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‘आवरण’ से मुगल इतिहास पर खड़े किए सवाल, ‘पर्व’ में महाभारत के किरदारों को बनाया आम आदमी: जानिए कौन थे कन्नड़ लेखक एसएल भैरप्पा, 94 साल की उम्र में निधन

कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक और पद्म भूषण से सम्मानित एसएल भैरप्पा का बुधवार (24 सितंबर 2025) को 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु के जयदेव मेमोरियल राष्ट्रोत्त्थान अस्पताल और रिसर्च सेंटर में अंतिम साँस ली।

एसएल भैरप्पा का पिछले तीन महीनों से इलाज चल रहा था। मंगलवार (23 सितंबर 2025 ) को दोपहर 2.38 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे कुछ समय से उम्रदराज होने के चलते उससे जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। कुछ महीने पहले सुबह की सैर के दौरान गिर भी गए थे।

भैरप्पा को बेहतर इलाज के लिए मैसूर से बेंगलुरु लाया गया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी तबीयत बिगड़ती गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार 26 सितंबर 2025 को मैसूर में किया जाएगा, वही शहर जहाँ उन्होंने अपने जीवन के कई साल बिताए। 25 सितंबर 2025 को उनका पार्थिव शरीर बेंगलुरु के रविंद्र कलाक्षेत्र में रखा जाएगा ताकि लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें।

लेखक के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर भावनात्मक पोस्ट लिख दुख जताया। पीएम ने लिखा, “श्री एसएल भैरप्पा जी के जाने से हमने एक महान व्यक्तित्व को खो दिया है, जिन्होंने हमारे अंतर्मन को जगाया और भारत की आत्मा को गहराई से छुआ।”

पीएम मोदी ने आगे लिखा, “वे निडर और समय से परे सोचने वाले लेखक थे, जिन्होंने अपनी उत्तेजक रचनाओं से कन्नड़ साहित्य को समृद्ध किया। उनकी लेखनी ने पीढ़ियों को सोचने, सवाल करने और समाज से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।”

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि एसएल भैरप्पा को भारत के इतिहास और संस्कृति में गहरी रुचि थी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने आगे लिखा, “इस दुख की घड़ी में मेरा दिल उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ है। ओम् शांति।”

प्रारंभिक जीवन और करियर

एसएल भैरप्पा का जन्म सन्तेशिवरा लिंगन्नैया भैरप्पा के रूप में हासन जिले के चन्नरायपटना तालुक में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन हासन और मैसूर में बिताया। वे भारत के कई हिस्सों जैसे गुजरात और नई दिल्ली में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे। उन्होंने NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) में भी काम किया और मैसूर के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (RIE) से प्रोफेसर पद से रिटायर हुए।

हालाँकि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में खूब मेहनत की लेकिन उनका असली जुनून उपन्यास लिखना था। उनका साहित्यिक सफर 1958 में ‘भीमकाय’ नाम की उपन्यास से शुरू हुआ, जब वे 27 साल के थे। उनकी किताबों की लोकप्रियता ऐसी है कि उनका पहला उपन्यास आज भी छपता और बिकता है।

अगले साठ वर्षों में उन्होंने कुल 25 उपन्यास लिखे। उनका आखिरी उपन्यास ‘उत्तरकांड’ (2017) था, जो रामायण की कहानी को महिलाओं के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इसके बाद उन्होंने लेखन से संन्यास ले लिया।

भैरप्पा कन्नड़ के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार थे। उनकी किताबें कई बार छप चुकी हैं और शुरुआती रचनाएँ भी लगातार पुनः प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं रही। उनके सभी उपन्यास कई भारतीय भाषाओं, अंग्रेजी और यूरोपियन भाषाओं में भी अनुवाद किए गए हैं।

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में वंशवृक्ष (1965), गृहभंग (1970) और पर्व (1979), जो कि महाभारत की पुनर्कथा है, शामिल हैं। उन्हें मंद्र (2001) उपन्यास के लिए 2010 में सरस्वती सम्मान मिला और 2023 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

आवरण: उनकी उत्कृष्ट कृतियों में से एक

एसएल भैरप्पा का सबसे विवादित उपन्यासों में से एक था आवरण (2007)। उन्होंने इसे कई सालों की गहरी रिसर्च के बाद लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत के मध्यकालीन इतिहास, खासकर मुगल काल को जिस तरह स्कूल की किताबों और सार्वजनिक चर्चाओं में दिखाया गया है, उस पर सवाल उठाए।

भैरप्पा का मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कई कड़वे सचों को दबा दिया गया या लोगों पर थोप दिया गया। इस उपन्यास में उन्होंने इतिहास की बहसों को आज के मुद्दों से जोड़ा- जैसे कि धर्मों के बीच शादी, धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान से जुड़ी चिंताएँ।

हालाँकि कुछ आलोचकों ने एसएल भैरप्पा पर यह आरोप लगाया कि उनका उपन्यास ‘आवरण’ मुस्लिम विरोधी और राजनीतिक सोच से प्रेरित है। लेकिन उनके प्रशंसकों ने इस किताब को एक साहसी कोशिश माना, ऐसी कोशिश जो इतिहास के छिपाए गए पहलुओं को सामने लाती है।

विवादों के बावजूद ‘आवरण’ बहुत लोकप्रिय हुआ, बेस्टसेलर बना और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। यह उपन्यास वर्तमान के भारतीय साहित्य में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली रचनाओं में से एक है।

पर्व: महाभारत की एक अलग तस्वीर

भैरप्पा की सबसे चर्चित रचनाओं में से एक पर्व (1979) भी है, जिसे उनकी उत्कृष्ट कृति माना जाता है। इस उपन्यास में उन्होंने महाभारत की कहानी को एक धार्मिक या चमत्कारी कथा की तरह नहीं बल्कि एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से पेश किया है। इसमें इंसानों के बीच का संघर्ष, मनोवैज्ञानिक उलझनें और सामाजिक हालात को केंद्र में रखा गया है।

इस किताब में भगवानों और चमत्कारों को हटा दिया गया है। इसके पात्र जैसे भीष्म, द्रौपदी, कर्ण और कृष्ण को एक आम इंसान की तरह दिखाया गया है, जो महत्वाकांक्षा, पीड़ा, निजी दुख और नैतिक दुविधाओं से जूझते हैं। इस तरह ‘पर्व’ महाभारत को एक ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट श्रीति सागर ने लिखी है। विस्तार से इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

पूर्ण राज्य की डिमांड पर सुलगा लद्दाख, हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस का बताया जा रहा हाथ: सोनम वांगचुक की ‘भूख हड़ताल’ कैसे आगजनी-पथराव तक पहुँची?

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेह में बुधवार (24 सितंबर 2025) को बंद के दौरान हिंसा भड़क उठी। यह जल्द ही झड़प, आगजनी और अराजकता में बदल गई। इस बंद का आह्वान लेह एपेक्स बॉडी की ओर से किया गया था।

हिंसा के बाद विवादित एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपना भूख हड़ताल खत्म कर दिया है। हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस नेताओं का हाथ होने की बात कही जा रही है। बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा है कि लद्दाख के विरोध प्रदर्शन के पीछे जेन-जी का हाथ होने का दिखावा किया जा रहा है। हिंसा भड़काने के पीछे कॉन्ग्रेस है।

उन्होंने कहा कि अपर लेह से कॉन्ग्रेस काउंसलर स्टैनजिंग त्सेपांग मुख्य साजिशकर्ता हैं। कई तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें कॉन्ग्रेस काउंसलर और उनके समर्थक हिंसा भड़काते दिख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हिंसा के दौरान बीजेपी के स्थानीय कार्यालय और पुलिस वैन को फूँक दिया गया। सुरक्षा बलों के साथ प्रदर्शनकारियों की हिंसक झड़प हुई।

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने जैसी माँगों के समर्थन में सोनम वांगचुक की अगुवाई में सितंबर की शुरुआत से आंदोलन चल रहा था। लेकिन हिंसा के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 163 लागू करनी पड़ी है। इसके तहत चार से अधिक लोगों के इकट्ठा होने, रैलियाँ निकालने और लाउडस्पीकरों के अनाधिकृत इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

हिंसा कैसे शुरू हुई

मीडिया रिपोर्टों में प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया जा रहा है कि 23 सितंबर की शाम से ही माहौल तनावपूर्ण था। भूख हड़ताल पर बैठे दो बुज़ुर्गों को हालत बिगड़ने के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा था। उनकी हालत बिगड़ने के बाद छात्रों और युवा कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए। इनमें से कई बातचीत में देरी को लेकर पहले से ही असंतुष्ट थे।

24 सितंबर की सुबह भूख हड़ताल वाली जगह के पास भीड़ जमा होने लगी। बाद में यही भीड़ लेह के बीजेपी कार्यालय की ओर बढ़ी। इन्हें नियंत्रित रखने के लिए बैरिकेड्स लगाए गए थे। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। लेकिन जैसी ही प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की गई, पथराव शुरू हो गया। हिंसा को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

लेकिन हालात तेजी से बेकाबू होते गए। पुलिस वैन में आग लगा दी गई। बीजेपी कार्यालय पर हमला कर उसे आग के हवाले कर दिया गया। प्रदर्शनकारी सोनम वांगचुक के समर्थन में नारे लगा रहे थे। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार झड़पों में दर्जनों लोग घायल हुए हैं। तीन से 5 लोगों की मौत का भी दावा किया जा रहा है, जिसकी खबर लिखे जाने तक पुष्टि नहीं हुई थी।

वांगचुक ने भूख हड़ताल कर शांति की अपील की

हिंसा के बाद सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल खत्म कर दी है। एक बयान में हिंसा पर अफसोस जताते हुए कहा है कि इससे उद्देश्य को नुकसान पहुँचता है। लेकिन लगे हाथ उन्होंने इसे ‘जेन-जी क्रांति’ और युवाओं की ‘हताशा की उपज’ बताते हुए अपनी नाकामी को छिपाने की भी कोशिश की है। गौरतलब है कि वांगचुक पिछले 5 साल से लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और बातचीत का आह्वान

हिंसा के बाद, भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस काउंसलर पर हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाते हुए X पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने पूछा है कि क्या राहुल गाँधी इसी तरह के उपद्रव की कल्पना कर रहे हैं?

