक X पोस्ट में दावा किया है कि तेजस्वी यादव आखिरी वक्त तक शांतनु यादव को टिकट मिलने का भरोसा दे रहे थे। अजय झा ने लिखा है, “स्वर्गीय शरद यादव ने अपनी पार्टी का विलय राजद में किया था। उस वक्त ये सहमति बनी थी कि उनके बेटे शांतनु यादव को राजद मधेपुरा से लोकसभा का टिकट देगी। लेकिन टिकट नहीं दिया गया। इस बीच शरद यादव का निधन हो गया।”

झा ने आगे लिखा, “अब विधानसभा चुनाव में एक बार फिर तेजस्वी यादव ने शांतनु को मधेपुरा सीट से विधानसभा चुनाव की तैयारी करने को कहा। दो दिन पहले फोन करके पेपर तैयार करने को भी कहा गया।”

उन्होंने आगे कहा, “यहाँ तक कि कल (16 अक्टूबर) आकर सिंबल लेकर जाने को कहा गया। लेकिन आखिरी वक्त में फिर से राजद ने सिटिंग विधायक को दे दिया। शांतनु ने इसके बाद तेजस्वी से मुलाकात कर साफ कर दिया कि इस विश्वासघात वो अब उनके साथ नहीं रह सकते हैं।”

जब शरद यादव ने लालू यादव को दिलाई थी बिहार CM की कुर्सी

यूँ तो शरद यादव मध्य प्रदेश में जन्मे थे लेकिन उनकी राजनीति की धाक उत्तर प्रदेश और बिहार तक थी। जय प्रकाश नारायण ने छात्र आंदोलन के बाद जिस उम्मीदवार को हलधर किसान के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़वाया वो शरद यादव ही थे। इसके बाद वे 1989 में बदायूँ से लोकसभा पहुँचे और बिहार के मधेपुरा से भी 4 बार लोकसभा सांसद रहे।

मार्च 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए और कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। जनता दल के विधायक दल का नेता चुनने की बारी आई तो सबको लगा कि रामसुंदर दास मुख्यमंत्री होंगे क्योंकि वे प्रधानमंत्री वीपी सिंह और जॉर्ज फर्नांडीस की पहली पसंद थे। इस बीच लालू यादव के नाम की चर्चा चलने लगी क्योंकि वे देवीलाल, शरद यादव और नीतीश कुमार की पसंद थे।

जब जनता दल विधायक दल का नेता सर्वसम्मति से चुनने की कोशिश की गई, तो शरद यादव विधायकों से वोटिंग के जरिए नेता चुनने पर अड़े गए। उन्हें सीधे मुकाबले में दास की जीत का अंदाजा था। वहाँ वोटिंग हुई और शरद यादव की सेट की गई फील्डिंग की बदौलत लालू यादव जीत गए। इसके बाद भी लालू यादव को शपथ ग्रहण का न्योता नहीं मिल रहा था तो उन्होंने खुद यह सुनिश्चित किया कि लालू को ना केवल न्यौता मिले बल्कि उनका भव्य शपथ ग्रहण समारोह भी हो।

बाद में उनके लालू यादव से मतभेद भी हुए। शरद यादव JDU में चले गए, फिर अपनी पार्टी भी बनाई और अंत में मार्च 2022 में अपनी पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल (LJD) का विलय राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में कर दिया। उन्होंने तब कहा था, “हमारी पार्टी का आरजेडी में विलय विपक्षी एकता की दिशा में पहला कदम है। देशभर में बीजेपी को हराने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट होना बहुत जरूरी है।”

लालू यादव खुद उनका यह एहसान मानते रहे और जब शरद यादव का निधन हुआ तो उन्होंने उन्हें बड़ा भाई बताते हुए कहा कि उनसे मतभेद तो हुए लेकिन कभी मनभेद नहीं हुए थे।

‘हिंदू विरोधी’ चंद्रशेखर को आरजेडी ने दिया टिकट

आरजेडी ने जिन पूर्व मंत्री चंद्रशेखर को टिकट दिया है उनका ‘हिंदू विरोधी’ बयानों को इतिहास रहा है। वो रामचरितमानस को ‘नफरत फैलान वाला ग्रंथ’ और ‘पोटेशियम साइनाइड’ तक बता चुके हैं।

