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बिहार चुनाव से पहले प्रशांत किशोर का ‘सियासी प्रयोग’: सम्राट चौधरी पर हत्या और अशोक चौधरी पर ₹500 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप, जानें PK के दावों में कितना दम?

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर दनादन नेताओं पर आरोप लगा रहे हैं। सोमवार (29 सितंबर 2025) को प्रशांत किशोर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और मंत्री अशोक चौधरी पर आरोप लगाए हैं।

उन्होंने जहाँ सम्राट चौधरी को हत्या में अभियुक्त बताया है तो वहीं अशोक चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। हालाँकि, उनके दावों कि हवा थोड़ी दी देर में सम्राट चौधरी ने निकाल दी है।

प्रशांत किशोर ने क्या आरोप लगाए?

प्रशांत किशोर ने केंद्र सरकार, बिहार सरकार और राज्यपाल से सम्राट चौधरी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर उन्हें पद से बर्खास्त करने की माँग की है। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि तारापुर में 1995 में कुशवाहा समाज के 7 लोगों की हत्या हुई थी और उसमें राकेश कुमार उर्फ सम्राट कुमार मौर्य उर्फ सम्राट चौधरी अभियुक्त हैं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि इस मामले में 1995 में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने नाबालिग होने की वजह से सम्राट चौधरी को जेल से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने जो डॉक्यूमेंट दिया था उसके हिसाब से उनकी जन्मतिथि 1981 थी। प्रशांत ने दावा किया कि 2020 में चुनावी हलफनामे में सम्राट चौधरी ने अपनी उम्र 51 वर्ष बताई थी, तो 1995 में इनकी उम्र 26 साल थी। गलत सर्टिफिकेट के आधार पर इन्हें रिहा किया गया था।

प्रशांत किशोर ने कहा, “शिल्पी गौतम रेप और मर्डर केस में, साधु यादव पर आरोप लगा, CBI तक केस गया था। सम्राट चौधरी उर्फ राकेश कुमार उर्फ सम्राट कुमार मौर्य उस केस में संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर नामजद थे या नहीं, यह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बात दें।”

उन्होंने सम्राट चौधरी पर सवाल उठाते हुए कहा, “आकर बताइए कि उस केस में अभियुक्त के तौर पर CBI ने आपकी जाँच की थी कि नहीं की थी? आपके सैंपल टेस्ट लिए गए थे कि नहीं लिए गए थे? आपकी उस घटना में क्या संलिप्तता है?”

क्या बोले सम्राट चौधरी?

सम्राट चौधरी ने प्रशांत किशोर को नौसिखिया बताता हुए आरोपों को बेबुनियाद और सनसनी फैलाने की कोशिश बताया है। उन्होंने 1995 के केस को लेकर कहा कि उस केस में मेरे परिवार के 22 लोगों को जेल में डाला गया था।

सम्राट ने कहा, “मेरे घर के अनाज में, चावल में पेशाब कर दिया गया। मानवाधिकार आयोग ने बिहार की तत्कालीन लालू सरकार पर फाइन लगाया और सरकार ने मुआवजा दिया था।” उन्होंने कहा कि कोर्ट ने उस केस में उन्हें बाइज्जत बरी किया था।

वहीं, शिल्पी-गौतम केस को लेकर उन्होंने कहा कि जिस राकेश का प्रशांत किशोर दावा कर रहे हैं, वो हाजीपुर का रहने वाला था और आइसक्रीम बेचता था। उन्होंने कहा, “अब इसको (प्रशांत किशोर) कहाँ-कहाँ से बुद्धि लोग दे रहे हैं। शिल्पी-गौतम कांड में पूरी तरह जाँच CBI ने की, हमलोगों को तो पता भी नहीं है। जिस राकेश की बात वो करते हैं, वो तो हाजीपुर का रहने वाला है। इन्हें बिहार के बारे में कुछ नहीं पता है।”

अशोक चौधरी पर प्रशांत के आरोप?

प्रशांत किशोर ने बिहार के मंत्री अशोक चौधरी पर टेंडर देने में 500 करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया है। प्रशांत किशोर ने इससे पहले भी अशोक चौधरी पर 200 करोड़ रुपए की संपत्ति इकट्ठा करने का आरोप लगाया था।

प्रशांत ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पिछले आठ महीनों में इन्होंने 20,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। हर कॉन्ट्रैक्ट में 5% पैसा कमीशन के तौर पर लिया गया है।” उन्होंने इंजीनियर के घर पर जलाए गए पैसों को भी इसी भ्रष्टाचार का पैसा बताया है।

प्रशांत ने शांभवी के पति के परिवार से जुड़े ट्रस्ट पर भी आरोप लगाए हैं। प्रशांत ने दावा किया कि आचार्य किशोर कुणाल के परिवार के ट्रस्ट ‘वैभव विकास न्यास’ के नाम पर एक वर्ष में 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति खरीदी गई है। उन्होंने ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारी जियालाल आर्य, किशोर कुणाल की पत्नी अनीता कुणाल और मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की सास से इसका जवाब देने को कहा है।

उन्होंने कहा कि अनीता कुणाल के बेटे सायण कुणाल की मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी (समस्तीपुर सांसद) के साथ सगाई और शादी के बाद ये संपत्तियाँ खरीदी गई हैं।

अशोक चौधरी और शांभवी चौधरी का पलटवार

मंत्री अशोक चौधरी और शांभवी चौधरी ने प्रशांत किशोर के आरोपों पर पलटवार किया है। अशोक चौधरी ने दावा किया है कि प्रशांत किशोर राजनीति को सनसनी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अशोक चौधरी ने कहा कि अगर उनके खिलाफ कोई सबूत है तो प्रशांत किशोर कोर्ट जाएँ, वहां सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

मंत्री ने कहा, “अगर मेरे खिलाफ या फिर मेरे किसी करीबी पर कोई दस्तावेजी प्रमाण है तो वह सामने आए। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि असली कौन है और नकली कौन? वह बताएँ कि हमने कहाँ जमीन और पैसा रखा हुआ है?”

साथ ही, उन्होंने कहा कि कमीशन का ऐसे ही आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। ट्रस्ट को लेकर अशोक चौधरी ने कहा कि वह ट्रस्ट 1985 से काम कर रहा है और उसका उनसे कुछ लेना-देना नहीं है।

अशोक चौधरी की सांसद बेटी शांभवी चौधरी ने प्रशांत किशोर के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया और कहा कि यह निजी प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास है। शांभवी ने कहा, “आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और चुनाव करीब आते ही इस तरह की बयानबाजी आम हो चुकी है, लेकिन इस बार मामला राजनीति से आगे बढ़कर हमारे परिवार पर निजी हमले का बन गया है।”

उन्होंने कहा कि इस पूरे विवाद में उनके ससुराल पक्ष को घसीटा जाना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। शांभवी ने कहा कि यह परिवार की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला हमला है और ऐसे आरोपों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रशांत किशोर पर भ्रष्टाचार के आरोप

सम्राट चौधरी ने प्रशांत किशोर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। सम्राट ने कहा, “कहता है कि हमको 14 करोड़ रुपए चंदा दिया, क्यों दिया? कल तक तुम्हें मेहनताना नहीं मिला था, अब 241 करोड़ रुपए का मेहनताना मिला है। कोई सेल कंपनी जिसकी औकात 10 लाख की है वो 10 करोड़ कैसे चंदा दे सकती है।”

उन्होंने कहा, “आते के साथ ही, पाटलिपुत्र में तुम्हारे पास 32 करोड़ रुपए का जमीन कैसे आ गया। सबका हिसाब होगा, जनता सबका जवाब देगी।” News18 के मुताबिक, सम्राट चौधरी ने कहा, “तुम अपने भ्रष्टाचार का हिसाब दो, तुम 241 करोड़ रुपए कहाँ से लाए। जिसने तुम्हें पैसा दिया, क्या वह तुम्हारा बाप है? तुम कौन हो? अगर तुम अपराध करोगे, तो उसका जवाब देना ही पड़ेगा।”

प्रशांत किशोर के आरोपों के बाद बीजेपी के प्रवक्ता दानिश इकबाल ने उन्हें लीगल नोटिस भेजने की बात भी कही है। जाहिर है कि चुनाव से पहले इस तरह के आरोप लगाना आम बात है लेकिन जो प्रशांत किशोर खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हैं, बिहार के लोग उन पर कितना भरोसा कर पाएँगे यह तो आने वाले चुनावों में ही साफ होगा।

काश पटेल का असीम मुनीर से हाथ मिलाना विश्वासघात नहीं, जियोपॉलिटिक्स की वास्तविकता है: भारत के हिंदुओं को छोड़नी होगी ‘असंभव की उम्मीद’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर से 25 सितंबर 2025 को मुलाकात की। इस बैठक में FBI प्रमुख काश पटेल भी मौजूद थे। बैठक की एक तस्वीर में काश पटेल पाकिस्तान के मुनीर से हाथ मिलाते दिखे, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

काश पटेल भारतीय मूल के हैं और हिंदू विरासत से आते हैं। जब उनकी यह तस्वीर व्हाइट हाउस में मुनीर से हाथ मिलाते हुए सामने आई तो भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच हलचल मच गई। कुछ लोगों ने इसे विश्वासघात कहा, कुछ ने इसे दोहरा मापदंड बताया और कुछ ने इसे मिलीभगत समझा। यह एक ऐसा पल बन गया जिसने सिर्फ पटेल की स्थिति नहीं बल्कि प्रवासी हिंदुओं से जुड़ी भारतीय उम्मीदों को भी उजागर किया।

लेकिन अब शायद जरूरत है एक शांत और संतुलित सोच की। हमें यह समझना होगा कि काश पटेल को दोष देना आसान है लेकिन शायद यह पल हमें खुद से सवाल करने का मौका देता है। क्या हमारी उम्मीदें उन प्रवासी हिंदुओं से हैं या वे हमारी अपनी असुरक्षाओं और भावनाओं का प्रतिबिंब हैं?