लेकिन सोनम वांगचुक ने कॉन्ग्रेस को क्लीनचिट देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि लद्दाख में कॉन्ग्रेस का इतना प्रभाव नहीं है कि वह 5000 युवाओं को सड़कों पर उतार सके। साथ ही दावा किया है कि कॉन्ग्रेस काउंसलर इसलिए गुस्से में अस्पताल पहुँचे थे, क्योंकि उनके गाँव के दो लोगों को घायल होने के बाद भर्ती कराया गया था।

वहीं विपक्षी दल के नेता इसके लिए बातचीत में केंद्र सरकार की ओर से देरी को जिम्मेदार बता रहे हैं। कारगिल डेमोक्रेटिक फ्रंट के सज्जाद कारगिली ने X पर लिखा है, “लेह में जो कुछ भी हो रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। लद्दाख सरकार के असफल प्रयोग के कारण निराशा और असुरक्षा की स्थिति में है। सरकार पर यह ज़िम्मेदारी है कि वह बातचीत फिर से शुरू करे, समझदारी से काम ले और लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की माँग बिना किसी देरी के पूरा करे।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने भी अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से लद्दाख के मामले में केंद्र सरकार के रवैए की आलोचना की है। शेख बशीर अहमद ने कहा है, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारा मानना है कि 5 अगस्त 2019 के फैसले को लेह या जम्मू-कश्मीर के लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया। वे तब से स्वायत्तता और विधायी अधिकारों की माँग कर रहे हैं। केंद्र की उदासीनता के कारण ही लोगों में गुस्सा फूट पड़ा है।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के ही नेता तनवीर सादिक ने कहा है, “यह बेहद दुख की बात है कि हर चीज को गलत तरीके से सँभाला जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में जो हुआ, वह लद्दाख में भी हो रहा है। हम हिंसा की निंदा करते हैं, लेकिन केंद्र सरकार से सार्थक बातचीत के लिए अपने दरवाजे खोलने का आह्वान करते हैं।”

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की माँग

अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 को समाप्त कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था। एक विधानसभा वाला जम्मू कश्मीर, दूसरा बिना विधायिका के लद्दाख। शुरुआत में मोटे तौर पर लेह लद्दाख के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया। लेकिन सोनम वांगचुक जैसे विवादित एक्टिविस्ट विधायी शक्ति को लेकर मुखर रहे हैं।

गौरतलब है कि लद्दाख की 90% से ज्यादा आबादी अनुसूचित जनजाति है। इस आधार पर इसे छठी अनुसूची में शामिल किए जाने का स्वाभाविक दावेदार बताया जाता है। आशंका जताई जा रही है कि इस दर्जे के बगैर स्थानीय लोगों की जमीन, नौकरी और सांस्कृति पहचान पर खतरा पैदा हो सकता है।

धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का गठबंधन लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) इस आंदोलन में सबसे आगे रहे हैं। 2020 से वे कई बार विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। केंद्र के कई दौर की बातचीत कर चुके हैं। इसी साल 27 मई को हुई बैठक में लद्दाख के लिए एक अधिवास नीति प्रस्तावित की गई थी। लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने को लेकर सहमति नहीं बन पाई है।

केंद्रीय मंत्रालय ने 20 सितंबर को लद्दाखी प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी। 6 अक्टूबर को नई दिल्ली में बातचीत निर्धारित है। माँगों पर विचार के लिए 2 जनवरी 2023 को एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) का भी गठन किया गया था। लेकिन लद्दाखी प्रतिनिधियों का दावा किया है कि प्रगति धीमी और असंतोषजनक रही है।

केंद्र के साथ बातचीत की सार्थकता को लेकर सोनम वांगचुक शुरुआत से संदेह जताते रहे हैं। केंद्र पर टालमटोल का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि भारत के लोगों का ध्यान लद्दाख की ओर आकर्षित करने के लिए लगातार विरोध प्रदर्शनों और भूख हड़ताल करते रहे हैं। पर 24 सितंबर को भड़की हिंसा के बाद अक्टूबर की प्रस्तावित बातचीत पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

केडीए ने 25 सितंबर को बंद का आह्वान किया है। अगले महीने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (एलएएचडीसी) के चुनाव भी होने हैं।

राहुल गाँधी जी, आपने सही कहा कि बिहार को योजना बनाकर उपेक्षित किया गया, लेकिन आपने नहीं बताया कि यह योजना कॉन्ग्रेस और नेहरू की थी

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा है कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से उपेक्षित किया गया है। यह बात उन्होंने कॉन्ग्रेस की कार्य समिति की बैठक में कही हैं जो 85 वर्षों बाद पटना में हो रही है। राहुल गाँधी ने शायद सही ही कहा है लेकिन इसके जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरू और उनकी पार्टी ही हैं, यह बात उन्होंने छिपा ली।

कॉन्ग्रेस के दशकों के शासन में ‘योजनाबद्ध’ तरीके से बिहार की बर्बादी की पटकथा लिखी गई। नेहरू के काल में शुरु हुआ ‘रेल भाड़ा सामान्यीकरण कानून‘ इस योजना में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ।

1952 में शुरू हुई इस नीति में आर्थिक विकास सुगम बनाने के लिए लंबी दूरी के माल परिवहन को सब्सिडी दी गई। अब इससे आर्थिक विकास बिहार जैसे राज्यों से दूर होता चला गया। यह नीति कपास जैसे कच्चे माल पर लागू नहीं हुई।

बिहार और झारखंड में मिलने वाले खनिज उपयोगी कच्चे माल थे लेकिन जब केंद्र ने भाड़ा पर सब्सिडी दी, तो उद्योगपतियों को यह सुविधा होती कि वे इन कच्चे मालों को बिहार से दूसरे राज्यों में सस्ते दाम पर भेज लें और वहाँ उद्योग स्थापित करें। इस तरह बिहार में उद्योग विकसित होने के अवसर हाशिए पर चले गए।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया के अजीत झा से बातचीत में इसे लेकर कहा था, “यदि यह कानून अंग्रेजों के जमाने में होता तो टाटा नगर न होता। फिर टाटा बंबई जैसे शहरों में अपना उद्योग खड़ा करते। केंद्र सरकार की इस बेईमानी की वजह से बिहार को कम से कम 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।”

उन्होंने इसके लेकर हुए पलायन को लेकर आगे कहा, “उद्योगों का राज्य में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। न खेती का पंजाब की तरह विकास हुआ। आबादी बढ़ती गई। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे थे। ऐसे में पलायन होना ही था।”

कॉन्ग्रेस शासन के लंबे दौर में यह असमानता और गहरी होती गई जिसके बाद बिहार से लाखों लोग रोजगार की तलाश में पंजाब, दिल्ली और मुंबई जाने पर मजबूर हो गए। राहुल जी, अगर शुरुआती दौर में ही बिहार को उद्योग दिए गए होते, ‘योजनाबद्ध’ तरीके से विकास के काम किए जाते तो आज यह राज्य पिछड़ेपन की पहचान नहीं बनता।

कॉन्ग्रेस ने अपने दौर में तो बिहार को हाशिये पर रखा ही लालू यादव के दौर में भी जब अपराध, जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार चरम पर था, तब भी कॉन्ग्रेस ने सत्ता की राजनीति के लिए लालू का साथ दिया। कॉन्ग्रेस ने सत्ता में हिस्सेदारी के लालच में बिहार की जनता को अपराध और अराजकता के हवाले कर दिया।

लालू के जंगलराज पर कॉन्ग्रेस की ‘मौन’ सहमति ‘चीख-चीखकर’ कहती है कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद किया गया था। अपने शासनकाल में ना कॉन्ग्रेस को बिहार में उद्योग की याद आई, ना रोजगार की।

बिहार में कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों ने रोजगार और उद्योग तो कभी नहीं दिए लेकिन अब जब उद्योग लगाने की कोशिश भी की जा रही है तो कॉन्ग्रेस का पूरा इकोसिस्टम इसके खिलाफ है। इसका हालिया उदाहरण गौतम अड़ानी को बिहार में 1 रुपए प्रति एकड़ की लीज पर जमीन दिए जाने के खिलाफ कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम के प्रदर्शन हैं।

