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‘हम सौभाग्यशाली हैं, हमें ये महान अवसर को देखने को मिला’ : RSS के शताब्दी वर्ष पर PM मोदी ने दी शुभकामनाएँ, बोले- विकसित भारत में संघ का होगा योगदान

100 वर्ष पूर्व विजयदशमी के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई थी। ये हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनर्स्थापन था, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर उस युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए, नए-नए अवतारों में प्रकट होती है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। ये हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है।

मैं इस अवसर पर राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित कोटि-कोटि स्वयंसेवकों को शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं संघ के संस्थापक, हम सभी के आदर्श…परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए हैं।

जिस तरह विशाल नदियों के किनारे मानव सभ्यताएँ पनपती हैं, उसी तरह संघ के किनारे भी सैकड़ों जीवन पुष्पित-पल्लवित हुए हैं। जैसे एक नदी जिन रास्तों से बहती हैं, उन क्षेत्रों को अपने जल से समृद्ध करती हैं, वैसे ही संघ ने इस देश के हर क्षेत्र, समाज के हर आयाम को स्पर्श किया है। जिस तरह एक नदी कई धाराओं में ख़ुद को प्रकट करती है, संघ की यात्रा भी ऐसी ही है। संघ के अलग-अलग संगठन भी जीवन के हर पक्ष से जुड़कर राष्ट्र की सेवा करते हैं।

शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, आदिवासी कल्याण, महिला सशक्तिकरण, समाज जीवन के ऐसे कई क्षेत्रों में संघ निरंतर कार्य करता रहा है। विविध क्षेत्र में काम करने वाले हर संगठन का उद्देश्य एक ही है, भाव एक ही है….राष्ट्र प्रथम।

अपने गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएँ। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएँ…व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं।

राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति यही संघ की सौ वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं।

संघ जब से अस्तित्व में आया…संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही। आज़ादी की लड़ाई के समय परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए। आजादी की लड़ाई में कितने ही स्वतन्त्रता सेनानियों को संघ संरक्षण देता रहा…उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता रहा।

आजादी के बाद भी संघ निरंतर राष्ट्र साधना में लगा रहा। इस यात्रा में संघ के खिलाफ साजिशें भी हुईं, संघ को कुचलने का प्रयास भी हुआ। ऋषितुल्य परम पूज्य गुरु जी को झूठे केस में फँसाया गया। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने कभी कटुता को स्थान नहीं दिया। क्योंकि वो जानते है, हम समाज से अलग नहीं हैं, समाज हमसे ही तो बना है। समाज के साथ एकात्मता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आस्था ने संघ के स्वयंसेवकों को हर संकट में स्थित प्रज्ञ रखा है…समाज के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है।

प्रारंभ से संघ… राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। जब विभाजन की पीड़ा ने लाखों परिवारों को बेघर कर दिया, तब स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा की। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना…ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं।

अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया…स्वाभिमान जगाया। संघ देश के उन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है..जो दुर्गम हैं…जहाँ पहुँचना सबसे कठिन है। संघ…दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाज, आदिवासी मूल्यों को सहेजने-संवारने में अपना सहयोग देता रहा है…अपना कर्तव्य निभा रहा है। आज सेवा भारती…विद्या भारती, एकल विद्यालय…वनवासी कल्याण आश्रम…आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का स्तंभ बनकर उभरे हैं।

समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियाँ हैं, जो ऊँच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएँ हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।

परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर ‘न हिन्दू पतितो भवेत्’ की भावना को आगे बढ़ाया। पूज्य बाला साहब देवरस जी कहते थे- छुआछूत अगर पाप नहीं, तो दुनिया में कोई पाप नहीं! सरसंघचालक रहते हुए पूज्य रज्जू भैया जी और पूज्य सुदर्शन जी ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाया। वर्तमान सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने भी समरसता के लिए समाज के सामने एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान का स्पष्ट लक्ष्य रखा है।

जब 100 साल पहले संघ अस्तित्व में आया था तो उस समय की आवश्यकताएँ, उस समय के संघर्ष कुछ और थे। लेकिन आज 100 वर्षों बाद जब भारत विकसित होने की तरफ बढ़ रहा है तब आज के समय की चुनौतियाँ अलग हैं, संघर्ष अलग हैं। दूसरे देशों पर आर्थिक निर्भरता, हमारी एकता को तोड़ने की साजिशें, डेमोग्राफी में बदलाव के षड़यंत्र, हमारी सरकार इन चुनौतियों से तेजी से निपट रही है। मुझे ये खुशी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस रोडमैप भी बनाया है।

संघ के पंच परिवर्तन, स्व बोध, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार और पर्यावरण ये संकल्प हर स्वयंसेवक के लिए देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को परास्त करने की बहुत बड़ी प्रेरणा हैं।

स्व बोध की भावना का उद्देश्य गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत पर गर्व और स्वदेशी के मूल संकल्प को आगे बढ़ाना है। सामाजिक समरसता के जरिए वंचित को वरीयता देकर सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रण है। आज हमारी सामाजिक समरसता को घुसपैठियों के कारण डेमोग्राफी में आ रहे बदलाव से भी बड़ी चुनौती मिल रही है। देश ने भी इससे निपटने के लिए डेमोग्राफी मिशन की घोषणा की है। हमें कुटुम्ब प्रबोधन यानी परिवार संस्कृति और मूल्यों को भी मजबूत बनाना है। नागरिक शिष्टाचार के जरिए नागरिक कर्तव्य का बोध हर देशवासी में भरना है। इन सबके साथ अपने पर्यावरण की रक्षा करते हुये आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।

अपने इन संकल्पों को लेकर संघ अब अगली शताब्दी की यात्रा शुरू कर रहा है। 2047 के विकसित भारत में संघ का हर योगदान, देश की ऊर्जा बढ़ाएगा, देश को प्रेरित करेगा। पुन: प्रत्येक स्वयंसेवक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

Wikipedia के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी में एलन मस्क, लाएँगे Grokipedia: क्या वामपंथी प्रोपेगेंडा को खत्म कर पाएगा नया ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया

दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया ‘विकिपीडिया’ (Wikipedia) के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात विकिपीडिया को टक्कर देने के लिए मस्क ‘ग्रोकिपीडिया’ (Grokipedia) बनाने जा रहे हैं। यह मस्क की कंपनी एक्सएआई (xAI) द्वारा विकसित किया जाएगा।

xAI के संस्थापक मस्क ने घोषणा की है कि यह एक ओपन-सोर्स ज्ञान का भंडार होगा जो विकिपीडिया का विकल्प बनने की दिशा में काम करेगा। मस्क ने कहा है कि यह विकिपीडिया से बेहतर होगा और इसके इस्तेमाल के लिए कोई लिमिट नहीं होगी। मस्क ने लोगों से xAI से जुड़कर ग्रोकिपीडिया बनाने में मदद करने की अपील भी की है।

एलन मस्क ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में कहा, “हम ग्रोकिपीडिया बना रहे हैं। यह विकिपीडिया से बहुत बड़ा सुधार होगा। वास्तव में, यह एक्सएआई के ब्रह्मांड को समझने के लक्ष्य की दिशा में एक आवश्यक कदम है।”

इससे पहले मस्क ने विकिपीडिया को अपना नाम बदलने के लिए $1 बिलियन की पेशकश की थी। मस्क ने बुधवार को इससे जुड़ा एक पोस्ट भी रिपोस्ट किया है, जिसमें लिखा है, “विकिपीडिया को एलन मस्क से 1 बिलियन डॉलर का प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए था, अब बहुत देर हो चुकी है, प्रतिद्वंद्वी आ रहा है- ग्रोकिपीडिया!”

मस्क द्वारा यह घोषणा 30 सितंबर 2025 को की गई, जब मस्क ने डेविड सैक्स के एक पोस्ट का जवाब दिया, जिसमें विकिपीडिया की पूर्वाग्रही होने की आलोचना की गई थी।

कैसे काम करेगा ग्रोकिपीडिया?

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, एक्सएआई की टीम द्वारा विकसित किया जाएगा, जिसमें एआई विशेषज्ञ और डेवलपर्स शामिल होंगे। मस्क ने लोगों को आमंत्रित किया है। यह ओपन-सोर्स होगा, अर्थात इसका कोड और सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होगी, जिससे कोई भी व्यक्ति इसमें सुधार कर सकेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नवंबर 2023 में लॉन्च किया गया ग्रोक नामक एआई चैटबॉट इस प्लेटफॉर्म का मुख्य इंजन होगा। ग्रोकिपीडिया में एआई का उपयोग जानकारी को सत्यापित करने, गलतियों को सुधारने और रीयल-टाइम अपडेट्स देने के लिए किया जाएगा। साथ ही, एक्स प्लेटफॉर्म से प्राप्त रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जानकारी हमेशा अपडेट रहे।

मस्क के मुताबिक, ग्रोकिपीडिया का लक्ष्य विकिपीडिया की तुलना में अधिक सटीक, पारदर्शी और विविध जानकारी लोगों तक पहुँचाना है। मस्क लंबे समय से विकिपीडिया की आलोचना करते रहे हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने X पर ही एक पोस्ट किया था कि विकिपीडिया पर अति-वामपंथी एक्टिविस्ट्स का नियंत्रण है। मस्क ने लिखा था, “लोगों को उन्हें दान देना बंद कर देना चाहिए।”

विकिपीडिया का एंटी हिंदू और वामपंथ प्रेमी प्रोपेगेंडा

Wikimedia Foundation बेशक यह दावा करता रहा हो कि विकिपीडिया एक स्वतंत्र, संपादकीय हस्तक्षेप-रहित विश्वकोश है लेकिन हकीकत इससे अलग है। वामपंथियों की टूलकिट बने विकिपीडिया का खुलासा करते हुए ऑपइंडिया ने 186 पन्नों का डोजियर तैयार किया था।

विकिपीडिया में असामान्य शक्ति वाले संपादक और प्रशासक सुनिश्चित करते हैं कि ‘दक्षिणपंथी’ (गैर-वामपंथी) स्रोतों को खारिज या ब्लैकलिस्ट कर दिया जाए। मस्क या ऑपइंडिया छोड़िए खुद Wikipedia के सह-संस्थापक लैरी सेंगर भी यह साफ-साफ कह चुके हैं कि विकिपीडिया में स्पष्ट वामपंथी पूर्वाग्रह है।

