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अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रबंधन और पुलिस पर उठे सवाल: न एंबुलेंस बुलाई, न परिवार को किया रिपोर्ट, लोगों ने किया प्रदर्शन

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी। घटना के बाद स्कूल में भारी संख्या में अभिभावक और हिंदू संगठनों के लोग पहुँचे और गुस्सा जताया।

हालात बिगड़ते देख पुलिस बल तैनात करना पड़ा। मृतक छात्र के परिजनों ने बताया कि कुछ दिन पहले स्कूल में ही उसका आठवीं कक्षा के कुछ छात्रों से मामूली बात पर झगड़ा हुआ था।

मृतक छात्र दसवीं कक्षा में पढ़ता था। मंगलवार (19 अगस्त 2025) को आरोपित छात्र स्कूल में उसके पास आए और चाकू मार दिया। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए।

स्कूल ने समय पर नहीं की कार्यवाही

जानकारी के मुताबिक, मृतक छात्र के दादा ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि कुछ दिन पहले उनका पोता स्कूल से छुट्टी के बाद सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था, तभी एक मुस्लिम छात्र से उसका झगड़ा हुआ था।

बाद में उस छात्र ने सॉरी कह दिया और मामला शांत हो गया। लेकिन घटना वाले दिन आठ-दस लड़के चेहरा ढक कर आए और उनके पोते पर चाकू से हमला कर दिया। दादा का आरोप है कि चाकू लगने के बाद भी स्कूल ने न तो उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया और न ही एम्बुलेंस को खबर दी।

परिवार के पहुँचने पर ही छात्र को अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने स्कूल की सुरक्षा पर भी सवाल उठाए कि आखिर चाकू जैसे हथियार लेकर लड़के स्कूल में कैसे घुस आए और सुरक्षाकर्मी क्या कर रहे थे।

मृतक के दादा ने बताया कि चाकू मारने वाले एक लड़के को पुलिस ने उसी रात शाह आलम इलाके से पकड़ लिया और तुरंत FIR दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्कूल में मुस्लिम छात्र अक्सर उनके पोते को परेशान करते थे। यहाँ तक कि वे मटन की सब्जी को पनीर बताकर उसे खिलाने की कोशिश करते थे, जबकि उनका परिवार शाकाहारी है।

मृतक छात्र के कुछ सहपाठियों ने बताया कि स्कूल में असामाजिक तत्वों का आतंक फैला हुआ है। उनका कहना है कि आरोपित अक्सर निचली कक्षाओं के बच्चों का गला दबाते हैं और उन्हें चाकू दिखाकर डराते-धमकाते हैं। मृतक छात्र के माता-पिता ने भी इस बारे में दो महीने पहले स्कूल में शिकायत की थी, लेकिन स्कूल प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की।

गुस्साए अभिभावकों ने कहा- यहाँ हिंदू-मुस्लिम कहाँ पढ़ेंगे? 

स्कूल के बाहर जमा गुस्साए अभिभावकों ने बताया कि यहाँ पहले भी कई शिकायतें हो चुकी हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। उनका कहना था कि मुस्लिम छात्रों के उत्पीड़न के कारण लोग पूछ रहे हैं “यहाँ हिंदू कहाँ पढ़ेंगे, मुसलमान कहाँ पढ़ेंगे?” अभिभावकों की बस एक ही माँग है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

एक महिला ने गंभीर आरोप लगाया कि स्कूल में पहले भी शराब और ड्रग्स पकड़े गए थे, लेकिन पैसे लेकर मामले दबा दिए गए। उन्होंने कहा कि इस स्कूल में अगर पैसा हो, तो कुछ भी हो सकता है।

एक अन्य महिला ने बताया कि दो महीने पहले मुस्लिम छात्रों ने उसके बेटे से झगड़ा किया था। उस समय भी स्कूल ने केवल अभिभावकों को बुलाकर मामला सुलझा दिया, लेकिन किसी तरह की सख्त कार्रवाई नहीं की।

अभिभावकों ने यह भी आरोप लगाया कि घायल बच्चे को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचाया गया। उनका कहना था कि अगर एम्बुलेंस की व्यवस्था होती, तो शायद उसकी जान बच सकती थी।

स्कूल पर ताला लगा देना चाहिए: एबीवीपी

सिंधी समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में स्कूल के बाहर इकट्ठा होकर न्याय की माँग करने लगे। सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष कमल मेहतानी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।

एक छोटी सी बात पर बच्चे को चाकू मार दिया गया, यह किसी भी छात्र के साथ हो सकता है। उन्होंने माँग की कि आरोपितों को तुरंत पकड़ा जाए, उन्हें सख्त सजा मिले और स्कूल प्रबंधन की भी जिम्मेदारी तय हो।

उन्होंने कहा कि स्कूल का काम सिर्फ फीस वसूलना नहीं है, बच्चों की सुरक्षा भी उनकी जिम्मेदारी है। एबीवीपी नेताओं ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब लाखों रुपए फीस लेने के बाद भी छात्र सुरक्षित नहीं हैं और असामाजिक तत्व स्कूल में चाकू लेकर घूम रहे हैं, तो ऐसे स्कूल पर ताला लगा दिया जाना चाहिए।

यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिंकन सेखड़िया ने लिखी है। मूल खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

साल 2023 में कमाई का सरप्लस से 2025 में कर्ज के गड्ढे तक: जानें- कॉन्ग्रेस सरकार की ‘खटाखट’ लुभावनी योजनाओं ने कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे किया बर्बाद

कर्नाटक की आर्थिक हालत दो साल में बिगड़ गई है। साल 2023 में बीजेपी सरकार के समय सरप्लस बजट था, लेकिन अब कॉन्ग्रेस के राज में राज्य कर्ज में डूब रहा है, वित्तीय घाटा बढ़ रहा है और विकास परियोजनाओं के लिए पैसा कम हो रहा है।

कम्पट्रोलर और ऑडिटर जनरल (CAG) ने 31 मार्च 2024 के लिए अपनी हालिया स्टेट फाइनेंस ऑडिट रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच ‘गारंटी’ योजनाएँ, जो बड़े धूमधाम से शुरू की गई थीं, राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रही हैं।

CAG की रिपोर्ट ने चिंता जताई

इस हफ्ते कर्नाटक विधानसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट में कॉन्ग्रेस सरकार की पाँच कल्याणकारी योजनाओं गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति, और युवा निधि के प्रभाव का पहला सरकारी ऑडिट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन गारंटी योजनाओं के लिए 2023-24 में 36,538 करोड़ रुपए का बजट रखा गया था, जो राज्य के कुल राजस्व खर्च का 15% है।

इसका असर साफ दिख रहा है। पिछले साल कर्नाटक की आय में सिर्फ 1.86% की बढ़ोतरी हुई, जबकि इन योजनाओं की वजह से खर्च 12.54% बढ़ गया। इस असंतुलन से राज्य को 9,271 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ, जो 2022-23 में कोविड-19 के बाद की रिकवरी को उलट रहा है।

राज्य का वित्तीय घाटा भी 2022-23 में 46,623 करोड़ रुपए से बढ़कर 2023-24 में 65,522 करोड़ रुपए हो गया। इस अंतर को भरने के लिए सरकार ने बाजार से 63,000 करोड़ रुपए उधार लिए, जो पिछले साल के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। CAG ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में कर्ज चुकाने का बोझ और ब्याज का खर्च बढ़ेगा।

दूसरी तरफ बुनियादी ढाँचे पर पूँजीगत खर्च 5,229 करोड़ रुपए कम हो गया। इससे ज्यादातर प्रोजेक्ट रुक गए हैं और अधूरे कामों की संख्या 68% बढ़ गई है। CAG ने साफ कहा कि इस तरह की उत्पादक पूँजी में कटौती कर्नाटक के भविष्य के विकास को नुकसान पहुँचाएगी।

