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‘बस 30 दिन का पानी बचा है’: EU की मीटिंग में जाकर पाकिस्तान ने रोया सिंधु जल समझौते का दुखड़ा, जानें सिडनी के IEP रिपोर्ट में PAK के जल संकट और समझौते पर क्या हैं दावे?

पाकिस्तान ने हाल ही में यूरोपियन यूनियन (EU) की मीटिंग में सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) को लेकर अपना दुखड़ा सुनाया है। पाकिस्तान का दावा है कि उनके पास सिर्फ 30 दिनों का पानी बचा है। पाकिस्तान इसका जिम्मेदार भारत को कह रहा है।

पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि की गोलबंदी और भारत के पानी रोकने के कारण पाक में जल संकट की स्थितियाँ बनी हैं। इस मुद्दे को लेकर 2025 की IEP (इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट) में भी चेतावनी दी गई है।

इसमें लिखा गया है कि पाकिस्तान की कृषि प्रणाली लगभग 80% सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर है और वर्तमान में ये गंभीर जल संकट के खतरे में है। इस पूरे मुद्दे को भारत-पाकिस्तान के इतिहास, सिंधु जल संधि के प्रावधानों और हालिया विवादों के साथ समझे जाने की जरूरत है।

IEP की 2025 की रिपोर्ट में क्या हैं प्रमुख दावे

ऑस्ट्रेलिया के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकनॉमिक्स एंड पीस (IEP) द्वारा जारी ‘इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट 2025’ में कहा गया कि सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र गंभीर जल संकट के खतरे का सामना कर रहा है। इसके अनुसार, भारत के बाँध प्रबंधन में मामूली बदलाव भी पाकिस्तान के लिए गंभीर नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो सकता है।

रिपोर्ट में जल संकट को व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक खतरा बताया गया है जो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। पानी की कमी के कारण सिंधु बेसिन में खाद्य उत्पादन, रोजगार, और आर्थिक गतिविधियां गहरे संकट में आ सकती हैं। रिपोर्ट ने भारत और पाकिस्तान दोनों को बेहतर संवाद और जल प्रबंधन पर ध्यान देने की सलाह दी है।

भारत के जल प्रबंधन की रणनीति और जियोपॉलिटिकल विवाद

भारत ने अपनी जल संरचनाओं में इजाफा किया है। इसमें ब्यास नदी को गंगा से और सिंधु को यमुना से जोड़ने वाली नई नहर परियोजनाएँ, जल संचयन सुविधाओं का विकास और सिंधु बेसिन के जल अधिकारों पर रणनीतिक नियंत्रण शामिल है।

भारत का तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती कृषि माँग के मद्देनजर जल की अपनी जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। भारत ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों की दोबारा समीक्षा करने की माँग की है।

इस समीक्षा में जल संसाधनों के न्यायसंगत और संतुलित उपयोग (Equitable and Reasonable Utilization – ERU) और किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने (No-Harm Rule) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत शामिल हो सकते हैं। भारत ने जल सुरक्षा के पहलुओं को भी प्रमुखता दी है और यह भी कहा है कि उसकी परियोजनाएँ संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं।

पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संकट के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांत को देश का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है। ये दोनों सिंधु नदी जल पर काफी निर्भर हैं। जल संकट के कारण खेत सूखाग्रस्त हो रहे हैं, फसलों का उत्पादन गिर रहा है, और खाद्य सुरक्षा संकट गहरा रहा है।

कपास, गेहूं, चावल जैसी प्रमुख फसलों की उपज में भारी कमी आ रही है, जो पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकती है। इसके साथ ही, जल संकट से ग्रामीण रोजगार में कमी, खाद्य कीमतों में वृद्धि और सामाजिक उथल-पुथल की आशंका भी बढ़ रही है।

जल संकट को कभी-कभी ‘जल आतंकवाद’ के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें जल संसाधन के नियंत्रण को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

क्या था भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का इतिहास

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी एक संधि है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी से निकलने वाले जल का बँटवारा सुनिश्चित करती है।

सिंधु नदी में तीन पश्चिमी नदियाँ सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को आवंटित की गईं जबकि तीन पूर्वी नदियाँ रावी, बीस और सतलज भारत के पाले में आई। संधि के अनुसार, भारत के पास पश्चिमी नदियों के जल पर नियंत्रण करने का अधिकार नहीं था, लेकिन भारत अपने बांध और जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए पूर्वी नदियों के जल का उपयोग कर सकता था।

इस समझौते में यह भी प्रावधान था कि भारत पाकिस्तान के जल आपूर्ति को बिना प्रभावित किए पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग सीमित मात्रा में कर सकता है। विश्व बैंक ने संधि की निगरानी और विवाद समाधान में सहायता की जिम्मेदारी भी ली थी।

सिंधु जल संधि इसलिए ऐतिहासिक रूप से भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांत जल विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण समझी जाती रही है। हालाँकि 2023 से 2025 के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और खासकर 26 अप्रैल 2025 पहलगाम आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया।

इससे पाकिस्तान में जल संकट बढ़ गया। पाकिस्तान की इंडस रिवर सिस्टम अथॉरिटी (IRSA) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिंधु नदी बेसिन से मिले पानी की मात्रा में हर वर्ष औसतन 13.3% की कमी आ रही है। इसके कारण पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में काफी परेशानी हो रही है।

सिंधु नदी की दो प्रमुख जलाशयों तरबेला और मंगला का जलस्तर डेड स्टोरेज लेवल पर पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि पानी की आपूर्ति लगभग खत्म होने वाली है। इस कमी के कारण कपास की खेती समेत कई अहम फसलों की उपज में गिरावट देखने को मिली है।

पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को दोबारा स्थापित करने और पानी बँटवारे में अपने ‘न्याय’ के लिए विश्व बैंक से फिर से मध्यस्थता की माँग की, मगर विश्व बैंक ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ अपना रोना रोया। उसने दावा किया कि जल संकट की वजह से पाकिस्तान की किसानी और जीविका पर भारी असर पड़ा है। साथ ही, पाकिस्तान की ओर से इस संकट को ‘जल संकट आपातकाल’ कहा जा रहा है।

संधि का वर्तमान स्वरूप और विवाद के क्या हैं समाधान

सिंधु जल संधि विश्व में जल विवादों के लिए एक ऐसा उदाहरण रही है जिसे दोनों देशों ने विवाद के समाधान के लिए अपनाया था। हालाँकि, वर्तमान स्थिति में यह संधि संकट में है।

दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिक तनाव के कारण संधि के पालन और वाटर शेयरिंग पर असहमति गहरी हो गई है। विश्व बैंक की मध्यस्थता और तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति के बावजूद विवाद नहीं सुलझ पाया है।

जल संकट को लेकर भारत और पाकिस्तान के संवाद के बिना समाधान की राहें अभी दूर हैं। जल अधिकारों पर नए नियम, जल उपयोग के तकनीकी सुधार और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के नए ढाँचे की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए दोनों को संयुक्त प्रयास, संघर्ष कम करना, और परस्पर भरोसा स्थापित करना होगा।

सिंधु जल संधि का संघर्ष और जल संकट क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जल संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील मामला है। पाकिस्तान EU समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी दिक्कतों को रखकर गम्भीर संकट की स्थिति दिखलाने और उशका पीड़ित बनने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, भारत जल संसाधन प्रबंधन और राष्ट्रीय हितों के तहत अपनी रणनीति को मजबूती दे रहा है। इस जटिल विवाद का दीर्घकालिक समाधान द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संवाद, जल कानूनों के आधुनिकरण, पर्यावरणीय स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है। सिंधु जल संधि की वर्तमान स्थिति बताती है कि जल को लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का टकराव भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।

दुबई एयर शो में तेजस क्रैश: निगेटिव G फोर्स, इंजन सीज या बर्ड स्ट्राइक- क्या था असली कारण और क्यों ऐसे हादसे नई बात नहीं है?

दुबई एयर शो में भारतीय वायु सेना (IAF) का तेजस विमान जब क्रैश हुआ, तो हमें बहुत दुख हुआ, क्योंकि हमने अपना एक प्रशिक्षित पायलट खो दिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। इस हादसे ने यह सवाल फिर उठा दिया है कि ये हवाई करतब (यानी प्रदर्शन उड़ानें) कितने खतरनाक होते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि ऐसे एयर शो में हादसे, हालाँकि कम होते हैं, पर दुनिया की सबसे एडवांस सेनाओं में भी हो सकते हैं, इसलिए भावनाओं में बहने के बजाय सच्चाई को समझना जरूरी है।

असल में, इन उड़ानों में विमान को उसकी पूरी ताकत दिखाने के लिए बहुत कम ऊँचाई पर और तेज गति से, जानबूझकर जोखिम भरी कलाबाजियाँ करवाई जाती हैं। ये उड़ानें सामान्य उड़ानों से बहुत अलग होती हैं, क्योंकि जरा सी भी गलती होने पर संभलने का मौका नहीं मिलता। इसीलिए, यह काम असली युद्ध की उड़ान से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है और शुक्रवार (21 नवंबर 2025) की घटना ने यही दुखद सच्चाई दिखाई।

शुरुआती वीडियो फुटेज देखकर विशेषज्ञों ने कहा है कि तेजस विमान मुश्किल कलाबाजी करते समय अचानक नीचे आने लगा था और उन्होंने कुछ संभावित कारण भी बताए हैं। मगर, यह बात याद रखनी चाहिए कि जाँच पूरी होने से पहले कोई भी व्यक्ति पक्के तौर पर हादसे की असली वजह नहीं बता सकता। ऐसे एडवांस फाइटर जेट के हादसे अक्सर किसी एक कारण से नहीं होते, बल्कि मशीन, पायलट, मौसम या काम करने के तरीके में हुई कई छोटी-छोटी गड़बड़ियों की एक पूरी चेन के कारण होते हैं, इसलिए हमें IAF की आधिकारिक जाँच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए।

लेकिन इस हादसे ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि विमानन एरिया के पेशेवरों की जिदंगी कितनी खतरनाक होती है। उनके काम में कितनी बारीकियाँ और पेचीदगियाँ होती हैं। जरा सी चूक भी कई बार भयानक नतीजे ला सकती है और दुर्भाग्यवश, कभी-कभी उनकी जान भी ले सकती है।

नेगेटिव G करतब और पायलट की शारीरिक सीमाएँ

सबसे ज्यादा जिस बात पर चर्चा हो रही है, वह है ‘नेगेटिव G’ करतब (Negative G manoeuvre) का पायलट के शरीर पर पड़ने वाला असर। आम तौर पर उड़ान के दौरान, गुरुत्वाकर्षण (Gravity) खून को दिमाग से दूर खींचता है। लेकिन ‘नेगेटिव G’ की स्थिति में इसका उल्ट होता है। खून तेजी से दिमाग की तरफ जाता है। इसकी वजह से ‘रेड-आउट’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें देखने की क्षमता बहुत बिगड़ जाती है और ज्यादा गंभीर होने पर कुछ पल के लिए बेहोशी भी आ सकती है।

हवाई कलाबाजी करते समय, खासकर उल्टे होकर उड़ने के दौरान, पायलट को चक्कर आ सकते हैं, उसके रिफ्लेक्स धीमे हो सकते हैं, और सोचने-समझने की क्षमता कुछ पल के लिए कमजोर पड़ सकती है। चाहे पायलट ने कितनी भी बेहतरीन ट्रेनिंग ली हो या ‘एंटी-G सूट’ पहना हो, कोई भी इन जैविक सीमाओं से बच नहीं सकता। तेज सफ्तार और कम ऊँचाई पर, अगर पायलट एक सेकंड के लिए भी बेकाबू हो जाए, तो विमान को संभालना नामुमकिन हो जाता है। यह कारण यह नहीं बताता कि पायलट की कोई गलती थी, बल्कि यह उस कठोर सच्चाई को दिखाता है कि विमान कभी-कभी उस सीमा से भी ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर सकता है, जिसे इंसान का शरीर ठीक से झेल नहीं पाता।

इंजन सीज या कुछ समय के लिए पावर लॉस होना

दुर्घटना का एक और संभावित कारण इंजन की खराबी या कलाबाजी के दौरान कुछ पल के लिए इंजन की ताकत कम होना हो सकता है। उदाहरण के लिए, मार्च 2024 में जैसलमेर के पास हुए तेजस क्रैश में, जाँचकर्ताओं ने पता लगाया था कि इंजन के तेल पंप में गड़बड़ी आ गई थी, जिससे इंजन जाम (Seizure) हो गया था। हालाँकि, इस दुबई क्रैश में भी वही खराबी थी, इसका कोई सबूत नहीं है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि जब लड़ाकू विमानों को इतनी जोरदार तरीके से उड़ाया जाता है, तो उनके इंजन तेल (Lubrication) या ईंधन सप्लाई की गड़बड़ियों के प्रति कितने कमजोर हो सकते हैं।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘नेगेटिव G’ या लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण वाली स्थितियों में, इंजन का तेल और ईंधन वैसे काम नहीं करते, जैसे वे सीधी उड़ान में करते हैं। तेल के दबाव या ईंधन की सप्लाई में जरा-सी भी रुकावट आने पर इंजन कुछ देर के लिए बंद हो सकता है या उसकी ताकत घट सकती है। सामान्य उड़ान में पायलटों के पास ऊँचाई और समय होता है कि वे इंजन को फिर से चालू करने या इमरजेंसी के तरीके अपना सकें। पर, एयर शो में विमानों को लोगों को दिखाने के लिए जानबूझकर जमीन के बहुत करीब उड़ाया जाता है, ऐसे में अगर इंजन की ताकत अचानक कम हो जाए, तो बचने या संभलने का कोई मौका नहीं मिलता।