हमारे शोध में सामने आया कि खुद को ओपन सोर्स बताना का दावा करने वाले विकिपीडिया की संरचना स्वयं कुछ व्यक्तियों को पूर्ण शक्ति देती है जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है। पूरे विश्व में केवल 435 सक्रिय प्रशासक हैं जिनके पास संपादकों को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को प्रतिबंधित करने और लेखों पर संपादन करने या पलटने का अधिकार है।

नवंबर 2024 में मोदी सरकार ने भी विकिपीडिया को नोटिस भेजकर इस पर प्रकाशित भ्रामक और पक्षपाती जानकारी पर सवाल पूछे थे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I&B) द्वारा जारी इस नोटिस में जिक्र किया गया था कि किस तरह विकिपीडिया की सामग्री पर एक छोटे समूह के संपादकों का नियंत्रण है, जो इसमें हेरफेर करने में सक्षम होते हैं और एकपक्षीय जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं।

Wikimedia Foundation की पूर्व CEO कैथरीन माहेर ने अगस्त 2021 में एक TED टॉक में अनजाने में यह खुलासा किया कि विकिपीडिया के माध्यम से फैलाई गई जानकारी सत्य पर आधारित नहीं होती।

कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक और अन्य सार्वजनिक भाषणों में स्पष्ट किया कि विकिपीडिया पर लिखने वाले लेखक ‘सत्य’ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। उन्होंने कहा, “जो लोग इन लेखों को लिखते हैं, वे सत्य पर नहीं, बल्कि वर्तमान समय में जो सबसे अच्छा संभव ज्ञान है, उस पर ध्यान केंद्रित करते हैं।”

विकिपीडिया के हिंदू विरोध को कुछ उदाहरणों से समझें तो इसने ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दिया जिसे संभल के मुस्लिम पत्थरबाजों को बचाने की कोशिश हुई और ‘जय श्रीराम’ के नारों को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार गया।

इसके अलावा विकिपीडिया ने छत्रपति संभाजी महाराज पर विवादित कंटेंट हटाने से मना कर दिया था। साथ ही, RSS के विकिपीडिया पेज से छेड़छाड़ कर उसे इस्लामी यूजर द्वारा ‘हिंदू आतंकी संगठन’ लिखे जाने का केस भी सामने आया है। हाल ही काे उदाहरण को देखें तो विकिपीडिया में वामपंथी एडिटर ‘द बंगाल फाइल्स’ को ‘प्रोपेगेंडा’ फिल्म बताने पर तुले नजर आए थे।

विकिपीडिया की फंडिंग पर भी हैं सवाल

Wikimedia Foundation का वित्तीय जुड़ाव Tides Foundation से है, जिस पर अमेरिका में हमास समर्थक प्रदर्शनों और जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठनों को फंड देने के आरोप हैं। ये दोनों मिलकर कई ऐसे समूहों को सहायता देते हैं जो भारत विरोधी एजेंडा चलाते हैं। इनमें Hindus for Human Rights, Equality Labs, Art+Feminism, Access Now और हिंडेनबर्ग जैसे संगठन शामिल हैं।

2019 से Wikimedia Foundation की भारत में कोई औपचारिक मौजूदगी नहीं है, फिर भी यह भारत से भारी डोनेशन लेता है और उन्हें उन एनजीओ तक पहुँचाता है जो उसके व्यावसायिक और भारत-विरोधी हितों को मजबूत करते हैं।

विकिपीडिया के एकछत्र और एक आयामी राज को खत्म कर एलन मस्क की यह पहल एक ऑनलाइन विश्वकोश से आगे बढ़कर सूचना की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव बन सकती है। विकिपीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर जो पक्षपात, अधूरी जानकारी और विवादास्पद संदर्भ होने की समस्याओं के उल्ट ग्रोकिपीडिया पारदर्शी और भरोसेमंद ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया बन सकता है।

बच्चों के ‘वोक ट्रांसजेंडर’ शो को लेकर निशाने पर Netflix, एलन मस्क समेत बड़ी संख्या में लोग कैंसल कर रहे सब्सक्रिप्शन: शो के क्रिएटर ने चार्ली किर्क पर दिया विवादित बयान

अमेरिका में नेटफ्लिक्स के खिलाफ एक बड़े पैमाने पर सब्सक्रिप्शन कैंसिल अभियान शुरू हो गया है। आरोप है कि नेटफ्लिक्स जेंडर आइडियोलॉजी (लैंगिक विचारधारा) को बढ़ावा दे रहा है। इस अभियान को टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने आगे बढ़ाया है।

इस विरोध की वजह नेटफ्लिक्स के एनिमेटेड शो ‘Dead End: Paranormal Park’ के क्रिएटर हैमिश स्टील का विवादित बयान माना जा रहा है। उन्होंने कंजरवेटिव एक्टिविस्ट चार्ली किर्क की हत्या पर आपत्तिजनक टिप्पणी की।

सोशल मीडिया पर वायरल एक स्क्रीनशॉट के मुताबिक, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने चार्ली किर्क के परिवार के लिए शोक संदेश लिखा था। इसके जवाब में हैमिश स्टील ने किर्क को रैंडम नाजी कहा है।

स्टील ने कथित तौर पर लिखा, “आप उन परिवारों के लिए संवेदना नहीं जताते जिनकी हत्या आपके हथियारों से हो रही है, लेकिन एक रैंडम नाजी मारा गया तो आप सार्वजनिक बयान देते हैं।”

एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर हैमिश स्टील के खिलाफ नाराजगी जताई, क्योंकि स्टील ने अपने नेटफ्लिक्स शो में बच्चों के लिए ट्रांस आइडियोलॉजी को बढ़ावा दिया। यह शो सिर्फ 7 साल के बच्चों के लिए भी बनाया गया है।

मस्क ने बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उन्होंने अपनी नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिया है। उन्होंने यह कदम तब उठाया जब एक एक्स यूजर ने भी ऐसा करने की बात कही। एक अन्य पोस्ट में मस्क ने ‘बच्चों के लिए’ नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने का आह्वान किया है।

डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के न्यूक्लियर वैज्ञानिक रहे मैट वैन स्वोल ने नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने की स्क्रीनशॉट शेयर कर लिखा, “मैंने अभी अपना नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिया है। अगर आप ऐसा कोई व्यक्ति रखते हैं जिसने चार्ली किर्क की हत्या का जश्न मनाया और मेरे बच्चों के लिए प्रो-ट्रांस सामग्री बनाता है… तो आप मेरी एक भी पैसा नहीं पाएँगे। बस इतनी सी बात है।”

इस पोस्ट को फिर से शेयर करते हुए, एलन मस्क ने लिखा, “वही।”

एक्स के मालिक ने भी हैमिश स्टील के शो में ट्रांसजेंडर थीम की आलोचना करते हुए एक पोस्ट को फिर से शेयर किया। यह शो 7 साल के बच्चों के लिए प्रमोट किया गया था। एलन मस्क ने लिखा, “यह ठीक नहीं है।”

स्टील की आलोचना करने वाले एक अन्य पोस्ट के जवाब में मस्क ने कहा, “वह एक ग्रूमर हैं”।

एलन मस्क लंबे समय से ट्रांस आइडियोलॉजी और जेंडर अफ़र्मिंग सर्जरी पर अपनी आलोचना व्यक्त करते रहे हैं। अपने इंटरव्यू में मस्क ने इसे ‘वोक माइंड वायरस’ कहा और अपने बेटे विवियन जेना के महिला में ट्रांज़िशन का जिक्र करते हुए इस पर आपत्ति जताई।

एलन मस्क द्वारा नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने के बाद नेटफ्लिक्स और हैमिश स्टील के खिलाफ नाराजगी और बढ़ गई। इसके तुरंत बाद सब्सक्रिप्शन रद्द करने का बड़ा अभियान शुरू हो गया। कई एक्स यूज़र्स ने अपना सब्सक्रिप्शन रद्द करने के स्क्रीनशॉट्स भी साझा किए हैं।

इस बीच, कई एक्स यूजर्स ने Dead End: Paranormal Park का एक क्लिप शेयर किया है, जिसमें मुख्य किरदार बार्नी गुटमैन कहता है कि वह ट्रांस है। इसके बाद से हैमिश स्टील ने अपना एक्स प्रोफाइल प्राइवेट कर लिया है।

ध्यान देने वाली बात है कि Dead End: Paranormal Park के आगे कोई एपिसोड रिलीज नहीं होंगे, क्योंकि नेटफ्लिक्स ने जनवरी 2023 में दो सीजन के बाद यह शो रद्द कर दिया था। यह शो हैमिश स्टील के हॉरर-कॉमेडी ग्राफिक नॉवल DeadEndia: The Watcher’s Test पर आधारित था।

इस सीरीज में, दो ऐम्यूसमेंट पार्क के कर्मचारी, बार्नी गुटमैन और नॉरमा खान, राक्षस कोर्टनी के साथ मिलकर पैरानॉर्मल एक्टिविटी की खोज और जाँच करते हैं।

दो सीजन के बाद, एनिमेटेड सीरीज रद्द कर दी गई, यह जानकारी हैमिश स्टील ने जनवरी 2024 में अपने एक्स पोस्ट में दी। उन्होंने बताया कि तीसरे सीजन की स्क्रीनप्ले और कहानी की रूप रेखा पहले ही राइटर्स रूम में पूरी हो चुकी थी और क्रू इस बात के लिए तैयार नहीं था कि Dead End: Paranormal Park को बंद कर दिया जाएगा।

हैमिश स्टील के वोक नेटफ्लिक्स शो और चार्ली किर्क के खिलाफ उनके कथित बयान के चलते नाराजगी के बीच, कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने यह भी बताया कि नेटफ्लिक्स पर Parental Guidance (PG) रेटेड एक डॉक्यूमेंट्री स्ट्रीम हो रही है।

इस डॉक्यूमेंट्री में एक ट्रांस एक्टिविस्ट के बारे में दिखाया गया है, जिसने बचपन में हार्मोन ब्लॉकर्स लिए और 18 साल की उम्र में जेनिटल म्यूटिलेशन कराया। नेटिज़ेंस का दावा है कि यह डॉक्यूमेंट्री बच्चों को ट्रांसजेंडर बनने के लिए प्रोत्साहित करती है और रासायनिक और शल्य चिकित्सा से नपुंसक बनाने को बढ़ावा देती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी सामग्री सभी उम्र के लोगों के लिए कैसे उपयुक्त मानी जा सकती है।

नेटिज़ेंस ने कई एनिमेटेड नेटफ्लिक्स शो के बारे में जानकारी साझा की है, जिनका 6 से 7 साल के बच्चों को लक्ष्य दर्शक माना गया है और जो वोक ट्रांस आइडियोलॉजी को बढ़ावा देते हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। जिसे इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