यही काम कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में होता है, उनके चुने हुए मुख्यमंत्री करते हैं तब यह राज्य के विकास की पहल होती है लेकिन अब यह कॉन्ग्रेस को उद्योगपति के ही हित की बात नजर आ रही है। तो राहुल जी, जब आप यह कहें कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद किया गया तो यह भी आगे से साथ-साथ ही स्पष्ट कर दें कि यह सब आपकी पार्टी और सहयोगियों का ही किया धरा है।

फुलवारी शरीफ से किशनगंज तक भारत को 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने की वही साजिश, जानिए ‘दरभंगा मॉड्यूल’ वाली जमीन पर कैसे गहरा रहा कट्टरपंथ का खतरा

बिहार में भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने की गहरी साजिशें रची गई है। सीमांचल से लेकर मिथिलांचल तक इसकी जद में हैं। दरभंगा मॉड्यूल, फुलवारी शरीफ मॉड्यूल से लेकर इंडियन मुजाहिदीन तक अपने स्लीपर सेल विकसित कर चुका है।

बिहार के सीमांचल के इलाके किशनगंज से प्रतिबंधित इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन पीएफआई का पूर्व अध्यक्ष महबूब आलम नदवी उर्फ महबूब आलम को गिरफ्तार किया गया है। एनआईए उसे 3 साल बाद गिरफ्तार कर पाई है। उसका सपना 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने का है।

11 सितंबर को किशनगंज से गिरफ्तारी के बाद उससे पूछताछ में कई खुलासे हुए हैं। उसका कनेक्शन फुलवारी शरीफ 2022 आपराधिक मामले से जुड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान इनलोगों ने गड़बड़ी की साजिश रची थी। इस मामले में चार्जशीट दाखिल की गई था। इस आधार पर उसे पकड़ा गया है। वह इस मामले का 19वाँ आरोपित है।

कौन है महबूब आलम

पीएफआई का पूर्व अध्यक्ष महबूब आलम नदवी कटिहार जिले के हसनगंज का रहने वाला है। पीएफआई पर प्रतिबंध लगने के बाद सीमांचल क्षेत्र में पिछले कई सालों से चोरी छिपे रह रहा था। वह किशनगंज के फातिमा गर्ल्स स्कूल में पिछले 6 महीने से पढ़ा रहा था। उसकी स्कूल में नियुक्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उसके पास न तो जरूरी दस्तावेज थे और न ही उसने अपनी पहचान बताई थी। सिर्फ डेमो क्लास लेकर उसे नियुक्त कर दिया गया था।

पीएफआई को मजबूत करने और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए वह मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर युवाओं से मदद माँग रहा था। इसके लिए वह पूर्णिया, कटिहार, अररिया जैसे सीमांचल जिलों का कई बार दौरा कर चुका है। वह मुस्लिम युवकों को गुमराह करने के लिए किताबें बाँटता था। किशनगंज में गिरफ्तारी के बाद एनआईए की टीम ने लगातार उससे 3 दिन तक पूछताछ की।

एनआईए के मुताबिक, महबूब आलम का फुलवारी शरीफ टेरर मॉड्यूल से लेकर दरभंगा मॉड्यूल तक में अहम रोल था। उसने पीएफआई से लोगों को जोड़ा था और हथियारों का प्रशिक्षण भी दे रहा था। इस्लामी कट्टरपंथी संगठन के नेटवर्क को फैलाने के लिए वह गुप्त बैठकें आयोजित करता था। संगठन के लिए फंड जुटाता था और उसे कार्यकर्ताओं तक पहुँचाता था।

ऐसा नहीं है कि आतंकवाद को बढ़ाने के लिए इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाल के दिनों में अपनी सक्रियता बिहार में बढ़ाई हो, इसकी शुरुआत तो यासीन भटकल ने इंडियन मुजाहिदीन की स्थापना कर और दरभंगा मॉड्यूल विकसित कर बहुत पहले कर चुका था।

फुलवारी शरीफ मॉड्यूल का खुलासा

पीएम मोदी के दौरे से पहले 11 जुलाई 2022 को एनआईए ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था। ये लोग पटना के फुलवारी शरीफ में दौरे से पहले आपराधिक साजिश को अंजाम देने में लगे थे। एनआईए ने 26 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था। ये सभी पीएफआई के सदस्य थे। इनलोगों ने प्रधानमंत्री के बिहार के दौरे के दौरान गड़बड़ी करने की साजिश रची थी। दौरे से कुछ दिनों पहले 11 जुलाई को एनआईए को इसका पता चल गया था। पीएफआई ने 11 आतंकियों को इसके लिए फुलवारी शरीफ भेजा था।

NIA ने बिहार में पटना से लेकर मधुबनी तक छापेमारी कर दूसरे सबूत भी जुटाए। आतंकियों की मदद के लिए इस्तेमाल हो रहा डिजिटल उपकरण मिला था। इस दौरान आतंकी ठिकानों पर आपत्तिजनक किताबें, डायरी भी मिली थी। इससे खुलासा हुआ कि 2023 से इनलोगों ने अपना टारगेट तय किया था कि ये 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क मनाना चाहते हैं।

पुलिस ने पटना में छापेमारी कर पीएफआई और एसडीपीआई यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया की आड़ में मार्शल आर्ट सिखाने के बहाने हथियार चलाने वाले ट्रेनिंग कैंप का खुलासा किया था। इसमें दूसरे राज्यों के लोगों को भी बुलाकर ट्रेनिंग दी जा रही थी। पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार भी किया था।

भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना पीएफआई का मकसद

फुलवारी शरीफ मामले की जाँच के दौरान एनआईए को चौकाने वाला दस्तावेज मिला। इस पर लिखा था ‘India 2047:Towards Rule of Islam in India” इसमें भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ाकर कैसे 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना है, इसकी चर्चा की गई थी। इसमें आतंकी गतिविधि को बढ़ाना, युवाओं को शामिल करना और पीएफआई के नेटवर्क को बढ़ाने का पूरा तरीका लिखा गया था।

आतंकियों का ‘गजवा ए हिंद’ का मंसूबा बिहार में 2010 में ही शुरू हो गया था, जब मिथिलांचल में आतंकी यासीन भटकल ने मुस्लिम युवाओं के दिमाग में आतंकवाद का जहर घोला। भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने, शरिया कानून लागू करने, गैर मुस्लिमों को खत्म करने और ‘जजिया कर’ लागू करने जैसे पाठ पढ़ाया। अगर कोई इस्लाम कबूल नहीं करेगा, तो उसे मार देने की ट्रेनिंग दी।

दरभंगा मॉड्यूल बनाया था इंडियन मुजाहिदीन संस्थापक ने

दरभंगा में इंडियन मुजाहिदीन का संस्थापक यासीन भटकल रहता था। उसने इंडियन मुजाहिदीन की शुरुआत भी यहीं से की थी। आतंकियों को पैदा करने वाले यासीन भटकल ने नुरुद्दीन जंगी, सनाउल्लाह को भी ट्रेनिंग दी थी, जो फुलवारी शरीफ में आतंकी घटना को अंजाम देने के मंसूबे पाले एक्टिव था। हॉमियोपेथी डॉक्टर यासीन ने बहुत होशियारी से संगठन को दरभंगा में फैलाया। अपनी मीठी दवाइयों के साथ ‘इस्लामी कट्टरपंथ का जहर’ वह लोगों को बाँट रहा था।

उसने दरभंगा, समस्तीपुर जैसे कई इलाकों में इंडियन मुजाहिदीन से युवाओं को जोड़ा। जब देश के कई हिस्सों मसलन बंगलुरु, चेन्नई, वाराणसी में विस्फोट हुए, तो उसके तार दरभंगा से जुड़े। उस वक्त दरभंगा मॉड्यूल सुर्खियों में आया। एनआईए ने यासीन भटकल को नेपाल भागते हुए बॉर्डर से गिरफ्तार किया था।

स्लीपर सेल दरभंगा मॉड्यूल का अहम हिस्सा

आतंकी यासीन भटकल ने दरभंगा और मिथिलांचल के दूसरे क्षेत्रों को आतंकियों का पनाहगार बना दिया। उसने लोगों को स्लीपर सेल के रूप में काम करने की ट्रेनिंग दी। एनआईए ने स्लीपर सेल के रूप में काम करने वाले आतंकियों को जब पकड़ा, तब इसका खुलासा हुआ। आतंकवाद को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए भटकल ने स्लीपर सेल विकसित किया था। इसमें समस्तीपुर का रहने वाला तहसीन अख्तर भी शामिल था, जिसने यासीन के बाद इंडियन मुजाहिदीन की जिम्मेदारी संभाली थी।

पीएफआई पर प्रतिबंध के बाद छिप कर हो रही साजिश

2022 में पीएफआई पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक इस संगठन से जुड़े कई आतंकियों को इसके बाद गिरफ्तार किया गया। प्रतिबंध की वजह से पूर्व पीएफआई अध्यक्ष महबूब आलम पिछले 3 सालों से चोरी-छिपे संगठन को मजबूत करने में लगा हुआ था। महबूब आलम की गिरफ्तारी से पीएफआई की फंडिंग, हथियार और सदस्यों की अहम जानकारी एनआईए को लगेगी।