कॉन्ग्रेस सरकार का दावा है कि ये योजनाएँ असमानता कम करती हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं और मानव पूँजी विकास को बढ़ावा देती हैं। लेकिन CAG ने चेताया कि अगर दूसरी सब्सिडी को कम या तर्कसंगत नहीं किया गया, तो ये गारंटी योजनाएँ ‘राज्य की वित्तीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डालेंगी।’

इन योजनाओं के शुरू होने के बाद कर्नाटक स्थिरता से कर्ज और वित्तीय तनाव की स्थिति में पहुँच गया है।

2023 में बीजेपी का संतुलित ‘सरप्लस’ बजट

वर्तमान स्थिति फरवरी 2023 के बिल्कुल उलट है, जब बीजेपी के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने सरप्लस बजट पेश किया था। कई लोगों को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव के चलते बीजेपी लोकलुभावन वादों के साथ बड़ा दाँव खेलेगी। लेकिन बोम्मई सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं को वित्तीय जिम्मेदारी के साथ संतुलित कर सबको चौंका दिया।

बजट में हर विभाग को ध्यान में रखा गया, बिना राज्य के वित्त को नुकसान पहुँचाए। किसानों, युवाओं और महिलाओं को योजनाओं का केंद्र बनाया गया। कृषि को भारी आवंटन मिला और किसानों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा बढ़ाई गई। जैसा कि उम्मीद थी, कोई नया कर नहीं लगाया गया और शराब की कीमतों को भी नहीं छुआ गया।

शिक्षा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ, जिसमें 37,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया गया। बोम्मई ने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त बस पास और महिलाओं – छात्रों के लिए सब्सिडी की घोषणा की।

बुनियादी ढाँचे को भी बोम्मई के बजट में जगह मिली। अपर भद्रा जल परियोजना को 5,300 करोड़ रुपए और कालसा बाँदूरी परियोजना को 1,000 करोड़ रुपए दिए गए। कर्नाटक में पानी के मुद्दे संवेदनशील हैं और ये आवंटन बीजेपी की योजनाओं में प्रमुख थे। बेंगलुरु को भी बेहतर गतिशीलता और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचा फंडिंग का वादा किया गया।

विपक्ष ने दावा किया कि बोम्मई और ज्यादा लोकलुभावन पहल कर सकते थे, खासकर कॉन्ग्रेस के मुफ्त बिजली और नकद पुरस्कारों की आक्रामक गारंटी के सामने। फिर भी दबाव के बावजूद बीजेपी सरकार ने लोगों के लिए केंद्रित और वित्तीय रूप से समझदार बजट पेश किया। उस साल राज्य को राजस्व सरप्लस भी मिला। यह नाजुक संतुलन अब मौजूदा आँकड़ों से साफ तौर पर उजागर हो रहा है।

सिद्धारमैया की मुफ्त योजनाएँ कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को कैसे डुबो रही हैं

2023 में कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व में कर्नाटक सरकार ने अपनी पाँच गारंटी योजनाएँ शुरू कीं। ये योजनाएँ कॉन्ग्रेस के चुनाव अभियान का आधार थीं और माना जाता है कि इनकी वजह से पार्टी को भारी जीत मिली। लेकिन अब इनका अर्थव्यवस्था पर खर्च साफ दिख रहा है।

कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के दो महीने बाद जुलाई 2024 में सिद्धारमैया के आर्थिक सलाहकार बसवराज रायरेड्डी ने स्वीकार किया कि इन गारंटी योजनाओं के लिए भारी राशि रखने की वजह से विकास परियोजनाओं के लिए पैसा नहीं बचा है।

उन्होंने खुलासा किया था कि इन योजनाओं पर करीब 65,000 करोड़ रुपए का खर्च आ रहा है। रायरेड्डी ने कहा “लोग विकास चाहते हैं। लेकिन मुझ पर विश्वास करें, बिल्कुल भी पैसा नहीं है। चूँकि मैं वित्तीय सलाहकार हूँ, मैंने यहाँ झील विकास परियोजना के लिए फंड जुटाया।”

कर्नाटक के सभी विधायक अपने क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए फंड जुटाने में असमर्थ हैं। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के नेता भी चुपके से स्वीकार कर रहे हैं कि ये गारंटी योजनाएँ सड़कों, सिंचाई और बुनियादी ढाँचे के लिए जरूरी फंड को खत्म कर रही हैं।

बीजेपी विधायक रमेश जारकिहोली ने कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि वह बेंगलुरु पर ही बचे हुए थोड़े पैसे खर्च कर रही है और बाकी राज्य को अनदेखा कर रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार के समय शुरू हुईं अधिकांश परियोजनाएँ जैसे कि अथानी में बसवेश्वर और अम्माजेश्वरी सिंचाई परियोजनाएँ पूरी तरह ठप हो गई हैं।

कॉन्ग्रेस की मुफ्त योजनाओं ने पार्टी के अंदर भी तनाव पैदा किया है। कुछ कॉन्ग्रेस नेता दावा करते हैं कि इन योजनाओं से अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला और इतने भारी खर्च की कीमत सही थी या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं।

वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने कई बार वित्तीय तनाव को स्वीकार किया है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जुलाई 2023 में माना कि पार्टी की गारंटी के लिए 40,000 करोड़ रुपए अलग रखने की वजह से विकास के लिए फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है।

मुफ्त योजनाएँ राज्य के बुनियादी ढाँचे के विकास को प्रभावित कर रही हैं

कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने 24 जून, 2025 को खुले तौर पर कहा कि वित्त मंत्रालय भी संभालने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं के लिए पर्याप्त फंड नहीं है।

गृह मंत्री ने बागलकोट जिले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, “हमारे पास पैसा नहीं है, सिद्धारमैया के पास भी अब फंड नहीं है। हमने पहले ही सब कुछ लोगों को चावल, दाल और तेल के रूप में दे दिया है, हाँ तेल भी।”

परमेश्वर के मुताबिक, कॉन्ग्रेस सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च किया है, जिसके चलते नए पूंजीगत परियोजनाओं के लिए बजट में बहुत कम जगह बची है।

इससे पहले, कर्नाटक के लघु-स्तरीय उद्योग और सार्वजनिक उद्यम मंत्री शरणबसप्पा दर्शनपुर ने कहा था कि कॉन्ग्रेस सरकार के पहले साल में बुनियादी ढाँचे का विकास कुछ हद तक प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि यह सिद्धारमैया सरकार की गारंटी योजनाओं की वजह से होगा।

मंत्री ने बताया कि इन गारंटी योजनाओं से खजाने पर 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ पड़ेगा।

दर्शनपुर ने कहा, “हमें अपनी पाँच गारंटी योजनाओं को लागू करने के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की जरूरत है। इससे विकास कार्य आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।”

‘गृह ज्योति’ योजना को फंड करने के लिए बिजली दरें 2.89 रुपए प्रति यूनिट बढ़ाई गईं

गृह ज्योति योजना ने धूम मचाई, लेकिन अब नागरिकों को इसका दर्द महसूस होने लगा है। गृह ज्योति योजना के तहत मुफ्त बिजली देने के लिए, 200 यूनिट से ज्यादा खपत पर बिजली की दरें 2.89 रुपए प्रति यूनिट बढ़ा दी गईं। राहत देने के बजाय कई परिवारों को मुफ्त स्लैब से ज्यादा खपत होने पर बिल में ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं।