द ऑप्टिक्स, और क्यों ये मायने रखते हैं

जैसा कि मीडिया ने भी जोर देकर बताया, पटेल और मुनीर की हाथ मिलाने की तस्वीर सबकी नजरों में आ गई। इस ‘इशारे’ को लेकर कई सवाल उठे, खासकर इसलिए क्योंकि मुनीर ने हाल ही में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक विभाजन पर जोर दिया था और दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन भी किया था।

नेटिजन्स ने पटेल की हिंदू पहचान, उनके ‘जय श्री कृष्ण’ कहने के पुराने बयान और उनके निजी संस्कारों और सार्वजनिक पद के बीच के अंतर को लेकर सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी छोड़ दी। लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा जारी की गई तस्वीर सिर्फ एक पल का दृश्य थी। ये एक तरह का राजनीतिक मंचन है और ये समझना जरूरी है कि उस तस्वीर में मुनीर से हाथ मिलाते हुए जो व्यक्ति दिख रहा है, वो कई सीमाओं, संस्थाओं और जिम्मेदारियों से बंधा हुआ है।

प्रवासी भारतीयों पर हमारी अपेक्षाओं का दबाव

अक्सर हम प्रवासी भारतीयों पर असंभव अपेक्षाएँ थोप देते हैं। यह आम धारणा है कि चूँकि उनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं इसलिए उन्हें भारत के हितों के प्रतिनिधि, रक्षक या संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि सुंदर पिचाई हमेशा भारतीय डेवलपर्स का पक्ष लें, सत्य नडेला माइक्रोसॉफ्ट को भारत की ओर झुका दें और पटेल किसी भी ऐसे आधिकारिक संवाद से इनकार कर दें जो पाकिस्तान के प्रति भारत की कमजोरी दर्शाए।

तुलसी गैबर्ड को ही ले लीजिए। अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने हिंदू प्रतीकों और मंत्रों का जिक्र जरूर किया लेकिन उन्होंने हमेशा एक अमेरिकी राजनेता की तरह काम किया न कि भारत की प्रतिनिधि बनकर। उनकी जिम्मेदारी उनके मतदाताओं और उस अमेरिकी कॉन्ग्रेस के प्रति थी, जहाँ उन्होंने सेवा दी, न कि भारत या वैश्विक हिंदू समुदाय के प्रति। इससे अलग कोई उम्मीद करना सांस्कृतिक प्रतीकों को राजनीतिक निष्ठा समझने की भूल है।

लेकिन यह नागरिक पद या कॉर्पोरेट संचालन की तर्क नहीं है। यह उस मिथक की तर्कशक्ति है, जिसे हम अपने भीतर लिए चलते हैं और जिसे हम सच होता देखना चाहते हैं, जब कोई भारतीय प्रवासी किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँचता है- जैसे काश पटेल।

ऋषि सुनक, जो यूनाइटेड किंगडम के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं। उनके भारत में पैतृक जड़ों के बावजूद अपने देश के हितों को ही आगे बढ़ाएँगे। उसी तरह पटेल भी FBI निदेशक के रूप में अमेरिका के हितों को प्राथमिकता देंगे, न कि भारत के। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला अपनी कंपनियों को लाभ, नियामकीय अनुपालन और वैश्विक बाजारों की ओर ले जाएँगे, न कि किसी राष्ट्रीय मिथक की दिशा में।

उनके कार्यों में कोई विश्वासघात नहीं है। दरअसल, यही तो असली दुनिया का तरीका है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि हर चूक या राजनीतिक समझौते को नजरअंदाज किया जाए। इसका मकसद है हमारी सोच को फिर से संतुलित करना। यह माँग बंद करना कि हर प्रवासी हिंदू अपनी पहचान और नियति की दोहरी नागरिकता निभाए।

एक और उदाहरण लेते हैं, आशा जाडेजा मोटवानी, जो एक भारतीय-अमेरिकी वेंचर कैपिटलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी की बड़ी डोनर हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से भारत को डोनाल्ड ट्रंप की मानसिकता के बारे में सलाह दी है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे ट्रंप से संवाद करें और उन्हें संतुष्ट करें ताकि व्यापारिक तनाव कम हो सके। उन्होंने यहाँ तक कहा कि भारत को ट्रंप का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम में मध्यस्थता की।

भले ही उनकी सोच और भाषा में कुछ समस्याएँ थीं लेकिन उनका रुख साफतौर पर यह दिखाता है कि जो लोग किसी बाहरी देश में रहते हैं और वहीं अपनी जिंदगी बसा चुके हैं, वे स्वाभाविक रूप से उसी देश के लिए अपना कर्तव्य निभाएँगे, ना कि भारत के लिए। उनकी सलाह सिर्फ एक सलाह थी, कोई विदेश नीति नहीं। वे भारत को किसी कार्रवाई के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। उसी तरह, उनसे उम्मीद करना कि वे भारत का पक्ष लें, कुछ ज्यादा ही माँग है क्योंकि उनकी जड़ें अमेरिका से जुड़ी हैं।

कर्तव्य, पहचान और संस्थागत निष्ठा

भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता ‘स्वधर्म‘ की बात करती है, जिसका अर्थ है अपने कर्तव्य का पालन करना, बिना फल की आसक्ति के। पटेल ने अमेरिकी संविधान की सेवा की शपथ ली है और वह शपथ उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता पर हाथ रखकर ली थी। उनका धर्म है अमेरिकी संस्थाओं की सेवा करना- कानून, नौकरशाही और सुरक्षा की अनिवार्यताओं से बँधा हुआ। अगर उस कर्तव्य के चलते कुछ दृश्य असहज लगें तो सवाल विश्वासघात का नहीं है बल्कि हमारी अपेक्षाओं और संस्थागत वास्तविकता के बीच के असंतुलन का है।

पटेल मुनीर से हाथ मिलाने से इनकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसका असर उनके ऊपर पड़ता। संस्थागत मानकों को कमजोर करना वह चीज नहीं है, जिसकी उम्मीद अमेरिका अपने FBI निदेशक से करता।

यहूदी और इजरायल का उदाहरण

प्रवासी निष्ठा को लेकर कई चर्चाएँ होती रही हैं, जिनमें यहूदी प्रवासियों और इजरायल का उदाहरण बार-बार सामने आता है, यह एक तरह का भाषाई संक्षेप है, जिसमें कहा जाता है, “देखिए, दुनिया भर के यहूदी इजरायल के लिए एकजुट हो जाते हैं तो हिंदू भारत के लिए क्यों नहीं?” लेकिन यह तुलना कमजोर है बल्कि कई बार भ्रामक भी साबित होती है।

इजरायल एक आधुनिक राष्ट्र है, जो एक मातृभूमि के रूप में अस्तित्व में आया। इसका गठन सदियों की विस्थापन और उत्पीड़न की पीड़ा के बाद हुआ। यहूदी प्रवासी अक्सर इजरायस को एक अस्तित्वगत शरणस्थली और एक राष्ट्रीय आधार के रूप में देखते हैं। बहुत से यहूदियों के लिए उनकी पहचान और इजरायल की नियति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इसके विपरीत हिंदू सदियों से भारत में निरंतर बसे हुए हैं। भले ही प्रवास, आक्रमण, धर्मांतरण और विभाजन ने इतिहास को बदल दिया हो लेकिन हिंदुओं को एक सामूहिक पहचान के रूप में कभी पूरी तरह निष्कासित या निर्वासित नहीं किया गया। आर्थिक या सामाजिक कारणों से प्रवास हिंदू अनुभव का हिस्सा रहा है। प्रवासी हिंदू अक्सर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव लेकर चलते हैं, जरूरी नहीं कि राजनीतिक या राष्ट्रीय निष्ठा के साथ।

इसलिए जब हम प्रवासी हिंदुओं से यह उम्मीद करते हैं कि वे हमेशा भारत के प्रतिनिधि की तरह व्यवहार करें तो हम एक ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और जटिल पहचान को सपाट बना देते हैं। हम व्यक्तियों को प्रतीक बना देते हैं, ऐसे लोग जिनकी निष्ठा उनके निवास देश के कानून और संस्थाओं से जुड़ी होती है।

निराशावाद के बजाए यथार्थवाद

हमें अपनी दृष्टि को फिर से संतुलित करने की जरूरत है और यथार्थवाद के साथ चीजों को देखने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि न तो अंधा निराशावाद पनपे और न ही भोली आस्था। यह निश्चित रूप से गर्व की बात है जब कोई भारतीय मूल का व्यक्ति FBI का निदेशक बनता है या जब सुंदर पिचाई यह तय करते हैं कि अरबों लोग जानकारी तक कैसे पहुँचें, जब ऋषि सुनक यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बनते हैं या जब सत्य नडेला वैश्विक व्यापार की दिशा तय करते हैं। इन उपलब्धियों को उनके वास्तविक मूल्य पर सराहा जाना चाहिए, ना कि उन्हें पैतृक निष्ठाओं की शर्तों से बोझिल किया जाए।

साथ ही, यह पूरी तरह वैध है कि जब कोई कार्य हानिकारक हो, तो उसकी आलोचना की जाए। अगर पटेल अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं, या अगर नडेला की नीतियाँ लगातार भारतीय हितों को नुकसान पहुँचाती हैं, तो आलोचना न केवल उचित है बल्कि ज़रूरी भी। लेकिन ऐसी आलोचना ठोस शासन और प्रभाव के आधार पर होनी चाहिए—वंश या भावनात्मक जुड़ाव के आधार पर नहीं।