क्या है नेपाल की ‘कुमारी देवी’ परंपरा, कैसे चुनते हैं ‘तलेजु देवी’ का अवतार: जानिए किन कठिन परीक्षाओं के बाद 2 साल की आर्यतारा बनीं नई ‘जीवित देवी’

नेपाल के काठमांडू में दो साल आठ महीने की आर्यतारा शाक्य को नेपाल की नई कुमारी यानि नई ‘जीवित देवी’ के रूप में चुना गया। मंगलवार (30 सितंबर 2025) को आर्यतारा को उनके घर से तलेजु भवानी मंदिर में ले जाया गया। इस दौरान बच्ची के माता-पिता भावुक हो गए क्योंकि अब देवी घर से दूर मंदिर में विराजमान रहेंगी।

आर्यतारा ने पूर्ववर्ती कुमारी, तृष्णा शाक्य का स्थान लिया। परंपरा के अनुसार, मौजूदा कुमारी जैसे ही किशोरावस्था में प्रवेश करती है तो उन्हें सामान्य मनुष्य माना जाने लगता है। देवी चुने जाने वाले दिन आर्यतारा को उनके पिता गोद में उठाकर कुमारी घर लेकर आए। इस दौरान भव्य समारोह आयोजित किया गया। जहाँ हजारों लोग कुमारी की एक झलक पाने के लिए कतार में खड़े रहे।

अष्टमी तिथि को हुए इस समारोह में आर्यतारा कुमारी की औपचारिक पूजा की गई। कुमारी को आशीर्वाद के साथ घर से विदा कर काठमांडू के ऐतिहासिक कुमारी घर में स्थायी रूप से बैठाया गया। यह परिवार के लिए सम्मान की बात मानी जाती है क्योंकि कुमारी का परिवार समाज में प्रतिष्ठित हो जाता है।

कौन है ‘जीवित देवी’?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई कुमारी का पूरा नाम आर्यतारा शाक्य है, जिनकी उम्र केवल दो साल आठ महीने है। वे शाक्य वंश के नेवार समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। ये वही समुदाय है, जो कुमारी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। आर्यतारा के पिता का नाम अनंत शाक्य, माता का नाम प्रतिष्ठा शाक्य है। उनकी एक बहन भी है, जिसका नाम पारमिता शाक्य है।

कैसे चुनी जाती हैं ‘जीवित देवी’?

नेपाल की इस परंपरा में कुमारी का सार्वजनिक रूप से चयन किया जाता है। इनमें नेवार समुदाय के शाक्य वंश की बालिकाओं का ही चयन होता है और यहा भी जरूरी है कि वे काठमांडू की मूल निवासी हो।

कुमारी बनने के लिए बालिकाओं में 32 गुण होने जरूरी हैं। इनमें 12 मानदंडों पर परीक्षा सफल करनी होती है। इनमें शारीरीक मानदंड में सुंदरता पर खास ध्यान दिया जाता है, जैसे चेहरा, दाँत, आँखें और त्वचा पर किसी प्रकार के दाग-धब्बे नहीं होने चाहिए या बच्ची के शरीर पर कोई घाव का निशान न हो।

आध्यात्मिक और व्यवहार संबंधी मानदंड पूरा करने के लिए बच्ची में निडर, शांत स्वभाव, दैवीय गुण होने जरूरी हैं। पारंपरिक अनुष्ठानों और ज्योतिष परीक्षणों के जरिए भी योग्य लड़की चुनी जाती है। आमतौर पर 2 से 4 साल की आयु की बच्ची का ही चयन कुमारी के रूप में किया जाता है। कुमारी बनने के बाद मासिक धर्म तक पहुँचने पर वह ‘देवी’ का रूप त्याग देती हैं और सामान्य जीवन में लौट आती हैं।

कुमारी चुने जाने के लिए ये मानदंड सदियों से चले आ रहे हैं। हालाँकि, आधुनिक समय में कुछ बदलाव और चर्चाएँ रही हैं, जिसमें कुमारी चुने जाने पर निजी शिक्षा लेने, टीवी देखने और कुछ आधुनिक सुविधाएँ पाने का अधिकार मिला है।

‘जीवित देवी’ बनने की परीक्षा

बच्ची को ‘जीवित देवी’ बनने के लिए कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। इससे बच्ची की देवी के रूप में साहस और अन्य गुणों को परखा जाता है। परीक्षा के दौरान बच्ची को बलि दिए गए भैंसो और रक्त में नाचते हुए नकाबपोश पुरुषों को दिखाया जाता है। इस दौरान अगर डर का कोई भी लक्षण बच्ची में दिखता है तो उसे अयोग्य माना जाता है। चूँकि बच्ची को तलेजु का अवतार माना जाएगा इसीलिए बच्ची का साहसी होना महत्वपूर्ण है।

कुमारी चुने जाने के बाद बच्ची को माता-पिता का घर छोड़ना होता है। देवी का रूप बने रहने तक बच्ची को मंदिर में स्थायी रूप से विराजित किया जाता है, यहाँ खास कुमारी घर की व्यवस्था की जाती है। जहाँ देवी आम लोगों को दर्शन देती हैं। कुमारी के परिवार को बेटी से मिलने की अनुमति नहीं होती है। केवल साल में 13 बार सार्वजनिक आयोजनों में जाने के वक्त माता-पिता उनसे मिल सकते हैं।

‘जीवित देवी’ का रूप

कुमार तलेजु देवी का रूप मानी जाती हैं। इसीलिए कुमारी चुने जाने पर उन्हें हमेशा लाल वस्त्र पहनने हैं। बच्ची पूरी तरह से देवी धारण कर रहेंगी। बालों में चोटी बाँधती है और उनके माथे पर तीसरी आँख बनी होती है। नई जीवित देवी की पूजा हिंदू और बौद्ध धर्म के लोग करते हैं।

यह परंपरा 500 से 600 वर्ष पुरानी है जो मल्ल राजाओं के समय शुरू हुई। हालाँकि, सदियों से चली आ रही परंपरा में समय-समय पर बदलाव होते गए हैं। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल सरकार ने अब सेवानिवृत्त कुमारियों को लगभग 110 डॉलर (भारतीय रुपए में 9765.80) की छोटी मासिक पेंशन भी प्रदान करनी शुरू कर दी है, जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से थोड़ा अधिक है।

पूर्व ‘जीवित देवी’ कौन हैं?

मंगलवार (30 सितंबर 2025) को ही पूर्व कुमारी जीवित देवी के रूप से सेवानिवृत्त हुई हैं। इस दौरान भव्य यात्रा निकालकर उन्हें वापस घर ले जाया गया। पूर्व कुमारी का नाम तृष्णा शाक्य है, जो साल 2017 में जीवित देवी चुनी गई थीं। अब 11 साल की आयु में तृष्णा शाक्य ने आम मनुष्य के जीवन में लौट गई हैं।

हिमाचल का तीन महादेवियों का मंदिर, जिसका मुख्य द्वार हमेशा के लिए हो गया बंद: जानें क्यों 400 वर्ष पुराने टारना माता धाम में सामने से नहीं होते हैं दर्शन

शारदीय नवरात्रि के समापन में हम आपको हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर (जिसे ‘छोटी काशी’ भी कहते हैं) के एक अनोखे मंदिर के बारे में बता रहे हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ माता रानी के दर्शन सामने से नहीं होते हैं, बल्कि साइड से किए जाते हैं। मंदिर का सामने वाला दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। भक्तों को केवल बगल के दरवाजे से ही दर्शन करने की अनुमति है।

मंदिर निर्माण और दर्शन का तरीका

इस मंदिर का नाम टारना माता मंदिर है, जिसे 16वीं शताब्दी में राजा श्याम सेन ने बनवाया था। मान्यता है कि राजा को एक दिन टारना की पहाड़ी पर तीन कन्याएँ दिखाई दी थीं, लेकिन पास जाने पर वहाँ कोई नहीं मिला। इसके बाद राजा को स्वप्न में माता रानी ने दर्शन दिए और मंदिर बनाने का आदेश दिया।

उस जगह पर जब खुदाई की गई तो वहाँ तीन पिंडी स्वरूपा मूर्तियाँ प्राप्त हुईं, ये मूर्तियाँ थी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की। शुरुआत में मंदिर का दरवाजा पिंडियों के ठीक सामने था। लेकिन, जब लोग सामने से दर्शन करते थे, तो कई श्रद्धालु माता के तेज (शक्ति) के कारण बेहोश हो जाते थे।

इसके बाद माता रानी ने राजा को फिर से स्वप्न में दर्शन देकर अपने तेज के बारे में बताया और कहा कि अब सामने का दरवाजा बंद कर बगल से नया दरवाजा बनवाया जाए। तभी से आज तक माता के दर्शन केवल बगल के दरवाजे से ही होते हैं।

बगल से होते है दर्शन

मंदिर के पुजारी हर्ष शर्मा ने बताया कि तभी से उत्तर दिशा वाले दरवाजे से दर्शन किए जाते हैं और पश्चिमी दिशा वाले दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। खास बात यह है कि माता के शेर की प्रतिमा आज भी बंद दरवाजे के सामने ही है।

‘श्यामाकाली’ नाम की कहानी

कुछ लोगों का मानना है कि राजा श्याम सेन ने सुकेत राज्य के खिलाफ युद्ध पर जाने से पहले इस मंदिर में पूजा की थी। राजा ने अपने अंगूठे से रक्त निकालकर जीत की प्रतिज्ञा ली थी। इसके बाद मंडी और सुकेत राज्यों के बीच बल्हघाटी के लोहारा मैदान में युद्ध हुआ। इस युद्ध में मंडी की सेना ने जीत हासिल की और सुकेत का राजा जीतसेन मैदान छोड़कर भागने लगा, लेकिन मंडी के सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

जब एक सैनिक उसे मारने लगा तो राजा श्याम सेन ने उसे रोक दिया और जीतसेन को छोड़ दिया। युद्ध जीतने के बाद, राजा श्याम सेन ने टारना की पहाड़ियों में माँ श्यामाकाली (टारना माता) का भव्य मंदिर बनवाने का आदेश दिया।

यही वजह है कि टारना माता को श्यामाकाली नाम से भी पूजा जाता है। माता को टारना माता या तारना माता इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि वे अपने भक्तों को हर संकट से तार देती हैं (बचाती हैं)।