कॉन्ग्रेस सरकार पर SC/ST विकास के लिए फंड डायवर्ट करने का आरोप

कॉन्ग्रेस सरकार ने कर्नाटक अनुसूचित जाति उप-योजना और जनजातीय उप-योजना (SCSP-TSP) के तहत आवंटित फंड का करीब 37% हिस्सा अपनी पाँच गारंटी योजनाओं के लिए डायवर्ट कर दिया। बीजेपी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी दलित समुदायों के कल्याण के लिए रखे गए फंड को डायवर्ट कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस सरकार ने ‘गृहलक्ष्मी’ योजना के लिए 7,881.91 करोड़ रुपए, ‘भाग्यलक्ष्मी’ योजना के लिए 70.28 करोड़ रुपए, ‘गृहज्योति’ योजना के लिए 2,585.93 करोड़ रुपए, ‘अन्नभाग्य’ योजना के लिए 448.15 करोड़ रुपए, ‘अन्नभाग्य’ के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के लिए 2,187 करोड़ रुपए, ‘शक्ति’ योजना के लिए 1,451.45 करोड़ रुपए और ‘युवा निधि’ योजना के लिए 175.50 करोड़ रुपए SCSP-TSP से उपयोग करने का फैसला किया है।

KSRTC वेतन संकट: ‘शक्ति’ ने कैसे तोड़ा सार्वजनिक परिवहन

इससे पहले, 5 अगस्त 2025 को कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (KSRTC) और बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (BMTC) के कर्मचारियों ने वेतन संशोधन और 38 महीने के बकाया भुगतान की माँग को लेकर हड़ताल किया था।

वे 25% वेतन वृद्धि और 1,800 करोड़ रुपए के बकाया भुगतान की माँग कर रहे थे। हालाँकि वित्तीय तंगी की वजह से राज्य सरकार ने सिर्फ 14 महीने के बकाया का निपटारा करने का प्रस्ताव रखा।

कर्मचारियों को गुस्सा इस बात का था कि उनकी तनख्वाह रोकी जा रही है, जबकि सरकार शक्ति योजना पर हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिसमें महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा मिलती है। कॉन्ग्रेस सरकार पर चार सरकारी परिवहन निगमों (KSRTC, BMTC, NWKRTC, KKRTC) को शक्ति योजना के लिए 1,600 करोड़ रुपए का बकाया है।

इन कंपनियों पर पहले से ही 6,330 करोड़ रुपए का कर्ज है और इस मुफ्त योजना ने उनकी वित्तीय स्थिति को और खराब कर दिया है। वेतन रुक गए हैं और कर्मचारी अब सड़कों पर उतरकर न्याय की माँग कर रहे हैं। इस बीच कर्नाटक में हजारों यात्री बसों के बंद होने से परेशान हैं।

कर्नाटक का दो साल का अनुभव एक सबक है। कल्याणकारी योजनाएँ अल्पकालिक राजनीतिक फायदे के लिए मददगार हो सकती हैं, लेकिन बिना वित्तीय समझदारी के अंधाधुंध लोकलुभावन नीतियां अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकती हैं। बीजेपी का 2023 का सरप्लस बजट दिखाता है कि कल्याण और विकास में संतुलन बनाया जा सकता है, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार की जल्दबाजी में शुरू की गई गारंटी योजनाओं ने इन लाभों को रिकॉर्ड समय में उलट दिया।

राजस्व सरप्लस से राजस्व घाटे तक, रुके हुए बुनियादी ढाँचे से लेकर योजनाबद्ध परियोजनाओं तक और वित्तीय समझदारी से बढ़ते कर्ज तक, कर्नाटक की अर्थव्यवस्था आज लोकलुभावन राजनीति की कीमत चुका रही है। अगर सब्सिडी को तर्कसंगत करने और विकास-प्रधान प्राथमिकताओं जैसे सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य और गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया जाएगा।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

जेल से अब नहीं चलेगी सरकार, संविधान संशोधन बिल पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने बोला हमला: कहा- जिन्होंने लालू यादव की राजनीति खत्म की, अब उनके साथ दे रहे भाषण

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (20 अगस्त 2025) को लोकसभा में संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक-2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किए। इन विधेयकों का उद्देश्य राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है, लेकिन जैसे ही ये बिल सदन में पेश हुए, विपक्षी दलों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया।

नारेबाजी, कागज फाड़ने और हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इस बीच, गृह मंत्री अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष पर जमकर निशाना साधा और अपनी सरकार की मंशा को स्पष्ट किया।

अमित शाह ने बताया भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कदम

गृहमंत्री अमित शाह ने अपने बयान में कहा, “देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देखकर मैंने संसद में लोकसभा अध्यक्ष जी की सहमति से संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री जेल में रहते हुए सरकार न चला पाएँ।”

उन्होंने कहा कि इस बिल का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में गिरते नैतिकता के स्तर को ऊपर उठाना और राजनीति में शुचिता लाना है। बिल में तीन मुख्य प्रावधान हैं-

  1. कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता।
  2. संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा था कि भविष्य में ऐसे राजनेता आएँगे जो गिरफ्तारी के बावजूद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं देंगे। हाल के वर्षों में कुछ मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने जेल से सरकार चलाने की कोशिश की, जो अनैतिक है।
  3. बिल में यह प्रावधान है कि अगर कोई राजनेता 30 दिन के भीतर जमानत नहीं ले पाता, तो 31वें दिन उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। हालाँकि जमानत मिलने पर वह अपने पद पर वापस आ सकता है।

अमित शाह ने जोर देकर कहा, “अब देश की जनता को यह तय करना पड़ेगा कि क्या जेल में रहकर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा सरकार चलाना उचित है?” उन्होंने इस बिल को राजनीतिक नैतिकता को मजबूत करने वाला कदम बताया और कहा कि यह जनता की भावनाओं का सम्मान करता है।

मोदी बनाम कॉन्ग्रेस की नीति

अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को कानून के दायरे में लाने का संविधान संशोधन पेश किया है और दूसरी ओर कानून के दायरे से बाहर रहने, जेल से सरकारें चलाने और कुर्सी का मोह न छोड़ने के लिए कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने इसका विरोध किया है।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों का जिक्र करते हुए कहा कि 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान संशोधन संख्या-39 के जरिए प्रधानमंत्री को कानूनी कार्यवाही से ऊपर रखने का प्रावधान किया था। शाह ने तंज कसते हुए कहा, “यह कॉन्ग्रेस की कार्य संस्कृति है कि वे प्रधानमंत्री को कानून से ऊपर करते हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी की नीति है कि हम अपने प्रधानमंत्री, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को कानून के दायरे में ला रहे हैं।”

गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल को जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप बताया और कहा कि यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि कोई भी नेता गंभीर आपराधिक आरोपों में जेल में रहकर शासन नहीं कर सकता। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए इस बिल का विरोध कर रहे हैं।

व्यक्तिगत टिप्पणी पर भी दिया जवाब

विपक्षी सांसद केसी वेणुगोपाल ने शाह पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि जब शाह गुजरात के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने एक मामले में नैतिकता का पालन नहीं किया था। इस पर शाह ने तीखा जवाब देते हुए कहा, “मैं कॉन्ग्रेस को याद दिलाना चाहता हूँ कि मैंने अरेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और बेल पर बाहर आने के बाद भी, जब तक मैं अदालत से पूरी तरह निर्दोष साबित नहीं हुआ, तब तक मैंने कोई संवैधानिक पद नहीं लिया था। मेरे ऊपर लगाए गए फर्जी केस को अदालत ने यह कहते हुए खारिज किया कि केस political vendetta से प्रेरित था।”

केंद्रीय गृहमंत्री ने बीजेपी और एनडीए की नैतिकता का हवाला देते हुए कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी ने भी केवल आरोप लगने पर ही इस्तीफा दे दिया था। दूसरी ओर उन्होंने कॉन्ग्रेस पर लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को बचाने का आरोप लगाया।

अमित शाह ने कहा, “जिस लालू प्रसाद यादव को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने अध्यादेश लाया था, जिसका राहुल गाँधी ने विरोध किया था, आज वही राहुल गाँधी पटना में लालू जी को गले लगा रहे हैं। विपक्ष का यह दोहरा चरित्र जनता भली-भांति समझ चुकी है।”

केंद्र सरकार लाई कौन से बिल, जिस पर विपक्ष कर रहा आपत्ति

संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक-2025 में प्रावधान है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक मामले (5 साल या उससे अधिक सजा वाले) में 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन करता है। सरकार का दावा है कि यह बिल राजनीति में शुचिता लाने और जनता के प्रति नेताओं की जवाबदेही बढ़ाने के लिए है।

विपक्ष ने इस बिल को संविधान के साथ छेड़छाड़ और गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने की साजिश करार दिया। विपक्षी सांसदों ने बिल की कॉपियाँ फाड़कर और शाह की ओर कागज फेंककर विरोध जताया।

जेपीसी के पास भेजा गया बिल

हंगामे के बीच शाह ने कहा कि सरकार इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का प्रस्ताव रखती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद शामिल होंगे। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि नैतिकता के मूल्य बढ़ें। हम ऐसे निर्लज्ज नहीं हो सकते कि हम पर आरोप लगें और हम संवैधानिक पद पर बने रहें।”

संविधान संशोधन बिल ने संसद में तीखी बहस और हंगामे को जन्म दिया है। अमित शाह ने इसे नैतिकता और पारदर्शिता का कदम बताया, जबकि विपक्ष इसे संविधान के साथ छेड़छाड़ करार दे रहा है। जेपीसी में इस बिल पर गहन चर्चा होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह विधेयक भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। जनता भी अब इस सवाल का जवाब ढूँढ रही है कि क्या जेल से सरकार चलाना उचित है, चूँकि वो कुछ समय पहले ही दिल्ली में ऐसा होते देख चुकी है, जिसमें पूरे दिल्ली की व्यवस्थाएँ चरमरा गई थी।

फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे… दुनियाभर से CSDS को मिलता है पैसा, संजय कुमार के ‘डाटा फ्रॉड’ के बाद फंड देने वाली सरकारी संस्थान ने भेजा नोटिस

देश में ‘वोट चोरी’ के नाम पर राजनीतिक बवंडर खड़ा करने वाले सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के संजय कुमार और कॉन्ग्रेस के युवराज राहुल गाँधी समेत कई लोगों के खिलाफ दिल्ली में शिकायत की गई है। फर्जी आँकड़ों के आधार पर ये खेल शुरू करने वाले संजय कुमार अब निशाने पर आ चुके हैं।

इस बीच, सीएसडीएस को सबसे ज्यादा फंडिंग देने वाली सरकारी संस्थान – भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) ने CSDS पर सवाल उठाए हैं और शो कॉज नोटिस जारी किया है। ICSSR ने सीएसडीएस पर फर्जी डेटा पेश करने और चुनाव आयोग की गरिमा को ठेस पहुँचाने का भी आरोप लगाया है। वहीं, सीएसडीएस की विदेशी फंडिंग खासकर जर्मनी की कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन से मिलने वाले करोड़ों रुपए अब जाँच के घेरे में हैं। आइए समझते हैं पूरा मामला..

मामला कैसे शुरू हुआ?

यह विवाद 17 अगस्त 2025 को तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि नासिक वेस्ट का वोटर संख्या लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव तक 47.38% बढ़ गई, जबकि हिंगणा में 42.08% की बढ़ोतरी हुई। साथ ही, रामटेक और देवलाली में वोटर संख्या में 40% की कमी आई। इन दावों को कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी बढ़ाया और चुनाव आयोग (ECI) पर सवाल उठाए। खेड़ा ने तो तंज कसते हुए लिखा, “अगली बार वे कहेंगे कि 2+2=420।”

लेकिन 19 अगस्त को संजय कुमार को कथित तौर पर अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने अपने पोस्ट को डिलीट कर दिया और माफी माँगी। उनका कहना था कि उनकी टीम ने डेटा की पंक्तियों को गलत पढ़ लिया था। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।

फर्जी आँकड़े सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर फैल चुके थे। असली डेटा देखें तो नासिक वेस्ट में वोटर संख्या में सिर्फ 6% और हिंगणा में 5.9% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि रामटेक और देवलाली में 3-4% की मामूली वृद्धि हुई।

ICSSR की कड़ी प्रतिक्रिया

इस घटना से नाराज होकर 19 अगस्त को ICSSR ने एक बयान जारी किया। शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली ICSSR सीएसडीएस को फंडिंग देने वाली मुख्य संस्था है। ICSSR के बयान में कहा गया कि सीएसडीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी (संजय कुमार) ने गलत डेटा पेश किया, जो बाद में वापस लेना पड़ा। इसके अलावा, सीएसडीएस ने चुनाव आयोग के SIR (सार्वजनिक जानकारी अभ्यास) को गलत तरीके से पेश करके मीडिया स्टोरीज छापीं।

ICSSR ने कहा कि चुनाव आयोग भारत की सबसे बड़ी लोकतंत्र की रीढ़ है और इसके सम्मान को ठेस पहुँचाना गंभीर अपराध है। उन्होंने सीएसडीएस पर डेटा से छेड़छाड़ और गलत नैरेटिव बनाने का आरोप लगाया, जो उनके अनुदान नियमों (Grant-in-Aid Rules) का उल्लंघन है। इसके जवाब में ICSSR ने सीएसडीएस को शो कॉज नोटिस जारी करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि यह घटना संस्थान और चुनाव प्रक्रिया दोनों की गरिमा को ठेस पहुँचाती है।

विनीत जिंदल ने दर्ज कराई एफआईआर

इसी बीच वकील विनीत जिंदल ने 19 अगस्त 2025 को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को एक शिकायत दी। उनकी शिकायत में राहुल गाँधी (विपक्ष के नेता), संजय कुमार (सीएसडीएस) और लोकसभा के सदस्य लोक सबा समेत कई लोगों पर आरोप लगाए गए। जिंदल का कहना है कि इन लोगों ने फर्जी डेटा फैलाकर जनता में अशांति फैलाई और सरकार के खिलाफ साजिश रची। उन्होंने कहा कि यह डेटा लोकसभा चुनावों को लेकर गलत था और चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी।

जिंदल ने अपनी शिकायत में लिखा कि ये लोग सोशल मीडिया और प्रेस के जरिए झूठी खबरें फैला रहे हैं, जिससे जनता का भरोसा लोकतंत्र पर कमजोर हो रहा है। उन्होंने माँग की कि इस मामले में सख्त कार्रवाई हो और जाँच शुरू की जाए।

सीएसडीएस की फंडिंग: कौन देता है पैसा?

अब सवाल उठता है कि सीएसडीएस को फंडिंग कहाँ से मिलती है? ICSSR सीएसडीएस का मुख्य फंडर है, जो सरकार के जरिए चलता है। लेकिन इसके अलावा सीएसडीएस को विदेशी फंडिंग भी मिलती है, जिस पर कई सवाल उठ रहे हैं।

सीएसडीएस की वेबसाइट और विदेशी योगदान की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों और संगठनों से पैसा आता है। इनमें फोर्ड फाउंडेशन, गेट्स फाउंडेशन (अमेरिका), आईडीआरसी (International Development Research Centre-कनाडा), डीएफआईडी (यूके), नॉराड (नॉर्वे), ह्यूलेट फाउंडेशन और जर्मनी की KAS जैसी एजेंसियाँ शामिल हैं। इसके अलावा स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान की कुछ एनजीओ से भी डोनेशन मिलते हैं।

हैरानी की बात है कि जर्मनी की सत्ताधारी पार्टी सीडीयू (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन ऑफ जर्मनी) से जुड़ी कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन सीएसडीएस के लिए सर्वाधिक फंडिंग करती है। सीएसडीएस की वेबसाइट पर विदेशी फंडिग से जुड़ी जो जानकारी साझा की गई है, वो जनवरी 2016 से लेकर अब तक की है।

हर तिमाही में कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को लाखों की फंडिंग की है। इन 10 सालों में देखा जाए, तो ये आँकड़ा कई करोड़ों में है। हालाँकि बदले में सीएसडीएस ने कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन के साथ मिलकर कुछ रिसर्स पेपर पब्लिश किए हैं, लेकिन फंडिंग के स्तर और काम को देखते हुए साफ है कि ये पैसा सिर्फ रिसर्च पेपर के लिए तो नहीं ही मिलता है।

CSDS के सहयोग से जर्मन संस्था द्वारा प्रकाशित पेपर

बीते एक साल की बात की जाए, तो कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को 25 लाख 9 हजार 190 रुपए ( 29 सितंबर 2024 को ₹4,58,950, 20 नवंबर 2024 को ₹4,39,300 / 17 दिसंबर 2024 को ₹4,38,600 रुपए / 27 फरवरी 2025 को ₹11,72,340) दिए।

वहीं, अमेरिका की UCLA लाइब्रेरी से ₹12.71 लाख का डोनेशन मिला। UCLA की लाइब्रेरी डिपार्टमेंट से जुड़ी रेचेल डेबलिंगर ने ये धन दिए हैं। उसने 24 जून 2024 को भी 24 लाख 92 हजार रुपए से ज्यादा की धनराशि दान दी है।

जनवरी 2024 में फ्रांस की FNSP संस्था के पास से 12 लाख रुपए से अधिक की धनराशि आई, तो ब्रिटिश लाइब्रेरी ने 5 फरवरी 2024 को 14 लाख रुपए से ज्यादा की धनराशि CSDS को दी।

इसके अलावा अतीत में जाकर देखें तो साल 2016 से अगले कई सालों तक कनाडा की संस्था की तरफ से हर साल करोड़ों की धनराशि लगातार मिलती रही। भारत सरकार ने एनजीओ की आड़ में विदेशी धन के प्रवाह को रोकने के लिए जब कदम उठाए, तो इसका असल सीएसडीएस की फंडिंग पर भी पड़ा। साल 2016 और 2025 के आँकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।

इन विदेशी फंडिंग का आँकड़ा हर तिमाही की रिपोर्ट में उपलब्ध है, जो सीएसडीएस की वेबसाइट पर सार्वजनिक है। आरोप है कि यह पैसा हिंदू समाज को जाति के आधार पर बाँटने और गलत नैरेटिव बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम में हिंदुओं को ओबीसी, ईबीसी, दलित और सवर्ण में बांटकर वोटिंग पैटर्न की रिपोर्ट छापी जाती है, जो अखबारों में सुर्खियाँ बनती हैं। लेकिन मुसलमानों की अंदरूनी जातीय दरारों (जैसे दलित मुसलमान, अशरफ) पर चुप्पी साध ली जाती है।

कई लोग इसे साजिश मानते हैं और कहते हैं कि सीएसडीएस का मकसद हिंदू समाज को तोड़कर कॉन्ग्रेस जैसे दलों को फायदा पहुँचाना है। योगेंद्र यादव और संजय कुमार जैसे नाम इस एजेंडे को हमेशा आगे बढ़ाते दिखते हैं। फिर, योगेंद्र कुमार किसान आंदोलन से लेकर उन तमाम मंचों पर खड़े नजर आते हैं, जो सरकार के विरोध में खड़े होते हैं।

फंडिंग रोकने की आशंका

ICSSR ने साफ कर दिया है कि सीएसडीएस का यह व्यवहार उनके नियमों का उल्लंघन है। शो कॉज नोटिस के बाद अगर सीएसडीएस संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता, तो फंडिंग रोकने की नौबत आ सकती है। यह कदम न सिर्फ सीएसडीएस के लिए बड़ा झटका होगा, बल्कि इस बात की भी जाँच शुरू हो सकती है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। अगर साबित हो जाता है कि विदेशी पैसा किसी खास राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल हुआ तो कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

विदेशी फंडिंग की वजह से अफवाहों में शामिल हुआ CSDS?

यह पूरा मामला अब साजिश के दावों से भरा हुआ है। एक तरफ जहाँ ICSSR और विनीत जिंदल इसे जानबूझकर फैलाई गई अफवाह मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सीएसडीएस इसे तकनीकी गलती बता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि एक प्रतिष्ठित संस्थान जैसे सीएसडीएस की टीम ने बिना जाँच-पड़ताल के डेटा क्यों पेश किया? क्या यह गलती सचमुच भूल थी या इसके पीछे कोई बड़ा प्लान था?

आरोप हैं कि विदेशी फंडिंग का दबाव सीएसडीएस पर है, जिसके चलते वह गलत डेटा पेश कर रहा है। हालाँकि ये तो तय है कि यह घटना भारतीय लोकतंत्र और शोध संस्थानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।

दूर तलक जाएगा ये मामला

सीएसडीएस को ICSSR के शो कॉज नोटिस और विनीत जिंदल की एफआईआर से साफ है कि यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख बचाने और फर्जी डेटा से नुकसान को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अगर सीएसडीएस दोषी पाया जाता है, तो न सिर्फ उसकी फंडिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि उसके शोध कार्यों पर भी सवाल उठेंगे।

दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग की जाँच शुरू होने से सीएसडीएस को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जनता के लिए भी यह सब एक सबक है कि सोशल मीडिया पर आने वाली हर खबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई जाँच लेनी चाहिए।

यह पूरा मामला सीएसडीएस, ICSSR और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। फंडिंग को लेकर उठे सवाल, फर्जी डेटा का विवाद, और एफआईआर सब कुछ मिलाकर यह दिखाता है कि शोध संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। ICSSR का कड़ा रुख और जिंदल की शिकायत से उम्मीद है कि सच सामने आएगा और दोषियों पर कार्रवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि जाँच निष्पक्ष हो, ताकि किसी का भी राजनीतिक फायदा न हो।

जुमे पर नमाज नहीं पढ़ी तो होगी 2 साल की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना: मलेशिया में तालिबानी फरमान का हो रहा विरोध, इसी मुल्क में है भारत का भगोड़ा जाकिर नाइक

मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज पढ़ने में नहीं शामिल होने वाले मुस्लिमों पुरुषों को 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। शरिया कानून को सख्ती से लागू करते हुए सरकार ने ये फरमान सुनाया है।

इसमें कहा गया है कि अगर बिनी किसी उचित कारण बताए शुक्रवार की नमाज में अनुपस्थित रहे, तो मुस्लिम पुरुषों को जेल जाना पड़ेगा। साथ ही 3000 रिंगिट यानी 61,000 रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

पहले लगातार 3 जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य था

टेरेंगानू में पीएएस यानी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी की सरकार है। पहले लगातार तीन शुक्रवार को नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को ये सजा दी जाती थी। लेकिन अब हर जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य के कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने बेरिटा हरियन अखबार को बताया, “नमाज केवल मजहबी प्रतीक नहीं है, बल्कि मुस्लिमों की खुदा के आज्ञा मानने से भी जुड़ा हुआ है।”

तालिबान बन जाएँगे हम- अजीज

इस पर मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने तर्क दिया है कि कुरान में कहा गया है कि ‘मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं’ होती। सरकार का फरमान इसके खिलाफ है। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन इसे अपराध बनाना गलत है। हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता है, वरना हम तालिबान बन जाएँगे।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया के इस राज्य में कोई विपक्षी पार्टी नहीं है। 12 लाख की आबादी है, जिसमें अधिकतर स्थानीय मुस्लिम हैं। सत्ताधारी पीएएस पार्टी ने 2022 में सभी 32 सीटों पर जीत हासिल की थी। ये हथकंडा पीएएस को अपनी सत्ता बचाने के लिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि दो साल के अंदर चुनाव होने वाले हैं।

इस्लाम मलेशिया का आधिकारिक मजहब है। मलेशिया का संविधान राज्यों को इस्लामी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उसका क्षेत्र परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए।

दूसरे राज्य ने भी कानून बनाना चाहा था

2019 में, मलेशियाई राज्य केलंतन ने अपने शरिया कानून को विस्तार देना चाहा था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यहाँ मलेशियाई संघ का कानून सबसे अहम है। इस फैसले को पीएएस नेताओं ने इस्लामी सत्ता पर हमले के रूप में प्रचारित किया और जमकर बवाल काटा।

तेरेंगानु के नए फरमान के खिलाफ भी लोग सड़कों पर आ गए हैं। कई लोगों ने कानूनी दबाव के जरिए मजहबी रिवाजों को मनवाने की ‘समझदारी’ पर सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कहा, “धर्मनिष्ठा दिल से आनी चाहिए, न कि लोगों के डर से”। कुछ लोगों ने चेताया है कि ऐसे कानून दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं।

मलेशिया में ही है भगोड़ा जाकिर नाइक

भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

पूजा ने ठोक दिया रेप-SC/ST एक्ट का केस, जाँच में पता चला वह मौके पर थी ही नहीं: जमीन विवाद में फर्जी मुकदमा करवाने वाले वकील को उम्रकैद, जानिए क्या है मामला

लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक वकील परमानंद गुप्ता को झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही ₹5.10 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। वकील ने एक जमीन विवाद में पड़ोसियों को फँसाने के लिए पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली महिला से झूठा रेप केस दर्ज करवाया। जाँच में सभी आरोप बेबुनियाद निकले।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वकील परमानंद गुप्ता ने एक जमीन विवाद में अपने पड़ोसी अरविंद यादव और उनके परिवार को फँसाने के लिए दलित महिला पूजा रावत से बलात्कार और उत्पीड़न का फर्जी केस दर्ज कराया। पूजा रावत वकील की पत्नी संगीता गुप्ता के ब्यूटी पार्लर में काम करती थी।

मुकदमे में आरोप लगाया गया कि मार्च से जुलाई 2024 के बीच उसके साथ दुराचार हुआ। वकील परमानंद गुप्ता का मकसद था कि इस आरोप के बाद उसके विरोधियों को जेल हो जाएगी और वह व्यक्तिगत बदला भी ले लेगा।

जाँच में कैसे खुला फर्जीवाड़ा?

सीबीआई जाँच अधिकारी ने पाया कि पूजा रावत घटना के समय 1 मार्च 2024 से 24 जुलाई 2024 तक मौके पर मौजूद नहीं थी। जहाँ उसे किरायेदार बताया गया था, वह मकान उस समय निर्माणाधीन था। मोबाइल लोकेशन, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज़ों से साबित हुआ कि मामला पूरी तरह फर्जी है।

पूजा रावत ने कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि वकील परमानंद गुप्ता और उसकी पत्नी ने दबाव बनाकर झूठे बयान दिलवाए। वह डर के कारण मजिस्ट्रेट के सामने झूठा बयान देने को मजबूर हुई।

कोर्ट का फैसला: उम्रकैद और AI निगरानी का आदेश

स्पेशल जज विवेकानंद त्रिपाठी ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि दूध से भरे महासागर में खट्टे पदार्थों की बूंदों को गिरने से नहीं रोका गया तो पूरा महासागर खराब और नष्ट हो जाएगा।” जज ने यह भी कहा कि अगर ऐसे वकीलों को नहीं रोका गया तो भारतीय न्यायपालिका पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।

कोर्ट ने बताया कि परमानंद गुप्ता ने 11 और पूजा गुप्ता ने 18 फर्जी मुकदमे दर्ज करवाए, इसलिए दोषी वकील को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा कोर्ट ने झूठे मुकदमों को रोकने के लिए AI का उपयोग करने का निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ रोकी जा सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR दर्ज होते ही मुआवजे की राशि न दी जाए, बल्कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही दी जाए।

कोर्ट ने पूजा रावत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। हालाँकि, अदालत ने उसे चेतावनी दी कि अगर वह भविष्य में ऐसा करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

‘मकान नंबर- 0’ का मतलब वोट चोरी नहीं, यह पात्र मतदाता को वोट की गारंटी: राहुल गाँधी की ‘बाल बुद्धि’ में यह घुसने से रहा, पर आप जान लीजिए इसके बारे में सब कुछ

भारत निर्वाचन आयोग ने राहुल गाँधी से अपने आरोपों के साथ औपचारिक शिकायत दर्ज कराने को कहा है, ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन विपक्ष के नेता ने अभी तक किसी भी प्राधिकारी के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। राहुल गाँधी के निराधार आरोपों के बाद ‘मकान नंबर 0’ को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है।

लगभग दो हफ्ते पहले राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलीभगत करके, लाखों फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए हैं। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई लोगों के मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा हुआ था। यानी ये फर्जी मतदाता थे, जिनके घर का पता नहीं था।

अपने आरोपों की पुष्टि के लिए राहुल गाँधी ने एक दस्तावेज भी दिखाया। उन्होंने दावा किया कि यह कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची है। इसमें मकान नंबर ‘0’ वाले कई मतदाता हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार (17 अगस्त 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गाँधी के दावों का खंडन किया। मकान संख्या ‘0’ को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि बेघर लोगों को ये नंबर दिया गया है। इनका पता स्पष्ट नहीं होता है।

चुनाव आयोग ‘मकान संख्या 0’ का इस्तेमाल इसलिए करता है ताकि वे मतदाता छूट न जाएँ, जिनके पास स्पष्ट रूप से घर का पता नहीं है या जिनका कोई घर नहीं है। ऐसे लोगों का चुनावी फॉर्म में पूरा पता दर्ज नहीं होता है। कई बार संयुक्त परिवार, साझा आवास या किराए के घरों में एक ही पते पर कई लोगों के नाम दर्ज होते हैं। ऐसे में एक ही पते पर कई मतदाताओं के नाम भी मिलते हैं।

2013 में शुरू मकान संख्या ‘0’

चुनाव आयोग ने मकान संख्या शून्य देने की शुरूआत 2013 में की थी। उस वक्त बेघर लोगों का मतदाता पहचान पत्र बनाने का काम शुरू हुआ। सबसे पहले दिल्ली में इसे लागू किया गया। पहली बार बेघर लोगों को मतदाता पहचान पत्र जारी किए गए।

एक ब्लॉक जिला अधिकारी (बीडीओ) ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मतदाता बनने के लिए किसी बेघर व्यक्ति को फॉर्म 6 भरना पड़ता है। वह जिस घर में रहता है, उसका निवास प्रमाण पत्र और बर्थ सर्टिफिकेट देना होगा। फॉर्म जमा करने के बाद, बीएलओ सत्यापन के लिए दिए गए पते पर जाता है।

दिल्ली में मकान संख्या ‘0’ वाले बेघर मतदाता

द इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रीय राजधानी के कुछ मतदाताओं से बात की, जिनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा है। पश्चिम बंगाल से आए 67 वर्षीय अपूर्व चटर्जी ने बताया कि वह शंकर गली सीता राम बाजार के एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते में ‘0’ लिखा है। चटर्जी ने ये भी कहा, “मैंने 2024 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ इस फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी अपना वोट डाला था।”

रैन बसेरा बंगला साहिब आश्रय गृह में रहने वाले एक बेघर व्यक्ति ने भी मीडिया को बताया कि उसने घर के पते ‘0’ का इस्तेमाल करके एक बैंक खाता भी खोला है। वह पहले वसंत कुंज के शेल्टर होम में रहता था, जहाँ से यहाँ आया है। उसने बताया कि 2013 से चुनावों में उसने वोट डाला था, वोटर आईडी कार्ड में उसके घर का पता ‘0’ लिखा है।

एक और बेघर महिला, दर्शना ने राष्ट्रीय राजधानी के एक शेल्टर होम में रहते हुए अपना मतदाता पहचान पत्र बनवाया। दर्शना के पास आधार कार्ड नहीं है। वह कई साल पहले पंजाब से दिल्ली आई थी जब उसका परिवार उसे छोड़कर चला गया था। वह अब एक दुकान में काम करती है। उसका कहना है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में उसने वोट डाला था।

राहुल की संसदीय सीट में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता

‘0’ मकान संख्या वाले मतदाता सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश का रायबरेली लोकसभा क्षेत्र भी शामिल है। गाँधी परिवार का गढ़ रहे रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में कई मतदाता ऐसे हैं, जो मकान संख्या ‘0’ वाले हैं। कई मतदाताओं का पता भी एक ही है। क्या इसका मतलब यह है कि राहुल गाँधी ने फर्जी मतदाताओं का इस्तेमाल करके अपनी सीट जीती है?

कर्नाटक में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता

करीब एक हफ्ते पहले, कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र में मकान संख्या ‘0’ वाले कई मतदाताओं के वीडियो सामने आए थे। इसमें कई लोगों ने अपना मतदाता पहचान पत्र दिखाया। इनमें उनके घर का पता ‘0’ लिखा हुआ था। इनमें से कुछ मतदाता 10-15 सालों से इस इलाके में रह रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके घरों पर नंबर नहीं थे। चुनाव अधिकारियों ने उनके मतदाता पहचान पत्र में मकान संख्या की जगह ‘0’ लिख दिया। उनके चुनावी फोटो पहचान पत्र (EPIC) में भी पते की जगह मकान संख्या 0 लिखा था।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अपने आरोपों के सबूत देने के लिए राहुल गाँधी को एक हफ्ते की मोहलत दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपनी प्रेस वार्ता में आरोप को लेकर सबूत माँगे थे। सवाल यह है कि धोखाधड़ी का चुनाव आयोग पर आरोप लगा कर हंगाम खड़ा करने वाले राहुल गाँधी आरोपों की जाँच क्यों नहीं कराना चाहते।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर… हर जगह से अखिलेश यादव की हुई थू-थू, ‘वोट चोरी’ पर बड़बोलापन सपा सुप्रीमो को पड़ा भारी: एक-एक DM ने बताया फैक्ट

‘वोट चोरी’ के नाम पर राहुल गाँधी के सुर में सुर मिलाते हुए अब अखिलेश यादव भी राग अलापने लगे हैं। सपा सुप्रीमो ने उत्तर प्रदेश के कई जिलों जैसे- लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी और जौनपुर की ओर उंगली उठाते हुए आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने फिर इन दावों को खारिज कर पोल खोल दी। जाँच में सारे आरोप झूठे निकले। इतना ही नहीं, इन जिलों के DM ने अखिलेश यादव के पोस्ट पर खुद फैक्ट चेक करते हुए जवाब भी दिया है।

अखिलेश यादव का आरोप

अखिलेश यादव ने 17 अगस्त 2025 को X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर बताया कि यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, जो वोट चोरी का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने इस संबंध में चुनाव आयोग को कई सबूत दिए हैं, लेकिन आयोग इन्हें नजरअंदाज कर रहा है। इसके अलावा अखिलेश यादव ने 4 तस्वीरें भी पोस्ट में शेयर की, जो लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर की है।

अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि लखनऊ के बक्शी का तालाब में 13 मतदाताओं के नाम हटाए गए। कासगंज के अमांपुर में 8 मतदाताओं के नाम हटाए गए। बाराबंकी के कुर्सी में 2 मतदाताओं के नाम हटाए गए। जौनपुर में 5 मतदाताओं के नाम हटाए गए। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दी गई डिजिटल रसीद अगर गलत साबित होती है तो ‘डिजिटल इंडिया’ की विश्वसनीयता भी खतरे में है।

लखनऊ DM का फैक्ट चेक

अखिलेश का दावा था कि लखनऊ के ‘बक्शी का तालाब’ क्षेत्र में 13 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए। लखनऊ DM ने जब जाँच की तो पता चला कि सिर्फ एक मतदाता का नाम 2012 में हटाया गया था। इसका कारण यह था कि वह व्यक्ति उस क्षेत्र में नहीं रहता था। बाकी सभी 12 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं।

कासगंज DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि कासगंज के अमांपुर क्षेत्र से 8 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। काजगंज DM ने जब इसकी जाँच की तो पाया कि 7 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दो बार लिखे हुए थे। नियमानुसार एक नाम को विलोपित (हटा दिया गया) किया गया। एक मतदाता का नाम अभी भी मतदाता सूची में है।

बाराबंकी DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि बाराबंकी के 266 कुर्सी क्षेत्र में 2 मतदाताओं ने शपथ पत्र दिया था कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। लेकिन जब बाराबंकी DM ने जाँच की तो पाया कि दोनों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। किसी का भी नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया गया है।

जौनपुर DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि जौनपुर में पाँच मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। जौनपुर DM ने जब की तो पाया कि ये सभी पाँचों मतदाता 2022 से पहले ही मर चुके थे। इसकी पुष्टि उनके परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने भी की थी। इसलिए इन पाँचों मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाए गए थे।

आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से नियमानुसार और पारदर्शी है। जिन मामलों में नाम हटाए गए, वे या तो दोहरे नामांकन के कारण थे या फिर मतदाता की मृत्यु हो गई थी। इस तरह के झूठे आरोप लगाकर अखिलेश यादव न केवल एक संवैधानिक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि जनता को भी गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ लोगों को हायर कर चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगवाया, जिनका जवाब ECI ने फैक्ट चेक के साथ देकर बोलती बंद की।

PM हो या CM, या फिर केंद्र से लेकर राज्य तक के मंत्री… जेल में रहकर नहीं चला पाएँगे सरकार: जानिए किस स्थिति में 31वें दिन ‘दागी’ अपने आप पद से हो जाएँगे मुक्त

लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने संविधान संशोधन से जुड़े 3 विधेयक पेश किए। बुधवार (20 अगस्त 2025) को सदन में पेश करते समय विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। इन विधेयकों में प्रावधान है कि आपराधिक मामलों में जेल गए पीएम, सीएम या मंत्री अपने पद पर बने नहीं रह सकेंगे।

ये विधेयक हैं-

  1. संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025
  2. संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025
  3. जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025

