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‘सरकार बदली तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी’: हिंसा के बाद बरेली की शांत फिजाओं में सुलग रही चिंगारी, जानें ऑपइंडिया के कैमरे पर क्या बोले इस्लामी कट्टरपंथी?

26 सितंबर की दोपहर 2 बजे से बरेली शहर ‘आई लव मुहम्मद’ के नारों से गूंज उठा, दोपहर की नमाज पढ़कर निकले मुसलमानों की भीड़ को पुलिस बार बार घर जाने के लिए कहती रही लेकिन भीड़ के मंसूबे अलग थे। कहीं भड़काऊ नारे थे, तो कहीं जहन में नफरत।

कुछ के हाथों में आइ लव मुहम्मद की तख्तियाँ थीं तो अधिकतर के हाथों मे पत्थर, लाठी-डंडे और पेट्रोल बम थे। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा ने इसलामिया ग्राउंड मे एकत्रित होने के लिए कहा था। प्रशासन का सीधा आदेश था कि, बिना इजाज़त के कोई भी भीड़ इकट्ठा नहीं हो सकती है।

भीड़ फिर भी मानने को तैयार नहीं थी। जब भीड़ को पुलिस ने रोकने की कोशिश की 12 से 22 साल के GenZ मुस्लिम लड़कों ने पथराव शुरू कर दिया। एक FIR में इस बात का भी जिक्र है कि पुलिसवालों के सामने मुस्लिम लड़कों ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे भी लगाए थे। फिर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बरेली पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था।

इस घटना को करीब तीन दिन हो गए हैं। मुस्लिमों के मन मे क्या है, उनके मुहल्लों में किस तरह की चर्चा चल रही है और हिन्दू इस घटना को कैसे देखते हैं यह समझने के लिए मैंने ग्राउंड पर जाने का निश्चय किया।

रविवार के दिन दोपहर 1 बजे मैं बरेली के सबसे व्यस्ततम चौराहे पर पहुँचा। यहीं पर बरेली कचहरी भी मौजूद है। चौराहे पर सन्नटा था, नाम मात्र के लोग मौजूद थे। बात चीत के क्रम में टाइल्स लगाने का काम करने वाले एक अधेड़ व्यक्ति से मेरी बात हुई।

बरेली में धर्मांतरण का गिरोह

शुरुआत मे झिझकने के बाद जब वो खुला तो उसने बताया कि उसके गाँव फैजनगर मे मुसलमान बड़ी संख्या मे हैं। यहाँ एक मदरसा है और वहाँ गुप्त रूप से धर्मांतरण का गिरोह चलता था। अभी एक महीने पहले ही बरेली पुलिस के द्वारा उस मदरसे पर छापा मारकर उसका भंडाफोड़ किया था।

पता चला था कि चौदह राज्यों से चंदा मांगकर यहाँ धर्मांतरण का काम किया जाता था। कई हिन्दू लड़के-लड़कियों और नाबालिगों का धर्मांतरण करवाया जा चुका था।इसके आगे वो बरेली मे 26 सितंबर की हुई घटना को लेकर कहा कि जहां इनकी संख्या बढ़ती है ये इसी तरह के कांड करते हैं।

मौलाना तौकीर रजा को लेकर कहा कि ये लंबे समय से इसी तरह की हरकतें करता था और इसका मन बढ़ गया था। लेकिन योगी सरकार ने अब इसको पकड़कर सही कर दिया है। अब बरेली शांत हो जाए।

इसके बाद मैं सबसे पहले उस इलाके की तरफ बढ़ा जहां 26 सितंबर को घटना हुई थी। इंटरनेट बंद होने की वजह से गूगल मैप काम नहीं कर रहा था। लोगों से रास्ता पूछने और भटकने की वजह से लगभग आधा शहर देख लिया।

इस्लामिया ग्राउंड से आँखों-देखी

बरेली पुराना शहर है। शहर के लगभग इलाकों के ज़्यादातर घरों पर इस्लामिक झंडे दिख रहे थे। हिंदुओं के इक्का दुक्का घरों पर ही कोई ऐसा निशान मौजूद था जिससे पता चले कि ये हिन्दू का घर है।

सबसे पहली जगह मिलती है। इस्लामिया ग्राउंड। इस्लामिया ग्राउंड के सामने बिहारीपुर पुलिस चौकी है। वहाँ बड़ी संख्या मे पुलिस वाले तैनात थे। ये वही जगह थी जहां आने की कोशिश उस दिन मुसलमान कर रहे थे।

गेट पर बड़ा सा ताला जड़ा हुआ था, आसपास गंदगी बिखरी थी और पुलिस वाले दोपहर की कड़ी धूप में पहरा दे रहे थे। बाहर से मैंने देखा तो एक बड़ा सा मैदान नजर आया और एक पुरानी और जर्जर इमारत जो अंग्रेजों के वक़्त से पहले के होने का सबूत देती है। उसकी झड़ रही लखौरी ईंटें अब अपनी उम्र ढल जाने का इशारा कर रही थीं।

इस मैदान के तीनों तरफ बड़ी संख्या मे मुसलमानों की घनी आबादी बसी हुई थी। चूंकि मैं केवल एक मोबाइल लेकर इस पूरे इलाके की रिकॉर्डिंग कर रहा था तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन तीन-चार 12 से 15 साल के मुस्लिम लड़के मेरे आसपास आकर खड़े हो गए। उन्होने कुछ कहा नहीं लेकिन जबतक मैं वहाँ रहा वो मेरी मोबाइल की स्क्रीन मे झाँकने की कोशिश करते रहे।

सामने मौजूद चौकी मे पुलिसवाले लंबी ड्यूटी के बाद चेहरों पर थकान लेकर भी मुस्तैदी के साथ खड़े नजर आ रहे थे। इसके बाद मैं बढ़ा उन मस्जिदों की तरफ जहां से नमाज पढ़कर उस दिन भीड़ निकली थी। रास्ते मे एक बैनर टंगा मिला जिसपर बड़े बड़े अक्षरों मे आई लव मुहम्मद लिखा हुआ था।

पहले मैंने नौमहिल्ला मस्जिद तक जाना चुना। यहाँ चीजें सामान्य दिख रही थी। आसपास बड़ी संख्या मे मुसलिम आबादी थी। कुछ एक मुसलमान अपनी खिडकियों से झांककर सड़क और पुलिस की तरफ देख रहे थे।

कुछ एक दीवारों पर ताजे पोस्टर निकाले जाने के निशान थे। मैंने गली मे बैठे एक बुजुर्ग से पूछा तो अपनी टोपी संभालते हुए कहा कि उस दिन के लाठीचार्ज के बाद लोगों ने अपनी दीवारों से खुद ही ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर हटा लिए हैं।

हालाँकि, उस गली मे घुसने वाले रास्ते पर एक एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था, जो हवा की वजह से ऐसा मुड़ गया था कि लव और मुहम्मद नहीं दिखाई दे रहा था, बचा हुआ था सिर्फ आई!

मुझे याद था कि दंगे भड़काने वाला मौलाना तौकीर रजा, बरेलवी मसलक के सबसे बड़े नामों मे एक आला हजरत खानदान से आता है। वही आला हजरत जिनके नाम पर बरेली की ये एक बड़ी मस्जिद कायम है।

यहाँ से जब मैं आला हजरत मस्जिद की तरफ जाने के लिए पैदल निकाल पड़ा। रास्ते मे शटर गिराए बैठे लोग गले मे आईकार्ड देखकर ये अंदाजा लगा पा रहे थे कि मैं पत्रकार हूँ और शायद बाहर से आया हूँ। मस्जिद के करीब पहुँचते हुए एक ठेले वाले से मैंने पूछा कि उस दिन यहीं पर बवाल हुआ था?

उसने घूरकर मेरी तरफ देखा और फिर नजरें फेर ली। मैंने दुबारा ज़ोर देकर पूछा तो उसने कहा कि मैं शहर मे नया आया हूँ। वैसे, आजतक देश के जिस भी हिस्से मे किसी भी इलाके में मैंने रिपोर्टिंग की है तो अधिकतर मुसलमान जवाब न देने के लिए यही बात कहते नजर आए हैं।

ख़ैर, मैं अगले पाँच मिनट मे मस्जिद के गेट पर था। जहाँ एक 18 से 20 साल का लड़का बैठा हुआ था। आसपास कुछ पुलिसवाले कुर्सी लगाकर बैठे हुए थे। मस्जिद के दो एंटरेंस के रास्ते थे। सड़क की तरफ खुलने वाले स्टील के दरवाजे पर तीन पोस्टर लगे हुए थे। सभी मे दो बातें लिखी थीं। पहली ‘आई लव मुहम्मद’ और दूसरी ‘मैं, मेरे मा बाप, मेरी आल, सब आप पर कुर्बान या रसूल अल्लाह’।

मस्जिद आला हजरत पर लगा पोस्टर

घूमते हुये जब मैं जब मस्जिद के दूसरे दरवाजे पर पहुँचा तो शाम के 4 बजकर 40 मिनट का वक़्त हो चला था। कुछ बुजुर्ग नमाज़ी आना शुरू हो गए थे। मस्जिद से बुलाने का ऐलान हो चुका था। इस दरवाजे पर भी ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर लगे हुए थे। अंतर बस ये था कि ये प्रिंटेड नहीं थे। इन्हें हाथों से बनाया गया था।

बनावट को देखकर यह भी स्पष्ट था कि, इसे किसी कम उम्र के बच्चे ने बनाया है। टूटी फूटी हैंडराइटिंग मे इसी पोस्टर पर किसी बच्चे ने लिखा था कि अगर नबी सालल्हू, अलेह, वसल्लम से मुहब्बत का इजहार करना जुर्म है तो यह जुर्म हम हर रोज करेंगे।

मस्जिद के दरवाजे पर लगा पोस्टर

आला हजरत मस्जिद की ओर इशारा करने के लिए लगे बोर्ड के ठीक पीछे समाजवादी पार्टी का एक बड़ा पोस्टर लगाया गया था। जो शायद उत्तरप्रदेश मे सियासत और मजहब के गठबंधन को साफ तौर पर दिखाने के लिए काफी है।

मस्जिद आला हजरत लिखा बोर्ड

ये वही मस्जिद है जहाँ से निकली भीड़ पैगंबर से मुहब्बत के नाम पर 26 सितंबर को बरेली शहर को जला देने पर आमादा थी। बवाल वाले दिन इस मस्जिद मे केवल नौजवान लड़के ही नमाज पढ़ने आए थे जबकि आज जो मैंने देखा उसमें एक भी व्यक्ति 40 साल से कम उम्र का नहीं था।

यहाँ मैंने नामजियों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी बात करने को राजी नहीं था। हर चेहरा पर्दे में रहने की कोशिश कर रहा था। यहाँ से चलकर मैं एक गली के अंदर गया। गली पतली थी लेकिन अंदर अधिकतर मुसलमानों से भरी एक बड़ी आबादी थी।

यहाँ भी अधिकतर मुसलमान कुछ भी बताने से बच रहे थे। एक महिला ने बताया कि नामजियों की ही भीड़ थी जिसने ये पूरा बवाल बनाया था। तभी, एक अधेड़ व्यक्ति ने आवाज देकर मुझे बुलाया। नदीम नाम के इस शख्स ने, पहले तो केवल नामजियों को बचाने की कोशिश की लेकिन लंबी बातचीत के दौरान उसकी जबान खुलती गयी।