मंदिर की प्रसिद्धि

टारना माता मंदिर अपनी अनोखी मान्यता और रहस्यमयी परंपरा के कारण मंडी के सभी मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। नवरात्रि और शिवरात्रि महोत्सव में यहाँ बहुत भीड़ लगती है। शिवरात्रि के दौरान मंडी के प्रमुख देवता कमरूनाग भी इसी मंदिर में विराजमान होते हैं। इस मंदिर की प्रसिद्धि के कारण राज्यपाल, मुख्यमंत्री और सभी बड़े VIP लोग भी यहाँ माता रानी के दर्शन करने जरूर आते हैं।

‘80% हिंदुओं के पिछड़ेपन के लिए रामायण-मनुस्मृति जिम्मेदार’: क्या MP की BJP की सरकार ने दाखिल किया है हिंदू विरोधी हलफनामा, जानिए पूरा मामला

सोशल मीडिया पर कुछ स्क्रीनशॉट्स वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार हिंदू-विरोधी है। वायरल स्क्रीनशॉट्स सुप्रीम कोर्ट में चल रहे OBC आरक्षण के हलफनामा के बताए गए, जिनमें कुछ ऐसे विवादित बयान थे जो हिंदू सभ्यता को निशाना बनाने वाले विवादित दावों से जुड़े थे।

इन स्क्रीनशॉ्टस के सोशल मीडिया पर वायरल होने के कुछ घंटों बाद ही 1 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने ‘हिंदू-विरोधी’ आरोपों पर फैक्ट-चेक जारी कर दिया।

ट्विटर पर वायरल कुछ स्क्रीनशॉट्स में और भी अजीब बातें लिखी दिखीं। एक जगह दावा किया गया था कि रामायण में ‘ऋषि शंबूक’ की हत्या जाति उत्पीड़न का उदाहरण है। लेकिन सच्चाई ये है कि श्रीराम ने शंबूक को उसकी जाति की वजह से नहीं मारा था बल्कि उसके इरादे माता पार्वती के प्रति गलत थे, इसलिए उसे दंड दिया गया।

एक और दावे में कहा गया कि मनुस्मृति में शूद्रों की जानवरों से तुलना करके उन्हें अपमानित किया है। इसमें ये भी लिखा था कि अंग्रेजों के सुधार और पेरियार की ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की वजह से जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ। यहाँ तक कि इस दस्तावेज में ये दावा भी किया गया कि हिंदू समाज को जानबूझकर सदियों तक बँटा हुआ रखा गया ताकि ऊँची जातियों का वर्चस्व बना रहे।

मनुस्मृति को लेकर अक्सर हिंदुओं पर आरोप लगाए जाते हैं लेकिन जो लोग मनुस्मृति की सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद हिंदू कोड बिल बनाते समय मनुस्मृति का हवाला दिया था और उससे मदद ली थी।

आलोचना का दूसरा बड़ा हिस्सा पेरियार को लेकर है। कहा जाता है कि जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ करने का श्रेय ई.वी. रामास्वामी यानी पेरियार को जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि पेरियार खुले तौर पर हिंदू-विरोधी विचारों वाले व्यक्ति थे। इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक उनसे नाराज रहते थे।

नेहरू ने 5 नवंबर 1957 को मद्रास के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कामराज को लिखे एक पत्र में साफ लिखा था, “मैं ई.वी. रामास्वामी नायकर द्वारा लगातार चलाए जा रहे एंटी-ब्राह्मण अभियान से बेहद दुखी हूँ। मैंने पहले भी आपको इस बारे में लिखा था और मुझे बताया गया था कि इस मामले पर विचार किया जा रहा है।”

नेहरू ने अपने पत्र में और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने लिखा, “मुझे लगता है कि रामास्वामी नायकर बार-बार वही बातें दोहरा रहे हैं और लोगों को उकसा रहे हैं कि वे मौका आने पर छुरा भोंकें और हत्या करें। ऐसी बातें केवल कोई अपराधी या पागल व्यक्ति ही कह सकता है।”

प्रधानमंत्री नेहरू ने मद्रास के मुख्यमंत्री से कहा, “मैं उन्हें ठीक से नहीं जानता कि तय कर सकूँ वे असल में क्या हैं, लेकिन एक बात साफ है कि इस तरह की बातें देश पर बहुत ही बुरा असर डाल रही हैं। तमाम असामाजिक और आपराधिक तत्व यह मानने लगते हैं कि वे भी इसी तरह की हरकतें कर सकते हैं।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का मानना ​​था कि पेरियार जैसे ब्राह्मण-विरोधी ‘कार्यकर्ताओं’ को पागलखाने में रखा जाना चाहिए जहाँ उनके ‘विकृत दिमागों’ का इलाज किया जा सके।

इस पूरे मुद्दे ने सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़का दिया। खासकर हिंदू संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने अदालत के हलफनामे में कथित तौर पर ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ का समर्थन करके अपनी वैचारिक जड़ों से गद्दारी की है। कई घंटों तक ‘एंटी-हिंदू’ कहकर सरकार के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड होते रहे, जिसे विपक्षी दलों ने और हवा दी।

हलफनामा नहीं, कॉन्ग्रेस-कालीन आयोग की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जारी किए स्पष्टीकरण में साफ किया कि ये टिप्पणियाँ उनके हलफनामें का हिस्सा नहीं है। सरकार ने बताया कि विवादित कन्टेन्ट रामजी महाजन की अध्यक्षता वाले मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट से लिया गया है, जिसका गठन 17 नवंबर 1980 को कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था। आयोग ने 22 दिसंबर 1983 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

महाजन रिपोर्ट और कई अन्य आयोगों की रिपोर्टें लंबे समय से सरकारी रिकॉर्ड्स का हिस्सा रही हैं। चूँकि OBC आरक्षण का मामला दशकों से न्यायिक जाँच के दायरे में है, इसलिए ये दस्तावेज पहले ही हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके थे और इसी कारण वे खुद ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल केस फाइल का हिस्सा बन गए।

राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि ऐसी रिपोर्टों को न्यायिक फाइल में शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि वर्तमान सरकार उनके निष्कर्षों का समर्थन करती है। बल्कि यह एक पूरी प्रक्रियात्मक जरूरत है क्योंकि आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सभी प्रासंगिक पुरानी रिपोर्टें नियमित रूप से अदालत के समक्ष रखी जाती हैं।

सरकार ने बताया कि महाजन रिपोर्ट के साथ-साथ सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की 1994 से 2011 तक की वार्षिक रिपोर्टें और राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग की 2022 की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की थीं। यह स्पष्टीकरण इसीलिए दिया गया ताकि यह साफ हो सके कि जो पन्ने वायरल हुए हैं, वे बीजेपी सरकार द्वारा तैयार किए गए हलफनामे का हिस्सा नहीं है बल्कि कॉन्ग्रेस शासनकाल की एक रिपोर्ट है जो न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा रही है।

आरक्षण के आँकड़ों की तुलना

बीजेपी सरकार ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि महाजन आयोग ने OBC के लिए 35% आरक्षण की सिफारिश की थी। जबकि वर्तमान राज्य सरकार 27% आरक्षण की माँग पर कायम है। सरकार ने कहा कि यही बात साबित करती है कि बीजेपी महाजन रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं मानती। इसके बजाए राज्य ने अपने नीति-निर्णयों को संवैधानिक मानकों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर तय किया है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो महाजन आयोग के सुझावों को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। बीजेपी का तर्क था कि अगर वह 1983 की रिपोर्ट से सहमत होती तो 35% OBC कोटा लागू करती। लेकिन उसके बजाए उसने कम संख्या पर ही समझौता कर लिया।

राज्य सरकार ने बताया दुर्भावनापूर्ण अभियान

सरकार के बयान में इन वायरल स्क्रीनशॉट्स को ‘झूठा, मनगढ़ंत, भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रेरित’ बताया गया। बयान में कहा गया कि शैक्षणिक या आयोग रिपोर्टों के चुनिंदा अंशों को अलग-थलग पेश करना राज्य के खिलाफ ‘दुष्प्रचार अभियान’ का हिस्सा है।

बयान में यह भी जोर देकर कहा गया कि मध्य प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक समरसता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और वह कभी भी ऐसे किसी नैरेटिव का समर्थन नहीं करेगी जो हिंदू परंपराओं या ग्रंथों को बदनाम करने का प्रयास करे। सरकार ने चेतावनी भी दी कि यह जाँच की जाएगी कि भ्रामक स्क्रीनशॉट्स कैसे प्रसारित हुए और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया पर आक्रोश

इस विवाद ने राजनीतिक क्षेत्र में काफी नुकसान पहुँचाया है। बीजेपी के आलोचकों ने पार्टी पर लापरवाही का आरोप लगाया। यह कहते हुए कि ऐसी रिपोर्टों को सिस्टम में बने रहने देना गंभीर चूक है। कुछ लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि इन दस्तावेजों का आधिकारिक रिकॉर्ड्स में मौजूद होना इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस शासनकाल का प्रोपेगेंडा सरकारी तंत्र में गहराई तक समा चुका है।

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार को तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। एक एक्स यूजर ने लिखा, “बीजेपी सक्रिय रूप से सामान्य वर्ग के खिलाफ विभाजन और नफरत फैला रही है।”

एक अन्य यूजर ने कहा, “यह सिर्फ विश्वासघात नहीं है। यहा बीजेपी का उन लोगों पर थूकना है जो हर अच्छे-बुरे समय में उसके साथ खड़े रहे। और विडंबना? तथाकथित ‘हिंदुत्व पार्टी’ अब पेरियारवादियों और अंग्रेजों की तरह वोट बैंक के लिए गंदा काम कर रही है।”

लंबे समय तक चलने वाले सवाल

हालाँकि, पर भ्रामक कन्टेन्ट पर मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने स्पष्टीकरण जारी कर दिया है लेकिन यह अब भी चिंता का विषय है कि सरकार बदलने के बावजूद वामपंथी प्रोपेगेंडा से प्रेरित दस्तावेज सिस्टम और रिकॉर्ड्स का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई की अगली तारीख 08 अक्टूबर 2025 तय की गई है। अब यह देखना बाकी है कि क्या यह विवाद कोर्ट की बहस का हिस्सा बनेगा।

फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने जोर देकर कहा है कि उनके हलफनामें में किसी भी प्रकार का हिंदू-विरोधी बयान नहीं दिया गया है और जो लोग मनगढ़ंत सामग्री फैला रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सरकार का कहना है, “प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक सद्भाव के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। दोहराया जाता है कि जो वायरल कंटेंट है, वह न तो सरकार के हलफनामे का हिस्सा है और न ही किसी अधिकृत या आधिकारिक नीति या निर्णय से जुड़ी है।”

अपने घर में ही घिरे डोनाल्ड ट्रंप, सीनेट में बजट बिल पास ना होने से अमेरिका में लागू हुआ ‘शटडाउन’: नॉन-एसेंशियल सेवाएँ बंद, जानें कैसे ‘ठप’ हो जाएगा US

पूरी दुनिया का ठेका लेकर नोबेल की आस लगाए बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ही देश में एक बिल भी पास ना करा सके। जिसके बाद अमेरिका में एक बार फिर से सरकारी ‘शटडाउन’ लग गया है। मंगलवार (30 सितंबर 2025) को सीनेट में सरकार को खर्चे के लिए फंड देने वाला बजट बिल पास नहीं हो पाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को सीनेट में अस्थायी फंडिंग बिल पास कराने के लिए कम से कम 60 वोटों की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में सिर्फ 55 वोट मिले। अब अमेरिकी सरकार का कामकाज ठप हो गया है और बुधवार (1 अक्टूबर 2025) से ‘नॉन-एसेंशियल’ यानी कम जरूरी सेवाएँ बंद कर दी गई हैं। इसका असर एयर ट्रैवल से लेकर आर्थिक रिपोर्ट्स, पर्यावरण सुरक्षा, छोटे व्यापारों के लोन और वैज्ञानिक रिसर्च तक पड़ेगा।

जानिए क्या है ‘शटडाउन’?

