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काश पटेल का असीम मुनीर से हाथ मिलाना विश्वासघात नहीं, जियोपॉलिटिक्स की वास्तविकता है: भारत के हिंदुओं को छोड़नी होगी ‘असंभव की उम्मीद’

काश पटेल की पाकिस्तान के असीम मुनीर से वायरल हैंडशेक ने प्रवासी भारतीयों को लेकर बहस फिर से शुरू कर दी है। यह दिखाता है कि सुंदर पिचाई, सत्य नडेला या आशा जडेजा मोटवानी जैसे भारतीय मूल के लोग अपने पद और उस देश के लिए काम करते हैं जहाँ वे रहते हैं, न कि भारत के हितों के रक्षक के तौर पर।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर से 25 सितंबर 2025 को मुलाकात की। इस बैठक में FBI प्रमुख काश पटेल भी मौजूद थे। बैठक की एक तस्वीर में काश पटेल पाकिस्तान के मुनीर से हाथ मिलाते दिखे, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

काश पटेल भारतीय मूल के हैं और हिंदू विरासत से आते हैं। जब उनकी यह तस्वीर व्हाइट हाउस में मुनीर से हाथ मिलाते हुए सामने आई तो भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच हलचल मच गई। कुछ लोगों ने इसे विश्वासघात कहा, कुछ ने इसे दोहरा मापदंड बताया और कुछ ने इसे मिलीभगत समझा। यह एक ऐसा पल बन गया जिसने सिर्फ पटेल की स्थिति नहीं बल्कि प्रवासी हिंदुओं से जुड़ी भारतीय उम्मीदों को भी उजागर किया।

लेकिन अब शायद जरूरत है एक शांत और संतुलित सोच की। हमें यह समझना होगा कि काश पटेल को दोष देना आसान है लेकिन शायद यह पल हमें खुद से सवाल करने का मौका देता है। क्या हमारी उम्मीदें उन प्रवासी हिंदुओं से हैं या वे हमारी अपनी असुरक्षाओं और भावनाओं का प्रतिबिंब हैं?

द ऑप्टिक्स, और क्यों ये मायने रखते हैं

जैसा कि मीडिया ने भी जोर देकर बताया, पटेल और मुनीर की हाथ मिलाने की तस्वीर सबकी नजरों में आ गई। इस ‘इशारे’ को लेकर कई सवाल उठे, खासकर इसलिए क्योंकि मुनीर ने हाल ही में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक विभाजन पर जोर दिया था और दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन भी किया था।

नेटिजन्स ने पटेल की हिंदू पहचान, उनके ‘जय श्री कृष्ण’ कहने के पुराने बयान और उनके निजी संस्कारों और सार्वजनिक पद के बीच के अंतर को लेकर सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी छोड़ दी। लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा जारी की गई तस्वीर सिर्फ एक पल का दृश्य थी। ये एक तरह का राजनीतिक मंचन है और ये समझना जरूरी है कि उस तस्वीर में मुनीर से हाथ मिलाते हुए जो व्यक्ति दिख रहा है, वो कई सीमाओं, संस्थाओं और जिम्मेदारियों से बंधा हुआ है।

प्रवासी भारतीयों पर हमारी अपेक्षाओं का दबाव

अक्सर हम प्रवासी भारतीयों पर असंभव अपेक्षाएँ थोप देते हैं। यह आम धारणा है कि चूँकि उनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं इसलिए उन्हें भारत के हितों के प्रतिनिधि, रक्षक या संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि सुंदर पिचाई हमेशा भारतीय डेवलपर्स का पक्ष लें, सत्य नडेला माइक्रोसॉफ्ट को भारत की ओर झुका दें और पटेल किसी भी ऐसे आधिकारिक संवाद से इनकार कर दें जो पाकिस्तान के प्रति भारत की कमजोरी दर्शाए।

तुलसी गैबर्ड को ही ले लीजिए। अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने हिंदू प्रतीकों और मंत्रों का जिक्र जरूर किया लेकिन उन्होंने हमेशा एक अमेरिकी राजनेता की तरह काम किया न कि भारत की प्रतिनिधि बनकर। उनकी जिम्मेदारी उनके मतदाताओं और उस अमेरिकी कॉन्ग्रेस के प्रति थी, जहाँ उन्होंने सेवा दी, न कि भारत या वैश्विक हिंदू समुदाय के प्रति। इससे अलग कोई उम्मीद करना सांस्कृतिक प्रतीकों को राजनीतिक निष्ठा समझने की भूल है।

लेकिन यह नागरिक पद या कॉर्पोरेट संचालन की तर्क नहीं है। यह उस मिथक की तर्कशक्ति है, जिसे हम अपने भीतर लिए चलते हैं और जिसे हम सच होता देखना चाहते हैं, जब कोई भारतीय प्रवासी किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँचता है- जैसे काश पटेल।