जनवरी 2023 में ‘नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी’ के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने रामचरितमानस के एक दोहे “अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए” का जिक्र करते हुए कहा था कि यह समाज में नफरत फैलानेवाला ग्रंथ है। उन्होंने इस कार्यक्रम से बाहर आकर कहा कि किसी जमाने में मनुस्मृति ने समाज में नफरत का बीज बोया, उसके बाद रामचरितमानस ने समाज में नफरत पैदा की।

यही शिक्षा मंत्री जो रामचरितमानस पर सवाल उठाते थे वे इस्लाम को ही मोहब्बत का पैगाम देने वाला मजहब मानते हैं। इतना ही नहीं सितंबर 2023 में तो उन्होंने इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद को मर्यादा पुरुषोत्तम बता दिया था। उन्होंने जन्माष्टमी पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था, “जब शैतानियत बढ़ गई दुनिया में, ईमान खत्म हो गया, बेईमान और शैतान ज्यादा हो गए तो मध्य एशिया के इलाके में ईश्वर ने, प्रभु ने, परमात्मा ने मर्यादा पुरुषोत्तम प्रोफेट मुहम्मद साहब को पैदा किया।”

2023 के सितंबर में ही उन्होंने रामचरितमानस में जहरीला रसायन पोटेशियम साइनाइड होने का दावा कर दिया था। इतना ही नहीं वे रामचरितमानस का खुलकर विरोध करते हैं और अब आरजेडी ने उन्हें उनके काम का ईनाम देते हुए शरद यादव के बेटे से वादाखिलाफी कर उन्हें टिकट दे दिया है।

ये कोई अदीना मस्जिद नहीं, हिंदुओं का आदिनाथ मंदिर है: TMC सांसद युसूफ पठान इस्लामी आक्रांताओं का कर रहे थे बखान, नेटीजन्स ने दिखाया आईना

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान ने 16 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की ऐतिहासिक अदीना मस्जिद की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पर साझा कीं।

यूसुफ पठान ने मस्जिद की तारीफ करते हुए लिखा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर है, जिसे 14वीं सदी में इलियास शाही वंश के दूसरे शासक सुलतान सिकंदर शाह ने बनवाया था। यह मस्जिद 1373 से 1375 ईस्वी के बीच बनाई गई थी और उस समय यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी। यह उस दौर की शानदार वास्तुकला को दर्शाती है।

जैसे ही TMC सांसद यूसुफ पठान ने अदीना मस्जिद की पोस्ट साझा की, कुछ लोगों ने इसका फैक्टचेक करना शुरू कर दिया और इसके हिंदू इतिहास की बात सामने रखी।

अधिवक्ता शेखर कुमार झा ने मस्जिद की दीवार पर खुदे हुए भगवान गणेश की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “ऐतिहासिक: आदिनाथ मंदिर बना अदीना मस्जिद।”

एक्स यूजर ‘PlanH’ ने यूसुफ पठान की पोस्ट का जवाब देते हुए लिखा: “प्रिय यूसुफ पठान, आप जिस जगह खड़े हैं वह कभी भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर का परिसर था, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने तोड़कर कब्जा कर लिया था।

यूजर ने कुछ तस्वीरें भी लगाई और कहा, “अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को सुधारा जाए और मंदिर की खोई हुई गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।”

‘अब्दुल किताबी’ नामक एक यूजर ने अदीना मस्जिद परिसर में पाए गए हिंदू मूर्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए यूसुफ पठान को टैग कर जवाब दिया:

“प्रिय यूसुफ पठान (@iamyusufpathan), आप जिस जगह खड़े हैं, वह कभी भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर का परिसर था, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने तोड़कर मस्जिद में बदल दिया था।”

उन्होंने आगे लिखा, “मैंने कुछ तस्वीरें संलग्न की हैं जो इस बात का प्रमाण हैं। अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को सुधारा जाए और मंदिर की खोई हुई गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए। एक सच्चे मुसलमान के तौर पर हमें यह मस्जिद हिंदुओं को लौटा देनी चाहिए।”

एक अन्य ने लिखा, “आदिनाथ मंदिर अब अदीना मस्जिद है! हमारी धर्मनिरपेक्षता की खूबसूरती!”

एक एक्स यूजर ने पूछा, “क्या आप लोगों ने अपना कुछ बनाया है, या दूसरों के धार्मिक स्थलों को तोड़कर सब कुछ अपने कब्जे में ले लिया है और उसे अपना बता दिया है?”