उसने कहा, “आज तो मुख्यमंत्री जी के भी बयान थे कि हमने डेंटिंग पेंटिंग कर दी, तो इसका सीख क्या है? ये डेंटिंग पेंटिंग करेंगे हमारी?” आगे कहा, “अभी इनकी सरकार है तो डेंटिंग पेंटिंग हो रही है, सरकार बदलेगी तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी।”

उसने बेहद उत्तेजित होते हुये कहा कि ‘आई लव मुहम्मद तो कयामत तलक रहेगा’। इसकी पूरी बात आप Opindia की विडियो रिपोर्ट मे भी देख सकते हैं।

इस व्यक्ति से मैंने करीब 16 मिनट तक बात की, पूरी बातचीत के दौरान एक बार भी यह व्यक्ति अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुआ बल्कि धमकी भरे लहजे मे आगे और बुरे भविष्य की ही बात करता रहा। इसके अलावा बाक़ी के मुसलमानों ने मानो चुप रहने की कसम खाई हुई हो। एक भी शख्स कैमरे पर बात करने को तैयार नहीं था।

करीब चार घंटे तक इस इलाके मे घूमने के बाद मैं हिंदुओं के मुहल्लों मे गया। एक व्यक्ति जो अपने दरवाजे पर बैठा था उसने कहा कि ‘हिन्दू त्योहार जब भी आते हैं, तभी ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं’ इसके साथ ही उसने 2010 के बरेली के दंगों को भी याद दिलवाया जब होली खेलने के समय कर्फ़्यू लग गया था।

हिंदुओं का कहना यह भी है कि मुसलमान सुनियोजित ढंग से हिन्दू त्योहारों के समय ही ऐसी हरकतें करते हैं। जबकि मुसलमानों के त्योहारों के समय हिन्दू शांत रहते हैं। कई हिंदुओं ने सीधे तौर पर बरेली मे होने वाली हर इस्लामी उन्माद के लिए मौलाना तौकीर रजा और उसको राजनीतिक संरक्षण देने वाली कुछ राजनीतिक पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया।

हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि आज प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो शायद बरेली जल रहा होता। सरकार बदलने की वजह से मौलाना तौकीर रजा जैसे लोग अब कोशिश तो करते हैं लेकिन पुलिस उनका सही से इलाज कर देती है।

दोनों पक्षों से बात करने के बाद मैं बरेली से दिल्ली की तरफ निकला। बरेली के प्रसिद्ध झुमका चौक के पहले अवेधनाथ द्वार था, जिसके ऊपर भगवान शंकर की योग मुद्रा मे मूर्ति स्थापित की गयी है।

अवेधनाथ द्वार

कुछ देर वहाँ मैं रुका और वहाँ मौजूद दुकानों के बोर्ड पढ़कर मुझे आभास हुआ कि वहाँ एक ही पक्ष की 70 फीसदी से ज्यादा दुकाने थी। यानि शहर का एंट्री पॉइंट एक ही पक्ष के कब्जे मे था। और शहर के अंदर की पूरी बसावट मैं देख ही चुका था।

आगस्टे काम्टे की पंक्ति ‘डेमोग्राफी इज डेस्टिनी’ मेरे दिमाग मे घूमने लगी थी। हालाँकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के मंचों से दिए जाने वाले बयान और ऐसी घटनाओं मे प्रशासनिक तत्परता अभी भी समाज के दूसरे पक्ष को चैन की सांस लेने का मौका दे रहे हैं।

मुस्लिम पीड़ित का नैरेटिव VS सच्चाई: ओलंपियन शाहिद के घर पर कार्रवाई ‘मुआवजा’ और ‘सहमति’ से हुई, फिर भी लिबरल-वामपंथी और सपा-कॉन्ग्रेसी गैंग ने फैलाया प्रोपेगेंडा

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ओलंपिक पदक विजेता और पद्मश्री से सम्मानित हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद के पुश्तैनी मकान पर बुलडोजर चलाया गया। प्रशासन ने कहा कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क चौड़ीकरण किया जा रहा है और इसी कड़ी में 13 मकानों को गिराने की कार्रवाई हुई।

इन्हीं मकानों की सूची में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। अब मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने को लेकर लिबरल-वामपंथी गैंग ने जबरन विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्षी दलों और लिबरल-वामपंथी गैंग ने बुलडोजर की इस कार्रवाई को बीजेपी सरकार के खिलाफ मुद्दा बना लिया और इसे ‘मुस्लिम पीड़ित’ के नैरेटिव से जोड़कर खूब प्रचारित किया।

मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाने का विरोध

विपक्ष ने बीजेपी को ‘जुल्मी सरकार’ बताते हुए ‘नाइंसाफी’ करने के इल्जाम लगाए, जो उनकी नजर में ‘अमानवीय’ तरीके से बुलडोजर कार्रवाई कर रही है। इस्लामी कट्टरपंथियों यहाँ ‘मुस्लिम पीड़ित’ का राग अलापने लग गए। दलितों के हितैषी बनने वाले चंद्रशेखर आजाद ने बीजेपी पर खिलाड़ियों का अपमान करने का आरोप लगाते हुए परिवार को मुआवजा देने की माँग की।

समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “जुल्म करनेवाले न भूलें नाइंसाफी की भी एक उम्र होती है।” उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा, “पूरा घर जमींदोज कर दिया। ये सिर्फ एक घर नहीं था बल्कि देश की खेल विरासत की पहचान थी। काशी की धरती पर प्रतिभाओं और सम्मानित विभूतियों का अपमान करने वाली भाजपा सरकार को जनता माफ नहीं करेगी।”

कॉन्ग्रेस नेता मोहम्मद वसीम ने ‘देश में मुसलमानों की हालत’ पर सवाल उठाए। इस्लामी कट्टरपंथी भी विरोध की इस दौड़ में पीछे नहीं रहे और योगी सरकार से मोहम्मद शाहिद के घर ढहाने के पीछे कारण पूछा। एक X यूजर मंजर हुसैन ने लिखा, “एक राष्ट्रीय नायक का घर अब मलबे में पड़ा है। सीएम योगी, कोई जवाब है?”

लिबरल-वामपंथी और कट्टरपंथी संगठनों का शोर

मामले को हवा देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और लिबरल पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर भी मोर्चा खोला। X पर मोहम्मद शाहिद के घर बुलडोजर चलाने के कई वीडियो पोस्ट किए गए। इनमें एक वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति पुलिस अधिकारी के हाथ जोड़कर रहा है। इस वीडियो को लिबरल गैंग और इस्लामी मीडिया ने गलत संदर्भों के साथ जमकर वायरल किया।

राणा अय्यूब ने अपने X अकाउंट पर ये वीडियो पोस्ट कर लिखा, “उत्तर प्रदेश में, हॉकी के दिग्गज मोहम्मद शाहिद का घर उन 13 घरों में से एक था जिन्हें बुलडोजर से गिरा दिया गया। क्या आपको उन लोगों की चुप्पी सुनाई दे रही है जिन्हें बोलना चाहिए?”

कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम भी मोहम्मद शाहिद के घर पर बुलडोजर चलाए जाने का विरोध करता नजर आया है। खुद को ‘गाँधीवादी’ बताने वाले सैयद फैसल इकबाल कहते हैं, “अगर यह इस्लामोफोबिया नहीं है, तो और क्या है? जब एक राष्ट्रीय नायक के परिवार को भी नहीं बख्शा जाता और जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप रहते हैं – तो उनकी चुप्पी मिलीभगत है।”

यहाँ तक की अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद, लुटियन्स मीडिया ने भी इस वीडियो को पोस्ट कर बीजेपी सरकार पर आरोप लगाते हुए ‘मुस्लिम-विरोधी होने की छवि पेश की’ और सोशल मीडियो पर लोगों की सहानूभूति बँटोरी।

इसी तरह वाराणसी की एक प्रशासनिक कार्रवाई विपक्ष और लिबरल-वामपंथी के लिए बीजेपी सरकार को घेरने का नया मुद्दा बन गई। वो भी बिना किसी असलियत के ज्ञान के, यही लोग जो सरकार पर विकास को लेकर सवाल उठाते हैं और धर्म की राजनीति का आरोप लगाते हैं। यहाँ साफ नजर आता है कि धर्म की राजनीति कहाँ से आती है और कैसे मुस्लिम-विरोधी प्रोपेगेंडा को हवा दी जाती है।

लिबरल-वामपंथी गैंग को आखिर चिंता किस बात की है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरे विवाद में जितने लिबरल, वामपंथी, इस्लामी कट्टरपंथी और कॉन्ग्रेसी हंगामा मचा रहे हैं, उन्हें असल में चिंता किस बात की है? क्योंकि मोहम्मद शाहिद की बीवी परवीन को इस कार्रवाई पर कोई आपत्ति नहीं है। मीडिया से बात करते हुए परवीन ने साफ कहा कि प्रशासन से उन्हें मुआवजा मिल चुका है और वे इस कार्रवाई से सहमत हैं। परवीन ने यह भी कहा, “सिर्फ हमारा घर नहीं बल्कि इलाके में दूसरे मकान भी तोड़े गए हैं।”

इतना ही नहीं घर के कुल 9 हिस्सेदारों में से 6 लोगों को बाकायदा मुआवजा दिया जा चुका है। यानि परिवार के भीतर से विरोध की कोई आवाज नहीं उठी लेकिन बाहर बैठे कथित सेक्युलर जमात और ‘खेल विरासत’ का रोना रोने वाले नेताओं को यह मौका मिल गया कि वे सरकार पर इल्जाम लगाने लगें। सवाल ये है कि जब परिवार खुद संतुष्ट है तो यह लिबरल-वामपंथी जमात क्यों मातम मना रही है?

मुस्लिम व्यक्ति का घर तोड़ा गया?

यहाँ एक और बड़ा झूठ फैलाया गया कि केवल मोहम्मद शाहिद का घर तोड़ा गया क्योंकि वो एक मुस्लिम हैं और सरकार मुस्लिम-विरोधी है। जबकि असलियत यह है कि पुलिस लाइन से कचहरी तक सड़क परियोजना के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए 13 मकानों को ध्वस्त किया गया। इन्हीं में मोहम्मद शाहिद का घर भी शामिल था। यानि प्रशासन ने किसी मुस्लिम को टारगेट नहीं किया बल्कि योजना के मुताबिक सभी 13 मकान तोड़े, न कि धर्म के आधार पर।

और हाँ, योगी सरकार का बुलडोजर हमेशा कानून के दायरे में ही चलता है। इस मामले में भी परिवार को पहले ही नोटिस दिया गया था। उस नोटिस में साफ-साफ लिखा था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए जिन हिस्सों की जरूरत है, उन पर मालिकों की सहमति ली जा चुकी है। अब जब परिवार सहमत था और मुआवजा भी मिल चुका था तो फिर ‘जुल्म’ और ‘नाइंसाफी’ का झूठा नैरेटिव खड़ा करने का क्या औचित्य है?