‘डिजिटल कंट्रोल’ वाला ‘फ्लाई-बाय-वायर’ सिस्टम

तेजस विमान एक ‘डिजिटल कंट्रोल’ वाला विमान है, जिसे ‘फ्लाई-बाय-वायर’ सिस्टम कहा जाता है। इसका मतलब है कि जब पायलट कोई कमांड देता है, तो वह सीधे मशीनरी तक नहीं जाती, बल्कि बीच में लगे कंप्यूटर उस कमांड को समझते हैं और फिर विमान को उड़ाते हैं। इस तकनीक से विमान बहुत तेज और फुर्तीला बन जाता है।

हालाँकि, यह सारा सिस्टम दर्जनों सेंसर से मिलने वाले सटीक डेटा पर निर्भर करता है। इसलिए, अगर अत्यधिक कलाबाजी के दौरान किसी सेंसर में कोई छोटी-सी गड़बड़ी आ जाए, या सॉफ्टवेयर में कोई उलझन पैदा हो जाए, तो विमान अचानक गलत प्रतिक्रिया दे सकता है। बेशक, इन सिस्टम की खूब जाँच की जाती है, लेकिन एयर शो में विमान को क्षमता की आखिरी हद तक उड़ाया जाता है। बहुत कम ऊँचाई पर, अगर कंट्रोल का जवाब थोड़ा सा भी देर से या गलत मिले, तो यह भयानक हो सकता है। यह समस्या केवल तेजस के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे आधुनिक लड़ाकू विमानों में भी ऐसा देखा गया है।

पक्षी से टकराना या कोई बाहरी चीज निगलना

हमें हादसे के पीछे मौसम और आस-पास के माहौल से जुड़े कारणों पर भी ध्यान देना होगा। एयर शो अक्सर समुद्र के किनारों या भीड़-भाड़ वाले शहरों के पास होते हैं, जहाँ पक्षी ज्यादा होते हैं। अगर उड़ान के दौरान कोई पक्षी विमान से टकरा जाए (Bird Strike) या इंजन में कोई बाहरी चीज चली जाए, तो इससे इंजन की हवा का बहाव, जलने की प्रक्रिया या टरबाइन का काम अचानक और बुरी तरह से बिगड़ सकता है।

इतिहास में, दुनिया की सबसे एडवांस एयर फोर्सेस के विमानों के साथ भी ऐसी घटनाओं के कारण हादसे हुए हैं। एक ऊँचाई पर उड़ रहे विमान में अगर पक्षी टकराए, तो शायद पायलट बच जाए, लेकिन कम ऊँचाई पर खतरनाक कलाबाजी करते समय अगर ऐसा हो जाए, तो समय और ऊँचाई कम होने के कारण विमान को संभालना नामुमकिन हो सकता है।

मिलिट्री एक्सरसाइज के दौरान एयरशो क्रैश या दुर्घटनाएँ पहले कभी नहीं होतीं, ऐसा क्यों है?

यह समझना बहुत जरूरी है कि एयर शो में विमानों का क्रैश होना सिर्फ भारत या तेजस विमान की अकेली समस्या नहीं है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और कई यूरोपीय देशों ने भी अपने बेहतरीन लड़ाकू विमानों को प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) उड़ानों के दौरान हादसों में खोया है। F-16, Su-27, मिराज 2000 और MiG-29 जैसे विमान, जिनकी भरोसेमंद कार्यक्षमता कई दशकों से सिद्ध हो चुकी है, वे भी एयर शो के दौरान क्रैश हुए हैं।

ये हादसे इसलिए नहीं होते कि विमान असुरक्षित होते हैं, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि एयर शो में जानबूझकर सुरक्षा की गुंजाइश कम कर दी जाती है, ताकि कलाबाजियाँ ज्यादा शानदार और नजदीक से दिख सकें। जोखिम ऐसे प्रदर्शनों का एक अटूट हिस्सा होता है। हाल के विश्वव्यापी उदाहरण देखें तो पता चलता है कि सबसे आधुनिक सेनाएँ भी हादसों से अछूती नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में अमेरिकी नौसेना को दक्षिण चीन सागर के ऊपर दोहरे हादसे का सामना करना पड़ा था, जब USS निमित्ज विमानवाहक पोत से उड़ान भरते समय एक MH-60R सीहॉक हेलिकॉप्टर और एक F/A-18F सुपर हॉर्नेट लड़ाकू जेट आधे घंटे के भीतर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे।

अमेरिका में हुई एक और दुखद घटना ने यह दिखाया कि कंट्रोल एयर स्पेस में भी विमानन सुरक्षा कितनी नाजुक हो सकती है। वाशिंगटन डीसी के पास, रीगन नेशनल एयरपोर्ट के नजदीक, अमेरिकन एयरलाइंस के एक छोटे जेट विमान और अमेरिकी सेना के ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर की हवा में टक्कर होने से बड़ा हादसा हो गया।

जिस समय यह हुआ, सिविल एयरक्राफ्ट (जिसमें 60 यात्री और 4 क्रू सदस्य थे) लैंडिंग के लिए आ रहा था, तभी उसकी ट्रेनिंग मिशन पर निकले सैन्य हेलिकॉप्टर से टक्कर हो गई। टक्कर होते ही दोनों विमान बर्फीली पोटोमैक नदी में जा गिरे। अधिकारियों ने पुष्टि की कि विमान में सवार सभी 64 नागरिक और हेलिकॉप्टर में सवार तीनों सैनिक मारे गए।

हालाँकि अमेरिका में दुनिया के सबसे एडवांस एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम हैं, फिर भी हादसे की वजह तुरंत पता नहीं चली, जिसके बाद राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड (NTSB) ने पूरी जाँच शुरू की। एयरपोर्ट को बंद कर दिया गया और फ्लाइट्स को मोड़ना पड़ा। बचाव दल को कई दिनों तक बर्फीले, कम रोशनी वाले पानी में जूझना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि भले ही नागरिक और सैन्य विमानन सिस्टम कितने भी आधुनिक क्यों न हों, वे इंसानी, तकनीकी या पर्यावरणीय गलतियों के आगे अब भी कमजोर पड़ सकते हैं।

सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में भी हादसे होते रहते हैं। जैसे, अमेरिकी नौसेना में हाल के सालों में कई बड़े हादसे हुए हैं। इससे पता चलता है कि जब काम का बोझ ज्यादा होता है, तो खतरा भी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 में, लाल सागर में अमेरिकी जहाज (Aircraft Carrier) यूएसएस हैरी एस ट्रूमैन से लगभग $6 करोड़ की कीमत वाला एक F/A-18 सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान, उसे खींचने वाले ट्रैक्टर के साथ, फिसलकर समुद्र में गिर गया था।

यह तब हुआ जब जहाज दुश्मनों से बचने की कोशिश कर रहा था और लगातार मिसाइलों के खतरे का सामना कर रहा था। सिर्फ अमेरिका ही क्यों, चीन में भी एयर शो के दौरान जानलेवा दुर्घटनाएँ हुई हैं। जैसे 2016 में, एक मशहूर पायलट मिशेल लूश की मौत हो गई थी, जब वह विमान को बहुत ऊँचाई से सीधी नीचे लाने के बाद वापस ऊपर नहीं खींच पाए थे। ये सभी घटनाएँ एक कड़वी सच्चाई बताती हैं। चाहे हम शांति के समय कोई शानदार प्रदर्शन कर रहे हों या लड़ाई के करीब वाले ऑपरेशन, ये तेज रफ्तार वाले विमान हमेशा इंसान और मशीन की आखिरी हद पर काम करते हैं। इसलिए, कोई भी देश, चाहे वह कितना भी आगे क्यों न हो, ऐसे दुखद हादसों से बच नहीं सकता।

तेजस का ऑपरेशनल ट्रैक रिकॉर्ड

तेजस विमान साल 2016 से भारतीय वायु सेना (IAF) में है और इसने अब तक हज़ारों घंटों तक सुरक्षित उड़ान भरी है, जिसमें सामान्य गश्त, अभ्यास और ट्रेनिंग मिशन सब शामिल हैं। इससे पहले जो क्रैश 2024 में जैसलमेर के पास हुआ था, उसकी वजह साफ-साफ पता चल गई थी। वह इंजन के तेल पंप की खराबी थी। उस हादसे के बाद जो सुधार किए गए, उसने दिखाया कि भारत की सैन्य विमानन सुरक्षा प्रणाली सक्रिय है और पारदर्शी तरीके से काम करती है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि दुबई में क्रैश उस दिन हुआ, जब सरकार ने तेल लीक होने की अफवाहों को गलत बताया था। जाँच पूरी होने से पहले ही बिना किसी संबंध वाले दावों को हादसे से जोड़ना, लोगों की समझ को गुमराह करता है और जाँच प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कम करता है।

एक त्रासदी, कोई फैसला नहीं

यह सच है कि मार्च 2024 से अब तक भारतीय वायु सेना (IAF) ने नौ विमान खोए हैं, और यह तेजस का दूसरा हादसा है, लेकिन सिर्फ इन आँकड़ों को देखकर डरना नहीं चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एयरफोर्स दुनिया के सबसे मुश्किल हवाई क्षेत्रों में काम करती है। ऐसे में, हादसे होना, भले ही दिल तोड़ने वाला हो, लेकिन तेज रफ्तार वाले सैन्य विमानन की एक दुखद सच्चाई है।

इस हादसे की जाँच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बिठा दी गई है और केवल उनके नतीजे ही हमें सही जवाब देंगे। जब तक जाँच पूरी नहीं होती, तब तक हमें अटकलों पर भरोसा करने के बजाय संयम रखना चाहिए और पूरी तस्वीर देखनी चाहिए। यह इंसान का स्वभाव है कि वह किसी भी असफलता का एक ही कारण जानना चाहता है, खासकर जब यह दुबई एयर शो के उस भयानक शुक्रवार (21 नवंबर 2025) की तरह इतना दुखद हो। लेकिन, अक्सर दुखद हादसों की वजह कोई एक गलती नहीं होती, बल्कि वे कई अनजाने कारणों के एक साथ मिल जाने का नतीजा होते हैं, और इनमें से कुछ कारणों का पता तो सबसे अनुभवी जाँचकर्ता भी शायद न लगा पाएँ।

अब दवाई-मेवों से आगे बढ़ेगा अफगानिस्तान-भारत के बीच कारोबार, पाकिस्तान को बायपास करने के लिए चालू होगा हवाई और समुद्री मार्ग: जानिए द्विपक्षीय व्यापार से और क्या होंगे दोनों देशों को लाभ

अफगानिस्तान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंध आज न सिर्फ ऐतिहासिक विरासत का विस्तार हैं बल्कि मौजूदा भू-राजनीतिक समीकरणों, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और पाकिस्तान को बायपास करने की रणनीति के केंद्र में भी हैं।

दोनों देश साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। एयर कार्गो कॉरिडोर, व्यापार अटैशे की नियुक्ति और निवेश सहयोग से यह साझेदारी न केवल आर्थिक पर साथ ही भू-राजनीतिक दृष्टि से भी अहम हो गई है।

भारत और अफगानिस्तान के बीच प्राचीन सिल्क रूट दोनों देशों की ऐतिहासिक विरासत रहा है। यहीं से सूखे मेवे, मसाले, कालीन और घोड़े आदि का आयात निर्यात होता रहा। आज दोनों देशों के रिश्ते सुरक्षा, विकास और कनेक्टिविटी की आधुनिक भाषा में बदल गए हैं, इसका आधार वही पुरानी ऐतिहासिक निकटता और आपसी भरोसा है।

तालिबानी सत्ता की वापसी के बाद राजनीतिक मान्यता को लेकर थोड़ी परेशानी रही, लेकिन भारत ने मानवीय सहायता, बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर ढाँचागत प्रोजेक्ट और व्यापारिक संपर्क को जारी रखकर संबंध टूटने नहीं दिए। इसी कड़ी में नई दिल्ली और काबुल अब इस रिश्ते को मदद से आगे ले जाकर ‘साझेदार व्यापार’ में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

अफगानिस्तान के उद्योग और वाणिज्य मंत्री नूरुद्दीन अजीजी 5 दिवसीय यात्रा के तहत भारत के दौरे पर हैं। इस दौरे का मकसद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के बेहतर करना है। इस दौरे में एयर कार्गो कॉरिडोर की घोषणा हुई। काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्ग पर मालवाहक उड़ानें शुरू होंगी।

इसके अलावा दोनों देशों ने व्यापार अटैशे नियुक्त करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य यह है कि व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी, निवेशकों को मार्गदर्शन और नीतिगत समन्वय सीधे तौर पर किया जा सके। इससे व्यापारिक विवादों का समाधान भी तेज़ी से होगा और कारोबारी माहौल को स्थिरता मिलेगी।