दरअसल, अमेरिका में हर साल सरकार को चलाने के लिए बजट पास करना होता है। अगर संसद समय पर खर्च के बिल को मंजूरी नहीं देती, तो सरकारी दफ्तरों को फंडिंग नहीं मिलती। ऐसे में सरकार ‘शटडाउन’ मोड में चली जाती है। यानी जिन सेवाओं को जरूरी नहीं माना जाता, उन्हें रोक दिया जाता है।

लाखों सरकारी कर्मचारी बिना वेतन के घर भेज दिए जाते हैं, जिसे ‘फरलो’ कहा जाता है और जो कर्मचारी जैसे सैनिक, बॉर्डर गार्ड्स या पुलिस जैसे जरूरी काम में हैं, वो ड्यूटी पर रहते हैं लेकिन सैलरी बाद में मिलती है।

इस बार का झगड़ा सिर्फ बजट पर नहीं बल्कि हेल्थकेयर सब्सिडी को लेकर भी है। डेमोक्रेट्स पार्टी चाहती है कि बजट में ओबामाकेयर के तहत मिलने वाली सब्सिडी को स्थायी कर दिया जाए ताकि 24 मिलियन यानी 2.4 करोड़ लोगों का इलाज सस्ता बना रहे लेकिन रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि बजट और हेल्थकेयर को अलग-अलग देखा जाए। इसी टकराव में कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट को और भड़का दिया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि अगर सरकार बंद होती है, तो और कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जाएगा और वो ‘डेमोक्रेट’ होंगे।

पहले ही इस हफ्ते 1.5 लाख कर्मचारी स्वेच्छा से नौकरी छोड़ चुके हैं, जो पिछले 80 सालों में सबसे बड़ा सरकारी एक्सोडस है। इसके अलावा हजारों कर्मचारियों को पहले ही निकाला जा चुका है। ट्रंप सरकार ने कुछ एजेंसियों को आदेश दिए हैं कि वे डेमोक्रेट्स को शटडाउन का दोष दें, जो आमतौर पर सरकारी नियमों के खिलाफ होता है।

क्या होगा ‘शटडाउन’ का असर?

अब बात ये है कि असर कितना बड़ा होगा। एयरलाइंस ने कहा है कि इससे उड़ानों में देरी होगी। लेबर डिपार्टमेंट बेरोजगारी की रिपोर्ट जारी नहीं करेगा। स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन लोन नहीं देगा। एनवायरनमेंट एजेंसी प्रदूषण की सफाई पर काम रोक देगी।

वहीं, सोशल सिक्योरिटी और जस्टिस डिपार्टमेंट जैसे अहम विभागों ने भी शटडाउन प्लान तैयार कर लिया है। दो यूनियनों ने कोर्ट में याचिका दी है कि जब तक मामला साफ न हो, तब तक कर्मचारियों को निकाला न जाए, लेकिन कोर्ट ने ट्रंप को काम जारी रखने की छूट दी है।

सीनेट में रिपब्लिकन लीडर जॉन थ्यून ने कहा है कि बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को एक और वोट होगा। लेकिन डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स में कोई समझौते के संकेत नहीं हैं। डेमोक्रेट नेता चक शूमर ने कहा कि हम अमेरिकियों की हेल्थ के लिए लड़ रहे हैं और इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर रिपब्लिकन्स का आरोप है कि डेमोक्रेट्स बजट को राजनीति के लिए रोक रहे हैं, ताकि 2026 के चुनावों से पहले अपने वोटर्स को खुश किया जा सके।

लंबा है शटडाउन का इतिहास

बता दें कि यह पहली बार नहीं हो रहा, अमेरिका में 1981 से अब तक 15 बार शटडाउन हो चुका है। ज्यादातर शटडाउन कुछ घंटों या एक-दो दिन में खत्म हो जाते हैं, लेकिन 2018-19 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में शटडाउन 35 दिन तक चला था, जो अब तक का सबसे लंबा था।

उस समय अमेरिका को करीब 3 बिलियन डॉलर यानी लगभग 25,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। इस बार दाव पर सिर्फ एक बजट बिल नहीं, बल्कि देश की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की सरकारी मशीनरी है, जो पूरे अमेरिका के बजट का करीब एक-चौथाई हिस्सा है।

बाकी का बजट पेंशन, स्वास्थ्य योजनाएँ और कर्ज के ब्याज में जाता है। यानी अगर ये शटडाउन लंबा चला, तो असर सिर्फ कर्मचारियों तक नहीं, बल्कि पूरे अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

साफ है कि ये सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं, ये राजनीति और पब्लिक सर्विस के बीच खिंचती रस्साकशी है, जिसमें नुकसान जनता का हो रहा है। अब सबकी निगाहें बुधवार (1 अक्टूबर 2025) की वोटिंग और दोनों दलों की जिद पर टिकी हैं।

अमेरिका के इस शटडाउन का असर भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास पर भी पड़ना शुरू हो गया है। दूतावास ने 1 अक्टूबर से अपने X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट अपडेट करने बंद कर दिए हैं।

भारत-भूटान के बीच पहली रेलवे लाइन: कनेक्टिविटी से बढ़कर, रणनीति सोच और नेबरहुड फर्स्ट की नीति का बनेगा नया आयाम

केंद्र सरकार की ओर से 29 सितंबर 2025 को भारत और भूटान के बीच एक रेलवे लाइन की ऐतिहासिक घोषणा की गई है। भारत और भूटान के बीच यह पहला सीमा पार रेलवे प्रोजेक्ट होगा। ये ‘मेक इन इंडिया’ पहल का एक हिस्सा है।

यूनियन मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि इस नए रेलवे लाइन की लागत 4033 करोड़ रुपए है। ये समत्से और गेलेफू औद्योगिक शहरों को जोड़ेगा। इस भारतीय रेल परियोजना से पश्चिम बंगाल के बनारहाट और असम के कोकराझार को भी जोड़ा जाएगा।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने घोषणा की कि ये दो प्रोजेक्ट्स दो देशों के बीच रेल संपर्क की पहली श्रृंखला का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, “भारत और भूटान के बीच रेल संपर्क स्थापित करने को लेकर एक बड़ा नया कदम उठाया गया है।”

दो अहम साझेदारों के बीच महत्वपूर्ण पहल

भूटान के विदेश सचिव की नई दिल्ली यात्रा के दौरान एक औपचारिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए और इन परियोजनाओं के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछले वर्ष मार्च में भूटान यात्रा के दौरान तय किया गया था। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जानकारी दी, “कुल लंबाई लगभग 90 किलोमीटर है, जिसमें से 89 किलोमीटर का रेलवे नेटवर्क तैयार किया जाएगा।”

उन्होंने बताया, “भारत भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और भूटान का अधिकांश शुल्क-मुक्त व्यापार भारतीय बंदरगाहों के माध्यम से होता है। इसलिए भूटान की अर्थव्यवस्था के विकास और लोगों को वैश्विक नेटवर्क तक बेहतर पहुँच देने के लिए लोगों के पास एक अच्छी और निर्बाध रेल व्यवस्था होनी चाहिए। इसी वजह से इस परियोजना की शुरूआत की गई है।”

रेल संपर्क के माध्यम से भूटान को भारतीय रेलवे नेटवर्क के 1,50,000 किलोमीटर तक की पहुँच मिलेगी। बनारहाट-समत्से रेल लाइन 3 वर्षों में बनाई जाएगी, जबकि कोकराझार-गेलेफू रेल लिंक अगले 4 वर्षों में विकसित की जाएगी। ये रेलवे लाइनें विद्युत चालित वंदे भारत ट्रेनों के हिसाब से बनाई जाएँगी।

भारत सरकार इन रेलवे लाइनों को बिछाने का खर्च उठाएगी। साथ ही सभी ट्रेन कोच और इससे जुड़ी तकनीक भी देश में ही बनाई जाएगी। लगभग 69 किलोमीटर लंबी कोकराझार-गेलेफू लाइन पर ₹3,456 करोड़ की लागत से 6 स्टेशन, 2 वायाडक्ट, 29 बड़े पुल, 65 छोटे पुल, दो शेड, 1 फ्लाईओवर और 39 अंडरपास बनाए जाएँगे।

20 किलोमीटर लंबी बनारहाट-समतसे लाइन पर ₹577 करोड़ की लागत से दो स्टेशन, 25 पुल, एक बड़ा फ्लाईओवर, 24 छोटे फ्लाईओवर और 37 अंडरपास बनाए जाएँगे।

विक्रम मिस्री ने कहा, “जैसा कि आप सभी जानते हैं, भारत और भूटान के बीच असाधारण विश्वास, पारस्परिक सम्मान और समझ का संबंध है। यह संबंध सांस्कृतिक और सभ्यतागत जुड़ाव, लोगों के बीच गहरे संबंधों और हमारे साझा विकास और सुरक्षा हितों पर आधारित है। यह संबंध उच्चतम स्तर पर भी बेहतर संपर्क को दिखाते हैं।”

उन्होंने बताया, “ये रेल लिंक माल और यात्री परिवहन को बढ़ाने के लिए काफी अहम होंगे। इसी विशेष संबंध के संदर्भ में दोनों सरकारों ने बनारहाट-समत्से और कोकराझार-गेलेफू के बीच दो सीमापार रेल लिंक स्थापित करने पर सहमति जताई है। ये भूटान के साथ पहली रेल संपर्क परियोजनाएँ होंगी।”