पूरा घर जमींदोज नहीं, केवल एक हिस्सा गिराया

जहाँ तक पूरा घर जमींदोज करने की बात है और वायरल वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति के गिड़गिड़ाने की बात है। तो PWD ने साफ कहा है कि चार मंजिला घर का केवल एक हिस्सा गिराया गया है और उनको मुआवजा दिया जा चुका है।

सरकार ने मुआवजा पहले ही दे दिया है। मोहम्मद शाहिद के घर में 9 हिस्सेदार बताए गए। इनमें से 6 को मुआवजा दे दिया गया जबकि बाकी 3 अलग-अलग वजहों से पैसा लेने से इनकार कर दिया। प्रशासन ने अपनी कार्रवाई के दौरान केवल उसी हिस्से को ढहाया जिसे मुआवजा मिल गया था। जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया, उनके हिस्से को नहीं छेड़ा गया है।

यानी विपक्ष और लिबरल मीडिया का यह आरोप भी पूरी तरह झूठा है कि ‘पूरा घर जमींदोज’ कर दिया गया। सच यही है कि प्रशासन ने सिर्फ उतना ही हिस्सा गिराया, जिसका भुगतान पहले से कर दिया गया था।

यह प्रक्रिया बिल्कुल वैसी ही है जैसी किसी भी विकास परियोजना में होती है। लेकिन चूँकि यहाँ मामला एक मुस्लिम खिलाड़ी का था तो कॉन्ग्रेसी, वामपंथी, लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी गैंग ने इसे मुस्लिम पीड़ित बनाम बीजेपी सरकार का एजेंडा खड़ा करने का मौका समझा और इसे भुनाने की कोशिश में जुट गए।

भाई को बनाया ‘भाई-जान’ तो नहीं मिलेगा बीमारियों का समाधान: ‘कजिन मैरिज’ को बढ़ावा देने में जुटी ब्रिटेन सरकार, जान लीजिए क्या होते हैं इसके दुष्परिणाम

‘कजिन मैरिज’ को लेकर दुनिया में कई शोध हुए हैं और इसके आधार पर होने वाले नुकसान की चर्चा हो रही है। वहीं, ब्रिटेन की सरकार ने इसको फायदेमंद बताया है। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने ‘कजिन मैरिज’ के फायदों को प्रमोट किया और उनके जेनेटिक खतरे की तुलना देर से बच्चा पैदा करने या गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान और शराब पीने से की। इसी के बाद अब इसकी आलोचना की जा रही है।

आलोचकों ने मुस्लिमों में प्रचलित इस रिवाज को महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार से भी जोड़ा है। ऐसे दंपति के बच्चों को आनुवांशिक बीमारियों की संभावना पर भी चर्चा अब तेज हो गई है।

2021 की जनगणना के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम यूरोप का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी खासकर पाकिस्तानी मुस्लिमों का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। इनकी जनसंख्या 16 लाख से ज्यादा है। पिछले कुछ वर्षों में यह आँकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। हालाँकि, यह पश्चिमी देश सिर्फ लोगों को ही नहीं, बल्कि उनके रीति-रिवाजों को भी संरक्षण दे रहा है। यहाँ क्राइम रेट काफी बढ़ गए हैं। ग्रूमिंग गैंग के केस लगातार सामने आते रहते हैं।

फिर भी, अधिकारी और मीडिया नस्लवाद के आरोपों से बचने के लिए ‘उदारवाद’ के नाम पर मुस्लिम अपराधों को छिपाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। अब मुस्लिम समुदाय में प्रचलित कुप्रथा ‘कजिन मैरिज’ के होने वाले दुष्परिणाम को महत्वहीन बताने की कोशिश की गई है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (जीनोमिक्स शिक्षा कार्यक्रम) ने मुसलमानों, खासकर पाकिस्तानी मूल के लोगों में प्रचलित ‘कजिन मैरिज’ को सही ठहराने के लिए अजीब दावा किया है। उन्होने ऐसी मैरिज से होने वाले संभावित लाभ को गिनाया है। वित्तीय लाभ (संसाधन, संपत्ति और विरासत को घरों के बीच विभाजित करने के बजाय एक साथ रखा जा सकता है) और खानदानी नेटवर्क के फायदे बताए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि विश्लेषण में यह माना गया है कि ऐसे रिश्तों से आनुवंशिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसमें ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि ब्रैडफोर्ड में यूनाइटेड किंगडम के अन्य हिस्सों की तुलना में आनुवंशिक रोगों वाले बच्चे ज्यादा पैदा हुए हैं। इस क्षेत्र में ब्रिटिश पाकिस्तानियों की एक बड़ी आबादी है, जिनमें ‘कजिन मैरिज’ आम है। लेख में बताया गया है कि कैसे इस आनुवंशिक रोग के कारण ‘एक के बाद एक बच्चे’ मर गए।

फिर भी, इसे ‘मुस्लिमों को दोष देने’ और ‘समस्या के सरलीकरण’ के रूप में लिया गया। ब्रिटेन में ‘कजिन मैरिज’ पर प्रतिबंध के खिलाफ तर्क दिया गया। ब्रिटिश सोसाइटी फॉर जेनेटिक मेडिसिन (बीएसजीएम) ने कहा कि इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित करने के लिए स्वास्थ्य को आधार बनाना अनुचित है।

रिपोर्ट के ख़िलाफ तीखी प्रतिक्रिया और माफ़ी की माँग

रिपोर्ट पर यूनाइटेड किंगडम में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, ऑक्सफ़ोर्ड स्थित फ़ारोस फ़ाउंडेशन के सामाजिक विज्ञान अनुसंधान विभाग के निदेशक और धार्मिक क़ानून के विशेषज्ञ डॉ. पैट्रिक नैश ने इस दिशानिर्देश की निंदा करते हुए इसे ‘वास्तव में निराशाजनक’ बताया है।

उन्होंने कहा, “कजिन मैरिज पूरी तरह गलत है, और इसे तत्काल प्रतिबंधित किया जाना चाहिए । राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के रिपोर्ट को बेहद भ्रामक बताते हुए तुरंत माफी माँगने को कहा है। इसमें कहा गया है कि जनता को किसी भी तरह से गुमराह नहीं किया जाना चाहिए।”

टोरी सांसद रिचर्ड होल्डन ने डेली मेल से बात करते हुए कहा, ” राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) को हानिकारक और दमनकारी सांस्कृतिक प्रथाओं के आगे घुटने टेकना बंद कर देना चाहिए। कंज़र्वेटिव भी ‘कजिन मैरिज’ प्रथा को समाप्त होते देखना चाहते हैं, लेकिन लेबर इन वाजिब माँगों के प्रति उदासीन है।”

उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटेन का हर समुदाय इस प्रथा को खत्म करने के पक्ष में है। वे ऐसे विधेयक का समर्थन कर रहे हैं जो चचेरे भाई-बहनों के आपस में निकाह करने पर प्रतिबंध लगाएगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इन विवाहों से पैदा हुए बच्चों में सिकल सेल रोग या सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों से पीड़ित होने की संभावना कहीं अधिक होती है, जिससे एनएचएस को अरबों पाउंड का नुकसान होता है। आँकड़ों के अनुसार, शेफ़ील्ड, ग्लासगो और बर्मिंघम जैसे इलाकों में आनुवांशिक बीमारियों से ग्रस्त बच्चों का इलाज बड़ी संख्या में किया जा रहा है। यहाँ इलाज करा रहे बीमारों में हर पाँच में से एक बच्चा पाकिस्तानी मूल का है।

रिपोर्टों से पता चलता है कि ‘कजिन मैरिज’ के पैदा हुए ब्रिटिश-पाकिस्तानी बच्चे बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूढ रहे हैं। ऐसे विवाहों से पैदा होने वाले बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें आ जाती हैं। बीबीसी के अपने लेख में इसका खुलासा किया है।

बॉर्न इन ब्रैडफोर्ड रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 2007 से 2010-11 के बीच वेस्ट यॉर्कशायर शहर में करीब 13,500 नवजातों की जाँच की। इसके बाद बचपन से लेकर किशोरावस्था और अब बड़े होने तक इनके स्वास्थ्य पर नजर रखी गई। इनमें पाकिस्तानी मूल के 37% विवाहित जोड़े चचेरे भाई-बहन थे।

लिवरपूल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, बच्चों का सेरिबेलम छोटा था और उनके कंकाल मनुष्यों की तुलना में वानरों से ज्यादा मिलते-जुलते थे। पारिवारिक विवाह और प्रजनन को इस सिंड्रोम से जोड़ा गया था, जिससे पता चला कि यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी है।

ब्रिटिश कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर ब्रिटिश-पाकिस्तानी जोड़ों को लेकर रिपोर्ट साझा किया। ब्रिटिश कार्यकर्ता टॉमी रॉबिन्सन ने जुलाई में एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि ब्रिटेन में 33% जन्मजात विकृतियाँ ब्रिटिश-पाकिस्तानियों के कारण होती हैं, जो आबादी का लगभग 3% हिस्सा हैं और ब्रैडफोर्ड में 76% पाकिस्तानी अपने कजिन से निकाह करते हैं। उन्होंने इस विकृतियों को पारंपरिक इस्लामी रीति-रिवाजों से जोड़ा और तर्क दिया कि इससे ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर भारी बोझ पड़ता है।

यह अध्ययन इस मामले में सबसे बड़ी जाँच थी। जिन बच्चों पर अध्ययन किया गया, उनमें से छह में से एक के माता-पिता कजिन थे। साथ ही ये पाकिस्तानी समुदाय से जुड़े थे।

मशहूर वैज्ञानिक ग्रेगर मेंडल ने आनुवंशिकी का मानक सिद्धांत की खोज की। इसके अनुसार, यदि माता-पिता दोनों में अप्रभावी जीन मौजूद हो, तो बच्चे में अप्रभावी जीन दिखने की संभावना चार में से एक होती है। इसके अतिरिक्त, यदि माता-पिता दोनों रिश्तेदार हों, तो दोनों के ‘जीन वाहक’ होने की संभावना अधिक होती है। सामान्य जनसंख्या के 3% की तुलना में, कजिन कपल के बच्चों के आनुवांशिक रोगी होने की संभावना 6% होती है।

शोधकर्ताओं ने बच्चों के बोलने और भाषा सीखने की क्षमता को भी बताया। उन्होंने पाया कि ब्रैडफोर्ड में ‘कजिन मैरिज’ करने वाले कपल के बच्चे में वाणी और भाषा संबंधी दिक्कतें 11% बच्चों में थी, जबकि जिन बच्चों के माता-पिता रिश्तेदार नहीं हैं, उनके लिए यह 7% थी।

ऐसा ही बच्चों के विकास को लेकर बताया गया है कि जिनके माता-पिता भाई-बहन हैं, उन बच्चों में 54 फीसदी कम विकसित होते हैं। जबकि सामान्य माता-पिता के 36% बच्चों का कम विकास हो सकता है।

कजिन कपल के बच्चों को तीन गुणा ज्यादा अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं। उनकी निगरानी ज्यादा करनी पड़ती है। आँकड़ों के अनुसार, खून के विकार से होने वाली बीमारियों की समस्या इनमें ज्यादा होती है।