अदीना या आदिनाथ, मस्जिद में बदला गया एक और हिंदू मंदिर

अदीना मस्जिद पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के ऐतिहासिक शहर पांडुआ में स्थित है। पारंपरिक इतिहासकारों के अनुसार, इस मस्जिद का निर्माण बंगाल सल्तनत के इलियास शाही वंश के सुलतान सिकंदर शाह ने 1373 में शुरू कराया था और 1375 में पूरा हुआ। उस समय यह मस्जिद पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी और इसे दिल्ली सल्तनत पर शाह की सैन्य जीत का प्रतीक माना गया।

हालाँकि, ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि इस मस्जिद का निर्माण पहले से मौजूद हिंदू धार्मिक संरचनाओं को तोड़कर उनके पत्थरों और सामग्री से किया गया था। ये मंदिर पाल–सेन काल (8वीं से 12वीं सदी) के थे।

मूर्ति और मूर्तिकला से जुड़े अवशेषों से यह भी संकेत मिलता है कि जहाँ आज अदीना मस्जिद खड़ी है, वहाँ पहले भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर था, जिसे आदिनाथ मंदिर कहा जाता था।

आदिनाथ शिव का एक प्राचीन रूप है। इस मंदिर परिसर में भगवान विष्णु का एक मंदिर भी था। इतिहासकारों का यह भी मानना है कि आज अदीना मस्जिद के भीतर जो मिंबर है, वह किसी पुराने मंदिर के काले पत्थर से बने दरवाजे को तोड़कर बनाया गया था।

अदीना मस्जिद की दीवारों, दरवाजों, मेहराबों और नमाज़ के स्थानों पर टेराकोटा और पत्थर की नक्काशी देखने को मिलती है, जिनमें भगवान शिव और गणेश जैसे हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं।

इसके अलावा, वहाँ फूलों की आकृति, चैत्य मेहराबें, कीर्तिमुख (मुखाकृति वाला मुखौटा), मोतियों की माला, और घुँघरू व घँटियों की जंजीर जैसी कलाकृतियाँ भी मौजूद हैं। ऐसी सजावट इस्लामी वास्तुकला में नहीं पाई जाती, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि ये सभी नक्काशियाँ और कलात्मक चिन्ह पाला–सेन काल (8वीं–12वीं सदी) के हिंदू स्थापत्य कला से संबंधित हैं।

अदीना मस्जिद के केंद्रीय मिहराब (नमाज पढ़ने की दिशा दर्शाने वाला हिस्सा) में इसके हिंदू इतिहास के साफ संकेत मिलते हैं। यह मिहराब एक घुमावदार दीवार में बना है और इसके सामने की मेहराब त्रि-पत्रीय (तीन खंडों वाली) डिजाइन में है। मेहराब के दोनों ओर के हिस्सों (स्पैंड्रल) को फूलों की आकृतियों (रोसेट्स) से सजाया गया है।

मिहराब के अंदर के पैनलों में भी त्रि-पत्रीय मेहराबों और रोसेट डिजाइनों की नक्काशी है, जिनके ऊपर से घंटियों और जंजीरों के लटकते हुए डिजाइन दिखाई देते हैं। ऐसे सजावटी डिजाइन खासतौर पर हिंदू स्थापत्य कला में पाए जाते हैं, और इन्हें आमतौर पर मंदिरों के खंभों पर उकेरा जाता था, खासकर पाला–सेन काल में।

अदीना मस्जिद के परिसर और उसकी दीवारों में आज भी टूटा हुआ शिवलिंग और कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। आसपास की संरचनाओं जैसे पांडुआ पुल में भी हिंदू मंदिरों के खंडहरों से लिए गए पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। यह इस पूरे क्षेत्र में इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर मंदिरों के विध्वंस को दर्शाता है।

पूर्व क्रिकेटर और TMC सांसद यूसुफ पठान ने इस मस्जिद को इस्लामी वास्तुकला की मिसाल बताते हुए एक ऐतिहासिक गौरव के रूप में पेश किया और सुल्तान सिकंदर शाह को भारतीय मुस्लिम शासक के तौर पर याद रखने की बात कही। जबकि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो सिकंदर शाह की राजनीतिक और धार्मिक सोच भारत नहीं बल्कि अरब और इराक (कटेसिफन) से प्रेरित थी।

यह मस्जिद 14वीं शताब्दी में सिकंदर शाह ने एक भव्य हिंदू मंदिर को तोड़कर बनवाई थी, जिसे पहले आदिनाथ मंदिर कहा जाता था। इसके बाद, 19वीं सदी में आए भूकंपों के चलते यह स्थल उजाड़ हो गया। वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के तहत राष्ट्रीय महत्त्व का संरक्षित स्मारक है, जिससे यहाँ खुदाई या पूजा-पाठ पर रोक लगी हुई है।