ऋषि सुनक, जो यूनाइटेड किंगडम के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं। उनके भारत में पैतृक जड़ों के बावजूद अपने देश के हितों को ही आगे बढ़ाएँगे। उसी तरह पटेल भी FBI निदेशक के रूप में अमेरिका के हितों को प्राथमिकता देंगे, न कि भारत के। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला अपनी कंपनियों को लाभ, नियामकीय अनुपालन और वैश्विक बाजारों की ओर ले जाएँगे, न कि किसी राष्ट्रीय मिथक की दिशा में।

उनके कार्यों में कोई विश्वासघात नहीं है। दरअसल, यही तो असली दुनिया का तरीका है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि हर चूक या राजनीतिक समझौते को नजरअंदाज किया जाए। इसका मकसद है हमारी सोच को फिर से संतुलित करना। यह माँग बंद करना कि हर प्रवासी हिंदू अपनी पहचान और नियति की दोहरी नागरिकता निभाए।

एक और उदाहरण लेते हैं, आशा जाडेजा मोटवानी, जो एक भारतीय-अमेरिकी वेंचर कैपिटलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी की बड़ी डोनर हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से भारत को डोनाल्ड ट्रंप की मानसिकता के बारे में सलाह दी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे ट्रंप से संवाद करें और उन्हें संतुष्ट करें ताकि व्यापारिक तनाव कम हो सके। उन्होंने यहाँ तक कहा कि भारत को ट्रंप का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम में मध्यस्थता की।

भले ही उनकी सोच और भाषा में कुछ समस्याएँ थीं लेकिन उनका रुख साफतौर पर यह दिखाता है कि जो लोग किसी बाहरी देश में रहते हैं और वहीं अपनी जिंदगी बसा चुके हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसी देश के लिए अपना कर्तव्य निभाएँगे, ना कि भारत के लिए। उनकी सलाह सिर्फ एक सलाह थी, कोई विदेश नीति नहीं। वे भारत को किसी कार्रवाई के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। उसी तरह, उनसे उम्मीद करना कि वे भारत का पक्ष लें, कुछ ज्यादा ही माँग है क्योंकि उनकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं।

कर्तव्य, पहचान और संस्थागत निष्ठा

भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता ‘स्वधर्म‘ की बात करती है, जिसका अर्थ है अपने कर्तव्य का पालन करना, बिना फल की आसक्ति के। पटेल ने अमेरिकी संविधान की सेवा की शपथ ली है और वह शपथ उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता पर हाथ रखकर ली थी। उनका धर्म है अमेरिकी संस्थाओं की सेवा करना- कानून, नौकरशाही और सुरक्षा की अनिवार्यताओं से बँधा हुआ। अगर उस कर्तव्य के चलते कुछ दृश्य असहज लगें तो सवाल विश्वासघात का नहीं है बल्कि हमारी अपेक्षाओं और संस्थागत वास्तविकता के बीच के असंतुलन का है।

पटेल मुनीर से हाथ मिलाने से इनकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसका असर उनके ऊपर पड़ता। संस्थागत मानकों को कमजोर करना वह चीज नहीं है, जिसकी उम्मीद अमेरिका अपने FBI निदेशक से करता।

यहूदी और इजरायल का उदाहरण

प्रवासी निष्ठा को लेकर कई चर्चाएँ होती रही हैं, जिनमें यहूदी प्रवासियों और इजरायल का उदाहरण बार-बार सामने आता है, यह एक तरह का भाषाई संक्षेप है, जिसमें कहा जाता है, “देखिए, दुनिया भर के यहूदी इजरायल के लिए एकजुट हो जाते हैं तो हिंदू भारत के लिए क्यों नहीं?” लेकिन यह तुलना कमजोर है बल्कि कई बार भ्रामक भी साबित होती है।

इजरायल एक आधुनिक राष्ट्र है, जो एक मातृभूमि के रूप में अस्तित्व में आया। इसका गठन सदियों की विस्थापन और उत्पीड़न की पीड़ा के बाद हुआ। यहूदी प्रवासी अक्सर इजरायस को एक अस्तित्वगत शरणस्थली और एक राष्ट्रीय आधार के रूप में देखते हैं। बहुत से यहूदियों के लिए उनकी पहचान और इजरायल की नियति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इसके विपरीत हिंदू सदियों से भारत में निरंतर बसे हुए हैं। भले ही प्रवास, आक्रमण, धर्मांतरण और विभाजन ने इतिहास को बदल दिया हो लेकिन हिंदुओं को एक सामूहिक पहचान के रूप में कभी पूरी तरह निष्कासित या निर्वासित नहीं किया गया। आर्थिक या सामाजिक कारणों से प्रवास हिंदू अनुभव का हिस्सा रहा है। प्रवासी हिंदू अक्सर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव लेकर चलते हैं, जरूरी नहीं कि राजनीतिक या राष्ट्रीय निष्ठा के साथ।