अजीजी से पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी अक्टूबर में भारत की सप्ताह भर की यात्रा के लिए आए थे। तब भारत और अफगानिस्तान ने खनिज, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में निवेश के अवसर तलाशने के लिए एक द्विपक्षीय व्यापार कमेटी बनाने की बात कही थी। भारत ने भी कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिहाज से काबुल में अपने तकनीकी मिशन को दूतावास का दर्जा दिया है।

गौरतलब है कि ये यात्रा उस समय हो रही है जब पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के रिश्तों में तनाव चल रहा है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए जमीनी रास्ते बंद कर दिए हैं। इससे अफगानिस्तान का व्यापार प्रभावित हो रहा है।

इसी के चलते अफगानिस्तान ने भारत की ओर अपने कदम तेजी से बढ़ाए हैं। अब एयर कार्गों सेवा जल्द ही शुरू किए जाने की घोषणा से पाकिस्तान पर दोतरफा दबाव बढ़ेगा। भारत- अफगानिस्तान डील में दोनों देशों ने नया संयुक्त वाणिज्य मंडल (Joint Chamber of Commerce) बनाने की घोषणा की है।

ये प्लेटफॉर्म व्यापारिक संगठनों, उद्योगपतियों और निवेशकों को एक साझा मंच देगा, जहाँ वे नए अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा कर सकेंगे। इससे निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी और व्यापारिक रिश्ते सरकारी स्तर से एक कदम आगे बढ़ेंगे।

क्या है भारत-आफगानिस्तान की मौजूदा व्यापारिक इंफ्रास्ट्रक्चर

2024-25 के वित्तीय वर्ष में भारत-अफगानिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार ₹8372 करोड़ (1 अरब डॉलर ) के पार पहुँच चुका है। क्षेत्रीय अस्थिरता के बावजूद ये इजाफा काबिल-ए-तारीफ है।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, कुल व्यापार लगभग 1.0087 अरब डॉलर (₹8372 करोड़) रहा, जिसमें से करीब 689.8 मिलियन डॉलर (₹5722 करोड़) अफगानिस्तान के निर्यात और करीब 319 मिलियन डॉलर (₹2647 करोड़) भारत के निर्यात रहे, यानी व्यापार संतुलन पहली बार काबुल के पक्ष में थोड़ा झुक गया।

अफगानिस्तान से भारत को मुख्य रूप से सूखे मेवे, बीज, केसर, जड़ी-बूटियाँ, किशमिश और अनार जैसे कृषि उत्पाद आते हैं, जो भारतीय बाजार में प्रीमियम श्रेणी के माने जाते हैं।

इसके बदले में भारत अफगानिस्तान को दवाइयाँ, मशीनरी, रेडीमेड कपड़े, खाद्य पदार्थ, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुएँ निर्यात करता है। ये सामान अफगान के शहरी और कस्बाई बाजारों के लिए अहम आपूर्ति शृंखला बन चुके हैं।

पाकिस्तान की समस्या और उसका बायपास

भारत- अफगानिस्तान व्यापार की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) रुकावट पाकिस्तान है। पाकिस्तान अक्सर भारत और अफगानिस्तान के बीच जमीनी ट्रांजिट को रोकने की कोशिश करता है।

वर्तमान में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ा है। सीमा पार हमले और बार बार क्रॉसिंग बंद होने से अफगानिस्तान के ताजे फल और सब्जियों के निर्यात को खासतौर पर भारी नुकसान हुआ। इसके कारण अफगानिस्तान को वैकल्पिक मार्ग खोजने पड़े।

हाल में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए अपनी जमीनी सीमा बंद कर दी। इसके कारण अफगानिस्तान को व्यापार में काफी नुकसान झेलना पड़ा। इसके बाद तालिबान सरकार ने अपने व्यापारियों को दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने तथा वैकल्पिक रूट अपनाने की सलाह जारी की।

इसी के चलते भारत के साथ हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के विस्तार को अफगानिस्तान की ‘पाकिस्तान बायपास’ रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे इस्लामाबाद की सामरिक और आर्थिक चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।

2017 में हुई भारत-अफगान एयर कॉरिडोर की शुरुआत

भारत- अफगानिस्तान के बीच एयर फ्रेट कॉरिडोर की शुरुआत 2017 में हुई, जब काबुल से दिल्ली के लिए पहला कार्गो फ्लाइट 60 टन कार्गो भारत पहुँचा। इसमें मुख्य रूप से ‘हींग’ और अन्य औषधीय पौधों को लाया गया।

असल में यह फैसला 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी की मुलाकात में लिया गया था, ताकि पाकिस्तान की जमीनी रुकावटों को खत्म करके अफगानिस्तान को सीधे भारतीय बाजार से जोड़ा जा सके।

इसके तुरंत बाद कंधार- दिल्ली कार्गो फ्लाइट शुरू हुई, जिससे अनार और ताजे फल आदि भारतीय थोक मंडियों तक आसानी और तेजी से पहुँचे। इससे अफगान किसानों को भी बेहतर दाम मिलने के रास्ते भी खुले।

इस एयर कॉरिडोर ने शुरुआती वर्षों में व्यापार को गति दी, लेकिन सुरक्षा, वित्तीय प्रतिबंधों और तालिबान की वापसी के बाद इसे रोक दिया गया। अब इसे फिर से सक्रिय किया जा रहा है।

दोनों देशों के बीच नई हवाई कार्गो सेवा की डील

अफगानिस्तान के तालिबान व्यापार मंत्री अल हज नूरुद्दीन अजीजी की हालिया यात्रा के दौरान काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्गों पर एयर फ्रेट कॉरिडोर ‘सक्रिय’ कर दिया गया हैं। इन रास्तों पर कार्गो उड़ानें बहुत जल्द शुरू होने वाली हैं।

विदेश मंत्रालय के अधिकारी आनंद प्रकाश के अनुसार, इन मार्गों पर शीघ्र ही नियमित कार्गो फ्लाइट ऑपरेशन शुरू होंगे, जिससे दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को सीधा बढ़ावा मिलेगा।

इस समय अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव के कारण जमीनी ट्रांजिट लगभग ठप है। इससे अफगान निर्यातकों, विशेषकर फल उत्पादकों, को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब एयर कार्गो कॉरिडोर से ही अफगानिस्तान को उम्मीद है कि ताजा और अधिक मूल्य वाले अफगानी सामान बिना रुकावट भारतीय शहरों तक पहुँचेंगे। कार्गो के जरिए भारत से दवाइयाँ, मशीनरी और कपड़े काबुल और अन्य शहरों में पहुँच सकेंगे।

चाबहार पोर्ट और समुद्री कनेक्टिविटी

हवाई मार्ग के साथ-साथ भारत और अफगानिस्तान ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए समुद्री-स्थलीय कनेक्टिविटी को भी रणनीतिक रूप से मजबूत करने की योजना पर काम कर रहे हैं।

चाबहार पोर्ट में भारत की भारी निवेश और त्रिपक्षीय ट्रांजिट समझौता अफगानिस्तान को अरब सागर तक वैकल्पिक समुद्री रास्ता देता है, जो पाकिस्तान के कराची और ग्वादर बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करता है।

अफगान व्यापार मंत्री ने भारत से चाबहार के जरिए रेगुलर शिपिंग सेवाएं शुरू करने, ईरान के निमरोज प्रांत में ड्राई पोर्ट विकसित करने और भारतीय बंदरगाह न्हावा-शेवा पर अफगान कार्गो की क्लीयरेंस आसान बनाने की माँग भी की है।

हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार की क्षमता अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रही, लेकिन इसे आने वाले समय में ‘गेम चेंजर कॉरिडोर’ माना जा रहा है जो दक्षिण एशिया और मध्य एशिया कनेक्टिविटी की धुरी बन सकता है।

भारत-अफगानिस्तान का व्यापारिक ढाँचा, रियायतें और निवेश अवसर

भारत ने अफगान उत्पादों के लिए अपने बाजार में लगभग शून्य या बहुत कम टैरिफ का प्रावधान रखा है। इसके कारण छोटे अफगान किसानों और उत्पादकों को बेहतर खरीदार और दाम मिल पा रहे हैं। कई विश्लेषकों का ये भी कहना है कि भारतीय बाजार तक आसान पहुँच के चलते अफगान किसानों को अफीम जैसी अवैध खेती के बजाय सूखे मेवे, केसर, जड़ी- बूटियों वाली वैकल्पिक खेली करने का मौका मिल रहा है।

दूसरी ओर, अफगानिस्तान तालिबान शासन के तहत भी भारतीय निवेश को आकर्षित करने के लिए 5 साल तक कृषि-प्रोसेसिंग, खनन और हल्की मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में टैक्स हॉलिडे, कच्चे माल और मशीनरी पर 1% आयात शुल्क जैसे प्रोत्साहन दे रहा है।

इस व्यापारिक संरचना को मूर्त रूप देने के लिए दोनों देशों ने वाणिज्यिक/ट्रेड अटैशे नियुक्त करने, संयुक्त कार्य समूहों को पुनः सक्रिय करने और बैंकिंग- भुगतान सिस्टम को दोबारा स्थापित करने पर आपसी सहमति जताई है।

अफगान बैंकों में भुगतान, बैंकिंग और SWIFT की चुनौती

तालिबान के सत्ता में आने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद अफगान बैंकों की SWIFT प्रणाली से कटौती के कारण भारत–अफगानिस्तान व्यापार में भुगतान और बैंकिंग सबसे बड़ी तकनीकी बाधा बनकर उभरे।

इससे न केवल बड़े कॉर्पोरेट सौदे, बल्कि छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए भी लेन–देन जोखिमपूर्ण और महँगा हो गया। इसके चलते कई भारतीय आयातकों को अपने ऑर्डर घटाने पड़े।

नई साझेदारी में दोनों देश इस स्थिति को हल करने के लिहाज से वैकल्पिक भुगतान सिस्टम, थर्ड-कंट्री बैंकिंग चैनल या लिमिटेड विशेष प्रावधान जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं ताकि वैध व्यापार को प्रतिबंधों से कम से कम नुकसान हो।

हवाई कार्गो और चाबहार मार्ग पर जोर इसलिए भी है कि इन संरचनाओं के साथ समानांतर रूप से सुरक्षित और पारदर्शी भुगतान ढाँचा स्थापित किया जा सके।

मानवीय, सामाजिक और सामरिक आयाम

भारत- अफगानिस्तान व्यापार आर्थिक साझेदारी के साथ मानवीय और सामाजिक आयाम से भी गहराई से जुड़ा है। बड़ी संख्या में अफगान नागरिक इलाज, शिक्षा और रोजगार के लिए भारत आते हैं। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों का भारतीय निर्यात सीधे तौर पर अफगानिस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था को सहारा देता है।

इसके अलावा, व्यापारिक कनेक्टिविटी को क्षेत्रीय स्थिरता की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है, जहाँ अफगानिस्तान को वैकल्पिक वैध आर्थिक अवसर देकर कट्टरपंथ और अवैध अर्थव्यवस्था को कम करने की सोच दिखाई देती है। भारत के लिए यह आर्थिक के साथ सामरिक निवेश भी है। ये मध्य एशिया तक भारत की पहुँच, ऊर्जा मार्गों और ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति को मजबूत करता है।

पाकिस्तान पर क्या पड़ेगा इसका असर

नई हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के सक्रिय होने से पाकिस्तान की पारंपरिक ‘ट्रांजिट लीवरेज’ कमजोर पड़ती है, क्योंकि अब वह अफगानिस्तान-भारत व्यापार को रोककर दोनों पर दबाव नहीं बना पाएगा।

भारतीय और अफगान अधिकारियों के बयानों से ये साफ संदेश दिखता है कि ‘रोडब्लॉक’ को बायपास करके दोनों देसों के बीच की साझेदारी को आगे बढ़ाया जाएगा। इससे पाकिस्तान की नाराजगी और चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

आर्थिक रूप से भी जब अफगानिस्तान अपनी निर्यात रणनीति भारत, ईरान और मध्य एशिया की ओर मोड़ता है तो पाकिस्तान की ट्रांजिट फीस, लॉजिस्टिक बिजनेस और सीमावर्ती व्यापार को नुकसान होता है। ये पहले सालाना अरबों डॉलर का वॉल्यूम रखता था। इस बदलाव से दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन और कनेक्टिविटी मैप पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है, जिसमें भारत-अफगानिस्तान की नजदीकी एक निर्णायक स्थिति के तौर पर बनकर उभर रही है।

दोनों देशों के लिए आगे की संभावनाएँ और चुनौतियाँ

आने वाले वर्षों में अगर एयर कॉरिडोर वाणिज्यिक तौर पर व्यावहारिक साबित होते हैं तो द्विपक्षीय व्यापार को 1.5- 2 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य पूरा होने की संभावना सच हो सकती है।

हालाँकि राजनीतिक मान्यता, तालिबान शासन की नीतियाँ, वैश्विक प्रतिबंध, आतंकवाद का खतरा और बैंकिंग में आने वाली बाधाएँ अभी भी चुनौतियाँ हैं, जो इस रिश्ते की रफ्तार को सीमित कर सकती हैं।

इसके बावजूद, मौजूदा स्थिति में अफगानिस्तान-भारत द्विपक्षीय व्यापार संबंध दोनों देशों के लिए एक ‘रेयर पॉजिटिव’ के रूप में उभर रहे हैं, जो मानवीय जरूरत, आर्थिक हित और जियोपॉलिटिकल रणनीति को एक साथ साधने की कोशिश है।

एक और बाबरी, एक और 6 दिसंबर: हिंदू आस्था के अपमान की यह मुगलिया सोच नए भारत में क्यों चले, सदियों पुराने जख्मों पर नमक रगड़कर क्या हासिल करेगी TMC?

अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर उनके भव्य मंदिर का पुनर्निमाण करने के लिए हिंदुओं ने 500 वर्षों से अधिक का लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के दौरान यह धरती राम भक्तों के लहू से लाल भी हुए लेकिन अपने आराध्य को मंदिर में देखने के सपने के सामने भक्तों को हर बलिदान छोटा लग रहा था। 500 सौ वर्षों तक हिंदुओं ने अन्याय, दमन और अपमान को सहते हुए भी प्रभु राम के प्रति अपनी श्रद्धा को टूटने नहीं दिया और कानूनी लड़ाई लड़ अपने आराध्य का भव्य मंदिर बनवा दिया।

इस संघर्ष की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि अयोध्या में मौजूद भगवान राम के मंदिर को तोड़कर वहाँ मुगलिया आक्रांताओं ने ‘बाबरी’ खड़ी कर दी थी। यह ना सिर्फ हिंदू आस्था पर चोट थी बल्कि इसे मजहबी वर्चस्व का प्रतीक बनाकर सदियों तक हिंदुओं के घावों को हरा रखा गया। आखिरकार, मुस्लिम आक्रांताओं की हिंदू विरोधी मानसिकता की इस पहचान को 6 दिसंबर 1992 को राम भक्तों ने ‘समतल’ कर दिया।

प्रभु राम का भव्य मंदिर बनकर तैयार है और आगामी 25 नवंबर को वहाँ धर्म ध्वजा स्थापित करने की तैयारी है। दूसरी और अयोध्या से 850 किलोमीटर दूर एक बाबरी बनाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए दिन चुना गया है- 6 दिसंबर।

ममता बनर्जी की पार्टी TMC के विधायक हुमायूँ कबीर ने मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर को ‘बाबरी नाम की मस्जिद’ की नींव रखे जाने का ऐलान किया है। हुमायूँ कबीर का कहना है कि इसे बनने में तीन साल लगेंगे। अगर किसी को इसका शक भी हो कि इस नई मस्जिद का उस पुरानी बाबरी से कोई लेना-देना नहीं है तो कबीर ने यह भी साफ कर दिया है कि यह उसी का ‘सेंटीमेंट’ यानी भाव है।

हुमायूँ कबीर का कहना है कि बाबर ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाई और यह ऐतिहासिक मुस्लिम सेंटीमेंट है। उनका कहना है, “बंगाल में 35-37% मुस्लिम आबादी और मुर्शिदाबाद में 72% है और इसलिए उनका ‘सेंटीमेंट’ है कि उनकी जो 6 दिसंबर को अयोध्या में मस्जिद तोड़ी गई वो मुस्लिमों के मन में अभी भी है।”

बंगाल में आने वाले 6 महीनों के भीतर विधानसभा चुनावों का एलान किए जाने की संभावना है और इसी को देखकर हुमायूँ के इस बयान को मुस्लिम वोटों के तुष्टीकरण की साजिश के तौर पर देखा जा रहा है। चुनावों से ठीक पहले TMC किसी भी तरह मुस्लिम आबादी को अपने पक्ष में लाने की पुरी कोशिश करती नजर आने लगी है। चाहे इसके लिए हिंदुओं की आस्था पर प्रहार ही क्यों ना करना पड़े।

TMC के साथ कॉन्ग्रेस भी वोटों की इस दौड़ में शामिल हो गई है। यह जानते हुए भी कि यह TMC की तुष्टिकरण की नीति है, कॉन्ग्रेस खुलकर उसके साथ है। कॉन्ग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि इसमें कुछ विवादित नहीं है, इसको विवाद का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है।

सुरेंद्र राजपूत कोई नौसिखिया तो हैं नहीं, टीवी पर कॉन्ग्रेस का लंबा समय से पक्ष रख रहे हैं और राजनीतिक चालबाजियों को अच्छी तरह से जानते समझते हैं। 6 दिसंबर की तारीख पर बाबरी बनाने के एलान के मायने क्या हैं इसमें अगर सुरेंद्र राजपूत को कुछ विवादित नहीं दिख रहा है तो साफ है कि उन्होंने अपने आँखों पर राजनीतिक पट्टी बाँध ली है।

भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण कोई नई बीमारी नहीं है लेकिन TMC ने इसे जिस स्तर तक गिराकर ले जाने की कोशिश की है, वह देश की सामाजिक एकता के लिए सीधा-सीधा खतरा भी बन सकता है। मुस्लिम वोटों की ठेकेदार बन चुकी यह पार्टी उस रास्ते पर उतर आई है, जहाँ वोटों के लालच में हिंदुओं की भावनाओं और आस्था को बार-बार कुचला जा रहा है।

इस मामले में TMC की रणनीति साफ है कि बहुसंख्यक हिंदुओं को उकसाओ, उनकी आस्था का मजाक बनाओ और फिर खुद को ‘अल्पसंख्यकों का रक्षक’ बताकर मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में खड़ा करो। इसके लिए देश पर तलवार के दम पर हुकूमत करने, मंदिर तोड़ने और हिंदुओं के अस्तित्व को मिटाने की कोशिश करने वाले मुगलों को रोमैन्टिसाइज करने में भी नेताओं को कोई गुरेज नहीं है।

हिंदुओं की आस्था और भावनाओं को चोट पहुँचाने का सिलसिला लगातार और योजनाबद्ध तरीके से चलाया गया है। चाहे वह राम मंदिर का विरोध हो, जय श्रीराम बोलने पर हिंसा हो, दुर्गा विसर्जन पर प्रतिबंध हो या मुगल महिमामंडन, हर घटना इस बात का सबूत है कि बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को जानबूझकर उकसाने के प्रयोग बार-बार किए जा रहे हैं।

सदियों से हिंदू समाज बाहरी और अंदरूनी दोनों प्रकार के संघर्षों से लड़ता आया है। लेकिन सबसे खतरनाक लड़ाई वह होती है जिसमें दुश्मन सामने से नहीं बल्कि भीतर से हमला करे। TMC की यह राजनीति उसी प्रकार का हमला है। जब किसी समाज की आस्था पर प्रहार किया जाता है, तो वह समाज अपनी पहचान खोने लगता है।

यह देश के लिए इसलिए भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि जब हिंदू-विरोधी और कट्टरपंथी राजनीति का सामान्यीकरण किए जाएगा तो इसका परिणाम समाजिक तनाव के रूप में सामने आएगा। मजहबी ध्रुवीकरण कोशिश होगी और यह आगे चलकर कितना खतरनाक रूप दिखाएगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

यह दौर नए और विकसित होते भारत के और सशक्त बनने का है और इसके लिए देश को तुष्टिकरण की सड़ी-गली राजनीति से बाहर निकलना होगा। TMC जैसी पार्टियाँ भारत को आगे नहीं ले जा रहीं बल्कि वे उन घावों को फिर से कुरेद रही हैं जिनसे निकलने में हिंदू समाज को सदियों लगे हैं। वोट बैंक की आड़ या कहें कि भूख में जो खेल खेलने की कोशिश की जा रही है वो पूरी भारतीय सभ्यता के खिलाफ है।

सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच कुर्सी के लिए बढ़ा ‘टकराव’, जानें कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के भीतर कैसे शुरू हुई अंदरूनी कलह?

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच कुर्सी को लेकर खींचतान अब और तेज हो गई है। कॉन्ग्रेस सरकार के ढाई साल पूरे होने पर अब शिवकुमार के समर्थक कॉन्ग्रेस हाईकमान को उनकी ओर से किए गए ‘CM पद को ढाई-ढाई साल तक साझा करने’ के वादे की याद दिलाने दिल्ली पहुँच रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवकुमार के करीब 10 समर्थक विधायक गुरुवार (20 नवंबर 2025) और बाकी शुक्रवार (21 नवंबर 2025) को दिल्ली पहुँचे। इनमें मंत्री एन चलुवरायस्वामी, विधायक इकबाल हुसैन, एचसी बालकृष्णा, एसआर श्रीनिवास, रवि गणिगा, गुब्बी वासु, दिनेश गूलीगौड़ा और अन्य शामिल हैं।

इसके अलावा अनेकल शिवन्ना, नेलमंगला श्रीनिवास, कुनिगल रंगनाथ, शिवगंगा बसवराजू समेत कई और विधायक भी दिल्ली जा रहे हैं। ये सभी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात कर 2023 में तय हुए ढाई-ढाई साल के सत्ता साझा फॉर्मूले को लागू करने की माँग करने पहुँच रहे हैं।

अक्सर शांत नजर आने वाले सिद्धारमैया उनसे शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने से जुड़े सवाल पूछे जाने पर अक्सर चिंतित नजर आते हैं। हाल ही में मीडिया से बातचीत के दौरान, सिद्धारमैया ने कहा कि कथित ‘सत्ता-साझेदारी व्यवस्था’ को लेकर हो रही चर्चा सिर्फ एक अनावश्यक बहस है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह कहा जा रहा था कि ढाई साल बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल किया जा सकता है, उसके बाद ही मुख्यमंत्री बदलने का मुद्दा सामने आया है। पार्टी नेताओं को मंत्रिमंडल फेरबदल पर फैसला लेना होगा। कुल 34 मंत्री पद हैं, जिनमें से दो पद खाली हैं। ये खाली मंत्री पद मंत्रिमंडल फेरबदल के दौरान भरे जाएँगे।”

एक ओर सिद्धारमैया मीडिया से बातचीत, सोशल मीडिया पोस्ट और अपने वफादार विधायकों के माध्यम से सिंहासन पर अपना दावा पेश कर रहे हैं तो दूसरी ओर शिवकुमार अपने ‘वादे’ वाले राज्याभिषेक की माँग को लेकर दिल्ली में अपने वफादार विधायकों के आंदोलन से खुद को दूर रख रहे हैं।

यहाँ गौर करने वाली एक दिलचस्प बात यह है कि सिद्धारमैया की तरफ से मुख्यमंत्री खुद आगे बढ़कर अपने पाँच साल के कार्यकाल का दावा कर रहे हैं, जबकि शिवकुमार की तरफ से, उनके वफादार ‘जरूरी’ काम कर रहे हैं। इस बीच डीके शिवकुमार मीडिया के सवालों पर अपनी पुरानी रट लगाए कह रहे हैं, “पार्टी मुझसे जो भी कहेगी, मैं करूँगा।”

जाहिर है, शिवकुमार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन खराब छवि से बचने के लिए सिद्धारमैया के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने से बच रहे हैं। दूसरी ओर, सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी मजबूत करने और जनता को ‘सब ठीक है’ का संदेश देने के लिए अपने पाँच साल के कार्यकाल का दावा कर रहे हैं।

सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच महीनों से चल रहा ‘सिंहासन का खेल’

कर्नाटक की सियासत में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच शक्ति संघर्ष अब खुलकर सामने आता दिख रहा है। दोनों नेता भले ही अपनी महत्वाकांक्षाओं को खुलकर स्वीकार या नकार नहीं रहे हों लेकिन यह कहना कि इसे लेकर कोई खींचतान नहीं है, आम लोगों को मूर्ख समझने जैसा होगा।

पिछले चार महीनों में कॉन्ग्रेस के चार नेताओं, तीन विधायक और एक पूर्व सांसद को पार्टी ने नोटिस जारी किए हैं। इन नेताओं ने खुले तौर पर शिवकुमार को अगले मुख्यमंत्री के रूप में समर्थन दिया था। कॉन्ग्रेस अनुशासन समिति ने इन बयानों को पार्टी के लिए शर्मिंदगी और हाईकमान के निर्देशों का उल्लंघन बताया।

शिवकुमार के समर्थक लगातार सिद्धारमैया की जगह उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की माँग उठा रहे हैं। कुछ विधायक तो यह भी कह रहे हैं कि इस साल के अंत तक बदलाव हो जाएगा। अक्टूबर में कुनीगल विधायक एचडी रंगनाथ और मांड्या के पूर्व सांसद एलआर शिवरामे गौड़ा को ऐसे ही बयानों पर नोटिस मिला।

इससे पहले चन्नागिरी विधायक शिवगंगा वी बसवराज और रामनगर विधायक इकबाल हुसैन पर भी कार्रवाई की गई थी। शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले इकबाल हुसैन ने कहा था कि सिद्धारमैया को पहले ही काफी मौका मिल चुका है, पहले पाँच साल और अब ढाई साल।

उनका कहना था, “शिवकुमार ने पार्टी के लिए बहुत मेहनत की, 140 सीटें दिलाईं। उन्हें मौका मिलना चाहिए ताकि 2028 में कॉन्ग्रेस फिर सत्ता में आए।” मांड्या के विधायक रवि कुमार गौड़ा ने भी कहा कि समय आने पर शिवकुमार जरूर मुख्यमंत्री बनेंगे। उसी तरह, तनवीर सैत ने संकेत दिया कि नेतृत्व स्थिर नहीं रह सकता, नया नेतृत्व आना जरूरी है।