माना जा रहा है कि आगामी बिहार चुनाव में इस्लामी कट्टरपंथी गड़बड़ी कर सकते हैं। इसलिए तमाम एजेंसियाँ बिहार में खास तौर पर एक्टिव हैं।

इंडियन एक्सप्रेस मेहरबान, उमर खालिद का अब्बू बन गया UAPA का ‘इमाम’: बेटे की पैरवी में फैलाया प्रोपेगेंडा, कबूला बेंच सेटिंग में लगे थे कपिल सिब्बल फिर भी खेल रहा ‘विक्टिम कार्ड’

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे कई हाई-प्रोफाइल आरोपितों के नाम सामने आए हैं। यह मामला पिछले कुछ सालों में सबसे चर्चित मामलों में से एक बन चुका है। इसमें हर वह चीज है जो किसी विवादास्पद केस को सुर्खियों में लाती है, जैसे कि चर्चित आरोपित, जाने-माने वकीलों की दलीलें, न्यायपालिका में पक्षपात के आरोप और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना।

भारत में मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, खासकर 2020 के बाद से, लगातार ऐसी कहानियाँ परोसता आ रहा है जो आरोपितों को निर्दोष साबित करने का प्रयास करती हैं। ऐसा लगता है जैसे मीडिया खुद न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा हो।

हाल ही में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एस क्यू आर इलियास (सैयद कासिम रसूल इलियास\SQR Ilyas) का एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था, “भारत को यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून) के खिलाफ जन आंदोलन की जरूरत है।” इस लेख में इलियास ने यह धारणा दी कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच बार-बार बदली जाती है, आरोपित बेल पर ही अपनी बेगुनाही साबित कर देते हैं और देरी के लिए हमेशा राज्य (सरकार) को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

इस तरह के तर्क देने वाले व्यक्ति की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। इलियास एक समय पर प्रतिबंधित इस्लामी आतंकवादी संगठन सिमी (SIMI) का सदस्य रह चुका है।

उसने 1985 में SIMI छोड़ दिया था। 2019 में उसने पश्चिम बंगाल में वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के टिकट पर मुर्शिदाबाद जिले की मुस्लिम बहुल जंगीपुर सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था । पूर्व SIMI सदस्य अब जमात-ए-इस्लामी हिंद और AIMPLB की केंद्रीय सलाहकार परिषद का सदस्य है।

2016 में जब उमर खालिद को देशद्रोही भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब इलियास ने सवाल उठाया था कि क्या उसके बेटे को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह खुद कभी SIMI से जुड़ा था। उसने कहा था, “मैंने SIMI को 1985 में छोड़ दिया था, जब मेरा बेटा उमर खालिद पैदा भी नहीं हुआ था। उस समय SIMI या उसके किसी सदस्य पर कोई केस नहीं था।”

यह बात ध्यान देने वाली है कि इलियास खुद को और अपने बेटे को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन यह तर्क कमजोर है। कोई भी संगठन एक दिन में आतंकवादी नहीं बनता। SIMI की बुनियाद ही एक कट्टर विचारधारा पर रखी गई थी। सिर्फ इसलिए कि 2001 से पहले उस पर कानूनी प्रतिबंध नहीं लगा था, इसका यह मतलब नहीं कि वह तब तक निर्दोष या समाजसेवी संगठन था।

दूसरी बात, 2012 में जब SIMI पर प्रतिबंध लगे 11 साल हो चुके थे, तब एस क्यू आर इलियास ने इस प्रतिबंध को हटाने की जोरदार माँग की थी। उसने एक कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें साफ तौर पर कहा कि सरकार ने SIMI पर बैन लगाकर नाइंसाफी की है। इससे साफ होता है कि इलियास अब भी मानता है कि SIMI कोई आतंकवादी संगठन नहीं था और उसकी गतिविधियाँ जायज थी।

अब जब हमें पता चल चुका है कि एस क्यू आर इलियास कौन है और किस तरह वो खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करता है, तो ये समझना जरूरी हो जाता है कि वे अपने बेटे उमर खालिद को भी कैसे बचाने की कोशिश कर रहा है। उमर खालिद वही शख्स हैं जिसे दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों की साजिश रचने वालों में एक अहम साजिशकर्ता माना गया है।

“ऊपरी तौर पर इलियास का इंडियन एक्सप्रेस में लिखा गया लेख आजादी की माँग जैसा लगता है। लेकिन जरा गहराई से देखें, तो वह एक राजनीतिक प्रचार की तरह सामने आता है, जिसमें तथ्य तोड़े-मरोड़े गए हैं, कानून की गलत व्याख्या की गई है और उसके बेटे के मामले से जुड़ी असुविधाजनक सच्चाइयों को छिपा लिया गया है।”

अगर भारत में यूएपीए कानून पर बहस होनी है, तो वो ईमानदारी से होनी चाहिए। लेकिन इलियास का लेख सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और अंत में एक तरह का प्रोपेगेंडा बन जाता है।

उसका मुख्य दुख ये है कि उमर खालिद और उसके अन्य साथी जैसे शरजील इमाम (जिसने कभी यह कहा था कि पूर्वोत्तर भारत को देश से काट देना चाहिए क्योंकि उस ‘चिकन नेक’ इलाके में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं) को जमानत नहीं मिल रही है और इसका कारण वे तथाकथित देरी को बताता है।

लेकिन यह बात छुपा ली गई है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सह-आरोपित तस्लीम अहमद की जमानत के आदेश में साफ कहा था कि इस मामले में जो देरी हो रही है, उसका बड़ा कारण खुद आरोपित है। कोर्ट ने दर्ज किया कि किस तरह से बार-बार सुनवाई को टाला गया और ये टालमटोल कई बार उन्हीं लोगों ने किया जो पहले से जमानत पर बाहर थे। इसका मकसद एक कृत्रिम देरी पैदा करना था ताकि बाकी आरोपित भी इसी आधार पर जमानत की माँग कर सकें।

इसका मतलब ये है कि देरी कोई सिस्टम की गलती नहीं थी, बल्कि बचाव पक्ष की एक रणनीति थी। और अब उसी देरी को ‘न्याय नहीं मिला’ कहकर पेश करना कोर्ट की बातों को अनदेखा करना और जनता को गुमराह करना है। दरअसल इस लेख में इलियास खुद मानता है कि देरी की वजह उसके बेटे और उसके वकील कपिल सिब्बल की चालबाजियाँ थी।

उसने लिखा है, “सामान्य तौर पर अगर सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई टल जाती है, तो अगली बार वह किसी नए बेंच के सामने आती है। लेकिन खालिद के मामले में ऐसा नहीं हुआ। उसका केस लगातार छह बार एक ही जज के सामने सुना गया। ये देखकर उसके वकीलों ने आखिरकार याचिका वापस ले ली और तय किया कि अब निचली अदालत में किस्मत आजमाएँगे। चूँकि सुप्रीम कोर्ट में बेंच का आवंटन मुख्य जज द्वारा तय किया जाता है, इसलिए एक ही जज के सामने केस बार-बार आना संयोग नहीं कहा जा सकता। अब जब हाई कोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी है, तो एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना ही एकमात्र विकल्प बचा है।”

दरअसल इलियास ने वही बात मानी जो ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी और तत्कालीन मुख्य जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी इसकी पुष्टि की थी। उमर खालिद की जमानत याचिका में जितनी देरी हुई, उसका एक बड़ा हिस्सा खुद उसकी ओर से लिया गया था। कुल 14 बार सुनवाई टली, जिसमें से 7 बार खुद उमर खालिद और उसके वकील कपिल सिब्बल ने समय माँगा। ऑपइंडिया की रिपोर्ट और तत्कालीन मुख्य जज (CJI) जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पुष्टि के अनुसार, उमर खालिद की टीम यह नहीं चाहती थी कि यह मामला जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच में सुना जाए। इसलिए बार-बार तारीख टलवाने की कोशिश की गई। इसे ‘बेंच फिक्सिंग’ या ‘फोरम शॉपिंग’ कहा जाता है, यानी अपनी पसंद के जज के सामने केस लाने की कोशिश।

खालिद की टीम ने यहाँ तक कोशिश की कि खुद CJI इस केस की सुनवाई करें। लेकिन जब CJI ने इस कोशिश को नकार दिया और फोरम शॉपिंग पर नाराजगी जताई, तब कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ले ली।

आज जब कुछ लोग इस देरी के लिए सिस्टम को दोष देते हैं, या कोर्ट पर सवाल उठाते हैं, तो यह जरूरी है कि पूरी तस्वीर सामने रखी जाए। देरी का बड़ा कारण खुद उमर खालिद की ओर से लिया गया समय और कोर्ट की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिशें थीं न कि केवल न्यायपालिका की सुस्ती।

कॉलम में यह कहा गया है कि ‘जमानत हर आरोपित का स्वाभाविक अधिकार’ है। यह बात भावनात्मक रूप से जरूर प्रभावशाली लगती है, लेकिन कानून के अनुसार यह सही नहीं है।

