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हाँ, मैं पास्टर हूँ, नेपाल से आकर यीशु-यीशु करता हूँ…बिहार में ‘पनिया बाबा’ के सभा करने पर पुलिस ने लगाई रोक: ‘जादुई पानी’ की आड़ में हिंदुओं को ईसाई बनाने का आरोप

बिहार के सारण में ‘जादुई पानी’ के नाम पर लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। स्थानीय लोगों ने ‘पनिया बाबा’ उर्फ वैधजी नामक एक ईसाई पादरी पर लोगों को बरगलाकर ईसाई बनाने के लिए प्रेरित करने का आरोप लगाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित पादरी जादुई पानी के नाम पर लोगों के ठीक होने का दावा करता था। ईसाई पादरी ‘पनिया बाबा’ लोगों से कहता था कि इस पानी को पीने से जीवन की समस्याएँ दूर हो जाती हैं।

दावा किया जा रहा है कि आरोपित प्रचारक नेपाल से आया था और सारण के कई गाँवों में वह लोगों को इस पानी से ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा चला रहा था।

‘मिशनरी के पैसे से धर्मांतरण का धंधा’

लोगों ने पानी के नाम पर सिर्फ धोखा देने का आरोप लगाया है। एक शख्स ने दावा किया है कि उसने 7 दिनों तक पादरी के यहाँ से पानी पिया था लेकिन कोई असर नहीं हुआ। एक अन्य शख्स ने दावा किया कि ईसाई मिशनरियों के द्वारा इसको फंडिंग दी जा रही थी और यहाँ धर्मांतरण का खेल चल रहा था।

एक महिला ने भी बाबा पर इलाज के नाम पर लोगों को बरगलाने का आरोप लगाया है। एक युवकों ने भी दावा किया है कि अगर सच में बाबा के पास चमत्कार है तो वो उनकी बीमारी ठीक करके दिखाएँ।

बाबा का क्या है दावा?

लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने वाले बाबा का दावा है कि अगर वो पानी पढ़कर दे दे तो उसे पीकर कैंसर तक ठीक हो जाता है। वो कहता है, “अगर कोई मरने की कगार पर है, नहीं चल पा रहा है तो भी प्रभु यीशू की कृपा से 3 महीने में वो ठीक हो जाएगा।”

धर्म परिवर्तन कराने के दावों पर उसने कहा कि वो एक पादरी है और ईसाई धर्म प्रचारक है। आरोपित ने सभी धर्मों का सम्मान करने की बात कही है। हालाँकि, वो अपनी सभाओं में यह सिखा रहा था कि रात को सोने से पहले और जागने के बाद प्रभु यीशु का नाम लो।

लोगों ने दावा किया कि पादरी कहता था कि मंदिर में शैतान रहते हैं। हालाँकि, ईसाई प्रचारक ने यह बात कहने से इनकार किया है।

पुलिस ने क्या कहा?

सारण पुलिस ने कहा है कि पनिया बाबा पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) व अनुमंडल पदाधिकारी, मढ़ौरा को मामले की जाँच के आदेश दिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि अभी पनिया बाबा पर जाँच चल रही है।

पुलिस ने कहा, “SDO द्वारा एक के सभा आयोजन की अनुमति दिए जाने की बात सामने आयी है जिसमें विधि व्यवस्था संधारण के लिए फोर्स नियुक्ति का आदेश भी दिया गया था। पिछले बुधवार को मदारपुर, भेल्दी थाना एरिया में ये सभा आयोजित होने की बात बताई गई है। तत्काल प्रभाव से ऐसे सभा आयोजन पर प्रतिबंध लगाया जाता है।”

7 महीनों में आवारा कुत्तों के 26 लाख मामले, ABC नियम ताक पर: ऑपइंडिया की RTI में खुलासा, NCDC के आँकड़े डराने वाले

भारत में आवारा कुत्तों की समस्या लागातार बढ़ रही है। हर साल लाखों लोगों को कुत्तों के काटने की घटना झेलनी पड़ती है। ये सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी एक गंभीर संकट है।

ऑपइंडिया ने देशभर में कुत्तों के काटने से जुड़े आँकड़ों के लिए एक RTI डाली थी। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने जानकारी दी है कि केवल वर्ष 2025 में ही अब तक 26 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने अपने जवाब में बताया कि 31 जुलाई 2025 तक भारत में कुल 26,71,732 कुत्ते काटने के मामले सामने आए हैं।

साभार- NCDC, भारत सरकार

ऑपइंडिया ने आरटीआई के जरिए 2001 से लेकर 31 जुलाई 2025 तक राज्यवार आँकड़ों की जानकारी जुटाई। 2001 में ही एबीसी (Animal Birth Control) नियम लागू हुए थे।

हालांकि, केंद्र सरकार के राज्यवार केंद्रीकृत आँकड़ों का संकलन 2012 से शुरू हुआ। ये भी एक समस्या ही है क्योंकि भारत में रेबीज के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। फिर भी 2001 से 2012 तक कोई केंद्रीकृत राज्यवार डेटा उपलब्ध नहीं है और ये तब है जब एबीसी नियम पहले ही लागू हो चुके थे।

आवारा कुत्तों का लगातार बढ़ता संकट

ऑपइंडिया को 2012 से 31 जुलाई 2025 तक के आँकड़े मिले। हालाँकि आरटीआई में कई अन्य सवाल भी शामिल थे, लेकिन अधिकांश का जवाब नहीं दिया गया क्योंकि वे अन्य विभागों के अधिकार क्षेत्र में आते थे।

इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन पहलुओं पर हमने ध्यान केंद्रित किया गया है। वह हैं- प्रतिवर्ष दर्ज किए गए कुत्ते काटने के मामले, राज्यवार कुत्ते काटने का भार और भारत सरकार की ओर से रेबीज से होने वाली मौतों का आधिकारिक डेटा।

NCDC की ओर से जारी आँकड़ों का चित्र

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़े इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम- इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IDSP-IHIP) से मिले हैं। इन आँकड़ों में सबसे सोचने वाली बात ये है कि वर्ष 2025 का महीने का औसत 2024 के मासिक औसत से अधिक है। ये दिखाता है कि देश में आवारा कुत्तों की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है।

आँकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2025 तक हर महीने औसतन 3,81,676 कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए। यह संख्या 2024 के मासिक औसत 3,09,778 की तुलना में काफी अधिक है। इसका मतलब है कि भारत में 2025 में पिछले वर्ष की तुलना में हर महीने लगभग 80,000 अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

ऑपइंडिया की RTI उस जाँच का हिस्सा है जो देशभर में आवारा कुत्तों की परेशानी को सामने ला रही है। इस जाँच ने न केवल समस्या को गंभीरता से सामने रखा है, बल्कि नसबंदी और रेबीज नियंत्रण कार्यक्रमों की विफलता को भी उजागर किया है। जहाँ एक ओर समाजसेवी और एनजीओ इस संकट को जबरन ‘बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया’ मानते हैं, वहीं सरकार के अपने आँकड़े दूसरी सच्चाई ही बता रहे हैं।

RTI क्या कहती है?