सीपी योगेश्वर ने दावा किया कि जिले के सभी विधायक शिवकुमार को ही मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं और अब फैसला हाईकमान को करना है। बसवराज ने अगस्त में यह भी कहा था कि दिसंबर तक ‘चेंज ऑफ गार्ड’ यानी सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। रंगनाथ ने शिवकुमार को अपना ‘राजनीतिक गुरु’ और ‘पैन-इंडिया नेता’ तक बताया।

शिवरामे गौड़ा ने यह दावा भी कर दिया कि दो-दो साल के सत्ता साझेदारी समझौते के तहत निर्णय नवंबर तक हो जाएगा। इन बार-बार के बयानों से परेशान होकर कॉन्ग्रेस हाईकमान ने नोटिस जारी किया और कहा, “इस संबंध में आपके मीडिया बयान न केवल पार्टी को शर्मिंदा करते हैं बल्कि पार्टी अनुशासन का भी उल्लंघन करते हैं। हमने आपके अनर्गल बयानों को गंभीरता से लिया है और स्पष्टीकरण माँगा है। आपको यह नोटिस मिलने के एक सप्ताह के भीतर जवाब देना होगा।”

इस साल अप्रैल में आई जाति जनगणना रिपोर्ट ने कॉन्ग्रेस के भीतर तनाव और बढ़ा दिया। लिंगायत, वोक्कालिगा और कुछ मुस्लिम समुदायों में असंतोष बढ़ा, जिसके राजनीतिक असर को लेकर सिद्धारमैया और शिवकुमार खेमों में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।

जेडीएस से आए विधायक सिद्धारमैया को सीएम बने रहने देना चाहते हैं। वहीं, शिवकुमार के समर्थक मानते हैं कि कॉन्ग्रेस को राज्य में सत्ता लाने में सबसे बड़ा योगदान उनका है, इसलिए उन्हें अधिकार मिलना ही चाहिए। शिवकुमार के नजरिए से इसे देखें तो अगर उनके मन में CM पद की महत्वाकांक्षा नहीं होती, तो वे अपने समर्थकों को चुप करवा सकते थे लेकिन उनकी चुप्पी और ‘वादे निभाओ’ की आवाजें, उनके मौन समर्थन का संकेत देती हैं।

सिद्धारमैया गुट चाहता है कि शिवकुमार को कर्नाटक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया जाए। 2023 में उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें एक साल में पद छोड़ देना चाहिए था लेकिन वे अब तक अध्यक्ष बने हुए हैं ताकि पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखें।

हाल ही में उन्होंने कहा, “मैं यह पद हमेशा नहीं रख सकता।” जिसे राजनीतिक संदेश माना जा रहा है कि वे धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहते हैं, सीधे टकराव नहीं। कुल मिलाकर, शिवकुमार के समर्थकों का खुला अभियान, नेतृत्व बदलने की लगातार चर्चाएँ और KPCC अध्यक्ष पद पर बने रहने की उनकी रणनीति यह साफ संकेत हैं कि वह सत्ता के शीर्ष पद की ओर कदम-ब-कदम बढ़ रहे हैं। अब देखना यह है कि कर्नाटक की सियासत में बदलाव होता है या सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरा कर पाते हैं।

कॉन्ग्रेस ने सिद्धारमैया और शिवकुमार गुटों की कलह के लिए BJP और मीडिया को ठहराया जिम्मेदार

कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही खींचतान को लेकर बीजेपी और मीडिया पर ठीकरा फोड़ा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी और मीडिया मिलकर कॉन्ग्रेस सरकार की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हैं।

सुरजेवाला ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री से बातचीत की है और दोनों इस बात से सहमत हैं कि भारी चुनावी हार झेल चुकी और आंतरिक कलह से जूझ रही भाजपा, मीडिया के कुछ हिस्सों के साथ मिलकर कॉन्ग्रेस सरकार को बदनाम करने की मुहिम चला रही है।

उनके अनुसार, इस अभियान का असली उद्देश्य कॉन्ग्रेस सरकार की 5 गारंटी योजनाओं, गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति और युवा निधि की सफलता को कमतर साबित करना है। वह कहते हैं कि ये योजनाएँ ‘समावेशी विकास और न्याय’ का मॉडल बन चुकी हैं।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ कॉन्ग्रेस विधायकों के गैर-जरूरी बयान स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं। पार्टी ने ऐसे नेताओं को नेतृत्व को लेकर खुले बयान न देने की कड़ी चेतावनी दी है। हालाँकि, विपक्ष यह कहता रहा है कि कॉन्ग्रेस अपनी ‘गारंटी योजनाओं’ की काल्पनिक सफलता दिखा रही है जबकि अगस्त में जारी CAG रिपोर्ट ने इन योजनाओं से राज्य की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ने की बात कही थी।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि सुरजेवाला के अपने बयान में ही यह साफ झलकता है कि कॉन्ग्रेस में अंदरूनी कलह हकीकत है, जिसे छिपाने के लिए बीजेपी और मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं।

अगर मान भी लिया जाए कि बीजेपी और मीडिया कॉन्ग्रेस को बदनाम कर रहे हैं, तो सवाल उठता है कॉन्ग्रेस के अपने ही विधायक क्यों सिद्धारमैया और शिवकुमार के पक्ष में बँटे हुए हैं? क्या अपने ही नेता मुख्यमंत्री बनने की माँग करके बीजेपी और मीडिया की साजिश में शामिल हो गए हैं?

यही सब इस मामले की असलियत को उजागर करता है कि कर्नाटक कॉन्ग्रेस में नेतृत्व को लेकर विवाद सच में मौजूद है, जिससे पार्टी खुद ही परेशान है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

रिलायंस ने जामनगर रिफाइनरी के लिए रूसी तेल खरीद रोकी, ये रणनीतिक फैसला: जानें- कैसे व्यापारिक हित में उठा ये कदम अमेरिकी दबाव से है मुक्त

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को घोषणा की कि वह अपने जामनगर स्थित एक्सपोर्ट-फोकस्ड रिफाइनरी में अब तुरंत रूसी कच्चे तेल (Russian crude) का आयात बंद कर देगी।

यह रिफाइनरी 1 दिसंबर 2025 से केवल गैर-रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पाद ही निर्यात करेगी। कंपनी ने साफ कहा कि यह फैसला अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाई जाने वाली उन नई पाबंदियों के कारण लिया गया है, जिनमें रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है।

हालाँकि कुछ आलोचकों का कहना है कि यह कदम अमेरिका के दबाव में लिया गया है, लेकिन यह दावा व्यापारिक सच्चाइयों को नजरअंदाज करता है। रिलायंस भारत में रूसी तेल की सबसे बड़ी खरीदार है और जामनगर रिफाइनरी का SEZ हिस्सा मुख्यतः निर्यात पर आधारित है, जहाँ से बड़ी मात्रा में उत्पाद अमेरिका और EU को भेजे जाते हैं।

ऐसे में यह फैसला किसी दबाव से ज्यादा जोखिम कम करने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की समझदारी भरा व्यावसायिक कदम लगता है। रिलायंस का निर्यात कारोबार बड़े मुनाफे और वैश्विक मार्केट पर निर्भर है, इसलिए प्रतिबंधों के लागू होने से पहले ही खुद को सुरक्षित करना कंपनी के लिए जरूरी था।

एक्सपोर्ट मार्केट, बैन का रिस्क, और बिजनेस समझदारी

अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और अन्य देशों को किए जाने वाले ईंधन निर्यात, जहाँ प्रीमियम मुनाफा और वैश्विक बाजार में पहचान मिलती है, रिलायंस के कारोबार की मुख्य ताकत है। सिर्फ घरेलू रिफाइनिंग इसका असली आधार नहीं है। बताया जाता है कि भारत से निर्यात किए जाने वाले रूसी कच्चे तेल (Russian crude) पर आधारित उत्पादों में लगभग आधा हिस्सा अकेले जामनगर SEZ रिफाइनरी से आता है।

इस बीच EU ने 21 जनवरी 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसी तरह अमेरिका ने भी रूस की बड़ी तेल कंपनियों जैसे लुकोइल और रोसनेफ्ट पर कड़े समय-सीमा वाले प्रतिबंध लागू किए हैं।

ऐसी स्थिति में रिलायंस का फैसला एक सक्रिय जोखिम-प्रबंधन (proactive risk mitigation) जैसा दिखता है। कंपनी पहले से तय की गई शिपमेंट्स को पूरा कर रही है, लेकिन आगे के निर्यातों के लिए वह गैर-रूसी कच्चा तेल इस्तेमाल कर रही है, ताकि पश्चिमी बाजारों तक उसकी पहुँच प्रभावित न हो और सेकेंडरी सैंक्शंस (द्वितीयक प्रतिबंध) का खतरा भी न रहे।

यह कदम किसी विचारधारा या राजनीतिक झुकाव का संकेत नहीं देता, बल्कि यह दिखाता है कि रिलायंस अपने निर्यात कारोबार को वैश्विक प्रतिबंधों से बचाकर व्यावसायिक अनुशासन और स्थिरता बनाए रखना चाहती है।

लॉन्ग टर्म रशियन डील बनाम शॉर्ट टर्म एक्सपोर्ट रियलिटी

रिलायंस ने हाल के सालों में रोसनेफ्ट के साथ प्रतिदिन 5 लाख बैरल तक रूसी कच्चा तेल खरीदने का अरबों डॉलर का लंबे समय का कॉन्ट्रैक्ट किया था, लेकिन किसी भी कॉर्पोरेट समझौते को बदलते अंतरराष्ट्रीय नियमों और प्रतिबंधों को ध्यान में रखना पड़ता है।

कंपनी अपने कॉन्ट्रैक्ट का सम्मान करते हुए अक्टूबर 2022 तक की सभी तय शिपमेंट्स उठा चुकी है और अंतिम कार्गो 12 नवंबर 2025 को लोड किया गया, जो दिखाता है कि वह नियमों का पालन करते हुए धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रही है।

सरकार के दृष्टिकोण से यह कदम किसी दबाव का नहीं, बल्कि व्यावहारिकता का संकेत है, भारत रूस पर अपनी नीति अचानक नहीं बदल रहा, बल्कि उद्योगों को इतना समय दे रहा है कि वे नए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लागू होने से पहले अपने व्यापार मॉडल को एडजस्ट कर सकें।

इसी बीच मोदी सरकार दीर्घकालिक ऊर्जा समझौतों के माध्यम से रूस के साथ रणनीतिक स्थिरता बनाए रखती है, जबकि निजी कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों और वैश्विक दबाव के अनुसार निर्यात-आधारित रणनीतियाँ अपनाने की स्वतंत्रता मिलती है।

भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध लेन-देन से आगे बढ़कर संरचनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं, जैसे रोसनेफ्ट का नायरा एनर्जी की वडिनार रिफाइनरी में 49% से अधिक हिस्सा, भारतीय PSUs का वैनकोरनेफ्ट, तास-यूर्याख और सखालिन-1 परियोजनाओं में मजबूत निवेश। इसलिए भले ही रिलायंस जैसी कंपनियाँ प्रतिबंधों और बाजार की स्थितियों को देखते हुए अपनी खरीद रणनीति बदलें, भारत–रूस के दीर्घकालिक ऊर्जा रिश्ते मजबूत और स्थिर बने रहते हैं।

एनर्जी सिक्योरिटी, डोमेस्टिक बनाम एक्सपोर्ट स्ट्रैटेजी और भारत सरकार की भूमिका

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रोक केवल रिलायंस की निर्यात-केन्द्रित जामनगर SEZ रिफाइनरी पर लागू होती है, न कि उसकी घरेलू रिफाइनिंग यूनिट्स पर। इसका मतलब है कि कंपनी दोहरी रणनीति अपना रही है।

घरेलू सप्लाई चेन अभी भी अलग-अलग तरह के कच्चे तेल, जिसमें रूसी तेल भी शामिल है (घरेलू टैरिफ नियमों के अनुसार), का उपयोग कर सकती है, जबकि निर्यात के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा तेल अब गैर-रूसी स्रोतों से लिया जाएगा ताकि पश्चिमी देशों के बाजार खुले रहें।

सरकार के नज़रिए से यह रणनीति पूरी तरह समझदारी भरी है, क्योंकि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कोई जोखिम नहीं आता और साथ ही निजी रिफाइनर सस्ते रूसी तेल का फायदा तब तक उठा सकते हैं, जब तक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं।

इस दृष्टि से मोदी सरकार की नीति किसी दबाव में झुकने के बजाय भारतीय कंपनियों को जोखिम प्रबंधन की स्वतंत्रता देती हुई दिखाई देती है, ताकि वे देश के आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीतियाँ तय कर सकें।

स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी बनाए रखना: घरेलू सप्लायर, प्राइसिंग और ग्लोबल अलाइनमेंट

जो आलोचक यह कहते हैं कि भारत अमेरिका के दबाव में झुक गया, वे स्थिति को बहुत सरल बनाकर देख रहे हैं। असल में यह प्रतिबंध लागू होने से पहले एक बड़े निजी उद्योग द्वारा किया गया बाजार आधारित फैसला है, न कि भारत सरकार द्वारा रूसी तेल पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा।