1977 में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने कहा था “जमानत नियम है, जेल अपवाद”। लेकिन यह एक सामान्य सिद्धांत है, कोई हर मामले में लागू होने वाला अधिकार नहीं। कुछ खास कानून जैसे कि यूएपीए, NDPS (नारकोटिक्स कानून) और PMLA (धन शोधन कानून) में जमानत पाना मुश्किल इसलिए किया गया है क्योंकि ये असाधारण और गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, जैसे आतंकवाद, नशीली दवाओं की तस्करी, और आतंक के लिए फंडिंग।

2021 में सुप्रीम कोर्ट ने के ए नजीब केस में कहा था कि अगर ट्रायल बहुत लंबा खिंचता है और इसमें आरोपित की कोई गलती नहीं है, तो कोर्ट जमानत दे सकती है। लेकिन अगर देर खुद बचाव पक्ष (defence) की वजह से हो रही हो, जैसा कि तसलीम अहमद केस में हुआ, तो यह नियम लागू नहीं होता।

यह कहना कि यूएपीए में आरोपित को अपनी ‘बेगुनाही साबित करनी होती है’, पूरी तरह गलत है। यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत अगर अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) का केस पहली नजर में सही दिखता है, तो जमानत नहीं दी जाती।

NIA बनाम वाटाली (2019) केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत के दौरान कोर्ट सिर्फ यह देखती है कि अभियोजन का दिया गया सबूत आरोप को समर्थन देता है या नहीं कोर्ट सबूतों की गहराई से जाँच नहीं करती, न ही आरोपित से कोई सबूत माँगती है। यानी बेगुनाही साबित करना आरोपित का काम नहीं होता।

यूएपीए किसी छोटे-मोटे अपराध के लिए नहीं है। यह कानून आतंकवाद, देश-विरोधी संगठनों और देश की संप्रभुता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों से निपटने के लिए बना है। इन मामलों में लंबी चार्जशीट, हजारों पन्नों की फाइलें और कई दस्तावेज होते हैं, क्योंकि जाँच में डिजिटल डेटा, फाइनेंशियल ट्रेल्स, कई आरोपितों की भूमिका जैसी चीजें आती हैं। इस तरह की चार्जशीट को ‘कागजी सजा’ कहना सच्चाई को नजरअंदाज करना है।

अगर जाँच के दौरान कोई नया सबूत मिलता है, तो कानून के मुताबिक उसे कोर्ट में पेश करना जरूरी होता है। इसे ‘परेशान करने का तरीका’ बताना न्याय प्रक्रिया का अपमान है। क्या हम सिर्फ इसलिए सबूत न दिखाएँ कि आरोपित गरीब या किसी खास धर्म से है?

इलियास के कॉलम में यह दावा किया गया कि TADA और POTA जैसे कानून ‘जन आंदोलनों’ से खत्म हुए लेकिन ये भी सच नहीं है। TADA संसद द्वारा समय पर न बढ़ाए जाने से खत्म हुआ और POTA को अगली सरकार ने राजनीतिक फैसले के तहत हटाया। कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं हुआ था। इतिहास को इस तरह बदलकर पेश करना गलत जानकारी फैलाना है।

कॉलम में लेखक (इलियास) बार-बार यह दावा करता है कि उसके बेटे को सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से फँसाया गया है। वह खुद के SIMI से जुड़े होने को नजरअंदाज करता है। लेकिन SIMI को उसके कट्टर और देश-विरोधी विचारों की वजह से बैन किया गया था। इस इतिहास को मिटाकर खुद को पीड़ित बताना राजनीतिक एजेंडा है, सच्चाई नहीं।

दिल्ली दंगों से जुड़ी चार्जशीट में षड्यंत्र, उकसाने, आतंकवादी गतिविधियों की योजना, झूठे दस्तावेज और संगठित हिंसा के साफ सबूत हैं। इन्हें सिर्फ पुलिस की ‘कल्पना’ कहना गलत और एकतरफा है। अगर आपके ऊपर इतने गंभीर आरोप हैं, तो उसकी जाँच को ‘सिर्फ मुस्लिम नाम’ का मामला कहना अन्याय है न केवल कानून के लिए, बल्कि दंगों के पीड़ितों के लिए भी, खासकर तब, जब उसके अपने बेटे के खिलाफ आरोपों में बड़े पैमाने पर निर्दोष लोगों की हत्या की योजना बनाना और उसे उकसाना शामिल है।

यह बयानबाजी का जामा सबूतों से ध्यान हटाकर पहचान की ओर मोड़ देता है। लेकिन आरोप नामों के नहीं, बल्कि कार्रवाई के होते हैं। दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में कई आरोप-पत्र साजिश, उकसावे और आतंकवाद को दर्शाते हैं।

भारत आतंकवाद, माओवाद और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग से चलने वाले कट्टरपंथी नेटवर्क का सामना कर रहा है। 26/11, बाटला हाउस और कई सीरियल ब्लास्ट जैसे हमलों ने दिखा दिया है कि साधारण कानून इन खतरों से निपटने के लिए काफी नहीं हैं। यूएपीए को संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों के अनुसार अपडेट किया गया ताकि भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से प्रभावी तरीके से निपट सके।

इलियास का लेख किसी गंभीर और संतुलित बहस का हिस्सा नहीं है, बल्कि एकतरफा और भ्रामक प्रचार है। एक सच्ची बहस में नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बात होती है, पर इलियास इस संतुलन को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है। वो इसे सिर्फ एक नारे में बदल देता है, जो किसी भी तरह से विद्वतापूर्ण या ईमानदार विश्लेषण नहीं कहा जा सकता।

उसका लेख कई तरह की गलत जानकारी फैलाता है, जैसे वो कोर्ट की ऐसी प्रक्रिया का जिक्र करता है, जो असल में होती ही नहीं। वह जमानत से जुड़े कानून को गलत ढंग से पेश करता है।

UAPA कानून की सीमा और असर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, आरोपितों की ओर से की गई देरी को छुपा लेता है। ‘जन आंदोलनों’ का एक झूठा इतिहास गढ़ता है और फिर बार-बार SIMI  के पुराने मामलों और ‘मुस्लिम नाम’ ब्रांडिंग के थके हुए पीड़ित आख्यान पर वापस आ जाता है।

इस तरह की बातें न तो तथ्यात्मक होती हैं और न ही समाज के लिए फायदेमंद। ये सिर्फ लोगों को गुमराह करने के लिए लिखी जाती हैं।

UAPA को लेकर एक गंभीर बहस होनी चाहिए, इसके दुरुपयोग की संभावना, जमानत की प्रक्रिया और कानूनी सुरक्षा को लेकर। लेकिन यह बहस तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, भावनाओं और पीड़ितता की राजनीति पर नहीं।

यह लेख मूल रुप से अंग्रेजी में नूपुर जे शर्मा ने लिखा है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

‘बाबा’ बनकर दरबार चला रहे रियाजुद्दीन-सद्दाम: कोई ‘जिन्नत बाबा’ बन ‘माँ काली से बात करने का करता है दावा, कोई ‘समीर बाबा’ बन ताबीज मिलाकर पिला रहा पानी

उत्तर प्रदेश में नकली मुस्लिम पीर बाबाओं का जाल देखने को मिला है जहाँ सम्मान, प्रतिष्ठा, धन, व्यापार में वृद्धि या पुत्र प्राप्ति जैसी बातों का झांसा देकर भोले-भाले लोगों को ठगने के कई मामले सामने आए हैं।

ये फर्जी पीर बाबा ‘दरबार’ चला रहे हैं और हाथों में चुंबक चिपकाकर सिक्कों को नचाने जैसे तमाशे दिखाते हैं। ऐसा करके वे समस्याओं के समाधान के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठ रहे हैं।

एक पीर बाबा लौंग मिला पानी पिलाता है। उस पर हत्या के प्रयास का आरोप है। इसके बावजूद यह बाबा रोजाना 5 से 9 घंटे दरबार लगाकर 200 से 400 लोगों से 50,000 रुपये तक की कमाई कर रहा है। यानी हर महीने लगभग 14-15 लाख रुपये की मोटी कमाई। ये चौंकाने वाले खुलासे दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आए हैं।

महराजगंज: रियाजुद्दीन उर्फ जिन्नात बाबा ‘माँ काली से बात करने’ का करता है दावा

महराजगंज के पास बिरैची गाँव में रियाजुद्दीन उर्फ जिन्नात बाबा का मामला सामने आया है। पुलिस ने उसके बड़े से दरबार के निर्माण को रोक दिया है। रियाजुद्दीन के पिता ने बताया कि वह जेल में था और हाल ही में जमानत पर बाहर आया है। यह कार्रवाई स्थानीय भाजपा नेताओं और बजरंग दल की शिकायत के बाद हुई।

बताया गया कि जिन्नात बाबा का दरबार बिरैची गाँव से 10 किलोमीटर दूर कुशीनगर की सीमा से सटे छोटी गंडक नदी के किनारे घुघली बुजुर्ग श्मशान घाट के पास लगाया जा रहा था।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, उनके रिपोर्टरों ने मौके पर पहुँचकर देखा कि रियाजुद्दीन/जिन्नात बाबा की सभा में लगभग 400 लोग आए थे। हैरानी की बात यह थी कि रियाजुद्दीन कोई इस्लामी तंत्र-मंत्र नहीं कर रहा था, बल्कि हिंदू धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित कर रहा था।