RTI के जवाब में सरकार ने वर्ष 2012 से लेकर जुलाई 2025 तक हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के कुत्ते काटने के मामलों के वर्षवार आँकड़े उपलब्ध कराए हैं। 2012 से 2021 तक का डेटा IDSP पोर्टल के में ‘P फॉर्म’ ते तहत दर्ज किया गया था।

हालाँकि, इस रिपोर्टिंग फॉर्मेट में एक बड़ी परेशानी ये ती कि उस समय के रेबीज से मौतों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। इसका मतलब है कि लगभग एक दशक तक भारत सरकार ने देशभर में रेबीज से होने वाली मौतों का डेटा ही दर्ज नहीं किया।

दिलचस्प बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का दावा है कि भारत में हर साल लगभग 20,000 रेबीज मौतें होती हैं, जो भारत सरकार के कुछ दशक पहले संसद में दिए गए उत्तर पर आधारित है।

हालिया अध्ययनों के अनुसार, भारत में रेबीज के मामलों का आँकड़े 5,000 से अधिक हो सकते हैं। लेकिन, सरकार के आँकड़े 2022 से हर साल 100 से कम मौतें दिखाते हैं।

वर्ष 2022 से सरकार ने IDSP-IHIP पोर्टल पर डेटा दर्ज करना शुरू किया।यहाँ पर जानकारी ‘प्रीजेंप्टिव फॉर्म’ पर दर्ज की जाती है। आसान तौर पर कहा जाए तो ये आँकड़े फील्ड स्तर पर तत्काल निगरानी के आधार पर अस्थायी तौर पर लिए गए हैं। ये बाद में संशोधित हो सकते हैं।

फिर भी, ये आँकड़े पहले से ही लाखों मामलों की पुष्टि करते हैं, जो इस परेशानी की थाह बताते हैं। इसके अलावा 2012 से 2019 के बीच राष्ट्रीय आँकड़ों में भी लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 2012 में कुल 42,51,977 मामले दर्ज हुए थे, जो 2019 में बढ़कर 72,69,410 हो गए।

2012 से 2017 के बीच कुत्तों के काटे जाने वाले मामलों के आंकड़े (साभार- NCDC)

इसके बाद 2020 में कोविड महामारी के कारण कुत्ते काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की गई। उस वर्ष यह संख्या घटकर 47,58,041 रह गई।

इसके बाद यह गिरावट जारी रही और 2022 में देशभर में केवल 21,90,056 मामले दर्ज हुए।

हालाँकि उस वर्ष के बाद आंकड़ों में तेज उछाल देखा गया। वर्ष 2023 में कुत्ते काटने के 30,52,324 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 37,17,336 हो गई।

सिर्फ जुलाई 2025 तक ही भारत में 26 लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। यदि यही प्रवृत्ति बनी रही, तो वर्ष 2025 के अंत तक देश में 45 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज हो सकते हैं।

आँकड़ों में कुछ खास बातें भी शामिल रहीं। ये भारत में पशु नियंत्रण नीतियों की विविधता को बताती हैं। उदाहरण के तौर पर, लक्षद्वीप ने लगातार ‘जीरो’ कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए हैं। यह कोई आँकड़ों का संयोग नहीं है, बल्कि स्पष्ट नीति का परिणाम है। इस द्वीप क्षेत्र में कुत्तों को रखने की अनुमति ही नहीं है। यहाँ तक कि पर्यटकों को भी अपने पालतू कुत्तों को साथ लाने की अनुमति नहीं दी जाती।

वहीं, इसके उलट, भारत के अन्य राज्यों और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में हर साल लाखों की संख्या में कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए जाते हैं। यह अंतर बताता है कि जहाँ कुछ क्षेत्रों में सख्त और स्पष्ट रोकथाम नीतियाँ अपनाई गई हैं, वहीं अधिकांश हिस्सों में अस्थायी और अप्रभावी उपायों से ही काम चलाया जा रहा है।

वर्ष वार बढ़ता राष्ट्रीय ट्रेंड

ये आँकड़े एक बेहद चिंताजनक राष्ट्रीय रुझान की ओर ध्यान दिलाते हैं। वर्ष 2012 में भारत में 42.5 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए थे। इसके बाद यह संख्या हर साल लगातार बढ़ती गई और 2018 में यह आँकड़ा 75 लाख को पार कर गया। ये अब तक के पूरे डेटा सेट में सबसे अधिक है।

इस बढ़ोतरी ने नसबंदी अभियानों की असफलता के साथ शहरी और ग्रामीण भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को बताता है।

इसके बाद आया कोविड काल, जिसमें कुत्तों के काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की। लेकिन, यह गिरावट ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। वर्ष 2023 में देश में फिर से 30 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए।

वर्ष 2020, 2021 और 2022 के आँकड़ों को लेकर कई सवाल हैं। 2020 में अधिकांश महीनों तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू था, फिर भी 47 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए। इसके बाद के दो वर्षों में, जब लॉकडाउन समाप्त हो चुका था तब कुत्ते काटने के मामलों में गिरावट जारी रही। ये बताता है कि जब देश कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा था तब कुत्तों के काटे जाने के मामलों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं की गई।

रेबीज से मौतों के मामले केवल 2022 (21 मौतें), 2023 (50), 2024 (52) और 2025 (31 जुलाई तक 23) के लिए उपलब्ध हैं।

महामारी के बाद की गिरावट से कुत्तों के काटने की दर कम नहीं हुई

कुछ कुत्ता-प्रेमी यह तर्क दे सकते हैं कि 2020 से 2022 के बीच आवारा कुत्तों की समस्या पर नियंत्रण पा लिया गया। लेकिन वास्तविकता इसे उलट है। ये वह समय था जब कोविड-19 के कारण देश ठप पड़ा था। लोग घरों में बंद थे और लॉकडाउन हटने के बाद भी संक्रमण के डर से बाहर नहीं निकल रहे थे। इशके कारण कुत्तों और इंसानों के बीच संपर्क कम रहा।

इसके साथ ही, अस्पताल कोविड मामलों से जूझ रहे थे और लोग कुत्ते काटने के बाद इलाज के लिए अस्पताल जाने से भी डर रहे थे। इस कारण रिपोर्टिंग भी कम हुई। इसे गिरावट नहीं कहा जा सकता। इन सब के अलावा, सरकारी तंत्र पूरी तरह महामारी से निपटने की कोशिशों में लगा था। इसके कारण डेटा और मॉनिटरिंग भी प्रभावित हुई।

स्वास्थ्य कर्मियों, निगरानी अधिकारियों और नगर निगम प्रशासन के पास कुत्ते काटने की घटनाओं को दर्ज करने या प्रमाणित करने की सीमित क्षमता थी। इसलिए उन वर्षों में जो गिरावट दर्ज हुई, उसे नसबंदी या प्रशासन की सफलता नहीं कहा जा सकता। यह आँकड़ों का ही हेरफेर था जो विशेष परिस्थितियों में दर्ज हुआ।

2022 के बाद के आँकड़ों में ये बात साफ तौर पर सामने आ गई कि परेशानी हल नहीं हुई है। वह केवल कोविड महामारी के चलते कुछ समय के लिए छिप गया था।