यह मुद्दा पहले भी बीजेपी द्वारा उठाया गया था और 2024 में फिर चर्चा में आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरी शंकर जैन ने हिंदुओं से आह्वान किया कि वे अदीना मस्जिद में जाकर पूजा शुरू करें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस संबंध में पत्र भी लिखा।

फरवरी 2024 में, हिरण्मय गोस्वामी नाम के एक युवा पुजारी ने कुछ हिंदू अनुयायियों के साथ अदीना मस्जिद परिसर में शिवलिंग के पास पूजा और मंत्रोच्चार शुरू किया। हालांकि, बाद में पुलिस ने उन्हें पूजा जारी रखने से रोक दिया।

इतिहास में मध्यकालीन इस्लामी आक्रमणों के दौरान हजारों हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया। आज जो कई ऐतिहासिक मस्जिदें मानी जाती हैं, वे वास्तव में उन्हीं मंदिरों के खंडहरों पर बनी हैं या उन्हीं मंदिरों को ढाँचे में थोड़ा बदलाव कर मस्जिद में बदल दिया गया है। अयोध्या का बाबरी ढाँचा, मथुरा की शाही ईदगाह, और काशी की ज्ञानवापी मस्जिद ये सभी ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं जहाँ मंदिरों को कब्जा करके मस्जिदें बनाई गईं।

इस प्रक्रिया की कानूनी रुकावट है 1991 का पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act), जो 15 अगस्त 1947 के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव की इजाज़त नहीं देता। यह कानून मंदिर पुनःस्थापन की कोशिशों में बड़ी बाधा बना हुआ है। हालाँकि अयोध्या में राम जन्मभूमि की सफल पुनर्प्राप्ति ने हिंदू समाज को नया उत्साह और आशा दी है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

बिहार में ‘महागठबंधन’ में मची सिर फुटव्वल, एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार रहे RJD-कॉन्ग्रेस-वामपंथी-VIP: तेजस्वी यादव के सहारे खोई सियासी जमीन की तलाश में राहुल गाँधी

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन की समय सीमा शनिवार (17 अक्टूबर 2025) को खत्म हो गई है लेकिन अब तक विपक्षी गठबंधन के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला ही तय नहीं हो पाया है। NDA से लड़ाई की तैयारी के बीच महागठबंधन के दल आपस में ही भिड़े हुए हैं और कई सीटों पर तो राजद और कॉन्ग्रेस ने एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी उतार दिए हैं।

इस कथित महागठबंधन की मौजूदा स्थिति दिखाती है कि इनकी चुनाव लड़ने की ही कोई साझा रणनीति या विचारधारा नहीं है। इस गठबंधन में केवल सत्ता की लालसा के लिए एकजुटता दिखने की कोशिश की जा रही है। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े चेहरे राहुल गाँधी बिहार चुनाव के बीच विदेश में छुट्टियाँ मना रहे थे और जब लौटे तब भी उन्होंने सीट बँटवारे के लिए तेजस्वी के साथ बैठक नहीं की है।

तेजस्वी यादव सीट बँटवारे की समस्या के समाधान के लिए दिल्ली तक आए भी लेकिन उनकी राहुल गाँधी के साथ बैठक नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उन्हें पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलकर इस समस्या का समाधान खोजने की सलाह दी है लेकिन इससे भी कोई बात नहीं बनी है। अब भी यह रार लगातार जारी है और बढ़ती ही जा रही है।

RJD के सहारे बिहार में सियासी पैर जमाने की कोशिश में कॉन्ग्रेस

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कॉन्ग्रेस किसी भी हाल में अपनी पसंद की सीटों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। पार्टी करीब 60 सीटों पर दावेदारी कर रही है और इनमें कई ऐसी सीटें हैं जिन पर राजद की नजर भी है।

राजद, कॉन्ग्रेस को लगभग 60–61 सीटें देने को तैयार तो है लेकिन असली विवाद इस बात पर अटका है कि कौन-सी सीटें किसके खाते में जाएँगी। यानी यहाँ मामला सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि सियासी जमीन के कब्जे का है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के अलावा वामपंथी दल और मुकेश सहनी की वीआईपी भी शामिल हैं लेकिन असली मुकाबला फिलहाल दो बड़े दलों के बीच है। कॉन्ग्रेस सीमांचल और दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों पर अपना दावा ठोक रही है।