मिस्री के अनुसार, भारतीय रेलवे मंत्रालय इन दोनों लिंक के भारतीय हिस्सों को वित्ती सहायता देगा, साथ ही भूटान के क्षेत्र में निर्माण के लिए 2024-2029 की 13वीं पंच-वर्षीय योजना के तहत भारत ₹10,000 करोड़ की सहायता देगा। दोनों लाइनों के भूटानी हिस्से की लंबाई दो किलोमीटर से थोड़ी अधिक है।

फोटो साभार-@AshwiniVaishnaw/X

मिस्री ने आगे कहा, ‘भारत और भूटान के रिश्ते असाधारण विश्वास, परस्पर सम्मान और समझ पर आधारित हैं। यह एक ऐसा रिश्ता है, जिसकी जड़ें सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत कड़ियों, लोगों से लोगों के बीच व्यापक रिश्तोों और हमारे साझा विकास एवं सामरिक हितों से जुड़ी हैं।’

भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक ने प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक प्राधिकरण के साथ गेलेफू को स्वतंत्र आर्थिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है। भारत सरकार ने भी इस महत्वपूर्ण (फ्लैगशिप) परियोजना को अपना समर्थन प्रदान किया है, जिसका उद्देश्य भूटान और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच व्यापक वाणिज्यिक एवं अन्य प्रकार के रिश्तों को स्थापित एवं पोषित करना है।

भूटान को भी भारत के व्यापक रेल नेटवर्क तक पहुँच और उसके उपयोग की सुविधा प्राप्त होगी। इसके माध्यम से वह अपनी वस्तुओं के व्यापार को बढ़ाने में सक्षम हो सकेगा। इसके जरिये उसे पत्तनों तक पहुँच सुगम बनाने के साथ ही बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों तक अपने सामान पहुँचाने में सुविधा मिलेगी।

विकास के साथ साथ रणनीतिक सोच भी

भूटान भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, पर साथ ही भौगोलिक लिहाज से भी भारत के लिए ये देश और भी अधिक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है। यह देश भारत और चीन के बीच पूर्वी हिमालय में स्थित है और भारत के चार राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के साथ 699 किलोमीटर की खुली सीमा साझा करता है।

इस लिहाज से भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाना काफी जरूरी भी है। खासकर तब, जब चीन के साथ संबंधों में हाल ही में कुछ नरमी आई है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने यह आभास कराया है कि वैश्विक नेताओं पर आँख बंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता और भरोसेमंद साझेदारियों पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं। ऐसे में यह रेलवे परियोजना एक ठोस कदम है।

भारत और चीन के बीच सीमा और नियंत्रण रेखा को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण अक्सर संघर्ष का कारण बनते रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी की झड़प और उससे पहले डोकलाम में ये संघर्ष पहले भी देखे जा चुके हैं।

चीन, भूटान और भारत के मुहाने पर त्रिकोणीय पड़ाव, डोकलाम, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पठार और घाटी है। नई रेल संपर्क भारत और भूटान के बीच रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत और भूटान डोकलाम को भूटान का क्षेत्र मानते हैं, जबकि चीन इसका विरोध करता है।

फोटो साभार- visionias.in

भारत और चीन की सेनाओं के बीच हाल के वर्षों की सबसे बड़ी सैन्य झड़प तब शुरू हुई जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने डोकलाम पठार पर सड़क निर्माण शुरू किया। इसे चीन अपने डोंगलांग प्रांत का हिस्सा मानता है। भारतीय सेना ने इसका विरोध किया और PLA ने वहाँ भारतीय सेना के एक पुराने बंकर को भी ध्वस्त कर दिया।

इस टकराव के जवाब में चीन ने सिक्किम के नाथू ला मार्ग से कैलाश-मानसरोवर की यात्रा को भी रोक दिया। दोनों देशों ने क्षेत्र में अपनी सैन्य तैनाती को बढ़ा दिया।

भारत ने ऊँचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। इससे रणनीतिक रूप से भारत बेहतर स्थिति में था। नई दिल्ली ने 16 जून से 28 अगस्त तक चले 73 दिनों के संघर्ष के बाद बीजिंग को पीछे हटने पर मजबूर किया। इस दौरान दोनो पक्षों के बीच कई बार हुई बातचीत भी शामिल थी।

सिक्किम, भूटान और तिब्बत का त्रिसंधि क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक और रक्षा दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि उस क्षेत्र में सड़क बन जाती, तो भारत को बड़ा नुकसान होता। यह भारत और भूटान के बीच संबंधों की अहमियत को चीन का मुकाबला करने के संदर्भ में दिखाता है।

मोदी सरकार की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ और पूर्वोत्तर भारत का विकास

सुरक्षा के अलावा भारत-भूटान रेल संपर्क मोदी सरकार की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ को भी सुदृढ़ करता है। यह नीति 2008 में ही प्रस्तावित हुई थी, लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार बनने के बाद इसे प्रमुखता मिली। इसका उद्देश्य भारत के पड़ोसी देशों जैसे श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भूटान के साथ संबंधों को बेहतर बनाना है।

इस नीति का लक्ष्य व्यापार और व्यवसाय को बढ़ाना है। साथ ही क्षेत्र में भौतिक, डिजिटल और मानवीय संपर्क को मजबूत करना है। हालाँकि इसके साथ ही यह भारत की क्षेत्रीय शक्ति को बढ़ाने और बाहरी प्रभावों को चुनौती देने के लिए आपसी निर्भरता बढ़ाने की भी कोशिश करता है।

भारत अपने पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करके दक्षिण-पूर्व एशिया में एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर सकता है। भूटान के साथ विकास इसी दिशा में एक कदम है। इसके अलावा भारत का वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आगे बढ़ाने का नेतृत्व भी पड़ोसी देशों के साथ सहयोग से मजबूत होता है।

चीन ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी मौजूदगी को काफी बढ़ाया है और नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में भारी निवेश किया है। इसलिए भारत के लिए अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को मजबूत करना भी कापी जरूरी हो गया है।

साथ ही, यह नीति भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास और प्रगति के लिहाज से काम करती है। यह क्षेत्र लंबे समय तक कॉन्ग्रेस की सरकारों द्वारा उपेक्षित रहा है और यहाँ पर बुनियादी ढाँचे की भी कमी रही है।

पूर्वोत्तर भारत की विकास गाथा असल में मोदी सरकार के शासन में आने के बाद ही शुरू हुई। सुरक्षा का संबंध अंदरूनी और क्षेत्रीय संपर्कों से जुड़ा होता है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर ने न केवल स्थानीय जनसंख्या को लाभ पहुँचाया पर साथ ही उस क्षेत्र में विकास के नए आयाम स्थापित किए जिसे पहले की सरकारों ने लंबे समय तक अनदेखा किया था।

2014 से सरकार पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। पीएम मोदी का ‘संपर्क से विकास’ एजेंडा खास तौर पर रेलवे को सामाजिक-आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिहाज से एक अहम कड़ी के रूप में आगे बढ़ा रहा है।

मिजोरम में बैराबी- सैरांग लाइन, नागालैंड में दीमापुर-जुबजा लाइन, सिक्किम में सेवोक- रंगपो परियोजना और असम में अरुणाचल प्रदेश से जोड़ने वाला इंजीनियरिंग चमत्कार बोगीबील पुल जैसी प्रमुख रेलवे परियोजनाएँ भारत के सात बहनों और एक भाई को ठोस प्रगति की ओर ले गई हैं। यह सब केंद्र सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और आधारभूत संरचना आधारित विकास पर केंद्रित दृष्टिकोण का परिणाम है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिसमें सड़कों, दूरस्थ क्षेत्रों की संरचना, बांधों और राष्ट्रीय राजमार्गों का विकास शामिल है, जिससे देश के बाकी हिस्सों से संपर्क बेहतर हुआ है और सुरक्षा को भी मजबूती मिली है।

इसी प्रकार, भारत और भूटान को जोड़ने वाला रेलवे नेटवर्क न केवल दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाएगा और आधारभूत संरचना को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि यह रणनीतिक और भू-राजनीतिक सहयोग को भी नई दिशा दे सकता है।

भारत की क्षेत्रीय शक्ति के रूप में पहचान

भारत और भूटान के बीच रेलवे संपर्क की घोषणा देश की विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि ही नहीं, बल्कि एक चतुराईपूर्ण भू-राजनीतिक कदम भी है जो भारत को एक आत्मविश्वास से ओत-प्रोत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है। साथ ही यह पूर्वोत्तर भारत के विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है, जो मोदी सरकार की विकास योजना का एक प्रमुख हिस्सा है।

इसके अलावा, नई दिल्ली की ऊर्जा आवश्यकताओं को भूटान के विशाल जलविद्युत संसाधनों से पूरा किया जा सकता है।

भूटान मुख्यतः एक बौद्ध राष्ट्र है। भारत बौद्ध धर्म की जन्मभूमि है और यहाँ हिंदू बहुलता के साथ एक जीवंत बौद्ध समुदाय भी मौजूद है। यह सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करने वाला एक अन्य सूत्र बन सकता है।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में रुकमा राठौर ने लिखी है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

प्रतिबंध हो या आपातकाल, संकट के हर समय भगिनीयों ने निभाया दायित्व: समाज सहयोग से सुगम बनी संघ शताब्दी यात्रा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अभी सौ वर्ष पूर्ण हो रहे है। इस सौ वर्ष की यात्रा में कई लोग सहयोगी और सहभागी रहे हैं। यह यात्रा परिश्रम पूर्ण और कुछ संकटों से अवश्य घिरी रही, परंतु सामान्य जनों का समर्थन उसका सुखद पक्ष रहा। आज जब शताब्दी वर्ष में सोचते हैं तो ऐसे कई प्रसंग और लोगों का स्मरण आता है, जिन्होंने इस यात्रा की सफलता के लिए स्वयं सब कुछ समर्पित कर दिया।

प्रारंभिक काल के वे युवा कार्यकर्ता एक योद्धा की तरह देश प्रेम से ओत-प्रोत होकर संघ कार्य हेतु देशभर में निकल पड़े। अप्पाजी जोशी जैसे गृहस्थ कार्यकर्ता हों या प्रचारक स्वरूप में दादाराव परमार्थ, बालासाहब व भाऊराव देवरस बंधु, यादवराव जोशी, एकनाथ रानडे आदि लोग डॉक्टर हेडगेवार जी के सान्निध्य में आकर संघ कार्य को राष्ट्र सेवा का जीवनव्रत मानकर जीवन पर्यन्त चलते रहे।

संघ का कार्य लगातार समाज के समर्थन से ही आगे बढ़ता गया। संघ कार्य सामान्य जन की भावनाओं के अनुरूप होने के कारण शनैः शनैः इस कार्य की स्वीकार्यता समाज में बढ़ती चली गई। स्वामी विवेकानंद से एक बार उनके विदेश प्रवास में यह पूछा गया कि आपके देश में तो अधिकतम लोग अनपढ़ हैं, अंग्रेज़ी तो जानते ही नहीं हैं, तो आपकी बड़ी-बड़ी बातें भारत के लोगों तक कैसे पहुँचेगी?