राज्यवार स्थिति

राज्य स्तर पर आँकड़ों को गहराई से देखा जाए तो पता चलता है कि यह समस्या पूरे देश में कितनी अंदर तक अपनी जड़ें जमा चुकी है। इस सूची में उत्तर प्रदेश लगातार पहले नंबर पर रहा है।
यूपी के वार्षिक आँकड़ों को देखा जाए तो महामारी से पहले के वर्षों में 10 लाख से अधिक मामले सामने आते थे। कभी-कभी ये मामले 20 लाख से भी अधिक की संख्या में दर्ज होते थे।कोविड के बाद के वर्षों में यह संख्या घटकर हर साल 5 लाख से कम रही है।

बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश उन राज्यों में शामिल हैं जहाँ हर साल कुत्ते काटने के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। इन राज्यों में हर वर्ष लाखों की संख्या में मामले सामने आते हैं।

महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे राज्यों के आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं। लेकिन फिर भी हर साल आँकड़े 6 अंकों में दर्ज होते हैं। यह बताता है कि भारत का कोई भी हिस्सा इस परेशानी से अछूता नहीं है।

2024 में सबसे अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश से 1,42,953, उत्तर प्रदेश से 1,64,009, असम से 1,66,232, ओडिशा से 1,66,790, आंध्र प्रदेश से 2,45,166, बिहार से 2,63,925, कर्नाटक से 3,61,306, गुजरात से 3,92,652, तमिलनाडु से 4,80,425 और महाराष्ट्र से 4,85,349 मामले मिले हैं।

यह संकट केवल बड़े राज्यों तक ही सीमित नहीं है। छोटे राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में भी आवारा कुत्तों की समस्या काफी विकट है। उदाहरण के लिए, असम ने वर्ष 2024 में 1,66,000 से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए। वहीं केरल में पिछले एक दशक में हर साल 1,00,000 से अधिक मामले सामने आए हैं। ये बताता है कि यह समस्या किसी क्षेत्र विशेष की सीमाओं से ऊपर है।

इन आँकड़ों के लिहाज से भारत में लक्षद्वीप एकमात्र अपवाद है, जहाँ एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। वहीं, दूसरी ओर देश के अन्य हिस्सों में लाखों मामले हैं। यह बताता है कि सुनियोजित और निर्णायक प्रशासनिक उपाय सार्वजनिक स्वास्थ्य के परिणामों को पूरी तरह बदल सकते हैं।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। खबर को इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

झारखंड के 1 आदमी ने राजस्थान में 454 हिंदुओं को बना दिया ईसाई, रजिस्टर में दर्ज कर रखा था सबका डिटेल: बोला- धर्म परिवर्तन का मिलता है टारगेट, मिलती है सैलरी

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में धर्मांतरण गिरोह का खुलासा हुआ है। यहाँ चेन्नई की फ्रेंड्स मिशनरी प्रेयर बैंड (FMDB) सक्रिय है, जो हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई में परिवर्तित करती है। पकड़े गए आरोपित पौलुस बारजो ने बताया कि वह 11 साल में 454 हिंदुओं को ईसाई बना चुका है।

पौलुस बारजो श्रीगंगानगर में FMDB मिशनरी का इंचार्ज है। मिशनरी से उसे हर साल 20 लोगों के धर्मांतरण का टारगेट मिलता था। इसके लिए उसे 9 हजार रुपए महीना और अन्य लाभ दिए जाते थे। बारजो शादी का झाँसा देकर धर्मांतरण करवाता था। इस गिरोह में उसके साथ बाप-बेटे विनोद और आर्यन भी शामिल हैं।

पीड़ित संदीप की शिकायत पर मामला आया सामने

श्रीगंगानगर में धर्मांतरण गिरोह के सक्रिय होने का खुलासा तब हुआ जब अनूपगढ़ थाना क्षेत्र के रहने वाले संदीप ने धर्म परिवर्तन की शिकायत पुलिस से की। शिकायत में संदीप ने बताया कि अनूपगढ़ रेलवे स्टेशन के पास वह बाइक स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर गया था। यहाँ दुकान मालिक आर्यन और उसके बाप विनोद ने संदीप से शादी के बारे में पूछा। फिर शादी का झाँसा देकर मिशनरी के इंचार्ज पैलुस बारजो से मिलवाया।

संदीप ने आगे बताया कि 20 दिन पहले पौलुस बारजो ने उसे ईसाई धर्म में परिवर्तित होने का लालच दिया और कहा- “अगर तुम ईसाई धर्म अपना लेते हो तो प्रभु तुम से खुश हो जाएँगे और तुम्हारी शादी हो जाएगी।” इसके बाद बारजो ने नहर के पानी में डुबकी लगवाकर संदीप को ईसाई बना दिया।

पीड़ित संदीप ने कहा कि इसके बाद बारजो ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। बारजो उससे लगातार बाकी हिंदुओं को भी ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का दबाव बनाने लगे। इससे तंग आकर संदीप ने पुलिस और विश्व हिंदू परिषद से शिकायत की।

पौलुस बारजो का धर्मांतरण गिरोह

संदीप की शिकायत पर पुलिस ने 47 वर्षीय पौलुस बारजो और आर्यन को पूछताछ के लिए बुलाया। पूछताछ में बारजो ने 454 हिंदुओं का धर्मांतरण करवाने की बात कबूल कर ली। पुलिस को उसके पास से रजिस्टर भी मिला है, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों का पूरा डाटा है। बारजो के मकान का किराया, खाना, प्रार्थना सभा, आने-जाने का खर्च, बच्चों की स्कूल फीस भी मिशनरी ही देता है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, धर्मांतरण के लिए बारजो बीमार और गरीब हिंदू परिवारों को निशाना बनाता है। उन्हें प्रलोभन से ईसाई धर्म में बदलता है। अब तक बारजो ने जितने भी धर्मांतरण किए है, वे सभी पहले हिंदू ही थे। धर्मांतरण के लिए बारजो ने गैंग बनाया हुआ है।

अनूपगढ़ क्षेत्र में श्यामलाल और सुरजीत नाम के दो लोगों को काम पर लगाया हुआ है। इन लोगों ने गाँव-गाँव में अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं, जो हिंदू लोगों का ब्रेनवॉश कर धर्मांतरण का टारगेट पूरा करते हैं। ये सब भी हिंदू से ईसाई में धर्म परिवर्तन कराए हुए है। इस गिरोह में महिलाएँ भी शामिल हैं।

पौलुस बारजो ने 30 साल पहले कराया धर्मांतरण

पौलुस बारजो ने बताया कि वह झारखंड के कटिंगगेल गाँव का रहने वाला है। उसका मूल धर्म हिंदू ही है। वह 30 साल पहले 1995 में ईसाई बना था। बारजो का बड़ा भाई भी ईसाई बन गया है। बारजो ने धर्मांतरण करवाने के बाद ही 2003 में FMDB मिशनरी से जुड़ा।

FMDB से जुड़ने के लिए बारजो ने इंटरव्यू दिया। इसमें पास होने के बाद उसे झाँसी में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। एक साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद सबसे पहले राजस्थान के सीकर जिले में धर्मांतरण के काम का अंजाम देना शुरू किया।