उसका दरबार एक हिंदू देवी के मंदिर के पास था। वह लोगों पर डंडा घुमाकर झाड़-फूँक करता था और कभी-कभी माँ काली से बात करने का नाटक करता था। वह भोजपुरी गीत गाता, माँ काली से सवाल करता और फिर बदली हुई आवाज में जवाब देता।

रियाजुद्दीन कुछ लोगों को तीन बार दरबार में आने को कहता, तो कुछ को अलग इलाज सुझाता। उसके पास बैठा लड़का 51 रुपये की फीस वसूलता और लोगों द्वारा लाए गए अगरबत्ती, कपूर, लौंग और लोबान ले लेता।

दिलचस्प बात यह थी कि जब कोई व्यक्ति उसके अंदाजे पर किसी तरह का सवाल करता तो वह चिल्लाकर उसे चुप करा देता या फिर कहता कि पहले तीन बार दरबार में आओ फिर माँ काली बताएँगी कि समस्या कैसे हल होगी।

रियाजुद्दीन उर्फ जिन्नात बाबा (फोटो-दैनिक भास्कर)

जिन्नात बाबा के दरबार में गए रिपोर्टर्स से 51 रुपये की फीस ली गई। इसके अलावा, पास की दुकान से अगरबत्ती, कपूर, लौंग और लोबान मँगवाए गए। इसकी कीमत 70 रुपये थी। इन्हें जलाने की अनुमति नहीं दी गई। रियाजुद्दीन के साथ के लड़कों ने इन्हें रख लिया और बाद में दुकान पर लौटाकर पैसे वसूल लिए।

इस तरह, रियाजुद्दीन हर व्यक्ति से कुल 121 रुपये की कमाई कर रहा है। जिस दिन उन रिपोर्टर्स ने दरबार का दौरा किया, उस दिन उसने लगभग 400 लोगों के फॉर्म भरवाए और सिर्फ 5 घंटे में 48,400 रुपये कमा लिए। इस हिसाब से, वह हर महीने लोगों को ठग कर लगभग 14.52 लाख रुपये की कमाई कर रहा है।

कुशीनगर: भूत भगाने, बीमारियाँ ठीक करने और नौकरी दिलाने के नाम पर सद्दाम उर्फ समीर बाबा का ‘चमत्कारी’ इलाज

कुशीनगर जिले के कोहरगड्डी गाँव में ‘अजमेर वाले चमत्कारी बाबा समीर साहिब’ ने अपना दरबार जमा रखा है। समीर बाबा का असली नाम सद्दाम है। खुद को हिंदू संत नहीं बताता, लेकिन उनके दरबार में समाज के कई वर्गों से लोग आते हैं।

जिन्नात बाबा की तरह, समीर बाबा भी लोगों की समस्याओं का अनुमान लगाकर दावा करता है और बताता है कि उनके घरों में ‘जिन्न’ या ‘खबीस’ घुस आया है। इसके बाद वह ‘फ्री’ इलाज देने की बात कहता है। लेकिन यही उसकी छुपी हुई असली चाल है। यह इलाज वास्तव में मुफ्त नहीं होता। समीर बाबा ने इसे एक भरा पूरा व्यापार बनाया हुआ है।

सद्दाम उर्फ बाबा समीर (फोटो-दैनिक भास्कर)

समीर बाबा का असली नाम सद्दाम है। अपने दरबार में आने वाले लोगों को वह 30 रुपये की लौंग और 60 रुपये की पानी की बोतल खरीदने को कहता है। इसके बाद वह उन पर कुछ धार्मिक मंत्रों का पाठ करने का नाटक करता है और दावा करता है कि यह पानी अब ‘चमत्कारी’ हो गया है। वह लोगों से कहते हैं कि इस पानी को तीन दिन तक पीना होगा।

दैनिक भास्कर की टीम के रिपोर्टर्स ने खुद को ‘फरियादी’ बनाकर इस धोखाधड़ी की पूरी कार्यप्रणाली को समझने की कोशिश की। उन्हें पता चला कि सद्दाम रोजाना 200 से अधिक लोगों के साथ यही प्रक्रिया दोहराता है।

समीर बाबा हर व्यक्ति से 50 से 100 रुपये तक वसूलता है। महज अंधविश्वास और झूठे दावों के जरिए वह हर महीने लगभग 3 से 5 लाख रुपए की कमाई कर रहा है।

सद्दाम उर्फ समीर बाबा महिलाओं को संतान संबंधी समस्याओं से छुटकारा दिलाने का दावा करता है। वह अरबी में लिखी पर्चियाँ देता है और ‘इलाज’ के नाम पर 1500 रुपये की गोलियाँ बेचता है।

इसके अलावा, उसने एक पैथोलॉजी संचालक अल्ताफ अंसारी से भी साठ-गाँठ कर रखी है। अंसारी महिलाओं की एक जाँच के लिए 800 रुपये वसूलता है और समीर बाबा के कहे अनुसार ही रिपोर्ट तैयार करता है।

दैनिक भास्कर की एक महिला रिपोर्टर ने खुद को संतान प्राप्ति में कठिनाई होने की बात कहकर इस धोखाधड़ी की तह तक जाने की कोशिश की। समीर बाबा ने उसे भी अल्ताफ अंसारी की पैथोलॉजी में टेस्ट करवाने भेजा।

टेस्ट के बाद अंसारी ने कहा कि रिपोर्ट में समस्या है और इलाज जरूरी है। उसने यह भी कहा कि अगर समीर बाबा चाहें तो रिपोर्टर को संतान प्राप्त हो सकती है।

इसके बाद जब रिपोर्टर ने असली स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुरहीता करीम से जाँच करवाई तो पता चला कि रिपोर्ट पूरी तरह सामान्य है और अल्ताफ अंसारी द्वारा बताई गई परेशानियाँ पूरी तरह झूठी थीं।

सद्दाम, ‘समीर बाबा’ बनने से पहले गाँव में गुंडों का गिरोह चलाता था। धीरे-धीरे उसने काले जादू और अंधविश्वास के सहारे लोगों को बहकाना शुरू किया। अब वह अपनी बहन की 2 डिसमिल जमीन यानी लगभग 871 स्क्वायर फुट पर दरबार लगाता है। उनकी बीवी और बच्चे गाँव में ही रहते हैं।

पिता अमीरुल्लाह इलाके में घूम-घूमकर छाते ठीक किया करते थे। भाई फखरुद्दीन और सफुद्दीन मछली पालन करते हैं। एक भाई मुसाफिर लखनऊ में पेंट-पॉलिश का ठेकेदार है। दूसरा भाई लाल मोहम्मद गाय की तस्करी के आरोप में जेल जा चुका है। सबसे छोटा भाई नईम अहमद गाँव का प्रधान है।

इन गतिविधियों पर पुलिस का कहना है कि झाड़-फूँक और आस्था के नाम पर अक्सर आपराधिक गतिविधियाँ होती हैं। इन मामलों में भी अगर कोई आपराधिक कृत्य पाया गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

85 साल बाद बिहार में CWC की बैठक, लेफ्ट की 12 सीटों पर दावा, मुकेश सहनी को भाव नहीं: कॉन्ग्रेस के ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ से INDI गठबंधन का दम फूला

बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव की घोषणा बस होने ही वाली है और राज्य की 243 सीटों पर जंग छिड़ने वाली है। एक तरफ सत्ताधारी एनडीए है, जिसमें नीतीश कुमार की जेडीयू और भाजपा की जोड़ी मजबूत दिख रही है। दूसरी तरफ विपक्ष का इंडी गठबंधन, जो महागठबंधन के नाम से जाना जाता है। लेकिन विपक्षी खेमे में अभी से ही घमासान मचा हुआ है।

सीएम पद का चेहरा तय नहीं, सीटों के बँटवारे पर लड़ाई और छोटे सहयोगियों की बगावत… ये सब मिलकर गठबंधन को कमजोर कर रहे हैं। क्या ये आंतरिक कलह इंडी गठबंधन को लेकर डूब जाएगी? ये बड़ा सवाल है। इस लेख में हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर बिहार की राजनीति में क्या कुछ चल रहा है।

बिखरने लगा है इंडी गठबंधन

बिहार चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होने की उम्मीद है। 2020 के चुनावों में महागठबंधन ने 243 में से 110 सीटें जीती थीं, लेकिन सत्ता से बाहर रह गया। अब 2025 में वापसी की कोशिश है, लेकिन गठबंधन के अंदर ही सब कुछ उलझा पड़ा है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सबसे बड़ा दाँव खेल रही है, जबकि कॉन्ग्रेस अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर अड़ी हुई है। वामपंथी दल, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) जैसे छोटे साथी भी अपनी दुकान चलाने को बेताब हैं। जानकार कहते हैं कि अगर ये विवाद न सुलझे, तो गठबंधन का वोट बँट सकता है।

सीएम चेहरा: तेजस्वी बनाम कोई और?