जन्मजात असामान्यताएँ और दूसरी समस्या

जन्मजात बीमारियों की वजह से ‘कजिन मैरिज’ वाले पैरेंट्स के बच्चों में मृत्यु दर ज्यादा होती है। जाँच में सामने आया है कि गैर-रक्त-संबंधी जोड़ों (सभी जातीय समूहों के) के लिए यह दर 2.5% थी, जबकि ‘कजिन मैरिज’ वाले बच्चों में यह दर 6.5% थी।

‘कजिन मैरिज’ से होने वाले संतानों में उनर टैन सिंड्रोम (यूटीएस) आम तौर पर देखा जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति चौपायों पर चलने लगते हैं और अक्सर उनमें सीखने की क्षमता में कमी आ जाती है। यह कथित तौर पर ‘उल्टा विकासित’ होने लगते हैं।

इसका पता तब चला, जब तुर्की के उल्लास परिवार के कुछ सदस्यों को चारों पैरों पर चलते हुए देखा गया। 2006 में आई बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री ने पहली बार इसका वर्णन किया था। चार बहनें और एक भाई इस अजीबोगरीब बीमारी के साथ पैदा हुए थे, जबकि परिवार के एक छठे सदस्य, जिसमें यह विशेषता नहीं थी, उसकी मृत्यु हो गई।

ब्रिटिश पाकिस्तानियों ने किया ‘कजिन मैरिज’ का समर्थन

इस बीच ब्रिटिश पाकिस्तानियों ने ‘कजिन मैरिज’ का पुरजोर समर्थन किया। बीबीसी से बातचीत में एक जोड़े ने कहा, “यह ईश्वर की इच्छा है, कोई कुछ नहीं कह सकता। अगर आप परिवार से बाहर भी शादी करते हैं, तब भी ऐसा हो सकता है।” उन्होंने सभी सबूतों को नजरअंदाज करते कहा, “बहुत से लोगों ने परिवार से बाहर शादी की है और फिर भी उनका एक बच्चा विकलांग हो गया।”

एक अन्य मुस्लिम व्यक्ति ने बताया कि पाकिस्तान या भारत में (विशाल मुस्लिम आबादी को देखते हुए) ‘कजिन मैरिज’ असामान्य नहीं हैं।

2021 के एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 55% ब्रिटिश पाकिस्तानियों में निकाह चचेरे भाई-बहनों से होती है, जो देश में होने वाली सभी शादियों का लगभग 3% है। बर्मिंघम में इस तरह का निकाह आम है, जहाँ ब्रिटिश पाकिस्तानियों की एक बड़ी आबादी रहती है।

चचेरे भाई-बहनों के निकाह वाले देश
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चचेरे भाई-बहनों के निकाह को इस्लामी समाज में मान्यता है। इस वर्ष के आँकड़ों से पता चला है कि पाकिस्तान 61.2% ऐसे ही निकाह हुए हैं, उसके बाद कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सूडान का स्थान आता है। मुस्लिम समुदाय में प्रचलित यह कुप्रथा, हानिकारक प्रभावों के बावजूद आज भी जारी है।

2022 के डीडब्ल्यू अध्ययन के अनुसार, इस प्रथा के कारण युवाओं में आनुवंशिक समस्याओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ गई है। हालाँकि, देश भर के कई इलाकों में चचेरे भाई-बहनों के बीच निकाह अभी भी आम है, भले ही लोग इसके दुष्परिणामों से वाकिफ हों।

‘जन्मजात दोषों के प्रमुख कारक’ शीर्षक से 2013 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बच्चों में जन्मजात विकलांगताओं के 77% मामलों में एक ही गोत्र में विवाह अहम कारण था। इसे लीड्स विश्वविद्यालय ने ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रकाशित किया था।

ज़फ़र इक़बाल के अध्ययन, ‘सगोत्र परिवारों में बौद्धिक अक्षमता के लिए ज़िम्मेदार जीन की पहचान’, में बताया गया है कि पाकिस्तान में सगोत्र निकाह दर अपेक्षाकृत अधिक (>60%) है। इसमें यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान में लगभग 17% से 38% सगोत्र मैरिज चचेरे भाई-बहनों के बीच होते हैं। यह पाकिस्तान में शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। इसके अलावा, अगर बच्चा जीवित रहता है, तो उसमें आनुवंशिक असामान्यता या दीर्घकालिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या विकसित होने की संभावना बहुत अधिक होती है।

पाकिस्तान का आनुवंशिक रोगों से जुड़ा डेटाबेस कोहाट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय जैसे पाकिस्तानी संस्थानों द्वारा बनाए जाते है। यह उन बीमारियों का पता लगाता है और उनकी निगरानी करता है जो मुख्य रूप से पाकिस्तानी बच्चों में अंतःप्रजनन के कारण होते हैं।

इस डेटा से पता चलता है कि 130 अलग-अलग आनुवंशिक बीमारियों में 1,000 से ज़्यादा म्यूटेशन हैं, जो विभिन्न स्थानों, जैसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, संघ प्रशासित जनजातीय क्षेत्र (FATA), पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, सिंध और गिलगित-बाल्टिस्तान की वजह से आए हैं।

पाकिस्तानी बच्चों में आम है थैलेसीमिया

एक वंशानुगत रक्त विकार थैलेसीमिया की बीमारी पाकिस्तानी बच्चों में ज्यादा मिलती है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाएँ ऑक्सीजन नहीं ले पाती हैं। पाकिस्तानी बच्चों में यह सबसे आम आनुवंशिक स्थिति है।

द टेलीग्राफ ने 2015 में चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन में पाकिस्तानी समुदायों में चचेरे भाई-बहनों के निकाहों की वजह से लगातार आनुवांशिक बीमारी से ग्रस्त बच्चों का जन्म हो रहा है।

जिस तरह ब्रिटिश प्रशासन और उसके मीडिया ने पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा अपनी नाबालिग लड़कियों के शोषण को कम करके आँकने की कोशिश की, उसी तरह अब वे पाकिस्तानी मुस्लिम समुदाय में अंतःप्रजनन के मुद्दे को भी कम महत्व दे रही है।

सबूत के बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लगातार बच्चों के जीवन को खतरे में डालने की कोशिश हो रही है। यहाँ तक कि वैज्ञानिक तथ्यों को भी खारिज किया जा रहा है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बिहार चुनाव से पहले प्रशांत किशोर का ‘सियासी प्रयोग’: सम्राट चौधरी पर हत्या और अशोक चौधरी पर ₹500 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप, जानें PK के दावों में कितना दम?

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर दनादन नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं। सोमवार (29 सितंबर 2025) को प्रशांत किशोर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और मंत्री अशोक चौधरी पर आरोप लगाए हैं।

उन्होंने जहाँ सम्राट चौधरी को हत्या में अभियुक्त बताया है तो वहीं अशोक चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। हालाँकि, उनके दावों कि हवा थोड़ी दी देर में सम्राट चौधरी ने निकाल दी है।

प्रशांत किशोर ने क्या आरोप लगाए?

प्रशांत किशोर ने केंद्र सरकार, बिहार सरकार और राज्यपाल से सम्राट चौधरी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर उन्हें पद से बर्खास्त करने की माँग की है। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि तारापुर में 1995 में कुशवाहा समाज के 7 लोगों की हत्या हुई थी और उसमें राकेश कुमार उर्फ सम्राट कुमार मौर्य उर्फ सम्राट चौधरी अभियुक्त हैं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि इस मामले में 1995 में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने नाबालिग होने की वजह से सम्राट चौधरी को जेल से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने जो डॉक्यूमेंट दिया था उसके हिसाब से उनकी जन्मतिथि 1981 थी। प्रशांत ने दावा किया कि 2020 में चुनावी हलफनामे में सम्राट चौधरी ने अपनी उम्र 51 वर्ष बताई थी, तो 1995 में इनकी उम्र 26 साल थी। गलत सर्टिफिकेट के आधार पर इन्हें रिहा किया गया था।

प्रशांत किशोर ने कहा, “शिल्पी गौतम रेप और मर्डर केस में, साधु यादव पर आरोप लगा, CBI तक केस गया था। सम्राट चौधरी उर्फ राकेश कुमार उर्फ सम्राट कुमार मौर्य उस केस में संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर नामजद थे या नहीं, यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बात दें।”

उन्होंने सम्राट चौधरी पर सवाल उठाते हुए कहा, “आकर बताइए कि उस केस में अभियुक्त के तौर पर CBI ने आपकी जाँच की थी कि नहीं की थी? आपके सैंपल टेस्ट लिए गए थे कि नहीं लिए गए थे? आपकी उस घटना में क्या संलिप्तता है?”

क्या बोले सम्राट चौधरी?

सम्राट चौधरी ने प्रशांत किशोर को नौसिखिया बताता हुए आरोपों को बेबुनियाद और सनसनी फैलाने की कोशिश बताया है। उन्होंने 1995 के केस को लेकर कहा कि उस केस में मेरे परिवार के 22 लोगों को जेल में डाला गया था।

सम्राट ने कहा, “मेरे घर के अनाज में, चावल में पेशाब कर दिया गया। मानवाधिकार आयोग ने बिहार की तत्कालीन लालू सरकार पर फाइन लगाया और सरकार ने मुआवजा दिया था।” उन्होंने कहा कि कोर्ट ने उस केस में उन्हें बाइज्जत बरी किया था।

वहीं, शिल्पी-गौतम केस को लेकर उन्होंने कहा कि जिस राकेश का प्रशांत किशोर दावा कर रहे हैं, वो हाजीपुर का रहने वाला था और आइसक्रीम बेचता था। उन्होंने कहा, “अब इसको (प्रशांत किशोर) कहाँ-कहाँ से बुद्धि लोग दे रहे हैं। शिल्पी-गौतम कांड में पूरी तरह जाँच CBI ने की, हमलोगों को तो पता भी नहीं है। जिस राकेश की बात वो करते हैं, वो तो हाजीपुर का रहने वाला है। इन्हें बिहार के बारे में कुछ नहीं पता है।”

अशोक चौधरी पर प्रशांत के आरोप?

प्रशांत किशोर ने बिहार के मंत्री अशोक चौधरी पर टेंडर देने में 500 करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया है। प्रशांत किशोर ने इससे पहले भी अशोक चौधरी पर 200 करोड़ रुपए की संपत्ति इकट्ठा करने का आरोप लगाया था।

प्रशांत ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पिछले आठ महीनों में इन्होंने 20,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। हर कॉन्ट्रैक्ट में 5% पैसा कमीशन के तौर पर लिया गया है।” उन्होंने इंजीनियर के घर पर जलाए गए पैसों को भी इसी भ्रष्टाचार का पैसा बताया है।

प्रशांत ने शांभवी के पति के परिवार से जुड़े ट्रस्ट पर भी आरोप लगाए हैं। प्रशांत ने दावा किया कि आचार्य किशोर कुणाल के परिवार के ट्रस्ट ‘वैभव विकास न्यास’ के नाम पर एक वर्ष में 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति खरीदी गई है। उन्होंने ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारी जियालाल आर्य, किशोर कुणाल की पत्नी अनीता कुणाल और मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की सास से इसका जवाब देने को कहा है।

उन्होंने कहा कि अनीता कुणाल के बेटे सायण कुणाल की मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी (समस्तीपुर सांसद) के साथ सगाई और शादी के बाद ये संपत्तियाँ खरीदी गई हैं।

अशोक चौधरी और शांभवी चौधरी का पलटवार

मंत्री अशोक चौधरी और शांभवी चौधरी ने प्रशांत किशोर के आरोपों पर पलटवार किया है। अशोक चौधरी ने दावा किया है कि प्रशांत किशोर राजनीति को सनसनी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अशोक चौधरी ने कहा कि अगर उनके खिलाफ कोई सबूत है तो प्रशांत किशोर कोर्ट जाएँ, वहां सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

मंत्री ने कहा, “अगर मेरे खिलाफ या फिर मेरे किसी करीबी पर कोई दस्तावेजी प्रमाण है तो वह सामने आए। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि असली कौन है और नकली कौन? वह बताएँ कि हमने कहाँ जमीन और पैसा रखा हुआ है?”