इसके बाद 2008 में बारजो अनूपगढ़ आया और 2016 में चला गया। इस दौरान कई अन्य राज्यों में घूमा। फिर 2022 में अनूपगढ़ वापस आया और मिशनरी का इंचार्ज बन धर्मांतरण गिरोह चलाने लगा। फिलहाल वह विनोद के घर पर रहता था।

विश्व हिंदू परिषद ने की कार्रवाई की माँग

मामला सामने आने के बाद विश्व हिंदू परिषद ने कार्रवाई की माँग की है। संगठन के जिला मंत्री कृष्ण राव ने कहा कि पौलु बारजो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवा रहा है। राव ने कहा कि इसके अलावा हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया।

जिला मंत्री ने कहा कि संदीप ने हिम्मत दिखाते हुए पुलिस से शिकायत की, अब संगठन पुलिस प्रशासन से मामले में कठोर कार्रवाई की माँग करता है।

धर्मांतरण के खिलाफ राजस्थान सरकार लाई सख्त कानून

राजस्थान की बीजेपी सरकार ने धर्मांतरण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। सरकार धर्मांतरण के खिलाफ नया बिल लाई है। यह बिल ‘राजस्थान विधि-विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2025’ विधानसभा में पारित हो गया है। अब इसे राज्यपाल और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

इस बिल के तहत जबरन धर्मांतरण करवाने पर उम्रकैद और अवैध धर्मांतरण कराने पर 14 साल की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ₹5 लाख रुपए तक का जुर्माना भी भुगतना पड़ सकता है।

PM मोदी का बर्थडे पर रिटर्न गिफ्ट: MP के धार से ‘स्वस्थ नारी सशक्त परिवार’ और ‘माँ की बगिया’ योजना की शुरुआत की, PM-MITRA पार्क का किया भूमि पूजन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर 17 सितंबर 2025 को मध्य प्रदेश के धार जिले का दौरा किया। इसमें पीएम मोदी ने महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ‘स्वस्थ नारी सशक्त परिवार’ और ‘आठवें राष्ट्रीय पोषण माह’ अभियान का शुभारंभ किया। यह अभियान देश में अब तक का सबसे बड़ा स्वास्थ्य अभियान है, जिसके तहत 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक पूरे देश में लाखों स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएँगे।

महिलाओं और बच्चों के लिए सबसे बड़ा अभियान शुरू

जानकारी के अनुसार, देशभर में 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक एक लाख से ज्यादा स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएँगे। इन शिविरों में महिलाओं और बच्चों की विशेष जाँच की जाएगी। कैंपों में एनीमिया, टीबी, सिकल सेल और अन्य बीमारियों की जाँच की व्यवस्था होगी। मातृत्व, पोषण, टीकाकरण, और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी जागरूकता फैलाई जाएगी।

प्रधानमंत्री ने मातृ वंदना योजना के तहत देशभर की करीब 10 लाख महिलाओं के खातों में सीधे पैसा ट्रांसफर किया। यह आर्थिक मदद माताओं के पोषण और देखभाल को सुनिश्चित करने के लिए दी गई है।

‘सुमन सखी’ चैटबॉट और सिकल सेल कार्ड का वितरण

गर्भवती महिलाओं को जानकारी देने के लिए ‘सुमन सखी’ चैटबॉट लॉन्च हुआ। पीएम मोदी मध्य प्रदेश के लिए एक करोड़वां ‘सिकल सेल स्क्रीनिंग कार्ड’ भी वितरित करेंगे, जिससे इस बीमारी के खिलाफ देश की लड़ाई को नई दिशा मिली है।

पीएम मोदी ने जनजातीय क्षेत्रों में सेवाभाव से काम करने के लिए ‘आदि सेवा पर्व’ की शुरुआत की। इस अभियान में शिक्षा, पोषण, जल संरक्षण और रोजगार जैसे विषयों पर फोकस किया। ‘ग्राम विजन 2030’ योजना के तहत हर जनजातीय गाँव के लिए अलग विकास का रोडमैप बनेगा।

पीएम मित्रा पार्क से खुले रोजगार के नए रास्ते

प्रधानमंत्री मोदी धार में 2,150 एकड़ में बने ‘पीएम मित्रा टेक्सटाइल पार्क‘ का उद्घाटन किया। इस पार्क में 23000 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश प्रस्ताव मिला। इससे करीब 3 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। किसानों को उनकी कपास की बेहतर कीमत भी मिलेगी।

‘माँ की बगिया’ योजना से महिलाओं को नई पहचान

पीएम मोदी ने ‘एक बगिया माँ के नाम’ पहल के तहत महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य को पौधा भेंट किया। मध्य प्रदेश की 10,000 से ज्यादा महिलाएँ अब ‘माँ की बगिया’ विकसित करेंगी। यह योजना पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण दोनों को जोड़ती है।

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा न सिर्फ योजनाओं की घोषणाओं तक सीमित रहा, बल्कि यह स्वास्थ्य, रोजगार, जनजातीय उत्थान और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित होगा। धार की धरती से देश के कोने-कोने तक बदलाव की नई लहर पहुँचेगी।

PM मोदी की माँ का AI वीडियो सोशल मीडिया से तुरंत हटाने के आदेश, पटना HC ने कॉन्ग्रेस को लगाई डाँट: कहा- देरी होने पर लेंगे एक्शन

पटना हाईकोर्ट ने बुधवार (17 सितंबर 2025) को एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने कॉन्ग्रेस पार्टी को सख्त हिदायत दी है कि वो पीएम नरेंद्र मोदी की माँ हीराबेन मोदी का AI जेनरेटेड वीडियो तुरंत सोशल मीडिया से हटा दे। ये वीडियो बिहार कॉन्ग्रेस ने पोस्ट किया था, जिसमें पीएम मोदी को सपने में अपनी माँ से डाँट खाते हुए दिखाया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पटना हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस पीबी बाजंतरी ने ये आदेश दिया। पटना हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाया। जस्टिस बीपी बाजंतरी ने कहा कि ये वीडियो तुरंत हटाओ, वरना सख्त कार्रवाई होगी।

इस मामले में बीजेपी दिल्ली इलेक्शन सेल के कन्वीनर संकेत गुप्ता ने FIR दर्ज कराई थी। FIR में भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ 18(2), 336(3), 336(4), 340(2), 352, 356(2) और 61(2) लगाई गईं। ये वीडियो पीएम की छवि खराब करने और माँ का अपमान करने के लिए बनाया गया था।

ये मामला तब शुरू हुआ जब बिहार कॉन्ग्रेस ने सोशल मीडिया पर ये वीडियो शेयर किया। वीडियो में पीएम मोदी अपनी माँ हीराबेन से राजनीति पर डाँट खा रहे हैं, जो वोट चोरी जैसे मुद्दों पर था। हीराबेन मोदी का निधन 2022 में हो गया था। इस वीडियो से बीजेपी भड़क गई। बीजेपी नेताओं ने कहा कि ये न सिर्फ पीएम की माँ का अपमान है, बल्कि पूरे देश की माताओं का भी।