उन्होंने कहा कि जैसे चीटियों को शक्कर का पता लगाने के लिए अंग्रेज़ी सीखने की ज़रूरत नहीं है, वैसे ही मेरे भारत के लोग अपने आध्यात्मिक ज्ञान के चलते किसी भी कोने में चल रहे सात्विक कार्य को तुरंत समझ जाते हैं व वहीं वो चुपचाप पहुँच जाते हैं। इसलिए वे मेरी बात समझ जाएँगे। यह बात सत्य सिद्ध हुई। वैसे ही संघ के इस सात्विक कार्य को धीरे क्यों न हो, सामान्य जन से स्वीकार्यता व समर्थन लगातार मिल रहा है।

संघ कार्य के प्रारंभ से ही संपर्कित व नये-नये सामान्य परिवारों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद व आश्रय प्राप्त होता रहा। स्वयंसेवकों के परिवार ही संघ कार्य संचालन के केंद्र रहे। सभी माता-भगिनियों के सहयोग से ही संघ कार्य को पूर्णता प्राप्त हुई।

दत्तोपंत ठेंगड़ी या यशवंतराव केलकर, बालासाहेब देशपांडे तथा एकनाथ रानडे, दीनदयाल उपाध्याय या दादासाहेब आपटे जैसे लोगों ने संघ प्रेरणा से समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में संगठनों को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। ये सभी संगठन वर्तमान समय में व्यापक विस्तार के साथ-साथ उन क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। समाज की बहनों के मध्य इसी राष्ट्र कार्य हेतु राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से मौसी जी केलकर से लेकर प्रमिलाताई मेढ़े जैसी मातृसमान हस्तियों की भूमिका इस यात्रा में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

संघ द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय हित के कई विषयों को उठाया गया। उन सभी को समाज के विभिन्न लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ, जिनमें कई बार सार्वजनिक रूप से विरोधी दिखने वाले लोग भी शामिल रहे। संघ का यह भी प्रयास रहा कि व्यापक हिंदू हित के मुद्दों पर सभी का सहयोग प्राप्त किया जाए।

राष्ट्र की एकात्मता, सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द तथा लोकतंत्र एवं धर्म-संस्कृति की रक्षा के कार्य में असंख्य स्वयंसेवकों ने अवर्णनीय कष्ट का सामना किया और सैकड़ों का बलिदान भी हुआ। इन सबमें समाज के संबल का हाथ हमेशा रहा है।

1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में भ्रमित करते हुए कुछ हिंदुओं का मतांतरण करवाया गया। इस महत्वपूर्ण विषय पर हिंदू जागरण के क्रम में आयोजित लगभग पाँच लाख की उपस्थिति वाले सम्मेलन की अध्यक्षता करने हेतु तत्कालीन कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ कर्णसिंह उपस्थित रहे।

1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में प्रसिद्ध संन्यासी स्वामी चिन्मयानंद, मास्टर तारा सिंह व जैन मुनी सुशील कुमार जी, बौद्ध भिक्षु कुशोक बकुला व नामधारी सिख सद्गुरु जगजीत सिंह इनकी प्रमुख सहभागिता रही।

हिन्दू शास्त्रों में अस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है यह पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से श्री गुरूजी गोलवलकर की पहल पर उडुपी में आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में पूज्य धर्माचार्यों सहित सभी संतों-महंतों का आशीर्वाद व उपस्थिति रही।

जैसे प्रयाग सम्मेलन में न हिंदुः पतितो भवेत् (कोई हिन्दू पतित नहीं हो सकता) का प्रस्ताव स्वीकार हुआ था वैसे ही इस सम्मेलन का उद्घोष था- हिंदवः सोदराः सर्वे अर्थात सभी हिन्दू भारत माता के पुत्र हैं। इन सभी में तथा गौहत्या बंदी का विषय हो या राम जन्मभूमि अभियान, संतों का आशीर्वाद संघ स्वयंसेवकों को हमेशा प्राप्त होता रहा है।

स्वाधीनता के तुरंत पश्चात राजनीतिक कारणों से संघ कार्य पर तत्कालीन सरकार द्वारा जब प्रतिबंध लगाया गया, तब समाज के सामान्य जनों के साथ अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने विपरीत परिस्थितियों में भी संघ के पक्ष में खड़े होकर इस कार्य को संबल प्रदान किया। यही बात आपातकाल के संकट समय में भी अनुभव में आई।

यही कारण है कि इतनी बाधाओं के पश्चात भी संघ कार्य अक्षुण्ण रूप से निरंतर आगे बढ़ रहा है। इन सभी परिस्थितियों में संघ कार्य एवं स्वयंसेवकों को सँभालने का दायित्व हमारी माता-भगिनीयों ने बड़ी कुशलता से निभाया। यह सभी बातें संघ कार्य हेतु सर्वदा प्रेरणास्रोत बन गयी हैं।

भविष्य में राष्ट्र की सेवा में समाज के सभी लोगों के सहयोग एवं सहभागिता के लिए संघ स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष में घर-घर संपर्क के द्वारा विशेष प्रयास करेंगे। देशभर में बड़े शहरों से लेकर सुदूर गाँवों के सभी जगहों तक तथा समाज के सभी वर्गों तक पहुँचने का प्रमुख लक्ष्य रहेगा। समूचे सज्जन शक्ति के समन्वित प्रयासों द्वारा राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की आगामी यात्रा सुगम एवं सफल होगी।

‘सरकार बदली तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी’: हिंसा के बाद बरेली की शांत फिजाओं में सुलग रही चिंगारी, जानें ऑपइंडिया के कैमरे पर क्या बोले इस्लामी कट्टरपंथी?

26 सितंबर की दोपहर 2 बजे से बरेली शहर ‘आई लव मुहम्मद’ के नारों से गूंज उठा, दोपहर की नमाज पढ़कर निकले मुसलमानों की भीड़ को पुलिस बार बार घर जाने के लिए कहती रही लेकिन भीड़ के मंसूबे अलग थे। कहीं भड़काऊ नारे थे, तो कहीं जहन में नफरत।

कुछ के हाथों में आइ लव मुहम्मद की तख्तियाँ थीं तो अधिकतर के हाथों मे पत्थर, लाठी-डंडे और पेट्रोल बम थे। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा ने इसलामिया ग्राउंड मे एकत्रित होने के लिए कहा था। प्रशासन का सीधा आदेश था कि, बिना इजाज़त के कोई भी भीड़ इकट्ठा नहीं हो सकती है।

भीड़ फिर भी मानने को तैयार नहीं थी। जब भीड़ को पुलिस ने रोकने की कोशिश की 12 से 22 साल के GenZ मुस्लिम लड़कों ने पथराव शुरू कर दिया। एक FIR में इस बात का भी जिक्र है कि पुलिसवालों के सामने मुस्लिम लड़कों ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे भी लगाए थे। फिर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बरेली पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा था।

इस घटना को करीब तीन दिन हो गए हैं। मुस्लिमों के मन मे क्या है, उनके मुहल्लों में किस तरह की चर्चा चल रही है और हिन्दू इस घटना को कैसे देखते हैं यह समझने के लिए मैंने ग्राउंड पर जाने का निश्चय किया।

रविवार के दिन दोपहर 1 बजे मैं बरेली के सबसे व्यस्ततम चौराहे पर पहुँचा। यहीं पर बरेली कचहरी भी मौजूद है। चौराहे पर सन्नटा था, नाम मात्र के लोग मौजूद थे। बात चीत के क्रम में टाइल्स लगाने का काम करने वाले एक अधेड़ व्यक्ति से मेरी बात हुई।

बरेली में धर्मांतरण का गिरोह

शुरुआत मे झिझकने के बाद जब वो खुला तो उसने बताया कि उसके गाँव फैजनगर मे मुसलमान बड़ी संख्या मे हैं। यहाँ एक मदरसा है और वहाँ गुप्त रूप से धर्मांतरण का गिरोह चलता था। अभी एक महीने पहले ही बरेली पुलिस के द्वारा उस मदरसे पर छापा मारकर उसका भंडाफोड़ किया था।

पता चला था कि चौदह राज्यों से चंदा मांगकर यहाँ धर्मांतरण का काम किया जाता था। कई हिन्दू लड़के-लड़कियों और नाबालिगों का धर्मांतरण करवाया जा चुका था।इसके आगे वो बरेली मे 26 सितंबर की हुई घटना को लेकर कहा कि जहां इनकी संख्या बढ़ती है ये इसी तरह के कांड करते हैं।

मौलाना तौकीर रजा को लेकर कहा कि ये लंबे समय से इसी तरह की हरकतें करता था और इसका मन बढ़ गया था। लेकिन योगी सरकार ने अब इसको पकड़कर सही कर दिया है। अब बरेली शांत हो जाए।

इसके बाद मैं सबसे पहले उस इलाके की तरफ बढ़ा जहां 26 सितंबर को घटना हुई थी। इंटरनेट बंद होने की वजह से गूगल मैप काम नहीं कर रहा था। लोगों से रास्ता पूछने और भटकने की वजह से लगभग आधा शहर देख लिया।

इस्लामिया ग्राउंड से आँखों-देखी

बरेली पुराना शहर है। शहर के लगभग इलाकों के ज़्यादातर घरों पर इस्लामिक झंडे दिख रहे थे। हिंदुओं के इक्का दुक्का घरों पर ही कोई ऐसा निशान मौजूद था जिससे पता चले कि ये हिन्दू का घर है।

सबसे पहली जगह मिलती है। इस्लामिया ग्राउंड। इस्लामिया ग्राउंड के सामने बिहारीपुर पुलिस चौकी है। वहाँ बड़ी संख्या मे पुलिस वाले तैनात थे। ये वही जगह थी जहां आने की कोशिश उस दिन मुसलमान कर रहे थे।