मोदी सरकार ने न तो यह वादा किया है कि भारत रूसी तेल का उपयोग बंद कर देगा, न ही सरकारी तेल कंपनियों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है और न ही अपनी स्वतंत्र विदेश नीति में कोई बदलाव किया है।

सरकार रिलायंस को अपनी व्यापारिक रणनीति बदलने की अनुमति देकर उच्च-मूल्य वाले ईंधन बाजारों की सुरक्षा करती है, निर्यातकों को बचाती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखती है।

घरेलू स्तर पर भी सस्ते रूसी तेल का फायदा भारत को मिला है, जिससे रिफाइनरियों की लागत कम हुई, ईंधन की कीमतें स्थिर रहीं और आम उपभोक्ताओं व अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ हुआ। इस संदर्भ में देखें तो मोदी सरकार का कदम दबाव में झुकने के बजाय व्यावसायिक समझदारी और वैश्विक संतुलन दोनों को साधने जैसा है।

बिजनेस की जरूरतें, ग्लोबल मार्केट और भारत की कॉम्पिटिटिव बढ़त

रिलायंस के फैसले को समझते समय वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि जामनगर कॉम्प्लेक्स दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग सुविधा है और उसके निर्यात कारोबार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है।

अगर वह निर्यात किए जाने वाले ईंधन में रूसी कच्चे तेल का उपयोग जारी रखता, तो पश्चिमी प्रतिबंध उसकी बाजार तक पहुँच को खतरे में डाल सकते थे। कंपनी ने अपने बयान में बताया कि यह बदलाव EU की समय-सीमा से पहले पूरा कर लिया गया, जो बाहरी दबावों के बीच उसकी ऑपरेशनल अनुशासन को दिखाता है।

मोदी सरकार के नज़रिए से इस बदलाव को नियामक स्पष्टता, उद्योग के साथ तालमेल और सावधानीपूर्ण कूटनीति के माध्यम से समर्थन देना किसी अधीनता का नहीं, बल्कि व्यवसाय-हितैषी शासन संस्कृति का संकेत है। भारत आज भी विदेशी निवेश आकर्षित कर रहा है और यह दिखाना कि भारतीय कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के जोखिम को समझदारी से संभाल सकती हैं, देश की वैश्विक साख को और मजबूत बनाता है।

यह कदम भारत-रूस संबंधों को कमजोर क्यों नहीं करता

यह समझना जरूरी है कि रिलायंस का यह बदलाव रूस के साथ किसी रणनीतिक दूरी का संकेत नहीं देता। कंपनी के दीर्घकालिक समझौते अब भी जारी हैं और भारत की कुल रूसी तेल खरीद भी अभी काफी बड़ी मात्रा में बनी हुई है।

मोदी सरकार ऊर्जा, रक्षा और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में रूस के साथ अपने संबंध सामान्य रूप से जारी रखे हुए है। यानी यह कोई विदेश नीति का अचानक बदला हुआ रुख नहीं, बल्कि एक खास निर्यात खंड में उद्योग द्वारा किया गया रणनीतिक समायोजन है।

इस दृष्टि से सरकार की प्रतिक्रिया पूरी तरह तार्किक लगती है, वह निजी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के हिसाब से खुद को ढालने देती है, जबकि रूस के साथ व्यापक रणनीतिक संबंध भी बनाए रखती है। भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति और आर्थिक हित इसी दोहरी रणनीति में फिट बैठते हैं, जहाँ जरूरत हो वहाँ वैश्विक तालमेल और जहाँ संभव हो वहाँ स्वतंत्रता।

बड़ी तस्वीर: घरेलू वैल्यू चेन को सपोर्ट करना, एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई को बचाना

रूसी कच्चे तेल में किए गए इस बदलाव से सिर्फ खरीद प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि भारत की घरेलू वैल्यू चेन को भी फायदा मिलता है। अगर जामनगर रिफाइनरी अपनी निर्यात क्षमता में दुनिया में शीर्ष पर बनी रहती है, तो भारत का डाउनस्ट्रीम सेक्टर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत रहेगा, विदेशी मुद्रा कमाता रहेगा और उच्च-मूल्य वाली नौकरियों की सुरक्षा भी होगी।

इस निरंतरता की अनुमति देकर मोदी सरकार देश की औद्योगिक रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा दोनों की रक्षा कर रही है। वहीं, निर्यात यूनिट में रूसी कच्चे तेल से दूरी बनाकर रिलायंस उन सेकेंडरी प्रतिबंधों या बाजार से बाहर किए जाने के जोखिम से भी बच जाता है, जो उसके भविष्य के पेट्रोकेमिकल, नवीकरणीय ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय निवेश योजनाओं को नुकसान पहुँचा सकते थे। कुल मिलाकर, यह कदम न सिर्फ रिलायंस जैसे वैश्विक भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गजों को सुरक्षित करता है बल्कि भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूत बनाता है।

निष्कर्ष

आखिर में, रिलायंस की निर्यात-केन्द्रित रिफाइनरी द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात बंद करने का फैसला किसी बाहरी दबाव में लिया गया कदम नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक रणनीति है, जिसे सरकार ने इसलिए संभव बनाया क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, निर्यात बाजारों, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा इन सभी के बीच संतुलन को समझती है।

मोदी सरकार ने रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को जारी रखा है, उसने न तो कोई सार्वजनिक तौर पर झुकाव दिखाया और न ही रूसी तेल पर पूरी तरह रोक लगाने जैसी कोई बाध्यता थोप दी।

इसके बजाय सरकार ने भारत की सबसे बड़ी निजी ऊर्जा कंपनी को बदलते वैश्विक माहौल में समझदारी से कदम उठाने की स्वतंत्रता दी, ताकि देश की निर्यात आय, रिफाइनिंग मार्जिन और पूरी  उत्पाद को बेचने की प्रक्रिया  सुरक्षित रहे।

वास्तविक तथ्य यह दिखाते हैं कि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का परिणाम है, जो आर्थिक वास्तविकताओं और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप काम कर रही है, भले ही कुछ आलोचक इसे कूटनीतिक झुकाव बताने की कोशिश करें। ऐसे अनिश्चित समय में जब सप्लाई चेन बाधित हैं, प्रतिबंध बढ़ रहे हैं और वैश्विक गठबंधन बदल रहे हैं, यही संतुलित और व्यावहारिक रणनीति भारत के लिए सबसे उपयुक्त है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है, उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य: जानें- क्यों विरोध में मुस्लिम संगठन, क्या होंगे फायदे

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।

इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।

प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।

इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें:

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।

मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।

बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।

मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।

इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।

इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।

दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।

वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।

इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।

उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

क्या इसीलिए UAPA का विरोध करती थी कश्मीर टाइम्स की एडिटर आभा भसीन? SIA की छापेमारी में हथियारों की बरामदगी: अब देश विरोधी गतिविधियों में दर्ज हुआ केस

19 नवंबर को जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने कश्मीर टाइम्स के जम्मू कार्यालय पर छापा मारा। यह कार्रवाई आतंकी फंडिंग, ‘राष्ट्रविरोधी’, जिहादी विचारधारा को बढ़ावा देने और ‘अलगाववादी गतिविधियों’ की जाँच के तहत की गई।

इसके बाद कश्मीर टाइम्स से जुड़े लोगों समेत एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन के खिलाफ कठोर गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम- UAPA के तहत FIR दर्ज की है।

अधिकारियों के अनुसार, दर्ज FIR में अनुराधा पर आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था। ऑफिस की तलाशी के दौरान एक रिवॉल्वर, खाली और भरी हुई AK-सीरीज की गोलियाँ, चली हुई गोलियाँ, संदिग्ध पिस्तौल कारतूस, ग्रेनेड के सेफ्टी लीवर, डिजिटल उपकरण और दस्तावेज बरामद किए गए।

कश्मीर टाइम्स की मैनेजिंग एडिटर अनुराधा भसीन ने इसे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने, बदनाम करने और चुप कराने की कोशिश’ बताया। यह अखबार 1954 में उनके पिता वेद भसीन ने स्थापित किया था। 2021-22 में लगातार निशाना बनाए जाने के बाद इसका प्रिंट संस्करण बंद कर दिया गया।

अनुराधा भसीन और कश्मीर टाइम्स पर आरोप है कि वे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ के नाम पर एंटी इंडिया प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार वेद भसीन द्वारा स्थापित और अब उनकी बेटी अनुराधा भसीन की ओर से चलाया जा रहा यह अखबार पहले भी विवादों में रहा है। 2020 में इसका श्रीनगर कार्यालय सील कर दिया गया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने कश्मीर टाइम्स को दो संपत्तियाँ आवंटित की थीं। एक कार्यालय के लिए और दूसरी वेद भसीन के निवास के लिए। 2015 में वेद भसीन की मृत्यु के बाद प्रशासन ने परिवार को आवास खाली करने का नोटिस दिया। अनुराधा भसीन ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अखबार का श्रीनगर कार्यालय ‘गैरकानूनी तरीके से बंद’ कर दिया।

इसके बाद 2023 में इसका डिजिटल संस्करण शुरू किया गया। भसीन और सह-संपादक और अनुसार अनुराधा के पति प्रबोध जम्वाल ने यह आरोप खारिज किया कि अखबार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देता है या अलगाववादी नैरेटिव चलाता है। असल में, यह अखबार कश्मीर के दोनों हिस्सों (LoC से अलग हुए हिस्से) की रिपोर्टिंग करता है और पाकिस्तान-प्रशासित हिस्से पर भी सवाल उठाता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुराधा इस समय अमेरिका में हैं। SIA ने अनुराधा भसीन और उनके अखबार कश्मीर टाइम्स पर आरोप लगाया है कि वे जम्मू-कश्मीर के आसपास के इलाकों में अलगाव वादी और राष्ट्रविरोधी लोगों के साथ आपराधिक साजिश में शामिल हैं। SIA उनसे पूछताछ कर सकती है।

गौरतलब है कि 10 नवंबर को दिल्ली के लालकिले के पास हुए बड़े कार धमाके की जाँच चल रही है। इस जिहादी आतंकी हमले में 13 लोग मारे गए थे। हमले का मुख्य आरोपी डॉ. उमर-उन-नबी था, जो कट्टरपंथी डॉक्टरों और मौलवियों के ‘व्हाइट कॉलर’ मॉड्यूल का हिस्सा था। इस दौरान कश्मीर टाइम्स पर कार्रवाई हो रही है।

अधिकारियों के अनुसार यह मॉड्यूल बड़े आतंकी हमलों की योजना बना रहा था। जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कई डॉक्टरों से लगभग 3000 किलो विस्फोटक और हथियार बरामद किए गए। यह मॉड्यूल हमास की शैली में हमला करने की तैयारी कर रहा था। ऐसा ही हमला अक्टूबर 2023 में इजरायल पर हुआ था।

अनुराधा ने पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक समय बिताया है और खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ की आवाज बताती हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई फेलोशिप हासिल की हैं और कश्मीर संघर्ष पर लिखती रही हैं।

किन विवादों का हिस्सा रहीं अनुराधा भसीन

2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा कारणों से कम्यूनिकेशन (संचार) बंदी लागू की तो अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ कदम’ माना गया और इससे से भी जाहिर हुआ कि वे अलगाववादियों की भाषा बोल रही हैं।

पहलगाम हमले के बाद भसीन का तर्क दिया कि हर आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानने की घोषणा करके भारत सरकार ने युद्ध की सीमा को कम कर दिया है और पाकिस्तान को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया। भसीन का कहना था कि मोदी सरकार ‘आतंकी हमलों पर फलती-फूलती है’।

17 नवंबर 2025 को अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान-समर्थित और इस्लामी मानसिकता से भरा हुआ एक लेख लिखा। इसका शीर्षक था- ‘Inventing an Enemy Within: ‘White Collar Hate’ to Combat ‘White Collar Terror’’। इस लेख में भसीन ने तर्क दिया कि दिल्ली धमाके के बाद ‘व्हाइट कॉलर टेररिज्म’ के नाम पर सभी मुसलमानों के खिलाफ इस्लामोफोबिया फैलाया जा रहा है।

भसीन ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार दिल्ली हमले के बाद जनता के गुस्से को निकालने के लिए एक खलनायक खड़ा करना चाहती है। इसीलिए मुसलमानों और खास तौर पर पढ़े-लिखे मुसलमानों को भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है।

अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान की फौज की बड़ाई करने से नहीं थकतीं। अपने लेख में उन्होंने यह भी कहा कि भारत को पता है कि दुनिया साउथ एशिया में परमाणु टकराव नहीं चाहती। साथ ही पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को भी कम करके नहीं आँका जा सकता।

फरवरी 2024 में अनुराधा भसीन ने कारवां इंडिया का एक प्रोपेगेंडा आर्टिकल साझा किया। इसमें दावा किया गया था कि भारतीय सेना अपने नागरिकों को प्रताड़ित करती है और फिर उनकी हत्या करती है।

कश्मीर टाइम्स पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर को ‘पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू और कश्मीर’ कहता है। अपनी रिपोर्ट्स में अखबार कभी ‘PaJK’ लिखता है या फिर लिखता है, “भारत इसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहता है।”

अनुराधा भसीन अक्सर UAPA के खिलाफ आवाज उठाती हैं। वह इसे असहमति की आवाज को दबाने का हथियार कहती हैं। हालाँकि SIA की जाँच के बाद उन पर UAPA के तहत ही मामला दर्ज किया गया है। इसके बाद वामपंथी समूह अनुराधा भसीन के बचाव में उतर आया है।

US ने ईरानी तेल की तस्करी से जुड़े लोगों-कंपनियों पर लगाया बैन, चपेट में आए भारतीय भी: जानें क्या होता है शैडो फ्लीट, जिसके दम पर अमेरिकी प्रतिबंधों को ठेंगा दिखा रहा इस्लामी मुल्क

अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने हाल ही में ईरान के तेल नेटवर्क के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत उन फ्रंट कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए हैं जो ईरानी सशस्त्र बलों को कच्चे तेल की बिक्री से वित्तीय मदद पहुँचाते हैं। इनमें 17 वैश्विक कंपनियों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिनमें भारत की एक शिपिंग कंपनी भी शामिल है।

असल में यह कार्रवाई अमेरिका की ईरान के खिलाफ लगातार बढ़ती दबाव नीति का हिस्सा है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों को रोकना है। सोचने वाली बात ये है कि ईरान के साथ डील अमेरिका के लिए इतनी बड़ी चिंता का विषय क्यों है।

अमेरिका ने पिछले समय में किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए और अमेरिका व पश्चिमी देशों की चिंता क्या है, आइए इसके बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं।

अमेरिका की नई कार्रवाई के पीछे क्या है विवाद?