इससे पहले भी बिहार के दरभंगा में कॉन्ग्रेस की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान स्टेज से पीएम और उनकी माँ पर गालियाँ दी गई थीं। पीएम मोदी ने उस घटना पर कहा था, “मेरी माँ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। ये गालियाँ सिर्फ मेरी माँ को नहीं, बल्कि देश की हर माँ, बहन और बेटी को अपमानित करने वाली हैं। बिहार की धरती कभी माँ का अपमान बर्दाश्त नहीं करती।” उन्होंने ये भी कहा कि वो एक बार माफ कर सकते हैं, लेकिन बिहार और भारत की जनता कभी नहीं।

मोदी सरकार के प्रहार से खौफ में वामपंथी आतंकी, हथियार डालकर शांति वार्ता के लिए लिखा पत्र: शाह ने मार्च 2026 तय की है नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन, 2025 में अब तक 200+ ढेर

नक्सली संगठन CPI (माओवादी) ने पहली बार सरकार से शांति वार्ता करने और हथियार डालने की पेशकश की है। संगठन ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा है कि वो फिलहाल एक महीने के लिए अस्थायी तौर पर संघर्ष रोककर सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं।

यह कदम तब उठाया गया है, जब गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षाबलों की कड़ी कार्रवाई से नक्सलियों को बड़ा नुकसान हुआ है, जिससे वे बातचीत के लिए मजबूर हुए हैं।

नक्सलियों के पत्र में क्या लिखा है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नक्सली संगठन के प्रवक्ता ‘अभय’ ने 15 अगस्त 2025 को जारी एक प्रेस नोट में कहा कि वो फिलहाल के लिए हथियारबंद संघर्ष को रोकना चाहते हैं और शांति वार्ता के लिए तैयार हैं। अभय ने अपने पत्र में लिखा कि बीते महीनों में लगातार मुठभेड़ों में उसके कई बड़े नेता मारे गए हैं। बसवराजू जैसे शीर्ष नेता समेत केंद्रीय कमेटी के 7 सदस्य इस साल मारे गए। अब संगठन शांति चाहता है।

नक्सली संगठन का सरकार को पत्र, लिखा- हथियार डालकर शांति वार्ता को तैयार

पत्र में यह भी कहा गया है कि वे सरकार से बातचीत करने के लिए एक महीने का समय चाहता हैं ताकि वो अपने देश भर के नेताओं और कार्यकर्ताओं, खासकर जेल में बंद साथियों से इस बारे में सलाह-मशविरा कर सकें। नक्सलियों ने कहा कि अगर सरकार चाहे तो वे वीडियो कॉल पर भी बात करने के लिए तैयार हैं।

पत्र में यह भी लिखा है कि भविष्य में वे राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लोगों के हक के लिए लड़ेंगे। हालाँकि, छत्तीसगढ़ पुलिस इस पत्र की सच्चाई की जाँच कर रही है और कहा है कि बातचीत पर कोई भी फैसला सरकार ही लेगी।

अमित शाह की डेडलाइन और 2024-25 तक मारे गए नक्सलियों की संख्या

गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का ऐलान किया था। अमित शाह ने कहा था कि अब समय आ गया है कि इस समस्या पर आखिरी प्रहार किया जाए। इसके बाद से ही सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज कर दिया है।

साल 2024 और 2025 में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में काफी तेजी आई है। इस दौरान सुरक्षाबलों ने बड़ी संख्या में नक्सलियों को मार गिराया है, जबकि कई ने डर से आत्मसमर्पण कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया। इसके अलावा, 1090 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया।

इस साल, सुरक्षाबलों ने 200 से ज्यादा नक्सलियों को मार गिराया है, जिनमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं। वहीं 104 को गिरफ्तार किया गया है और 164 ने आत्मसमर्पण किया है। हाल ही में, 21 मई 2025 को 27 नक्सली मारे गए थे, जिसमें 1.5 करोड़ का इनामी बसवा राजू भी था।

इससे पहले भी कई बड़े ऑपरेशन हुए, जिनमें कई टॉप नक्सली नेताओं का खात्मा हुआ। माना जा रहा है कि इन लगातार हो रही कार्रवाईयों ने ही नक्सलियों को हथियार डालने के लिए मजबूर किया है।

पिछले 15 महीनों में, कुल मिलाकर 400 से ज़्यादा नक्सली मारे गए हैं, जिनमें कई बड़े कमांडर भी शामिल हैं। गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में चलाई जा रही ‘जीरो टॉलरेंस‘ नीति के कारण इन ऑपरेशनों को बड़ी सफलता मिली है।

नक्सली हिंसा में कमी

सरकार की कड़ी कार्रवाई के कारण नक्सली हिंसा में भी कमी आई है। 2004 से 2014 के बीच जहाँ 16,463 हिंसक घटनाएँ हुई थीं। वहीं, मोदी सरकार आने के बाद 2014 से 2024 के बीच यह संख्या 53% घटकर 7,744 रह गई।

इसी दौरान सुरक्षाबलों की मौत में 73% और नागरिकों की मौत में 70% की कमी आई है। 2014 में जहाँ 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, 2024 में यह संख्या घटकर केवल 12 रह गई है।

सरकार की शर्त

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने पहले ही साफ कर दिया था कि सरकार किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन उसकी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। विजय शर्मा ने कहा था कि अगर नक्सली मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं तो उन्हें भारतीय संविधान को मानना होगा, क्योंकि बिना संविधान को माने कोई भी बातचीत बेमतलब होगी।

राहुल गाँधी ने ‘वोट चोरी’ के प्रेजेंटेशन में दिखाई न्यूजलॉन्ड्री की प्रोपेगेंडा रिपोर्ट, जाने इसे लिखने वाले हिंदू-विरोधी विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल की पूरी कुंडली

कॉन्ग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर बेबुनियाद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाकर उसे ‘मुद्दा’ बनाने की कोशिश करती है, जबकि उसके समर्थक प्रोपेगेंडा चैनल अपने राजनीतिक आकाओं के दावों को ‘विश्वसनीय’ बताते हुए झूठे तथ्यों का प्रचार-प्रसार करते हैं।

पत्रकार विजय पटेल ने इस सांठगांठ को उजागर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हाल ही में पोस्ट डाला है। इसमें बताया गया है कि कैसे राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस का ‘वोट चोरी‘ प्रचार अभियान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और हिन्दू विरोधियों के हाथों में इसकी डोर है।

कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी की 7 अगस्त को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई गई ‘वोट चोरी’ पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन पहले ही सवालों के घेरे में आ चुकी है, लेकिन हालिया खुलासे चुनावी धोखाधड़ी के उनके दावों को और कमजोर कर देते हैं। गाँधी को न केवल ‘वोट चोरी’ प्रेजेंटेशन के कारण, बल्कि वामपंथी प्रचारक न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित हिटजॉब्स पर उनकी निर्भरता के कारण भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

ये प्रोपेगैंडा लेख कट्टर हिंदू-विरोधी लोगों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें से एक की पहचान विशाल वैभव के रूप में हुई है। ये लोग चुनाव आयोग के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