गेट पर बड़ा सा ताला जड़ा हुआ था, आसपास गंदगी बिखरी थी और पुलिस वाले दोपहर की कड़ी धूप में पहरा दे रहे थे। बाहर से मैंने देखा तो एक बड़ा सा मैदान नजर आया और एक पुरानी और जर्जर इमारत जो अंग्रेजों के वक़्त से पहले के होने का सबूत देती है। उसकी झड़ रही लखौरी ईंटें अब अपनी उम्र ढल जाने का इशारा कर रही थीं।

इस मैदान के तीनों तरफ बड़ी संख्या मे मुसलमानों की घनी आबादी बसी हुई थी। चूंकि मैं केवल एक मोबाइल लेकर इस पूरे इलाके की रिकॉर्डिंग कर रहा था तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन तीन-चार 12 से 15 साल के मुस्लिम लड़के मेरे आसपास आकर खड़े हो गए। उन्होने कुछ कहा नहीं लेकिन जबतक मैं वहाँ रहा वो मेरी मोबाइल की स्क्रीन मे झाँकने की कोशिश करते रहे।

सामने मौजूद चौकी मे पुलिसवाले लंबी ड्यूटी के बाद चेहरों पर थकान लेकर भी मुस्तैदी के साथ खड़े नजर आ रहे थे। इसके बाद मैं बढ़ा उन मस्जिदों की तरफ जहां से नमाज पढ़कर उस दिन भीड़ निकली थी। रास्ते मे एक बैनर टंगा मिला जिसपर बड़े बड़े अक्षरों मे आई लव मुहम्मद लिखा हुआ था।

पहले मैंने नौमहिल्ला मस्जिद तक जाना चुना। यहाँ चीजें सामान्य दिख रही थी। आसपास बड़ी संख्या मे मुसलिम आबादी थी। कुछ एक मुसलमान अपनी खिडकियों से झांककर सड़क और पुलिस की तरफ देख रहे थे।

कुछ एक दीवारों पर ताजे पोस्टर निकाले जाने के निशान थे। मैंने गली मे बैठे एक बुजुर्ग से पूछा तो अपनी टोपी संभालते हुए कहा कि उस दिन के लाठीचार्ज के बाद लोगों ने अपनी दीवारों से खुद ही ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर हटा लिए हैं।

हालाँकि, उस गली मे घुसने वाले रास्ते पर एक एक बड़ा सा पोस्टर लगा हुआ था, जो हवा की वजह से ऐसा मुड़ गया था कि लव और मुहम्मद नहीं दिखाई दे रहा था, बचा हुआ था सिर्फ आई!

मुझे याद था कि दंगे भड़काने वाला मौलाना तौकीर रजा, बरेलवी मसलक के सबसे बड़े नामों मे एक आला हजरत खानदान से आता है। वही आला हजरत जिनके नाम पर बरेली की ये एक बड़ी मस्जिद कायम है।

यहाँ से जब मैं आला हजरत मस्जिद की तरफ जाने के लिए पैदल निकाल पड़ा। रास्ते मे शटर गिराए बैठे लोग गले मे आईकार्ड देखकर ये अंदाजा लगा पा रहे थे कि मैं पत्रकार हूँ और शायद बाहर से आया हूँ। मस्जिद के करीब पहुँचते हुए एक ठेले वाले से मैंने पूछा कि उस दिन यहीं पर बवाल हुआ था?

उसने घूरकर मेरी तरफ देखा और फिर नजरें फेर ली। मैंने दुबारा ज़ोर देकर पूछा तो उसने कहा कि मैं शहर मे नया आया हूँ। वैसे, आजतक देश के जिस भी हिस्से मे किसी भी इलाके में मैंने रिपोर्टिंग की है तो अधिकतर मुसलमान जवाब न देने के लिए यही बात कहते नजर आए हैं।

ख़ैर, मैं अगले पाँच मिनट मे मस्जिद के गेट पर था। जहाँ एक 18 से 20 साल का लड़का बैठा हुआ था। आसपास कुछ पुलिसवाले कुर्सी लगाकर बैठे हुए थे। मस्जिद के दो एंटरेंस के रास्ते थे। सड़क की तरफ खुलने वाले स्टील के दरवाजे पर तीन पोस्टर लगे हुए थे। सभी मे दो बातें लिखी थीं। पहली ‘आई लव मुहम्मद’ और दूसरी ‘मैं, मेरे मा बाप, मेरी आल, सब आप पर कुर्बान या रसूल अल्लाह’।

मस्जिद आला हजरत पर लगा पोस्टर

घूमते हुये जब मैं जब मस्जिद के दूसरे दरवाजे पर पहुँचा तो शाम के 4 बजकर 40 मिनट का वक़्त हो चला था। कुछ बुजुर्ग नमाज़ी आना शुरू हो गए थे। मस्जिद से बुलाने का ऐलान हो चुका था। इस दरवाजे पर भी ‘आई लव मुहम्मद’ के पोस्टर लगे हुए थे। अंतर बस ये था कि ये प्रिंटेड नहीं थे। इन्हें हाथों से बनाया गया था।

बनावट को देखकर यह भी स्पष्ट था कि, इसे किसी कम उम्र के बच्चे ने बनाया है। टूटी फूटी हैंडराइटिंग मे इसी पोस्टर पर किसी बच्चे ने लिखा था कि अगर नबी सालल्हू, अलेह, वसल्लम से मुहब्बत का इजहार करना जुर्म है तो यह जुर्म हम हर रोज करेंगे।

मस्जिद के दरवाजे पर लगा पोस्टर

आला हजरत मस्जिद की ओर इशारा करने के लिए लगे बोर्ड के ठीक पीछे समाजवादी पार्टी का एक बड़ा पोस्टर लगाया गया था। जो शायद उत्तरप्रदेश मे सियासत और मजहब के गठबंधन को साफ तौर पर दिखाने के लिए काफी है।

मस्जिद आला हजरत लिखा बोर्ड

ये वही मस्जिद है जहाँ से निकली भीड़ पैगंबर से मुहब्बत के नाम पर 26 सितंबर को बरेली शहर को जला देने पर आमादा थी। बवाल वाले दिन इस मस्जिद मे केवल नौजवान लड़के ही नमाज पढ़ने आए थे जबकि आज जो मैंने देखा उसमें एक भी व्यक्ति 40 साल से कम उम्र का नहीं था।

यहाँ मैंने नामजियों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी बात करने को राजी नहीं था। हर चेहरा पर्दे में रहने की कोशिश कर रहा था। यहाँ से चलकर मैं एक गली के अंदर गया। गली पतली थी लेकिन अंदर अधिकतर मुसलमानों से भरी एक बड़ी आबादी थी।

यहाँ भी अधिकतर मुसलमान कुछ भी बताने से बच रहे थे। एक महिला ने बताया कि नामजियों की ही भीड़ थी जिसने ये पूरा बवाल बनाया था। तभी, एक अधेड़ व्यक्ति ने आवाज देकर मुझे बुलाया। नदीम नाम के इस शख्स ने, पहले तो केवल नामजियों को बचाने की कोशिश की लेकिन लंबी बातचीत के दौरान उसकी जबान खुलती गयी।

उसने कहा, “आज तो मुख्यमंत्री जी के भी बयान थे कि हमने डेंटिंग पेंटिंग कर दी, तो इसका सीख क्या है? ये डेंटिंग पेंटिंग करेंगे हमारी?” आगे कहा, “अभी इनकी सरकार है तो डेंटिंग पेंटिंग हो रही है, सरकार बदलेगी तो इनकी डेंटिंग-पेंटिंग होगी।”

उसने बेहद उत्तेजित होते हुये कहा कि ‘आई लव मुहम्मद तो कयामत तलक रहेगा’। इसकी पूरी बात आप Opindia की विडियो रिपोर्ट मे भी देख सकते हैं।

इस व्यक्ति से मैंने करीब 16 मिनट तक बात की, पूरी बातचीत के दौरान एक बार भी यह व्यक्ति अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुआ बल्कि धमकी भरे लहजे मे आगे और बुरे भविष्य की ही बात करता रहा। इसके अलावा बाक़ी के मुसलमानों ने मानो चुप रहने की कसम खाई हुई हो। एक भी शख्स कैमरे पर बात करने को तैयार नहीं था।

करीब चार घंटे तक इस इलाके मे घूमने के बाद मैं हिंदुओं के मुहल्लों मे गया। एक व्यक्ति जो अपने दरवाजे पर बैठा था उसने कहा कि ‘हिन्दू त्योहार जब भी आते हैं, तभी ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं’ इसके साथ ही उसने 2010 के बरेली के दंगों को भी याद दिलवाया जब होली खेलने के समय कर्फ़्यू लग गया था।

हिंदुओं का कहना यह भी है कि मुसलमान सुनियोजित ढंग से हिन्दू त्योहारों के समय ही ऐसी हरकतें करते हैं। जबकि मुसलमानों के त्योहारों के समय हिन्दू शांत रहते हैं। कई हिंदुओं ने सीधे तौर पर बरेली मे होने वाली हर इस्लामी उन्माद के लिए मौलाना तौकीर रजा और उसको राजनीतिक संरक्षण देने वाली कुछ राजनीतिक पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया।

हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि आज प्रदेश मे योगी आदित्यनाथ की सरकार नहीं होती तो शायद बरेली जल रहा होता। सरकार बदलने की वजह से मौलाना तौकीर रजा जैसे लोग अब कोशिश तो करते हैं लेकिन पुलिस उनका सही से इलाज कर देती है।

दोनों पक्षों से बात करने के बाद मैं बरेली से दिल्ली की तरफ निकला। बरेली के प्रसिद्ध झुमका चौक के पहले अवेधनाथ द्वार था, जिसके ऊपर भगवान शंकर की योग मुद्रा मे मूर्ति स्थापित की गयी है।

अवेधनाथ द्वार

कुछ देर वहाँ मैं रुका और वहाँ मौजूद दुकानों के बोर्ड पढ़कर मुझे आभास हुआ कि वहाँ एक ही पक्ष की 70 फीसदी से ज्यादा दुकाने थी। यानि शहर का एंट्री पॉइंट एक ही पक्ष के कब्जे मे था। और शहर के अंदर की पूरी बसावट मैं देख ही चुका था।

आगस्टे काम्टे की पंक्ति ‘डेमोग्राफी इज डेस्टिनी’ मेरे दिमाग मे घूमने लगी थी। हालाँकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के मंचों से दिए जाने वाले बयान और ऐसी घटनाओं मे प्रशासनिक तत्परता अभी भी समाज के दूसरे पक्ष को चैन की सांस लेने का मौका दे रहे हैं।