इजरायल के साथ हुई 12-दिन की जंग में हार के बाद ईरानी सेना अपने वार्षिक बजट को पूरा करने और कमजोर हो चुकी सेनाओं को फिर से खड़ा करने के लिए कच्चे तेल की बिक्री पर और अधिक निर्भर हो गई है।

इस कारण से अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने ईरान के ‘शैडो ऑयल नेटवर्क’ के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाए हैं। इस नेटवर्क के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में बेचता है और इससे मिलने वाली आय अपने परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करता है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस कार्रवाई पर कहा, “ये कार्रवाई अमेरिकी ट्रेजरी के उस अभियान का हिस्सा है जिसका मकसद ईरानी शासन को परमाणु हथियार विकसित करने और आतंकी संगठनों को समर्थन देने के लिए मिलने वाली फंडिंग को रोकना है। ईरानी शासन की आय को बाधित करना उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने के लिए बेहद जरूरी है।”

अमेरिका का दावा है कि ईरान के इस तेल नेटवर्क के जरिए उसके सैन्य बजट में भारी इजाफा हो रहा है। इजरायल के साथ जंग में ईरान की सेना को भारी नुकसान हुआ था जिसके लिए वह तेल बिक्री से आने वाले पैसों पर काफी अधिक निर्भर है।

इस नेटवर्क में ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ का अहम योगदान है। यह कंपनी अपने तेल को बेचने के लिए फ्रंट कंपनियों और शैडो फ्लीट यानी छिपे हुए जहाजों का इस्तेमाल करती है।

इन जहाजों के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में भेजता है, जिससे उसकी आय बढ़ती है। अमेरिका ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए अब तक 170 से ज्यादा जहाजों पर प्रतिबंध लगा चुका है।

शैडो फ्लीट क्या है?

शैडो फ्लीट को डार्क फ्लीट भी कहा जाता है। ये ऐसे टैंकरों और सहायक जहाजों का समूह है जो धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीकों पर निर्भर रहते हैं। इनका मकसद होता है प्रतिबंधित या हाई रिस्क (उच्च-जोखिम) वाले माल को इस तरह ले जाना कि उसकी असली उत्पत्ति, मालिकाना हक या पहुँचने वाली जगह का नाम छिपा रहे।

2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह नेटवर्क तेजी से बढ़ा और इसके साथ ही एक नई कैटेगरी ‘ग्रे फ्लीट’ सामने आई। इसमें वे जहाज आते हैं जिनमें रूस से जुड़े जोखिम का पता भी चलता है, लेकिन उन पर अब तक औपचारिक रूप से प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

विंडवार्ड की ग्रे फ्लीट सूची उन जहाजों को बताती है जिनके पैटर्न रूस-संबंधी गतिविधियों से जुड़े होते हैं। इसमें मालिकाना हक में बदलाव, सामान्य से हटकर व्यापारिक मार्ग, या फिर उच्च-जोखिम वाले बंदरगाहों की सूची शामिल हो सकती है।

इन जहाजों को यूँ ही असुरक्षित नहीं माना जाता, बल्कि सूची में शामिल होने का मतलब है कि इनके साथ व्यापार करने से पहले अतिरिक्त जाँच, दस्तावेजों की पुष्टि और सावधानी बरतनी जरूरी है।

ग्रे फ्लीट में शामिल होना एक गतिशील मॉडलिंग प्रक्रिया है जो जहाजों के व्यवहार पर आधारित होती है, न कि किसी कानूनी निर्णय पर। यह समय के साथ बदलती रहती है- जैसे-जैसे जहाजों का मालिकाना हक बदलता है, उनके व्यापारिक पैटर्न में भी बदलाव आता है और नए जोखिम संकेत सामने आते हैं।

शैडो फ्लीट किस तरह काम करता है?

शैडो फ्लीट में काम करने वाले जहाज अक्सर ऑटोमैटिक आईडंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) ट्रांसपोंडर को बंद कर देते हैं (AIS-off), जिससे उनकी लोकेशन और गतिविधि छुप जाती है। इस धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीके के तहत जब AIS बंद होता है तो जहाज ट्रैकिंग या रडार से गायब हो जाते हैं। इससे पोर्ट अथॉरिटी भी उन्हें आसानी से ढूंढ नहीं सकती।​

इसके अलावा अधिकतर शैडो फ्लीट में पुराने, रिटायर्ड या स्क्रैप के लिए नामित टैंकरों को नई-नई शेल कंपनियों के नाम पर खरीद लिया जाता है। इनकी मालिकाना जानकारी बदल दी जाती है या फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। ये अक्सर कमजोर रेगुलेशन वाले देशों जैसे पनामा, कुक आइलैंड्स, लाइबेरिया, आदि के झंडे (फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस- flag of convenience) का इस्तेमाल करते हैं। एक ही जहाज बार-बार देश का झंडा बदल देता है, जिससे उसकी पहचान छुप जाती है।​

ये जहाज अफ्रीका, मिडिल ईस्ट या साउथ अमेरिका जैसे देशों के दूर- दराज इलाकों में एक दूसरे जहाज से माल लेते हैं। इसका मकसद होता है कागजों में ‘ऑरिजिन’ छुपाना ताकि माल का पता न चले कि वह ईरान, रूस या किसी और बैन वाले देश से आया है। यह प्रक्रिया भी कई बार AIS बंद करके की जाती है।​

इसके अलावा शैडो फ्लीट के तहत डॉक्यूमेंटेशन और पेपरवर्क में हेरफेर कर के भी माल को गंतव्य तक पहुँचाया जाता है। ऐसा दाखिल- खारिज, फर्जी रूट दिखाना, प्रमाणीकरण में जालसाजी और ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड को बदलकर किया जाता है ताकि इंश्योरर या बैंक को मालूम न हो कि तस्करी हो रही है।​

पहचान छुपाने के अन्य तरीकों में GNSS या GPS लोकेशन को स्पूफ करना, फर्जी IMO नंबर या MMSI नंबर बनाना और ‘जॉम्बी’ जहाजों की पहचान अपनाना यानी पुराने-रिटायर्ड जहाजों की एन्ट्री फिर शुरू करना शामिल होता है।

शैडो फ्लीट में अधिकतर जहाज 20-30 साल पुराने होते हैं, जो आमतौर पर पश्चिमी बेड़े से रिटायर हो चुके होते हैं। इनकी तकनीकी हालत खराब होती है, रखरखाव कम होता है, और पर्यावरणीय खतरे जैसे तेल रिसाव या दुर्घटनाएं बहुत बढ़ जाती हैं।​

ऐसा ज्यादातर इसलिए होता है कि इन जहाजों का कोई भरोसेमंद इंश्योरेंस नहीं होता। पारंपरिक इंश्योरेंस कंपनियां इन्हें कवर ही नहीं करती हैं। अगर हादसा या दुर्घटना हो जाती है तो इंटरनेशनल अथॉरिटीज के लिए नुकसान की भरपाई बहुत मुश्किल हो जाती है।​

इनमें कमजोर टेक्नीकल निगरानी, खराब मेंटेनेंस, और अफसरों की सुरक्षा जोखिम बहुत अधिक होती है।​ इसमें आर्थिक और सुरक्षा खतरे भी हैं। यह पूरी प्रक्रिया न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की अवहेलना है बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कानूनी व व्यापारिक व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा पैदा करती है।​

इसके अलावा ब्याज, इंश्योरेंस और डॉक्युमेंटेशन फर्जी होने की वजह से बैंकों, ट्रेडर्स और देशों को अप्रत्याशित कानूनी और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।​

भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध क्यों लगा?

अमेरिका ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को भारत के दो कारोबारियों और उनकी कंपनियों जैर हुसैन और जुल्फिकार हुसैन के साथ उनकी कंपनी ‘RN Ship Management Private Limited’ को भी प्रतिबंधित किया है। यह कंपनी ईरान की सेपेहर एनर्जी जहान के लिए कई जहाजों का ऑपरेशन करती थी, जिनमें से एक जहाज ‘SOBAR’ भी था।

अमेरिका का आरोप है कि यह कंपनी ईरान के तेल नेटवर्क को सपोर्ट कर रही थी, जिससे ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड मिल रहा था। इसलिए अमेरिका ने इस कंपनी और उसके नेताओं पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।

इसके अलावा, यूएई, पनामा, ग्रीस, जर्मनी और बल्गेरिया की कई कंपनियों और व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें Luan Bird Shipping Service L.L.C, Mars Investment L.L.C, Loire Shipping Inc., Altomare S.A., Moon Line Plastics and Raw Materials Trading L.L.C, Alsafeenah Althahabya Ship and Boats Spare Parts and Components Trading L.L.C, BPT Berlin Petroleum Trading GmbH, Shandong Independent Energy Trading DMCC शामिल हैं।

अमेरिका के प्रतिबंधों में कई व्यक्तियों के नाभी शामिल हैं। इनमें Hamidreza Heidari, Mohammad Moloudi, Kaveh Rostami Zahabi, Ahmad Ghaedi, Sayyed Mojtaba Hosseini, और Penka Ivanova Madzharska का नाम लिखा है। ये सभी ईरान के तेल नेटवर्क के लिए फ्रंट कंपनियों, जहाजों और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के जरिए आय जुटाने में मदद कर रहे थे।

अब तक किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए?

अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें कुछ कंपनियाँ इस तरह हैं:

  • ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ और उसकी फ्रंट कंपनियाँ।
  • ईरान की एयरलाइन ‘महान एयर’ और उसकी सब्सिडियरी ‘याजद इंटरनेशनल एयरवेज कंपनी’। यह एयरलाइन ईरान के आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाती थी।
  • ईरान के तेल नेटवर्क से जुड़ी कई शिपिंग कंपनियाँ और जहाज।
  • ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कई वैज्ञानिक और तकनीकी कंपनियाँ।

ट्रंप प्रशासन अब तक 170 से अधिक जहाजों को प्रतिबंधित कर चुका है। फरवरी और मई 2025 में भी कई कंपनियों और जहाजों को ब्लैकलिस्ट किया गया था। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।

ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट से अमेरिका और पश्चिमी देशों को चिंता क्यों है?

ईरान अपने परमाणु प्रोजेक्ट को हमेशा से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बताता आया है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ ऊर्जा उत्पादन और मेडिकल रिसर्च के लिए है। ईरान ने कई बार दावा किया है कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा है और उसका लक्ष्य सिर्फ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है।

हालाँकि, अमेरिका और पश्चिमी देशों को ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट पर भरोसा नहीं है। उनका दावा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के जरिए परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों को चिंता है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकता है। ईरान पहले से ही लेबनान के हिज्बुल्लाह, यमन के हूती विद्रोहियों और सीरिया में असद सरकार को समर्थन देता है। परमाणु हथियार मिलने पर इन समूहों की ताकत और बढ़ सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को बड़ी समस्या का सामना करना होगा।

अमेरिका का मानना है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह न केवल अपने पड़ोसी देशों के लिए खतरा बन जाएगा, बल्कि पूरे विश्व के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है।

इसके अलावा, अमेरिका को यह भी चिंता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से मिलने वाली तकनीक और ज्ञान का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए कर सकता है। इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगा रहे हैं।

इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके। इसके अलावा, अमेरिका ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश कर रहा है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके।

ट्रंप प्रशासन की रणनीति में ईरान को रोकने के लिए क्या है?