विवादास्पद पीपीटी के चौथे पेज पर, राहुल गाँधी ने दावा किया, “महाराष्ट्र के नतीजों ने बड़े पैमाने पर वोट चोरी के हमारे संदेह की पुष्टि की है।” पीपीटी में न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट का शीर्षक है, “नए मतदाताओं की बाढ़? कामठी का अजीबोगरीब मामला, जहाँ महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख जीते।”

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री के प्रचार लेखों का सहारा लेना, उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता को दर्शाता है। हालाँकि यह बात सामने आई है कि न्यूज़लॉन्ड्री के पत्रकार विशाल वैभव हिंदू विरोधी हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया यूजर्स पर ‘गौमूत्र’, ‘cowf&kers’ और ‘D%kless Hindutva’ जैसे तंज कसते हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री पर ऑथर पेज के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि एक्स अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब मौजूद नहीं है। इसमें हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन दिख जाएँगे।

शायद, न्यूज़लॉन्ड्री के प्रोपेगैंडा फैक्ट्री का हिस्सा बनने के लिए हिंदुओं को ‘गाली देना’ अनिवार्य पात्रता है। राहुल गाँधी ने अपनी वोट चोरी वाले पीपीटी में जिस न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्टर की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात की, अब उसके बारे में बात करते हैं। उसका कॉन्ग्रेस पार्टी से पुराना नाता रहा है। सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक की ऑनर और संचालक विवादास्पद कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर है।

ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे सीपीआर विदेशी फंडिंग मानदंडों के उल्लंघन के लिए जाँच के घेरे में रहा है और केंद्र सरकार ने इसका लाइसेंस निलंबित कर दिया था। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च पर सितंबर 2022 में आयकर छापे पड़े थे। जुलाई 2023 में अय्यर के सीपीआर को टैक्स छूट मिलना भी बंद हो गया।

मित्तल इंडियास्पेंड (IndiaSpend) पोर्टल के साथ काम कर चुके हैं। इंडियास्पेंड कॉन्ग्रेस पार्टी की वैचारिक विचारधारा से सबसे ज़्यादा जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, कॉन्ग्रेस पार्टी के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती इंडियास्पेंड के संस्थापक ट्रस्टी हैं। हालाँकि, इंडियास्पेंड की वेबसाइट में उनका नाम नहीं है। ऑपइंडिया ने कई मौकों पर इंडियास्पेंड के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी झूठों का पर्दाफ़ाश किया है। इंडियास्पेंड ने पहले भी अपने डेटाबेस में मुस्लिम पीड़ितों की संख्या बढ़ाने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। कई मामलों में ऐसा देखा गया है।

न्यूज़लॉन्ड्री की वरिष्ठ रिपोर्टर सुमेधा मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा-विरोधी और इस्लाम-समर्थक प्रोपोगेंडा आउटलेट्स में भी काम किया है।

दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2021 से सितंबर 2022 के बीच, सुमेधा मित्तल ने मोदी विरोधी और कुख्यात शासन विरोधी जॉर्ज सोरोस की क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) में काम किया। OCCRP को अमेरिकी विदेश विभाग और अब भंग हो चुकी अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) से भारी मात्रा में धन प्राप्त हुआ। OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF), फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन और रॉकफ़ेलर ब्रदर्स फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि OCCRP ने व्यवसायी गौतम अडानी और सेबी के खिलाफ़ हिटजॉब्स प्रकाशित किए थे। OCCRP भारतीय लोकतंत्र को कमज़ोर करने के लिए बार-बार दुष्प्रचार भी करता रहा है। भारत में ‘वोट चोरी’, म्यांमार में डेटा संकलन, झूठ और भ्रामक सूचनाओं को ‘ज़बरदस्त’ खुलासे के रूप में प्रस्तुत किया गया

कॉन्ग्रेस पार्टी राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ पीपीटी के साथ एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश कर रही थी। इस बीच से बात सामने आयी कि ये दस्तावेज म्यांमार में तैयार किए गए थे। ‘वोट चोरी’ वेबसाइट पर अपलोड की गई पीडीएफ फाइलों के मेटाडेटा विश्लेषण से पता चला कि राहुल गाँधी की प्रस्तुति के तीनों संस्करण म्यांमार मानक समय (एमएमटी) में बनाए गए हैं। कॉन्ग्रेस नेताओं और आईटी सेल ने इन आरोपों को हालाँकि खारिज किया, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर संदेह जताने के लिए कॉन्ग्रेस ने न्यूज़लॉन्ड्री के लेखों का सहारा लेना, अपने आप में उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है। हालाँकि, यह सामने आया है कि न्यूज़लॉन्ड्री के लेखक, विशाल वैभव, एक कट्टर हिंदू विरोधी रहे हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर ‘गौमूत्र’, ‘गाय-बकरियों’ और ‘गधा हिंदुत्व’ जैसे व्यंग्य करते रहते हैं। न्यूज़लॉन्ड्री पर उनके लेखक पृष्ठ के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि X अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब “मौजूद नहीं है”, लेकिन उनके बेहद विक्षिप्त और हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन सामने आए हैं।

राहुल गाँधी द्वारा अपने वोट चोरी पीपीटी में उद्धृत न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्ट्स की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात करें तो उनका न केवल एक वैचारिक पूर्वाग्रह है, बल्कि कॉन्ग्रेस पार्टी से उनका पुराना संबंध भी है।

सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक का स्वामित्व और संचालन विवादास्पद कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर के पास है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च सितंबर 2022 में आयकर छापों का विषय रहा है। जुलाई 2023 में अय्यर के थिंक टैंक की कर छूट की स्थिति भी रद्द कर दी गई थी। मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा विरोधी और इस्लाम समर्थक प्रचार आउटलेट में भी योगदान दिया है।

राहुल गाँधी की वोट चोरी के दस्तावेजों का म्यांमार में तैयार किया जाना आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उनका करियर विदेशी ताकतों की संलिप्तता से जुड़े विवादों में घिरा रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, रहस्यमयी विदेश यात्राएँ, विदेशी अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकें, कज़ाकिस्तान, रूस और इंडोनेशिया के रोबोट द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्रभाव अभियान, और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का आह्वान किया जाना, इसकी पुष्टि करते हैं।

22 पेज वाली वोट चोरी की इस पीपीटी में कॉन्ग्रेस पार्टी ‘हम हारे नहीं हैं, हमें हरा दिया गया है’ साबित करने की कोशिश करती रही। हालाँकि ऑपइंडिया ने बताया है कि कैसे चुनाव आयोग ने हर आरोप का खंडन किया, चाहे वह मतदाता पंजीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में गड़बड़ी हो, मतदान प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करना हो या राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए डिजिटल मतदाता सूची को साझा करने से चुनाव आयोग का साफ इनकार हो।

दस्तावेज़ के पेज 8 पर, गाँधी ने यह आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र के आँकड़ों को छिपा रहा है ताकि ‘वोट चोरी’ का पता नहीं चल पाए, लेकिन उनकी टीम ने बड़ी मेहनत से इसकी जाँच की है। हालाँकि, चुनाव आयोग के इस पेज में 30 एंट्री हैं और महादेवपुरा में मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 6 लाख है। इसका सीधा अर्थ यह है कि गाँधी के दावों के विपरीत, लाखों नहीं, बल्कि केवल 20,000 पेज की जाँच की आवश्यकता थी। जाहिर है, आँकड़ों पर आधारित प्रचार में भी, कॉन्ग्रेस मेलोड्रामा का तड़का लगाना नहीं भूली।