इसलिए जब हम प्रवासी हिंदुओं से यह उम्मीद करते हैं कि वे हमेशा भारत के प्रतिनिधि की तरह व्यवहार करें तो हम एक ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और जटिल पहचान को सपाट बना देते हैं। हम व्यक्तियों को प्रतीक बना देते हैं, ऐसे लोग जिनकी निष्ठा उनके निवास देश के कानून और संस्थाओं से जुड़ी होती है।

निराशावाद के बजाए यथार्थवाद

हमें अपनी दृष्टि को फिर से संतुलित करने की जरूरत है और यथार्थवाद के साथ चीजों को देखने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि न तो अंधा निराशावाद पनपे और न ही भोली आस्था। यह निश्चित रूप से गर्व की बात है जब कोई भारतीय मूल का व्यक्ति FBI का निदेशक बनता है या जब सुंदर पिचाई यह तय करते हैं कि अरबों लोग जानकारी तक कैसे पहुँचें, जब ऋषि सुनक यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बनते हैं या जब सत्य नडेला वैश्विक व्यापार की दिशा तय करते हैं। इन उपलब्धियों को उनके वास्तविक मूल्य पर सराहा जाना चाहिए, ना कि उन्हें पैतृक निष्ठाओं की शर्तों से बोझिल किया जाए।

साथ ही, यह पूरी तरह वैध है कि जब कोई कार्य हानिकारक हो, तो उसकी आलोचना की जाए। अगर पटेल अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं, या अगर नडेला की नीतियाँ लगातार भारतीय हितों को नुकसान पहुँचाती हैं, तो आलोचना न केवल उचित है बल्कि ज़रूरी भी। लेकिन ऐसी आलोचना ठोस शासन और प्रभाव के आधार पर होनी चाहिए—वंश या भावनात्मक जुड़ाव के आधार पर नहीं।

इसका मतलब यह भी है कि भारत अपनी आकांक्षाओं को प्रवासी समुदाय पर नहीं टिका सकता। प्रवासी उद्धारकर्ता का मिथक तब फीका पड़ जाता है जब भारत अपनी क्षमता को भीतर से विकसित करता है। जब शक्ति, प्रभाव और ढांचा देश के अंदर से उभरता है, तब यह और स्पष्ट हो जाता है कि भारत को अपनी उम्मीदें कहाँ रखनी चाहिए। प्रभाव हमेशा तब अधिक टिकाऊ होता है जब वह सोच-समझकर निर्यात किया जाए, न कि केवल विदेश में सफल व्यक्तियों की विरासत के सहारे।

आखिरकार सीमाओं को स्वीकार करना जरूरी है। प्रवासी समुदाय की भूमिका को सबसे बेहतर तरीके से सॉफ्ट पावर के रूप में समझा जा सकता है, एक जुड़ाव के रूप में, एक सांस्कृतिक पुल के रूप में जो देशों के बीच संवाद बनाता है। यह किसी राजनयिक पद का विकल्प नहीं है और न ही इसे विदेश नीति की निगरानी समझना चाहिए। उनकी सफलताएँ वैश्विक हिंदू और भारतीय पहचान को समृद्ध करती हैं लेकिन उनका कर्तव्य उस क्षेत्राधिकार में होता है जिसकी वे सेवा करते हैं।

इसे जागरूकता का संकेत मानें

अब वक्त आ गया है कि हम प्रवासी प्रतीकों पर जो भावनात्मक बोझ डालते हैं, उसे थोड़ा हल्का करें। उन्हें एक इंसान की भूमिका में देखना चाहिए, न कि किसी मिथकीय प्रतिनिधि के रूप में। यह समझना जरूरी है कि उनकी निष्ठा उस देश और उस पद के प्रति होती है जहाँ वे कार्यरत हैं। ना कि भारत के प्रति, भले ही कभी-कभी उनके कर्तव्य हमारी भावनात्मक भूगोल से अलग हो जाएँ।

पटेल से यह उम्मीद करना कि वे भारत के पक्षधर बनें, ऐसा बोझ है जिसे कोई भी सार्वजनिक अधिकारी स्वीकार नहीं करेगा। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला से यह अपेक्षा रखना कि वे हमेशा राष्ट्रवादी रेखा पर चलें, वैश्विक संस्थाओं के काम करने के तरीके से मेल नहीं खाता। थोड़ा विवेक रखें और उन्हें उनकी भूमिकाओं के अनुसार काम करने दें।

भारत का भविष्य प्रवासी विश्वासियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। वह भारत की अपनी शक्ति, सहनशीलता, विश्वसनीयता पर टिका है। चाहे वह कूटनीति हो, अर्थव्यवस्था, सॉफ्ट पावर या नैतिक चरित्र। जब ये आधार मजबूत होते हैं तो प्रवासी गौरव एक गूँज बन जाता है, बोझ नहीं।

अब जागने का समय है। असंभव की उम्मीदें छोड़िए। प्रवासी अपने-अपने पदों की सेवा करें और हम उस भारत की सेवा करें जिसे हम स्पष्टता, संप्रभुता और कम भोली आशा के साथ गढ़ना चाहते हैं।

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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