सबसे बड़ा सवाल है- अगर (मान लेते हैं) महागठबंधन जीत गया, तो बिहार का अगला सीएम कौन बनेगा? तेजस्वी यादव खुद को इस पद का मजबूत दावेदार मानते हैं। वे 2020 में डिप्टी सीएम रह चुके हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अभी तक उनके नाम को स्वीकृति ही नहीं दी है। पार्टी के नेता कहते हैं कि बिना चेहरे के चुनाव लड़ना जोखिम भरा है, लेकिन तेजस्वी को अकेले आगे बढ़ाना गठबंधन के लिए ठीक नहीं।

इस बात की खीज में हाल ही में तेजस्वी ने बयान दे दिया कि वे सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। ये बयान सीट बँटवारे की बातचीत के ठहराव के बीच आया, और इसे गठबंधन के अंदर दबाव की रणनीति माना जा रहा है। तेजस्वी ने कहा, “वोटरों से अपील है कि मेरे नाम पर वोट दें, चाहे कोई भी सीट हो।” ये सुनते ही सहयोगी दल हैरान रह गए। कॉन्ग्रेस ने इसे “तेजस्वी जी का अपना स्टैंड” बताया, लेकिन अंदरखाने में नाराजगी साफ दिख रही है।

कॉन्ग्रेस की नजरें राहुल गाँधी पर हैं। वे बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाल चुके हैं, जो ‘उसकी नजर में’ काफी सफल रही। यात्रा में तेजस्वी के साथ उनकी जोड़ी ने विपक्षी एकता का संदेश दिया, लेकिन अब ये यात्रा कॉन्ग्रेस को ज्यादा सीटें दिलाने का हथियार बन गई है। राहुल ने यात्रा के जरिए वोटर लिस्ट से नाम कटने का मुद्दा उठाया, हालाँकि ये बैकफायर कर गया।

ये अलग बात है कि इंडी गठबंधन के अंदर राहुल की यात्रा सीएम चेहरे की बहस को और उलझा रही है। वामपंथी दलों का कहना है कि कहा कि कॉन्ग्रेस को यथार्थवादी होना चाहिए और आरजेडी को लचीला। अगर चेहरा तय न हुआ, तो गठबंधन का वोटर कन्फ्यूज हो सकता है। एनडीए तो नीतीश कुमार को ही आगे रख रहा है, जो स्थिरता का प्रतीक बने हुए हैं।

बँटवारे में कॉन्ग्रेस की माँग 70-75 सीट

अब बात सीटों की। 2020 में कॉन्ग्रेस ने 70 सीटें लड़ीं, लेकिन सिर्फ 19 जीतीं। अब पार्टी कम से कम 70-75 सीटें माँग रही है। राहुल की यात्रा के बाद कॉन्ग्रेस का हौसला बढ़ा है, और वे कहते हैं कि ‘खराब सीटें ही क्यों मिलें?’ इनमें से 12-15 सीटें वामपंथी दलों की हैं, जो पहले जीत चुकी हैं। आरजेडी ये माँग मानने को तैयार नहीं। वे कहते हैं कि 2020 का फॉर्मूला ही ठीक है, जिसमें आरजेडी को 144, कॉन्ग्रेस को 70 और बाकी सहयोगियों को बाँटा गया था।

इस बीच, कॉन्ग्रेस ने दबाव बनाने के लिए पटना में केंद्रीय कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई है। ये 1940 के बाद बिहार में पहली बार हो रहा है। 24 2025 सितंबर को राहुल गाँधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सभी राज्य प्रभारियों के साथ बैठक होगी। कॉन्ग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने कहा, “ये सिर्फ बिहार का मुद्दा नहीं, पूरे देश का है। हम दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।? एनडीए ने इसपर तंज कसा है कि कॉन्ग्रेस सीटों के लिए दबाव डाल रही है।

कॉन्ग्रेस के इस माँग से वामपंथी दल नाराज हैं। सीपीआई(एमएल) के दीपंकर भट्टाचार्य ने 4-5 दिन पहले बयान दिया कि कॉन्ग्रेस की ज्यादा माँग से उनकी सीटें खतरे में हैं। गठबंधन अब 5 से बढ़कर 9 दलों का हो गया है – आरजेडी, कॉन्ग्रेस, वामपंथी, वीआईपी, जेएमएम, एलजेपी(रा) जैसे नए साथी जुड़े हैं। ये ‘समृद्धि की समस्या’ बन गई है, जहाँ सीटें कम हैं और दावेदार ज्यादा। अगर बात न बनी, तो छोटे दल बगावत कर सकते हैं।

मुकेश साहनी का डिप्टी सीएम का सपना

गठबंधन में एक और टेंशन पॉइंट है – विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के मुखिया मुकेश साहनी। वे हर हाल में डिप्टी सीएम का पद चाहते हैं। साहनी कहते हैं, “तेजस्वी दूल्हा नंबर एक, मैं नंबर दो।” वे 60-70 सीटें माँग रहे हैं, खासकर ईबीसी वोटों के लिए।

पहले आरजेडी ने उन्हें इग्नोर किया, तो वे कॉन्ग्रेस के करीब चले गए। राहुल की यात्रा में वे बराबर खड़े दिखे। लेकिन अब कॉन्ग्रेस भी ठंडी पड़ गई है। साहनी की माँग से बातचीत जटिल हो गई है। जानकार कहते हैं कि अगर साहनी को जगह न मिली, तो वे एनडीए की ओर रुख कर सकते हैं। ये गठबंधन के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि वीआईपी के पास निषाद समुदाय का मजबूत वोट बैंक है।

आरजेडी की आक्रामक रणनीति, यात्रा और उम्मीदवार की घोषणा

आरजेडी ने जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। पहले कॉन्ग्रेस की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का समापन पटना में होना था, लेकिन आरजेडी ने इसे रोका। इसके बाद तेजस्वी ने बिना सहयोगियों के ‘बिहार अधिकार यात्रा’ शुरू कर दी। ये यात्रा बेरोजगारी और अपराध पर केंद्रित है और तेजस्वी इसमें खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। यात्रा राहुल की कामयाबी को कंसोलिडेट करने का बहाना है, लेकिन असल में गठबंधन में अपनी प्रधानता दिखाने की कोशिश है।

सबसे तीखा कदम कुटुंबा सीट पर उठाया गया। यहाँ कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार विधायक हैं। आरजेडी कार्यकर्ताओं ने बिना सीट बँटवारे का फॉर्मूले तय हुए ही अपनी तरफ से आरजेडी उम्मीदवार के तौर पर एक नाम भी सामने कर दिया। इस उम्मीदवार का नाम सुरेश राम पासवान है, जो स्थानीय स्तर पर मजबूत माने जाते हैं। ये सीट अभी तक गठबंधन के बँटवारे में नहीं आई, फिर भी आरजेडी ने दावा ठोंक दिया।

13 सितंबर को कॉन्ग्रेस ने कुटुंबा में सम्मेलन किया, तो 15 को घोषणा कर आरजेडी ने 18 को अपना कार्यक्रम रखा। दोनों तरफ से दूसरे दल का कोई नेता नहीं पहुँचा। ये कदम साफ बताता है कि आरजेडी कॉन्ग्रेस को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती। प्रदेश अध्यक्ष की सीट पर ही दाँव खेलकर वे मैक्सिमम प्रेशर डाल रही हैं।

अतिमहत्वाकांक्षा कहीं पड़ न जाए भारी

जानकारों का मानना है कि गठबंधन को जल्द फैसला लेना होगा। तेजस्वी की महत्वाकांक्षा अच्छी है, लेकिन गठबंधन की भावना जरूरी। कॉन्ग्रेस अगर 60 सीटों पर मान गई, तो बात बन सकती है। मुकेश साहनी जैसे सहयोगियों को संतुष्ट करना भी चुनौती है। कुल मिलाकर, बिहार चुनाव सिर्फ सीटों की जंग नहीं, बल्कि गठबंधनों की परीक्षा है। क्या इंडी गठबंधन इन चुनौतियों से पार पा लेगा या एनडीए फिर बाजी मार लेगा? आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

बीवी को तीन तलाक देकर किया घर से बाहर, अब्बू ने 15 साल की बेटी को महीनों तक बनाया हवस का शिकार: बच्ची के गर्भवती होने पर हुआ खुलासा, यूपी के मुरादाबाद का मामला

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक 50 वर्षीय शख्स द्वारा अपनी 15 वर्षीय बेटी के साथ कई महीनों तक रेप किए जाने का शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। आरोपित ने इससे पहले अपनी बीवी को तीन तलाक देकर घर से बाहर निकाल दिया था।

बेटी का 3 महीने तक रेप करता रहा आरोपित

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता ने बीते रविवार (21 सितंबर 2025) को अपनी माँ के साथ थाने जाकर मामले की शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया है कि उसका अब्बू करीब 3 महीने से बार-बार उसके साथ रेप कर रहा था और शनिवार देर रात भी उसके साथ रेप किया था।

बीते शनिवार को अपने अब्बू के सोने के बाद पीड़िता ने अपनी अम्मी को फोन लगाया और उसके साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव की सारी जानकारी दी। पीड़िता ने अपनी अम्मी को बताया कि वह प्रेग्नेंट भी हो गई थी। इसके बाद रविवार को पीड़िता ने अम्मी के साथ थाने जाकर इस मामले की शिकायत दी है।