130वाँ संविधान संशोधन विधेयक

  1. संविधान संशोधन विधेयक 2025 के तहत अनुच्छेद 75, 164 और 230ए में संशोधन कर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री को हटाने का प्रावधान किया जा रहा है।

विधेयक में कहा गया है, ” कोई भी मंत्री जो गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया जाता है या 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, तो प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकते हैं। अगर उसे हटाया नहीं जाता है तो वह 31वें दिन से पदमुक्त माना जाएगा।”

इसी तरह प्रधानमंत्री भी आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किए जाते हैं या 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, जिसमें कम से कम 5 साल जेल की सजा हो सकती है, तो उन्हें भी पद से हटना होगा। अगर नहीं हटते हैं तो 31वें दिन उन्हें पदमुक्त समझा जाएगा।

संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025

केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों के कारण गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए मुख्यमंत्री या मंत्री को हटाने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक 2025 लाया गया है। इसमें केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 की धारा 45 में संशोधन किया जाएगा।

ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री या दूसरे मंत्री को हटाने के लिए कानूनी प्रावधान किया जा रहा है। इसमें कहा गया है कि ऐसे आपराधिक मामले, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, उसके तहत गिरफ्तार मंत्री को उसके पद से हटाया जा सकता है या 31वें दिन वह खुद ही पदमुक्त माना जाएगा।

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक में जुड़ेगा खंड

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 में मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और 30 दिन तक हिरासत में रहने पर पदमुक्त हो जाने का प्रावधान है। इससे पहले जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए इसकी धारा 54 में संशोधन कर 4ए जोड़ा जा रहा है।

इसमें बताया गया है कि 30 दिन हिरासत में रहने पर 31वें दिन मुख्यमंत्री की सलाह पर उपराज्यपाल आरोपित मंत्री को पद से हटा देंगे। अगर मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं तो अगले दिन वह खुद ही पदमुक्त हो जाएगा।

विधेयक का मकसद जनता में विश्वास पैदा करना है ताकि संवैधानिक तौर पर नैतिकता की रक्षा की जा सके। इसमें कहा गया है कि जनता अपना प्रतिनिधि विश्वास के साथ चुनती है। लोगों की आशाओं पर खड़े उतरना इनका कर्तव्य है। इसमें ये भी कहा गया है कि मंत्रियों का आचरण किसी भी संदेह से परे होना चाहिए।

दिल्ली के सीएम ने जेल से चलाई सरकार

दिल्ली में शराब घोटाले को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। केजरीवाल जेल गए थे, लेकिन उन्होने पद से इस्तीफा नहीं दिया। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने सीएम पद छोड़ा। दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का भी रहा। उन्हें शराब घोटाले को लेकर गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में वे जेल गए थे। जनता की अदालत में वे भी हार गए। दिल्ली के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को 2022 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया। वो जेल गए लेकिन पद से इस्तीफा काफी दिनों बाद दिया।

राहुल गाँधी ने बिहार में जीप पर चढ़वाकर जिससे कहलवाया ‘वोट चोरी’, वो निकला बड़ा फ्रॉड: चुनाव आयोग ने राजद BLA सुबोध कुमार के हर झूठ की खोली पोल, देखिए सबूत

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी इस समय बिहार के नवादा में ‘वोट अधिकार यात्रा’ पर निकले हुए है। रैली के दौरान राहुल गाँधी की गाड़ी पर एक शख्स सवार होता है और चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर कहता है कि ‘वोट चोरी’ हुई है और उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।

आश्चर्य नहीं कि चुनाव आयोग की फैक्ट चेक में यह दावा पूरी तरह झूठा निकला। चुनाव आयोग ने बताया कि सुबोध कुमार नाम का यह शख्य कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट (BLA) हैं और उसका नाम कभी भी वोटर लिस्ट में था ही नहीं।

चुनाव आयोग पर राहुल गाँधी का ‘नकली ड्रामा’

राहुल गाँधी को तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं। वो हर चुनाव से पहले बच्चों जैसी जिद पर अड़े रहते हैं कि ‘वोट चोरी हो गई’ और हर बार चुनाव आयोग फैक्ट चेक कर उनके झूठ को उजागर करता है, फिर भी वो वही रट लगाते रहते हैं।

दरअसल, अपनी ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान नवादा में एक शख्स को मंच पर माइक थमाकर राहुल गाँधी ने कहा, “इनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, यही लाखों लोगों के साथ हो रहा है।” यह शख्स सुबोध कुमार था, जिसने राहुल गाँधी के रथ पर चढ़ते ही कैमरे के सामने आरोप जड़ा कि उसका नाम वोटर लिस्ट से गायब है।

राहुल गाँधी ने इस पूरे वाकये को रैली से लाइव दिखाया और फिर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलाया। X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “जो सुबोध कुमार जी के साथ हुआ, वही लाखों लोगों के साथ बिहार में हो रहा है। वोट चोरी भारत माता पर आक्रमण है– बिहार की जनता ये होने नहीं देगी।”

सुबोध कुमार नाम के व्यक्ति को मंच पर बुलाना, माइक थमाना और कैमरे के सामने आरोप लगवाना… यह सब पहले से स्क्रिप्टेड था। राहुल गाँधी ने इसे ‘भारत माता पर हमला‘ बताया। लेकिन असल हमला जनता की समझदारी पर किया गया छल था। रंजू देवी के झूठ के बाद अब सुबोध कुमार पर राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की कहानी हर बार फेल होती है।

फैक्ट चेक: चुनाव आयोग ने आरोपों को किया तार-तार

चुनाव आयोग की विस्तृत जाँच रिपोर्ट के अनुसार, सुबोध कुमार नाम का व्यक्ति कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट है। 29 अक्तूबर 2024 को प्रकाशित सूची और फिर 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में भी सुबोध कुमार का नाम कभी भी मतदाता सूची में नहीं था। उसके परिवार के कुछ सदस्य सूची में शामिल है, लेकिन खुद उसका नाम कभी दर्ज नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर प्रकाशित विलोपित मतदाताओं की सूची में भी उसका नाम दर्ज नहीं है।

चुनाव आयोग बताता है कि सुबोध कुमार ने ना तो फॉर्म-6 भरा और ना ही किसी प्रकार का घोषणा पत्र (Annexure-D) दिया। जब बीएलओ ने विलोपित मतदाताओं की सूची बूथ पर चिपकाई तब सुबोध वहीं मौजूद था, लेकिन उसने कोई आपत्ति नहीं दर्ज की। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वह स्वयं हस्ताक्षर कर चुका है, फिर भी मंच पर दावा किया कि उसका नाम हटा दिया गया। चुनाव आयोग ने कहा कि सुबोध कुमार ने जो आरोप लगाए, वो निराधार एवं असत्य है। यदि वे भविष्य में नियमानुसार फॉर्म-6 एवं घोषणा पत्र प्रस्तुत करेंगे तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है।

बार-बार दोहराया गया झूठ

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने इस तरह का निराधार आरोप लगाया है। इससे पहले, औरंगाबाद में उन्होंने रंजू देवी नाम की एक महिला का मामला उठाया था, यह दावा करते हुए कि उनका नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। लेकिन बाद में रंजू देवी ने खुद एक वीडियो में बताया कि उनका नाम मतदाता सूची में मौजूद है और उन्हें गुमराह किया गया था।

राहुल गाँधी का बार-बार एक ही तरह के निराधार आरोप लगाना, एक बच्चे की तरह रट्टा लगाने जैसा लगता है, जो ‘फैक्ट चेक’ के बाद भी अपनी बात पर अड़े रहते हैं। यह न सिर्फ उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी गलत आरोप लगाने का प्रयास करता है।