ट्रंप प्रशासन ने ईरान को रोकने के लिए ‘मैक्सिमम प्रेशर’ यानी दवाब नीति अपनाई है। इस नीति के तहत अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।

अमेरिका ने अपने सहयोगियों से भी ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की अपील की है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अगर दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट हो जाएँ तो ईरान को रोका जा सकता है।

ट्रंप प्रशासन ने ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश की है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश की है।

इस विवाद का असर केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत जैसी कंपनियाँ भी प्रभावित होती हैं जिन्हें ईरान से जुड़ी गतिविधियों के कारण प्रतिबंध झेलना पड़ता है। तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ती है क्योंकि ईरान दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। इसके अलावा प्रतिबंध से मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है जिससे वैश्विक शांति और सुरक्षा को खतरा होता है।

निष्कर्ष

ईरान के साथ तेल डील करने वाली कंपनियों पर अमेरिका के प्रतिबंध इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से पूरे विश्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए वह ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए लगातार प्रतिबंध लगा रहा है। ट्रंप प्रशासन का भले ही मानना हो कि दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट होकर उसे रोक सकते हैं, लेकिन अभी तक यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

दुख-दर्द-पीड़ा… माड़वी हिड़मा के एनकाउंटर से The Wire का सब निकला बाहर, लाल आतंकी को वामपंथी पोर्टल बताने में जुटा ‘आदिवासियों का Hero’

भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा को आखिरकार सोमवार (18 नवंबर 2025) को ढेर कर गिया गया। उसे आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले के मारेडुमिल्ली जंगल में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया। उसके साथ उसकी पत्नी मड़कम राजे (राजक्का) और चार अन्य माओवादी भी मारे गए।

हिड़मा पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कुल 1 करोड़ रुपए से ज्यादा का इनाम घोषित किया था। वह माओवादी संगठन की सेंट्रल कमिटी का सबसे युवा सदस्य था और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (DKSZC) का सचिव भी बना दिया गया था। पिछले दो दशकों में उसने 26 बड़े हमलों की कमान संभाली, जिनमें सैकड़ों सुरक्षा बलों के जवान और निर्दोष आदिवासियों की मौतें हुई।

लेकिन वामपंथी प्रोपेगैंडा मशीन के रूप में कुख्यात वेबसाइट ‘द वायर हिंदी’ ने हिड़मा की मौत पर गुरुवार (20 नवंबर 2025) को एक आर्टिकल पब्लिश किया, जिसकी हेडलाइन थी- “मोस्ट वांटेड या आदिवासी नायक? माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा के अंतिम संस्कार के लिए उमड़े लोग”। इस आर्टिकल में हिड़मा को पुलिस दस्तावेजों में ‘मोस्ट वांटेड नक्सली’ बताने के बावजूद उसे ‘आम लोगों के लिए हीरो’ करार दिया गया, जिसने ‘जल-जंगल-जमीन के लिए हथियार उठाया था’।

इस आर्टिकल में ग्रामीणों के वायरल वीडियो, सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान जैसे विवादित एक्टिविस्ट्स के बयान छापकर यह नैरेटिव बनाया गया कि हिड़मा कोई आतंकवादी नहीं, बल्कि आदिवासियों का रक्षक था और उसकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई।

यह लेख न सिर्फ तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बल्कि एक खूंखार हत्यारे को महिमामंडित करने की घिनौनी कोशिश है। आइए, द वायर के इस लेख के हर दावे को तथ्यों की कसौटी पर कसते हैं और देखते हैं कि द वायर जैसा वामपंथी संस्थान कैसे लाल आतंक को ग्लैमराइज कर रहा है।

हिड़मा कोई ‘नायक’ नहीं बल्कि एक क्रूर हत्यारा था

द वायर का आर्टिकल हिड़मा को “आदिवासियों का हीरो” बताता है, जो जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ा। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवर्ती गाँव का रहने वाला एक अनपढ़ (केवल सातवीं तक पढ़ा) युवक था, जो 1994-95 में महज 17 साल की उम्र में माओवादी संगठन में शामिल हो गया। वह माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर था। उसकी बटालियन माओवादियों की सबसे क्रूर और हथियारबंद इकाई मानी जाती है।

हिड़मा पर आरोप है कि उसने कम से कम 26 बड़े हमलों की कमान संभाली या उनमें प्रमुख भूमिका निभाई। इसमें से कुछ बड़े हमलों के बारे में जान लीजिए-

दंतेवाड़ा (ताड़मेटला) हमला: माओवादियों ने 6 अप्रैल 2010 को घात लगाकर CRPF की 76 जवानों की जान ले ली। यह भारत में माओवादी हिंसा का सबसे बड़ा हमला था। हिड़मा की बटालियन ने इसे अंजाम दिया था।

झीरम घाटी हमला 2013: कॉन्ग्रेस की परिवर्तन रैली पर लाल आतंकियों ने हमला किया था। उस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 27 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले से कॉन्ग्रेस का लगभग पूरा राज्य नेतृत्व ही साफ हो गया था। कुख्यात नक्सल आतंकी हिड़मा ही इसका मास्टरमाइंड था।

सुकमा में साल 2017 में 2 हमले: हिड़मा के नेतृत्व में वामपंथी आतंकियों ने अप्रैल 2017 में सीआरपीएफ की टीम पर हमला किया था, जिसमें 25 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई थी। वहीं, मार्च 2017 के हमले में 12 जवानों को वीरगति मिली थी।

सुकमा-बीजापुर हमला 2021: वामपंथी आतंकियों के इस हमले में 22 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई।

इनके अलावा दर्जनों छोटे-बड़े हमले, वसूली, आदिवासियों को ‘पुलिस मुखबिर’ बताकर मारना, गाँवों को जलाना… यह सब हिड़मा का ‘कारनामा’ था। वह विरोधी आदिवासियों को क्रूरता से मारता था, महिलाओं का अपहरण करता था और जंगलों में अपना साम्राज्य चलाता था। क्या यही ‘जल-जंगल-जमीन’ की लड़ाई है? यह तो शुद्ध आतंकवाद है, जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आदिवासी ही हुए हैं।

हिड़मा की माँ ने कुछ दिन पहले ही उससे सरेंडर करने की अपील की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर अंत तक उसे खत्म करने की डेडलाइन दी थी। लेकिन हिड़मा ने सरेंडर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उसे हथियारों की ताकत पर ही भरोसा था। ऐसे में वो आँध्र की ओर भाग गया, जहाँ नक्सलियों के अन्य सुरक्षित ठिकाने हैं, लेकिन सुरक्षा बलों ने उसे ढेर कर दिया।

लाल आतंकियों के पक्ष में फेक नैरिटव चला रहा है द वायर

द वायर का लेख पूरी तरह एकतरफा है। इसे इन बातों से समझ सकते हैं-

जिस गाँव में हिड़मा दशकों से नहीं आया, उसे दिखाया शोकग्रस्त: ग्रामीणों के वीडियो दिखाकर कहा गया कि पूरा गाँव शोक मना रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा ने दशकों से गाँव में कदम नहीं रखा था। वह डर के कारण गाँव नहीं आता था, क्योंकि उसके अपने ही इलाके में कई आदिवासी उसके खिलाफ थे। जो वीडियो वायरल हैं, उनमें कुछ महिलाएँ और बच्चे रो रहे हैं। ये दृष्य हर किसी के लिए स्वाभाविक है। जाहिर सी बात है कि जो भी मरा, वो भी किसी का बेटा, किसी का भाई और किसी का पति था ही न… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा बस्तर उसे हीरो मानता है।

बस्तर के आईजी पी. सुंदरराज ने साफ कहा था, “शव के साथ बेसिक इंसानियत बरती जाएगी, लेकिन इसे शहीद समारोह नहीं बनने देंगे।” इसलिए इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात थे, मोबाइल नेटवर्क बंद था। ऐसे में कौन खुलकर बोलता? जो लोग वीडियो में बोल रहे हैं, वे भी डर के मारे या पार्टी के दबाव में बोल रहे हैं। यही माओवादी स्टाइल है, जिसमें डर का राज चलाकर उसे ‘जन समर्थन’ बताया जाता है।

सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान के बयान: सोनी सोरी खुद कई मामलों में आरोपी रही है और माओवादियों से कथित संबंधों के लिए जेल जा चुकी है। वह फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाती है, लेकिन कोई सबूत नहीं। चौहान भी ह्यूमन राइट्स के नाम पर माओवादियों का पक्ष लेते रहे हैं।

फर्जी मुठभेड़ का आरोप: लेख में कहा गया कि हिड़मा के साथ हमेशा सैकड़ों गार्ड रहते थे, तो सिर्फ 6 लोग कैसे मारे गए? सच्चाई यह है कि पिछले सालों में सुरक्षा बलों के लगातार ऑपरेशन से माओवादी संगठन कमजोर हो चुका है। हिड़मा भागते-भागते सिर्फ 5 लोगों के साथ रह गया था। मुठभेड़ में AK-47, डेटोनेटर और हथियार बरामद हुए। आंध्र प्रदेश पुलिस और छत्तीसगढ़ पुलिस ने साफ कहा कि यह असली मुठभेड़ थी।

द वायर ने हिड़मा के अपराधों को सिर्फ अंत में एक पैराग्राफ में डालकर कमतर दिखाया, जबकि पूरा लेख उसे ‘नायक’ बनाने में लगा है। यह स्पष्ट प्रोपेगैंडा है।

दिल्ली बैठकर माओवादियों की वकालत करती है लेखिका संतोषी मरकाम

यह लेख संतोषी मरकाम ने लिखा है। संतोषी द वायर हिंदी की नियमित लेखिका हैं, जो दिल्ली में बैठकर बस्तर, छत्तीसगढ़ और आदिवासी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करती हैं। उनके अधिकतर लेख आदिवासी अधिकारों, बंधुआ मजदूरी, मनरेगा और माओवादी प्रभावित इलाकों पर होते हैं। लेकिन इनमें हमेशा एक पैटर्न दिखता है – सरकार और सुरक्षा बलों को विलेन दिखाना, जबकि माओवादियों या उनके समर्थकों को पीड़ित या ‘संघर्ष करने वाला’ बताना। मुद्दा कोई भी हो, विलेन तो सरकार ही होनी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर इन बिंदुओं को देख सकते हैं-

वह बँधुआ मजदूरी पर लेख लिखती हैं, जहाँ छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को हरियाणा या जम्मू में फँसाया जाता है-यह सही मुद्दा है, लेकिन समाधान में कभी माओवादियों की भूमिका नहीं बताती, जो इन इलाकों में विकास नहीं होने देते।

आदिवासी संस्कृति पर लेख लिखती है, लेकिन मुख्यधारा की शिक्षा को आदिवासी संस्कृति के लिए खतरा बता देती है। जबकि आँकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों को नक्सलियों से मुक्त कराया गया, उनका तेजी से विकास हुआ।

माओवादी इलाकों में माइनिंग के खिलाफ लेख, जहाँ कॉर्पोरेट और सरकार को दोषी ठहराती हैं, लेकिन माओवादियों द्वारा माइनिंग रोकने के लिए की जाने वाली हिंसा पर चुप्पी साध लेती है।

संतोषी कभी ग्राउंड पर जाकर दोनों पक्षों की बात नहीं करतीं। वह चुनिंदा एक्टिविस्ट्स (जैसे सोनी सोरी) से बात करके अपनी पूर्वाग्रही राय को ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ का नाम दे देती हैं। यह दिल्ली से बैठकर ‘अर्बन नक्सल’ स्टाइल की पत्रकारिता है, जहाँ तथ्यों को तोड़-मरोड़कर वामपंथी नैरेटिव चलाया जाता है।

यहाँ से वो बैठे कर ये बता देती है कि नक्सलियों के संगठन में क्या चल रहा है और नक्सली अभी हथियार नहीं डाल रहे हैं। संतोषी की पकड़ तो देखिए, वो दिल्ली में बैठकर नक्सलियों की केंद्रीय और क्षेत्रीय कमेटियों के पदाधिकारियों के नाम भी बता रही है और चर्चित नक्सली प्रवक्ता ‘अभय’ के हथियार छोड़ने के प्रस्ताव को खारिज करने वाली रिपोर्ट लिखती है। इसमें रेफरेंस किन लोगों के होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

अर्बन नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना है द वायर

द वायर शुरू से ही वामपंथी प्रोपेगैंडा का केंद्र रहा है। इसके फाउंडर एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन की पत्नी नंदिनी सुंदर खुद माओवादियों से सहानुभूति रखने के लिए जानी जाती हैं। द वायर के कई लेखक और कॉलमिस्ट खुले तौर पर माओवादियों का बचाव करते हैं, फर्जी मुठभेड़ के आरोप लगाते हैं और सुरक्षा बलों को बदनाम करते हैं।

ऑपइंडिया ने द वायर के प्रोपेगेंडा को कई बार बेनकाब किया है। जैसे-

यह सब जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क का हिस्सा है, जो भारत में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं।

लाल आतंक का सफाया जरूरी

हिड़मा की मौत माओवाद के लिए अंतिम कील साबित होगी। मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य अब करीब है। लेकिन द वायर जैसे पोर्टल और उनके लेखक अभी भी लाल आतंक को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे प्रोपेगैंडा को पहचानना और उसका मुंहतोड़ जवाब देना हर देशभक्त का कर्तव्य है। चूँकि हिड़मा कोई हीरो नहीं बल्कि वो सैकड़ों मासूमों की जान लेने वाला खूँखार हत्यारा था, जिसने जनआंदोलन की चादर ओढ़ रही थी। ऐसे में उसके खात्मे से बस्तर में शांति की राह खुलेगी।