इसका मतलब यह भी है कि भारत अपनी आकांक्षाओं को प्रवासी समुदाय पर नहीं टिका सकता। प्रवासी उद्धारकर्ता का मिथक तब फीका पड़ जाता है जब भारत अपनी क्षमता को भीतर से विकसित करता है। जब शक्ति, प्रभाव और ढांचा देश के अंदर से उभरता है, तब यह और स्पष्ट हो जाता है कि भारत को अपनी उम्मीदें कहाँ रखनी चाहिए। प्रभाव हमेशा तब अधिक टिकाऊ होता है जब वह सोच-समझकर निर्यात किया जाए, न कि केवल विदेश में सफल व्यक्तियों की विरासत के सहारे।

आखिरकार सीमाओं को स्वीकार करना जरूरी है। प्रवासी समुदाय की भूमिका को सबसे बेहतर तरीके से सॉफ्ट पावर के रूप में समझा जा सकता है, एक जुड़ाव के रूप में, एक सांस्कृतिक पुल के रूप में जो देशों के बीच संवाद बनाता है। यह किसी राजनयिक पद का विकल्प नहीं है और न ही इसे विदेश नीति की निगरानी समझना चाहिए। उनकी सफलताएँ वैश्विक हिंदू और भारतीय पहचान को समृद्ध करती हैं लेकिन उनका कर्तव्य उस क्षेत्राधिकार में होता है जिसकी वे सेवा करते हैं।

इसे जागरूकता का संकेत मानें

अब वक्त आ गया है कि हम प्रवासी प्रतीकों पर जो भावनात्मक बोझ डालते हैं, उसे थोड़ा हल्का करें। उन्हें एक इंसान की भूमिका में देखना चाहिए, न कि किसी मिथकीय प्रतिनिधि के रूप में। यह समझना जरूरी है कि उनकी निष्ठा उस देश और उस पद के प्रति होती है जहाँ वे कार्यरत हैं। ना कि भारत के प्रति, भले ही कभी-कभी उनके कर्तव्य हमारी भावनात्मक भूगोल से अलग हो जाएँ।

पटेल से यह उम्मीद करना कि वे भारत के पक्षधर बनें, ऐसा बोझ है जिसे कोई भी सार्वजनिक अधिकारी स्वीकार नहीं करेगा। सुंदर पिचाई या सत्य नडेला से यह अपेक्षा रखना कि वे हमेशा राष्ट्रवादी रेखा पर चलें, वैश्विक संस्थाओं के काम करने के तरीके से मेल नहीं खाता। थोड़ा विवेक रखें और उन्हें उनकी भूमिकाओं के अनुसार काम करने दें।

भारत का भविष्य प्रवासी विश्वासियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। वह भारत की अपनी शक्ति, सहनशीलता, विश्वसनीयता पर टिका है। चाहे वह कूटनीति हो, अर्थव्यवस्था, सॉफ्ट पावर या नैतिक चरित्र। जब ये आधार मजबूत होते हैं तो प्रवासी गौरव एक गूँज बन जाता है, बोझ नहीं।

अब जागने का समय है। असंभव की उम्मीदें छोड़िए। प्रवासी अपने-अपने पदों की सेवा करें और हम उस भारत की सेवा करें जिसे हम स्पष्टता, संप्रभुता और कम भोली आशा के साथ गढ़ना चाहते हैं।

अब भूल जाओ दंगाइयों के सामने सजदा वाला दौर… बरेली में ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ होते ही दर्द से छटपटाने लगी ‘डिजिटल पत्थरबाज’ आरफा खानम-राणा अय्यूब

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़वी दवाई से कट्टरपंथी बिलबिला रहे हैं। बरेली की हिंसा पर जो बिल में जाकर बैठ गए थे, वे सीएम योगी के आक्रामक बयानों के बाद जुबानी हमलों पर उतर आए हैं। उन्हें कट्टरपंथियों और दंगाइयों के लिए भी ऐसी भाषा की अपेक्षा है कि जिसमें फूल बरसते हों।

आरफा खानम शेरवानी और राणा अय्यूब जैसी कथित पत्रकार जो पत्रकारिता की आड़ में इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाती हैं, वो सीएम योगी के डेंटिंग-पेंटिग वाले तीखे बयानों से खफा है। हालाँकि, यह पूरी जमात बरेली में इस्लामिक कट्टरपंथियों के बवाल पर खामोश बैठी थी।

बरेली में ‘I Love Muhammad’ को लेकर इस्लामी भीड़ ने खूब बवाल किया। इस भीड़ को मौलाना तौकीर रजा उकसा रहा था। वो चाहता था कि बवाल मचे चाहे इसके लिए पुलिसकर्मियों की हत्या ही क्यों ना करनी पड़े। पेट्रोल बम, बंदूक, पत्थर, डंडों से लैस इस भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। खूब पत्थर चलाए, फायरिंग की और फिर… फिर पुलिस ने इस कट्टरपंथियों की ठीक से खबर ली।

पुलिस ने हंगामा कर रहे लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। इस हमले के मुख्य साजिशकर्ता तौकीर रजा को गिरफ्तार कर लिया, उसके अलावा भी दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 2000 से अधिक लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने उपद्रवियों को साफ संदेश दिया की उत्तर प्रदेश में यह दंगा-फसाद नहीं चलेगा। सीएम योगी ने रजा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “बरेली में एक मौलाना भूल गया कि राज्य में सत्ता किसकी है। हमने जो सबक सिखाया है, उससे आने वाली पीढ़ियाँ दंगे करने से पहले दो बार सोचेंगी।”

योगी दंगाइयों को चेताने में यही नहीं रुके, उन्होंने कहा, “जब भी कोई हिंदू पर्व और त्यौहार आता है, उनको गर्मी आने लगती है और उनकी गर्मी को शांत करने के लिए हमें डेंटिंग-पेंटिंग का सहारा लेना पड़ता है।” साथ ही, उन्होंने भारत में गजवा-ए-हिंद का ख्वाब देखने वालों का जहन्नुम का टिकट काटने की बात भी कहीं।

अब यही खरी-खरी बात कुछ कट्टरपंथियो को नागवार गुजरी, तो वो राशन-पानी लेकर ज्ञान देने चले आए। राणा अय्यूब ने X पर सीएम योगी का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “ये भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिया है।” अय्यूब ने लिखा, “मुसलमानों के खिलाफ नफरत के इस खुले मौसम में न्यायपालिका, संस्थाओं, मीडिया और हमारे बुद्धिजीवियों की खामोशी ही इसे सामान्य बना रही है।”

अब, एक और कट्टरपंथियो को देखिए, आरफा खानम शेरवानी भी योगी की तल्ख बयानी से बिलबिला गई हैं। आरफा ने लिखा, “आदित्यनाथ को मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम ‘नाजी’ भाषा का प्रयोग करते हुए सुनकर, यह सवाल उठता है, क्या भारत का संविधान अब भी उत्तर प्रदेश में लागू होता है?”

एक कट्टरपंथी है मारिया खान, उसकी बौखलाहट इन दोनों से भी ज्यादा है। वो X पर लिखती है, “मुसलमानों को ऐसे ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ करने की बात करता है जैसे वे इंसान न होकर कोई कबाड़ हों। सत्ता ने उसे बेशर्म बना दिया है और खामोशी ने खतरनाक।”

ये सारे डिजिटल पत्थरबाज, बरेली की हिंसा पर तौकीर रजा और उस कट्टरपंथी भीड़ की हिंसा पर खामोश बैठे तमाशा देख रहे थे। इन्हें अब लगता है कि दंगाइयों का इलाज डंडा ना हो, ये चाहते हैं कि कोई दंगाइयों के सामने जाकर सजदा करे और वो ‘बेचारे’ सुधर जाएँ।

इन दंगाइयों और उनके प्रेमियों को उन तुष्टिकरण करने वाली सरकारों की आदत लग गई है जो इनके बवाल के बाद भी वोट के लिए इन दंगाइयों को छूने की हिम्मत नहीं करते थे। इसी उत्तर प्रदेश में दंगे के आरोपियों को लेने के लिए पिछली सपा सरकार में विशेष विमान भेजा जाता था। अब इन दंगाइयों पर कार्रवाई हो रही है तो ये बिलबिला उठे हैं।

अब दंगाइयों को मिठाइयाँ खिलाकर या फूल माला पहनाकर या कोई दोहे सुनाकर तो नहीं सुधारा जा सकता है। दंगाइयों का इलाज तो डंडा ही होना चाहिए और ऐसे दंगाई जो देश और उत्तर प्रदेश में पाकिस्तान और बांग्लादेश हालात बनाना चाहते हैं, उन पर किसी भी तरह का रहम क्यों ही किया जाए?