बीवी को दो बार दिया तीन तलाक

आरोपित ने बेटी के साथ दरिंदगी करने से पहले अपने बीवी को तीन तलाक देकर घर से बाहर कर दिया था। पीड़िता की माँ ने पुलिस को बताया कि उसका शौहर आए दिन उसके साथ मारपीट करता था। शौहर ने कुछ समय पहले उसे पहली बार तीन तलाक दिया था लेकिन कुछ समय बाद रिश्तेदारों ने हलाला कराकर दोनों का निकाह करा दिया था।

करीब 3 महीने पहले शख्स ने एक बार फिर अपनी बीवी को तीन तलाक दिया था और घर से बाहर निकाल दिया था। आरोपित के 6 बच्चे हैं और उसने बच्चों अपने पास रख लिए। आरोपित की सबसे बड़ी बेटी की उम्र करीब 15 साल है।

जब पीड़िता की अम्मी घर से चली गई तो एक दिन उसका अब्बू नशे में धुत होकर आया और खाना खाने के बाद बेटी के साथ रेप किया। जब पीड़िता रोई-चिल्लाई तो आरोपित ने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया।

बेटी को दी जान से मारने की धमकी

पीड़िता ने बताया कि उसका अब्बू आए दिन उसके साथ रेप करता था और धमकी भी देता था। पीड़िता ने बताया कि अब्बू ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने किसी को इस बारे में कुछ भी बताया तो वह उसके छोटे भाई की गर्दन चाकू से काट देगा। आरोपित ने 8वीं कक्षा में पढ़ रही पीड़िता का स्कूल जाना भी बंद करा दिया था।

आरोपित ने बच्ची की अम्मी को भी धमकी दी थी। आरोपित ने उससे कहा था कि अगर वह पुलिस में शिकायत देगी तो उसके बच्चे की गर्दन काट देगा। वहीं, पुलिस ने इस मामले में पीड़िता की शिकायत पर केस दर्ज कर लिया है और मामले की जाँच की जा रही है।

रिकॉर्ड ₹1.14 लाख पर पहुँची 10 ग्राम 24 कैरेट सोने की कीमत, 5 साल में आया 112% का उछाल: जानें क्यों आसमान छू रहे हैं भाव?

23 सितंबर 2025 को सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गईं है। 24 कैरेट सोने की कीमत ₹1,14,480 प्रति 10 ग्राम बिक रहा है जबकि 22 कैरेट सोने की कीमत ₹1,04,950 प्रति 10 ग्राम है। 18 कैरेट सोने की कीमत ₹85,900 प्रति 10 ग्राम हो गई है।

भारत में सोने की कीमतों में 2024 की शुरुआत से ही उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ये विश्व में चल रहे तमाम युद्धों, आर्थिक अनिश्चितताओं, ट्रम्प के टैरिफ और अमेरिकी डॉलर के अवमूल्यन सहित कई वजहों से बढ़ी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बाद विश्वस्तर पर सोने की कीमतों में भारी उछाल देखा गया।

5 साल पहले की तुलना करे, तो 2020 से सोने की कीमतों में 112% की वृद्धि दर्ज की गई। 19 सितंबर, 2020 में, मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MCX) के मुताबिक सोने (24 कैरेट) की कीमत 51,619 रुपये प्रति 10 ग्राम थी। यह कीमत अब ₹1,09,388 तक पहुँच गई है। एक साल पहले यानी 2024 में यह कीमत ₹72,874 थी। पिछले पाँच वर्षों में, COVID-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका के लगाए गए टैरिफ और दूसरी राजनीतिक-आर्थिक अनिश्चितताओं जैसे कारकों ने वैश्विक स्तर पर और भारत में सोने की कीमतों को प्रभावित किया है। बढ़ती कीमतों के बावजूद इसकी माँग में कोई कमी नहीं आई है।

पिछले 20 वर्षों की बात करें, तो सोने की कीमतें 1200% बढ़ी हैं। 2005 में ₹7,638 से बढ़कर 2025 (जून तक) में ₹1,00,000 से अधिक हो गई हैं, जिससे यह पीली धातु 2025 में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली संपत्ति और एक विश्वसनीय धरोहर बन गई है।

निवेशकों को फायदा, खुदरा विक्रेताओं को नुकसान

सोने की कीमत में 2020 से विश्वस्तर पर 17% और भारत में 20% की वृद्धि दर्ज की गई है। इन 5 सालों में निवेशकों को सोने की बढ़ती कीमतों से लाभ हुआ है। लेकिन खुदरा विक्रेताओं का कारोबार धीमा चल रहा है, क्योंकि गैर-जरूरी खरीदारी और आभूषणों की बिक्री में गिरावट आई है। सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव खुदरा विक्रेताओं के लिए इन्वेंट्री प्लानिंग को मुश्किल बना देता है। कई निवेशक यह सोच रहे हैं कि उन्हें अपना सोना रखना चाहिए या बेच देना चाहिए।

भारत में सोने से भावनात्मक रिश्ता

हमारे देश में सोने को एक निवेश की तरह नहीं लिया जाता, बल्कि इसका गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व भी है। यह कीमती धातु प्राचीन काल से ही महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा का स्रोत रही है। यह शादियों और दूसरे शुभअवसर का एक अनिवार्य हिस्सा है। विश्व स्वर्ण परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल सोने की माँग में भारतीय परिवारों की हिस्सेदारी एक-चौथाई है।

भारत दुनिया में चीन के बाद सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता रहा है। हालाँकि, पिछले साल भारत में सोने की खपत 802.8 टन तक पहुँच गई, जो चीन के 511.4 टन की खपत से अधिक थी। दोनों देशों में आभूषण के रूप में सोने की सबसे अधिक खपत होती है। भारतीय परिवारों के पास लगभग 24,000 टन सोना होने का अनुमान है, जो वैश्विक केंद्रीय बैंकों के कुल सोने के भंडार से भी अधिक बताया जाता है। भारत में सोने की लगभग एक-तिहाई बिक्री शादियों और दशहरा व दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान होती है।

हालाँकि, सोने की बढ़ती कीमतों ने घरेलू स्तर पर इसकी माँग को प्रभावित किया है। 2024 की दूसरी तिमाही में सोने की माँग 395 टन दर्ज की गई, और 2025 की दूसरी तिमाही में यह घटकर 341 टन रह गई। हालाँकि, आगामी त्योहारों और शादियों के मौसम के साथ, सोने की माँग बढ़ने की संभावना है। सोने की बढ़ी हुई कीमतों को ध्यान में रखते हुए ग्राहक बहुमूल्य और अर्ध-कीमती पत्थरों से जड़े 18 कैरेट और 14 कैरेट के सोने के आभूषण खरीदने पर विचार कर रहे हैं।

स्टालिन सरकारी धन से बनवाना चाहते थे करुणानिधि की मूर्ति, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार: कहा- ‘अपने नेता की महिमा के लिए पब्लिक के पैसे का उपयोग क्यों?’

तमिलनाडु सरकार की ओर से दिवंगत मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की प्रतिमा को स्थापित करने के लिए सार्वजनिक धन के उपयोग की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया।

यह प्रतिमा तिरुनेलवेली जिले के वलियूर डेली वेजिटेबल मार्केट के मुख्य द्वार के पास लगाई जानी थी। सरकार ने इसके लिए एक ब्रॉन्ज की मूर्ति और नाम पट्टिका लगाने की अनुमति माँगी थी।

सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ जस्टिस विक्रम नाथ और प्रशांत कुमार मिश्रा ने सुनवाई के दौरान कहा, “यह अनुमति योग्य नहीं है। आप अपने पूर्व नेताओं की महिमा के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग क्यों कर रहे हैं?”

अदालत ने तमिलनाडु सरकार को अपनी विशेष अनुमति याचिका (SLP) वापस लेने और जरूरत पड़ने पर मद्रास हाईकोर्ट से राहत प्राप्त करने की सलाह दी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमा लगाने की अनुमति देने से इनकार किया गया था।

क्या था हाईकोर्ट का पहले का फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने पहले ही यह निर्णय दिया था कि सरकार सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमा लगाने की अनुमति नहीं दे सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रतिमाएँ अक्सर यातायात जाम और नागरिकों को असुविधा का कारण बनती हैं।

अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, “सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमा लगाने की अनुमति देने से भारी ट्रैफिक और अन्य समस्याएँ होती हैं, जिससे आम जनता को कठिनाई होती है। संविधान के तहत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा राज्य का कर्तव्य है।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि सरकार को राज्य भर में ‘लीडर्स पार्क’ की स्थापना करनी चाहिए, जहाँ नेताओं की प्रतिमाएँ लगाई जा सकें और युवाओं को उनके विचारों के बारे में बताया जा सके।

हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से यह अनुरोध किया कि क्या वलियूर सब्जी मंडी के प्रवेश द्वार पर प्रस्तावित आर्च (तोरणद्वार) को अनुमति दी जा सकती है क्योंकि इसे लेकर याचिका में विशेष रूप से चुनौती नहीं दी गई थी।

करुणानिधि की राजनीतिक विरासत

एम करुणानिधि द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख नेता थे। उन्हें ‘कलाईनार’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में पाँच बार सेवा दी। 1969- 71, 1971- 76, के बाद 1989- 91, 1996- 2001 और 2006- 2011 के कार्यकाल में उन्होंने अपनी सेवा दी। 7 अगस्त 2018 में 94 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ।