प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने SCO शिखर सम्मेलन से पहले द्विपक्षीय बैठक हुई। बैठक में पीएम मोदी ने कहा कि भारत आपसी रिश्तों को आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। पीएम मोदी ने कहा कि दोनों देशों का सहयोग 280 करोड़ की आबादी और मानवता के लिए जरूरी है।
पीएम मोदी ने कहा, “पिछले साल कज़ान में हमारी बहुत ही अच्छी बातचीत हुई थी जिससे हमारे रिश्तों में सुधार आया। सीमा पर सैनिकों की वापसी के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना है। सीमा प्रबंधन को लेकर हमारे विशेष प्रतिनिधियों के बीच समझौता हुआ है।”
पीएम नरेंद्र मोदी ने बैठक में यह भी कहा, “कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हो गई है। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी फिर से शुरू हो रही हैं। दोनों देशों के 280 करोड़ लोगों के हित हमारे सहयोग से जुड़े हैं। इससे पूरी मानवता के कल्याण का रास्ता भी खुलेगा।”
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी पीएम मोदी की बात पर सहमति जताते हुए कहा कि दोनों देशों का साथ आना जरूरी है।
पीएम मोदी ने शी जिनपिंग को दी बधाई
पीएम मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की चीन की सफल अध्यक्षता के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग को बधाई भी दी। साथ ही पीएम मोदी ने चीन आने के निमंत्रण और मुलाकात के लिए जिनपिंग को धन्यवाद भी दिया।
पीएम मोदी की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के फैसले से वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में हलचल मची हुई है।
मिजोरम को पहली बार एयरपोर्ट से सीधी रेलवे कनेक्टिविटी मिलने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 सितंबर 2025 को मिजोरम में बैराबी-सैरांग रेल लाइन का उद्घाटन करेंगे। यह 51.38 किलोमीटर लंबी लाइन बांग्लादेश-म्यांमार सीमा से जुड़ी है।
?Railways reach Mizoram after 78 years of Independence.
रिपोर्ट्स के अनुसार, आइजोल के लेंगपुई एयरपोर्ट से मात्र 25 किलोमीटर दूर बना रेलवे स्टेशन लोगों को बड़ी सहूलियत देगा। अभी तक पर्यटकों और यात्रियों के पास मिजोरम से असम जाने के लिए दो ही विकल्प थे, या तो सड़क से सीधे सिलचर जाना, या फिर बैराबी रेलवे स्टेशन तक सड़क से पहुँचकर वहाँ से ट्रेन लेना। अब यह परेशानी खत्म हो रही है, क्योंकि एयरपोर्ट और नया रेलवे स्टेशन एक ही रूट पर हैं और यह दूरी कुछ ही समय में तय की जा सकेगी।
51.38 किलोमीटर लंबी इस नई रेलवे लाइन पर सैरांग, मुआलखांग, कानपुई और हार्तकी चार नए स्टेशन बनाए गए हैं। राजधानी आइजोल से सबसे नजदीक सैरांग स्टेशन है, जो एयरपोर्ट से भी सबसे पास है। यहीं से ट्रेनें चलेंगी। मुआलखांग स्टेशन पर 13 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परियोजना का उद्घाटन करेंगे। यह स्टेशन पूरी तरह तैयार है और यहाँ दो हेलीपैड भी बनाए जा रहे हैं।
कानपुई स्टेशन पर काम अभी चल रहा है लेकिन यात्री सुविधाएँ पूरी रहेंगी, वहीं हार्तकी स्टेशन छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत है क्योंकि यह चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। इन चारों स्टेशनों के अलावा पहले से ही बैराबी स्टेशन मौजूद है, जो मिजोरम और असम की सीमा पर है। पहले यात्रियों को यहीं तक ट्रेन मिलती थी, अब वे सीधे सैरांग तक ट्रेन में सफर कर सकेंगे।
यह रेलवे ट्रैक तकनीकी और प्राकृतिक दोनों रूप से बेहद खास है। इसमें कुल 48 सुरंगें और 150 से ज्यादा पुल हैं। इस लाइन पर बना सबसे ऊँचा पुल 196 नंबर है, जिसकी ऊँचाई 104 मीटर है यानी यह कुतुबमीनार से भी 42 मीटर ऊँचा है।
बादलों से लिपटी घाटियाँ और हरे-भरे जंगलों के अद्भुत दृश्य देख पाएँगे यात्री
पूरी रेल लाइन में से 12.8 किलोमीटर की दूरी सुरंगों से होकर गुजरेगी। इन सुरंगों की दीवारों पर मिजोरम की संस्कृति, इतिहास, महिला सशक्तिकरण और पर्यटन स्थलों को खूबसूरत पेंटिंग्स के जरिए दर्शाया गया है।
विस्टाडोम कोच से सफर के दौरान यात्री बाँस, केले और सुपारी के पेड़ों से भरे पहाड़, बादलों से लिपटी घाटियाँ और हरे-भरे जंगलों के अद्भुत दृश्य देख पाएँगे। लंबी सुरंगों में शानदार लाइटिंग की गई है, जिससे यात्रा और भी रोमांचक हो जाती है।
इस रेल प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा फायदा समय और खर्च की बचत है। अभी तक बैराबी से आइजोल तक सड़क मार्ग से पहुँचने में 5 से 6 घंटे का समय और 1000 रुपए से ज्यादा खर्च होता था, लेकिन अब ट्रेन से यह सफर सिर्फ 1 से 1.5 घंटे में और लगभग 100 रुपये में पूरा होगा। यानी करीब 4 घंटे और 900 रुपये की सीधी बचत होगी।
इससे न सिर्फ यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि छोटे-बड़े व्यापार, टूरिज्म और लोकल इकोनॉमी को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। बैराबी से सैरांग तक इस 51.38 किलोमीटर की रेललाइन पर ट्रेन की स्पीड 110 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी। इसमें 55 बड़े और 87 छोटे पुल, 5 रोड ओवरब्रिज और 6 अंडरब्रिज शामिल हैं। इसकी कुल लागत 8071 करोड़ रुपए है।
इस प्रोजेक्ट के साथ अब पूर्वोत्तर भारत के चार राज्यों, असम (दिसपुर), त्रिपुरा (अगरतला), अरुणाचल प्रदेश (ईटानगर) और मिजोरम (आइजोल) की राजधानियाँ सीधे इंडियन रेलवे नेटवर्क से जुड़ गई हैं। इससे इन राज्यों के बीच समन्वय बढ़ेगा, व्यापार तेज होगा और आर्थिक ढाँचा मजबूत होगा। इससे लाखों लोगों को सीधा फायदा मिलेगा। यह मिजोरम के लिए ऐतिहासिक कदम है जो राज्य को देश के बाकी हिस्सों से और ज्यादा मजबूती से जोड़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुँचे हैं। जहाँ वे कई देशों के नेताओं के अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात करेंगे। इस मुलाकात से पहले ही यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने पीएम मोदी से रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर फोन पर बात की।
दोनों नेताओं ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर बात की। पीएम मोदी ने कहा कि भारत हर कदम पर यूक्रेन के साथ है। साथ ही पीएम ने जल्द शांति बहाली का आश्वासन भी दिया। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि भारत इस दिशा में सभी जरूरी सहायता उपलब्ध कराएगा।
यूक्रेन के राष्ट्रपति से बातचीत के बाद पीएम मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट किया। पीएम मोदी ने लिखा, “राष्ट्रपति जेलेंस्की के आज आए फोन कॉल के लिए धन्यवाद। हमने मौजूदा रूस-यूक्रेन संघर्ष, उसके मानवीय पहलुओं और शांति और स्थिरता लाने के प्रयासों पर चर्चा की। भारत इस दिशा में सभी प्रयासों का पूरा समर्थन करता है।”
Thank President Zelenskyy for his phone call today. We exchanged views on the ongoing conflict, its humanitarian aspect, and efforts to restore peace and stability. India extends full support to all efforts in this direction. @ZelenskyyUa
वहीं, जेलेंस्की ने अपने बयान में बातचीत की अधिक जानकारी साझा की। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बातचीत और रूस के साथ शांति वार्ता में शामिल होने के यूक्रेन के हाल ही की प्रयासों का जिक्र किया। साथ ही रूस के ताबड़तोड़ हमले के बावजूद रूसी राष्ट्रपति से मिलने के लिए यूक्रेन की रजामंदी के बारे में बताया।
जेलेंस्की ने आगे कहा, “अलास्का वार्ता को लगभग दो हफ्ते बीत चुके हैं और इस दौरान जब रूस को कूटनीति की तैयारी करनी चाहिए थी, मॉस्को ने कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिया है- केवल नागरिक ठिकानों पर निंदनीय हमले किए हैं और हमारे दर्जनों लोगों को मार डाला है। मैं प्रधानमंत्री को पीड़ितों के परिवारों और प्रियजनों के प्रति व्यक्त की गई उनकी संवेदनाओं के लिए धन्यवाद देता हूँ।”
I informed about the talks with President Trump in Washington with the participation of European leaders. It was a productive and important conversation, a shared vision among partners on how to achieve real peace. Ukraine… pic.twitter.com/fINVbncnlR
— Volodymyr Zelenskyy / Володимир Зеленський (@ZelenskyyUa) August 30, 2025
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने कहा, “शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन से पहले हमने अपनी स्थिति पर सहमति बना ली थी। इस युद्ध का अंत तुरंत युद्धविराम और शांति से होना चाहिए। सभी लोग इस बात को समझते हैं और समर्थन करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “जब हमारे शहर और समुदाय लगातार गोलाबारी में हों, तो शांति की बात करना मुश्किल है। भारत इस दिशा में जरूरी कदम उठाने और शिखर सम्मेलन के अलावा होने वाली बैठकों में रूस और अन्य नेताओं को सही संकेत देने के लिए तैयार है। धन्यवाद”
इसके अलावा जेलेंस्की और पीएम मोदी के बीच दोनों देशों के रिश्तों, यात्रा की तैयारियों और संयुक्त आयोग की बैठक के आयोजन पर बात हुई। जेलेंस्की ने जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा भी जताई है।
बता दें कि यह अगस्त 2025 में दूसरी बार है जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और पीएम नरेंद्र मोदी ने फोन पर बातचीत की है।
उधर पीएम नरेंद्र मोदी रविवार (31 अगस्त 2025) को चीन में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले हैं। इस दौरान पीएम चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। शिखर सम्मेलन के दौरान उनकी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात होने की उम्मीद है।
पश्चिम बंगाल में अगले साल चुनाव होने हैं और इसी बीच चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जैसे ही यह काम शुरू हुआ, बांग्लादेश सीमा से सटे मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में अफरातफरी मच गई।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ मुस्लिम बहुल इलाकों में हजारों लोग जन्म प्रमाण पत्र सुधारने, डिजिटलीकरण करवाने और नए सिरे से बनवाने के लिए नगर पालिकाओं, पंचायतों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
लोग खुलेआम दोगुनी कीमत पर स्टाम्प पेपर खरीद रहे हैं और वकीलों को भारी-भरकम फीस चुका रहे हैं। लोगों में इस बात का डर साफ है कि कहीं NRC या विशेष गहन संशोधन (SIR) लागू हुआ तो भारतीय होने का सबूत सिर्फ यही कागज देगा।
बरहामपुर और मुर्शिदाबाद में कतारों का सैलाब
बरहामपुर नगर पालिका का हाल ऐसा है की यहाँ रोजाना 10-12 आवेदन आते थे, अब अचानक यह संख्या 500-600 तक पहुँच गई है। लोग सुबह 7 बजे से लंबी-लंबी लाइनों में खड़े रहते हैं। नगर पालिका अध्यक्ष नारुगोपाल मुखर्जी मानते हैं कि हालात काबू से बाहर हैं।
फॉर्म संग्रह, सुधार, विलंबित नए जन्म प्रमाण पत्र और डिजिटलीकरण के लिए अलग-अलग कियोस्क बनाए गए हैं। लेकिन भीड़ इतनी है कि अधिकारी भी परेशान हैं। 65 साल के अबुल कासिम शेख अपने गाँव से 45 किलोमीटर दूर सिर्फ इसलिए आए हैं कि उनकी बेटी का 20 साल पुराना जन्म रजिस्ट्रेशन ‘लाल कागज’ से बदलकर डिजिटल सफेद प्रिंटआउट हो जाए। शेख कहते हैं, “गाँव में हर कोई यही कह रहा है कि लाल वाले की कोई कीमत नहीं, सफेद चाहिए।”
नौदा से आई समीरुन बीबी अपने दोनों बेटों के जन्म प्रमाण पत्र अपडेट करवाने पहुँची हैं। वे साफ कहती हैं, “हमें डर है कि कल NRC आ जाएगा और पहले हमारा वोटिंग राइट छीना जाएगा, फिर हमें बाहर निकाल देंगे। इसीलिए यह काम अभी निपटाना जरूरी है।”
अदालतों और वकीलों का धंधा चमका
जन्म प्रमाण पत्र सुधारने की भीड़ का सीधा फायदा वकीलों और बिचौलियों को हो रहा है। मुर्शिदाबाद कोर्ट के बाहर वकीलों के टेंट लगे हैं जहाँ रोजाना सैकड़ों हलफनामे तैयार हो रहे हैं। वकील सैयद रामी बताते हैं, “आमतौर पर मुझे हफ्ते में 10-12 स्टाम्प पेपर की जरूरत होती थी। पिछले हफ्ते 500 लिए और इस हफ्ते 600 से ज्यादा। लोग मेरे घर तक आधी रात को पहुँच जाते हैं।”
स्टाम्प पेपर की कीमत 10 रुपए से बढ़कर 20 रुपए हो चुकी है। वकीलों की फीस भी 150 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक पहुँच गई है। जिनके नाम, जन्मतिथि या माता-पिता के नाम आधार, वोटर कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र में मेल नहीं खाते, उन्हें कोर्ट का हलफनामा बनवाना पड़ रहा है।
पंचायतों और साइबर कैफे तक फैला असर
गाँव-गाँव की पंचायतों में भीड़ संभालना मुश्किल हो रहा है। कंडी के महालंडी पंचायत की अधिकारी सुवर्णा मरजीत बताती हैं कि रोज 70-80 लोग डिजिटलीकरण के लिए आते हैं और 20-30 लोग नए प्रमाण पत्र के लिए। लेकिन यह काम SDO या BMO ही कर सकते हैं। प्रधान साहेबा खातून का कहना है, “लोगों को डर है कि जन्म प्रमाण पत्र सही नहीं हुआ तो उन्हें सीधे बांग्लादेश भेज देंगे।”
इसी बीच, बिचौलिए भी सक्रिय हो गए हैं। जन्म प्रमाण पत्र में छोटे-मोटे सुधार के लिए 1000-2000 रुपए, बड़े बदलाव और गजट नोटिफिकेशन के लिए 4000-5000 रुपए तक वसूले जा रहे हैं। साइबर कैफ़े वाले भी पीछे नहीं 20 रुपए लेकर फॉर्म भरने तक का काम कर रहे हैं।
गरमाईराजनीति, गहराय लोगों का डार
ममता बनर्जी सरकार आरोप लगा रही है कि भाजपा मुस्लिमों को टारगेट करने के लिए SIR और NRC का डर फैला रही है। इसलिए सरकारी तंत्र को जन्म प्रमाण पत्र सुधारने और डिजिटलीकरण में झोंक दिया गया है। बरहामपुर और मुर्शिदाबाद में दर्जनों अधिकारी फील्ड पर तैनात हैं।
#WATCH | Patna, Bihar: TMC MP Kalyan Banerjee says, "The special intensive revision that is being done is nonsense. The Election Commission wants to help the BJP, that's why the names of all voters are being removed. We will fight together. Vote theft is happening across the… pic.twitter.com/FCOwAc5zmH
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, “यह जो विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) किया जा रहा है, वह पूरी तरह बकवास है। चुनाव आयोग भाजपा की मदद करने के लिए मतदाताओं के नाम हटा रहा है। हम सब मिलकर इसका मुकाबला करेंगे। वोटों की चोरी पूरे देश में हो रही है और इसे रोकना जरूरी है। महाराष्ट्र और हरियाणा में उन्होंने यही किया, अब बिहार और बंगाल में भी वही चाल चल रहे हैं। लेकिन हम इसे हर हाल में रोकेंगे।”
वहीं, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का दावा है, “बंगाल में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज हैं। हम समय-समय पर चुनाव आयोग को सचेत करते रहे हैं। तृणमूल जानबूझकर दहशत फैला रही है।” लेकिन जमीनी हकीकत साफ है।
हजारों लोग जन्म प्रमाण पत्र के लिए लाइन में खड़े हैं, स्टाम्प पेपर और वकील की जेबें भर रही हैं और बिचौलिए पैकेज बेच रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया सच में नागरिकता साबित करने का आधार बनेगी या फिर आम जनता के खून-पसीने की कमाई लूटने का एक और जरिया?
अमेरिका और भारत के रिश्तों में पिछले कुछ हफ्तों में खटास देखने को मिली है। इसकी बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए बेतुके टैरिफ हैं। ट्रंप दावा कर रहे हैं कि भारत पर 50% फीसदी टैरिफ लगाने की वजह भारत द्वारा रूसी तेल खरीदा जाना है।
हालाँकि, रूसी तेल खरीदने और व्यापार को लेकर चीन पर टैरिफ ना लगाए जाने के बाद उन पर बार-बार सवाल उठ रहे थे। इसके अलावा वो लगातार यह दावा भी कर रहे हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर कराया है। अब न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में ट्रंप के भड़के होने का राज खुला है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप के रिश्तों में आई खटास की बड़ी वजह रूसी तेल नहीं बल्कि भारत का ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित ना करना है।
गौरतलब है कि ट्रंप ने जब भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम की बात कही थी तो उसके बाद पाकिस्तान ने उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित कर दिया था। पाकिस्तान की फौज के मुखिया आसिम मुनीर की व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात हुई थी और इसके कुछ दिनों बाद ही पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से ट्रंप को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया था।
रिपोर्ट में क्या है दावा?
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम मोदी से भी ट्रंप यही चाहते थे। रिपोर्ट में कहा गया है, “17 जून को हुई एक फोन कॉल में ट्रंप ने फिर वही बात (भारत-पाकिस्तान सीजफायर) छेड़ दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने सैन्य तनाव को खत्म कर दिया है।”
रिपोर्ट कहती है, “उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि पाकिस्तान उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने जा रहा है। कॉल से वाकिफ लोगों के अनुसार, इस बातचीत का सीधा-सा संकेत यह था कि मोदी को भी वही करना चाहिए।”
रिपोर्ट में लिखा है, “मोदी यह सुनकर तिलमिला गए। उन्होंने ट्रंप से साफ कह दिया कि हालिया युद्धविराम में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी। यह फैसला सीधे भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। ट्रंप ने मोदी की इस बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी लेकिन यह असहमति और नोबेल के मुद्दे पर मोदी का इनकार दोनों नेताओं के रिश्ते में आई खटास का बड़ा कारण बना था।”
न्यूयॉर्क टाइम्स का दावा है कि उसकी रिपोर्ट वॉशिंगटन और दिल्ली के दर्जन भर से ज्यादा लोगों से हुई बातचीत पर आधारित है। इनमें से ज्यादातर ने गोपनीयता की शर्त पर बात की क्योंकि दोनों देशों के रिश्तों का असर बहुत दूरगामी है।
भारत ने अमेरिकी मध्यस्थता की बात को किया है खारिज
जून की उस फोन कॉल के कुछ हफ्तों बाद बातचीत के बीच ही ट्रंप ने अचानक भारत पर 25% टैरिफ लगाने का एलान कर दिया था। इसके कुछ दिनों यह बढ़ाकर 50% कर दिया गया था।
ट्रंप दरअसल दावा करते हैं कि उन्होंने व्यापार की धमकी देकर इस युद्ध को रुकवाया था। जाहिर है कि अगर ट्रंप की बात में दम होता और भारत ने उनकी बात ही सुनी होती तो आज भारत पर इतना टैरिफ ना लग रहा होता।
भारत ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि भारत-पाकिस्तान के बीच किसी तीसरे देश की मध्यस्थता उसे स्वीकार नहीं है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और सैन्य अधिकारी भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संघर्ष विराम के लिए पाकिस्तान के DGMO द्वारा भारत के DGMO से अनुरोध किया गया था।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ चर्चा से ज्यादा विवादों में बनी हुई है। शनिवार (30 अगस्त 2025) को सारण जिले (छपरा) में जब यह यात्रा पहुँची तो वहाँ एक अजीब नजारा देखने को मिला।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंच और सड़कों पर भीड़ तो जुटी लेकिन उनमें से कई लोगों को यह तक नहीं मालूम था कि वे किस रैली में आए हैं और उसका मकसद क्या है। रैली में शामिल शख्स का दावा है कि बड़ी संख्या में लोगों को 500-500 रुपए देकर यात्रा में शामिल किया गया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि लोकतंत्र और वोटरों के अधिकार की बात करने वाली यह यात्रा असल में भीड़ दिखाने का राजनीतिक कार्यक्रम भर है।
रैली में शामिल एक शख्स ने News18 से बात करते हुए कहा, “हमें रैली में आने के लिए 500 रुपए मिले हैं। दिन भर की मजदूरी मिल गई। हमारे साथ 20-25 आदमी आए थे, हमें झंडा लेकर खड़ा रहने को कहा गया था।” हालाँकि, जब इस शख्स ने पूछा गया कि वोटर अधिकार क्या है तो यह नहीं बता सका। शख्स ने टीशर्ट मिलने की बात भी कही है।
बीजेपी नेता अमित मालवीय ने यह वीडियो X पर शेयर करते हुए लिखा है कि राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा की पोल खुल गई है। उन्होंने लिखा, “नकली नारों और पैसों की भीड़ से राजनीति करने वालों को जनता भली-भाँति पहचानती है।”
छपरा में राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की खुली पोल!
लोगों ने खुद स्वीकार किया कि यात्रा में भीड़ जुटाने के लिए उन्हें ₹500 दिये गये।
नक़ली नारों और पैसों की भीड़ से राजनीति करने वालों को जनता भली-भांति पहचानती है। pic.twitter.com/B1BWyUcJcY
रैली के दौरान राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव खुले वाहन पर सवार होकर भीड़ का अभिवादन कर रहे थे, तभी नीचे से ‘नरेंद्र मोदी जिंदाबाद’ के नारे लगे और काले झंडे दिखाए गए।
यह दूसरा मौका है जब यात्रा किसी नकारात्मक वजह से सुर्खियों में आई। इससे पहले दरभंगा में राहुल गाँधी के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माँ की गाली दी गई थी, जिसके आरोपित को जेल भेजा गया।
सारण में हुए हंगामे और पैसे देकर भीड़ जुटाने की खबरों ने इस यात्रा की साख पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जो लोग 500 रुपए लेकर रैली में पहुँचे, उन्हें न तो रैली का असली मकसद मालूम था और न ही यह जानकारी कि कॉन्ग्रेस किस अधिकार की लड़ाई की बात कर रही है।
ऐसे में राहुल गाँधी का यह दावा खोखला साबित होता है कि यात्रा जनता की भागीदारी और लोकतंत्र की रक्षा के लिए है। यह भी गौर करने वाली बात है कि यात्रा के 14वें दिन सारण में यह विवाद हुआ।
इससे पहले भी कई जिलों से होकर यह यात्रा गुजरी है, लेकिन हर जगह भीड़ जुटाने के लिए कॉन्ग्रेस और सहयोगी दलों को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा। 1 सितंबर को पटना में इस यात्रा का समापन एक विशाल पैदल मार्च से होना है, लेकिन सवाल यही है कि क्या यह भीड़ वास्तविक जनसमर्थन की है या फिर केवल पैसों और व्यवस्थाओं से बनाई गई एक दिखावटी तस्वीर? जहाँ लोगों को असली मकसद ही नहीं पता की वो इस यात्रा में किस लिए आए है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (30 अगस्त 2025) को चीन के तियानजिन पहुँचे, जहाँ एयरपोर्ट पर उनका भव्य ‘रेड कार्पेट’ स्वागत किया गया। यह पिछले 7 वर्षों में उनका पहला चीन दौरा है। वह 1 सितंबर तक चीन में रहेंगे और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। इस सम्मेलन में 20 से अधिक देशों के नेता भाग लेंगे।
पीएम मोदी की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के फैसले से वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में हलचल मची हुई है।
एयरपोर्ट पर हुआ पीएम मोदी का भव्य स्वागत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तियानजिन एयरपोर्ट पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। यहाँ चीनी प्रतिनिधिमंडल उनकी अगुवानी के लिए मौजूद था और रेड कार्पेट बिछाया गया था। सामने आए वीडियो में कलाकार पारंपरिक अंदाज में लाल रूमाल हाथ में लेकर नृत्य कर पीएम मोदी का स्वागत करते नजर आ रहे हैं।
#WATCH | Prime Minister Narendra Modi arrives in Tianjin, China. He will attend the SCO Summit here.
इसके अलावा, चीन पहुँचने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत सांस्कृतिक कार्यक्रमों से किया गया। भरतनाट्यम कलाकारों के एक समूह ने उनके सामने नृत्य प्रस्तुत किया। वहीं, एक अन्य समूह ने वाद्ययंत्रों पर वंदे मातरम की धुन बजाई, जिसे प्रधानमंत्री ध्यानपूर्वक और मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।
पीएम मोदी ने चीनी भाषा में किया पोस्ट
चीन में लैंड करने के बाद पीएम मोदी ने X पर दो पोस्ट किए हैं। इनमें एक पोस्ट अंग्रेजी और दूसरा चीनी भाषा में किया गया है। पीएम मोदी ने लिखा, “शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के नेताओं के साथ गहन चर्चा और बैठकों की प्रतीक्षा में चीन के तियानजिन में पहुँचा।”
सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी तय है। शी जिनपिंग के साथ उनकी बैठक में दोनों देशों के संबंधों को और सामान्य बनाने तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा होगी।
वहीं, पुतिन के साथ वार्ता में द्विपक्षीय रिश्तों और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। मोदी की चीन यात्रा को बीजिंग में ऐतिहासिक माना जा रहा है। भारतीय समुदाय, स्थानीय चीनी नागरिकों और कारोबारियों के बीच इस दौरे को लेकर खासा उत्साह है। इससे पहले पीएम जापान की यात्रा पर पहुँचे थे और वहाँ उन्होंने चीन के साथ संबंधों की बेहतर होने की बात कही थी।
लोगों के मन में सवाल उठ रहे होंगे कि जब अमेरिका की पिछली सरकारें भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए बड़ी से बड़ी छूट भारत को दे रहे थे, तब उसी अमेरिका को ऐसी क्या चिढ़ हो गई कि वो भारत में टैरिफ पर टैरिफ लगाने लगा। हालाँकि अब शायद इसका जवाब सामने आ चुका है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका ने भारत पर 50% का भारी-भरकम टैरिफ (आयात शुल्क) क्यों लगाया?
एक अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज की रिपोर्ट के मुताबिक, इसका कारण है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को सुलझाने में मध्यस्थता करने का मौका नहीं मिला। यानी ट्रंप को इस बात का गुस्सा है कि भारत ने उन्हें इस मसले में दखल देने से मना कर दिया।
रिपोर्ट कहती है कि ये टैरिफ ट्रंप के निजी नाराजगी का नतीजा हैं। ट्रंप को लगता था कि वे मई में भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु ताकत वाले देशों के बीच हुए तनाव को खत्म करने में मदद कर सकते थे। लेकिन भारत ने साफ कह दिया कि वह इस मामले में किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं चाहता। भारत का ये रुख हमेशा से रहा है कि वह पाकिस्तान के साथ अपने मसलों को खुद सुलझाएगा।
ट्रंप ने कई बार दावा किया है कि उन्होंने दुनिया भर के कई झगड़ों को खत्म किया, जिसमें भारत-पाकिस्तान का मुद्दा भी शामिल है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जुलाई में कहा था कि ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए।
ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर लिखा था, “मैं दोनों देशों के साथ मिलकर कश्मीर जैसे हजार साल पुराने मसले का हल निकाल सकता हूँ।” लेकिन भारत ने उनकी इस पेशकश को ठुकरा दिया, क्योंकि भारत किसी बाहरी देश को अपने मामलों में दखल देने की इजाजत नहीं देता।
इसके अलावा टैरिफ लगाने की एक और वजह भारत का कृषि क्षेत्र है। जेफरीज की रिपोर्ट कहती है कि भारत ने अपनी खेती को बचाने के लिए विदेशी आयात को अपने कृषि बाजार में आने से रोका है। भारत में करीब 25 करोड़ किसान और मजदूर खेती पर निर्भर हैं। देश की 40% आबादी खेती से अपनी रोजी-रोटी चलाती है। इसलिए भारत सरकार ने हमेशा अपने किसानों को प्राथमिकता दी है और विदेशी कृषि उत्पादों को बाजार में लाने से बचती रही है।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेन्ट ने हाल ही में कहा था कि भारत व्यापार समझौतों में थोड़ा जिद्दी रवैया अपनाता है। भारत ने इन टैरिफ को “अनुचित और गलत” बताया है। भारत का कहना है कि उसे इस तरह निशाना बनाना ठीक नहीं है।
जेफरीज की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका भारत पर दबाव डालता रहा, तो भारत और चीन के बीच नजदीकियाँ बढ़ सकती हैं। दोनों देश सितंबर से पाँच साल बाद फिर से सीधी उड़ानें शुरू करने वाले हैं।
भारत ने भारी आर्थिक नुकसान के बावजूद अपनी नीति पर कायम रहते हुए किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को सिरे से नकार दिया। ये टैरिफ भारत के लिए चुनौती तो हैं, लेकिन भारत अपने स्टैंड पर अडिग है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा धमाका हुआ है। डेनमार्क ने अमेरिका पर सीधा आरोप लगाया है कि ट्रंप से जुड़े तीन अमेरिकियों ने ग्रीनलैंड में ‘रेजिम चेंज ऑपरेशन’ यानी सत्ता पलट की गुप्त साजिश रची।
डेनमार्क के पब्लिक ब्रॉडकास्टर DR की जानकरी के मुताबिक, इन तीन अमेरिकियों के CIA और ट्रंप प्रशासन से कनेक्शन हैं और इन्हें ग्रीनलैंड को डेनमार्क से अलग करवाने की योजना बनाते पकड़ा गया।
यही नहीं, इनमें से एक ने तो ‘ट्रंप समर्थक ग्रीनलैंडर्स’ की लिस्ट तक बना डाली और ट्रंप विरोधियों के नाम इकट्ठा किए, जबकि बाकी दो ने वहाँ के नेताओं, बिजनेसमैन और आम लोगों से नेटवर्क बनाने की कोशिश की।
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कोपेनहेगन में तैनात अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब किया और साफ कहा कि ‘ग्रीनलैंड के भविष्य में बाहरी दखल बर्दाश्त नहीं होगा।’ याद रहे, ट्रंप खुद कई बार ग्रीनलैंड को खरीदने या अपने कब्जे में लेने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी यह साफ नहीं है कि ये तीनों अमेरिकी अपने दम पर काम कर रहे थे या ट्रंप प्रशासन की सीधी मंज़ूरी से, लेकिन व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने तो बस इतना कहकर डेनमार्क को हल्का लेने की कोशिश की ‘डेनिश लोगों को शांत होना चाहिए।’
खुलासा यहीं खत्म नहीं होता। इसी साल वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बताया था कि खुफिया एजेंसियों को ग्रीनलैंड की आजादी की चाह और वहाँ अमेरिकी संसाधनों पर कब्जे के रवैये की निगरानी का आदेश दिया गया था। यह निर्देश किसी और ने नहीं बल्कि अमेरिका की खुफिया प्रमुख टुलसी गैबार्ड के दफ्तर से जारी हुआ था। इसमें CIA, DIA और NSA सभी को शामिल किया गया था।
खनिज-समृद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड
मार्च 2025 से लेकर अब तक ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी लगातार सुर्खियों में है। इस साल मार्च में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ग्रीनलैंड गए थे। उन्होंने वहाँ आर्कटिक सुरक्षा मुद्दों पर जानकारी ली और अमेरिकी सैनिकों से मुलाकात की। डेनमार्क सरकार और ग्रीनलैंडवासियों की नाराज़गी के बावजूद वेंस ने अमेरिकी संचालित पिटुफ़िक स्पेस बेस का दौरा किया।
ट्रंप का ग्रीनलैंड प्रेम नया नहीं है। पहले राष्ट्रपति कार्यकाल से ही वह ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते रहे हैं। दिसंबर 2024 में उन्होंने ट्रुथ सोशल पर साफ कहा था कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाना ‘एकदम जरूरी’ है। मार्च 2025 में उन्होंने कॉन्ग्रेस में भाषण देते हुए दोबारा यही दावा किया और इस हफ्ते मीडिया से भी कहा – ‘ग्रीनलैंड शायद हमारा भविष्य है।’
दरअसल, ग्रीनलैंड दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा द्वीप है और इसकी अहमियत आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक तीनों ही स्तर पर है। यह अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है और यूरोप व उत्तरी अमेरिका को जोड़ने वाले अहम समुद्री और हवाई रास्तों पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन से पिघलती बर्फ ने यहाँ विशाल खनिज संपदा, गैस और तेल तक पहुँच आसान कर दी है।
खासतौर पर दुर्लभ खनिज जैसे नियोडिमियम, डिसप्रोसियम और यूरेनियम जो हरित तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके अलावा ग्रीनलैंड की लोकेशन अमेरिका के लिए मिसाइल डिफेंस, स्पेस सर्विलांस और आर्कटिक-नॉर्थ अटलांटिक में नेवल गतिविधियों की निगरानी के लिहाज से भी रणनीतिक महत्व रखती है। यह क्षेत्र GIUK Gap (ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके) का हिस्सा है, जो ट्रांस-अटलांटिक रूट्स के लिए अहम है।
ट्रंप का मकसद साफ है, ग्रीनलैंड पर नियंत्रण से अमेरिका को आर्कटिक शिपिंग रूट्स पर दबदबा मिलेगा, रूस-चीन-उत्तर कोरिया की गतिविधियों पर नजर रख सकेगा और साथ ही चीन पर दुर्लभ खनिजों की सप्लाई को लेकर निर्भरता कम होगी।
प्राकृतिक संसाधनों की लालच में लार टपकाते पहुँच जाता है CIA
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पर दशकों से दुनिया भर में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की साजिश रचने और सरकारें गिराने के आरोप लगते रहे हैं। इसकी रणनीति हमेशा यही रही है कि जिस सरकार से अमेरिकी हितों को खतरा हो, उसके खिलाफ माहौल बनाया जाए, चाहे विरोधी आंदोलनों को हवा देना हो, अलगाववाद और हिंसा भड़कानी हो, चुनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर सीधे तख्तापलट और गुप्त सैन्य कार्रवाई करनी हो।
Cold War के दौर से ही यह CIA की विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है। 1953 में ईरान में ऑपरेशन AJAX के तहत प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को हटाया गया, क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।
1954 में ग्वाटेमाला में ऑपरेशन PBSuccess के जरिए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज को गिरा दिया गया, क्योंकि उनकी जमीन सुधार नीतियों से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान थीं। 1957-58 में इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की सरकार को अस्थिर करने के लिए CIA ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन ऑपरेशन फेल हुआ और अमेरिका की पोल खुल गई।
1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए Bay of Pigs आक्रमण कराया गया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। 1963 में वियतनाम में अमेरिकी समर्थन से राष्ट्रपति Ngô Đình Diệm के खिलाफ तख्तापलट हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।
1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेन्दे को हटाने के लिए CIA ने विपक्ष और सेना को समर्थन दिया, जिससे तानाशाह पिनोशे सत्ता में आया। 1979-1989 के बीच CIA ने ऑपरेशन Cyclone चलाकर अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर से मुजाहिदीन आतंकियों को फंड किया, जिसके नतीजे में तालिबान पैदा हुआ।
समय के साथ CIA ने अपनी रणनीति बदली और खुली बगावत या सीधा तख्तापलट करने के बजाय ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए सरकारें गिराने का खेल शुरू किया। बिल क्लिंटन के दौर में NGO और मीडिया नेटवर्क को हथियार बनाया गया।
जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी, USAID, ओमिद्यार नेटवर्क आदि के जरिए देशों में अस्थिरता फैलाई गई। भारत में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें नाकाम कर दिया।
तकनीकी मोर्चे पर भी CIA सक्रिय रही 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को Stuxnet वायरस से निशाना बनाया गया। सीरिया गृहयुद्ध में बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों को फंड और ट्रेनिंग दी गई और ट्रंप ने भी CIA को असद को हटाने का आदेश दिया।
2024 में असद की सरकार गिरी और अब वहाँ pro-US शराअ सत्ता में है। वेनेजुएला में भी 2020 में अमेरिकी प्राइवेट मिलिट्री और विपक्षी नेताओं की मदद से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की कोशिश हुई, लेकिन वह पकड़ी गई।
लैटिन अमेरिका CIA का पसंदीदा निशाना रहा है। 1964 में ब्राजील के राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को हटाया गया, क्योंकि उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ माना जा रहा था। 2023 में फिर से ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा को हटाने के लिए ‘Maidan-style uprising’ की कोशिश की गई, जिसमें बोल्सोनारो समर्थकों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट पर हमला किया, लेकिन CIA का दांव उल्टा पड़ गया।
लूला अब BRICS देशों का खुला समर्थन कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों को भड़का कर प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया।
हसीना ने खुद अमेरिका पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें इसलिए हटवाया क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने से इनकार कर दिया और बांग्लादेश की संप्रभुता पर समझौता नहीं किया।
अब बारी ग्रीनलैंड की है। प्राकृतिक संसाधनों, आर्कटिक समुद्री मार्गों और सामरिक महत्व की वजह से ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए बेहद अहम है। लेकिन यहाँ अभी तक कोई मज़बूत pro-US भावनाएँ नहीं हैं।
ट्रंप कई बार ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की इच्छा जता चुके हैं और रूस-चीन की आर्कटिक में बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए यह आशंका गहरी हो गई है कि CIA ग्रीनलैंड में भी सत्ता परिवर्तन की साजिश रच रही है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदनी ने विवादित टिप्पणी की। मौलाना मदनी ने दावा किया कि उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर हिमंता बिस्वा सरमा को कॉन्ग्रेस से चुनाव टिकट ना देने की माँग की थी। मदनी ने कहा कि सरमा RSS की मानसिकता से प्रभावित हैं और अब असम में आग लगा रहे हैं।
अरशद मदानी ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “मैंने सोनिया गाँधी को पत्र लिखा था कि कॉन्ग्रेस से हिमंता बिस्वा सरमा को टिकट न दें क्योंकि उनमें RSS की मानसिकता है। अब वही हिमंता बिस्वा सरमा पूरे असम को आग में झोंक रहे हैं।”
मदनी के बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और भाजपा नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने मदनी के दावों पर करारा जवाब देते हुए कहा, “मौलाना मदनी ने खुद माना है कि असम में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के चयन में उनकी भूमिका थी। जब मैं कॉन्ग्रेस में था तब यही मौलाना शिक्षक भर्ती में मुझ पर दबाव बनाने की कोशिश करते थे। बीजेपी सरकार ने आते ही उनकी यह ‘दुकान’ ताला लगाकर बंद कर दी।।”
मौलाना मदानी ने स्वयं स्वीकार किया है कि असम में कांग्रेस प्रत्याशी के चयन में उनकी भूमिका रही है। जब मैं कांग्रेस में था, तब यही मौलाना शिक्षक भर्ती में मुझ पर दबाव डालने की कोशिश करते थे। भाजपा सरकार ने आते ही उनकी यह 'दुकान' ताला लगाकर बंद कर दी।। pic.twitter.com/owbZDh5T4N
मुख्यमंत्री हिमंता ने कहा, “मौलाना मदनी, सैयदा हमीद और हर्ष मंदर जैसे लोगों का एक ही उद्देश्य है। असम को एक कट्टर इस्लामवादी प्रदेश में बदलना। लेकिन भाजपा के रहते यह कभी संभव नहीं होगा।” सीएम ने आगे कहा, “बीजेपी लगातार असम की सत्ता पर काबिज है। असम में बीजेपी काफी मजबूत है। वो हमारे खिलाफ अब कुछ नहीं कर पाएँगे। भले ही वो लगातार कुछ न कुछ करने की कोशिश जरूर करते रहेंगे।
सीएम ने कहा, “हमारा अगला चरण NRC है। घुसपैठियों की बेदखली जारी रहेगी, इसके अलावा हमारे एजेंडे में और भी बहुत कुछ है। हम अपना काम जारी रखेंगे। हमारे पास मौलाना अरशद मदनी के जैसे विचारों वाले नेताओं के खिलाफ एक लंबा एजेंडा है। असम को कट्टरपंथी इस्लामी राज्य बनाने के विचार के खिलाफ काम करेंगे।”
मौलाना मदनी के बयान पर बीजेपी नेता अमित मालवीय ने भी गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने मदनी की टिप्पणी का वीडियो एक्स पर शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा और कहा, “क्या अब मौलवी तय करेंगे कि कॉन्ग्रेस का टिकट किसे मिलेगा?”
“I wrote to Sonia Gandhi asking her not to give a ticket to Himanta Biswa Sarma from Congress, as he had an RSS mentality. Now he is setting Assam on fire…” — Arshad Madani, President of the Jamiat Ulama-e-Hind (A).