योगी राज में पुलिस पर पथराव का जवाब सजदा से देने की परंपरा खत्म हो गई है। ऐसे दंगाइयों से समाज की सुरक्षा फूलों की थाल से नहीं बल्कि कानून के डंडे से ही होती है। अगर इन पत्थरबाजों और उनके हिमयातियों को इस साफ-साफ लेकिन कठोर भाषा से दिक्कत है तो बेहतर है कि दंगाई और पत्थरबाज कानून को हाथ में लेने के बजाय जो समाज की अपेक्षा है वैसा काम करें।

विजयादशमी पर CJI गवई की माँ ने दिखाई हिंदूघृणा, बताया सामाजिक चेतना को नुकसान पहुँचाने वाला त्योहार: खुद के ‘आंबेडकरवादी’ होने की दी दुहाई, RSS ने भेजा था निमंत्रण

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में 5 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक कार्यक्रम होना है। यह कार्यक्रम विजयादशमी और संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की माँ कमलताई गवई को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।

लेकिन कमलताई गवई ने निमंत्रण ठुकरा दिया है। खुद को ‘आंबेडकरवादी’ बताते हुए हिंदू विरोधी भावनाओं का इजहार भी किया है। संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का दावा करने वाली मीडिया रिपोर्टों को खारिज करते हुए कमलताई गवई ने मराठी में एक पत्र लिखा है।

पत्र में खुद को आंबेडकरवादी विचारधारा में ओत-प्रोत और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बताया है। उन्होंने लिखा है कि वह किसी भी परिस्थिति में RSS के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगी। साथ ही कहा है कि किसी हिंदू त्यौहार के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने से ‘सामाजिक चेतना को नुकसान’ होगा।

कमलताई गवई ने पत्र में लिखा है, “महाराष्ट्र के अमरावती स्थित श्रीमती नरसम्मा महाविद्यालय मैदान में 5 अक्टूबर को शाम 6:30 बजे होने वाले RSS के विजयादशमी कार्यक्रम में मेरे शामिल होने के बारे में हाल ही में प्रकाशित खबरें पूरी तरह से झूठी हैं। आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित दादा साहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक अध्यक्ष और भारतीय संविधान के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता के कारण मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊँगी या उसका समर्थन करूँगी। विश्वास दिलाती हूँ कि मैं किसी भी तरह से सामाजिक चेतना को कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”

कमलताई गवई ने कहा है कि विजयादशमी का हिंदू संस्कृति में महत्व है। लेकिन उनके जैसे बौद्धों के लिए ‘अशोक विजयादशमी’ या मौर्य सम्राट अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाने और हिंसा का त्याग करना स्मरणोत्सव है। हालाँकि, यह उल्लेख करना जरूरी है कि इतिहासकारों का एक वर्ग और यहाँ तक कि पुरातात्विक साक्ष्य भी संकेत देते हैं कि अशोक का बौद्ध धर्म में परिवर्तन कलिंग युद्ध से पहले का है।

कमलताई गवई ने मीडिया में आई उन खबरों की कड़ी निंदा की और उन्हें ‘RSS का प्रोपेगेंडा’ बताया। जबकि ज्यादातर रिपोर्ट्स में सिर्फ इतना कहा गया था कि RSS ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की माता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित किया है, न कि उन्होंने उसमें शामिल होने की सहमति दी है।

उन्होंने कहा, “मैं महाराष्ट्र और पूरे भारत के लोगों से अपील करती हूँ कि इस बात पर ध्यान दें। विजयादशमी हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण है लेकिन हमारे लिए धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस है, जिसे अशोक विजयादशमी भी कहा जाता है, जो कि सबसे ज्यादा मायने रखता है। मैं हाल ही में प्रकाशित खबरों को गलत जानकारी मानती हूँ और लोगों से आग्रह करती हूँ कि ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण से भटकाने वाले प्रोपेगेंडा का शिकार न हों। मैं अपने सभी आंबेडकरवादी साथियों से कहती हूँ कि इस बात को समझें और मुझ पर भरोसा रखें। मेरी अनुमति या लिखित सहमति के बिना इस खबर को फैलाना RSS की साजिश है। मैं इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करती।”

कमलताई के दूसरे बेटे ने RSS कार्यक्रम में जाने का किया दावा

हालाँकि, कमलताई की तीखी प्रतिक्रिया के तुरंत बाद उनके दूसरे बेटे ने दावा किया कि वह RSS के कार्यक्रम में शामिल होंगी। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और कमलताई के बेटे डॉ. राजेंद्र गवई ने एक वीडियो जारी कर कहा कि कमलताई RSS के कार्यक्रम में जरूर शामिल होंगी और उन्होंने खुद भी निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।

दिवंगत पूर्व राज्यपाल आरएस गवई ने दीक्षाभूमि स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बेटे डॉ. राजेंद्र गवई वर्तमान में स्मारक समिति के सदस्य हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कमलताई गवई की शुरुआती प्रतिक्रिया कि वह RSS द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम या विजयादशमी जैसे हिंदू त्योहार मनाने वाले किसी भी कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होंगी- क्योंकि वह और उनका परिवार ‘आंबेडकरवादी विचारधारा’ और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं- मानो भारतीय संविधान बौद्धों या ‘आंबेडकरवादियों’ को RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने या हिंदू त्योहार मनाने से रोकता हो।

RS गवई
1981 में RSS कार्यक्रम में शामिल आरएस गवई, साथ में भय्याजी सहस्रबुद्धे, बालासाहेब देवरस और बाबासाहेब पथाडे।

हालाँकि उनके दिवंगत पति रामकृष्ण सूर्यभान गवई, जिन्हें दादासाहेब गवई के नाम से भी जाना जाता है और जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के वरिष्ठ नेता थे। वे साल 1981 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।

आरएस गवई, बाबासाहेब अंबेडकर के करीबी सहयोगी थे और नागपुर स्थित दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भी रहे। साल 1998 में वे रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अमरावती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 2006 से 2011 तक, जब केंद्र में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस वक्त वे बिहार, सिक्किम और केरल के राज्यपाल रहे।

साल 2009 में केरल के राज्यपाल रहते हुए आरएस गवई ने मुख्यमंत्री अच्युतानंदन की अगुवाई वाली राज्य कैबिनेट की सिफारिश को दरकिनार कर दिया और CBI को कम्युनिस्ट नेता और वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ SNC-लावालिन भ्रष्टाचार मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। उस समय केरल में कॉन्ग्रेस-UDF विपक्ष में थी। वहीं केंद्र की कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार ने राज्यपाल गवई के इस फैसले का स्वागत किया।

CJI भूषण रामकृष्ण गवई ने खुद बताया कि उनके पिता दादासाहेब गवई कॉन्ग्रेस पार्टी से 40 साल से भी ज्यादा समय तक जुड़े रहे। वे कॉन्ग्रेसस के समर्थन से सांसद और विधायक भी रहे। CJI गवई के भाई राजेंद्र गवई, जो रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, वे भी कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए हैं।

इधर कमलताई गवई के पत्र ने विवाद खड़ा कर दिया। कुछ दिन पहले CJI बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी से देशभर में नाराजगी फैली। यह मामला 16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने आया, जिसकी अध्यक्षता CJI गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह कर रहे थे।

याचिकाकर्ता राकेश दलाल, जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, ने अदालत में कहा कि मूर्ति की पुनर्स्थापना सिर्फ पुरातत्व का मामला नहीं है बल्कि यह आस्था, सम्मान और हिंदुओं के अपने देवी-देवताओं की संपूर्ण रूप में पूजा करने के मूल अधिकार से जुड़ा है।

लेकिन CJI गवई ने इस याचिका को खारिज करते हुए हिंदू आस्था को लेकर कुछ अनावश्यक और तंज भरी बातें कह दीं। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका है। जाओ, अब खुद भगवान से कहो कि कुछ करें। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो तो जाओ और प्रार्थना करो।”

लाल किले से RSS का जिक्र, भागवत के जन्मदिन पर विशेष लेख: PM मोदी ने ‘मन की बात’ में ध्वस्त किए संघ पर फैलाए गए सारे प्रोपेगेंडा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (28 सितंबर 2025) को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का जिक्र किया। यह पिछले करीब डेढ़ महीने में तीसरा मौका है जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से संघ की इस ऐतिहासिक उपलब्धि का जिक्र किया है।

यह इसलिए भी अहम हो जाता है कि लंबे समय से एक वर्ग विशेष यह धारणा बनाने की कोशिश करता रहा है कि मोदी सरकार और संघ के बीच मुद्दे पर मतभेद हैं। कभी कहा जाता है कि सरकार संघ की राय को दरकिनार करती है, तो कभी यह नैरेटिव दिया जाता है कि संघ और मोदी के बीच ‘दूरी’ बढ़ रही है।

दरअसल, पीएम मोदी और संघ का रिश्ता दशकों का है। वो बीजेपी में आने से पहले लंबे वक्त तक संघ के प्रचारक रहे थे। संघ और पीएम मोदी दोनों ही लंबे वक्त तक खुलकर एक-दूसरे को लेकर अपनी बात रखने से बचते रहे हैं लेकिन पिछले दिनों में पीएम मोदी ने साफ कर दिया है कि संघ और उनके बीच कोई दूरी नहीं है बल्कि आत्मीयता का रिश्ता है।

‘मन की बात’ में क्या बोले मोदी?

पीएम मोदी ने राष्ट्र निर्माण में संघ के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा, “इस बार विजयादशमी एक और वजह से बहुत विशेष है। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष हो रहे हैं। एक शताब्दी की ये यात्रा जितनी अद्भुत है, अभूतपूर्व है, उतनी ही प्रेरक है।”

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए देश की आजादी के साथ-साथ ये भी महत्वपूर्ण था कि देश वैचारिक गुलामी से भी आजाद हो। ऐसे में, परम पूज्य डॉ० हेडगेवार जी ने इस विषय में मंथन करना शुरू किया और फिर इसी भगीरथ कार्य के लिए उन्होंने 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की। डॉक्टर साहब के जाने के बाद परम पूज्य गुरु जी ने राष्ट्र सेवा के इस महायज्ञ को आगे बढ़ाया।”

पीएम मोदी ने कहा, “त्याग और सेवा की भावना और अनुशासन की सीख यही संघ की सच्ची ताकत है। आज RSS सौ वर्ष से बिना थके, बिना रुके, राष्ट्र सेवा के कार्य में लगा हुआ है। इसीलिए हम देखते हैं, देश में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आए, RSS के स्वयंसेवक सबसे पहले वहाँ पहुँच जाते हैं।”

मोहन भागवत के जन्मदिन पर PM मोदी ने लिखा लेख

पीएम मोदी ने बीते 11 सितंबर को RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत के जन्मदिन पर एक लंबा लेख लिखा था। इसके साथ ही उन्होंने उन सारी अफवाहों को विराम दे दिया जो उनके और मोहन भागवत के कथित मतभेदों को लेकर उड़ाई जाती थीं।