साथ ही, उन्होंने कहा कि कमीशन का ऐसे ही आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। ट्रस्ट को लेकर अशोक चौधरी ने कहा कि वह ट्रस्ट 1985 से काम कर रहा है और उसका उनसे कुछ लेना-देना नहीं है।

अशोक चौधरी की सांसद बेटी शांभवी चौधरी ने प्रशांत किशोर के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया और कहा कि यह निजी प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास है। शांभवी ने कहा, “आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और चुनाव करीब आते ही इस तरह की बयानबाजी आम हो चुकी है, लेकिन इस बार मामला राजनीति से आगे बढ़कर हमारे परिवार पर निजी हमले का बन गया है।”

उन्होंने कहा कि इस पूरे विवाद में उनके ससुराल पक्ष को घसीटा जाना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। शांभवी ने कहा कि यह परिवार की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला हमला है और ऐसे आरोपों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रशांत किशोर पर भ्रष्टाचार के आरोप

सम्राट चौधरी ने प्रशांत किशोर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। सम्राट ने कहा, “कहता है कि हमको 14 करोड़ रुपए चंदा दिया, क्यों दिया? कल तक तुम्हें मेहनताना नहीं मिला था, अब 241 करोड़ रुपए का मेहनताना मिला है। कोई सेल कंपनी जिसकी औकात 10 लाख की है वो 10 करोड़ कैसे चंदा दे सकती है।”

उन्होंने कहा, “आते के साथ ही, पाटलिपुत्र में तुम्हारे पास 32 करोड़ रुपए का जमीन कैसे आ गया। सबका हिसाब होगा, जनता सबका जवाब देगी।” News18 के मुताबिक, सम्राट चौधरी ने कहा, “तुम अपने भ्रष्टाचार का हिसाब दो, तुम 241 करोड़ रुपए कहाँ से लाए। जिसने तुम्हें पैसा दिया, क्या वह तुम्हारा बाप है? तुम कौन हो? अगर तुम अपराध करोगे, तो उसका जवाब देना ही पड़ेगा।”

प्रशांत किशोर के आरोपों के बाद बीजेपी के प्रवक्ता दानिश इकबाल ने उन्हें लीगल नोटिस भेजने की बात भी कही है। जाहिर है कि चुनाव से पहले इस तरह के आरोप लगाना आम बात है लेकिन जो प्रशांत किशोर खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हैं, बिहार के लोग उन पर कितना भरोसा कर पाएँगे यह तो आने वाले चुनावों में ही साफ होगा।

काश पटेल का असीम मुनीर से हाथ मिलाना विश्वासघात नहीं, जियोपॉलिटिक्स की वास्तविकता है: भारत के हिंदुओं को छोड़नी होगी ‘असंभव की उम्मीद’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर से 25 सितंबर 2025 को मुलाकात की। इस बैठक में FBI प्रमुख काश पटेल भी मौजूद थे। बैठक की एक तस्वीर में काश पटेल पाकिस्तान के मुनीर से हाथ मिलाते दिखे, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

काश पटेल भारतीय मूल के हैं और हिंदू विरासत से आते हैं। जब उनकी यह तस्वीर व्हाइट हाउस में मुनीर से हाथ मिलाते हुए सामने आई तो भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच हलचल मच गई। कुछ लोगों ने इसे विश्वासघात कहा, कुछ ने इसे दोहरा मापदंड बताया और कुछ ने इसे मिलीभगत समझा। यह एक ऐसा पल बन गया जिसने सिर्फ पटेल की स्थिति नहीं बल्कि प्रवासी हिंदुओं से जुड़ी भारतीय उम्मीदों को भी उजागर किया।

लेकिन अब शायद जरूरत है एक शांत और संतुलित सोच की। हमें यह समझना होगा कि काश पटेल को दोष देना आसान है लेकिन शायद यह पल हमें खुद से सवाल करने का मौका देता है। क्या हमारी उम्मीदें उन प्रवासी हिंदुओं से हैं या वे हमारी अपनी असुरक्षाओं और भावनाओं का प्रतिबिंब हैं?

द ऑप्टिक्स, और क्यों ये मायने रखते हैं

जैसा कि मीडिया ने भी जोर देकर बताया, पटेल और मुनीर की हाथ मिलाने की तस्वीर सबकी नजरों में आ गई। इस ‘इशारे’ को लेकर कई सवाल उठे, खासकर इसलिए क्योंकि मुनीर ने हाल ही में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक विभाजन पर जोर दिया था और दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन भी किया था।

नेटिजन्स ने पटेल की हिंदू पहचान, उनके ‘जय श्री कृष्ण’ कहने के पुराने बयान और उनके निजी संस्कारों और सार्वजनिक पद के बीच के अंतर को लेकर सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी छोड़ दी। लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा जारी की गई तस्वीर सिर्फ एक पल का दृश्य थी। ये एक तरह का राजनीतिक मंचन है और ये समझना जरूरी है कि उस तस्वीर में मुनीर से हाथ मिलाते हुए जो व्यक्ति दिख रहा है, वो कई सीमाओं, संस्थाओं और जिम्मेदारियों से बंधा हुआ है।

प्रवासी भारतीयों पर हमारी अपेक्षाओं का दबाव

अक्सर हम प्रवासी भारतीयों पर असंभव अपेक्षाएँ थोप देते हैं। यह आम धारणा है कि चूँकि उनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं इसलिए उन्हें भारत के हितों के प्रतिनिधि, रक्षक या संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि सुंदर पिचाई हमेशा भारतीय डेवलपर्स का पक्ष लें, सत्य नडेला माइक्रोसॉफ्ट को भारत की ओर झुका दें और पटेल किसी भी ऐसे आधिकारिक संवाद से इनकार कर दें जो पाकिस्तान के प्रति भारत की कमजोरी दर्शाए।

तुलसी गैबर्ड को ही ले लीजिए। अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने हिंदू प्रतीकों और मंत्रों का जिक्र जरूर किया लेकिन उन्होंने हमेशा एक अमेरिकी राजनेता की तरह काम किया न कि भारत की प्रतिनिधि बनकर। उनकी जिम्मेदारी उनके मतदाताओं और उस अमेरिकी कॉन्ग्रेस के प्रति थी, जहाँ उन्होंने सेवा दी, न कि भारत या वैश्विक हिंदू समुदाय के प्रति। इससे अलग कोई उम्मीद करना सांस्कृतिक प्रतीकों को राजनीतिक निष्ठा समझने की भूल है।

लेकिन यह नागरिक पद या कॉर्पोरेट संचालन की तर्क नहीं है। यह उस मिथक की तर्कशक्ति है, जिसे हम अपने भीतर लिए चलते हैं और जिसे हम सच होता देखना चाहते हैं, जब कोई भारतीय प्रवासी किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँचता है- जैसे काश पटेल।

ऋषि सुनक, जो यूनाइटेड किंगडम के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं। उनके भारत में पैतृक जड़ों के बावजूद अपने देश के हितों को ही आगे बढ़ाएँगे। उसी तरह पटेल भी FBI निदेशक के रूप में अमेरिका के हितों को प्राथमिकता देंगे, न कि भारत के। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला अपनी कंपनियों को लाभ, नियामकीय अनुपालन और वैश्विक बाजारों की ओर ले जाएँगे, न कि किसी राष्ट्रीय मिथक की दिशा में।

उनके कार्यों में कोई विश्वासघात नहीं है। दरअसल, यही तो असली दुनिया का तरीका है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि हर चूक या राजनीतिक समझौते को नजरअंदाज किया जाए। इसका मकसद है हमारी सोच को फिर से संतुलित करना। यह माँग बंद करना कि हर प्रवासी हिंदू अपनी पहचान और नियति की दोहरी नागरिकता निभाए।

एक और उदाहरण लेते हैं, आशा जाडेजा मोटवानी, जो एक भारतीय-अमेरिकी वेंचर कैपिटलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी की बड़ी डोनर हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से भारत को डोनाल्ड ट्रंप की मानसिकता के बारे में सलाह दी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे ट्रंप से संवाद करें और उन्हें संतुष्ट करें ताकि व्यापारिक तनाव कम हो सके। उन्होंने यहाँ तक कहा कि भारत को ट्रंप का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम में मध्यस्थता की।

भले ही उनकी सोच और भाषा में कुछ समस्याएँ थीं लेकिन उनका रुख साफतौर पर यह दिखाता है कि जो लोग किसी बाहरी देश में रहते हैं और वहीं अपनी जिंदगी बसा चुके हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसी देश के लिए अपना कर्तव्य निभाएँगे, ना कि भारत के लिए। उनकी सलाह सिर्फ एक सलाह थी, कोई विदेश नीति नहीं। वे भारत को किसी कार्रवाई के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। उसी तरह, उनसे उम्मीद करना कि वे भारत का पक्ष लें, कुछ ज्यादा ही माँग है क्योंकि उनकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं।

कर्तव्य, पहचान और संस्थागत निष्ठा

भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता ‘स्वधर्म‘ की बात करती है, जिसका अर्थ है अपने कर्तव्य का पालन करना, बिना फल की आसक्ति के। पटेल ने अमेरिकी संविधान की सेवा की शपथ ली है और वह शपथ उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता पर हाथ रखकर ली थी। उनका धर्म है अमेरिकी संस्थाओं की सेवा करना- कानून, नौकरशाही और सुरक्षा की अनिवार्यताओं से बँधा हुआ। अगर उस कर्तव्य के चलते कुछ दृश्य असहज लगें तो सवाल विश्वासघात का नहीं है बल्कि हमारी अपेक्षाओं और संस्थागत वास्तविकता के बीच के असंतुलन का है।

पटेल मुनीर से हाथ मिलाने से इनकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसका असर उनके ऊपर पड़ता। संस्थागत मानकों को कमजोर करना वह चीज नहीं है, जिसकी उम्मीद अमेरिका अपने FBI निदेशक से करता।

यहूदी और इजरायल का उदाहरण

प्रवासी निष्ठा को लेकर कई चर्चाएँ होती रही हैं, जिनमें यहूदी प्रवासियों और इजरायल का उदाहरण बार-बार सामने आता है, यह एक तरह का भाषाई संक्षेप है, जिसमें कहा जाता है, “देखिए, दुनिया भर के यहूदी इजरायल के लिए एकजुट हो जाते हैं तो हिंदू भारत के लिए क्यों नहीं?” लेकिन यह तुलना कमजोर है बल्कि कई बार भ्रामक भी साबित होती है।