यह दस्तावेज चुनिंदा मामलों से जुड़ा है, जिसमें प्रबंधन या तकनीकी समस्याएँ शामिल थीं और उन्हें ‘वोट चोरी’ के सबूत के रूप में पेश किया गया। कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं की उपेक्षा का इतिहास रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी अब सरासर झूठ और वैचारिक रूप से पक्षपातपूर्ण प्रचार करने वालों पर निर्भर है और तुच्छ राजनीतिक फायदे के लिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

4 बंडल दस्तावेज, ₹1000 करोड़ का लेनदेन: छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में ED ने पेश की 7000 पन्नों की चार्जशीट, भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को बताया ‘सिंडिकेट का प्रमुख हैंडलर’

छत्तीसगढ़ के शराब घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। रायपुर की विशेष अदालत में ED ने 4 बंडलों में कुल 7000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी निवेश और राजनीतिक नेटवर्किंग से जुड़े आरोपों को शामिल किया गया है।

ED का दावा है कि चैतन्य को शराब घोटाले की ब्लैक मनी से ₹16.70 करोड़ मिले। इसे उसने रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में निवेश कर वैध दिखाने की कोशिश की। इसके अलावा घोटाले के लिए सिंडिकेट बनाकर कुल ₹1000 करोड़ का लेनदेन किया।

ED ने 18 जुलाई 2025 को चैतन्य को उनके भिलाई स्थित घर से गिरफ्तार किया था। अभी वह जेल में हैं। यह शराब घोटाला वर्ष 2019 से 2022 के बीच कॉन्ग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुआ।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ED के ये सभी आरोप लक्ष्मी नारायण बंसल उर्फ पप्पू बंसल के बयान पर आधारित हैं। बंसल ने ED को बताया कि उन्होंने चैतन्य के साथ मिलकर शराब घोटाले से ₹1,000 करोड़ बनाए और काले धन को सफेद करने की कोशिश की।

शराब घोटाले से राज्य को हुआ ₹2,161 करोड़ का नुकसान

ED का कहना है कि इस पूरे सिंडिकेट ने अपने हिसाब से आबकारी विभाग के समान ही ये तंत्र बनाया और शराब बेची। इससे राज्य को मिलने वाले राज्स्व के बजाय सिंजिकेट को फायदा हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य को कुल ₹2,161 करोड़ का नुकसान हुआ।

इस मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) भी सक्रिय हैं। दोनों एजेंसियों ने चैतन्य की सात दिन की रिमांड माँगी है, जिससे उनकी गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है।

कोर्ट ने फिलहाल फैसला सुरक्षित रखा है और अगली सुनवाई 19 सितंबर 2025 को निर्धारित की गई है। चैतन्य ने गिरफ्तारी से बचने के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका लगाई थी, जिसे जस्टिस अरविंद वर्मा की एकल पीठ ने खारिज कर दिया।

सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल विवेक शर्मा ने याचिका का विरोध किया, जबकि बचाव पक्ष ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया।

ED के अनुसार, शराब घोटाले का पैसा एक नेटवर्क के जरिए चैतन्य तक पहुँचा। इस नेटवर्क में अनवर ढेबर, दीपेंद्र चावड़ा, केके श्रीवास्तव और कॉन्ग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल शामिल थे।

शराब घोटाले में सिंडिकेट का प्रमुख हैंडलर था चैतन्य बघेल

ED का आरोप है कि चैतन्य ही इस नेटवर्क का मास्टरमाइंड है। उसी ने इस घोटाले से जुड़े ₹1000 करोड़ के लेन-देन को मैनेज किया, जिसमें कई फ्रंट कंपनियों और नकद लेन-देन शामिल थे।

ED ने अपने आरोपो में ये भी बताया कि ₹18.9 करोड़ की अवैध राशि को चैतन्य की रियल एस्टेट परियोजना में निवेश किया गया। चैतन्य बघेल ने अपने रियल एस्टेट प्रोजेक्ट विट्ठल ग्रीन में 18.90 करोड़ रुपए और अपनी रियल एस्टेट फर्म मेसर्स बघेल डेवलपर्स एंड एसोसिएट्स में 3.10 करोड़ रुपए के काले धन का इस्तेमाल किया।

आरोपों की पुष्टि के लिए ED ने डिजिटल साक्ष्य, गवाहों के बयान और सौम्या चौरसिया (मुख्यमंत्री कार्यालय की पूर्व उप सचिव), ढेबर, चैतन्य और अन्य आरोपितों की व्हाट्सएप चैट को प्रस्तुत किया है।

ED के अनुसार, बंसल ने चैतन्य के कहने पर छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के कोषाध्यक्ष को बड़ी मात्रा में नकद पैसे पहुँचाए गए। मामले में एक अन्य आरोपी अग्रवाल फिलहाल फरार है।

500 साल बाद जन्मभूमि पर राम मंदिर, 500 साल बाद पावागढ़ में फहराई धर्म ध्वजा… काशी से कामाख्या तक PM मोदी ने जगाया ‘गर्व से कहो हम हिंदू है’ का गौरव बोध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (17 सितंबर 2025) अपना 75वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। 2014 में सत्ता सँभालने के बाद उन्होंने जहाँ अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और राजनीति के क्षेत्र में कई बड़े फैसले लिए तो दूसरी और उनके कार्यकाल का एक अहम पहलू धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी रहा है।

500 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण हो या फिर पावागढ़ की पहाड़ियों पर 5 शताब्दियों बाद धर्म ध्वजा का फिर से फहराया जाना हो, इन घटनाओं ने खुद को गर्व से हिंदू बताने के गौरव बोध को फिर से जगाया है।

काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन में महाकाल लोक का निर्माण और असम की कामाख्या शक्ति पीठ का विकास जैसे कार्यों ने आस्था से जुड़े इन स्थलों को नई पहचान दी है। इन स्थलों पर जाने वाले लोगों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।

जब पीएम मोदी ने पावागढ़ में फहराई धर्म ध्वजा

राम मंदिर के संघर्ष की कहानी तो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँच गई है लेकिन पावागढ़ के काली माता मंदिर के लिए भी संघर्ष कम नहीं था। इस मंदिर पर महमूद बेगड़ा नाम के सुल्तान ने 15 वीं सदी में हमला किया था। महमूद गुजरात का छठा सुल्तान था और उसका पूरा नाम अबुल फत-नासिर-उद-दीन महमूद शाह प्रथम था। मात्र 13 साल की उम्र में सुल्तान की गद्दी पर बैठने के बाद उसने गुजरात में 52 साल राज किया।

1459-1511 ई के बीच कई लोगों ने इस सुल्तान का खूँखार रूप कई बार देखा। वह इलाकों को कब्जाने के लिए जंग लड़ता और जब जीत हासिल होती तो वहाँ के राजाओं से इस्लाम कबूल करने को कहता। जैसे ही कोई राजा इस्लाम मानने से मना करता वह उन्हें मौत के घाट उतार देता।