इस लेख में पीएम मोदी ने लिखा था, “भागवत जी का पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाला रहा है। उन्होंने कई वर्षों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों, विशेषकर विदर्भ में काम किया। अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख के रूप में मोहन भागवत जी के कार्यों को आज भी कई स्वयंसेवक स्नेहपूर्वक याद करते हैं। इसी कालखंड में मोहन भागवत जी ने बिहार के गांवों में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिताए और समाज को सशक्त करने के कार्य में समर्पित रहे।”

उन्होंने लिखा था, “हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमारे पास मोहन भागवत जी जैसे दूरदर्शी और परिश्रमी सरसंघचालक हैं, जो ऐसे समय में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक की उनकी जीवन यात्रा उनकी निष्ठा और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती है।”

लाल किले से RSS का जिक्र

पीएम मोदी ने बीते 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए RSS की खूब तारीफ की थी। यह उनके प्रधानमंत्री काल में पहला अवसर था जब उन्होंने लाल किले से संघ का जिक्र किया था। पीएम मोदी ने ‘गर्व के साथ’ संघ का जिक्र किया था।

पीएम मोदी ने कहा था, “आज से 100 साल पहले एक संगठन का जन्म हुआ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, 100 साल की राष्ट्र की सेवा, एक बहुत ही गौरवपूर्ण स्वर्णिम पृष्ठ है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को लेकर के 100 साल तक मां भारती का कल्याण का लक्ष्य लेकर के स्‍वयंसेवकों ने मातृभूमि के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किया है।”

पीएम मोदी ने कहा था, “सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन, यह जिसकी पहचान रही है, ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का यह सबसे बड़ा एनजीओ है। मैं लाल किले के प्राचीर  से 100 साल की इस राष्ट्र सेवा की यात्रा में योगदान करने वाले सभी स्वयंसेवकों को आदरपूर्वक स्‍मरण करता हूँ।”

इसके अलावा मार्च 2025 के आखिर में पीएम मोदी नागपुर स्थित संघ के मुख्यालय पहुँचे थे और वहाँ जाकर उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि भी अर्पित की थी। इसके बाद अप्रैल के आखिर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री आवास जाकर PM मोदी से लंबी मुलाकात भी की थी। इसके बाद देशभर में जातीय जनगणना का एलान किया गया था।

PM मोदी के हालिया विचारों से साफ है कि ना तो उनके व संघ के बीच और ना ही सरकार व संघ के बीच कोई खाई है। इसके विपरित यह रिश्ता विचारधारा और समर्पण के भरोसा की बुनियाद पर बना है।

आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब PM मोदी द्वारा RSS की प्रशंसा यह भी दिखाती है कि विचारधार की शक्ति और सामाजिक संगठन एक राष्ट्र को मजबूत करने के लिए कितने जरूरी है। RSS यही ताकत भारत को प्रदान कर रहा है।

RSS की स्थापना 1925 में डॉ. हेडगेवार ने की थी और बीते 100 वर्षों में संगठन ने बिना किसी औपचारिक राजनीतिक पहचान के समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्यों को अपना लक्ष्य बनाया है और इसी के साथ आगे बढ़ रहा है। PM मोदी के ये संदेश स्पष्ट करते हैं कि विरोधी कितना भी प्रोपेगेंडा कर लें उनका और संघ का रिश्ता जो दशकों पुराना है, वो ऐसे ही अनवरत आगे बढ़ता रहेगा।

रीवा में सड़क पर मिला गाय का कटा सिर, अकबरी बेगम बोली- ‘₹100 में होती है गो मांस की होम डिलीवरी’: स्थानीय लोगों का हंगामा, मोहम्मद इस्माइल समेत 2 लोग पकड़े गए

मध्य प्रदेश के रीवा में शनिवार (27 सितंबर 2025) देर रात बिछिया थाना क्षेत्र के लक्ष्मण बाग मोहल्ले में एक अजीब और डराने वाली घटना सामने आई है। मोहल्लेवासियों को बीच सड़क पर एक गाय का कटा हुआ सिर मिला।

सुबह होते ही गुस्साए लोगों ने सिर सड़क पर रखकर चक्का जाम कर दिया और आरोपितों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग उठाई। स्थानीय लोगों का कहना है कि 27 सितंबर की रात दो अज्ञात व्यक्ति पहले इलाके में रेकी करते दिखाई दिए थे।

कुछ लोगों ने बताया कि वे संदिग्ध रात में मोहल्ले के आस-पास घूमते हुए देखे गए थे। सुबह मोहल्ले में घूमने वाली गाय गायब पाई गई और बाद में उसका कटा हुआ सिर मिला। जिसके बाद लोगों ने कार्रवाई की माँग करते हुए सड़क पर गाय का कटा हुआ सिर रख कर सड़क जाम कर दिया।

स्थानीयों लोगों ने बताया कि इलाके में कई बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं, इसलिए लोग पहले से ही सतर्क थे और संदिग्ध गतिविधि पर ध्यान दे रहे थे। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि रात में मोहल्ले में घूमते हुए लोगों को देखा गया और बाद में CCTV फुटेज चेक करने पर कुछ अज्ञात शख्स संदिग्ध लग रहे थे।

एक वीडियो में तो गाय संदिग्धों से डरकर भागती हुई नजर आ रही हैं, जिसे स्थानीय निवासी विशाल सिंह परिहार ने ऑपइंडिया के साथ साझा की।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है और आरोपितों की तलाश में जुटी है। ऑपइंडिया के पास मौजूद मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, घटना वाले दिन ही अज्ञात आरोपितों के खिलाफ बीएनएस की धारा 196(2), 299 और 365, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) और मध्य प्रदेश गोवंश वध प्रतिषेध नियम 2004 की धारा 6/9 के तहत FIR दर्ज की गई है।

रीवा के मुख्य पुलिस अधीक्षक राजीव पाठक ने मौके का जायजा लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ कड़ी और जल्द कार्रवाई की जाएगी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर रही है ताकि आरोपितों की पहचान की जा सके।

बिछिया थाने की एसएचओ, मनिधा उपाध्याय ने बताया कि पुलिस लगातार आरोपितों की तलाश कर रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लोगों से सहयोग करने और शांति बनाए रखने की अपील की है। इस बीच, पुलिस ने मामले में दो लोगों मोहम्मद इस्माइल और एक नाबालिग को हिरासत में लिया है।

विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता बालकृष्ण द्विवेदी ने कहा, “हमारी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। अगर प्रशासन ने आरोपितों को जल्दी गिरफ्तार नहीं किया तो बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।”

घटना के बाद एक स्थानीय महिला अकबरी बेगम ने बताया कि उनके झोपड़ियों तक 100-200 रुपए में गोमांस पहुँचाया जाता है। पुलिस फिलहाल मामला दर्ज कर CCTV फुटेज, स्थानीय बयानों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जाँच कर रही है।

दुर्गा पंडाल में कहीं ‘काबा-मदीना’ तो कहीं ‘ईसा मसीह’, उस दिन से डरो सेकुलरों जब धैर्य की प्रतीक्षा खत्म होगी

कभी आपने सुना की सेक्युलरिज्म के नाम पर किसी मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया हो। कभी ये सुना है कि मुस्लिमों के किसी मजहबी जुलूस में भगवान राम या कृष्ण के नाम की जय-जयकार की गई हो। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि सेक्युलरिज्म के नाम पर सारे प्रयोगों की ठेकेदारी हिंदू त्योहारों की ही है।

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कला-संस्कृति से लेकर आधुनिकता और विविधता पर हिंदुओं के त्योहारों पर तमाम तरह के प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हिंदुओं के हर त्योहार से पहले या उनके दौरान पानी में कंकड़ मारकर यह परखा जाता है कि हिंदुओं की सहनशीलता कितनी है, वे कहाँ तक बर्दाश्त कर सकते हैं।

इसे अब कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं, इन दिनों नवरात्रि चल रही हैं और देशभर में दुर्गा पंडाल लगे हैं। कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी एक पंडाल में पहुँची, साथ में मदन मित्रा समेत पार्टी के अन्य नेता भी थे। पंडाल में जाकर पूजा-अर्चना करनी चाहिए थे लेकिन हुआ क्या?

मदन मित्रा ने दुर्गा पंडाल में ‘मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है’ गाना शुरू कर दिया। जाहिर है, दुर्गा पंडाल में इसे गाए जाने का कोई मतलब, कोई तुक नहीं है। ऐसे में ममता को अपने नेता को रोकना चाहिए था लेकिन वो क्या कर रही थीं? वो अपने नेता के इस गीत पर ताली बजा रही थीं। यह सब तमाशा खुद को सेक्युलर दिखाने के लिए किया जा रहा है।

अब सोचिए, ममता बनर्जी और उनके नेता ने जो किया अगर वही काम किसी अन्य मजहब के कार्यक्रम में हुआ होता तो क्या होता, क्या पूरे देश में हंगामा खड़ा नहीं हो गया होता? क्या सेक्युलरिज्म के सूरमा सड़कों पर नहीं आ गए होते?

ये हुआ बस एक उदाहरण, एक और देखिए, झारखंड की राजधानी राँची में तो बात इससे भी आगे बढ़ गई, वहाँ दुर्गा पूजा पंडाल को ही ‘वेटिकन सिटी’ की थीम पर बना दिया गया। सेक्युलरिज्म में कमी ना रह जाए इसलिए इस पंडाल में बाकायदा ईसा मसीह की मूर्तियाँ और क्रॉस तक लगाए गए थे।

और आगे बढ़िए, कर्नाटक में दशहरे के उत्सव की शुरुआत करने के लिए एक मुस्लिम महिला बानू मुश्ताक को बुलाया गया। मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।

कभी आपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या यह हिंदुओं के पर्व को किसी और धर्म के चेहरों से जोड़ने की सोची-समझी कोशिश नहीं लगती है? क्या यह हिंदुओं की परंपराओं के साथ प्रयोग नहीं है?

ऐसी प्रयोगधर्मिता गरबा में भी नजर आती है, गरबा में मुस्लिम युवकों को प्रवेश मिल जाए, इसका माहौल एक जमात द्वारा बनाया जा रहा है। जो लोग इन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

अब इसके उल्ट दूसरी स्थिति देखिए, गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ का वॉट्सऐप स्टेटस लगाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक युवक की पिटाई कर दी। यानी आप उनके ‘I Love Muhammad’ जैसा कुछ करने की कोशिश करेंगे तो आप मारे-पीटे जाएँगे। यही नए जमाने का सेक्युलरिज्म है।

इन सारी चीजों को क्रमवार देखने पर लगता है कि यह स्वत: नहीं हो रहा है। बल्कि यह एक चाल है, पहले धीरे-धीरे हिंदुओं की आस्था पर चोट करो, उनकी सीमा जाँचो, उनकी प्रतिक्रिया को तौलो और फिर अगला कदम बढ़ाओ।

हिंदुओं से उम्मीद की जाती है कि वे हमेशा चुपचाप सब सह लें। उन्हें हमेशा समझौता करना है, हमेशा दूसरों को जगह देनी है, हमेशा अपने त्योहारों-परंपराओं को बदलने की आदत डालनी है।

इस मानसिकता को अब बदलने जाने की जरूरत है। हिंदू अगर चुप रहेंगे तो यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। हर बार नए प्रयोग होंगे, हर बार नई चोट लगेगी और धीरे-धीरे पूरी आस्था खोखली कर दी जाएगी। शायद कुछ लोगों की कोशिश भी यही है।

विदेशी चंदा, करोड़ों की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप: सरकार से पारदर्शिता की माँग करने वाले सोनम वांगचुक खुद कितने साफ?

लद्दाख में अस्थिरता के बीच सोनम वांगचुक पर गंभीर आरोप, असली जनआंदोलन और राजनीतिक हेरफेर के बीच की रेखाएँ धुँधली होने का खतरा।

लद्दाख में जारी अशांति ने अब एक नया और चिंताजनक मोड़ ले लिया है। जिस समय यह क्षेत्र पहले से ही तनाव और हिंसक झड़पों के कारण अशांत है, उसी समय कुछ ऐसे आरोप सामने आए हैं, जो इसकी राजनीतिक और सामाजिक दिशा को बदल सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनोवेटर और पर्यावरणविद् के रूप में पहचाने जाने वाले सोनम वांगचुक, जिन्हें लद्दाख के आंदोलनों का चेहरा माना जाता है, अब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के केंद्र में हैं।

आंदोलन की आड़ में भावनाओं से खिलवाड़- बीजेपी

भाजपा के शीर्ष सूत्रों द्वारा लगाए गए ये आरोप महज गड़बड़ी का मामला नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देते हैं कि वांगचुक ने आंदोलन की आड़ में जनता की भावनाओं को भड़काकर निजी और संगठनात्मक हित साधने का प्रयास किया। सबसे बड़ा और ताज़ा घटनाक्रम गृह मंत्रालय का वह निर्णय है, जिसमें उसने सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।

यह फैसला विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act), 2010 के तहत कई गंभीर उल्लंघनों के बाद लिया गया। यह कोई साधारण प्रशासनिक कदम नहीं है- इसका सीधा असर SECMOL की विदेशी चंदा प्राप्त करने की वैधता पर पड़ा है। इसके अलावा, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी जाँच शुरू कर दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं विदेशी चंदा का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। जाँच से जो आँकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।

संस्थाओं के फंडिंग में गड़बड़ी और नियम तोड़ना

सोनम वांगचुक की प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के फंडिंग में अचानक से होने वाली बढ़ोतरी देखी गई। वित्तीय वर्ष 2023-24 में जहाँ यह राशि 6 करोड़ रुपए थी, वहीं अगले वर्ष यह बढ़कर 15 करोड़ रुपए से अधिक हो गई। पहली नजर में इसे जनता के बढ़ते समर्थन का नतीजा माना जा सकता है, लेकिन जाँच एजेंसियों का दावा है कि यह वित्तीय प्रवाह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है।

HIAL से जुड़े सात बैंक खातों में से चार खाते कथित रूप से घोषित नहीं किए गए। और भी गंभीर बात यह है कि इस संस्था ने 1.5 करोड़ रुपए से अधिक विदेशी पैसा बिना FCRA रजिस्ट्रेशन के प्राप्त की, जो कि कानून की धारा 11 का सीधा उल्लंघन है।

9 बैंक खातों में से 6 की अधिकारियों को जानकारी नहीं

गड़बड़ी यहीं तक सीमित नहीं है। SECMOL के पास कुल नौ बैंक खाते बताए जा रहे हैं, जिनमें से छह खातों को अधिकारियों से छिपाया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं सुनियोजित तरीके से वित्तीय लेन-देन को छुपाने का प्रयास तो नहीं हुआ।

इसके साथ ही एक निजी कंपनी शेष्योन इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड (SIPL) भी जाँच के दायरे में आई है, जिसमें सोनम वांगचुक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। आरोप है कि HIAL से इस निजी कंपनी में 6.5 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और फंड के दुरुपयोग के सवाल खड़े हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस कंपनी का शुद्ध लाभ (Net Profit) एक वर्ष में 6.13% से गिरकर सिर्फ 1.14% रह गया, जिससे संदेह और गहरा हो गया कि कहीं धनराशि को गलत तरीके से बाहर तो नहीं निकाला गया।
सबसे गंभीर आरोप सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति पर हैं।

सोनम वांगचुक ने ₹2.3 करोड़ विदेश भेजा

भाजपा सूत्रों का कहना है कि उनके पास कुल 9 व्यक्तिगत बैंक खाते हैं, जिनमें से 8 खातों का खुलासा नहीं किया गया। इन खातों में ज्यादा संख्या में विदेशी पैसा आने का दावा किया गया है। और भी चिंताजनक बात यह है कि 2021 से अब तक सोनम वांगचुक ने 2.3 करोड़ रुपए से अधिक की पैसा विदेश भेजी, जिनके प्राप्तकर्ताओं की पहचान ‘अज्ञात संस्थाओं’ के रूप में बताई जा रही है।

यह सीधे तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका पैदा करता है। विडंबना यह है कि सोनम वांगचुक अक्सर कॉरपोरेट जगत और सरकारों की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन आरोप है कि उनकी संस्थाओं ने सरकारी उपक्रमों (PSUs) और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में CSR (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड प्राप्त किए हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह उनके सार्वजनिक बयानों और निजी कार्यों के बीच भारी विरोधाभास को उजागर करेगा।

इन आरोपों के असर बहुत दूरगामी हो सकते हैं। अब तक लद्दाख के आंदोलन को एक जमीनी स्तर का संघर्ष माना जाता था, जो स्थानीय लोगों की स्वायत्तता (खुद निर्णय लेने वाले), पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान की माँगों पर आधारित था। लेकिन अगर ये वित्तीय अनियमितताएँ साबित हो जाती हैं, तो यह आंदोलन एक व्यक्ति के निजी लाभ और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बनकर रह जाएगा। इसका सीधा नुकसान लद्दाख के आम लोगों की वैध माँगों को होगा, जो कमजोर पड़ सकती हैं।

यह भी सच है कि आरोप और सच्चाई में फर्क होता है। सोनम वांगचुक का काम और योगदान, विशेषकर शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में, अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकार और उद्योगों से पारदर्शिता की माँग करता है, तो उसे स्वयं भी उतनी ही पारदर्शिता दिखानी चाहिए। CBI की जाँच के परिणाम दो कहानियों में से एक को सामने लाएँगे या तो यह एक दूरदर्शी नेता के खिलाफ राजनीतिक साजिश का मामला होगा, या फिर एक आंदोलनकारी नेता के मुखौटे के पीछे छिपे वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश होगा।​ लद्दाख और देश की जनता को अब सत्य की प्रतीक्षा है, क्योंकि यही सच न केवल सोनम वांगचुक की छवि बल्कि लद्दाख के भविष्य को भी निर्धारित करेगा।

8 महीने में 3 महासागर, 4 महाद्वीप और 3 ग्रेटकैप को किया पार, 50000KM की समुद्री परिक्रमा कर रचा कीर्तिमान: जानिए कौन हैं लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और रूपा, जिन्हें PM ने किया सलाम

प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात के 126वें एपिसोड में नौसेना के दो जांबाज महिला अधिकारियों का जिक्र किया है। ये हैं लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा। ये पाल नौकायन से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली भारत और एशिया की पहली इंसान हैं।

दुनिया की पहली महिलाएँ हैं, जिन्होंने छोटी-सी नौका से पूरी दुनिया के चक्कर लगाए। इनके उत्साह, लगन, मेहनत की तारीफ करते हुए पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ के माध्यम से दोनों महिलाओं के साथ संवाद किया। इस दौरान दोनों नेवी की अधिकारियों ने अपने अद्भुत यात्रा का अनुभव साझा किया।

लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना कौन है

नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना (logistics) लोजिस्टिक्स कैडर से हैं। 2014 में वह इंडियन नेवी में अफसर बनीं थी। केरल की कोझिकोड की रहने वाली दिलना के पिता देवदासन भी आर्मी में जवान थे। लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना को सेना में जाने की प्रेरणा उन्हीं से मिली। उनकी माता कुशल गृहणी हैं और पति इंडियन नेवी में ही अधिकारी हैं। यहाँ तक कि एनसीसी से जुड़ी हुई हैं।

लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा को जानिए

लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा इंडियन नेवी से 2017 में जुड़ी। उन्होंने नौसेना आयुध निरीक्षण (armament inspection) कैडर ज्वाइंन किया। रूपा के पिता अलागिरीसामी जीपी तमिलनाडु के हैं, जबकि माँ पुद्दुचेरी की हैं। पिता एयरफोर्स में थे, वहीं से डिफेंस में आने की प्रेरणा मिली। जबकि माँ कुशल गृहणी हैं।

दुनिया की परिक्रमा करने वाली दिलना और रूपा का कहना है कि जिंदगी में ऐसा मौका सिर्फ एक बार मिलता है, जो जिंदगी बदल देती है। (circimnavigation) पूरे संसार की जल से यात्रा एक ऐसा अवसर था, जो इंडियन नेवी और भारत सरकार ने दिया।

जल यात्रा से पहले की तैयारियाँ

लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा और लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना ने पूरे संसार की जलयात्रा करने के दौरान 47500 किलोमीटर समुद्र में यात्रा की। 2 अक्टूबर 2024 को गोवा से दोनों निकलीं और 29 मई 2025 को वापस आई। यानी पूरे 238 दिन लगे। उस नौका में सिर्फ ये दोनों थीं। इस यात्रा की तैयारी दोनों ने 3 साल पहले शुरू कर दी थी। इसके लिए मार्गदर्शन से लेकर कम्यूनिकेशन डिवाइस को कैसे ओपरेट करना है, गोताखोरी कैसे करते हैं और बोट में कुछ भी इमरजेंसी हो, जैसे मेडिकल इमरजेंसी तो कैसे मैनेज करना है, इन सबकी ट्रेनिंग इंडियन नेवी से ली थी।

नौका में सिर्फ दोनों थीं और दोनों को एक साथ मेहनत करना पड़ता था। वहाँ बोट रिपेयर से इंजन मेकेनिक तक के काम मिल कर करती थीं। वो नौका में आई तकनीकी खराबी से लेकर मेडिकल एसिस्टेंट, कुक, क्लिनर, ड्राइवर, मार्गदर्शक और सबकुछ वही एक दूसरे के लिए थीं। इसके लिए इंडियन नेवी ने ट्रेनिंग में सबकुछ सिखाया था।

‘प्वांइट निमो’ पर फहराया तिरंगा

लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा प्वाइंट निमो (point Nemo) तक गईं और भारत का झंडा फहराया। ‘प्वाइंट निमो’ दुनिया की सबसे दूरतम जगह (remolest location) है जो दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इस जगह के सबसे नजदीक कोई इंसान है तो वह इंटरनेशनल स्पेस सेंटर में है। वहाँ से नजदीक अगर कोई जमीन है, तो वह करीब 2,688 किलोमीटर दूर है। इसका नाम लैटिन शब्द “निमो” से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘कोई नहीं’। एक पाल नौका से इस प्वाइंट तक पहुँचने वाला पहला भारतीय, पहला एशियन और दुनिया का पहला इंसान बनने का मौका भारत की इन दो नेवी की महिला अधिकारियों को मिला।

समुद्री यात्रा के दौरान चुनौतियाँ

लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा पिछले 5 सालों से एक-दूसरे को अच्छी तरह जानती हैं। तीन सालों तक साथ में ट्रेनिंग लीं है। जब यात्रा शुरू हुई तो छोटे से नौका में दोनों गोवा से समुद्र की लंबाई मापने निकलीं और वह भी 17 मीटर लंबी और 5 मीटर चौड़ी अपनी छोटी सी पाल नौका ‘आईएनएसवी तारिणी’ से।

कभी- कभी कुछ लहरें तीन मंजिला मकान जितनी ऊँची आती थी, तो कभी हवा रुक जाती और नौका नीचे चली जाती। कभी बहुत ज्यादा गर्मी और कभी बहुत ज्यादा सर्दी, हर तरह की परिस्थितियों का इनदोनों ने मिलकर सामना किया। दोनों एक-दूसरे के सहारे थे, कभी हँस कर एक दूसरे को मोटिवेट करते तो कभी एक-दूसरे का संबल बनते। एक दूसरे की मजबूती और कमजोरियों से दोनों वाकिफ थीं, इसलिए कोई भी दिक्कत आ जाए, टीम वर्क कभी फेल नहीं हुआ।

घने अंधेरे में मशीन ने दिया धोखा

एक बार घने अंधेरे में जीपीएस, ऑटोपायलट और हवा की दिशा बताने वाला नेविगेशनल पैनल अचानक काम करना बंद कर दिया। प्रशांत महासागर के बीचो बीच इन्हें लगा जैसे ये समुद्र में खो गए। मदद की उम्मीद करना बेकार था, क्योंकि कोई भी मदद 4-5 दिनों से पहले नहीं मिल सकती थी। दोनों ने मिलकर अपने सिस्टम को 3 घंटे की कड़े मेहनत के बाद ठीक किया और आगे बढ़ीं
समुद्र के माउंट एवरेस्ट यानी केप हॉर्न को पार किया

यात्रा के दौरान पहली रात में केप हॉर्न को पार किया। ये समुद्र का माउंट एवरेस्ट कहलाता है। यहाँ मौसम कभी भी खराब हो सकता है। समुद्र में काफी उथल-पुथल मचा रहता था। बड़ी बड़ी लहरें इससे टकराती है। पूरा समुद्र सफेद झाग से भरा रहता है। इस दौरान कई बार पॉल की रॉड पानी से टकरा गई और नौका एक तरफ झुक गई। ट्रेनिंग इस वक्त काफी काम आया और दोनों ने इसे पार किया। समुद्र का ऐसा रौद्र रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। ऐसा लग रहा था कि पहाड़ों पर नौका चल रही है और फिर घाटियों में उतर रही है।

खराब मौसम और शरीर पड़ा सुन्न

यात्रा में बहुत सारी विपरीत परिस्थितियाँ थी। खास कर दक्षिणी सागर में हमेशा मौसम खराब रहता हैं। इस दौरान तीन तूफानों का सामना करना पड़ा।
57 डिग्री दक्षिण की ओर जाने पर तापमान 2 डिग्री तक पहुँच गई। शरीर सुन्न पड़ गए। इस दौरान नौका में एक छेद हो गया, जिससे पानी अंदर आने लगा। इससे कई इलेक्ट्रिकल उपकरण खराब हो गया और शॉर्ट सर्किट हो गया। इसे ठीक करने में काफी वक्त लगा।

अंटार्कटिका में नौकायन के दौरान 1 डिग्री तापमान और 90 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आ रही हवा, दोनों का सामान एक साथ करना पड़ा। इससे बचने के लिए 7 लेयर वाली कपड़े पहने थे। पूरे दक्षिणी सागर में नौकायन के दौरान इसे पहनना पड़ा। कभी-कभी गैस स्टोव को लेकर हाथ गरम करना पड़ा।

कभी कभी ऐसी परिस्थिति भी आई थी जब हवा बिल्कुल भी नहीं चलता था। नौका पूरी तरह नीचे करके drift होता रहता था। इस वक्त सब्र की काफी जरूरत होती है।

सबसे यादगार पल रहा Comet A3 देखना

दोनों कमांडर कहती हैं कि दुर्लभ धुमकेतु Comet A3 देखना उनके लिए सबसे अद्भुत पल था। ये करीब 80000 साल बाद आता है। इसे दोनों ने एक हफ्ते तक आसमान में इसे चमकते देखा और मोबाइल के कैमरे में कैद किया। इसको लेकर दोनों काफी उत्साहित दिखीं। समुद्र से दिख रहा नीला आसमान और उसमें अद्भुत खगोलीय नजारा देखने का मौका मिलने पर ये ईश्वर को भी धन्यवाद कर रही हैं।

यात्रा में 4 जगहों पर रुकी नौका

पूरे 8 महीने में 4 जगहों पर नौका रूकी थी। ये जगह हैं- ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और पोर्ट स्टेनली। हर एक जगह पर 14 दिनों तक ये रुकी थीं। इस दौरान पूरी दुनिया में इनलोगों ने भारतीय को देखा। लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना का कहना है कि भारतीय हर जगह बहुत एक्टिव और आत्मविश्वास से भरे मिले। भारत का नाम रौशन कर रहे हैं। हमारी जो सफलता है वो उसे अपनी सफलता मानते हैं।

लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा का कहना है कि हर जगह उन्हें अलग-अलग अनुभव मिला। जैसे ऑस्ट्रेलिया में, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया पार्लियामेंट के स्पीकर ने मुलाकात की। उन्होंने काफी मोटिवेट किया। वहीं न्यूजीलैंड में माउरी लोगों ने स्वागत किया। उनके मन में भारतीय संस्कृति को लेकर काफी इज्जत था।

पोर्ट स्टेनले एक रिमोट आइसलैंड है, जो दक्षिण अमेरिका के पास है। वहाँ पर जनसंख्या मात्र 3500 है। लेकिन वहाँ हमने एक मिनी इंडिया देखा। वहाँ 45 भारतीय थे। उन्होंने अपने जैसा समझा और वहाँ घर जैसा महसूस हुआ।

देश का नाम रौशन करें बेटियाँ- लेफ्टिनेंट रूपा

पीएम मोदी ने जब पूछा कि देश के बेटियों के लिए क्या कहना चाहेंगी, तो लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ने कहा कि अगर दिल लगाकर मेहनत किया जाए, तो इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। वहीं लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना का कहना है कि आप कहाँ से हैं, कहाँ पैदा हुए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम चाहते हैं कि भारत के युवा और महिलाएँ बड़े-बड़े सपने देखें और भविष्य में महिलाएँ बड़ी संख्या में डिफेंस ज्वाइंन करें। स्पोर्ट्स और एडवेंचर में शामिल हों और देश का नाम रौशन करें।