पार्टी का मानना है कि इन इलाकों में उसका सामाजिक आधार मजबूत है जबकि राजद इस बात से भली-भाँति वाकिफ है कि अगर उसने इन क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस को मौका दिया, तो भविष्य में इन इलाकों में उसकी पकड़ ढीली पड़ सकती है। कॉन्ग्रेस, राजद के कँधे पर चढ़कर अपने दशकों पुराने जनाधार को फिर से वापस पाने के जुगाड़ में लगी है।

हालाँकि, इसमें यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार में कॉन्ग्रेस का अपना आधार राजद के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है फिर भी वो राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी ताकत को भुनाने की कोशिश में है। कॉन्ग्रेस का यह भी दावा है कि राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से चुनाव का माहौल महागठबंधन के पक्ष में हो गया है और वे अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं।

एक-दूसरे पर शायराना वार कर रहे RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में सीट बँटवारे की खींचतान में ‘शायरी वार’ भी देखने को मिल रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने अपनी नोकझोंक को अब कविताओं के जरिए बयाँ करना शुरू कर दिया है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने X पर गठबंधन के बीच रार को लेकर लिखा, “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय…”। उन्होंने इसे ‘हर अवसर के लिए प्रासंगिक’ बताया है।

कुछ ही समय में कॉन्ग्रेस का भी इस पर जवाब आ गया। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने इस पर तंज करते हुए लिखा, “पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है, अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है।”

आधा दर्जन से अधिक सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ महागठबंधन के प्रत्याशी

बिहार विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे को सीधी चुनौती दे रहे हैं। कहलगाँव में राजद के रजनीश यादव और कॉन्ग्रेस के प्रवीण कुशवाहा आमने-सामने हैं जबकि तारापुर में राजद के अरुण शाह का मुकाबला वीआईपी के सकलदेव सिंह से है।

बछवाड़ा, बिहारशरीफ, रोसड़ा और राजपाकर सीटों पर कॉन्ग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवारों के बीच सीधी है। बछवाड़ा से कॉन्ग्रेस के प्रकाश दास और सीपीआई के अवधेश राय, बिहारशरीफ से कॉन्ग्रेस के उमैर खान और सीपीआई के शिव प्रसाद यादव, रोसड़ा से कॉन्ग्रेस के बीके रवि और सीपीआई के लक्ष्मण पासवान जबकि राजपाकर से कॉन्ग्रेस की प्रतिमा कुमारी और सीपीआई के मोहित पासवान मैदान में हैं।

वहीं, वैशाली सीट पर राजद के अजय कुशवाहा और कॉन्ग्रेस के ई. संजीव सिंह के बीच टक्कर है। सबसे चर्चित लालगंज सीट पर राजद ने बाहुबली नेता मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला को मैदान में उतारा है तो कॉन्ग्रेस से आदित्य कुमार राजा ने मोर्चा सँभाल लिया है।

बीबीसी ने राजद की एक पूर्व प्रवक्ता के हवाल से बताया है कि राजद और कॉन्ग्रेस की कई सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ होगी। इस प्रवक्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा है, “लगभग छह से सात ऐसी सीटें ऐसी हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस और राजद आमने-सामने हो सकते हैं।”

अविश्वास से भरी आगे की राह

यह भी स्पष्ट है कि राजद और कॉन्ग्रेस दोनों एक-दूसरे पर दबाव की राजनीति का खेल खेल रहे हैं। एक दल खुद को राष्ट्रीय स्तर की ताकत बताकर झुकने को तैयार नहीं, तो दूसरा दल अपने क्षेत्रीय प्रभाव की ताकत को आजमा रहा है। यही कारण है कि कई सीटों पर दोनों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर चुके हैं।

अगर देखा जाए तो यह केवल ‘सीट शेयरिंग’ का विवाद नहीं रहा बल्कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या महागठबंधन अब भी किसी साझा लड़ाई के लायक बचा है या फिर यह सिर्फ नाममात्र का गठबंधन है, जो इस चुनावी दौर में सत्ता की लालसा तक ही सीमित रह गया है।

इसके अलावा यह स्थिति बिहार की राजनीति में विपक्ष के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता यह देख रही है कि जो दल अपने भीतर तालमेल नहीं बना पा रहे, वे राज्य को स्थिर नेतृत्व कैसे देंगे? महागठबंधन लोगों के लिए अविश्वास के प्रतीक की तरह बन गए है। जहाँ साथी दल ही एक-दूसरे की जड़ों के मट्ठा डालने में लगे हुए हैं।