इजरायल एक आधुनिक राष्ट्र है, जो एक मातृभूमि के रूप में अस्तित्व में आया। इसका गठन सदियों की विस्थापन और उत्पीड़न की पीड़ा के बाद हुआ। यहूदी प्रवासी अक्सर इजरायस को एक अस्तित्वगत शरणस्थली और एक राष्ट्रीय आधार के रूप में देखते हैं। बहुत से यहूदियों के लिए उनकी पहचान और इजरायल की नियति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इसके विपरीत हिंदू सदियों से भारत में निरंतर बसे हुए हैं। भले ही प्रवास, आक्रमण, धर्मांतरण और विभाजन ने इतिहास को बदल दिया हो लेकिन हिंदुओं को एक सामूहिक पहचान के रूप में कभी पूरी तरह निष्कासित या निर्वासित नहीं किया गया। आर्थिक या सामाजिक कारणों से प्रवास हिंदू अनुभव का हिस्सा रहा है। प्रवासी हिंदू अक्सर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव लेकर चलते हैं, जरूरी नहीं कि राजनीतिक या राष्ट्रीय निष्ठा के साथ।

इसलिए जब हम प्रवासी हिंदुओं से यह उम्मीद करते हैं कि वे हमेशा भारत के प्रतिनिधि की तरह व्यवहार करें तो हम एक ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और जटिल पहचान को सपाट बना देते हैं। हम व्यक्तियों को प्रतीक बना देते हैं, ऐसे लोग जिनकी निष्ठा उनके निवास देश के कानून और संस्थाओं से जुड़ी होती है।

निराशावाद के बजाए यथार्थवाद

हमें अपनी दृष्टि को फिर से संतुलित करने की जरूरत है और यथार्थवाद के साथ चीजों को देखने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि न तो अंधा निराशावाद पनपे और न ही भोली आस्था। यह निश्चित रूप से गर्व की बात है जब कोई भारतीय मूल का व्यक्ति FBI का निदेशक बनता है या जब सुंदर पिचाई यह तय करते हैं कि अरबों लोग जानकारी तक कैसे पहुँचें, जब ऋषि सुनक यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बनते हैं या जब सत्य नडेला वैश्विक व्यापार की दिशा तय करते हैं। इन उपलब्धियों को उनके वास्तविक मूल्य पर सराहा जाना चाहिए, ना कि उन्हें पैतृक निष्ठाओं की शर्तों से बोझिल किया जाए।

साथ ही, यह पूरी तरह वैध है कि जब कोई कार्य हानिकारक हो, तो उसकी आलोचना की जाए। अगर पटेल अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं, या अगर नडेला की नीतियाँ लगातार भारतीय हितों को नुकसान पहुँचाती हैं, तो आलोचना न केवल उचित है बल्कि ज़रूरी भी। लेकिन ऐसी आलोचना ठोस शासन और प्रभाव के आधार पर होनी चाहिए—वंश या भावनात्मक जुड़ाव के आधार पर नहीं।

इसका मतलब यह भी है कि भारत अपनी आकांक्षाओं को प्रवासी समुदाय पर नहीं टिका सकता। प्रवासी उद्धारकर्ता का मिथक तब फीका पड़ जाता है जब भारत अपनी क्षमता को भीतर से विकसित करता है। जब शक्ति, प्रभाव और ढांचा देश के अंदर से उभरता है, तब यह और स्पष्ट हो जाता है कि भारत को अपनी उम्मीदें कहाँ रखनी चाहिए। प्रभाव हमेशा तब अधिक टिकाऊ होता है जब वह सोच-समझकर निर्यात किया जाए, न कि केवल विदेश में सफल व्यक्तियों की विरासत के सहारे।

आखिरकार सीमाओं को स्वीकार करना जरूरी है। प्रवासी समुदाय की भूमिका को सबसे बेहतर तरीके से सॉफ्ट पावर के रूप में समझा जा सकता है, एक जुड़ाव के रूप में, एक सांस्कृतिक पुल के रूप में जो देशों के बीच संवाद बनाता है। यह किसी राजनयिक पद का विकल्प नहीं है और न ही इसे विदेश नीति की निगरानी समझना चाहिए। उनकी सफलताएँ वैश्विक हिंदू और भारतीय पहचान को समृद्ध करती हैं लेकिन उनका कर्तव्य उस क्षेत्राधिकार में होता है जिसकी वे सेवा करते हैं।

इसे जागरूकता का संकेत मानें

अब वक्त आ गया है कि हम प्रवासी प्रतीकों पर जो भावनात्मक बोझ डालते हैं, उसे थोड़ा हल्का करें। उन्हें एक इंसान की भूमिका में देखना चाहिए, न कि किसी मिथकीय प्रतिनिधि के रूप में। यह समझना जरूरी है कि उनकी निष्ठा उस देश और उस पद के प्रति होती है जहाँ वे कार्यरत हैं। ना कि भारत के प्रति, भले ही कभी-कभी उनके कर्तव्य हमारी भावनात्मक भूगोल से अलग हो जाएँ।

पटेल से यह उम्मीद करना कि वे भारत के पक्षधर बनें, ऐसा बोझ है जिसे कोई भी सार्वजनिक अधिकारी स्वीकार नहीं करेगा। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला से यह अपेक्षा रखना कि वे हमेशा राष्ट्रवादी रेखा पर चलें, वैश्विक संस्थाओं के काम करने के तरीके से मेल नहीं खाता। थोड़ा विवेक रखें और उन्हें उनकी भूमिकाओं के अनुसार काम करने दें।

भारत का भविष्य प्रवासी विश्वासियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। वह भारत की अपनी शक्ति, सहनशीलता, विश्वसनीयता पर टिका है। चाहे वह कूटनीति हो, अर्थव्यवस्था, सॉफ्ट पावर या नैतिक चरित्र। जब ये आधार मजबूत होते हैं तो प्रवासी गौरव एक गूँज बन जाता है, बोझ नहीं।

अब जागने का समय है। असंभव की उम्मीदें छोड़िए। प्रवासी अपने-अपने पदों की सेवा करें और हम उस भारत की सेवा करें जिसे हम स्पष्टता, संप्रभुता और कम भोली आशा के साथ गढ़ना चाहते हैं।

अब भूल जाओ दंगाइयों के सामने सजदा वाला दौर… बरेली में ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ होते ही दर्द से छटपटाने लगी ‘डिजिटल पत्थरबाज’ आरफा खानम-राणा अय्यूब

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़वी दवाई से कट्टरपंथी बिलबिला रहे हैं। बरेली की हिंसा पर जो बिल में जाकर बैठ गए थे, वे सीएम योगी के आक्रामक बयानों के बाद जुबानी हमलों पर उतर आए हैं। उन्हें कट्टरपंथियों और दंगाइयों के लिए भी ऐसी भाषा की अपेक्षा है कि जिसमें फूल बरसते हों।

आरफा खानम शेरवानी और राणा अय्यूब जैसी कथित पत्रकार जो पत्रकारिता की आड़ में इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाती हैं, वो सीएम योगी के डेंटिंग-पेंटिग वाले तीखे बयानों से खफा है। हालाँकि, यह पूरी जमात बरेली में इस्लामिक कट्टरपंथियों के बवाल पर खामोश बैठी थी।

बरेली में ‘I Love Muhammad’ को लेकर इस्लामी भीड़ ने खूब बवाल किया। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा उकसा रहा था। वो चाहता था कि बवाल मचे चाहे इसके लिए पुलिसकर्मियों की हत्या ही क्यों ना करनी पड़े। पेट्रोल बम, बंदूक, पत्थर, डंडों से लैस इस भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। खूब पत्थर चलाए, फायरिंग की और फिर… फिर पुलिस ने इस कट्टरपंथियों की ठीक से खबर ली।

पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। इस हमले के मुख्य साजिशकर्ता तौकीर रजा को गिरफ्तार कर लिया, उसके अलावा भी दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 2000 से अधिक लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने उपद्रवियों को साफ संदेश दिया की उत्तर प्रदेश में यह दंगा-फसाद नहीं चलेगा। सीएम योगी ने रजा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “बरेली में एक मौलाना भूल गया कि राज्य में सत्ता किसकी है। हमने जो सबक सिखाया है, उससे आने वाली पीढ़ियाँ दंगे करने से पहले दो बार सोचेंगी।”

योगी दंगाइयों को चेताने में यही नहीं रुके, उन्होंने कहा, “जब भी कोई हिंदू पर्व और त्यौहार आता है, उनको गर्मी आने लगती है और उनकी गर्मी को शांत करने के लिए हमें डेंटिंग-पेंटिंग का सहारा लेना पड़ता है।” साथ ही, उन्होंने भारत में गजवा-ए-हिंद का ख्वाब देखने वालों का जहन्नुम का टिकट काटने की बात भी कहीं।

अब यही खरी-खरी बात कुछ कट्टरपंथियो को नागवार गुजरी, तो वो राशन-पानी लेकर ज्ञान देने चले आए। राणा अय्यूब ने X पर सीएम योगी का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “ये भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिया है।” अय्यूब ने लिखा, “मुसलमानों के खिलाफ नफरत के इस खुले मौसम में न्यायपालिका, संस्थाओं, मीडिया और हमारे बुद्धिजीवियों की खामोशी ही इसे सामान्य बना रही है।”

अब, एक और कट्टरपंथियो को देखिए, आरफा खानम शेरवानी भी योगी की तल्ख बयानी से बिलबिला गई हैं। आरफा ने लिखा, “आदित्यनाथ को मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम ‘नाजी’ भाषा का प्रयोग करते हुए सुनकर, यह सवाल उठता है, क्या भारत का संविधान अब भी उत्तर प्रदेश में लागू होता है?”

एक कट्टरपंथी है मारिया खान, उसकी बौखलाहट इन दोनों से भी ज्यादा है। वो X पर लिखती है, “मुसलमानों को ऐसे ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ करने की बात करता है जैसे वे इंसान न होकर कोई कबाड़ हों। सत्ता ने उसे बेशर्म बना दिया है और खामोशी ने खतरनाक।”

ये सारे डिजिटल पत्थरबाज, बरेली की हिंसा पर तौकीर रजा और उस कट्टरपंथी भीड़ की हिंसा पर खामोश बैठे तमाशा देख रहे थे। इन्हें अब लगता है कि दंगाइयों का इलाज डंडा ना हो, ये चाहते हैं कि कोई दंगाइयों के सामने जाकर सजदा करे और वो ‘बेचारे’ सुधर जाएँ।

इन दंगाइयों और उनके प्रेमियों को उन तुष्टिकरण करने वाली सरकारों की आदत लग गई है जो इनके बवाल के बाद भी वोट के लिए इन दंगाइयों को छूने की हिम्मत नहीं करते थे। इसी उत्तर प्रदेश में दंगे के आरोपियों को लेने के लिए पिछली सपा सरकार में विशेष विमान भेजा जाता था। अब इन दंगाइयों पर कार्रवाई हो रही है तो ये बिलबिला उठे हैं।

अब दंगाइयों को मिठाइयाँ खिलाकर या फूल माला पहनाकर या कोई दोहे सुनाकर तो नहीं सुधारा जा सकता है। दंगाइयों का इलाज तो डंडा ही होना चाहिए और ऐसे दंगाई जो देश और उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान और बांग्लादेश हालात बनाना चाहते हैं, उन पर किसी भी तरह का रहम क्यों ही किया जाए?

योगी राज में पुलिस पर पथराव का जवाब सजदा से देने की परंपरा खत्म हो गई है। ऐसे दंगाइयों से समाज की सुरक्षा फूलों की थाल से नहीं बल्कि कानून के डंडे से ही होती है। अगर इन पत्थरबाजों और उनके हिमयातियों को इस साफ-साफ लेकिन कठोर भाषा से दिक्कत है तो बेहतर है कि दंगाई और पत्थरबाज कानून को हाथ में लेने के बजाय जो समाज की अपेक्षा है वैसा काम करें।

विजयादशमी पर CJI गवई की माँ ने दिखाई हिंदूघृणा, बताया सामाजिक चेतना को नुकसान पहुँचाने वाला त्योहार: खुद के ‘आंबेडकरवादी’ होने की दी दुहाई, RSS ने भेजा था निमंत्रण

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में 5 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक कार्यक्रम होना है। यह कार्यक्रम विजयादशमी और संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की माँ कमलताई गवई को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।

लेकिन कमलताई गवई ने निमंत्रण ठुकरा दिया है। खुद को ‘आंबेडकरवादी’ बताते हुए हिंदू विरोधी भावनाओं का इजहार भी किया है। संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का दावा करने वाली मीडिया रिपोर्टों को खारिज करते हुए कमलताई गवई ने मराठी में एक पत्र लिखा है।

पत्र में खुद को आंबेडकरवादी विचारधारा में ओत-प्रोत और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बताया है। उन्होंने लिखा है कि वह किसी भी परिस्थिति में RSS के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगी। साथ ही कहा है कि किसी हिंदू त्यौहार के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने से ‘सामाजिक चेतना को नुकसान’ होगा।

कमलताई गवई ने पत्र में लिखा है, “महाराष्ट्र के अमरावती स्थित श्रीमती नरसम्मा महाविद्यालय मैदान में 5 अक्टूबर को शाम 6:30 बजे होने वाले RSS के विजयादशमी कार्यक्रम में मेरे शामिल होने के बारे में हाल ही में प्रकाशित खबरें पूरी तरह से झूठी हैं। आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित दादा साहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक अध्यक्ष और भारतीय संविधान के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता के कारण मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊँगी या उसका समर्थन करूँगी। विश्वास दिलाती हूँ कि मैं किसी भी तरह से सामाजिक चेतना को कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”

कमलताई गवई ने कहा है कि विजयादशमी का हिंदू संस्कृति में महत्व है। लेकिन उनके जैसे बौद्धों के लिए ‘अशोक विजयादशमी’ या मौर्य सम्राट अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाने और हिंसा का त्याग करना स्मरणोत्सव है। हालाँकि, यह उल्लेख करना जरूरी है कि इतिहासकारों का एक वर्ग और यहाँ तक कि पुरातात्विक साक्ष्य भी संकेत देते हैं कि अशोक का बौद्ध धर्म में परिवर्तन कलिंग युद्ध से पहले का है।

कमलताई गवई ने मीडिया में आई उन खबरों की कड़ी निंदा की और उन्हें ‘RSS का प्रोपेगेंडा’ बताया। जबकि ज्यादातर रिपोर्ट्स में सिर्फ इतना कहा गया था कि RSS ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की माता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित किया है, न कि उन्होंने उसमें शामिल होने की सहमति दी है।

उन्होंने कहा, “मैं महाराष्ट्र और पूरे भारत के लोगों से अपील करती हूँ कि इस बात पर ध्यान दें। विजयादशमी हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण है लेकिन हमारे लिए धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस है, जिसे अशोक विजयादशमी भी कहा जाता है, जो कि सबसे ज्यादा मायने रखता है। मैं हाल ही में प्रकाशित खबरों को गलत जानकारी मानती हूँ और लोगों से आग्रह करती हूँ कि ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण से भटकाने वाले प्रोपेगेंडा का शिकार न हों। मैं अपने सभी आंबेडकरवादी साथियों से कहती हूँ कि इस बात को समझें और मुझ पर भरोसा रखें। मेरी अनुमति या लिखित सहमति के बिना इस खबर को फैलाना RSS की साजिश है। मैं इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करती।”

कमलताई के दूसरे बेटे ने RSS कार्यक्रम में जाने का किया दावा

हालाँकि, कमलताई की तीखी प्रतिक्रिया के तुरंत बाद उनके दूसरे बेटे ने दावा किया कि वह RSS के कार्यक्रम में शामिल होंगी। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और कमलताई के बेटे डॉ. राजेंद्र गवई ने एक वीडियो जारी कर कहा कि कमलताई RSS के कार्यक्रम में जरूर शामिल होंगी और उन्होंने खुद भी निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।

दिवंगत पूर्व राज्यपाल आरएस गवई ने दीक्षाभूमि स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बेटे डॉ. राजेंद्र गवई वर्तमान में स्मारक समिति के सदस्य हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कमलताई गवई की शुरुआती प्रतिक्रिया कि वह RSS द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम या विजयादशमी जैसे हिंदू त्योहार मनाने वाले किसी भी कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होंगी- क्योंकि वह और उनका परिवार ‘आंबेडकरवादी विचारधारा’ और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं- मानो भारतीय संविधान बौद्धों या ‘आंबेडकरवादियों’ को RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने या हिंदू त्योहार मनाने से रोकता हो।

RS गवई
1981 में RSS कार्यक्रम में शामिल आरएस गवई, साथ में भय्याजी सहस्रबुद्धे, बालासाहेब देवरस और बाबासाहेब पथाडे।

हालाँकि उनके दिवंगत पति रामकृष्ण सूर्यभान गवई, जिन्हें दादासाहेब गवई के नाम से भी जाना जाता है और जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के वरिष्ठ नेता थे। वे साल 1981 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।

आरएस गवई, बाबासाहेब अंबेडकर के करीबी सहयोगी थे और नागपुर स्थित दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भी रहे। साल 1998 में वे रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अमरावती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 2006 से 2011 तक, जब केंद्र में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस वक्त वे बिहार, सिक्किम और केरल के राज्यपाल रहे।

साल 2009 में केरल के राज्यपाल रहते हुए आरएस गवई ने मुख्यमंत्री अच्युतानंदन की अगुवाई वाली राज्य कैबिनेट की सिफारिश को दरकिनार कर दिया और CBI को कम्युनिस्ट नेता और वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ SNC-लावालिन भ्रष्टाचार मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। उस समय केरल में कॉन्ग्रेस-UDF विपक्ष में थी। वहीं केंद्र की कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार ने राज्यपाल गवई के इस फैसले का स्वागत किया।

CJI भूषण रामकृष्ण गवई ने खुद बताया कि उनके पिता दादासाहेब गवई कॉन्ग्रेस पार्टी से 40 साल से भी ज्यादा समय तक जुड़े रहे। वे कॉन्ग्रेसस के समर्थन से सांसद और विधायक भी रहे। CJI गवई के भाई राजेंद्र गवई, जो रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, वे भी कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए हैं।

इधर कमलताई गवई के पत्र ने विवाद खड़ा कर दिया। कुछ दिन पहले CJI बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी से देशभर में नाराजगी फैली। यह मामला 16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने आया, जिसकी अध्यक्षता CJI गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह कर रहे थे।

याचिकाकर्ता राकेश दलाल, जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, ने अदालत में कहा कि मूर्ति की पुनर्स्थापना सिर्फ पुरातत्व का मामला नहीं है बल्कि यह आस्था, सम्मान और हिंदुओं के अपने देवी-देवताओं की संपूर्ण रूप में पूजा करने के मूल अधिकार से जुड़ा है।

लेकिन CJI गवई ने इस याचिका को खारिज करते हुए हिंदू आस्था को लेकर कुछ अनावश्यक और तंज भरी बातें कह दीं। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका है। जाओ, अब खुद भगवान से कहो कि कुछ करें। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो तो जाओ और प्रार्थना करो।”

लाल किले से RSS का जिक्र, भागवत के जन्मदिन पर विशेष लेख: PM मोदी ने ‘मन की बात’ में ध्वस्त किए संघ पर फैलाए गए सारे प्रोपेगेंडा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (28 सितंबर 2025) को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का जिक्र किया। यह पिछले करीब डेढ़ महीने में तीसरा मौका है जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से संघ की इस ऐतिहासिक उपलब्धि का जिक्र किया है।

यह इसलिए भी अहम हो जाता है कि लंबे समय से एक वर्ग विशेष यह धारणा बनाने की कोशिश करता रहा है कि मोदी सरकार और संघ के बीच मुद्दे पर मतभेद हैं। कभी कहा जाता है कि सरकार संघ की राय को दरकिनार करती है, तो कभी यह नैरेटिव दिया जाता है कि संघ और मोदी के बीच ‘दूरी’ बढ़ रही है।

दरअसल, पीएम मोदी और संघ का रिश्ता दशकों का है। वो बीजेपी में आने से पहले लंबे वक्त तक संघ के प्रचारक रहे थे। संघ और पीएम मोदी दोनों ही लंबे वक्त तक खुलकर एक-दूसरे को लेकर अपनी बात रखने से बचते रहे हैं लेकिन पिछले दिनों में पीएम मोदी ने साफ कर दिया है कि संघ और उनके बीच कोई दूरी नहीं है बल्कि आत्मीयता का रिश्ता है।

‘मन की बात’ में क्या बोले मोदी?

पीएम मोदी ने राष्ट्र निर्माण में संघ के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा, “इस बार विजयादशमी एक और वजह से बहुत विशेष है। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष हो रहे हैं। एक शताब्दी की ये यात्रा जितनी अद्भुत है, अभूतपूर्व है, उतनी ही प्रेरक है।”

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए देश की आजादी के साथ-साथ ये भी महत्वपूर्ण था कि देश वैचारिक गुलामी से भी आजाद हो। ऐसे में, परम पूज्य डॉ० हेडगेवार जी ने इस विषय में मंथन करना शुरू किया और फिर इसी भगीरथ कार्य के लिए उन्होंने 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। डॉक्टर साहब के जाने के बाद परम पूज्य गुरु जी ने राष्ट्र सेवा के इस महायज्ञ को आगे बढ़ाया।”

पीएम मोदी ने कहा, “त्याग और सेवा की भावना और अनुशासन की सीख यही संघ की सच्ची ताकत है। आज RSS सौ वर्ष से बिना थके, बिना रुके, राष्ट्र सेवा के कार्य में लगा हुआ है। इसीलिए हम देखते हैं, देश में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आए, RSS के स्वयंसेवक सबसे पहले वहाँ पहुँच जाते हैं।”

मोहन भागवत के जन्मदिन पर PM मोदी ने लिखा लेख

पीएम मोदी ने बीते 11 सितंबर को RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत के जन्मदिन पर एक लंबा लेख लिखा था। इसके साथ ही उन्होंने उन सारी अफवाहों को विराम दे दिया जो उनके और मोहन भागवत के कथित मतभेदों को लेकर उड़ाई जाती थीं।

इस लेख में पीएम मोदी ने लिखा था, “भागवत जी का पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाला रहा है। उन्होंने कई वर्षों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों, विशेषकर विदर्भ में काम किया। अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख के रूप में मोहन भागवत जी के कार्यों को आज भी कई स्वयंसेवक स्नेहपूर्वक याद करते हैं। इसी कालखंड में मोहन भागवत जी ने बिहार के गांवों में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिताए और समाज को सशक्त करने के कार्य में समर्पित रहे।”

उन्होंने लिखा था, “हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमारे पास मोहन भागवत जी जैसे दूरदर्शी और परिश्रमी सरसंघचालक हैं, जो ऐसे समय में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक की उनकी जीवन यात्रा उनकी निष्ठा और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती है।”

लाल किले से RSS का जिक्र

पीएम मोदी ने बीते 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए RSS की खूब तारीफ की थी। यह उनके प्रधानमंत्री काल में पहला अवसर था जब उन्होंने लाल किले से संघ का जिक्र किया था। पीएम मोदी ने ‘गर्व के साथ’ संघ का जिक्र किया था।

पीएम मोदी ने कहा था, “आज से 100 साल पहले एक संगठन का जन्म हुआ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, 100 साल की राष्ट्र की सेवा, एक बहुत ही गौरवपूर्ण स्वर्णिम पृष्ठ है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर के 100 साल तक मां भारती का कल्याण का लक्ष्य लेकर के स्‍वयंसेवकों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया है।”

पीएम मोदी ने कहा था, “सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन, यह जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का यह सबसे बड़ा एनजीओ है। मैं लाल किले के प्राचीर  से 100 साल की इस राष्ट्र सेवा की यात्रा में योगदान करने वाले सभी स्वयंसेवकों को आदरपूर्वक स्‍मरण करता हूँ।”

इसके अलावा मार्च 2025 के आखिर में पीएम मोदी नागपुर स्थित संघ के मुख्यालय पहुँचे थे और वहाँ जाकर उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि भी अर्पित की थी। इसके बाद अप्रैल के आखिर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री आवास जाकर PM मोदी से लंबी मुलाकात भी की थी। इसके बाद देशभर में जातीय जनगणना का एलान किया गया था।

PM मोदी के हालिया विचारों से साफ है कि ना तो उनके व संघ के बीच और ना ही सरकार व संघ के बीच कोई खाई है। इसके विपरित यह रिश्ता विचारधारा और समर्पण के भरोसा की बुनियाद पर बना है।

आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब PM मोदी द्वारा RSS की प्रशंसा यह भी दिखाती है कि विचारधार की शक्ति और सामाजिक संगठन एक राष्ट्र को मजबूत करने के लिए कितने जरूरी है। RSS यही ताकत भारत को प्रदान कर रहा है।

RSS की स्थापना 1925 में डॉ. हेडगेवार ने की थी और बीते 100 वर्षों में संगठन ने बिना किसी औपचारिक राजनीतिक पहचान के समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्यों को अपना लक्ष्य बनाया है और इसी के साथ आगे बढ़ रहा है। PM मोदी के ये संदेश स्पष्ट करते हैं कि विरोधी कितना भी प्रोपेगेंडा कर लें उनका और संघ का रिश्ता जो दशकों पुराना है, वो ऐसे ही अनवरत आगे बढ़ता रहेगा।

रीवा में सड़क पर मिला गाय का कटा सिर, अकबरी बेगम बोली- ‘₹100 में होती है गो मांस की होम डिलीवरी’: स्थानीय लोगों का हंगामा, मोहम्मद इस्माइल समेत 2 लोग पकड़े गए

मध्य प्रदेश के रीवा में शनिवार (27 सितंबर 2025) देर रात बिछिया थाना क्षेत्र के लक्ष्मण बाग मोहल्ले में एक अजीब और डराने वाली घटना सामने आई है। मोहल्लेवासियों को बीच सड़क पर एक गाय का कटा हुआ सिर मिला।

सुबह होते ही गुस्साए लोगों ने सिर सड़क पर रखकर चक्का जाम कर दिया और आरोपितों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग उठाई। स्थानीय लोगों का कहना है कि 27 सितंबर की रात दो अज्ञात व्यक्ति पहले इलाके में रेकी करते दिखाई दिए थे।

कुछ लोगों ने बताया कि वे संदिग्ध रात में मोहल्ले के आस-पास घूमते हुए देखे गए थे। सुबह मोहल्ले में घूमने वाली गाय गायब पाई गई और बाद में उसका कटा हुआ सिर मिला। जिसके बाद लोगों ने कार्रवाई की माँग करते हुए सड़क पर गाय का कटा हुआ सिर रख कर सड़क जाम कर दिया।

स्थानीयों लोगों ने बताया कि इलाके में कई बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं, इसलिए लोग पहले से ही सतर्क थे और संदिग्ध गतिविधि पर ध्यान दे रहे थे। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि रात में मोहल्ले में घूमते हुए लोगों को देखा गया और बाद में CCTV फुटेज चेक करने पर कुछ अज्ञात शख्स संदिग्ध लग रहे थे।

एक वीडियो में तो गाय संदिग्धों से डरकर भागती हुई नजर आ रही हैं, जिसे स्थानीय निवासी विशाल सिंह परिहार ने ऑपइंडिया के साथ साझा की।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है और आरोपितों की तलाश में जुटी है। ऑपइंडिया के पास मौजूद मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, घटना वाले दिन ही अज्ञात आरोपितों के खिलाफ बीएनएस की धारा 196(2), 299 और 365, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) और मध्य प्रदेश गोवंश वध प्रतिषेध नियम 2004 की धारा 6/9 के तहत FIR दर्ज की गई है।

रीवा के मुख्य पुलिस अधीक्षक राजीव पाठक ने मौके का जायजा लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ कड़ी और जल्द कार्रवाई की जाएगी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर रही है ताकि आरोपितों की पहचान की जा सके।

बिछिया थाने की एसएचओ, मनिधा उपाध्याय ने बताया कि पुलिस लगातार आरोपितों की तलाश कर रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लोगों से सहयोग करने और शांति बनाए रखने की अपील की है। इस बीच, पुलिस ने मामले में दो लोगों मोहम्मद इस्माइल और एक नाबालिग को हिरासत में लिया है।

विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता बालकृष्ण द्विवेदी ने कहा, “हमारी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। अगर प्रशासन ने आरोपितों को जल्दी गिरफ्तार नहीं किया तो बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।”

घटना के बाद एक स्थानीय महिला अकबरी बेगम ने बताया कि उनके झोपड़ियों तक 100-200 रुपए में गोमांस पहुँचाया जाता है। पुलिस फिलहाल मामला दर्ज कर CCTV फुटेज, स्थानीय बयानों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जाँच कर रही है।

दुर्गा पंडाल में कहीं ‘काबा-मदीना’ तो कहीं ‘ईसा मसीह’, उस दिन से डरो सेकुलरों जब धैर्य की प्रतीक्षा खत्म होगी

कभी आपने सुना की सेक्युलरिज्म के नाम पर किसी मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया हो। कभी ये सुना है कि मुस्लिमों के किसी मजहबी जुलूस में भगवान राम या कृष्ण के नाम की जय-जयकार की गई हो। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि सेक्युलरिज्म के नाम पर सारे प्रयोगों की ठेकेदारी हिंदू त्योहारों की ही है।

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कला-संस्कृति से लेकर आधुनिकता और विविधता पर हिंदुओं के त्योहारों पर तमाम तरह के प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हिंदुओं के हर त्योहार से पहले या उनके दौरान पानी में कंकड़ मारकर यह परखा जाता है कि हिंदुओं की सहनशीलता कितनी है, वे कहाँ तक बर्दाश्त कर सकते हैं।

इसे अब कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं, इन दिनों नवरात्रि चल रही हैं और देशभर में दुर्गा पंडाल लगे हैं। कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी एक पंडाल में पहुँची, साथ में मदन मित्रा समेत पार्टी के अन्य नेता भी थे। पंडाल में जाकर पूजा-अर्चना करनी चाहिए थे लेकिन हुआ क्या?

मदन मित्रा ने दुर्गा पंडाल में ‘मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है’ गाना शुरू कर दिया। जाहिर है, दुर्गा पंडाल में इसे गाए जाने का कोई मतलब, कोई तुक नहीं है। ऐसे में ममता को अपने नेता को रोकना चाहिए था लेकिन वो क्या कर रही थीं? वो अपने नेता के इस गीत पर ताली बजा रही थीं। यह सब तमाशा खुद को सेक्युलर दिखाने के लिए किया जा रहा है।

अब सोचिए, ममता बनर्जी और उनके नेता ने जो किया अगर वही काम किसी अन्य मजहब के कार्यक्रम में हुआ होता तो क्या होता, क्या पूरे देश में हंगामा खड़ा नहीं हो गया होता? क्या सेक्युलरिज्म के सूरमा सड़कों पर नहीं आ गए होते?

ये हुआ बस एक उदाहरण, एक और देखिए, झारखंड की राजधानी राँची में तो बात इससे भी आगे बढ़ गई, वहाँ दुर्गा पूजा पंडाल को ही ‘वेटिकन सिटी’ की थीम पर बना दिया गया। सेक्युलरिज्म में कमी ना रह जाए इसलिए इस पंडाल में बाकायदा ईसा मसीह की मूर्तियाँ और क्रॉस तक लगाए गए थे।

और आगे बढ़िए, कर्नाटक में दशहरे के उत्सव की शुरुआत करने के लिए एक मुस्लिम महिला बानू मुश्ताक को बुलाया गया। मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।

कभी आपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या यह हिंदुओं के पर्व को किसी और धर्म के चेहरों से जोड़ने की सोची-समझी कोशिश नहीं लगती है? क्या यह हिंदुओं की परंपराओं के साथ प्रयोग नहीं है?

ऐसी प्रयोगधर्मिता गरबा में भी नजर आती है, गरबा में मुस्लिम युवकों को प्रवेश मिल जाए, इसका माहौल एक जमात द्वारा बनाया जा रहा है। जो लोग इन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अब इसके उल्ट दूसरी स्थिति देखिए, गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ का वॉट्सऐप स्टेटस लगाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक युवक की पिटाई कर दी। यानी आप उनके ‘I Love Muhammad’ जैसा कुछ करने की कोशिश करेंगे तो आप मारे-पीटे जाएँगे। यही नए जमाने का सेक्युलरिज्म है।

इन सारी चीजों को क्रमवार देखने पर लगता है कि यह स्वत: नहीं हो रहा है। बल्कि यह एक चाल है, पहले धीरे-धीरे हिंदुओं की आस्था पर चोट करो, उनकी सीमा जाँचो, उनकी प्रतिक्रिया को तौलो और फिर अगला कदम बढ़ाओ।

हिंदुओं से उम्मीद की जाती है कि वे हमेशा चुपचाप सब सह लें। उन्हें हमेशा समझौता करना है, हमेशा दूसरों को जगह देनी है, हमेशा अपने त्योहारों-परंपराओं को बदलने की आदत डालनी है।

इस मानसिकता को अब बदलने जाने की जरूरत है। हिंदू अगर चुप रहेंगे तो यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। हर बार नए प्रयोग होंगे, हर बार नई चोट लगेगी और धीरे-धीरे पूरी आस्था खोखली कर दी जाएगी। शायद कुछ लोगों की कोशिश भी यही है।