उसने जूनागढ़ और पावागढ़ में भी अपना कब्जा बहुत जल्दी कर लिया था। इसके बाद उसने महाकाली के मंदिर और द्वारका मंदिर को तुड़वाया। हिंदू मंदिरों पर हमले से उसका उद्देश्य साफ था कि हिंदुओं की अपने भगवान के प्रति आस्था कम हो जाए और वह इस्लाम कबूलें।

प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता

बता दें कि 15वीं शताब्दी के खूँखार इस्लामी सुल्तान ने पावागढ़ में जिस महाकाली मंदिर को अपना निशाना बनाया था उसे लेकर मान्यता है कि यहाँ पर ऋषि विश्वामित्र ने माता काली की कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा श्रीराम भगवान और माता सीता के पुत्रों ने भी पावागढ़ में ही मोक्ष प्राप्त किया था।

पावागढ़ में इस प्राचीन मंदिर के शिखर को तोड़कर एक सुल्तान ने दरगाह का निर्माण करवाया था अब वहाँ दोबारा काली माता का भव्य मंदिर बनकर गया है। पीएम मोदी ने 18 जून 2022 को 500 साल बाद यहाँ ध्वज फहराया था।

गुजरात से सोमनाथ तक अध्यात्म का उदय

मोदी सरकार में उत्तराखंड के चारधाम महामार्ग प्रोजेक्ट के जरिए चार प्रमुख तीर्थस्थलों- केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री को हर मौसम में सड़क के द्वारा जोड़ने की बड़ी योजना चल रही है। वहीं, 2013 की आपदा के बाद केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण भी पीएम मोदी की प्राथमिकताओं में रहा है। धारा 370 हटने के बाद श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर और घाटी के अन्य प्राचीन मंदिरों, शक्तिपीठों का पुनर्विकास शुरू हुआ है।

मोदी सरकार ने विश्वविद्यालयों और IITs में भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) की शुरुआत की, जिसके तहत वेद, उपनिषद, योग और आयुर्वेद को शिक्षा से जोड़ा गया है। साथ ही, अयोध्या, चित्रकूट, हंपी, कुरुक्षेत्र जैसे ‘रामायण और पीएम मोदी’ केंद्रों पर इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा गया।

बतौर प्रधानमंत्री अपने एक दशक के कार्यकाल में पीएम मोदी ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को फिर से भारत के केंद्र में ला खड़ा किया है। पीएम मोदी के उदय से सामूहिक चेतना का उद्भव हुआ है, धर्मस्थल भव्य और दिव्य हुए हैं। मोदी सिर्फ प्रधानमंत्री से अधिक एक ऐसे शख्स के तौर पर सामने आए हैं जिन्होंने ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ की भावना को नया आत्मविश्वास दिया है।

‘भगवान से खुद कुछ करने को कहो’: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति बदलने की याचिका, खजुराहो के मंदिर से जुड़ा है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर 2025) को मध्य प्रदेश के खजुराहो में जावरी मंदिर की सात फुट लंबी भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति को ठीक करने या नई लगाने की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका राकेश दालाल ने दायर की थी। उनका कहना था कि मुगल हमलों में मूर्ति का सिर टूट गया था और भक्तों को पूजा करने का हक मिलना चाहिए। लेकिन सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने याचिका सुनने से मना कर दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीजेआई ने इसे ‘पब्लिसिटी का हथकंडा’ बताया। उन्होंने कहा, “ये बस पब्लिसिटी के लिए है… जाओ, भगवान विष्णु से खुद कहो कि कुछ करें। अगर तुम उनके इतने बड़े भक्त हो, तो प्रार्थना करो, ध्यान लगाओ।”

याचिकाकर्ता के वकील ने मूर्ति की तस्वीर दिखाई और कहा कि सिर पूरी तरह बर्बाद है, इसे ठीक करना जरूरी है। लेकिन सीजेआई ने जवाब दिया कि खजुराहो मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) के जिम्मे है। उन्होंने कहा, “ये पुरातत्व की चीज है। एएसआई को तय करना है कि मूर्ति ठीक होगी या नहीं। कई सारी दिक्कतें हैं। तब तक, अगर तुम्हें शिवजी से दिक्कत नहीं, तो वहाँ जाकर पूजा कर लो। खजुराहो में शिव का बहुत बड़ा लिंगम है, सबसे बड़े में से एक।” बेंच ने याचिका फौरन खारिज कर दी।

याचिका में लिखा था कि केंद्र के गृह मंत्री और एएसआई को कई बार चिट्ठी लिखी गई, लेकिन जवाब मिला कि मूर्ति बदलना संरक्षण नियमों के खिलाफ है। एएसआई के सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट ने कहा कि खजुराहो मंदिरों की देखभाल उनकी जिम्मेदारी है और टूटी मूर्ति को नई से बदलना नियमों में नहीं है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे भक्तों के पूजा के हक का हनन हो रहा है। उन्होंने विरोध, ज्ञापन और अभियानों का जिक्र किया, जो बेकार गए। लेकिन कोर्ट ने इसे हक का मसला नहीं माना।

सीजेआई का बयान सोशल मीडिया पर तूफान मचा रहा है। लोग गुस्से में हैं कि कोर्ट ने हिंदू भक्तों की भावनाओं का मजाक बनाया। कईयों का कहना है कि देवता से पूछने वाला तंज अपमानजनक है।

शशांक शेखर झा ने ट्वीट किया, “हिंदुस्तान में एक हिंदू भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति ठीक करने की गुहार लगाता है। सुप्रीम कोर्ट में मामला जाता है। सीजेआई, जो खुद को नियो-बौद्ध कहते हैं, न सिर्फ मदद करने से मना करते हैं, बल्कि भक्त की आस्था का मजाक उड़ाते हैं। मैं मध्य प्रदेश के सीएम @DrMohanYadav51 से मूर्ति ठीक करने की अपील करता हूँ।”

एडवोकेट विनीत जिंदल ने लिखा, “इससे अधिक शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता कि देश के माननीय CJI भगवान के संदर्भ में इस प्रकार की टिप्पणी करें। जो व्यक्ति सभी धर्मों को सम्मान देने की बात करते हैं, क्या वे किसी अन्य धर्म विशेष के संदर्भ में इस तरह के शब्द कह सकते हैं? निश्चित ही नहीं। आदेश देना उनका अधिकार है, लेकिन भगवान का अपमान सहन नहीं किया जाएगा, चाहे वह देश का मुख्य न्यायाधीश ही क्यों न हो। माननीय CJI को देश के करोड़ों हिंदुओं से क्षमा माँगनी चाहिए और अपने इन मौखिक शब्दों को तत्काल वापस लेना चाहिए।”

इन ट्वीट्स से साफ है कि लोग खफा हैं। कई यूजर्स कह रहे हैं कि कोर्ट को धार्मिक मामलों में संवेदनशील होना चाहिए। मध्य प्रदेश के सीएम से हस्तक्षेप की माँग तेज हो रही है। जानकारों का कहना है कि एएसआई के नियम सख्त हैं, लेकिन भक्तों की आस्था को भी देखना चाहिए। ये मामला अब सियासी रंग ले सकता है।