पीएम मोदी ने देश की इन दो बेटियों से कहा कि निश्चित तौर पर आप दोनों की मेहनत, सफलता और एचिवमेंट देश के युवाओं और युवतियों को प्रेरित करेगी। देश का झंडा तिरंगा इसी तरह लहराते रहिए।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले दक्षिण अमेरिका के दौरे पर राहुल गाँधी, ‘पार्ट टाइम राजनेता’ वाली छवि पर उठे सवाल: जानें अहम मौकों पर कॉन्ग्रेस नेता की विदेश यात्राओं का इतिहास

लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस के सांसद राहुल गाँधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। इस बार वे दक्षिण अमेरिका के चार देशों का दौरा करेंगे। कॉन्ग्रेस का कहना है कि इस यात्रा के दौरान उनका उद्देश्य राजनीतिक नेताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और व्यापारिक समुदाय से मुलाकात करना है।

कॉन्ग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के अनुसार, राहुल गाँधी ब्राजील और कोलंबिया जाएँगे। वहाँ वे विश्वविद्यालयों में छात्रों को संबोधित करेंगे, राष्ट्रपति और शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे और व्यापार और तकनीक जैसे मुद्दों पर व्यवसायियों से बातचीत करेंगे।

कॉन्ग्रेस ने इस दौरे को दक्षिण अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। खासकर जब भारत और दक्षिण अमेरिका के बीच गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और ग्लोबल साउथ के जरिए ऐतिहासिक संबंध भी रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी इस यात्रा को लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझेदारी बनाने के प्रयास के रूप में पेश कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर फिर से देश में सवाल खड़े हो रहे हैं।

बिहार चुनाव नजदीक आने पर विदेश यात्रा

लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गाँधी देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं और न ही किसी सरकारी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं। फिर भी, इसके बावजूद वे विदेशों में भाषण देने की भूमिका निभा रहे हैं और वो भी ऐसे समय में जब बिहार में महत्वपूर्ण चुनाव नजदीक है।

इस पर आलोचना भी हो रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ गलत हैं। एक जिम्मेदार नेता इतने बड़े चुनाव से पहले, अपना समय चुनाव की रणनीति बनाने, जनता से संपर्क करने और अपने दल को मजबूत करने में लगाता लेकिन राहुल गाँधी ने एक और विदेशी यात्रा को चुना है।

विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्रों से मिलने का उनका निर्णय भी सवालों के घेरे में है। वे न तो कोई शैक्षणिक विशेषज्ञ हैं और न ही किसी विषय के जानकार, फिर भी उन्होंने छात्रों और विचारकों के साथ लेक्चर और बहसें तय की हैं। आलोचक कहते हैं कि कोलंबिया और ब्राजील में भाषण देने के बजाय उन्हें बिहार के मतदाताओं से मिलकर कॉन्ग्रेस की स्थिति मजबूत करनी चाहिए।

ऐसे वक्त पर फिर से वही आलोचना सामने आता है कि राहुल गाँधी राजनीति को गंभीरता से नहीं लेते और इसे पार्ट-टाइम काम की तरह देखते हैं, जबकि इसे पूर्णकालीन जिम्मेदारी की तरह संभालना चाहिए।

कुछ सप्ताह पहले मलेशिया में मौज करते हुए दिखे थे राहुल

इस धारणा को और मजबूत करता है उनका हालिया मलेशिया दौरा। इसी महीने की शुरुआत में राहुल गाँधी ने बिहार में अपनी तथाकथित ‘वोटर अधिकार यात्रा’ पूरी की थी। इसके बाद राजनीतिक संपर्क को आगे बढ़ाने के बजाय, यात्रा खत्म होते ही वे मलेशिया छुट्टियों पर चले गए।

उनकी यह यात्रा तब विवादों में आ गई, जब सोशल मीडिया पर उनकी लंगकावी, मलेशिया में छुट्टियाँ बिताते हुए तस्वीरें वायरल हुईं। भाजपा नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने उन पर एक बार फिर महत्वपूर्ण राजनीतिक समय में गायब होने का आरोप लगाया।

भाजपा IT सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने X पर लिखा, “राहुल गाँधी फिर से लापता हो गए, इस बार लंगकावी, मलेशिया में गुप्त छुट्टी पर। लगता है बिहार की राजनीति का दबाव कॉन्ग्रेस के युवराज के लिए ज्यादा था, इसलिए उन्हें आराम के लिए भागना पड़ा। या फिर यह कोई ऐसा गुप्त मीटिंग थी, जिसे किसी को पता नहीं होना चाहिए था। किसी भी तरह, जब लोग असली मुद्दों से जूझ रहे हैं, राहुल गाँधी गायब होने और छुट्टियाँ बिताने की कला में व्यस्त हैं।”

साथ ही, राहुल गाँधी की मलेशिया यात्रा को लेकर यह भी अटकलें थीं कि उन्होंने वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक से मिलने के लिए जा सकते हैं, जिन्होंने भारत छोड़ने के बाद मलेशियाई नागरिकता ले ली थी। एक X यूजर ने लिखा, “वे अपने गुरु जाकिर नाइक से मिलने मलेशिया गए हैं।”

बिहार यात्रा के तुरंत बाद की यह मलेशिया यात्रा इस बात को और पुष्ट करती है कि राहुल गाँधी राजनीतिक कार्यक्रमों को जैसे असाइनमेंट की तरह देखते हैं, जिन्हें जल्दी पूरा करके विदेश जाकर आराम करना जरूरी है।

राज्य चुनावों से पहले उज़्बेकिस्तान की गुप्त यात्रा

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने चुनावों से पहले विदेश यात्रा करना चुना हो। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने कई राज्यों में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले गुप्त रूप से भारत छोड़कर उज़्बेकिस्तान की यात्रा की थी।

जब वे वापस लौटे, तो मीडिया को इसके बारे में तब ही पता चला जब उन्हें दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देखा गया। उन्होंने यात्रा का उद्देश्य अभी तक सार्वजनिक नहीं किया। उनकी विदेश यात्राएँ अक्सर गोपनीयता में होती हैं और यह उनकी आदत जैसी बन गई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह का व्यवहार एक वरिष्ठ विपक्षी नेता के लिए ठीक नहीं है।

कॉन्ग्रेस के राजकुमार का चुनाव के दौरान विदेश जाने का इतिहास रहा है

राहुल गाँधी की आदत रही है कि वे चुनावी समय या तब भी विदेश यात्रा पर चले जाते हैं जब उनकी पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उन्हें पार्टी में संकट के दौरान विदेशी यात्राओं और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी दखल को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है।

उनका 2019 का बैंकॉक दौरा भी उतना ही विवादित रहा। उस समय भी वे चुनावों के बीच विदेश यात्रा पर निकल गए थे। उनकी विदेश यात्राओं पर उठने वाले सवाल बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि कई बार ऐसी यात्राओं के दौरान उनकी मुलाकात भारत विरोधी तत्वों से भी हुई है।

उदाहरण के लिए, 2023 में अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ से मुलाकात की। HfHR एक इस्लामी समूह है, जो भारत में हिंदुओं पर भेदभाव का आरोप लगाता है।

अप्रैल 2022 में, जब कॉन्ग्रेस को नेतृत्व की जरूरत थी और पार्टी में प्रशांत किशोर को शामिल करने की अटकलें थीं, राहुल गाँधी विदेश चले गए। इसके बाद जब प्रशांत किशोर ने कॉन्ग्रेस जॉइन करने से मना कर दिया, तो राहुल गाँधी लगभग 10 दिन अचानक गायब रहे, बिना किसी जानकारी दिए। इस दौरान, कॉन्ग्रेस को नेतृत्व के बिना ही काम करना पड़ा।

दिसंबर 2021 में, जब पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा तो राहुल गाँधी इटली की व्यक्तिगत यात्रा पर थे। उनकी यात्रा के कारण पंजाब में चुनावी गतिविधियों में बड़ी बाधा आई और अधिकांश रैलियाँ उनकी वापसी तक टाल दी गईं। यह यात्रा आम आदमी पार्टी की जीत और कॉन्ग्रेस की हार का कारण भी बनी।

सितंबर 2021 में, जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस मुश्किल में थी, गाँधी परिवार शिमला में छुट्टी मना रहा था।

दिसंबर 2020 में, कॉन्ग्रेस पार्टी के 136वें स्थापना दिवस के दौरान भी राहुल गाँधी इटली चले गए। इसी तरह अक्टूबर 2019 में, हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव से केवल 15 दिन पहले, वे बैंकॉक गए।

इसी तरह, 2019 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद वे नतीजों का इंतजार किए बिना लंदन छुट्टियाँ मनाने चले गए। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी माँ सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया।

इसके अलावा, राहुल गाँधी अक्सर विदेश यात्राओं के दौरान SPG सुरक्षा (विशेष सुरक्षा समूह) नहीं लेते थे और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते रहे। इसी वजह से सरकार ने उनकी SPG सुरक्षा वापस ले ली थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भी इस पर सवाल उठाए थे।

गलत प्राथमिकताओं को दिखाने वाला पैटर्न

बिहार चुनाव नजदीक हैं लेकिन राहुल गांधी का दक्षिण अमेरिका दौरा पुरानी आलोचनाओं को फिर से उभार रहा है। राजनीतिक समय बिहार में बिताने के बजाय वे विदेश में छात्रों और नेताओं से बातें कर रहे हैं जबकि उनकी पार्टी के लिए राज्य में बहुत कुछ दाँव पर है।

कई विशेषज्ञों के लिए यह उनकी प्राथमिकताओं की गलत दिशा को दर्शाता है। जब कांग्रेस पार्टी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक में अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, उसका नेता हजारों किलोमीटर दूर है। राहुल गाँधी का चुनावों से पहले विदेश चले जाने का यह पैटर्न उनके राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठाता है और यह भी कि क्या वे खुद को पूर्णकालिक नेता मानते हैं या नहीं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)